
भारत के सुन्दरतम पर्वत श्रृंखला न्यौला पंचाचूली हिम श्रृंखल’ के सामने ‘‘स्यं सैं च्यूति गबला की थाती माटी’’ पर बसा गाँव-बोन के अत्यधिक आर्थिक कमजोर परिवार में भावी सामाजिक चिन्तक-बालक का जन्म 11 जुलाई 1940 में हुआ। जिनका नाम उनके परिवारजनों ने नैन सिंह रखा। नैन सिंह जी के माता का नाम-श्रीमती सुरमा दताल बोनाल और पिता का नाम-श्री ज्ञान सिंह बोनाल ‘पूनराठ’ था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे स्कूली शिक्षा में अक्षर ज्ञान की औपचारिक शिक्षा भी
ठीक से प्राप्त नहीं कर पाए। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन में बहुआयामी रूप से बहुत तरक्की किया। उनका व्यक्तित्व-बहुमुखी (सम्वेदनशील, कर्मशील, कठोर परिश्रमी) स्नेहशील और मिलनसार था। नैन सिंह जी अपने साक्षात् जीवन में सामाजिक सुधार हेतु निरन्तर चिन्तनशील रहते थे।
श्रद्धेय नैन सिंह जी की अनौपचारिक शिक्ष और आजीविका- नैन सिंह जी ने अपने साक्षात् जीवन के अन्तिम दौर तक निरन्तर बहुत संघर्षशील तप किए। नैन सिंह जी की छोटी उम्र में ही उनके पिता जी की अचानक मृत्यु हो गयी जिस कारण उनके परिवार का भरण-पोषण की अतिरिक्त बाहरी जिम्मेदारी और आर्थिक सुधार की पूरी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गयी। इन्हीं कारणों से उन्होंने होश सम्भालते ही लक्ष्य 10-11 साल की उम्र से ही परिवार की आर्थिक रूप से मदद करने हेतु गाँव में सहायक (सहयोगी) के रूप में कार्य करना शुरू किया। जैसे- दूसरों के भेड़-बकरी को चराने में मदद करना और अन्य सहायक रूप के कार्य करना। नैन सिंह जी ने जैसे ही मानसिक रूप से समझ व शारीरिक रूप से सक्षम होने पर गाँव के मददगार लोगों के साथ मिलकर अपना छोटा-सा कार्य शुरू करने लगे। जैसे- अपनी थोड़ी सी भेड़-बकरी को दूसरों के भेड़-बकरियों की टोली के साथ ले जाकर सुदूर क्षेत्रों पर सामग्री विनिमय हेतु व्यापारिक कार्य पर जाना। आगे चलकर नैन सिंह बोनाल जी ने सरकारी संस्था के पशुपालन विभाब में दैनिक वेतनभोगी के तौर पर गाँव-ग्रामीणों से दूर जीवन का प्रथम चरण शुरू किया। नैन सिंह जी ने मात्रा 19 साल की उम्र से सन् 1959 में भारत-तिब्बत सीमान्त क्षेत्र बिदंग में रक्षा सीमा प्रहरी के कार्यालय वायरलैस चैक पोस्ट पर सहायक (हैल्पर) के रूप में अस्थाई नौकरी की। यह नौकरी मात्रा छः माह मई से अक्टूबर तक के लिए ही होती थी। तब वायरलैस के माध्यम से बातचीत करते समय वायरलैस की मशीन को हाथ से घुमाना पड़ता था। वे अपने कार्य के प्रति ईमानदारी व लगन से कठिन परिश्रम करते थे। शिक्षा के प्रति निरन्तर जिज्ञासा रखने के कारण उन्होंने इसी कार्यालय के कर्मचारियों की मदद से शिक्षा का प्रथम उद्देश्य ‘अक्षर ज्ञान’ की अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त की। सन् 1962-63 में मात्रा 22 साल की उम्र पर में नैन सिंह जी ने पांगू में स्थित सरकारी भेड़ पालन केन्द्र पर भेड़ों की देखरेख करने की नौकरी की। नैन सिंह जी ने जहाँ-जहाँ नौकरी की वहीं-वहीं अपनी लिखाई-पढ़ाई में रूचि व लेखनी पर विशेष ध्यान देते रहे और शिक्षित लोगों से वे निरन्तर शिक्षा लेते रहे। नैन सिंह बोनाल जी ने औपचारिक शिक्षा को प्राथमिक स्कूल से अक्षर ज्ञान की शिक्षा ठीक से प्राप्त न करने के बाद भी उन्होने अपनी शिक्षा अभिरूचि जिज्ञासा से औपचारिक शिक्षा को अनौपचिरिक रूप से प्राप्त किया। शिक्षा सम्बन्धित ज्ञान-कर्मशील योग्यता और उनके ईमानदार व्यक्तित्व के कारण क्षेत्राय ग्रामीणों के अनुमोदन पर उन्होंन सन् 1966 से 1969 तक बौंन का ग्रामीण पोस्ट आफिस में ग्रामीण पोस्ट मास्टर के पद पर सरकारी कार्य किया। नैन सिंह जी की जिन्दगी में विशेष मोड़ तब आया जब उन्हें ‘बौंन-दुग्तु’ साधन सहकारी समिति में गणक (काउन्टेन्ट) पद पर काम करने को मिला। उन्होंने इन्हीं दिनों सहकारी समिति का कार्य भी किया। इन्हीं वजहों से सरकारी सहायता क्षेत्रा के क्रियाविधि् (कार्य प्रणालियों) के बारे में जानने-समझने का मौका मिला। सहकारी समिति के कार्यों के माध्यम से उनका दारमा के चौदह गाँवों के प्रबुद्धजनों और बुद्धजीवियों से मिलन व उनसे व्यक्तिगत व्यक्तित्व से परस्पर
मैत्रिक सम्बन्ध् बने। उन्हें सहकारी कार्यों के सम्बन्ध् में समय-समय पर धारचूला ब्लॉक स्तर के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ बैठकों में शामिल होकर विचार-विमर्श करने का अवसर मिला।
ग्रमीण कार्यशैली से हटके बाहर शासनिक-प्रशासनिक संस्था के कार्यशैली व सरकारी तन्त्रा में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में जानने-समझने के कारण वे शिक्षा को और अध्कि महत्व देने लगे। उनसे मिलने वाले प्रत्येक अशिक्षित व्यक्तियों को अनौपचारिक रूप से प्रौढ़ शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा देते थे और उनके परिवारजनों का शिक्षा के प्रति उत्साहित करते हुए औपचारिक संस्थागत शिक्षा ग्रहण करने को कहते थे।
सामाजिक चिन्तक श्रद्धेय नैन सिंह के सामाजिक जन जागृति अभियान पर महत्वपूर्ण भूमिका- दारमा लुंग्बा के क्षेत्रजनों ने सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए सत्तर-अस्सी के दशक में जन जागृति अभियान चलाया। यह अभियान दारमा समाज सुधारक संस्था का गठन कर चलाया गाया। इस संस्था का सूत्रधार-नेतृत्वकर्ता नैन सिंह बोनाल थे। उन्होंने दारमा घाटी के उस समय के सक्रिय नवयुवकों नवयुवतियों और विद्यार्थियों के साथ मिलकर टोली बनाकर कई बार पारम्परिक संस्कृति और संस्थागत शिक्षण के प्रति जागरूकता कार्यक्रमों को जमीनी स्तर से शुरू कर क्षेत्रजनों के मन मस्तिष्क तक इसकी महत्वता को पहुँचाया जिसका एक उदाहरण ‘चौदह गाँव-चौदह दिन’ ‘पाँच सूत्रीय जन जागृति कार्यक्रम’ भी था जो 1 बाल विवाह प्रतिबन्ध्, 2 नशाबन्दी (मद्य निषेध्) 3 द्वृक्षारोपण, 4 शिक्षा-साक्षरता, ;5 सफाई आन्दोलन ;स्वास्थ्य के प्रति स्वच्छताद्ध आदि मुख्य बिन्दु थे।
सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल जी ने जून सन् 1974-1975 में इस पाँच सूत्रीय जन जागृति अभियान में शामिल नवयुवकों-नवयुवतियों एवं विद्यार्थियों के समूह का नेतृत्व करते हुए, दारमा का दूरस्थ गाँव-सिपू से लेकर गाँव-सेला तक के चौदह गाँवों में चौदह दिन कई घण्टे पैदल चलकर घर-घर जाकर इस अभियान को चलाया। इस अभियान के निम्नलिखित उद्देश्य ;1 नशाबन्दी, ;2 शिक्षा-साक्षरता, ;3 द्क्षारोपण, ;4 बाल विवाह प्रतिबन्ध, ;5 सफाई आन्दोलन (स्वास्थ्य के प्रति स्वच्छता) होने वाले लाभ व नुकसान पर दारमा लुंग्बा के साथ-साथ दिलंग दारमा के क्षेत्राजनों के मन-मस्तिष्क (अन्तरात्मा) जन जगृति पैदा कराया जिसका काफी लाभ रं लुंग्बा जनों को हुआ। इस सामाजिक पाँच सूत्राय जन जागृति अभियान से नशाबन्दी, शिक्षा स्वास्थ्य, बाल विवाह रोकथाम व प्राकृतिक पेड़-पौधें से होने वाले लाभ के प्रति समाज को कापफी लाभ हुआ।
सामाजिक चिन्तक- श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल ने पुनः ‘दारमा यवक संघ’ का नेतृत्व कर जनवरी 1977 में जौलजीबी दाँतू खे़डा से लेकर बलुवाकोट घाटीबगड़, छारछम-नयाबस्ती, कालिका, गोठी एवं निंगालपानी-गलाती तक के ग्रामीणों का जून सन् 1975 में चौदह गाँव चौदह दिन ‘पाँच सूत्राय जन ‘जागृत अभियान’ कां याद दिलाते हुए पुनः नशाबन्दी, बाल विवाह रोकथाम, कुटिर उद्योग, शिक्षा स्वास्थ्य के प्रति जनचेतना का वृहद अभियान चलाया जिसे सफलताप पूर्वक सम्पन्न किया। उपरोक्त दोनों जन जागृति (जन जागरण) में बहुत सारे दारमा के नवयुवक-नवयुवती और छात्र-छात्रायें शामिल थे। उनमें से कुछ युवकों के नाम इस प्रकार से है। कल्याण सिंह सोनाल, राम सिंह सोनाल, चन्द सिंह ग्वाल, पुष्कर सिंह सेलाल, फली सिंह दताल, श्री लाल सिंह बोनाल और बिशन सिंह बोनाल। समय-समय पर हुए इस प्रकार से जन चेतना कार्यक्रम के फलस्वरूप ही आज दारमा रं लुंग्बा के अनेक नौजवान शिक्षा प्राप्त कर उच्च पदां पर आसीन होकर दारमा का नाम रोशान कर रहे हैं। सन् 1980 जुलाई-अगस्त कोठी में जबरदस्त भूकम्प आया जिसमें स्थानीय लोगों की बहुत चल-अचल सम्पत्तियों का नुकसान हुआ। उस वक्त भी नैन सिंह बोनाल जी ने निःस्वार्थ ध्रातली सेवक के रूप मे भूकम्प पीड़ितों को राहत पहुँचाने हेतु लगातार कई महिने तक कर्तव्यनिष्ठ सिपाही के तौर पर शासन-प्रशासन की सहायता कर विशेष योगदान दिया। उस समय के सरकारी अधिकारियों ने उनकी इस सेवा कार्य की खूब प्रशंसा की और इन अध्किरियों और क्षेत्राय सामाजिक संस्थाओं ने उनके द्वारा क्षेत्रा में पूर्व से 1980 अगस्त तक के समाज सेवा, सामाजिक सेवा कार्यों की गणना कर उन्होंने समाज को दिये अपन े महत्वपूर्ण समय की महत्वता को समझते हुए कार्य पफल के रूप में श्रद्धेय नैन सिंह जी का नाम राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए नामित करने की बात की। पर दुर्भाग्यवश कुछ षड़यन्त्राकारियों के कारण उनका नाम इस पुरस्कार के लिए नामित नहीं हो पाया। समाज सेवक नैन सिंह जी ने सामाजिक क्षेत्रा से लेकर कई सरकारी संस्थानों में काम करते हुए अपनी अन्तर आत्मा के अनुसार सामाजिक दायित्वों को पूर्ण कर्तव्यनिष्ठा एवं ईमानदारी से निभाया। जिस वजह से स्थानीय समाज उनके नाम को समय-समय पर जरूर स्मरण करते हैं। यही उनके लिए सर्वोपरि पुरस्कार के समान है। समाज सेवक नैन सिंह बोनाल ने सच्चे समाज सेवक के रूप में दारमा क्षेत्रा और राज्य सरकार द्वारा संचालित समाज कल्णण विभाग से जनमानस को लाभ पहुँचाने के लिए बहुत से कार्य किये। नैन सिंह बोनाल जी ने सामाजिक हित के लिए परस्पर विरोध् की राजनीति के बिना ;किसी भी पक्ष-विपक्ष के बहकावे में आए बिनाद्ध अपने विवेक से जनमानस क्षेत्राजनों के परस्पर प्रेम एकता हेतु सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में समाज सेवा का कार्य उनसे जितना हो सके वे कार्य उन्होंने पूर्ण ईमानदारी से किया। इन्हीं कारणों से उन्हें रं लुंग्बा का सामाजिक प्रेरणास्रोत माना जाता है।
सामाजिक चिन्तक- नैन सिंह जी के सपफल प्रयासों से हम सब आज दंग्ते दंग में मन्दिरों की सुन्दर श्रृंखला देख पा रहे हैं ;जब इस पवित्रा दंग्तों देव दं बं पर मन्दिर निर्माण कार्य शुरू होने वाला था।
सभी खरीदे निर्माण सामग्रियों व कार्य करने वाले लोग यहाँ पहुँच गये थे। मन्दिर निर्माण कार्य शुरू करने के लिये खुदाई शुरू करनी थी तब यहाँ सर्वप्रथम खुदाई शुरू करने के लिए कोई क्षेत्राजन व निर्माण कार्य करने वाला व्यक्ति तैयार नहीं हुआ क्योंकि कुछ रूढ़िवादी सोच वाले लोगों ने अपफवाह फैला दी थी कि इस पवित्रा दंग्तों दं बं भू-भाग में जो खुदाई करेगा उसे प्रकृति और दैवीय शक्ति का दण्ड झेलना पड़ेगा। उस समय रूढ़िवादी सोच के डर से कोई भी व्यक्ति यहाँ खुदाई शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। इस विकट समस्या पर रूढ़िवादी सोच से हटकर श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल ने कहा कि मैं यहाँ सर्वप्रथम खुदाई करूंगा। चाहे मुझे प्रकृति और दैविय दण्ड झेलना पड़े। मैं झेलूँगा कहते हुए खुदाई की सर्वप्रथम शुरूआत उन्होंने मन्दिर निर्माण कार्य हेतु किया तभी इस पवित्रा दंग्तों देव दं बं पर मन्दिर निर्माण कार्य शुरू हो पाया। ;कथन नैन सिंह बोनाल जी की पत्नी आवती गुंज्याल बोनालद्ध समाज सेवक श्र(ेय नैन सिंह बोनाल के कार्यपफल से ही वर्तमान में पवित्रा दंग्तों देव दं बं पर इस प्रकार से मन्दिरों की सुन्दर श्रृंखला देख पा रहे हैं।
सन् 1977 संगठन (समिति) स्यांग सैं ह्या गबला देव की मूर्ति लाने की जिम्मेदारी उस समय के सक्रिय कार्यकता नैन सिंह बोनाल जी और रूप सिंह दताल (नेता जी) को सौंपी। पूर्व प्रस्ताव के आधर पर नैन सिंह बोनाल अपने सहायक ;सहयोगीद्ध रूप सिंह दताल (नेता जी) के साथ दाँतू के सामूहिक ह्या गबला देव मन्दिर हेतु स्यांग सैं ह्या गबला की मूर्ति को जयपुर में बनवाने के लिए मई 1978 को गये। अगस्त 1978 को यह मूर्ति जयपुर राजस्थान से गोठी, धरचूला लाया गया। इस स्यांग सैं ह्या गबला की मूर्ति को सभी चौदह गाँवों में परिक्रमा करवाते हुए 23-08-1978 को दाँतू गाँव में मूर्ति पहुँचाई गई और 24-08-1978 को आदि देव ‘स्यांग सैं ह्या गबला देव’ गबला मन्दिर में स्थापित किया गया। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल जी ने दारमा के सामाजिक बुद्धजीवियों ने उन्हें सौंपी
जिम्मेदारी को बखूबी से निभाते हुए इन सभी सामूहिक कार्यों को सन्ताशजनक ढंग से सम्पन्न करवाया। इसके साथ ही श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल और उनके अनुज भ्राता इन्जीनियर श्री फल सिंह बोनाल जी के सौजन्य से अपनी माता स्व. सुरमा देवी दताल बोनाल की दादी यानि नैन सिंह व फल सिंह जी की परनानी महान समाजसेविका जसुली देवी जी की मूर्ति को मूर्तिकार-डी.आर. सीपाल जी से बनवाकर स्थापित करवाया। यह लला जसुली जी की मूर्ति पूरे रं लुंग्बा का प्रथम रं मूर्ति (स्टेचू) था और है जो वर्तमान समय पर भी लला जसुली दं बं पर स्थित है।
उपरोक्त सेवा कार्यों के बाद उनके जीवन के अगले चरण में धारचूला ब्लॉक में कनिष्ठ उप प्रमुख के पद पर कार्य किया। इसके बाद वे ग्राम बौंन में 1970-80 के दशक में दो बार ग्राम प्रधन पद पर चुने गये। समाज सेवक नैन सिंह जी धारचूला ब्लॉक के सच्चे, ईमानदार, निष्ठावान, निःस्वार्थ समाज सेवक के रूप में उभरे।
राजनीति भूमिका- श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल जी ने राजनीति की पारी सन् 1969-1970 में काँग्रेस पार्टी की सदस्यता लेकर किया। काँग्रेस पार्टी में शामिल होकर उन्होंने अपने पूरे राजनीति जीवन पदाध्किरी पद की लालसा किए बिना एक सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया। उन्होंने समय-समय पर कांग्रेस संगठन के साथ मिलकर कई बार कांग्रेस सदस्यता अभियान चलाया। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल जी ने कांग्रेस पार्टी में पद की प्राथमिकता उनके जीवन में कभी नहीं रहा। वे जमीनी सक्रिय कार्यकर्ता का काम संगठन के पदाधिकारी से अधिक महत्वपूर्ण समझते थे। वे हमेशा स्वदेशी खादी कुर्ता-पायजामा ही पहनते थे। पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता का सम्बन्ध् पार्टी सदस्यों और पदाधिकारी दोनों के साथ होता है। दोनां ही पक्ष सक्रिय कार्यकर्ता की बात सुनते व मानते हैं। इसी से आप समझ सकते हैं कि संगठन में सक्रिय कार्यकर्ता की क्या भूमिका होती है। कांग्रेस पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल की महत्वपूर्ण भूमिका के माध्यम से सन् 1986-1987 में प्रधन मन्त्रा राजीव गांधी जी को गेठी बुलाने में वे सपफल रहे। इसी से आप स्पष्ट समझ सकते हैं कि उनके पास कांग्रेस पार्टी का कोई पद न होने के बाद भी उनकी कांग्रेस संगठन में क्या महत्व था। उनकी ईमानदार-कर्तर्व्य निष्ठता के सिद्धान्त ही उनका मूल मन्त्र था।
समाज सेवक नैन सिंह बोनाल जी ने अपने जीवन यात्रा में सम्भाले कुछ मुख्य सामाजिक पद का विवरण- 1. सहायक गणक (सुपरवाईजर)-बौंन-दुग्तू साध्न सहकारी समिति। 2. अध्यक्ष नवयुवक संघ/मंगल दल-बौंन। 3 अध्यक्ष दारमा उत्थान समिति। 4. ग्राम प्रधान -बौंन। 5. सक्रिय सदस्य-कांग्रेस ब्लॉक कमेटी धारचूला। 6. उपाध्यक्ष कल्याण संस्था शाखा धारचूला। 7. सदस्य एकीकृत जनजाति विकास समिति नाचनी मुनस्यारी। 8. सदस्य खादी कमीशन सलाहकार समिति धारचूला। 9. संचालक जिला सहकारी बैंक पिथौरागढ़। 10. ब्लॉक कनिष्ठ प्रमुख क्षेत्रा समिति धारचूला। 11. सदस्य-कैलाशाश्रम स्वराज्य संस्था धारचूला। 12. सदस्य उ.प्र. सरकार द्वारा आयोजित भारत भ्रमण प्रोग्र्राम के सदस्य में सम्मिलित हुए उन्हें कई धर्मिक स्थानों एवं प्रतिष्ठानों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ था।
समाज सेवक बोनाल जी ने अपने जीवन के उनसठ बसन्त देखने के बाद अपने घर गोठी में स्वस्थ स्वास्थ्य में दिनांक 3.5.1998 की रात को लगभग आठ बजे अचानक हृदयगति रुक जाने से हम सभी को छोड़कर ईश्वर के पास चले गये। उनके द्वारा किये गये बहुत सारे सामाजिक कार्यों से हम हमेशा उन्हें याद करते हुए उनके ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ कार्य प्रणाली से प्रेरणा लेते रहेंगे। जिन्होंने अपना सारा जीवन समाज की भलाई के लिए चिन्तनशील रहते हुए समाज को समर्पित किया। इन्हीं कारणों से उन्हें रं लुंग्बा का महान सामाजिक चिन्तकों की श्रेणी में रखा जाता है। इसका मुख्य कारण उनके द्वारा किसी भी पक्ष-विपक्ष के बहकावे में आए बिना सापफ छवि ईमानदार कर्तव्य निष्ठता व्यक्तित्व से किया कार्य माना जाता है। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल ने समाज में किये गये सांस्कृतिक, राजनैतिक और सामाजिक उत्थान के कार्य को संज्ञान में लेकर रं कल्याण संस्थान ने अपने वार्षिक आम सभा (एजीम 2011) ग्राम-दाँतू (दारमा) में उन्हें रं गौरव सम्मान से सम्मानित किया।
समाज सेवक नैन सिंह बोनाल जी के परिवार का संक्षिप्त विवरण- वैसे तो निःस्वार्थ समाज सेवा के प्रति निष्ठावान समाज सेवक का परिवार पूरा समाज होता है। पफर भी ऐसे ध्नात्मक सोच वाले सामाजिक चिन्तक के निजी जीवन का थोड़ा जिक्र होना ही चाहिए। बोनाल जी ने अगस्त 1964 में गुंजी गाँव की आवती गुंज्याल जी से विवाह किया। धर्मपत्नी आवती जी से दो पुत्र (गगन सिंह, धीरेन्द्र सिंह ) और दो पुत्रियां (शकुन्तला, विशन्तला) हुई। समाज सेवक-श्र(ेय नैन सिंह बोनाल के दोनों पुत्रा भारत सरकार के अधीन सरकारी कार्यालयों में अपनी सेवा दे रहे हैं। उनके चारों बच्चे अपने-अपने दाम्पत्य जीवन के सुख भोग रहे हैं। वर्तमान समय में उनकी धर्मपत्नी आवती गुंज्याल बोनाल उम्र के अस्सीवे पड़ाव में अपनी सभी बच्चों के साथ खुशनुमा जीवन व्यतीत कर रहे हैं।







