ढाकर बोकने का अपना मजा था, लाछुली से भराड़ी जाते थे

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
अल्मोड़ा। तिब्बत व्यापार के दिनों में जोहार के रावत परिवार में से एक तेजम से तीन किमी आगे लाछुली और एक जलद बस गया। व्यापार के सिलसिले में इध्र से उध्र जाने वालों ने दुरुह दिन देखे हैं और अपने को स्थापित किया है। अपनी उन पुरानी यादों के साथ पिघलता हिमालय से बात करते हुए 66 वर्षीय रघुनाथ सिंह रावत कहते हैं कि बचपन में उन्होंने भी ढाकर बोका है। लाछुली से बाखड़धर, शामा, हरसिंगियाबगड़ होते हुए भराड़ी तक वह लोग जाते थे। ये व्यापार के पड़ाव थे और बकरियों-भेड़ों ेके साथ सामान लेकर जाना होता था। ढाकर बोकने का अपना मजा था। समूह में जब कई लोग अपने जानवरों के साथ जाते थे तो छोटों को कुछ जानवरों के साथ आगे-आगे भेजा जाता था। पीछे से बड़े-सयाने आते थे। वह बताते हैं कि मुनस्यारी रुट से वह नामिक भी गये। नामिक में रावतों की जमीनें हैं।
श्री रावत के पिता 103 वर्षीय गोविन्द सिंह रावत तो कई बार तिब्बत व्यापार में शामिल हुए हैं। माइग्रेसन के समय यह परिवार लाछुली से शंखाध्ुरा ;मुनस्यारी पिफर मिलम जाता था। इसी अवरोही क्रम में उतरते थे। गोविन्द सिंह जी इस समय शंखाध्ुरा में रहते हैं।
रघुनाथ सिंह जी बताते हैं कि जलद वाले गंगासिंह रावत अभी भी हर साल मिलम जाते हैं। कई पुरानी यादों के साथ रघुनाथ जी अल्मोड़ा में निवास कर रहे हैं। शंखाध्ुरा में भी इनका परिवार है।
पिघलता हिमालय 6 जून 2016 के अंक में प्रकाशित