
गंगा सिंह पांगती
पि.हि.प्रतिनिधि
तिब्बत व्यापार के दौर की कई यादों के साथ कई लोग हमारे समाज में हैं। वह व्यापार चाहे सीमा पार जाकर तिब्बत होता था या आन्तरिक शहर-कस्बे-गाँव में, उनकी स्मृतियाँ हमेशा मधुर रहेंगी। ऐसी ही मधुर स्मृतियों को सजो कर रखा है ध्रमघर में रहने वाले गंगा सिंह पांगती ने।
1951 में दरकोट, मुनस्यारी में पिता रतनसिंह माता रूमा देवी के घर जन्मे गंगासिंह का बचपन बहुत ही संघर्षमय रहा है। इनकी दो बहिनें- कोकिला देवी ;पंचपाल और प्रेमा;मर्तोलिया हैं। पिता के निधन के बाद 5-6 साल की उम्र में बालक गंगा अपने नाना दलीप सिंह पंचपाल;सयाना के घर सिमगड़ी, नाकुरी पट्टी आ गये। पिथौरागढ़-बागेश्वर जनपदों की सीमा क्षेत्रा ध्रमघर नामक स्थान में इनका परिवार रहता है।
गंगासिंह बताते हैं कि इनके नाना जी चार भाई थे- दलीप सिंह, उत्तम सिंह। व्यापार के दिनों में यह लोग अपने जानवरों सहित इधर-उधर जाते थे। झुप्पू में समान लादकर दूर तक इनकी यात्राएं होती थीं। झुप्पू याक से छोटे नश्ल का जानवर है। झुप्पू भी दो तरह के होते हैं- एक तो छोटे कद और छोटे सींग वाला और दूसरा बड़े शरीर वाला। नाना जी लोग सिमगड़ी में रहते हुए ही जोहार के पांछू और तिब्बत तक जाते। जब वे लोग नमक इत्यादि सामान लेकर वापस आते थे तब बचपन में कमेड़ीदेवी, गरुड़, बिन्ता, सोमेश्वर, द्वाराहाट जाने का मौका मिला। नाना जी के साथ दूनागिरी, पाण्डुखोली ;द्वाराहाट भी गया। सोमेश्वर, बिन्ता से वापसी में चावल लाते थे। वस्तु विनिमय में नमक इत्यादि सामान के बदले चावल मिलता था। अपने बचपन को याद करते हुए पांगती जी बताते हैं कि जिला पंचायत के अन्तर्गत माइग्रेशन का प्राइमरी स्कूल पांछू नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम सिमगड़ी स्कूल हो गया और माइग्रेशन व्यवस्था नहीं रही किन्तु उन्होंने पुराने रिकार्ड खुलवाये और इस आवाज उठाई। बाद में एक और प्राइमरी स्कूल शौक्यूड़ा नाम से खुल गया। बचपन की पढ़ाई के बाद गंगासिंह मुनस्यारी पढ़ने चले गये। चाचा सत्यवीर सिंह पांगती सहित कई लोगों ने आगे पढ़ाई के लिये सहयोग किया लेकिन कक्षा आठ की पढ़ाई करते हुए ही गंगा सिंह सीआरपीएफ में भर्ती हो गये। 1980 में हरतोला के झुब सिंह पंचपाल ;मल्ला राठ की पुत्री से इनका विवाह हुआ। अपनी स्थिति-परिस्थिति से घिरे गंगा सिंह का संघर्ष चलता रहा। नौकरी के दौरान ही अस्वस्थ्य माता जी के इलाज के लिये वह अपने अधिकारियों से तक भिड़ जाते थे। चूंकि उनकी हर आवाज उनके अन्तःकरण की थी, सो वह सपफल ही रहे। सेवानिवृत्त होने के बाद गंगासिंह जी सिमगड़ी के ग्राम प्रधान बन गये। जनहित के मुद्दों को उठाने के साथ ही एक पफौजी अनुशासन के लिये चर्चित पांगती जी को पंचायतीराज संगठन का ब्लाक अध्यक्ष बना दिया गया। संगठन के जिला, मण्डल अध्यक्ष के बाद अब वह प्रान्तीय अध्यक्ष हैं।
अपने बचपन की यादों में लौटते हुए वह बताते हैं कि उनका मूल घर तो मिलम ही है। पिता जी दरकोट आते समय बोगड्यार से टांटरू, बाख ले आते थे। टांटरू की सब्जी और बाख का आचार खूब याद आता है। संगठन की भावना के साथ सबको जोड़ने वाले श्री पांगती कहते हैं- ‘विषम परिस्थितियों में भी खुश रहना आता है पर्वतवासियों को।
पिघलता हिमालय 15 अगस्त 2016 से

