जल विद्युत परियोजना को लेकर सीमावासी मुखर

मुनस्यारी।
चीन सीमा पर जिले की पहली प्रस्तावित बहुप्रतिक्षित जल विद्युत परियोजना को लेकर सीमावासी मुखर हो गए है. इसी के चलते निगम की 120 मेघावाट की रुपसियाबगड़ – सरकारी भेल जल विद्युत परियोजना को वित्तीय स्कीकृति दिए जाने की मांग तेज हो गई है. जिपं सदस्य जगत मर्तोलिया ने आज प्रदेश के मुख्यमंत्री को इस आशय का पत्र भेजकर इस मांग को हवा दे दी है. कहा कि इस वित्तीय वर्ष में सीएम नहीं माने तो चीन सीमा क्षेत्र के लोग आंदोलन करेंगे.
उत्तराखंड जल विद्युत निगम ने इस चीन सीमा पर बनने वाले बहुप्रतिक्षित परियोजना का डीपीआर तैयार कर शासन को भेज दिया है. पिथौरागढ़ जिला चीन सीमा से लगा हुआ है. जिले के व्यास, चौदास, रालम व जोहार क्षेत्र चीन सीमा से लगा हुआ है. चीन सीमा के जोहार क्षेत्र से लगे इस क्षेत्र में प्रस्तावित यह परियोजना चीन सीमा पर भारत की पहली विद्युत परियोजना होगी.
जिपं सदस्य जगत मर्तोलिया ने कहा कि इस परियोजना के बनने के बाद चीन सीमा से लगे लास्पा, रिलकोट, मर्तोली, ल्वां,पांछू, गनघर, मापा, मिलम, बिलजू, बुर्फू, टोला, खिलांच,रालम सहित सेना व अर्द्ध सैनिक बलो की अंतिम चौकियों को भी बिजली मिलने का रास्ता सांफ हो जाएगा. इससे बेरोजगारी कम होगी तथा चीन सीमा क्षेत्र से पलायन भी कम होगा.
मर्तोलिया ने कहा कि चीन सीमा क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भी इस परियोजना का निर्माण किया जाना बेहद जरूरी है. कहा कि राज्य सरकार को इस परियोजना के संचालन से राजस्व मिलेगा.
जिपं सदस्य मर्तोलिया ने कहा हम क्षेत्रवासी इस वित्तीय वर्ष सरकार के फैसले का इंतजार करेंगे, उसके बाद चीन सीमा क्षेत्र के लोग आंदोलन कर सरकारो पर दबाव बनायेंगे.

कठिन दौर के लोग- भवानी देवी पंचपाल

बा बोक बोकबेर जांछि
डाॅ.पंकज उप्रेती
कठिन दौर हमें बहुत कुछ सिखा जाता है। वर्तमान की आरामतलब पीढ़ी को यदि कठिन दौर के किस्से सुनाये जाएं तो वह आश्चर्य करती हैं लेकिन उन्हें यह जरूर बताये जाने चाहिये ताकि वह अपनी जड़ों से जुड़े रहेें। और जान सकें कि जितना भी वह आज बन पाये हैं इसके पीछे संघर्षों की लम्बी गाथा है। कठिन दौर सबका होता है, हर युग में होता है लेकिन किसी की परीक्षा ज्यादा ही होती है। कई दुश्वारियों के साथ कुछ लोग रास्ता बना लेते हैं और कुछ हार मानकर टूट जाते हैं। हमारे सीमान्त क्षेत्रा में तो यह स्थिति और भी विकट रही है। सड़क, बिजली, अस्पताल, स्कूल, संचार से दूर रहकर भी हौंसले के साथ रहना पहाड़ की आदत रही है परन्तु यदि इसमें भी आपदा-विपदा हमें घेर ले तो परीक्षा कई गुना हो जाती है। इसी प्रकार की तमाम परेशानियों में घिरकर आगे बढ़ी हैं- भवानी देवी पंचपाल। मुनस्यारी के तल्लाघोरपट्टा से अपने परिवार के साथ यह ध्रमघर की होकर रह गई। 82 वर्षीय भवानी देवी अतीत के उस दौर को याद कर फफकते हुए रो पड़ती हैं। पति के निधन के बाद जिन परेशानियों से वह घिरी उससे उबरने का साहस उन्हें हिमालय ने दिया। वह हिमालय जो दृढ़ रहता है, अटल रहता है, पिघल कर भी जीवन देता है।
भवानी देवी कहती हैं- ‘‘बा बोक बोकबेर जांछि।’’ कनोल ;नाचनी के पास निवासी पिता केशर सिंह धर्मशक्तू व माता कुशा धर्मशक्तू के घर में जन्मी भवानी देवी का सात वर्ष की आयु में तल्ला घोरपट्टा निवासी रामसिंह पंचपाल के साथ विवाह हो गया था। तब छुटपन में ही विवाह का रिवाज था। इनके ससुर रतन सिंह छुटपुट कारोबार करते थे। परिवार के सदस्य अपने जानवरों सहित जोहार यात्रा पर जाता था और परिवार की गुजर-बसर चल रही थी। घोड़ा, भेड़-बकरी, गाय-बैल सहित परिवार एक छोर से दूसरे छोर परम्परागत माइग्रेशन क्रम से अपने में जुटा था। रामसिंह पत्थर तक तोड़कर मजदूरी करने में पीछे नहीं थे। कठोर लेकिन प्रकृति के करीब की इस दिनचर्या में भी परिवार खुश था लेकिन एक दिन अचानक राम सिंह का निधन हो गया। इस समय परिवार में चार छोटे-छोटे बच्चे अपनी माँ भवानी के साथ थे। इसमें बसन्ती पांगती, प्रेमा बृजवाल, जगत सिंह पंचपाल ;बैक से सेवानिवृत्त, डी.एस. पंचपाल ;वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी भा.कृषि अनुसंधान केन्द्र अल्मोड़ा हैं। वर्षों के संघर्ष के बाद परिवार ने समाज में अपनी जगह अपने आप से बनाई।
भवानी देवी बताती हैं कि पति रामसिंह जी के निधन के समय सबसे छोटो पुत्र देबू; देवसिंह चार साल का था। परिवार को नानी गोविन्दी पांगती ने पाला। मुनस्यारी तल्ला घोरपट्टा छोड़कर परिवार धरमघर आ गया। सबलोग मिलकर उन के कारोबार, दन-चुटके बनाने से लेकर कृषि कर्म में जुट गये। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी इधर-उधर कई जगह हुई लेकिन साहस के साथ उन्होंने पढ़ाई भी की। बाद के दिनों मंे बहन बसन्ती अपने भाई जगह-देवेन्द्र की संरक्षक के रूप में सक्रिय हो गई और पठन-पाठन में यह आगे बढ़ गये।
भवानी देवी पंचपाल आज अपने भरेपूरे परिवार के साथ है लेकिन उन घटनाओं का स्मरण करती है जब कठिन दौर में उन्हें किसी ने संरक्षण दिया। साथ ही उन घटनाओं को भी नहीं भूली है जिन लोगों ने उन्हें चुनौती दी और दूरी बना ली। बचपन के श्रम और जीवन की सच्चाई से दो-चार हुए डी.एस. पंचपाल कहते हैं कि स्कूल जाने से पहले वह धान कूटते थे।
सचमुच संघर्ष की कहानी आनन्ददायी होती है, जो हमें अपनों से जोड़े रखती है। जीवन-जगह का सत्य पहचाने में मदद करती है।

समर्पित गुरुजनों से संवारा जीवन जो हमेशा याद रहेंगे

चन्दन सिंह रावत बातचीज: तेजम का बचपन
पि.हि. प्रतिनिधि
हल्द्वानी। आज स्कूल-कालेजों में नवाचार को लेकर बहुत हल्ला किया जा रहा है जबकि पहले से गुरुजन पढ़ाने के साथ साथ समाज संवारने को अपनी जिम्मेदारी समझते थे और उनका समर्पण विद्यार्थियों का जीवन संवारने वाला था।
तेजम के पुराने दिनों को याद करते हुए चन्दन सिंह रावत बताते हैं कि विशम्भरदत्त जोशी जी प्रा.पाठशाला में गुरु जी थे, जिन्होंने खेल-खेल में बच्चों का जीवन संवारा। वह पहले धापा में भी रहे। धापा से तेजम आने के बाद ग्रामीण परिस्थितियों में वहां के अनुरूप बच्चों को सिखाते थे। बताते चलें कि तेजम के प्रहलाद सिंह जी के पुत्रों में चन्दन सिंह, डाॅ.प्रद्युमन सिंह, लक्ष्मण सिंह;लखनउ, ईश्वर सिंह ;देहरादून हैं। सारी स्थितियों को जीतने के बाद भी रावतों का यह परिवार अपने ग्राम, अपने गुरुजनों का स्मरण करता है और जुड़ा हुआ है। यह प्रेरणादायक है, यही नवाचार है।
चन्दन सिंह जी बतात हैं कि विशनदत्त मास्साब 1960 से 64 तक तेजम में रहे, जो इससे पहले मुनस्यारी के धापा में थे। स्कूल में पढ़ाई के लिये पूरा समय देने के अलावा प्रातःकाल प्रार्थना के समय ही उत्कृष्ट कार्यों के लिये बच्चों को प्रोत्साहित किया जाता था ताकि साथी बच्चे भी उससे उत्साहित हो। उदाहरण के लिये- मास्साब कहते आज फलां बालक बहुत साफ-सुथरा बनकर आया है। उसे प्रार्थना में आगे बुलाया जाता था। उसे देखकर अन्य साथी भी तैयारी करते। ग्राम को स्वच्छ रखना, जानवरों को किसी के भी खेतों में जाने से रोकने, एक-दूसरे की मदद करने जैसे विचार गुरुजन मन के भीतर कर देते थे जो आज भी हैं।

संघर्षमय रहा जिनका पूरा जीवन

पत्रकारिता के मिशन को जिस लगन से स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने शुरू किया था, उसे बनाये रखने वाली कमला उप्रेती की 15 सितम्बर 2019 को प्रथम पुण्यतिथि है।
जिन्दगी को आन्दोलन बना चुके आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते हुए आपने किसी से कोई शिकायत नहीं की। जिन्दगी के सफर में रोग-शोक से लड़कर भी बच्चों को हौंसला दिया। घर-परिवार और गाँव के सारे लोगों को आपका ममतामयी स्पर्श हमेशा बांधे रहा। अपने सीमित साधनों में घर-गृहस्थी चलाते हुए सामाजिक आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका आपने निभाई। बहुत विपरीत स्थितियों में भी आपके बोल संस्कारों से भरे थे। ‘जशौदा मैया तेर कन्हैया बड़ो झगड़ी, झन लगाया गोरु-ग्व्ाला हमन दगड़ी’ जैसे भजनों से लेकर होली के आशीष तक के गीत गाने वाली इस माँ ने जीवन की सच्चाई को हमेशा सामने रखा और गुनगुनाया- ‘संग्राम जिन्दगी है लड़ना इसे पड़ेगा….।’
66 वर्ष की आयु में अन्तिम सांस तक अपने मिशन के लिये जिस साहस से आप लड़ीं वह चिंगारी बुझ नहीं सकती है। पिघलता हिमालय का यह अंक आपको समर्पित।

मर्तोली में भी है नैनीताल

गोपालसिंह मर्तोलिया

पि.हि.प्रतिनिधि
बहुत कठिन दौर था वह जब दुनिया से कटे हुए क्षेत्र के लोग अपनी दिनचर्या में हसरतें लिये हुए आगे बढ़ रहे थे। लेकिन उन हसरतों ने ही हौंसला दिया और लोग कामयाब हुए। मल्ला जोहार के मर्तोली में ज्वाला सिंह मर्तोलिया और श्रीमती मोतिमा देवी के घर जन्म हुआ था- गोपालसिंह मर्तोलिया का। 73 वर्षीय गोपाल सिंह जी बताते हैं कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर बहुत जोश होता था बच्चों में। मर्तोली गाँव की गली-गली में बच्चे अपने हाथ का बनाया तिरंगा लेकर गाते थे- ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’। जोहार में जन्मे गोपालसिंह उन पुराने दिनों के गवाह हैं और बताते हैं कि मुनस्यारी से जोहार में माइग्रेशन में जाना-आना होता था। शिक्षक गुलाबराम जी उनके गोठ में ही रहा करते थे। प्रत्येक बच्चे की ड्यूटी थी वह बारी-बारी से राशन उनके घर पहँुचाते थे। एक बार शायद सन् 1955 में बरफ की लहर में उनका स्कूल टूट गया। प्रकृति के करीब रहने वालों ने हौंसला बनाये रखा और दूसरा स्कूल भवन बनाया गया। हमारे परिवार के पास पधानचारी थी। पिता ज्वाला सिंह जी प्रधान थे। मर्तोली में नैनीताल नामक स्थान पर हमारा मकान है। यह स्थान नैनीताल से मिलता-जुलता है। सामने दृश्य और भी मनमोहक। बुर्फू में मल्ला जोहार का पटवारी रहता था और प्रधान से टैक्स वसूली के लिये पटवारी का आना होता था। तब एक टैक्स पटवारी को देना होता था और दूसरा बागेश्वर उत्तरायणी मेले में देते थे। नन्दाष्टमी तक सारे परिवार जोहार में रहने के बाद मुनस्यारी आते थे। तब नन्दाष्टमी मेले के लिये प्रत्येक परिवार से एक बकरा बलि के लिये जाता था। वेदान्ताचार्य पुण्डरीकाक्ष महाराज के कथा प्रवचन का प्रभाव ही था कि यहाँ बलि प्रथा बन्द हो गई। अब तो पचास साल से भी ज्यादा समय हो चुका है जब बलि प्रथा बन्द है।
गोपाल सिंह बताते हैं कि आज पलायन का रोना-पीटना मचा है लेकिन पुराने कठिन समय में सारे गाँव आबाद थे। बोझा ढोकर यात्राओं पर निकले परिवारों ने ठाना था कि वह कुछ करेंगे। तब सुरिंग से मर्तोली जाने तक चार पड़ाव होते थे। खेतीबाड़ी के लिये हर साल ‘इज्जर’ बंजर भूमि खोदने का काम होता था। बंजर खोद-खोद कर आलू, सरसों, फाॅफर/उगल की खूब पैदावार होती थी। एक बार मर्तोली में घट खराब हो गया था, तब आटा पिसवाने के लिये बुर्फू तक जाते थे।
अपने बचपन की याद में भावुक होते हुए श्री मर्तोलिया कहते हैं- जोहार के बड़े ग्रामों में मर्तोली है। गाँव के बीच में कच्हरी लगती थी और सयानों के बैठने की जगह थी। नन्दाष्टमी से पहले नैनीताली पुजाई होती थी, जिसमें प्रधान पिता जी को दो बकरों का सिर मिलता था, फिर सादी पुजाई होती थी जिसमें तीन बकरों का सिर मिलता था। इसके बाद नन्दाष्टमी की पूजा होती थी। मन्दिर के पास मैदान में लगातार खेल होते थे। किसी भी विशेष सूचना के लिये छत में चढ़कर एक व्यक्ति उँफची आवाज में बोलता था, जिसे आजकल एनाउंसर के रूप में समझा जा सकता था। मेले के अवसर पर ढुस्का-चांचरी के लिये सारे ग्रामीण जुटते थे। हिलमधर में हम सभी अपनी ध्यैनियों-परिचितों को देखने जाते थे कि कौन-कौन मर्तोली आ रहे हैं। जोहार से माइग्रेसन में वापस आने से पहले सारा कामकाज समेटा जाता था। खेतों में फसल कटाई के बाद नींममुचाई याने जानवरों को छोड़ दिया जाता था ताकि रहा-बचा वह भी चर लें। उस समय के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में स्व.गोपाल सिंह और हयात सिंह ‘बनवारी’ थे। गोपाल सिंह जी यह भी बताते हैं कि पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया जब घर आते थे, उन्होंने बच्चों को गीत सिखाया था। पठन-पाठन, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम सभी में सहभागिता करते बच्चे अपनी परम्परागत पाठशाला से भी जुड़े थे। नई पीढ़ी में बहुत बदलाव आ चुका है लेकिन उन्हें अपनी जड़ों में जुड़े रहना चाहिये। अभी नन्दा माई के मन्दिर को भव्य रूप देने की तैयारी की जा रही है।