पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली प्राचीन समय की बात जब रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) के दारमा घाटी में धनधान्य से परिपूर्ण मालदार व्यापारी सुनपति भोट रं रहा करते थे। तब लगभग 75 प्रतिशत वर्तमान कुमाउँ में कत्यूरी वंश के राजाओं का शासन था। पर रं लुंग्बा (दारमा, व्याँस और चैदाँस घाटी) स्वतन्त्र भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था। उस समय भोट देश का अलग राजा शासन करता था। तब परगना दारमा के वासी भांट देश का भोट प्रान्त होने के बाद भी वे अपने-अपने ग्रामों के स्वतन्त्र स्वामी थे। उस समय दारमानी, दारमा, रंगपा और जोहारी लोग दारमा और जोहार घाटी आने जाने व पश्चिम तिब्बत प्रान्त ;मल्ला जोहार व्यापार मार्ग से पहलेद्ध। ये हिम दर्रा मार्ग निम्न थे- 1 पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग, 2. सीपू- बलाती हिम दर्रा मार्ग। पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग- दारमा-जोहार घाटी के व्यापारी और अन्य लोग पंचाचूली हिमगिरी शिखर के पंचा हिम दर्रा को पार कर दारमा जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह हिम दर्रा तहसील धरचूला, दारमा घाटी में है। यह दर्रा मार्ग छोटा और खतरनाक था। इस मार्ग का प्रयोग तल्ला और मध्य दारमा के 10-15 ग्राम वाले करते थे। यह पंचा-दाँतू हिम दर्रा साफ मौसम में ही पार किया जा सकता था, जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम दाँतू में प्रवेश किया करते थे, साथ ही दारमा घाटी के वासी रालम-पातों ग्राम क्षेत्रा में पहुंचते थे। कहावत- इस पंचा-दाँतू दर्रा मार्ग को तय करने में इतना कम समय लगता था कि मूल दाँतू ग्राम से जड़ी-बूटी, नमक और घीट से से तैयार मरच्या (नमकीन चाय जड़ी बूटी गरम चाय) पीते हुए, जोहार घाटी के रालम-पातौं क्षेत्र में पहुँचा जा सकता था। सीपू-बलाती हिम दर्रा मार्ग- तहसील मुनस्यारी और धारचूला, ग्राम सीपू, अटासी और ग्राम सीपू बलाती के क्षेत्र में पड़ने वाला इस हिमदर्रा को पार करते हुए दारमा-जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह दर्रा मार्ग पंचा दर्रा की अपेक्षा लम्बा और सुरक्षित था। इस मार्ग का प्रयोग मल्ला दारमा के 9-10 ग्राम वाले किया करते थे, यह सीपू-बलाती हिम दर्रा जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम बलाती, अटासी ‘जोहार घाटी’ में पहुंचते थे। कहावत- ऐसी मान्यता है कि इस हिम दर्रा की दारमा-जोहार नजदीक ग्रामों की दूरी तय करने में इतना समय लगता था कि सीपू गाँव में बनी रोटी कपड़े में तय की गयी, गरम रोटी जोहार घाटी के बलाती ग्राम क्षेत्रा तक गरम ही पहँुचती थी। ;जोहार-रालम घाटी और दारमा घाटी के व्यापारी इन दोनों ही पंचा-दाँतू और सीपू-बलाती दर्रा मार्ग का प्रयोग करके दारमा घाटी होते हुए, सीमान्त पश्चिम तिब्बत प्रान्त के निम्नलिखित क्षेत्र- मंगोल, शिल्दी थं, मिसल, चिन, ज्ञानिमा, दरचन, दयाकार, शिनचिलम और ठूकर मण्डियों में सामाग्रियों का व्यापारी विनियम करते थे। पुरंग, पाला किरमेक, डोंग दर्चिन, जोमजिंन, बिल्थी थं तकलाकोट ठुकर (मानसरोवर) गढ़तोक में अधिकतर व्याँसी लोग व्यापारी विनिमय कर व्यापार करते थे और नीति-माना घाटी वासी शिवचिलम, चपराउफ मण्डियों में व्यापारिक विनिमय के लिए जाते थे। इन्हीं मण्डियों के आसपास लला लसुली देवी के धर्म शालाएं विद्यमान हैं। उन धर्मशालाओं के अवशेष/ साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। दारमा घाटी के तरह ही जोहार घार्टी के व्यापारी भी इन्हीं तिब्बती मण्डियों का प्रयोग व्यापारिक विनिमय के लिये करते थे। इन मण्डियों तक पहँुचने के लिए उटाधूरा, जयन्तीधूरा, कुंगरी-बिंगरी धूरा तीनों गिरी द्वारों को पार करना पड़ता था। अंग्रेज समय काल से भारत-तिब्बत अन्तर्राष्ट्रीय सीमान्त व्यापारियों का विनिमय व्यापार केन्द्र दारमा रं लुंग्बा (दारमा प्राचीन भोट प्रान्त क्षेत्र) मंगोल शिल्दी थं, विदांग नामक ग्राम ;वर्तमान ग्राम खिमलिंगद्ध हो गया, और यह विनिमय व्यापार लगभग 1962 तक चलता रहा। वर्तमान समय इस दारमा भारत-पश्चिम तिब्बत सीमान्त क्षेत्रा से कोई व्यापार नहीं होता है। विनिमय (आदान-प्रदान) पश्चिम तिब्बत सामग्री- निम्न सामाग्री जैसे स्वर्ण चुरे, सुहागा, तिब्बती बकरियों का उन (पसमीन उन), नमक, बहुमूल्य रत्न, लाचा (लाख), जंगली पशुओं का चोखाल (समूर), पत्थर रत्न और अन्य सामग्री होते थे। साथ ही बकरियों, घोड़े, झुप्पू, याक का भी खरीददारी भोट (रं) जन करते थे। यह व्यापार 16500 से 18500 पिफट उफँचाई पर प्रवास के समय होता था। इन सीमान्त वासियों का मुख्य पेशा तिब्बती व्यापार तथा उफनी शिल्प उद्योग में एक दूसरे के पूरक थे। विनिमय भारतीय (भोट/रं) सामग्री- निम्न सामग्री जैसे- गुड़, मिश्री, चीनी, चाय कपड़ा, तम्बाकू सूती वस्त्रा, सामान्य दवाईयां, ड्राई फूड, लपफो और दैनिक प्रयोग की अन्य सामग्रियों की खरीददारी पश्चिम तिब्बत व्यापारीजन करते थे। सुनपति रं भोट समयकाल से ही जोहार-दारमा घाटी आना-जाना, व्यापार करना व अच्छे व्यवहारिक सामाजिक सम्बन्ध् के कारण शादी-विवाह का भी चलन था। पौराणिक किवदंतियाँ (जनश्रुतियाँ)- दारमा-जोहार-रालम घाटी का पारिवारिक सम्बन्ध्- एक समय की बात है, दारमा घाटी के बेटे का ब्याह जोहार रं, रंगपा लड़की के साथ हुआ, ब्याह के बाद कुछ दिन के लिये अपने मायके जोहार-रालम घाटी रहने जा थी। मायका जोहार घाटी जाते समय वे न्यौला पंचाचूली हिमगिरी पंचा-दाँतू दर्रा को पार करने वाली थी, तब वे उच्च हिम मार्ग पार करने से कुछ पहले कुछ देर आराम करते हुए अपने दोनों तरफ ससुराल व मायका को निहार रही थी, और ससुराल से साथ लायी खाद्य सामग्री (स्यली/फाफर के आटे से तैयार गोलनुमा खाद्य) गंदु, चरपा और पतली/कट्टू आटा से तैयार गुठे, श्यली/ फापफर के आटे से तैयार गंदु (गोलनुमा), चरपा खाद्य पदार्थ पैक वाला निंगाल का टिफिन बाॅक्स ढलान की ओर गिरता ही चला गया। उस महिला ने तुरन्त उस जगह को दोष देते हुए, कोई न खा पाएँ, खा यानु बं (कितनी गन्दी जगह) अपशब्द निकल आया, जिसके कारण उसी वक्त मौसम खराब होते हुए हिमस्खलन व भूस्खलन होने लगा, वह महिला जोड़ी इस हिमस्खलन की चपेट में आकर वहीं मर गयी, साथ ही न्यौला पंचाचूली के निचला भूभाग ‘न्योल्पा बुग्याल थं’ के आसपास रहने वाले मूल दाँतू ग्राम के अधिकतर ग्रामवासी उस हिमस्खलन मं दबकर मर गए, कुछ बचे हुए ग्रामवासी वर्तमान स्थित ग्राम दाँतू में आकर बस गए। ये ग्रामवासी ही यह ग्राम दाँतू के मूल दताल निवासी माने जाते हैं। उसी समय इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग पूर्ण रूप से खण्डित हो गया। जिस कारण इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग से दोनों ‘दारमा-जोहार-रालम घाटी’ का सम्पर्क पूर्ण रूप से टूट गया, तब से आज तक इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग का पता नहीं चल सका। इसी समय में जोहार- दारमा घाटी को मिलाने वाली दूसरी अटासी, बलाती, सीपू हिम दर्रा (बलाती-सीपू हिम दर्रा) के टूटने से यह मार्ग भी बन्द हो गया था। इसके पश्चात जोहार घाटी का व्यापार मल्ला जोहार के रास्ते पश्चिम तिब्बत प्रान्त से होने लगा। पर वर्तमान समय में इस मार्ग का प्रयोग ट्रेकर्स जोहार से दारमा, दारमा से जोहार घाटी ट्रेकिंग किया करते हैं। यह समय काल मीठे, मृदुभाषी, ईमानदार और कर्मठ लोगों का सत्यवादी युक्त समय था।
इतिहास-कथा ——————————————————————— बाबरे-बाबरे, कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो खानदा छन ————————————————————————– नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त/प्रदेश) के व्याँस और चाौंदास दोनों घाटी में ‘हुमला झुमला’ प्रान्त के झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित-लूटपाट समय- अन्तराल (समय-समय) में होता रहता था। इस घटनाक्रम के बारे में दारमा घाटी के जन भी परस्पर पारिवारिक सम्बन्ध् होने के नाते समय-समय पर सुनते रहते थे, क्योंकि दारमा रं जन का सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक सम्बन्ध् आदि समयकाल से ही व्याँस और चाौंदाँसियों से होता रहा है। ये उस समय की बात है जब दारमा घाटी के निवासी कन्चोती तथा व्याँसी लोग लोंलको नामक स्थान के आसपास से नीचले क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से आ-जा नहीं सकते थे। क्योंकि इसके नीचे का परिक्षेत्र अस्कोट राज्य के अधीन माना जाता था, जबकि उस समय दारमा व्याँसी और चाौंदासियों का क्षेत्र स्वतंत्र भोट देश का भोट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ कहलाया जाता था। भोंट प्रदेश ‘रं लंुग्बा’ का उस समय अपना मजबूत प्रशासनिक ढाँचा नहीं था। इस कारण पड़ोसी देश नेपाल के प्रान्तीय शासक इस क्षेत्र पर अपना जबरदस्ती परिसीमन समझता था और गाये-बगाये उनके कर्मचारी इस भोंट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ परिक्षेत्र में आकर जबरदस्ती कर वसूलते थे, मना करने पर आतंकित लूटपाट करते थे। व्याँस-चाौंदास दोनों घाटी के लोग बार-बार जबरदस्ती कर वूसूली-आतंकित लूटपाट से तंग आ चुके थे। इस कारण वसूली व लूटपाट से पार पाने के लिए दोनों घाटी के लोगों ने सामूहिक परस्पर समूह में झुमली मुकाबला कार्यक्रम कर झुमलियों का दमन योजना बनाते थे। फिर भी ये क्षेत्रा वर्तमान-नेपाल के नजदीक के नजदीक परिसीमन होने के कारण ये अत्याचारी झुमला आक्रमण कारियों की टोली जबरदस्ती कर वसूली करके और न मानने पर आतंकित लूटपाट कर तुरन्त बिना हमारे क्षेत्र काली नदी वार ठहरे, काली नदी पार कर वापास नेपाल क्षेत्र में लौट जाते थे। उस समयकाल में जैसे-जैसे झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित लूटपाट क्षेत्रा बढ़ता जा रहा था। तब हम दारमावासियों ने सोचा एक दिन ये झुमली लोग हमारे लुंग्बा में भी जबरदस्ती कर वसूली और आतंक कर सकते हैं। ये सोच कर दारमावासियों ने समय रहते एक रणनीति बनाते हुए व्यास-चाौंदास झुमली दमन योजना के तर्ज पर दारमा वासियों ने झुमली से मुकाबले की योजना बनाई। रणनीति अनुसार दारमा झुमली संहारक योद्धाओं की टीम तैयार कर झुमलियों से मुकाबला करने के लिए स्थान का चयन किया गया। यह स्थान ‘बालिंग से गंबैनाती’ की ओर ‘गंबैनाती से बालिंग’ की ओर का लगभग मध्य स्थान ‘जैं गुरु सैं’ स्थल के नजदीक का स्थान चुना था, जो अत्यधिक संकरा और अत्यधिक खतरनाक चट्टानी मार्ग था, इस संकरे चट्टानी रास्ते का चयन करने का मुख्य लाभ यह था कि इस रास्ते के उपर 40-50 मी. की उफँचाई पर एक सुरंगनुमा गुफा है, जिसे हम सब रं जन गंबैनाती फु के नाम से जानते हैं। यह फु /गुफा आश्रय के लिए सुरक्षित गुफा है। इसी गुफा के नजदीक और संकरे चट्टाननुमा रास्ते के 20-25 मी. उपर से झुमलियों पर आक्रमण करना सबसे उचित और सुरक्षित रहेगा, यह समझते हुए हमारे धरोहित बुजुर्ग रणनीतिकारों ने इस स्थान को झुमलियों से मुकाबले के लिए चुना। कहा जाता है कि इस सुरंगनुमा गुफा (गंबैनाती फु) में सुरक्षित वातावरण में आराम से लगभग 5-6 ग्रामवासी रहने तक का स्थान था, ये गुफा सर्वप्रथम प्राचीन काल में तकरीबन ढाई से तीन किमी. दूर ग्राम बालिंग ब्यैंक्से बुग्याली नामक स्थान तक खुलता था। ‘दारमावासी वीर रक्षक योद्धाओं ने नदी से बड़े-बड़े गोल पत्थर लाकर गुफा में इकट्ठे किए। एक दिन ऐसा समय आ ही गया, झुमली आक्रमणकारियों की टोलियों ने व्यास-चाौंदास के ग्राम-रिमझिम की चोटी को पार कर दारमा, दैर्रीयंग/हैर्री, लांगदारमा फकल नामक प्राचीन ग्राम स्थान से बोंगलिंग नदी पार कर बोंगलिंग-वर्थिंग होते हुए, दारमा के अन्य ग्रामों में प्रवेश करने वाले हैं। इसकी सूचना सुदूर दारमा में मिलते ही यहाँ के दारमावासियों ने ‘झुमली संहारक योद्धाओं की पूरी टीम सदस्यों’ ने झुमली मुकाबला चयन स्थान में अपने-अपने ढाल, तलवार, हथियार, गोलनुमा पत्थर और खाने-पीने का सामान, हमी (सत्तू के आटे से तैयार चर्पा/लड्डूनुमा खाद्य पदार्थ और अन्य खाद्य सामग्री एकत्रित कर सभी दारमा के नौजवान योद्धा एकत्रित होकर झुमलियों के मुकाबले के इन्तजार मंे एकत्रित हो गए। 4-5 दिन इन्तजार करने के बाद अगले दिन झुमलियों का काफिला बालिंग से गंबैनाती की ओर आते देखा गया। जैसे ही दारमावासियों के द्वारा चयनित गुफा के ठीक नीचे चट्टानी संकरे रास्ते झुमलियों की टोली 10-15 मीटर चट्टानी रास्ते के मध्य सीध्े-आगे गुजरने ही वाली थी, तुरन्त सभी नौजवानों ने झुमली संहारक योद्धाओं ने उन पर एकाएक लगातार देर तक पत्थरों के गोले बरसाये, अचानक हुए इस खतरनाक हमले से झुमली लोग घबरा गए, कुछ झुमली इस हमले में गम्भीर रूप से घायल हो गए, बांकी झुमलियों ने अपने रास्ते से पीछे हटना ही ठीक समझा और वे सभी पीछे हट गये। आगे बढ़ना पीछे लौटने से कहीं ज्यादा खतरनाक था क्योंकि आगे बढ़ने-पीछे हटने के लिए वही एकमात्रा रास्ता था, नीचे नदी उपर बिल्कुल खतरनाक चट्टान। झुमली लोग जान बचाते हुए, कुछ दूर वापस जाकर उपर खतरनाक चट्टानी गुफा के नजदीक में एकत्रित हुए लोगों को देखा कि वे लोग एक हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हें। इस क्रियाकलाप को देखकर वे चकित रह गए और वे यह कहते वापस भागे ‘बाबरे-बाबरे कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो (पत्थर) लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो (पत्थर) खानदा छन’ (अरे ये कैसे लोग हैं कए हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हैं) जबकि वे योद्धाओं दूसरे हाथ से सत्तू/हमी और लड्डूनुमा चर्पा का गोलनुमा खाद्य पदार्थ खा रहे थे। दूसरे हाथ से पत्थर खाने की ऐसी खतरनाक क्रिया समझकर वे झुमली लोग भाग गए। फिर दोबार उन्होंने इस प्रकार का जबरदस्ती कर वसूली-आतंकित लूटपाट करने की स्वतंत्र भारत गणराज्य बनने तक कोई कोशिश नहीं की। उस समय झुमली आतंकित लुटेरे-आक्रमणकारियों के द्वारा किया गया यह झुमली आक्रमण 20वीं शताब्दी से पहले का और पिछले ‘प्राचीन काल में हुआ जैं श्री हुरबी पहलवान-झुमली मुकाबला’ के बाद का लुंग्बा में किया गया प्रथम और अन्तिम आतंकित लुटेरे झुमली आक्रमण का मुकाबला था। ऐसा मैंने बड़े बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी और अमटीकर लेखों से पढ़ी सही कथनों के निष्कर्ष निकालते हुए यह संक्षिप्त विवरण दिया है। यह 17वीं-18वीं शताब्दी के मध्य की घटना मानी जाती है बाद में कूर्मांचल (कुमाउ) को गोरखा शासन ने अपने अधीन कर लिया था तब भी प्राचीन भोंट प्रान्त- रं लुंग्बा स्वतंत्र था। हमारे पूर्वज जनों का हम पर यह कर्ज हमेशा रहेगा जिन्होंने हमें सुरक्षित रखा। जय हो हमारे पूर्वज ध्रोहर रणनीतिकार, जय हो हमारे रक्षक वीर योद्धा (झुमली संहारक योद्धा))।