झुमली आक्रमणकारियों का दारमा लुंग्बा पर प्रथम और अन्तिम आक्रमण

इतिहास-कथा
———————————————————————
बाबरे-बाबरे,
कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो खानदा छन
————————————————————————–
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त/प्रदेश) के व्याँस और चाौंदास दोनों घाटी में ‘हुमला झुमला’ प्रान्त के झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित-लूटपाट समय- अन्तराल (समय-समय) में होता रहता था।
इस घटनाक्रम के बारे में दारमा घाटी के जन भी परस्पर पारिवारिक सम्बन्ध् होने के नाते समय-समय पर सुनते रहते थे, क्योंकि दारमा रं जन का सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक सम्बन्ध् आदि समयकाल से ही व्याँस और चाौंदाँसियों से होता रहा है। ये उस समय की बात है जब दारमा घाटी के निवासी कन्चोती तथा व्याँसी लोग लोंलको नामक स्थान के आसपास से नीचले क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से आ-जा नहीं सकते थे। क्योंकि इसके नीचे का परिक्षेत्र अस्कोट राज्य के अधीन माना जाता था, जबकि उस समय दारमा व्याँसी और चाौंदासियों का क्षेत्र स्वतंत्र भोट देश का भोट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ कहलाया जाता था। भोंट प्रदेश ‘रं लंुग्बा’ का उस समय अपना मजबूत प्रशासनिक ढाँचा नहीं था। इस कारण पड़ोसी देश नेपाल के प्रान्तीय शासक इस क्षेत्र पर अपना जबरदस्ती परिसीमन समझता था और गाये-बगाये उनके कर्मचारी इस भोंट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ परिक्षेत्र में आकर जबरदस्ती कर वसूलते थे, मना करने पर आतंकित लूटपाट करते थे। व्याँस-चाौंदास दोनों घाटी के लोग बार-बार जबरदस्ती कर वूसूली-आतंकित लूटपाट से तंग आ चुके थे। इस कारण वसूली व लूटपाट से पार पाने के लिए दोनों घाटी के लोगों ने सामूहिक परस्पर समूह में झुमली मुकाबला कार्यक्रम कर झुमलियों का दमन योजना बनाते थे। फिर भी ये क्षेत्रा वर्तमान-नेपाल के नजदीक के नजदीक परिसीमन होने के कारण ये अत्याचारी झुमला आक्रमण कारियों की टोली जबरदस्ती कर वसूली करके और न मानने पर आतंकित लूटपाट कर तुरन्त बिना हमारे क्षेत्र काली नदी वार ठहरे, काली नदी पार कर वापास नेपाल क्षेत्र में लौट जाते थे।
उस समयकाल में जैसे-जैसे झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित लूटपाट क्षेत्रा बढ़ता जा रहा था। तब हम दारमावासियों ने सोचा एक दिन ये झुमली लोग हमारे लुंग्बा में भी जबरदस्ती कर वसूली और आतंक कर सकते हैं। ये सोच कर दारमावासियों ने समय रहते एक रणनीति बनाते हुए व्यास-चाौंदास झुमली दमन योजना के तर्ज पर दारमा वासियों ने झुमली से मुकाबले की योजना बनाई। रणनीति अनुसार दारमा झुमली संहारक योद्धाओं की टीम तैयार कर झुमलियों से मुकाबला करने के लिए स्थान का चयन किया गया। यह स्थान ‘बालिंग से गंबैनाती’ की ओर ‘गंबैनाती से बालिंग’ की ओर का लगभग मध्य स्थान ‘जैं गुरु सैं’ स्थल के नजदीक का स्थान चुना था, जो अत्यधिक संकरा और अत्यधिक खतरनाक चट्टानी मार्ग था, इस संकरे चट्टानी रास्ते का चयन करने का मुख्य लाभ यह था कि इस रास्ते के उपर 40-50 मी. की उफँचाई पर एक सुरंगनुमा गुफा है, जिसे हम सब रं जन गंबैनाती फु के नाम से जानते हैं। यह फु /गुफा आश्रय के लिए सुरक्षित गुफा है। इसी गुफा के नजदीक और संकरे चट्टाननुमा रास्ते के 20-25 मी. उपर से झुमलियों पर आक्रमण करना सबसे उचित और सुरक्षित रहेगा, यह समझते हुए हमारे धरोहित बुजुर्ग रणनीतिकारों ने इस स्थान को झुमलियों से मुकाबले के लिए चुना। कहा जाता है कि इस सुरंगनुमा गुफा (गंबैनाती फु) में सुरक्षित वातावरण में आराम से लगभग 5-6 ग्रामवासी रहने तक का स्थान था, ये गुफा सर्वप्रथम प्राचीन काल में तकरीबन ढाई से तीन किमी. दूर ग्राम बालिंग ब्यैंक्से बुग्याली नामक स्थान तक खुलता था। ‘दारमावासी वीर रक्षक योद्धाओं ने नदी से बड़े-बड़े गोल पत्थर लाकर गुफा में इकट्ठे किए।
एक दिन ऐसा समय आ ही गया, झुमली आक्रमणकारियों की टोलियों ने व्यास-चाौंदास के ग्राम-रिमझिम की चोटी को पार कर दारमा, दैर्रीयंग/हैर्री, लांगदारमा फकल नामक प्राचीन ग्राम स्थान से बोंगलिंग नदी पार कर बोंगलिंग-वर्थिंग होते हुए, दारमा के अन्य ग्रामों में प्रवेश करने वाले हैं। इसकी सूचना सुदूर दारमा में मिलते ही यहाँ के दारमावासियों ने ‘झुमली संहारक योद्धाओं की पूरी टीम सदस्यों’ ने झुमली मुकाबला चयन स्थान में अपने-अपने ढाल, तलवार, हथियार, गोलनुमा पत्थर और खाने-पीने का सामान, हमी (सत्तू के आटे से तैयार चर्पा/लड्डूनुमा खाद्य पदार्थ और अन्य खाद्य सामग्री एकत्रित कर सभी दारमा के नौजवान योद्धा एकत्रित होकर झुमलियों के मुकाबले के इन्तजार मंे एकत्रित हो गए। 4-5 दिन इन्तजार करने के बाद अगले दिन झुमलियों का काफिला बालिंग से गंबैनाती की ओर आते देखा गया। जैसे ही दारमावासियों के द्वारा चयनित गुफा के ठीक नीचे चट्टानी संकरे रास्ते झुमलियों की टोली 10-15 मीटर चट्टानी रास्ते के मध्य सीध्े-आगे गुजरने ही वाली थी, तुरन्त सभी नौजवानों ने झुमली संहारक योद्धाओं ने उन पर एकाएक लगातार देर तक पत्थरों के गोले बरसाये, अचानक हुए इस खतरनाक हमले से झुमली लोग घबरा गए, कुछ झुमली इस हमले में गम्भीर रूप से घायल हो गए, बांकी झुमलियों ने अपने रास्ते से पीछे हटना ही ठीक समझा और वे सभी पीछे हट गये। आगे बढ़ना पीछे लौटने से कहीं ज्यादा खतरनाक था क्योंकि आगे बढ़ने-पीछे हटने के लिए वही एकमात्रा रास्ता था, नीचे नदी उपर बिल्कुल खतरनाक चट्टान।
झुमली लोग जान बचाते हुए, कुछ दूर वापस जाकर उपर खतरनाक चट्टानी गुफा के नजदीक में एकत्रित हुए लोगों को देखा कि वे लोग एक हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हें। इस क्रियाकलाप को देखकर वे चकित रह गए और वे यह कहते वापस भागे ‘बाबरे-बाबरे कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो (पत्थर) लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो (पत्थर) खानदा छन’ (अरे ये कैसे लोग हैं कए हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हैं) जबकि वे योद्धाओं दूसरे हाथ से सत्तू/हमी और लड्डूनुमा चर्पा का गोलनुमा खाद्य पदार्थ खा रहे थे। दूसरे हाथ से पत्थर खाने की ऐसी खतरनाक क्रिया समझकर वे झुमली लोग भाग गए। फिर दोबार उन्होंने इस प्रकार का जबरदस्ती कर वसूली-आतंकित लूटपाट करने की स्वतंत्र भारत गणराज्य बनने तक कोई कोशिश नहीं की। उस समय झुमली आतंकित लुटेरे-आक्रमणकारियों के द्वारा किया गया यह झुमली आक्रमण 20वीं शताब्दी से पहले का और पिछले ‘प्राचीन काल में हुआ जैं श्री हुरबी पहलवान-झुमली मुकाबला’ के बाद का लुंग्बा में किया गया प्रथम और अन्तिम आतंकित लुटेरे झुमली आक्रमण का मुकाबला था।
ऐसा मैंने बड़े बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी और अमटीकर लेखों से पढ़ी सही कथनों के निष्कर्ष निकालते हुए यह संक्षिप्त विवरण दिया है।
यह 17वीं-18वीं शताब्दी के मध्य की घटना मानी जाती है बाद में कूर्मांचल (कुमाउ) को गोरखा शासन ने अपने अधीन कर लिया था तब भी प्राचीन भोंट प्रान्त- रं लुंग्बा स्वतंत्र था।
हमारे पूर्वज जनों का हम पर यह कर्ज हमेशा रहेगा जिन्होंने हमें सुरक्षित रखा। जय हो हमारे पूर्वज ध्रोहर रणनीतिकार, जय हो हमारे रक्षक वीर योद्धा (झुमली संहारक योद्धा))।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *