होली हमारा लोकसंगीत है, इसकी ठसक-मसक बनी रहे: चन्द्रशेखर पाण्डे

बातचीज

पि.हि. प्रतिनिधि
पहाड़ की होली में अल्मोड़ा का उल्लेख पहले किया जाता है। नागर होली के लिये अल्मोड़ा की महफिलों को बहुत मानते हैं। होली बैठकों के रंग-ढंग अल्मोड़ा के अलावा अन्य स्थानों पर भी होते हैं लेकिन अल्मोड़ा सांस्कृतिक नगरी की मान्यता के साथ-साथ रसिक जनों की खासी सहभागिता इसे आगे बनाये हुए है। यहाँ कई नामी कलाकार हुए जिन्होंने बैठकी होली की महफिलें सजाई और इसके संरक्षण के लिये भी कई प्रतिष्ठित लोग हुए। होली गायकी के चले आ रहे ढांच पर गायन के अलावा बात-बहस भी अल्मोड़ा में होती रही है क्योंकि यह बुद्धिजीवियों का शहर जो है। होली को लोकसंगीत मानने और इसकी चाल को बनाये रखते हुए महफिल सजाने में माहिर 76 वर्षीय चन्द्रशेखर पाण्डे कहते हैं- ‘होली हमारा लोक संगीत है, इसकी ठसक-मसक बनी रहे।’
होली से पहले पाण्डे जी के परिवार की ही बात कर लेते हैं। पहले कभी पवेत, चम्पावत के रहने वाले पाण्डे परिवार झाकरसैम आये थे। इनकी मान्यता तांत्रिक के रूप में रही है। इन्हीं परिवारों में से रामदत्त पाण्डे का परिवार अल्मोड़ा में रहा। रामदत्त जी के असमय निधन से इनके पुत्र मनोरथ ने अल्मोड़ा के जोगालाल साह के वहाँ हलवाई का कार्य किया। बाद में मनोरथ पाण्डे जी ने अपना कारोबार किया और वह मिष्ठान के कार्य में खासी पहचान रखते थे। रामदत्त जी के दो पुत्र बच्चीराम और मनोरथ और एक पुत्री देवकी देवी हुई। मनोरथ पाण्डे जी के पुत्रों में चन्द्रशेखर पाण्डे, पूरन चन्द्र पाण्डे, गोपालदत्त, विनोद पाण्डे और कमल पाण्डे हैं। परिवार की शाखा काफी विस्तृत हो चुकी है लेकिन आज भी मनोरथ पाण्डे की पहचान से इन्हें हर कोई पचहान लेता है। परिवार के सदस्यों में अपनी कला संस्कृति के प्रति बेहद लगाव है। इसी परिवार के वरिष्ठ सदस्य चन्द्रशेखर वस्त्र व्यापारी होने के साथ सामाजिक गतिविधियों में रमे हुए हैं और होली के लिये इनकी दीवानगी देखने लायक है। वर्षभर होली सुनने वालों में से यह भी एक कलाकार हैं।
श्री पाण्डे जी अपने अतीत को याद करते हुए कहते हैं- ‘मुझे याद नहीं है होली से कब जुड़ गया। पिता जी सन्त प्रवृत्ति के और संगीत के शौकीन थे। घर मेें साधू-सन्तों का आना होता, इसी से मेरा रुझान भी इस ओर हुआ। 9-10 साल से मैंने अल्मोड़ा की होली बैठकों और रामलीला में जाना आरम्भ कर दिया था।’ वह कहते हैं- ‘होली सीखने से नहीं श्रवण से आती है। बार-बार महफिलों में सुनने का परिणाम ही है कि वह कुछ गा पाते हैं। शिवलाल वर्मा उर्फ अच्छन, चन्द्र सिंह नयाल, भवान सिंह नयाल, प्रेम लाल साह इसके बाद जवाहर लाल साह, ताराप्रसाद पाण्डेय ने मुझे प्रभावित किया। उन महफिलों की यादें मेरे मस्तिष्क में भली भांति अंकित हैं।’
लोक कलाकार संघ के सदस्य के रूप में भी चन्द्रशेखर पाण्डे सक्रिय रहे हैं और आज भी अपने पुराने साथियों का स्मरण करते हैं। वह बताते हैं कि लोक कलाकार संघ की गतिविधियों में उन्हें कई विधाएं सीखने का अवसर मिला। आज भी प्रतिदिन होली की बन्दिशें नियमित रूप से सुनने वाले चन्द्रशेखर पाण्डे का मानना है कि संगीत प्रकृति प्रदत्त होता है। पहाड़ की होली परम्परागत रूप से उपजी है, समय के साथ इसमें प्रयोग अच्छी बात है लेकिन इन प्रयोगों में इसकी सरलता-सुगमता का ध्यान रखना चाहिये। यह एकल गायकी नहीं बल्कि सामूहिक गायकी है। हमारे विद्वानों ने होली की ऐसी अद्भुद रचनाएं रचीं हो जो तय राग के अनुसार आज तक सटीक हैं। उन सुन्दर रचनाओं को वर्षों से गाया जा रहा है। इस बीच कुछ नये बोलों को लेकर गाने की करामात हुई लेकिन नई कविताएं बनाकर जबरन गाने से होली गीत नहीं हो सकता है। ऐसे गीत जुगुनू की तरह होते हैं और चलन से बाहर हो जाते हैं। नये होली रचनाकारों में चारुचन्द्र जी की मान्यता है क्योंकि उन्होंने जो भी गीत रचे वह हमारे होली थाट के लिये सटीक हैं। चारु चन्द्र जी संगीत के भी जानकार थे इसलिये उन्होंने बेहतरीन रचनाएं रचीं। पहाड़ की होली गायन का एक खांचा बना हुआ है उसमें गाने का अपना आनन्द है।
बातचीज के दौरान पाण्डे जी कुछ रचनाओें को गुनगुनाते हैं और पुराने गवैयों को याद कर भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं- ‘संगीत सरस्वती का वरदान है। ये प्रकृति प्रदत्त है। ये जहाँ भी है, सुख-शान्ति का और ईश्वर से मिलाने वाला है।’

पेटशाल, पनुवानौला में रुकते थे पैदल यात्री

बातचीज

पि.हि. प्रतिनिधि

अल्मोड़ा जिले के पेटशाल इलाका बहुत चर्चित है। चितई गोलज्यू मन्दिर के कारण तो पेटशाल को लोग जानते ही हैं, लखुडियार के कारण भी इसकी चर्चा होती है। इसके अलावा पेटशाली परिवार भी चर्चा का बड़ा कारण है। कला-साहित्य-संस्कृति के लिये इन लोगों को याद करते हैं। इन्हीं परिवारों में से संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर पेटशाली भी हैं। हंसादत्त पेटशाली के पुत्र- प्रेम बल्लभ ;इनके पुत्र जानकी प्रसाद, लीला हैं, पद्मादत्त ;इनके पुत्र रमेश चन्द्र हैं।, हरिदत्त पेटशाली ;इनके पुत्र हुए जुगलकिशोर, कैलाश, ललितमोहन।
संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर बताते हैं कि इनके बुजुर्ग मूल रूप से नेपाल से आये। चम्पावत जिले के पुण्यागिरी के पास टुन्यास में वह लोग रहा करते थे। गोरखों की मारकाट में एक बुजुर्ग महिला और सात साल का बालक कृष्णदेव जान बचाकर भाग निकले। समझदार बुजुर्ग ने पेटशाल में 200 रुपये में जमीन खरीद ली। पेटशाली जी कहते हैं- अंग्रेजों के समय स्थान के नाम पर वहाँ के वासियों को पुकारा जाने लगा। जैसे- कपकोट से कपकोटी, बाराकोट से बाराकोटी, पेटशाल से पेटशाली।
संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर जी ने पेटशाली में पर्वतीय वाद्ययन्त्रों का संग्रहालय स्थापित कर रखा है। कई पुस्तकों का लेखन व सम्पादन इनके द्वारा किया गया है। पहाड़ के गीत-संगीत की वर्तमान स्थिति को देख वह बेहद खिन्न हैं और कहते हैं कि ग्राम्य पृष्ठभूमि में लोक संस्कृति होती है और अब मंचों पर जो कुछ दिखाई-सुनाई दे रहा है अधिकतर वह जानकारी से अनभिज्ञ लोगों का तमाशा है। लोकविधा की जानकारी इन स्टार कलाकारों को नहीं होती है।
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए पेटशाली जी बताते हैं कि पैदल रास्तों के जमाने में गंगोलीहाट से तक लोग नैनी होते हुए पैदल आते थे। कृपालदत्त ताउ की दुकान में रुकने का अड्डा था। पनुवानौला में गंगादत्त बिनवाल का डेरा रुकने का स्थान था। तब चितई में अनावश्यक भीड़ नहीं होती थी। बाद में जब गिनीचुनी बसें चलनी शुरु हुई। यात्राी बस रुकवाकर मन्दिर में भेंट चढ़ाने असिका लेने आते-जाते थे। ग्राम्य जीवन शुद्ध वातावरण का था।

अल्मोड़ा शहर: जब लोग पान खाने के बहाने शिब्बन की दुकान में जाया करते थे

संस्मरण

नवीन चन्द्र उपाध्याय

बचपन की यादें बहुत मधुर होती हैं जो कोमल हृदय और अपरिपक्व मस्तिष्क में एक सुन्दर सपने की भांति जीवन भर मंडराती रहती हैं। मेरी बचपन व शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा शहर में हुई अतः यह स्वाभाविक है कि उस वक्त की सारी खट्टी-मीठी यादें अभी भी मन को गुदगुदाती रहती हैं। चूंकि यह शहर एक सांस्कृतिक व प्राचीन सम्भ्यता को अपने में संजोये हुए है, जहाँ पर हर मुहल्ले व गली में संगीत की धारा बहती है। खासतौर पर शुद्ध शास्त्रीय संगीत की झलक यहाँ की बैठकोंहोली में मिलती है। यहाँ कुमाउनी संस्कृति व रीति-रिवाज का सम्पुट अन्य धर्मावलम्बी वर्गों में भी मिलता है। होली, दिवाली, ईद व क्रिसमस साथ-साथ मनाई जाती है। जहाँ दीवाली की बात आती है बचपन में सभी बच्चे शहर की दीवाली देखने जाया करते थे वहाँ उनको खेल-खिलौने मिठाई खाने को मिलती थी। बिजली आने से पूर्व मोमबत्ती व दिये से शहर को रोशन किया जाता था। पचासवें दशक की बात है जब पहले पहल बिजली के बल्बों की रोशनी में दिवाली मनाई गई तो सारा शहर रोशनी से नहा रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शहर आसमान के तारों से जा मिला या तारे शहर में उतर आये हों। कुछ भी रहा हो, बच्चों के लिये यह एक आश्चर्यजनक नजारा था। कभी-कभी ऐसा दृश्य तब देखने को मिलता था जब बरसात या जाड़ों में कोहरा आने पर जमीन व आसमान एक ही नजर आते थे। इसीदृश्य को देखते हुए गीतकारों ने भी गीत लिखा था-
‘‘ये आसमां छू रहा है जमीं पर
ये मिलन हमने देखा यहीं पर………..।’’
विद्यार्थी जीवन के कई रोचक प्रसंग अभी भी याद आ रहे हैं। मैं रामजे हाईस्कूल में पढ़ता था, जहाँ पर प्रार्थना सभा में बाइविल की आयात का पाठ किया जाता था क्योंकि स्कूल ईसाई मिशनरी के प्रबन्ध् न में था। अतः अधिकांश शिक्षक क्रिश्चियन वर्ग के थे। एक दिन मेरे गाँव से एक परिचित मुझे विद्यालय में मिलने आये, वे गेट पर से मुझे बाइविल का पाठ करते देख रहे थे जब प्रार्थना सभा समाप्ति पर थी वे अचानक मेरे बगल में खड़े हो गये मुझे बाइविल न पढ़ने के लिये कहने लगे तथा स्कूल बदलने को कहा। इस पर चुप होकर मैं उनको सुनने लगा जब उनका भाषण खत्म हो गया मैं उन्हें विद्यालय के भीतर ले गया जहाँ हर कमरे की दीवार में बाईविल की आयतें लिखी थी वे इस प्रकार से थी-
‘‘ईश्वर सबका एक है। ईश्वर से प्रेम करो। भगवान का भय बुद्धि का प्रारम्भ है।…..।’’ वे सज्जन इनको
पढ़कर कहने लगे- यह तो हमारे धर्मग्रन्थ में भी लिख रहता है। तब मैंने उनसे कहा कि अधिकांश लोग अन्ध्कार में रह कर एक-दूसरे के धर्म की निन्दा करते देखे गये हैं। वे सज्जन सन्तुष्ट होकर वापस चले गये और मैं अपनी कक्षा में। उस समय मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ता था, मेरी हिन्दी की कक्षा थी, हमको हिन्दी पढ़ाने वाले अध्यापक श्री केशवदत्त पाण्डे जी थे जो साधरण सा लिवास पहने रहते थे तथा उच्च विचारों के एक योग्य अध्यापक थे। उनके पढ़ाने का तरीका ऐसा था कि कक्षा के बच्चे एकदम शान्तचित्त होकर उनको सुना करते थे, वे बीच-बीच में कुछ कहानियां व रोचक प्रसंग भी सुनाया करते थे। एक बार उन्होंने एक रोचक प्रसंग विद्यालय के बारे में सुनाया। प्रसंग इस प्रकार था कि विद्यालय में कुछ अंग्रेज अधिकारी पैनल मुआयने में आये थे उनमें से एक अधिकारी अंग्रेजी अध्यापक की कक्षा का निरीक्षण करने गया, साथ में काजेल के प्रधनाचार्य मि.रावत भी थे अध्यापक को सम्बोधित करते हुए अधिकारी ने कहा- ‘मि.आपका शाब्दिक उच्चारण ठीक नहीं है, ठीक से अंग्रेजी के शब्द बोलिये।’ रावत जी भी अध्यापक का उच्चारण सुन रहे थे। उन्हें लगा कि उच्चारण
सही हो रहा है। उन्होंने अधिकारी से कहा- महाशय! अध्यापक बिल्कुल सही बोल रहे हैं। इस पर अधिकारी नाराज हो गये। रावत जी ने अंग्रेज से कहा मि. क्या आप कुमाउनी भाषा के शब्दों को ठीक से बोल सकते हैंयदि हाँ तो मैं कुछ शब्द बोलता हँू आप उन्हें ठीक उसी प्रकार दुहरायेंगे
बोलें- मडुवाक रऽवाट’, अंग्रेज अधिकारी के मुख से निकला- ‘मडुवाक ल्वात’। इस पर सभी बच्चे हँसने लगे तब रावत जी ने उन्हें समझाया कि भौगोलिक परिस्थितियों व जलवायुके अनुसार ही हमारी जीभ व मँुह का संचालन होता है। ठण्डी जलवायु के लोग अपना मँुह गर्म जलवायु के व्यक्तियो की अपेक्षा कम खोलते हैं जिससे उनका उच्चारण प्रभावित होता है। इस पर अंग्रेज अफसर चुप होकर चला गया।
मध्यान्तर हुआ हम सभी विद्यार्थी बाहर निकले और इसी प्रसंग की चर्चा में हँसते रहे। बाजार में
कन्हैयालाल नन्दलाल के यहाँ दूध् पीने चले गये जो उस वक्त एकआने में एक गिलास मलाई डालकर मिलता था, वह दूध् आज भी याद आता है। अगली कक्षाओं के लिये कुछ समय अभी बचा था, हम सभी शिब्बन पान वाले की दुकान के सामने रेडियो सुनने चले गये। वहाँ पर अधिकांश लोग पान खाने के बहाने रेडियो समाचार व आजाद कश्मीर रेडियो के गाने सुना करते थे। छुट्टी के दिन या इतवार को हम लोग ब्राइटन कार्नर घूमने जाया करते थे और लौटते समय रीगल सिनेमा के सामने ठेला लगाये बाबा के यहाँ स्वादिष्ट गोलगप्पे का आनन्द लेते हुए बसंल होटल के गुलाब जामुन खाना नहीं भूलते थे।
इस प्रकार विद्यार्थी जीवन की छोटी-मोटी बातें आज भी दिलो-दिमांग में घूमती रहती हैं। एक बार नन्दादेवी के मेले में मुझे अपने फूफा जी केसाथ जाने का अवसर प्राप्त हुआ। फूफा जी मुझे अपने कन्ध्े में बिठा कर बावन सीड़ियां चढ़कर मन्दिर परिसर में ले गये, जहाँ बहुत भीड़ एकत्रित थी कारण था भैंस की बलि चढ़ाना लोग देख रहे थे। मैं फूफा जी के कन्ध्े में बैठा सबसे आगे वाली कतार में था। बलि का भैंसा लाया गया साथ में एक खड्ग हाथ में लिये खटिक भी था। राजा काशीपुर के हाथ में खड्ग पकड़ा कर खटिक ने एक ही बार में भैंस की गरदन से सिर अलग कर दिया, खून की धारा बहने लगी। हृदय विदारक दृश्य को देखकर मेर बाल मन विकल हो उठा और मैं बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा। साथ ही मेरे फूफा जी भी गिर पड़े। दोनों को चोटें आई। किसी प्रकार हम लोग घर पहँुच पाये। कई दिनों तक मेरे दिमाग में वह वीभत्स घटना तैरती रही जिससे मुझे रात नींद में चिल्लाने व उठ कर बैठ जाने की शिकायत हो गई। आज भी मैं सोचता हँू कि मनुष्य ने अपनी सुख सुविधा व मनोकामना के लिये या कहें मनोरंजन के लिये निरीह प्राणियों पर किस प्रकार से अत्याचार करते हैं जो एक जघन्य पाप की श्रेणी में आता है। अभी तक यहप्रथा चली आ रही है। कुछ हद तक सरकार ने इसको प्रतिबन्धित किया है। फिर भी लोग चोरी-छिपे ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं जो अनुचित है।

पिघलता हिमालय 1 दिसम्बर 2014 के अंक से

रामसिंह जागरुक जनों की धुरी थे, एनटीडी अल्मोड़ा को बनाया केन्द्र

लक्ष्मण सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
जोहार के इतिहास-भूगोली की समग्र जानकारी के लिये याद किये जाने वाले रामसिंह पांगती के बारे में पिघलता हिमालय डाॅ.आर.एस.टोलिया का कालम नियमित रूप से प्रकाशित हो रहा है। इस अंक में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का हवाला दिया जा रहा है। परिवार के वरिष्ठ सदस्य लक्ष्मण सिंह पांगती से बातचीत के आधार पर यह जानकारियां हैं। 80 वर्षीय लक्ष्मण सिंह पांगती भी हमेशा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। इन्होंने मिडिल मुनस्यारी से करने के बाद हाईस्कूल अल्मोड़ा से किया। आईबी में नौकरी करते हुए नैनीताल, इलाहाबाद, लेह-लद्दाख, लखनउ रहे। असि0डायरेक्टर आईबी से सेवानिवृत्त होकर अब हल्द्वानी में रह रहे हैं। अपनी सरकारी सेवा के दौरान भी सामाजिक मेल-मिलाप में रहने वाले लक्ष्मण सिंह जी ने लखनउफ में काफी समय व्यतीत किया और पहाड़ की संस्कृति से युवाओं को जोड़ने के लिये लेखन भी करते रहे। पिघलता हिमालय में भी आपके द्वारा लेख व उपयोगी सामग्रियां उपलब्ध् करवाई गई।
पिता रामसिंह पांगती व माता हिरमा देवी के कनिष्ठ पुत्रा लक्ष्मण सिंह जी बताते हैं कि उनके पिता ने परिवार से ज्यादा समय समाज के लिये दिया। रामसिंह जी जागरुक जनों की धुरी थे, उन्होंने सीमान्त क्षेत्रा के लोगों को मदद के लिये एनटीडी अल्मोड़ा में केन्द्र बनाया। 8 जून 1884 को राडागाडी तहसील मुनस्यारी में जन्मे रामसिंह मिडिल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी और 17 अगस्त 1906 में सर्वे आपफ इण्डिया देहरादून में सर्वेयर के पद पर नियुक्त हुए। कुछ वर्षों बाद नौकरी भी छोड़ दी। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आन्दोलन चलाने के साथ ही कई पुस्तकें उन्होंने लिखी। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में- जोहार का इतिहास व वंशावली ;सन् 1936 ई.द्ध, आत्म कहानी, स्त्री शिक्षा ;1910द्ध, जोहारीय उपकारक;भाग 1, भाग 2द्ध हैं। हस्तलिखित पुस्तकों में- होली का अखबार ;सन् 1935, महिला सुधर ;जोहारी बोली में 1936द्ध, देशोपकारक ;जिसमें शौका सेवक मण्डल, जोहार पंचायत, सुधरकों को आदेश, अछूतोद्धाार और मनोभिलाषा शामिल हैद्ध, भूत शंका निवारण है। इन दिनों उनकी हस्तलिखित पुस्तकों के आधर पर जोहारी बोली में ‘छितकू की कथा एवं ऐतिहासिक कथाएं’ पुस्तक तैयार हो रही है। पिता जी ने अल्मोड़ा के लाला बाजार में दुकान भी ले ली थी लेकिन वह नहीं कर सके। रामसिंह जी ने जोहार उपकारिणी महासभा, जोहार सोसाइटी ;सम्वत 1969, नौजवान पांगती पुस्तकालय, जोहार कांग्रेस मण्डल सामाजिक तथा राजनैतिक संस्थाओं के गठन में सक्रिय सहयोग दिया। महिला उत्थान के लिए 1900 से ही प्रयास करते रहे। बाल विवाह, कन्या विक्रय, अशिक्षा व महिलाओं में पर्दे का प्रचलन रोकने के लिए प्रचार तथा प्रयास किया। 1910 में महिलाओं में जागृति के लिए स्त्रीशिक्षा नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। 12 जुलाई 1951 को जोहार भवन, नारायण तेवाड़ी देवाल ;एनटीडी अल्मोड़ा में उनका निध्न हुआ था।
इस पांगती परिवार की बात करें तो सोबन सिंह, रामसिंह और नरसिंह तीन भाई थे। दरकोट में रहते हुए इन्होंने मुनस्यारी में शान्तिकुन्ज में आसियाना बनाया। शान्तिभवन नाम से बने आवास में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और वंशावली तैयारी के लिये दूर-दूर से लोग आते थे। जागरुक जनों की बैठकें और सामाजिक चेतना के लिये बनने वाली रणनीति के बीच परिवार के छोटे बच्चे लोकरंग में रंगते हुए काफी जागरुक हो चुके थे। रामसिंह के परिवार में पुत्र-पुत्री- मोहनसिंह, उत्तमसिंह, गोविन्द सिंह, तुलसी देवी, लक्ष्मण सिंह हुए। यही वंशावली आगे बढ़ते हुए मोहन सिंह परिजनों में कमला, राजकुमारी पांगती, हरीश, भगवान, राजेन्द्र सिंह। उत्तम सिंह जी के परिजनों में मुन्नी देवी, तारा जंगपांगी, पूरन सिंह। तुलसी रावत के पति श्रीराम सिंह रावत जी हैं। लक्ष्मण सिंह के पुत्र- जयन्त व तनुज पांगती।

पिघलता हिमालय 29 अगस्त 2016 अंक से

श्रद्धांजलि स्व.शमशेरसिंह बिष्ट

आन्दोलन का भरोसा थे
अल्मोड़ा। जन आन्दोलनों में अग्रणीय रहे डाॅ. शमेशर सिंह बिष्ट का 22 सितम्बर 2018 की प्रातः निधन हो गया। समाजसेवी, पत्रकार के रूप में भी वह आम जन की आवाज उठाते रहे। उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के मुखिया के रूप में वह जनता की आवाज उठाते रहे। बिष्ट जी आन्दोलनों का भरोसा थे। अपने छात्र जीवन से ही वह अन्याय के खिलाफ आन्दोलनों में जुड़े रहे। मूल रूप से खटल गाँव, स्याल्दे निवासी डाॅ.शमशेर सिंह बिष्ट का जन्म 4 फरवरी 1947 को अल्मोड़ा में हुआ। बचपन से ही मेधवी और जुझारु बिष्ट जी 1972 में अल्मोड़ा कालेज में छात्रा संघ अध्यक्ष बने। उनके आन्दोलन तरीका एकदम अलग था। जब वह छात्रा संघ चुनाव लड़े थे तब उन्होंने एक मोहर बनाई थी और दूसरे छात्र नेताओं द्वारा फैंके गये पर्चे-बिल्लों के पीछे अपनी मोहर लगाकर बांट देते। उनके सोचने और समझाने का यह तरीका हर किसी को भाता था। उत्तराखण्ड आन्दोलन सहित जल, जंगल, जीमन की बातों पर वह बेवाक लिखते व बोलते थे। पिछले दो साल से स्वास्थ्य विकार के कारण उन्हें दिक्कत थी, बावजूद वह बैठकों, सभा, आन्दोलनों में जुड़े रहे। आर्य समाज के साथ स्वामी अग्निवेश से वह बहुत प्रभावित रहे। स्वास्थ्य बहुत खराब होने के बाद उन्हें दिल्ली अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। वह इलाज करवाकर अल्मोड़ा आ गये और दवाईयों खाने के अलावा स्वध्याय में लगे रहे। किताबों के दोस्त और समझ रखने वाले डाॅ.शमशेर की कल्पना थी- ‘किताब घर’। तभी उनके प्रतिष्ठान का नाम किताबघर रखा गया। जिसमें स्तरीय पुस्तकों का खजाना है।
स्व.बिष्ट जी व उनके परिवार का पिघलता हिमालय परिवार से गहरा रिश्ता है। वह हर सुख-दुःख में शामिल होते रहे हैं। बिष्ट जी के पत्नी श्रीमती बिष्ट अध्यापिका रही हैं। उनके सुपुत्रा अयजमित्र व जयमित्र जानेमाने फोटोग्राफर, ट्रैकर व समाजसेवी हैं। स्व.बिष्ट अपने पीछे ईष्ट-मित्र-भरापूरा परिवार छोड़ गये हैं। पिघलता हिमालय परिवार उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है।