जन चेतना का गढ़ रहा है शक्ति प्रेस

धीरज उप्रेती
महानगर की शक्ल ले चुके हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड की सूरत भी अब बदलती जा रही है। कभी इस सड़क पर फड़ों का छोटा सा बाजार और दूर जाकर पीलीकोठी मुख्य स्थान हुआ करता था। उसके बाद उँचापुल। तब कहीं जाकर कठघरिया, फतेहपुर का ग्रामीण इलाका। मुखानी नहर चैराहे के बाद यह सारे गाँव बसे थे। आज कुछ पहचान नहीं आता है। चारों ओर फैल रहा शहर महानगर का आकार ले चुका है। कालाढूंगी चैराहा शहर का मुख्य चैराहा है, इसी सड़क पर हमारा छापाखाना शक्ति प्रेस तमाम सामाजिक आन्दोलनों का मुख्यालय बनकर रहा। इस पुराने भवन में छापाखान, आन्दोलनकारियों की बैठकें, प्रेसवार्ता, आन्दोलनकारियों की भीड़ हमेशा रही। यही मेरा जन्म स्थान है। बचपन के खेलकूद, पढ़ाई और संगीत सबकुछ इसी माहौल में हुआ। जन चेतना के इस गढ़ का अपना इतिहास है।
समय के साथ सब बदलता जायेगा लेकिन कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो केन्द्रबिन्दु बनकर इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। शक्ति प्रेस का यह ठिकाना भी ऐसा ही है। मैंने बचपन से प्रेस/घर के हिस्से में अन्तर ही महसूस नहीं किया। सबकुछ तो हँसीखुशी के माहौल में होता था। आज घुट से रहे हल्द्वानी शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है लेकिन अपनापन नहीं है। अपनों के बीच बसने की चाह लेकर पलायन कर रहे लोग भीड़ में खो चुके हैं। बैठने के पुराने अड्डे नहीं रहे। दौड़भाग की शक्ल वाला यह शहर सिर्फ बाजार बनकर खड़ा है, जिसमें बेचने और बिकने वालों की बात हो रही है। ऐसे में सावधान रहने की जरूरत है। पुराने जमाने की लकीर भले न पीटी जाए लेकिन उसकी मान्यताओं को रखना जरूरी है।
हमारे गाँव कुंजनपुर, गंगोलीहाट इलाके के सभी लोगों का अड्डा उस जमाने में शक्ति प्रेस था। अब तो होटलों में रहने की परम्परा हो चुकी है और फैलते हल्द्वानी में कई लोगों के परिवार-रिश्तेदार हो चुके हैं। मुनस्यारी-धरचूला के सीमान्त से ‘पिघलता हिमालय’ परिवार के सदस्यों के अलावा तमाम जगह से लोगों का आना-जाना था। रामनगर, काशीपुर, बाजपुर के लिये चार-पाँच बसों का अड्डा हमारे छापाखाने के बगल में खुल गया। वर्षाें बाद 80 के दशक में यह बस अड्डा बड़ा आकार ले चुका था और करीब अस्सी बसें इसमें थीं लेकिन इसे हटाना जरूरी था। तब कालाढूंगी रोड में घनी आबादी के बीच प्राइवेट बस अड्डे को हटाने के लिये शासन-प्रशासन बौना दिखाई दिया। ऐसे में उग्र आन्दोलन ही सहारा था। मैंने यह पहला आन्दोलन देखा जिसकी अगुवाई ईजा ने की। इसमें धरना- प्रदर्शन, ज्ञापन से कुछ होने वाला नहीं था। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती ने कई बसों के शीशे तोड़ डाले। हम बच्चे भी पत्थर मारकर बस के शीशे तोड़ने को खेल मानकर जुट जाते। दरअसल उस समय कई खूंखार लोग बस अड्डे से जुड़ चुके थे और मनमानी चाहते थे। ऐसे में सबकी नज़रे ‘शक्ति प्रेस’ पर होती। हल्द्वानी थाने के सीओ पुष्कर सिंह सैलाल जो बाद में डीआईजी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, ईजा को समझाने आते थे- ‘भाभी जी बस अड्डा हट जायेगा, इनके शीशे मत तोड़ना।’ हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले का संचालन ही हमारे ‘शक्ति प्रेस’ से हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के उस दौर के प्रबुद्ध जनों की बैठक यहाँ हुआ करती थी। लोक चेतना मंच से जुड़कर ईजा ने कई जगह प्रतिभाग किया। सीखने की इच्छा में ईजा ने ट्राइसेम योजना के तहत पीपुल्स कालेज में जुड़ीं। गायत्री परिवार के अभियान से जुड़कर उन्हें सहयोग किया। आन्दोलन के साथ विचार-विमर्श के इस अड्डे से कई अन्य आन्दोलन भी संचालित हुए, जो सामाजिक सौहार्द व दिशा देने वाले थे।

फरवरी 2019

हल्द्वानी के इतिहास के उम्रदार गवाह थे केशवदेव वशिष्ठ

पि.हि.प्रतिनिधि
24 मार्च 2017 को पं.केशवदेव बशिष्ट का सौ वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। अपने जमाने के पहलवान, संगीत रसिक, जाने-माने मुनीम स्व.बशिष्ट जी अपने पीछे पुत्र सूर्यदेव नाती-पोतों सहित भरापूरा परिवार छोड़ गये हैं। भाबर के हल्द्वानी बनने से लेकर अंग्रेजों के जमाने के तमाम किस्से जानने वाले बशिष्ट जी को लोग ‘मुनीम जी’ नाम से पहचानते थे। शहर के पुराने परिवारों में से इनका परिवार भी है। ;स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती, सम्पादक पि0हि0 की पुस्तक हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से में इनके बारे में कई रोचक जानकारियां प्राप्त की जा सकती हैं।
इनके पिता स्व.भीष्मदेव जी अपने समय के कवियों में से थे। वह दौर जब हल्द्वानी में दिन की रामलीला का मेला देखने को तराई-भाबर उमड़ पड़ता था, पहलवानों के दंगल लगते थे, संगीत प्रेमियों के अड्डे कोठे भी थे, फूलों के गजरे और पान के शौकीन लोग सायं को टहला करते थे। रासलीला की मण्डियां मथुरा से आया करती थीं। हरे-भरे खेत लहलहात थे और खुली नहरों की कलकल देखने को मिलती थी। उस दौर के पूरे नक्शे को याद करते हुए बशिष्ट जी ने समय के साथ अपने को समेट लिया। रामपुर रोड स्थित अपने पैतृक आवास में वह पुत्रों-भाईयों के बीच रहा करते थे। करीब साल भर से अपने पुत्र के तीनपानी स्थित मकान में वह रहने लगे थे। उम्र के इस पड़ाव में भी उन्होंने प्रातःकालीन योगक्रिया नहीं छोड़ी थी और राग-रागनियों को गुनगुनाया करते थे। पहाड़ की होली बैठक के बेहद शौकीन मुनीम जी को दुर्लभ होली रचनाएं याद थीं। होली गीतों को वह ठेठ ध्र्रे से हटकर तीनताल में गाया करते थे। हिमालय संगीत शोध् समिति के संरक्षक के रूप में वह हमेशा सक्रिय रहे और मार्गदर्शन करते थे। कलाकारों को प्रोत्साहन भी किया करते थे। छोटे कद के मुनीम जी को स्वाभिमानी और स्वावलम्बी थे। उन्होंने शहर के बड़े प्रतिष्ठित व्यापारियों के वहाँ मुनीमगिरी की और उम्र के साथ अरुचि हो गई थी लेकिन उनके अनुभव और शैली के कायल व्यापारी उन्हें छोड़ते ही नहीं थे। एक बार में एक सैकड़ा व्यापारियों की मुनीमी करना हर किसी के बूते की बात नहीं। इसके अलावा शहर में होने वाले प्रत्येक आयोजन विशेषकर संगीत कार्यक्रमों में वह दर्शक के रूप में जरूर दिखाई देते थे।
फैलते जा रहे शहर और बदलती जा रही जिन्दगी से हैरान बशिष्ट जी कहा करते थे- ‘जिन्दगी में सारी लपेट चलती रहेगी। अपने साथ शामिल बाजा भी होगा लेकिन सर्तकता अपनी करनी है। कोई भरोसा नहीं कब क्या हो जाए।’ पिघलता हिमालय कार्यालय, शक्ति प्रेस छापाखाना उनका प्रमुख अड्डा था।
बुजुर्गवार पं.केशवदेव बशिष्ट जी अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी स्मृतियां हमेशा बनी रहेंगी। हल्द्वानी शहर के पुराने परिवारों के रूप में उनकी जड़ें हमेशा सक्रिय रहेंगी। उनके पुत्र, बहू, नाती-पोते सभी मिलकर स्व.बशिष्ट जी की यादों को उनके बताये रास्तों को अपनायेंगे। जब-जब हल्द्वानी का इहिहास पढ़ा जायेगा, इनका स्मरण होना ही है। युवाओं को प्रोत्साहित करने वाले बुजुर्ग स्व.बशिष्ट जी को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजलि

पिघलता हिमालय 17 अप्रैल 2017 अंक से।