समाज सेवक नैन सिंह बोनाल का त्याग

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
भारत के सुन्दरतम पर्वत श्रृंखला न्यौला पंचाचूली हिम श्रृंखल’ के सामने ‘‘स्यं सैं च्यूति गबला की थाती माटी’’ पर बसा गाँव-बोन के अत्यधिक आर्थिक कमजोर परिवार में भावी सामाजिक चिन्तक-बालक का जन्म 11 जुलाई 1940 में हुआ। जिनका नाम उनके परिवारजनों ने नैन सिंह रखा। नैन सिंह जी के माता का नाम-श्रीमती सुरमा दताल बोनाल और पिता का नाम-श्री ज्ञान सिंह बोनाल ‘पूनराठ’ था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे स्कूली शिक्षा में अक्षर ज्ञान की औपचारिक शिक्षा भी
ठीक से प्राप्त नहीं कर पाए। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन में बहुआयामी रूप से बहुत तरक्की किया। उनका व्यक्तित्व-बहुमुखी (सम्वेदनशील, कर्मशील, कठोर परिश्रमी) स्नेहशील और मिलनसार था। नैन सिंह जी अपने साक्षात् जीवन में सामाजिक सुधार हेतु निरन्तर चिन्तनशील रहते थे।
श्रद्धेय नैन सिंह जी की अनौपचारिक शिक्ष और आजीविका- नैन सिंह जी ने अपने साक्षात् जीवन के अन्तिम दौर तक निरन्तर बहुत संघर्षशील तप किए। नैन सिंह जी की छोटी उम्र में ही उनके पिता जी की अचानक मृत्यु हो गयी जिस कारण उनके परिवार का भरण-पोषण की अतिरिक्त बाहरी जिम्मेदारी और आर्थिक सुधार की पूरी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गयी। इन्हीं कारणों से उन्होंने होश सम्भालते ही लक्ष्य 10-11 साल की उम्र से ही परिवार की आर्थिक रूप से मदद करने हेतु गाँव में सहायक (सहयोगी) के रूप में कार्य करना शुरू किया। जैसे- दूसरों के भेड़-बकरी को चराने में मदद करना और अन्य सहायक रूप के कार्य करना। नैन सिंह जी ने जैसे ही मानसिक रूप से समझ व शारीरिक रूप से सक्षम होने पर गाँव के मददगार लोगों के साथ मिलकर अपना छोटा-सा कार्य शुरू करने लगे। जैसे- अपनी थोड़ी सी भेड़-बकरी को दूसरों के भेड़-बकरियों की टोली के साथ ले जाकर सुदूर क्षेत्रों पर सामग्री विनिमय हेतु व्यापारिक कार्य पर जाना। आगे चलकर नैन सिंह बोनाल जी ने सरकारी संस्था के पशुपालन विभाब में दैनिक वेतनभोगी के तौर पर गाँव-ग्रामीणों से दूर जीवन का प्रथम चरण शुरू किया। नैन सिंह जी ने मात्रा 19 साल की उम्र से सन् 1959 में भारत-तिब्बत सीमान्त क्षेत्र बिदंग में रक्षा सीमा प्रहरी के कार्यालय वायरलैस चैक पोस्ट पर सहायक (हैल्पर) के रूप में अस्थाई नौकरी की। यह नौकरी मात्रा छः माह मई से अक्टूबर तक के लिए ही होती थी। तब वायरलैस के माध्यम से बातचीत करते समय वायरलैस की मशीन को हाथ से घुमाना पड़ता था। वे अपने कार्य के प्रति ईमानदारी व लगन से कठिन परिश्रम करते थे। शिक्षा के प्रति निरन्तर जिज्ञासा रखने के कारण उन्होंने इसी कार्यालय के कर्मचारियों की मदद से शिक्षा का प्रथम उद्देश्य ‘अक्षर ज्ञान’ की अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त की। सन् 1962-63 में मात्रा 22 साल की उम्र पर में नैन सिंह जी ने पांगू में स्थित सरकारी भेड़ पालन केन्द्र पर भेड़ों की देखरेख करने की नौकरी की। नैन सिंह जी ने जहाँ-जहाँ नौकरी की वहीं-वहीं अपनी लिखाई-पढ़ाई में रूचि व लेखनी पर विशेष ध्यान देते रहे और शिक्षित लोगों से वे निरन्तर शिक्षा लेते रहे। नैन सिंह बोनाल जी ने औपचारिक शिक्षा को प्राथमिक स्कूल से अक्षर ज्ञान की शिक्षा ठीक से प्राप्त न करने के बाद भी उन्होने अपनी शिक्षा अभिरूचि जिज्ञासा से औपचारिक शिक्षा को अनौपचिरिक रूप से प्राप्त किया। शिक्षा सम्बन्धित ज्ञान-कर्मशील योग्यता और उनके ईमानदार व्यक्तित्व के कारण क्षेत्राय ग्रामीणों के अनुमोदन पर उन्होंन सन् 1966 से 1969 तक बौंन का ग्रामीण पोस्ट आफिस में ग्रामीण पोस्ट मास्टर के पद पर सरकारी कार्य किया। नैन सिंह जी की जिन्दगी में विशेष मोड़ तब आया जब उन्हें ‘बौंन-दुग्तु’ साधन सहकारी समिति में गणक (काउन्टेन्ट) पद पर काम करने को मिला। उन्होंने इन्हीं दिनों सहकारी समिति का कार्य भी किया। इन्हीं वजहों से सरकारी सहायता क्षेत्रा के क्रियाविधि् (कार्य प्रणालियों) के बारे में जानने-समझने का मौका मिला। सहकारी समिति के कार्यों के माध्यम से उनका दारमा के चौदह गाँवों के प्रबुद्धजनों और बुद्धजीवियों से मिलन व उनसे व्यक्तिगत व्यक्तित्व से परस्पर
मैत्रिक सम्बन्ध् बने। उन्हें सहकारी कार्यों के सम्बन्ध् में समय-समय पर धारचूला ब्लॉक स्तर के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ बैठकों में शामिल होकर विचार-विमर्श करने का अवसर मिला।
ग्रमीण कार्यशैली से हटके बाहर शासनिक-प्रशासनिक संस्था के कार्यशैली व सरकारी तन्त्रा में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में जानने-समझने के कारण वे शिक्षा को और अध्कि महत्व देने लगे। उनसे मिलने वाले प्रत्येक अशिक्षित व्यक्तियों को अनौपचारिक रूप से प्रौढ़ शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा देते थे और उनके परिवारजनों का शिक्षा के प्रति उत्साहित करते हुए औपचारिक संस्थागत शिक्षा ग्रहण करने को कहते थे।
सामाजिक चिन्तक श्रद्धेय नैन सिंह के सामाजिक जन जागृति अभियान पर महत्वपूर्ण भूमिका- दारमा लुंग्बा के क्षेत्रजनों ने सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए सत्तर-अस्सी के दशक में जन जागृति अभियान चलाया। यह अभियान दारमा समाज सुधारक संस्था का गठन कर चलाया गाया। इस संस्था का सूत्रधार-नेतृत्वकर्ता नैन सिंह बोनाल थे। उन्होंने दारमा घाटी के उस समय के सक्रिय नवयुवकों नवयुवतियों और विद्यार्थियों के साथ मिलकर टोली बनाकर कई बार पारम्परिक संस्कृति और संस्थागत शिक्षण के प्रति जागरूकता कार्यक्रमों को जमीनी स्तर से शुरू कर क्षेत्रजनों के मन मस्तिष्क तक इसकी महत्वता को पहुँचाया जिसका एक उदाहरण ‘चौदह गाँव-चौदह दिन’ ‘पाँच सूत्रीय जन जागृति कार्यक्रम’ भी था जो 1 बाल विवाह प्रतिबन्ध्, 2 नशाबन्दी (मद्य निषेध्) 3 द्वृक्षारोपण, 4 शिक्षा-साक्षरता, ;5 सफाई आन्दोलन ;स्वास्थ्य के प्रति स्वच्छताद्ध आदि मुख्य बिन्दु थे।
सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल जी ने जून सन् 1974-1975 में इस पाँच सूत्रीय जन जागृति अभियान में शामिल नवयुवकों-नवयुवतियों एवं विद्यार्थियों के समूह का नेतृत्व करते हुए, दारमा का दूरस्थ गाँव-सिपू से लेकर गाँव-सेला तक के चौदह गाँवों में चौदह दिन कई घण्टे पैदल चलकर घर-घर जाकर इस अभियान को चलाया। इस अभियान के निम्नलिखित उद्देश्य ;1 नशाबन्दी, ;2 शिक्षा-साक्षरता, ;3 द्क्षारोपण, ;4 बाल विवाह प्रतिबन्ध, ;5 सफाई आन्दोलन (स्वास्थ्य के प्रति स्वच्छता) होने वाले लाभ व नुकसान पर दारमा लुंग्बा के साथ-साथ दिलंग दारमा के क्षेत्राजनों के मन-मस्तिष्क (अन्तरात्मा) जन जगृति पैदा कराया जिसका काफी लाभ रं लुंग्बा जनों को हुआ। इस सामाजिक पाँच सूत्राय जन जागृति अभियान से नशाबन्दी, शिक्षा स्वास्थ्य, बाल विवाह रोकथाम व प्राकृतिक पेड़-पौधें से होने वाले लाभ के प्रति समाज को कापफी लाभ हुआ।
सामाजिक चिन्तक- श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल ने पुनः ‘दारमा यवक संघ’ का नेतृत्व कर जनवरी 1977 में जौलजीबी दाँतू खे़डा से लेकर बलुवाकोट घाटीबगड़, छारछम-नयाबस्ती, कालिका, गोठी एवं निंगालपानी-गलाती तक के ग्रामीणों का जून सन् 1975 में चौदह गाँव चौदह दिन ‘पाँच सूत्राय जन ‘जागृत अभियान’ कां याद दिलाते हुए पुनः नशाबन्दी, बाल विवाह रोकथाम, कुटिर उद्योग, शिक्षा स्वास्थ्य के प्रति जनचेतना का वृहद अभियान चलाया जिसे सफलताप पूर्वक सम्पन्न किया। उपरोक्त दोनों जन जागृति (जन जागरण) में बहुत सारे दारमा के नवयुवक-नवयुवती और छात्र-छात्रायें शामिल थे। उनमें से कुछ युवकों के नाम इस प्रकार से है। कल्याण सिंह सोनाल, राम सिंह सोनाल, चन्द सिंह ग्वाल, पुष्कर सिंह सेलाल, फली सिंह दताल, श्री लाल सिंह बोनाल और बिशन सिंह बोनाल। समय-समय पर हुए इस प्रकार से जन चेतना कार्यक्रम के फलस्वरूप ही आज दारमा रं लुंग्बा के अनेक नौजवान शिक्षा प्राप्त कर उच्च पदां पर आसीन होकर दारमा का नाम रोशान कर रहे हैं। सन् 1980 जुलाई-अगस्त कोठी में जबरदस्त भूकम्प आया जिसमें स्थानीय लोगों की बहुत चल-अचल सम्पत्तियों का नुकसान हुआ। उस वक्त भी नैन सिंह बोनाल जी ने निःस्वार्थ ध्रातली सेवक के रूप मे भूकम्प पीड़ितों को राहत पहुँचाने हेतु लगातार कई महिने तक कर्तव्यनिष्ठ सिपाही के तौर पर शासन-प्रशासन की सहायता कर विशेष योगदान दिया। उस समय के सरकारी अधिकारियों ने उनकी इस सेवा कार्य की खूब प्रशंसा की और इन अध्किरियों और क्षेत्राय सामाजिक संस्थाओं ने उनके द्वारा क्षेत्रा में पूर्व से 1980 अगस्त तक के समाज सेवा, सामाजिक सेवा कार्यों की गणना कर उन्होंने समाज को दिये अपन े महत्वपूर्ण समय की महत्वता को समझते हुए कार्य पफल के रूप में श्रद्धेय नैन सिंह जी का नाम राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए नामित करने की बात की। पर दुर्भाग्यवश कुछ षड़यन्त्राकारियों के कारण उनका नाम इस पुरस्कार के लिए नामित नहीं हो पाया। समाज सेवक नैन सिंह जी ने सामाजिक क्षेत्रा से लेकर कई सरकारी संस्थानों में काम करते हुए अपनी अन्तर आत्मा के अनुसार सामाजिक दायित्वों को पूर्ण कर्तव्यनिष्ठा एवं ईमानदारी से निभाया। जिस वजह से स्थानीय समाज उनके नाम को समय-समय पर जरूर स्मरण करते हैं। यही उनके लिए सर्वोपरि पुरस्कार के समान है। समाज सेवक नैन सिंह बोनाल ने सच्चे समाज सेवक के रूप में दारमा क्षेत्रा और राज्य सरकार द्वारा संचालित समाज कल्णण विभाग से जनमानस को लाभ पहुँचाने के लिए बहुत से कार्य किये। नैन सिंह बोनाल जी ने सामाजिक हित के लिए परस्पर विरोध् की राजनीति के बिना ;किसी भी पक्ष-विपक्ष के बहकावे में आए बिनाद्ध अपने विवेक से जनमानस क्षेत्राजनों के परस्पर प्रेम एकता हेतु सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में समाज सेवा का कार्य उनसे जितना हो सके वे कार्य उन्होंने पूर्ण ईमानदारी से किया। इन्हीं कारणों से उन्हें रं लुंग्बा का सामाजिक प्रेरणास्रोत माना जाता है।
सामाजिक चिन्तक- नैन सिंह जी के सपफल प्रयासों से हम सब आज दंग्ते दंग में मन्दिरों की सुन्दर श्रृंखला देख पा रहे हैं ;जब इस पवित्रा दंग्तों देव दं बं पर मन्दिर निर्माण कार्य शुरू होने वाला था।
सभी खरीदे निर्माण सामग्रियों व कार्य करने वाले लोग यहाँ पहुँच गये थे। मन्दिर निर्माण कार्य शुरू करने के लिये खुदाई शुरू करनी थी तब यहाँ सर्वप्रथम खुदाई शुरू करने के लिए कोई क्षेत्राजन व निर्माण कार्य करने वाला व्यक्ति तैयार नहीं हुआ क्योंकि कुछ रूढ़िवादी सोच वाले लोगों ने अपफवाह फैला दी थी कि इस पवित्रा दंग्तों दं बं भू-भाग में जो खुदाई करेगा उसे प्रकृति और दैवीय शक्ति का दण्ड झेलना पड़ेगा। उस समय रूढ़िवादी सोच के डर से कोई भी व्यक्ति यहाँ खुदाई शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। इस विकट समस्या पर रूढ़िवादी सोच से हटकर श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल ने कहा कि मैं यहाँ सर्वप्रथम खुदाई करूंगा। चाहे मुझे प्रकृति और दैविय दण्ड झेलना पड़े। मैं झेलूँगा कहते हुए खुदाई की सर्वप्रथम शुरूआत उन्होंने मन्दिर निर्माण कार्य हेतु किया तभी इस पवित्रा दंग्तों देव दं बं पर मन्दिर निर्माण कार्य शुरू हो पाया। ;कथन नैन सिंह बोनाल जी की पत्नी आवती गुंज्याल बोनालद्ध समाज सेवक श्र(ेय नैन सिंह बोनाल के कार्यपफल से ही वर्तमान में पवित्रा दंग्तों देव दं बं पर इस प्रकार से मन्दिरों की सुन्दर श्रृंखला देख पा रहे हैं।
सन् 1977 संगठन (समिति) स्यांग सैं ह्या गबला देव की मूर्ति लाने की जिम्मेदारी उस समय के सक्रिय कार्यकता नैन सिंह बोनाल जी और रूप सिंह दताल (नेता जी) को सौंपी। पूर्व प्रस्ताव के आधर पर नैन सिंह बोनाल अपने सहायक ;सहयोगीद्ध रूप सिंह दताल (नेता जी) के साथ दाँतू के सामूहिक ह्या गबला देव मन्दिर हेतु स्यांग सैं ह्या गबला की मूर्ति को जयपुर में बनवाने के लिए मई 1978 को गये। अगस्त 1978 को यह मूर्ति जयपुर राजस्थान से गोठी, धरचूला लाया गया। इस स्यांग सैं ह्या गबला की मूर्ति को सभी चौदह गाँवों में परिक्रमा करवाते हुए 23-08-1978 को दाँतू गाँव में मूर्ति पहुँचाई गई और 24-08-1978 को आदि देव ‘स्यांग सैं ह्या गबला देव’ गबला मन्दिर में स्थापित किया गया। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल जी ने दारमा के सामाजिक बुद्धजीवियों ने उन्हें सौंपी
जिम्मेदारी को बखूबी से निभाते हुए इन सभी सामूहिक कार्यों को सन्ताशजनक ढंग से सम्पन्न करवाया। इसके साथ ही श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल और उनके अनुज भ्राता इन्जीनियर श्री फल सिंह बोनाल जी के सौजन्य से अपनी माता स्व. सुरमा देवी दताल बोनाल की दादी यानि नैन सिंह व फल सिंह जी की परनानी महान समाजसेविका जसुली देवी जी की मूर्ति को मूर्तिकार-डी.आर. सीपाल जी से बनवाकर स्थापित करवाया। यह लला जसुली जी की मूर्ति पूरे रं लुंग्बा का प्रथम रं मूर्ति (स्टेचू) था और है जो वर्तमान समय पर भी लला जसुली दं बं पर स्थित है।
उपरोक्त सेवा कार्यों के बाद उनके जीवन के अगले चरण में धारचूला ब्लॉक में कनिष्ठ उप प्रमुख के पद पर कार्य किया। इसके बाद वे ग्राम बौंन में 1970-80 के दशक में दो बार ग्राम प्रधन पद पर चुने गये। समाज सेवक नैन सिंह जी धारचूला ब्लॉक के सच्चे, ईमानदार, निष्ठावान, निःस्वार्थ समाज सेवक के रूप में उभरे।
राजनीति भूमिका- श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल जी ने राजनीति की पारी सन् 1969-1970 में काँग्रेस पार्टी की सदस्यता लेकर किया। काँग्रेस पार्टी में शामिल होकर उन्होंने अपने पूरे राजनीति जीवन पदाध्किरी पद की लालसा किए बिना एक सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया। उन्होंने समय-समय पर कांग्रेस संगठन के साथ मिलकर कई बार कांग्रेस सदस्यता अभियान चलाया। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल जी ने कांग्रेस पार्टी में पद की प्राथमिकता उनके जीवन में कभी नहीं रहा। वे जमीनी सक्रिय कार्यकर्ता का काम संगठन के पदाधिकारी से अधिक महत्वपूर्ण समझते थे। वे हमेशा स्वदेशी खादी कुर्ता-पायजामा ही पहनते थे। पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता का सम्बन्ध् पार्टी सदस्यों और पदाधिकारी दोनों के साथ होता है। दोनां ही पक्ष सक्रिय कार्यकर्ता की बात सुनते व मानते हैं। इसी से आप समझ सकते हैं कि संगठन में सक्रिय कार्यकर्ता की क्या भूमिका होती है। कांग्रेस पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल की महत्वपूर्ण भूमिका के माध्यम से सन् 1986-1987 में प्रधन मन्त्रा राजीव गांधी जी को गेठी बुलाने में वे सपफल रहे। इसी से आप स्पष्ट समझ सकते हैं कि उनके पास कांग्रेस पार्टी का कोई पद न होने के बाद भी उनकी कांग्रेस संगठन में क्या महत्व था। उनकी ईमानदार-कर्तर्व्य निष्ठता के सिद्धान्त ही उनका मूल मन्त्र था।
समाज सेवक नैन सिंह बोनाल जी ने अपने जीवन यात्रा में सम्भाले कुछ मुख्य सामाजिक पद का विवरण- 1. सहायक गणक (सुपरवाईजर)-बौंन-दुग्तू साध्न सहकारी समिति। 2. अध्यक्ष नवयुवक संघ/मंगल दल-बौंन। 3 अध्यक्ष दारमा उत्थान समिति। 4. ग्राम प्रधान -बौंन। 5. सक्रिय सदस्य-कांग्रेस ब्लॉक कमेटी धारचूला। 6. उपाध्यक्ष कल्याण संस्था शाखा धारचूला। 7. सदस्य एकीकृत जनजाति विकास समिति नाचनी मुनस्यारी। 8. सदस्य खादी कमीशन सलाहकार समिति धारचूला। 9. संचालक जिला सहकारी बैंक पिथौरागढ़। 10. ब्लॉक कनिष्ठ प्रमुख क्षेत्रा समिति धारचूला। 11. सदस्य-कैलाशाश्रम स्वराज्य संस्था धारचूला। 12. सदस्य उ.प्र. सरकार द्वारा आयोजित भारत भ्रमण प्रोग्र्राम के सदस्य में सम्मिलित हुए उन्हें कई धर्मिक स्थानों एवं प्रतिष्ठानों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ था।
समाज सेवक बोनाल जी ने अपने जीवन के उनसठ बसन्त देखने के बाद अपने घर गोठी में स्वस्थ स्वास्थ्य में दिनांक 3.5.1998 की रात को लगभग आठ बजे अचानक हृदयगति रुक जाने से हम सभी को छोड़कर ईश्वर के पास चले गये। उनके द्वारा किये गये बहुत सारे सामाजिक कार्यों से हम हमेशा उन्हें याद करते हुए उनके ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ कार्य प्रणाली से प्रेरणा लेते रहेंगे। जिन्होंने अपना सारा जीवन समाज की भलाई के लिए चिन्तनशील रहते हुए समाज को समर्पित किया। इन्हीं कारणों से उन्हें रं लुंग्बा का महान सामाजिक चिन्तकों की श्रेणी में रखा जाता है। इसका मुख्य कारण उनके द्वारा किसी भी पक्ष-विपक्ष के बहकावे में आए बिना सापफ छवि ईमानदार कर्तव्य निष्ठता व्यक्तित्व से किया कार्य माना जाता है। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल ने समाज में किये गये सांस्कृतिक, राजनैतिक और सामाजिक उत्थान के कार्य को संज्ञान में लेकर रं कल्याण संस्थान ने अपने वार्षिक आम सभा (एजीम 2011) ग्राम-दाँतू (दारमा) में उन्हें रं गौरव सम्मान से सम्मानित किया।
समाज सेवक नैन सिंह बोनाल जी के परिवार का संक्षिप्त विवरण- वैसे तो निःस्वार्थ समाज सेवा के प्रति निष्ठावान समाज सेवक का परिवार पूरा समाज होता है। पफर भी ऐसे ध्नात्मक सोच वाले सामाजिक चिन्तक के निजी जीवन का थोड़ा जिक्र होना ही चाहिए। बोनाल जी ने अगस्त 1964 में गुंजी गाँव की आवती गुंज्याल जी से विवाह किया। धर्मपत्नी आवती जी से दो पुत्र (गगन सिंह, धीरेन्द्र सिंह ) और दो पुत्रियां (शकुन्तला, विशन्तला) हुई। समाज सेवक-श्र(ेय नैन सिंह बोनाल के दोनों पुत्रा भारत सरकार के अधीन सरकारी कार्यालयों में अपनी सेवा दे रहे हैं। उनके चारों बच्चे अपने-अपने दाम्पत्य जीवन के सुख भोग रहे हैं। वर्तमान समय में उनकी धर्मपत्नी आवती गुंज्याल बोनाल उम्र के अस्सीवे पड़ाव में अपनी सभी बच्चों के साथ खुशनुमा जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

प्राचीन व्यापारिक सम्बन्ध

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
प्राचीन समय की बात जब रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) के दारमा घाटी में धनधान्य से परिपूर्ण मालदार व्यापारी सुनपति भोट रं रहा करते थे। तब लगभग 75 प्रतिशत वर्तमान कुमाउँ में कत्यूरी वंश के राजाओं का शासन था। पर रं लुंग्बा (दारमा, व्याँस और चैदाँस घाटी) स्वतन्त्र भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था।
उस समय भोट देश का अलग राजा शासन करता था। तब परगना दारमा के वासी भांट देश का भोट प्रान्त होने के बाद भी वे अपने-अपने ग्रामों के स्वतन्त्र स्वामी थे। उस समय दारमानी, दारमा, रंगपा और जोहारी लोग दारमा और जोहार घाटी आने जाने व पश्चिम तिब्बत प्रान्त ;मल्ला जोहार व्यापार मार्ग से पहलेद्ध। ये हिम दर्रा मार्ग निम्न थे-
1 पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग, 2. सीपू- बलाती हिम दर्रा मार्ग।
पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग- दारमा-जोहार घाटी के व्यापारी और अन्य लोग पंचाचूली हिमगिरी शिखर के पंचा हिम दर्रा को पार कर दारमा जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह हिम दर्रा तहसील धरचूला, दारमा घाटी में है।
यह दर्रा मार्ग छोटा और खतरनाक था। इस मार्ग का प्रयोग तल्ला और मध्य दारमा के 10-15 ग्राम वाले करते थे। यह पंचा-दाँतू हिम दर्रा साफ मौसम में ही पार किया जा सकता था, जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम दाँतू में प्रवेश किया करते थे, साथ ही दारमा घाटी के वासी रालम-पातों ग्राम क्षेत्रा में पहुंचते थे।
कहावत- इस पंचा-दाँतू दर्रा मार्ग को तय करने में इतना कम समय लगता था कि मूल दाँतू ग्राम से जड़ी-बूटी, नमक और घीट से से तैयार मरच्या (नमकीन चाय जड़ी बूटी गरम चाय) पीते हुए, जोहार घाटी के रालम-पातौं क्षेत्र में पहुँचा जा सकता था।
सीपू-बलाती हिम दर्रा मार्ग- तहसील मुनस्यारी और धारचूला, ग्राम सीपू, अटासी और ग्राम सीपू बलाती के क्षेत्र में पड़ने वाला इस हिमदर्रा को पार करते हुए दारमा-जोहार घाटी आया-जाया करते थे।
यह दर्रा मार्ग पंचा दर्रा की अपेक्षा लम्बा और सुरक्षित था। इस मार्ग का प्रयोग मल्ला दारमा के 9-10 ग्राम वाले किया करते थे, यह सीपू-बलाती हिम दर्रा जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम बलाती, अटासी ‘जोहार घाटी’ में पहुंचते थे।
कहावत- ऐसी मान्यता है कि इस हिम दर्रा की दारमा-जोहार नजदीक ग्रामों की दूरी तय करने में इतना समय लगता था कि सीपू गाँव में बनी रोटी कपड़े में तय की गयी, गरम रोटी जोहार घाटी के बलाती ग्राम क्षेत्रा तक गरम ही पहँुचती थी।
;जोहार-रालम घाटी और दारमा घाटी के व्यापारी इन दोनों ही पंचा-दाँतू और सीपू-बलाती दर्रा मार्ग का प्रयोग करके दारमा घाटी होते हुए, सीमान्त पश्चिम तिब्बत प्रान्त के निम्नलिखित क्षेत्र- मंगोल, शिल्दी थं, मिसल, चिन, ज्ञानिमा, दरचन, दयाकार, शिनचिलम और ठूकर मण्डियों में सामाग्रियों का व्यापारी विनियम करते थे। पुरंग, पाला किरमेक, डोंग दर्चिन, जोमजिंन, बिल्थी थं तकलाकोट ठुकर (मानसरोवर) गढ़तोक में अधिकतर व्याँसी लोग व्यापारी विनिमय कर व्यापार करते थे और नीति-माना घाटी वासी शिवचिलम, चपराउफ मण्डियों में व्यापारिक विनिमय के लिए जाते थे। इन्हीं मण्डियों के आसपास लला लसुली देवी के धर्म शालाएं विद्यमान हैं। उन धर्मशालाओं के अवशेष/ साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। दारमा घाटी के तरह ही जोहार घार्टी के व्यापारी भी इन्हीं तिब्बती मण्डियों का प्रयोग व्यापारिक विनिमय के लिये करते थे। इन मण्डियों तक पहँुचने के लिए उटाधूरा, जयन्तीधूरा, कुंगरी-बिंगरी धूरा तीनों गिरी द्वारों को पार करना पड़ता था।
अंग्रेज समय काल से भारत-तिब्बत अन्तर्राष्ट्रीय सीमान्त व्यापारियों का विनिमय व्यापार केन्द्र दारमा रं लुंग्बा (दारमा प्राचीन भोट प्रान्त क्षेत्र) मंगोल शिल्दी थं, विदांग नामक ग्राम ;वर्तमान ग्राम खिमलिंगद्ध हो गया, और यह विनिमय व्यापार लगभग 1962 तक चलता रहा। वर्तमान समय इस दारमा भारत-पश्चिम तिब्बत सीमान्त क्षेत्रा से कोई व्यापार नहीं होता है।
विनिमय (आदान-प्रदान) पश्चिम तिब्बत सामग्री- निम्न सामाग्री जैसे स्वर्ण चुरे, सुहागा, तिब्बती बकरियों का उन (पसमीन उन), नमक, बहुमूल्य रत्न, लाचा (लाख), जंगली पशुओं का चोखाल (समूर), पत्थर रत्न और अन्य सामग्री होते थे। साथ ही बकरियों, घोड़े, झुप्पू, याक का भी खरीददारी भोट (रं) जन करते थे। यह व्यापार 16500 से 18500 पिफट उफँचाई पर प्रवास के समय होता था। इन सीमान्त वासियों का मुख्य पेशा तिब्बती व्यापार तथा उफनी शिल्प उद्योग में एक दूसरे के पूरक थे।
विनिमय भारतीय (भोट/रं) सामग्री- निम्न सामग्री जैसे- गुड़, मिश्री, चीनी, चाय कपड़ा, तम्बाकू सूती वस्त्रा, सामान्य दवाईयां, ड्राई फूड, लपफो और दैनिक प्रयोग की अन्य सामग्रियों की खरीददारी पश्चिम तिब्बत व्यापारीजन करते थे।
सुनपति रं भोट समयकाल से ही जोहार-दारमा घाटी आना-जाना, व्यापार करना व अच्छे व्यवहारिक सामाजिक सम्बन्ध् के कारण शादी-विवाह का भी चलन था।
पौराणिक किवदंतियाँ (जनश्रुतियाँ)- दारमा-जोहार-रालम घाटी का पारिवारिक सम्बन्ध्- एक समय की बात है, दारमा घाटी के बेटे का ब्याह जोहार रं, रंगपा लड़की के साथ हुआ, ब्याह के बाद कुछ दिन के लिये अपने मायके जोहार-रालम घाटी रहने जा थी। मायका जोहार घाटी जाते समय वे न्यौला पंचाचूली हिमगिरी पंचा-दाँतू दर्रा को पार करने वाली थी, तब वे उच्च हिम मार्ग पार करने से कुछ पहले कुछ देर आराम करते हुए अपने दोनों तरफ ससुराल व मायका को निहार रही थी, और ससुराल से साथ लायी खाद्य सामग्री (स्यली/फाफर के आटे से तैयार गोलनुमा खाद्य) गंदु, चरपा और पतली/कट्टू आटा से तैयार गुठे, श्यली/ फापफर के आटे से तैयार गंदु (गोलनुमा), चरपा खाद्य पदार्थ पैक वाला निंगाल का टिफिन बाॅक्स ढलान की ओर गिरता ही चला गया। उस महिला ने तुरन्त उस जगह को दोष देते हुए, कोई न खा पाएँ, खा यानु बं (कितनी गन्दी जगह) अपशब्द निकल आया, जिसके कारण उसी वक्त मौसम खराब होते हुए हिमस्खलन व भूस्खलन होने लगा, वह महिला जोड़ी इस हिमस्खलन की चपेट में आकर वहीं मर गयी, साथ ही न्यौला पंचाचूली के निचला भूभाग ‘न्योल्पा बुग्याल थं’ के आसपास रहने वाले मूल दाँतू ग्राम के अधिकतर ग्रामवासी उस हिमस्खलन मं दबकर मर गए, कुछ बचे हुए ग्रामवासी वर्तमान स्थित ग्राम दाँतू में आकर बस गए।
ये ग्रामवासी ही यह ग्राम दाँतू के मूल दताल निवासी माने जाते हैं। उसी समय इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग पूर्ण रूप से खण्डित हो गया। जिस कारण इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग से दोनों ‘दारमा-जोहार-रालम घाटी’ का सम्पर्क पूर्ण रूप से टूट गया, तब से आज तक इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग का पता नहीं चल सका। इसी समय में जोहार- दारमा घाटी को मिलाने वाली दूसरी अटासी, बलाती, सीपू हिम दर्रा (बलाती-सीपू हिम दर्रा) के टूटने से यह मार्ग भी बन्द हो गया था। इसके पश्चात जोहार घाटी का व्यापार मल्ला जोहार के रास्ते पश्चिम तिब्बत प्रान्त से होने लगा। पर वर्तमान समय में इस मार्ग का प्रयोग ट्रेकर्स जोहार से दारमा, दारमा से जोहार घाटी ट्रेकिंग किया करते हैं।
यह समय काल मीठे, मृदुभाषी, ईमानदार और कर्मठ लोगों का सत्यवादी युक्त समय था।

जैं श्री ह्या छूड.ग सैं ‘इष्ट देव’ ग्राम तिदंग

इतिहास कथा

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
तिदांग में सर्वप्रथम ‘जैं रंचिम सैं’ का युग था। फिर सुम कच्यरों पैं (तीन कच्यरों भाई) का युग आया। उसके बाद तिदांग में ‘ह्या छूड.ग सैं’ का युग आया। ह्या छूड.ग से जब अपने मूल निवास स्थान- किदांग, तिब्बत से पश्चिम-दक्षिण हिमालयी क्षेत्र में भ्रमण करने निकले, तिदांग की अलौकिक सुन्दरता यहाँ से चारों ओर दिखाई देने वाला प्राकृतिक नैसर्गिकता और ग्राम जनों का परस्पर स्नेह को देखकर तिदांग को ही अपना निवास स्थान बनाने का निश्चय किया। तब ग्राम- तिदांग, नदी के पास का उच्च मैदानी भू-भाग ‘आधा नमीयुक्त हरियाली और आधा बंजरनुमा भूभाग’ हुआ करता था। समय बीतने के साथ-साथ हरियाली नुमा बंजर (सूखते जा रहे) होते जा रहे खेतीनुमा भू-भाग के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने जाना कि इस भू-भाग के नीचे बड़ा सा पत्थर है। इस पत्थर के नीचे एक साँप (खोबू) रहता है, जिसके तासीर (ताप) से तिदांग गाँव का मैदानी खेती युक्त भू-भाग बंजर होते जा रहा था, इस साँप को मारने के लिये ह्या छूड.ग सैं ने ‘चूहा और गरुड़ पक्षी’ का रूप धारण कर साँप को बाहर निकालकर उसे मार डाला और मरे हुए साँप को अपनी चोंच में पकड़कर आस-पास के ग्रामों में घुमा-घुमाकर हवाई रास्ते से किदांग (तकलाकोट )क्षेत्र ले जाकर दफना दिया। इस दौरान जब ह्या छूड.ग सैं वापस दितांग गाँव में पहुंचते हैं तो तिदांग की 30 प्रतिशत बजंर (सूखते) मैदानी भू-भाग, हरा-भरा खेतीनुमा मैदानी भू-भाग में बदल गया। जिस हरा-भरा खेती नुमा मैदानी भू-भाग में साँप की तासीर का प्रभाव अत्यधिक पड़ा उस भू-भाग में आज से 300-400 साल पहले तक उसका प्रभाव साफ दिखाई देता था। ऐसा बड़े-बुजुर्ग जनों का कहना है।
इस भौगोलिक परिवर्तन को देखकर सभी ग्रामजन खुश हुए और ह्या छूघग सैं की दिव्य शक्ति को देखकर ग्रामजनों ने उनका धन्यवाद किया। और उन्हें यहीं रहने का आग्रह करते हुए उनको प्रतिष्ठित कर पूजा-अर्चना का विशेष आयोजन किया। ग्रामजनों की श्रद्धापूर्वक भक्ति को देखकर ह्या छूड.ग सैं ने ग्राम तिदांग को ही अपना स्थाई निवास बनाने का निर्णय किया।
तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ के युग के दौरान बौन-ग्राम में एक शक्तिशाली तंत्र-मंत्र ज्ञाता (विद्वान) ‘हबा लाटौ’ रहता था। दारमा के ग्राम्य जनों के द्वारा देवी-देवताओं को पूजा-पाठ के माध्यम से चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा, बौन के तंत्र-मंत्र ज्ञाता हबा लाटौ इस चढ़ावा को देवी-देवताओं से पहले स्वतः ग्रहण कर लेते थे, जिससे देवी-देवताओं को यह चढ़ावा उन तक नहीं पहुंच पाता था। इस समस्या को हल करने के लिए भोले शिव के अवतारक दाँतू (दंग्तो) ‘‘ह्या गबला देव’’ ने अपने तपोस्थली ग्राम दाँतू के दं थं प्रांगण में दारमा के सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया। सभी देवी-देवतागण निमंत्रण मिलते ही सोंग (ग्राम) दं थं प्रांगण में उपस्थित हो गए। तिदांग ह्या छूड.ग सैं भी साधारण व्यक्ति के समान तिब्बती पहनावा व टेढ़ी टोपी पहनकर टट्टू (गधा) में सवार होकर सभा प्रांगण में पहुंचे।
किसी देवी-देवताओं ने भी ह्या छूड.ग सैं की उपस्थिति पर ध्यान नहीं दिया। ह्या छूड.ग सैं सभा प्रांगण से कुछ दूरी पर बैठकर सुस्ताने लगे। अपने टोपू (हुक्का) में तम्बाकू भरकर गधा (बाँगजु) के त्यागा (काठी) से च्यामा (आग प्रज्जवलित करने का पदार्थ) रगड़ कर आग पैदा की और तम्बाकू सुलगा कर हुक्का पीने लगे, तत्काल अपनी प्यास बुझाने के लिए अपनी मुट्ठी तेजी से जमीन की ओर फैंका, उस स्थान से फव्वारे की तरह पानी निकल आया। जिससे ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने वह पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। सभा में उपस्थित सभी देवी-देवतागण इस अद्भुत दिव्य-शक्ति को देखकर अचम्भित हो गए। सभी देवी-देवता ह्या छूड.ग सैं की असाधारण दिव्य-शक्ति देकर सभा में स्थान ग्रहण करने को कहा, लेकिन ह्या छूड.ग सैं ने कहा- ‘मैं अपनी जगह पर ही ठीक हूं। आप अपनी सभा प्रारम्भ कीजिए।’ सभा में ‘हबा लाटो’ के विषय पर प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, इस समस्या का निवारण करने के लिए जैं श्री ह्या गबला देव ने सभा में उपस्थित प्रत्येक देवी-देवता गणों से पूछा/प्रश्न किया। ह्या छूड.ग सैं के अलावा सभी देवी-देवताओं ने इस विषय में असमर्थता व्यक्त की। आंखिर में ह्या छूड.ग सैं से प्रश्न किया। उन्होंने सिर हिलाते हुए हामी भर दी। साथ ही ‘होला दम्फू सैं’ ने भी हाथ खड़ा कर हामी भरा। तब ह्या गबला देव, होला दम्फू सैं से पूछता है कि तुमने हाँ किस लिये किया। तब दम्फू सैं ने उत्तर दिया कि ‘ह्या छूड.ग सैं मेरे मामा हैं। इस समस्या को हल करने में जो कार्य वे मुझे सौंपेंगे, मैं वह कार्य करूंगा।’ इस प्रकार सभा पूर्ण हुई। सभी देवी-देवता गण अपने-अपने निवास स्थान को चले गए। ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू में सवार होकर तिदांग के लिए रवाना हो गए। ह्या छूड.ग सैं की अद्भुत दिव्य शक्ति और हबा लाटौ विषय पर कार्य सपफलता की परीक्षा लेने के लिए ह्या गबला देव ने उनके पीछे से तीव्र आंधी-तूफान प्रहार किया। जैं श्री ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू को तेजी से दौड़ाते हुए इतनी तेजी से ढाकर ‘गिलीघ’ नामक मैदान मेें पहुंचे , कि आंधी-तूफान भी उन्हें छू नहीं सके और वह तूफान उनकी टेड़ी टोपी को भी हिला न सका। तभी इस घटनाक्रम से ह्या गबला देव को पूर्ण विश्वास हो गया कि ह्या छूड.ग सैं के पास ही ऐसी शक्ति है जो हबा लाटौ जी के द्वारा देवी-देवताओं का प्रसाद जबरदस्ती ग्रहण करने की समस्या से निजात दिलाएगा। उस जमाने में तिब्बती लोग अपने भेड़-बकरियों, याक में नमक, सुहागा, छयूरा और अन्य सामग्री लादकर दारमा-पश्चिम तिब्बत सीमान्त परिक्षेत्र में व्यापार के लिए आया-जाया करते थे और दोनों क्षेत्र के व्यापारी परस्पर मित्रता रखा करते थे, ग्राम-बौन के हबा लाटौ का भी तिब्बती व्यापारियों से घनिष्ट मित्रता थी। तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने अपने अपनी दिव्य मंत्र-शक्ति का प्रयाग कर तिब्बती चन (भूत) का आह्वान किया और उसे हिदायत देते हुए कहा कि तुम अपने कुछ साथियों को लेकर सैकड़ों भेड़-बकरियों के साथ गो से आगे गोतो-रामा के मैदान में सही समय और मौसम को देखकर प्रकट हो जाना। एक दिन ह्या छूड.ग सैं को तिब्बती चन (भूत) ने रामा गोतो दं (उंचा स्थान) के मैदान में प्रकट होने का सन्देश भिजवाया और तभी ह्या छूड.ग सैं ने ‘लिंकम दं थं’ व ‘गोतो दं’ के बीच का चट्टानी रास्ता पूर्णतया बर्फ से ढकवा दिया और अपने भान्जे ‘होला दंफू सैं’ को ‘बौर बा लाटौ’ के पास व्यापारिक सूचना सूचित करने के लिए भेजा और हबा लाटौ जी से कहना तुम्हारे तिब्बती व्यापारिक मित्रगण अपने सैकड़ों भेड़-बकरियों और विनिमय सामान के साथ ‘रामा-गोतो दं’ (उंचा स्थान) के थं(मैदान) में डेरा लगाकर बैठे हैं, और तुम्हें जल्दी से जल्दी मिलने के लिए कहा है। इस पर हबा लाटौ जल्दी-जल्दी अपने मित्रों से मिलने के लिए अपने निवास स्थान से व्यापारिक परिक्षेत्र की ओर रवाना हो गया और जब ‘गोतो-लिंकम दं’ (उंचा स्थल) का पहाड़ी रास्ता बर्फ से ढका हुआ दिखाई दिया, तब ‘बौन हबा लाटौ’ बर्फ में डूबने व फिसलने से बचने के लिए तन्त्र विद्या का प्रयोग करते हुए, अपने जेब से ‘सरसों का दाना’ निकालकर अपने से आगे फैंकते गया, सरसों का दाना फेंकते ही सरसों के दाने का पत्थर बन गया। उन्हीं पत्थरों में छलांग लगाते हुए, आगे बढ़ते गए। जैसे ही बर्फीला आधा रास्ता तय कर लिया, तब उनका सरसों का दाना खत्म हो गया, अब ‘हबा लाटौ’ का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। साथ ही पीठ पीछे के सरसों से बना पत्थर भी अदृश्य हो गया, उसी समय तिदांग ह्या छूड.ग सैं ने उपर पहाड़ से बर्फ का बर्फीला तूफान करवाया और हबा लाटौ का अन्त हो गया। ऐसा कहा जाता है कि जिस स्थान पर हबा लाटौ दब गया था, वहाँ पर बहुत बड़ा टीला बन गया, जो अभी भी मौजूद है।
तंत्र-मंत्र ज्ञाता ‘हबा लाटौ’ को मारने के बाद इलाके के सभी देवी-देवतागणों को मनुष्यों के द्वारा चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा पूजा-पाठ खाद्य सामग्री सर्वप्रथम मिलना शुरु हो गया।
‘जैं हो किदांग जु (के)-
तदांग ह्या छूड.ग सैं’

त्रिलोक सिंह नंगन्याल (तिंका नंगन्याल प्रथम) के वंशजों का दारमा प्रतिनिधित्व काल

इतिहास-कथा
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
दारमा घाटी के जिस ग्राम की खूबसूरत चोटियों के कारण दिन में सात बार सूर्य दिखता व सात बार सूर्य छिपता है, उस ग्राम नागलिंग में त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी का जन्म 1750 के आसपास हुआ। त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी की सोच- आकांक्षाएं, आधुनिक भविष्य की जीवन जीने की सोच रखने वाले व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। ऐसा माना जाता है कि त्रिलोक सिंह जी के पूर्वज कत्यूर राज्य से दारमा आए थे। त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी को तिंका प्रथम के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। त्रिलोक सिंह जी के चार पुत्र हुए, जिनके नाम- बालों, चतुवा, बंगा और जसपाल थे। श्री तिंका नंगन्याल प्रथम जी की प्रभावशाली छवि, ज्ञानी व्यक्तित्व के कारण उन्होंने अपने चारों पुत्रों को अलग-अलग कार्य क्षेत्रा सौंपे, सबसे बड़े पुत्र बालों सिंह को राजनीतिक रणनीतिकार, दूसरे पुत्र चतुवा सिंह को समाज सुधारक, तीसरे पुत्र बंगा सिंह को व्यापारिक कार्य एवं सबसे छोटे पुत्र जसपाल सिंह को खेती कार्य क्षेत्र सौंपा।
इस प्रकार चारों पुत्रों की कार्य क्षेत्र की यश कीर्ति पूरे रं लुंग्बा में प्रचलित थी। श्री त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी का अस्कोट राज परिवार और तिब्बती राजाओं के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध् थे। ऐतिहासिक समय रं लुंग्बा, दारमा परगना (परगना दारमा) में श्री कित्ती सिंह ग्वाल ‘फौजदार’ ‘‘रं प्रतिनिधित्वकर्ता’’ ग्वाल एकाधिकार के बाद श्री त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी के सबसे बड़े पुत्र बालों सिंह जी दारमा लुंग्बा रं प्रतिनिधित्व कर्ता के रूप में उबरे और उन्होंने यह जिम्मेदारी निभाई। ग्वाल फौजदार परिवार का एकाधिकार के बाद अब दारमा का सभी प्रकार के न्याय कार्य ग्राम-गो की जगह ग्राम-नांगलिंग से होने लगा। नंगन्याल परिवार ने अपना प्रशासनिक अधिकार एवं व्यावसायिक कार्य ग्राम-नांगलिंग से ही शुरु किया। कुमाउँ ब्रिटिश शासन में अंग्रेजों का आगमन जब दारमा घाटी में हुआ। श्री बालों सिंह का प्रभावशाली व्यक्तित्व, जन लोकप्रियता, न्यायप्रियता व शानों- शौकत और साथ ही भवन की भव्यता को देखकर अंग्रेज आश्चर्यचकित हो गये। श्री बालों सिंह नंगन्याल जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने बालों जी को अपने पक्ष में करने के लिये उन्हें तीन प्रकार के अंग्रेजी हथियार और तीन खून माफ का अधिकार प्रदान कर कूटनीति चाल चली, श्री बालों सिंह नंगन्याल जी ने उस काल में अपने भव्य भवन निर्माण कार्य करवाने के लिये बागेश्वर, अल्मोड़ा, हल्द्वानी, पड़ोसी देश नेपाल के राजमिस्त्रियों को आमन्त्रित किया। इस भवन निर्माण में बड़े-बड़े पत्थरों, खड़िया पत्थरों के जोड़ को मजबूती प्रदान करने के लिये चूना व उड़द ;मासद्ध दाल के घोल बनवाकर चिनाई करवायी गयी। भवन राजमिस्त्राी कारीगरों के नाम दीपार के पत्थरों पर आज भी अंकित हैं। मकान में प्रयोग की गयी बड़े-बड़े पत्थरों की कटाई-छटाई में उस समय चाँदी-सिक्का (सवा रुपये) की लागत आई। जब-जब ब्रिटिश आला अधिकारी दारमा घाटी में आते थे, उक्त भव्य भवन में रहना व इसकी प्रशंसा करना नहीं भूलते थे।
श्री बालों नंगन्याल जी के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री तिंका नंगन्याल (तिंका द्वितीय जी ;1860-1940) ने अपना राजपाठ के साथ दारमा प्रतिनिधि/प्रतिनिधिकर्ता कार्यभार संभाला। श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी के सामय जब सम्पूर्ण भारतवर्ष में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार हो रहा था, तब दारमा घाटी में उन्होंने ईसाई धर्म प्रचार-प्रसार के लिये अंग्रेजों का प्रवेश निषेध् कर दिया था, जब ब्रिटिश रेजीमेन्ट को इस बात की सूचना मिली तो वे श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी से अत्यधिक नाराज हो गये। पर दारमा घाटी एक अत्यन्त दुर्गम व उनकी प्रभावशाली छवि के कारण कुमाउँ ब्रिटिश अंग्रेज प्रशासक श्री तिंका नंगन्याल जी पर कोई कार्यवाही नहीं कर सके। बाद में कुछ समय उपरान्त अंग्रेज अधिकारियों ने श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी को याद दिलाया कि उनके पिता बालों नंगन्याल को अंग्रेज प्रशासन ने तीन प्रकार हथियार करतूस और तीन खून माफ का अधिकार दिया था। उनके समय के घनिष्ठ सम्बन्धें की भी याद दिलाई। साथ ही तिंका नंगन्याल जी को अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें तीन की जगह सात खून माफ करने का शासनादेश और सम्पूर्ण रं लुंग्बा का ब्रिटिश मेम्बर नियुक्त किया गया और अल्मोड़ा जिला परिषद का मनोनीत सदस्य चुना एवं कुछ अन्य रं लुंग्बा के सुरक्षा से सम्बन्धित प्रभावी अधिकार भी दिये गये, तब जाकर अंग्रेजों का दारमा घाटी में पुनः प्रवेश और ईसाई ध्र्म का प्रचार-प्रसार हेतु अनुमति तो दी पर उनके प्रचार में कोई सहायता नहीं की। अंग्रेजों को इस प्रचार-प्रसार पर कोई फायदा नहीं मिला, न ही रं लुंग्बा दारमा घाटी के किसी भी परिवार ने ईसाई धर्म स्वीकार किया, इससे स्पष्ट होता है कि उस समय दारमा घाटी के प्रत्येक परिवार, प्रत्येक ग्राम व पूरे रं जनों में कितनी एकता-सक्षमता थी, पर दारमा घाटी में ईसाई प्रचारकों का आवागमन होते रहा, बाद में श्री नंगन्याल जी के स्वभाव, बुद्धिमत्ता व क्षेत्र में उनके प्रभाव के कारण ब्रिटिश शासकों से अच्छे सम्बन्ध् हो गये। श्री तिंका द्वितीय ‘मेम्बर साहब’ ने रं लुंग्बा दारमा प्रतिनिधित्वकर्ता का कार्य बखूबी निभाते हुए बहुत से कार्य करवाये और दारमा लुंग्बा का प्रथम ठेकेदारी मार्ग कार्य उन्होंने 1500/- रुपये का ठेका लेकर सन् 1923 में कार्य करवाया, यह ठेका कार्य मार्ग ग्राम- खेला से दारमा तक का था। उस समय ग्राम- खेला, दारमा, व्यास दोनों घाटी कुन्चाजनों का मुख्य पड़ाव केन्द्र के साथ-साथ तीनों रं घाटी जनों का प्राचीन व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था, जहाँ से पश्चिम तिब्बत, नेपाल और निचले भारतीय क्षेत्रों में जाने के लिए व्यापारिक विनिमय गतिविधियों से सम्बन्धित कार्य योजना संचालित होता था। श्री तिंका सिंह नंगन्याल (तिंका द्वितीय) ने ब्रिटिश प्रशासन द्वारा दिए गए अधिकारों का खूब प्रयोग किया, माना जाता है। श्री तिंका द्वितीय जी ने रं-शौका जनों के प्राचीन व्यापारिक पड़ावों का अधिकार बरकरार रहे इस सम्बन्ध् में पड़ाव क्षेत्रीय शासन-प्रशासन तक अपनी बात रखते हुए उन पड़ावों को बचाने की कोशिश की। उन्होंने तिब्बती प्रान्तीय राजाओं, नेपाल सीमान्त प्रशासक और अस्कोट राज्य ‘राज परिवार’ से घनिष्ठता बढ़ाने के साथ-साथ पूर्व से ही चली आ रही मित्रता को और अधिक घनिष्ठता में परिवर्तित किया। श्री तिंका नंगन्याल (तिंका द्वितीय) बुद्धिमान, प्रभावशाली छवि और चतुर व्यक्तित्व के धनी थे। इन कारणों के कारण वे तीन महीने तिब्बती प्रान्तीय राजाओं, राज प्रशासकों के साथ तिब्बती प्रान्तों और महीने उक्कू- बांकू, जौलजीवी, नेपाल में अस्कोट राजाओं के साथ आनन्दमयी जीवन व्यतीत करते थे। इस समय एक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक घटना घटित हुई। पिथौरागढ़ व्यापारी ‘मालदार परिवार’ के सदस्य जब तिब्बत व्यापार के लिए गए थे। अनजाने में तिब्बती कानून का उल्लंघन होने के कारण तिब्बती प्रशासन ने उन्हें कारावास की सजा दे दी, तब मालदार व्यापारी परिवार के सदस्य सीमान्त अस्कोट राज्य के राजा के पास इस सम्बन्ध् में मदद हेतु गए तो ‘राजा रजवार’ राज प्रशासन ने इस पर असमर्थता जताते हुए उन्हें श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी से मदद मांगने का सुझाव दिया और वे नंगन्याल जी पास गये। अपनी समस्या से अवगत कराया। इस समस्या समाधन हेतु नंगन्याल जी ने तिब्बती राजा को अनुरोध् पत्र लिखा। इसी पत्र द्वारा मालदार व्यापारी को तिब्बती कारावास से मुक्त किया गया।
श्री तिंका सिंह नंगन्याल (तिंका द्वितीय) ने अपने पिता से अधिक नाम कमाया और इसी कारण सम्पूर्ण रं क्षेत्र में वे ‘मेम्बर साहब’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। ऐसा माना जाता है कि समय के साथ-साथ श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी आकांक्षाओं महत्वाकांक्षा के कारण उनका अस्कोट राज्य के राजघराने से सम्बन्ध् बिगड़ते गए, स्यांकुरी से उपर दारमा घाटी, व्यास घाटी और चैदास घाटी पर अपना प्रतिनिधित्व अधिकार परिक्षेत्र मानते हुए, इन क्षेत्रों रे ‘रं लुंग्बा व्यवस्था-प्रबन्धन’ से सम्बन्धित कार्य हेतु वसूली करते थे और इन सम्पूर्ण क्षेत्र को परगना दारमा नाम दिया गया। बाद में अस्कोट राज्य राज परिवार से कर वसूली से सम्बन्धित विवाद हो गया। जब तिंका द्वितीय नंगन्याल जी अपने सेवकों के साथ वर्मा (म्यांमार) गये थे, और वापसी में अस्कोट पहँुचे तो वहाँ राज परिवार प्रशासन से अपने-अपने अधिपत्य सीमान्त क्षेत्रा की कर वसूली पर मतभेद होता चला गया, श्री तिंका नंगन्याल (तिंका द्वितीय) जी रं लुंग्बा के राज परिवार (राजा) न होते हुए अपने वंशजों में सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले रं प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि) रहे। बाद में तिंका नंगन्याल द्वितीय जी भाबर भारत, नेपाल देश व्यापारसे वापसी के समय टनकपुर के आस-पास अपने पड़ाव में उनकी मृत्यु हो गई। श्री तिंका द्वितीय के बाद उनके बड़े पुत्र श्री बाल बहादुर जी ‘प्रथम दारमा सरपंच’ ;बालो द्वितीय जी 1916-1969द्ध ने कार्यभार सम्भालते हुए दारमा क्षेत्रजनों के लिए बहुत कार्य किए। श्री बालो द्वितीय जी ने शासन-प्रशासन से अनुरोध् कर क्षेत्रीयजनों को शिक्षा-पत्राचार प्रदान करवाने के लिए ग्राम दुग्तू स्कूल (दारमा प्रथम स्कूल), दारमा लुंग्बा प्रथम पोस्ट आफिस ग्राम नांगलिंग में खुलवाने का महत्वपूर्ण कार्य किये और वे जौलजीवी तीर्थ मेले में भी सामाजिक भूमिका अदा करते रहते थे। एक बाद उन्होंने दो चवर गाय ‘याक’ और कुछ कम्बलों को मेला कमेटी को सहयोग रूप में भेंट दिया।
श्री तिंका नंगन्याल द्वितीय जी अस्कोट राजा भांति राजा तो नहीं था परन्तु सम्पन्नता धन-दौलत एवं शानों-शौकत अस्कोट राजा से कम नहीं थे।
रं लुंग्बा दारमा घाटी ग्राम नांगलिंग की सम्पूर्ण सम्पत्ति का आध भाग इसी वंश के उत्तराधिकारियों के अधिकार में है। साथ ही ग्राम- चल, सेला, वर्थिंग, बोगलिंग, दर, सोबला, न्यू सोबला सुवा, बैती, गलाती, गस्थला, दोबाट, धारचूला, पिथौरागढ़, हल्द्वानी, देहरादून, लखनउ, दिल्ली, म्यांमार तक में भी इनकी सम्पत्ति रही है, ऐसा कहा जाता है। जब इस वंश के व्यापारी तिब्बत व्यापार, टनकपुर व्यापार, नेपाल व्यापार हेतु निकलते थे तो इनके कापिफले के दिन-समय कोई दूसरा व्यापारी इस मार्ग से नहीं गुजरता था। इसकी सूचना पूर्व में ही लोगोें को दे दी जाती थी।
मुख्य ध्रोहरित सामग्रियाँ-
ब्रिटिश कालीन दो नाली कारतूस वाली बन्दूक, अन्य भरवा बन्दूक और इटालियन राइपफल ;जिसे बाद में बेच दिया गयाद्ध, चाँदी का बना इटालियन टार्च, चाँदी की छड़ी।
ब्रिटिश कालीन राजशाही चाँदी के बर्तन और सिक्के हैं तथा कत्यूरी शैली की बनी खिड़कियाँ व दरवाजों पर बनी नक्काशी दर्शनीय है।
बड़े-बड़े चार पफुर्मा तोली (फुर्मा तावी और चार फुर्मा कढ़ाई जो 40-40 किलोग्राम के हैं)। ये ‘तोली-कढ़ाई’ लगभग 300 वर्ष पूर्व की मानी जाती हैं। ये तोली-कढ़ाई तिब्बत से लायी गयी थी।
दर्जनों ऐतिहासिक ‘ढाल तलवार’ और पुरुष-स्त्री परिधान। साथ ही महिलाओं के अनेक श्रृंगार आभूषण मौजूद हैं।
नंगन्याल भवन के भीतरी भाग में एक विशाल आकार का शिवलिंग स्थित है। साथ ही हस्तिनापुर की महारानी ‘कुन्ती गान्धरी’ के शिलालेख भी मौजूद हैं।
श्री नंगन्याल राज में जिस प्रकार से इस बंशजों की शानो-शौकत, रहन सहन, सम्पूर्ण क्षेत्र में फैली शक्तियाँ और अधिकारों को सुनकर तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे राज परिवार का न होते हुए भी एक राजा की ही भाँति रं लुंग्बा में एकाधिकार रखते थे।

कित्ती फौजदार: प्रथम रं लुंग्बा प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि)

इतिहास-कथा

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
दारमा घाटी में आज से लगग 18वीं शताब्दी के मध्य से 19वीं शताब्दी के मध्य तक ग्राम-गो में एक प्रखर बुद्धिमान, आर्थिक सम्पन्न तथा दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति रहते थे, जिनका नाम कित्ती सिंह ग्वाल (कित्ती फौजदार) था, वे उस काल के सबसे प्रतिभावान, प्रभावशाली व्यक्ति थे और लीक से हटकर सोच रखते थे। शायद उन्होंने ही रं लोगों को उस समय तिब्बत देश से लेकर नेपाल देश और पश्चिम कुमाउँ तक व्यापार करना सिखाया हो।
उस समय भी दारमा, चैंदास तथा व्यास घाटी रं लुंग्बा प्राीचन भोंट देश का भोंट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था। इस कारण केन्द्रीय तिब्बत राज शासक- प्रशासक इस प्राचीन भोंट प्रान्त को ‘रं लुंग्बा’ के तिब्बत सीमान्त (रं लुंग्बा) क्षेत्र को जबरदस्ती अपना मानते हुए, दारमा व्यापारियों से जबरदस्ती कर वसूलते थे। साथ ही तिब्बत का प्रशासक कित्ती फौजदार को उसके प्रभावशाली छवि, आर्थिक सम्पन्नता के कारण इस रं क्षेत्र (रं लुंग्बा दारमा) का क्षेत्राीय तरजम (एस.डी.एम.), छयासों (कर अधिकारी) साथ ही ज्युस्यों (व्यापारी मुखिया) भी उन्हीं को मानते थे। जबकि दारमा वासी फौजदार जी को दारमा घाटी क्षेत्र का व्यवस्था प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि) समझते थे और उनका आदर सम्मान कर उनकी बातों को मानते थे। श्री कित्ती फौजदार जी के प्रभावशाली छवि के परिणामस्वरूप 18वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी के मध्य तक की ज्ञानिमा-सिल्दी व्यापार मण्डी का व्यापार दर (कमिशन दर) तब तक तय नहीं होता था जब तक ग्वाल व्यापारी लोग वहाँ नहीं पहँुच जाते थे।उस बात का फायदा उठाकर ग्वाल व्यापारी देरी से व्यापार मण्डी स्थल पर कई दिनों पहले पहुंचते थे और अन्य ग्राम व्याापारियों को व्यापार मण्डी स्थल पहँुचने के बाद भी कई दिनों तक इन्तजार करना पड़ता था। इस कारण अन्य व्यापारी परेशान होते थे। बाद में ब्रिटिश राज के मसय इस गटतोक (कमीशन रेट) की बात दारमा व्यापारियों ने मिलकर कुमाउँ कमीश्नर प्रशासन के संज्ञान में लाया गया, तत्पश्चात ग्वालों का व्यापार दर तय करने का एकछत्र राज (अधिकार) समाप्त हुआ।
श्री कित्ती फौजदार अपने रं प्रतिनिधित्वकर्ता काल में अपने क्षेत्र के लिए उन्नति/ प्रगति का अवसर ढूंढते रहते थे, वे रं लुंग्बा से बाहर अन्य क्षेत्रों तक व्यापार का अवसर देखना चाहते थे। यह व्यापारिक सोच चाह के मुताबिक जल्दी सम्भव हीं था, क्योंकि उस समय इस रं क्षेत्रों का किसी भी प्रकार का अपना स्थायी शासनिक-प्रशासनिक ढांचा नहीं था। रं धरोहित बुजुर्गों के कहने के अनुसार आज से 250-300 साल पूर्व तक रं लुंग्बा जन जाड़ों के मौसम में (जब अत्यधिक ठण्ड पड़ी थी) दारमा घाटी वासी ‘सोबला-कंच्योति, व्यास घाटी वासी लामारी-मालिपा-लोलंको नामक स्थापन पर तीन-चार महीने जानवरों को पालने के वास्ते आते थे। फिर वापस अपने मूल ग्राम की ओर चले जाते थे। इन निम्न स्थानों से नीचे के क्षेत्र अस्कोट राज परिवार अपना जबरदस्ती भू-क्षेत्र अधिकार मानता था। तब दारमा, चैंदास और व्यास का रं लुंग्बा प्राचीन भोट देश का भोट प्रान्त ‘संयुक्त रं लुंग्बा’ कहलाता था। उस समय इस प्राचीन भोट प्रान्त- ‘रं लुंग्बा’ क्षेत्रा से बाहर ब्रिटिश राज कालीन भारतीय क्षेत्रों तक जाने के लिए सर्वप्रथम अस्कोट रजवार ‘राजशाही’ के अनुमति की आवश्यकता पड़ती थी। इस कारण को देखते हुए एक दिन कित्ती फौजदार जी ने अपनी योजना बनाई। श्री कित्ती फौजदार ने विशेष जयन्ती के अवसर का चयन कर एक दिन अपने अच्छे-अच्छे ढोल-नगाड़े ‘दमो-छेलंग’ बाजकों के साथ अस्कोट रजवार के समारोह स्थल- जनता दरबार पर अनुरोध् प्रार्थना पत्रा और उपहार लेकर पहँुचे। महोदय हमारे रं जनों को आपके सीमान्त राज क्षेत्रों में जाड़ों के मौसम में 4-5 महीने धूप सेकने, जानवरों को चराने तथा व्यापार करने की अनुमति दी जाए। शायक रजवार ने कहा- राजकाज के नियमानुसार बिना किसी स्पद्धा/द्वन्द प्रतियोगिता जीते बिना ऐसी अनुमति देने का कोई प्रावधान नहीं साथ ही कहा- कित्ती, कुश्ती, दमो बाजा और क्षलिया नाच निम्न से किसी एक प्रतियोगिता का चयन कर तैयार रहना। फौजदार ने उस समय की परिस्थिति को देखते हुए डोल- नगाड़े (दमों) बजाने की प्रतियोगिता स्वीकार की ली। प्रतियोगिता अगले दिन करवाई गई और दोनों टीम/पक्ष का घण्टा परस्पर बाजा द्वन्द्व चलता रहा, उस वर्तमान परिस्थिति को समझते हुए, काका फौजदार ने अपने कलाकारों ‘दमों बाजकों’ का रं बोली में ‘जन्सु ला छयानी’ अर्थात (ग्वन संस्कार/ मृत्यु संस्कार वाला बाजा बजाने का संकेत दिया) यह कहते ही इन दमों (बाजे)कों ने उल्टा दमों बाजा बजाया। इन दमों बाजा की कला पर रजवार पक्ष प्रतियोगिता टक्कर नहीं दे पाये, (वे इस कला से दमों बना नहीं पाये) और वे हार गये। ‘दमो बाजा’ की कला केवल रं समाज में ही मृत्यु संस्कार में बजाये जाते हैं। इस प्रकार डोल-नगाड़े (दमों) प्रतियोगिता में श्री कित्ती फौजदार कलाकार पक्ष की जीत हुई। अस्कोट रजवार राजशाही को उनकी बात माननी पड़ी। तब से रं जनों को कंच्योति से नीचे रजवार परिसीमन जौलजीवी तल्लाबगड़ तक जाड़ों में बसने की अनुमति मिली, उस समय गोरी नदी की सरहद से लेकर एलागाड़ तक तक क्षेत्रा को मल्ला अस्कोट क्षेत्रा कहते थे।
रं लोग सन् 1950 तक रजवार क्षेत्रों में अस्थायी झोपड़ी बनाकर रहते थे और दारमा वापस जाते समय झोपड़ी जला देते थे। धीरे-धीरे स्थायी घर बनने लगे। उसी के परिणाम स्वरूप आज धारचूला तहसील से जौलजीवी तक अनेक रं गाँव बसे हुए हैं। अस्कोट दमों प्रतियोगिता विजय के बाद गोरखा शासन काल में श्री कित्ती फौजदार, नेपाल देश की राजधानी-काठमाण्डू राजशाही दरबार तक पहँुचे। श्री कित्ती जी, रं लुंग्बा के वे पहले व्यक्ति थे, जो इतने सुदूर से काठमाण्डू पहुंचे और अपनी क्षेत्रा की बात रखी। उनकी ‘प्रखर वक्ता’, अपने क्षेत्र के प्रभावशाली छवि, अस्कोट रजवार से सम्बन्ध्, तिब्बत से व्यापारिक सम्बन्धित के नाते उन्हें अपने पक्ष में लेने के लिए नेपाल राजशाही दरबार ने उनको ‘फौजदार’ की पदवी से सम्मानित किया। साथ ही उनकी कार्य कुशलता, कार्य प्रबन्धन नीति को देखते हुए उनको नेपाल की ओर से दारमा घाटी में शासन चलाने के लिये सन् 1813 में लाल मुहर और काला मुहर प्रदान कर न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों की आधिकारिक जिम्मेदारी सौंपी। उनके अनुरोध् पर रं लोगों को नेपाल के दार्चुला क्षेत्र में जाड़ों में रहने तथा अपने क्षेत्रों में व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी। सही मायने में श्री कित्ती फौजदार जी ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने रं लोगों को अपने क्षेत्रों से बाहर नये अवसरों को ढूंढने के लिए प्रेरित किया। इसके फलस्वरूप धारचूला तहसील क्षेत्रा के सैकड़ों गाँवों में से मात्रा रं समुदाय के लोग ही दूर-दूर तक व्यापार के लिए जाते रहे। जब भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत से व्यापार बन्द हुआ तब रं लोगों का व्यापर विकल्प नेपाल के सिलगड़ी, धनगड़ी, बेतड़ी, आछम, बयालमाटा, बजंग आदि और अन्य महत्वपूर्ण व्यापारिक सहयोग रहा। हम मानें या न मानें इसका श्रेय श्री कित्ती फौजदार जी को जाता है। क्योंकि उन्होंने ही लीक से हटकर, निडर होकर नया अवसर ढूंढ़ना और सफल होना सिखाया। इस कारण प्राचीन भोट प्रान्त रं लुंग्बा से बाहर व्यापारिक पटकथा के भूमिगत रचना/भूमिगत आधर तैयार करने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति वे ही थे। हमारी ओर से उन्हें नमन, उन्हें हमेशा याद कर रखना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
रं प्रतिनिधि श्री कित्ती फौजदार की मृत्यु के बाद उनका राजपाठ कार्यभार उनके उत्तराधिकारी पुत्र श्री मुंडवा सिंह ग्वाल ने सम्भाला। श्री मुंडवा ने अपनी दारमा प्रतिनिधि काल में उतनी ख्याति प्राप्त नहीं की, जितनी ख्याति पिता कित्ती जी की रही। फिर भी वे रं लुंग्बा परिसीमन के लिए लड़े, अस्कोट राज्य रजवार के साथ हुए परिसीमन विवाद को लेकर अंग्रेज शासन-प्रशासन के न्यायालय तक पहँुचे। ग्वाल जी ने अल्मोड़ा जिला न्यायालय में ठोस साक्ष्यों के साथ अपने पक्ष को रखा। न्यायालय ने तथ्यों पर गहन विचार विमर्श कर अन्त में श्री मुंडवा ‘ग्वाल साहब’ को सीमा विवाद पर विजय घोषित किया। इस विजय फैसले पर ग्वाल साइब पक्ष समूह जन जब विजय उल्लास के साथ लौट रहे थे उस समय अस्कोट-जौलजीवी के मध्य ग्राम गर्जिया, गोरी नदी पुल से अस्कोट राज्य षड्यन्त्रकर्ताओं ने विश्वासघात कर ग्वाल साहब को नदी में धकेल कर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार रं लुंग्बा ग्वाल प्रतिनिधित्वकर्ता का शासन काल समाप्त हुआ। लेकिन इतिहास की यह बातें हमेशा के लिये अमर हैं।

झुमली आक्रमणकारियों का दारमा लुंग्बा पर प्रथम और अन्तिम आक्रमण

इतिहास-कथा
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बाबरे-बाबरे,
कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो खानदा छन
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नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त/प्रदेश) के व्याँस और चाौंदास दोनों घाटी में ‘हुमला झुमला’ प्रान्त के झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित-लूटपाट समय- अन्तराल (समय-समय) में होता रहता था।
इस घटनाक्रम के बारे में दारमा घाटी के जन भी परस्पर पारिवारिक सम्बन्ध् होने के नाते समय-समय पर सुनते रहते थे, क्योंकि दारमा रं जन का सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक सम्बन्ध् आदि समयकाल से ही व्याँस और चाौंदाँसियों से होता रहा है। ये उस समय की बात है जब दारमा घाटी के निवासी कन्चोती तथा व्याँसी लोग लोंलको नामक स्थान के आसपास से नीचले क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से आ-जा नहीं सकते थे। क्योंकि इसके नीचे का परिक्षेत्र अस्कोट राज्य के अधीन माना जाता था, जबकि उस समय दारमा व्याँसी और चाौंदासियों का क्षेत्र स्वतंत्र भोट देश का भोट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ कहलाया जाता था। भोंट प्रदेश ‘रं लंुग्बा’ का उस समय अपना मजबूत प्रशासनिक ढाँचा नहीं था। इस कारण पड़ोसी देश नेपाल के प्रान्तीय शासक इस क्षेत्र पर अपना जबरदस्ती परिसीमन समझता था और गाये-बगाये उनके कर्मचारी इस भोंट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ परिक्षेत्र में आकर जबरदस्ती कर वसूलते थे, मना करने पर आतंकित लूटपाट करते थे। व्याँस-चाौंदास दोनों घाटी के लोग बार-बार जबरदस्ती कर वूसूली-आतंकित लूटपाट से तंग आ चुके थे। इस कारण वसूली व लूटपाट से पार पाने के लिए दोनों घाटी के लोगों ने सामूहिक परस्पर समूह में झुमली मुकाबला कार्यक्रम कर झुमलियों का दमन योजना बनाते थे। फिर भी ये क्षेत्रा वर्तमान-नेपाल के नजदीक के नजदीक परिसीमन होने के कारण ये अत्याचारी झुमला आक्रमण कारियों की टोली जबरदस्ती कर वसूली करके और न मानने पर आतंकित लूटपाट कर तुरन्त बिना हमारे क्षेत्र काली नदी वार ठहरे, काली नदी पार कर वापास नेपाल क्षेत्र में लौट जाते थे।
उस समयकाल में जैसे-जैसे झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित लूटपाट क्षेत्रा बढ़ता जा रहा था। तब हम दारमावासियों ने सोचा एक दिन ये झुमली लोग हमारे लुंग्बा में भी जबरदस्ती कर वसूली और आतंक कर सकते हैं। ये सोच कर दारमावासियों ने समय रहते एक रणनीति बनाते हुए व्यास-चाौंदास झुमली दमन योजना के तर्ज पर दारमा वासियों ने झुमली से मुकाबले की योजना बनाई। रणनीति अनुसार दारमा झुमली संहारक योद्धाओं की टीम तैयार कर झुमलियों से मुकाबला करने के लिए स्थान का चयन किया गया। यह स्थान ‘बालिंग से गंबैनाती’ की ओर ‘गंबैनाती से बालिंग’ की ओर का लगभग मध्य स्थान ‘जैं गुरु सैं’ स्थल के नजदीक का स्थान चुना था, जो अत्यधिक संकरा और अत्यधिक खतरनाक चट्टानी मार्ग था, इस संकरे चट्टानी रास्ते का चयन करने का मुख्य लाभ यह था कि इस रास्ते के उपर 40-50 मी. की उफँचाई पर एक सुरंगनुमा गुफा है, जिसे हम सब रं जन गंबैनाती फु के नाम से जानते हैं। यह फु /गुफा आश्रय के लिए सुरक्षित गुफा है। इसी गुफा के नजदीक और संकरे चट्टाननुमा रास्ते के 20-25 मी. उपर से झुमलियों पर आक्रमण करना सबसे उचित और सुरक्षित रहेगा, यह समझते हुए हमारे धरोहित बुजुर्ग रणनीतिकारों ने इस स्थान को झुमलियों से मुकाबले के लिए चुना। कहा जाता है कि इस सुरंगनुमा गुफा (गंबैनाती फु) में सुरक्षित वातावरण में आराम से लगभग 5-6 ग्रामवासी रहने तक का स्थान था, ये गुफा सर्वप्रथम प्राचीन काल में तकरीबन ढाई से तीन किमी. दूर ग्राम बालिंग ब्यैंक्से बुग्याली नामक स्थान तक खुलता था। ‘दारमावासी वीर रक्षक योद्धाओं ने नदी से बड़े-बड़े गोल पत्थर लाकर गुफा में इकट्ठे किए।
एक दिन ऐसा समय आ ही गया, झुमली आक्रमणकारियों की टोलियों ने व्यास-चाौंदास के ग्राम-रिमझिम की चोटी को पार कर दारमा, दैर्रीयंग/हैर्री, लांगदारमा फकल नामक प्राचीन ग्राम स्थान से बोंगलिंग नदी पार कर बोंगलिंग-वर्थिंग होते हुए, दारमा के अन्य ग्रामों में प्रवेश करने वाले हैं। इसकी सूचना सुदूर दारमा में मिलते ही यहाँ के दारमावासियों ने ‘झुमली संहारक योद्धाओं की पूरी टीम सदस्यों’ ने झुमली मुकाबला चयन स्थान में अपने-अपने ढाल, तलवार, हथियार, गोलनुमा पत्थर और खाने-पीने का सामान, हमी (सत्तू के आटे से तैयार चर्पा/लड्डूनुमा खाद्य पदार्थ और अन्य खाद्य सामग्री एकत्रित कर सभी दारमा के नौजवान योद्धा एकत्रित होकर झुमलियों के मुकाबले के इन्तजार मंे एकत्रित हो गए। 4-5 दिन इन्तजार करने के बाद अगले दिन झुमलियों का काफिला बालिंग से गंबैनाती की ओर आते देखा गया। जैसे ही दारमावासियों के द्वारा चयनित गुफा के ठीक नीचे चट्टानी संकरे रास्ते झुमलियों की टोली 10-15 मीटर चट्टानी रास्ते के मध्य सीध्े-आगे गुजरने ही वाली थी, तुरन्त सभी नौजवानों ने झुमली संहारक योद्धाओं ने उन पर एकाएक लगातार देर तक पत्थरों के गोले बरसाये, अचानक हुए इस खतरनाक हमले से झुमली लोग घबरा गए, कुछ झुमली इस हमले में गम्भीर रूप से घायल हो गए, बांकी झुमलियों ने अपने रास्ते से पीछे हटना ही ठीक समझा और वे सभी पीछे हट गये। आगे बढ़ना पीछे लौटने से कहीं ज्यादा खतरनाक था क्योंकि आगे बढ़ने-पीछे हटने के लिए वही एकमात्रा रास्ता था, नीचे नदी उपर बिल्कुल खतरनाक चट्टान।
झुमली लोग जान बचाते हुए, कुछ दूर वापस जाकर उपर खतरनाक चट्टानी गुफा के नजदीक में एकत्रित हुए लोगों को देखा कि वे लोग एक हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हें। इस क्रियाकलाप को देखकर वे चकित रह गए और वे यह कहते वापस भागे ‘बाबरे-बाबरे कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो (पत्थर) लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो (पत्थर) खानदा छन’ (अरे ये कैसे लोग हैं कए हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हैं) जबकि वे योद्धाओं दूसरे हाथ से सत्तू/हमी और लड्डूनुमा चर्पा का गोलनुमा खाद्य पदार्थ खा रहे थे। दूसरे हाथ से पत्थर खाने की ऐसी खतरनाक क्रिया समझकर वे झुमली लोग भाग गए। फिर दोबार उन्होंने इस प्रकार का जबरदस्ती कर वसूली-आतंकित लूटपाट करने की स्वतंत्र भारत गणराज्य बनने तक कोई कोशिश नहीं की। उस समय झुमली आतंकित लुटेरे-आक्रमणकारियों के द्वारा किया गया यह झुमली आक्रमण 20वीं शताब्दी से पहले का और पिछले ‘प्राचीन काल में हुआ जैं श्री हुरबी पहलवान-झुमली मुकाबला’ के बाद का लुंग्बा में किया गया प्रथम और अन्तिम आतंकित लुटेरे झुमली आक्रमण का मुकाबला था।
ऐसा मैंने बड़े बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी और अमटीकर लेखों से पढ़ी सही कथनों के निष्कर्ष निकालते हुए यह संक्षिप्त विवरण दिया है।
यह 17वीं-18वीं शताब्दी के मध्य की घटना मानी जाती है बाद में कूर्मांचल (कुमाउ) को गोरखा शासन ने अपने अधीन कर लिया था तब भी प्राचीन भोंट प्रान्त- रं लुंग्बा स्वतंत्र था।
हमारे पूर्वज जनों का हम पर यह कर्ज हमेशा रहेगा जिन्होंने हमें सुरक्षित रखा। जय हो हमारे पूर्वज ध्रोहर रणनीतिकार, जय हो हमारे रक्षक वीर योद्धा (झुमली संहारक योद्धा))।

जैं श्री ह्या पुक्टांग सैं ‘ईष्ट देव’ ग्राम- सेला

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
दारमा घाटी के ग्राम सेला, जन प्राचीन काल से ही जैं ‘श्री ह्या पुक्टांग’ सैं को अपना ईष्ट देव/स्यंग सैं मानते हैं। सेलाल जनों का /सेलालों का मानना है कि जैं श्री ह्या पुक्टांग सैं सृष्टि की रचना के समय से ही धरती पर अवतरित हुए और वे आदि देव महादेव का ही अवतारक शिव अंश है।
ग्राम सेला की उत्तरी दिशा में विशाल ‘पांगर’ के वृक्षों के मध्य ‘श्री ह्या पुक्टांग सैं’ का मूल मन्दिर स्थित है। श्रद्धालु श्रद्धासुमन भाव से ह्या पुक्टांग सैं के मूल मन्दिर में नतमस्तक होकर सुख- शान्ति, समृद्धि , सौभाग्य प्राप्त होने का वरदान मांगते हैं। सच्चे मन से मांगे गये वरदान जरूर पूर्ण होते हैं। ग्राम सेला वासियों का मानना है कि ह्या पुक्टांग सैं सृष्टि के पालनहार है और वे दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण ‘शिव अंश’ है।
जैं श्री ह्या पुक्टांग सैं की महिमा- जैं ह्या पुक्टांग सैं की महिमा का साक्षात दर्शन ग्राम डंगरिया /धामी के द्वारा ग्राम जनों को होता है। सभी ग्रामवासी मिलकर जब सैंथान /भगवान का स्थल में ‘नौर्ता’ /जागर का आयोजन करते हैं, ढोल, दमै-छिलांग की आवाज पर डंगरिया /धामी के शरीर में ईष्ट देव अवतरित होते हैं। डंगरिया /धामी जी के ज्येष्ठ पुत्र ही धामी होते हैं, उन्हें ईष्ट देव के दिशा-निर्देशानुसार नियम का पालन करना पड़ता है। डंगरिया जी के दिशा निर्देशानुसार में ग्राम के सभी प्रकार के संस्कार सम्पन्न होते हैं। आदि काल से ही ‘ह्या पुक्टांग सैं’ ने गाँव की रक्षा हेतु एक ऐसी व्यवस्था बनाई है कि जब ईष्ट देव ‘जैं ह्या पुक्टांग सैं’ जप-तप और साधना में लीन होते हैं, तब ग्राम को अयाल-बयाल, रोग-ब्याग, प्राकृतिक विपत्ति और अन्य बाहरी समस्याओं से बचाने के लिए ईष्ट देव भैरव के रूप में ‘श्री हुल्ला सैं’ को ग्राम रक्षक के रूप में नियुक्त करते हैं। यूं तो समय-सम पर भक्तजनों को ह्या पुक्टांग सैं की अपार दिव्य शक्तियों की कृपा से हम सब रं जन परिचित हैं परन्तु कुछ साक्षात घटनाएं इस प्रकार हैं-

घटना 1- आज से लगभग चार दशक पूर्व की बात है, जब ‘जैं ह्या पुक्टांग सैं’ के देवालय स्थल पर ग्रामजनों ने नौर्ता /जागर लगा रखा था, उस दिन सुबह से ही गर्जना भरी घनघोर मूसलाधार बारिश हो रही थी। नौर्ता /जागर में आग की धूनी जल रही थी। फिर भी इस धूनी के चारों ओर लोग पेड़-पत्थरों की आड़ में दुबक कर बैठे थे, तभी ग्रामजनों की इस भक्ति से प्रसन्न होकर धामी श्री दरपान सिंह जी के शरीर में साक्षात ह्या पुक्टांग सैं अवतरित हुए और उन्होंने अपने हाथों में अक्षत /ठुमू पछम लेकर मसलते हुए आसमान की ओर उछाल कर बारिश को रुकने का दशारा किया, देखते ही देखते एकाएक बारिश रुक गयी। घनघोर मौसम पूरी तरह साफ हो गया और जागर का कार्यक्रम सुचारु ढंग से चलता रहा।

घटना 2- ‘जैं ह्या पुक्टांग सैं/स्यांग सैं’ के मूल स्थल पर एक दिन पूजा-पाठ नौर्ता /जागर के दौरान कुछ महिलाओं के शरीर पर देवी अवतरित होने लगी, इस साक्षात दैवीय घटनाचक्र को शान्त करने के लिए ईष्ट देव/ स्यांग सैं ने डंगरिया /धामी ‘मुख्य पंडित’ के शरीर में अवतरित होकर अक्षत /ठुमू पछम के कुछ दाने साक्षात देवी घटनाचक्र /कांपती हुई, महिलाओं की ओर उछाल दिये, देखते ही देखते अवतरित देवी ‘कांपने वाली सभी महिलाएं’ शान्त होकर अपने-अपने स्थान पर जागर बैठ गई। इससे स्पष्ट हो जाता है कि र्दष्ट देवता ‘ह्या पुक्टांग सैं’ की अनुमति के बिना उनके जागर में अन्य कोई देवी-देवता किसी भी भी रूप में अवतरित नहीं हो सकते हैं।

घटना 3- एक और नौर्ता /जागर के दौरान की बात है। ‘ह्या पुक्टांग सैं’ /जैं इष्ट देव की जैं जागर स्थल में गाँव और रिश्तेदारों के विशाल जन समूह एकत्र थे। रात्रि के लगभग 8.30 बजे का समय था, जब डंगरिया /धामी जी के शरीर में ईष्ट देव अवतरित हुए। वहाँ उपस्थित लोगों ने देवता से विनती की कि- हे ईष्ट देव! बाघ ने हमारे जानवरों को विचलित कर रखा है और लगातार जानवरों की हत्या कर रहा है। हमारे उपर इसके समाधान हेतु कृपा करें। तभी तुरन्त धामी जी ने तीन बार सीटी बजायी। देखते ही देखते बाघ उछलते हुए, हवा की गति सी तेज रफ्रतार से मन्दिर परिसर के उपर आकर बैठ गया। जीभ बाहर निकाल लपलपाने लगा। सभी ग्रामजन यह देख भयभीत हो गये, सभी ने ईष्ट देव-हे ईष्ट देव रक्षा करें का उच्चारण किया। धामी जी ने एक लाल कपड़े की ध्वजा /दाजा से अक्षत /ठुमु पछुम बांधकर जलती धूनी के अंगारों के बीच से राख उठाकर, मंत्र फंूककर एक गाँठ बनाई और बाघ के गले में बाँध् दिया। साथ ही उसके कानों में मंत्र सिद्ध कर धूनी के चारों ओर परिक्रमा करवा कर, दूर जंगल की ओर जाने का इशारा किया। और वह बाघ जंगल की ओर चला गया। डंगरिया ने कहा कि अब यह बाघ हमारे गाँव में नहीं दिखाई देगा। इस घटनाक्रम को देखकर लोग अचम्भित रह गये। उन्हेें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो घटनाक्रम घटा वह सच्चाई है या स्वप्न था। जैं ईष्ट देव की इस माया को देख लोग प्रसन्न, भाव-विभोर हो गये और स्वयं को सेला-ग्रामजन समझकर बहुत धन्य समझने लगे।

ये तीन-चार साक्षात घटनाक्रम के साथ ‘जैं श्री ह्या पुक्टांग सैं’ की अन्य माया-कृपा ग्राम डंगरिया जी /धामी के माध्यम से ग्रामजनों को सन्तान प्राप्त करना हो या किसी जंगली जानवरों के आतंक-भय से ग्राम के जानवरों को बचाना हो, फसली मौसम पर कृपा करवानी हो, या किसी भी प्रकार की परेशानियों को ईष्ट देव/स्यांग सैं ;जैं ह्या पुक्टांग सैं जागर /नौर्ता के उन फलों में साक्षात धामी जी के शरीर में अवतरित होकर हमें आशीर्वाद देता है और समस्याओं का समाधान कर हमारे उपर कृपा करते हैं। हम ‘सैं समा’ के हमेशा रिणी रहेंगे.

जय श्री हुरबी पहलवान जी (जै रं बाहुबली)

जै हुरबी रं बाहुबली का गाँव बोंगलींग/बौंग्लींग
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
प्राचीन काल में रंग लुंग्बा के दारमा घाटी, ग्राम- बोंगलींग/बौंग्लींग में बाहुबली मानव ‘हुरबी’ पहलवान रहता था। वे कुश्ती पहलवानी करते-करते इतने पहलवान हो गये कि वह रं लुग्बा का बाहुबली मानव कहलाने लगे। हुरबी पहलवान को रं लुंग्बा के कोई भी पहलवान पहलवानी/कुश्ती में पराजित नहीं कर पाते थे। इस प्रकार उन्होंने अपने समय में पहलवानी में इतिहास रचा, जिसके कारण आज भी हम उन्हें याद करते हुए और जय दारमा ‘भीम’ के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। यह उस सदी की बात है जब रं लुंग्बा के पुरुष अपने कमर में हल की रस्सी बाँधकर खेत की जुताई किया करते थे।
प्राचीन समय से ही रं लुंग्बा जनों ने नेपाल हुमला-झुमला प्रान्त के झुमलियों के द्वारा जबरदस्ती कर वसूली व अमानवीय आतंकित लूटपाट का दंश समय-अन्तराल समय-समय पर झेला था। ये लोग रं लुंग्बा जन बहुत ही सीधे-साधे विचार के रहे हैं।
पहली घटना- एक बार लगभग 50-60 झुमलियों के समूह ने जबरदस्ती कर वसूली व आतंरिक लूटपाट करने के वास्ते नेपाल देश के हुमला-जुमला प्रान्त से बंगबा चैंदाँस घाटी के रिमझिम, हिमखोला ग्राम के पहाड़ की चढ़ाई कर पहाड़ की दूसरी ओर दारमा क्षेत्र का लंगदारमा, दैर्री /हेरी, फकल, नामक क्षेत्र में पहुँच कर नदी पार कर तल्ला दारमा, ग्राम बौंगलींग में प्रवेश किया। ग्राम जनों ने झुमलियों के द्वारा की जाने वाली जबदस्ती कर वसूली का विरोध् किया, झुमली लोग डराकर आतंकित लूटपाट पर उतारु हो हो गये, उसी पल दोनों गुटों में बहस हो गयी पर कुछ बुद्धिजीवी ग्रामजनों ने जबदरस्ती आतंकित लूटपाट से बचने के लिए एक कूटनीति चाल चली। हम आपको दोगुना टैक्स/कर देंगे, पर जब आप लोग हमारे हुरबी जी को कुश्ती में हरा पाओगे।
झुमलियों ने हुरबी पहलवान जी को सामान्य व्यक्ति समझकर इस कुश्ती चुनौती को स्वीकार कर लिया और कुश्ती का मुकाबला ग्राम के चैथरा थंग में शुरु करवाया गया। बाहुबली हुरबी पहलवान ने एक-एक करके अधिकतर झुमलियों को अकेले ही हरा दिया और हारे हुए झुमलियों में से 10-15 झुमलियों को अकेले ही को कुश्ती में क्ररता से इतना घायल कर दिया कि एक-ढेड़ घण्टे के समय अन्तराल में उनकी मृत्यु हो गयी।
बाहुबली हुरबी पहलवान जी के इस भयंकर क्रूर रूप को देखकर बचे झुमली लोगांे ने वहाँ से बचकर भागना ही ठीक समझते हुए, बंग्बा ;चैंदाँस की ओर भाग निकले और अन्त में गुस्से से जय श्री हुरबी पहलवान जी ने वहाँ मरे झुमलियों के सिर काट कर उनकी खोपड़ियों को गाँव से दूर जंगलों के मध्य उनका एकान्त नियमित अभ्यास स्थल पर स्थित पर ओखली में डालकर मुसले से कुटे, इस घटना के बाद से ग्राम जन हुरबी पहलवान जी को ग्राम रक्षक देव रूप में पूजते हैं। यह ओखली विशाल ठोस पत्थर पर बनी हुई है, ऐसी मान्यता है। यह खूनमखून लाल रक्त-रंगनुमा ओखली निशान चिन्ह आज भी उस स्थान पर बाहुबली हुरबी पहलवान जी के साक्ष्य के रूप में विद्यमान है। यह लाल रक्त नुमा ओखली बाहुबली हुरबी के नियमित अभ्यास के दौरान मुक्का-मुट्ठी मार-मार कर बना हुआ है। यह बात नागलिंग जैं श्री कल्या लौहार जी के समय काल का ही माना जाता है। इस जबरदस्ती कर वसूली आतंकित लूटपाट घटनाक्रम के बाद शताब्दियों तक पुनरावृत्ति करने की इन झुमलियों ने दुबारा कोशिश नहीं की।
दूसरी घटना- एक दिन ग्राम बौंग्लींग, बस्ती के समीप उपर बड़ा सा चट्टानी पत्थर पर जय जय श्री हुरबी पहलवान जी ने गुस्से से जोर से घूंसा जड़ दिया और उस पत्थर पर दरार पड़ गयी। ग्रामवासियों को वह पत्थर के टूटकर मकानों पर गिरने का डर बना रहता था।
उस पत्थर को टूटकर गिरने से रोकने के लिए ग्राम जनों ने जय श्री कल्या लोहार जी से टाँका लगाने का अनुरोध् किया और संकट मोहक जै श्री कल्या लोहार जी ने ग्राम जनों को बचाने के वास्ते उस पत्थर में टाँका लगा दिया। यह पत्थर आज भी वैसा ही मौजूद है। बाहुबली जैं श्री हुरबी पहलवान और जैं श्री कल्या लोहार जी को संकट मोचक के रूप में पूज्यनीय माना जाता है।