
पि.हि.प्रतिनिधि
24 मार्च 2017 को पं.केशवदेव बशिष्ट का सौ वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। अपने जमाने के पहलवान, संगीत रसिक, जाने-माने मुनीम स्व.बशिष्ट जी अपने पीछे पुत्र सूर्यदेव नाती-पोतों सहित भरापूरा परिवार छोड़ गये हैं। भाबर के हल्द्वानी बनने से लेकर अंग्रेजों के जमाने के तमाम किस्से जानने वाले बशिष्ट जी को लोग ‘मुनीम जी’ नाम से पहचानते थे। शहर के पुराने परिवारों में से इनका परिवार भी है। ;स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती, सम्पादक पि0हि0 की पुस्तक हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से में इनके बारे में कई रोचक जानकारियां प्राप्त की जा सकती हैं।
इनके पिता स्व.भीष्मदेव जी अपने समय के कवियों में से थे। वह दौर जब हल्द्वानी में दिन की रामलीला का मेला देखने को तराई-भाबर उमड़ पड़ता था, पहलवानों के दंगल लगते थे, संगीत प्रेमियों के अड्डे कोठे भी थे, फूलों के गजरे और पान के शौकीन लोग सायं को टहला करते थे। रासलीला की मण्डियां मथुरा से आया करती थीं। हरे-भरे खेत लहलहात थे और खुली नहरों की कलकल देखने को मिलती थी। उस दौर के पूरे नक्शे को याद करते हुए बशिष्ट जी ने समय के साथ अपने को समेट लिया। रामपुर रोड स्थित अपने पैतृक आवास में वह पुत्रों-भाईयों के बीच रहा करते थे। करीब साल भर से अपने पुत्र के तीनपानी स्थित मकान में वह रहने लगे थे। उम्र के इस पड़ाव में भी उन्होंने प्रातःकालीन योगक्रिया नहीं छोड़ी थी और राग-रागनियों को गुनगुनाया करते थे। पहाड़ की होली बैठक के बेहद शौकीन मुनीम जी को दुर्लभ होली रचनाएं याद थीं। होली गीतों को वह ठेठ ध्र्रे से हटकर तीनताल में गाया करते थे। हिमालय संगीत शोध् समिति के संरक्षक के रूप में वह हमेशा सक्रिय रहे और मार्गदर्शन करते थे। कलाकारों को प्रोत्साहन भी किया करते थे। छोटे कद के मुनीम जी को स्वाभिमानी और स्वावलम्बी थे। उन्होंने शहर के बड़े प्रतिष्ठित व्यापारियों के वहाँ मुनीमगिरी की और उम्र के साथ अरुचि हो गई थी लेकिन उनके अनुभव और शैली के कायल व्यापारी उन्हें छोड़ते ही नहीं थे। एक बार में एक सैकड़ा व्यापारियों की मुनीमी करना हर किसी के बूते की बात नहीं। इसके अलावा शहर में होने वाले प्रत्येक आयोजन विशेषकर संगीत कार्यक्रमों में वह दर्शक के रूप में जरूर दिखाई देते थे।
फैलते जा रहे शहर और बदलती जा रही जिन्दगी से हैरान बशिष्ट जी कहा करते थे- ‘जिन्दगी में सारी लपेट चलती रहेगी। अपने साथ शामिल बाजा भी होगा लेकिन सर्तकता अपनी करनी है। कोई भरोसा नहीं कब क्या हो जाए।’ पिघलता हिमालय कार्यालय, शक्ति प्रेस छापाखाना उनका प्रमुख अड्डा था।
बुजुर्गवार पं.केशवदेव बशिष्ट जी अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी स्मृतियां हमेशा बनी रहेंगी। हल्द्वानी शहर के पुराने परिवारों के रूप में उनकी जड़ें हमेशा सक्रिय रहेंगी। उनके पुत्र, बहू, नाती-पोते सभी मिलकर स्व.बशिष्ट जी की यादों को उनके बताये रास्तों को अपनायेंगे। जब-जब हल्द्वानी का इहिहास पढ़ा जायेगा, इनका स्मरण होना ही है। युवाओं को प्रोत्साहित करने वाले बुजुर्ग स्व.बशिष्ट जी को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजलि
पिघलता हिमालय 17 अप्रैल 2017 अंक से।
