हल्द्वानी: आज नहीं तो कल बदल ही जाना है शहर का चेहरा

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
हल्द्वानी महानगर बनने के साथ ही तेजी से बदलने लगा है। जन दबाव के कारण यहाँ की सड़कें जाम होने लगी हैं, गलियों में निकलने में दिक्कत हो रही है, नालियां बजबजा रही हैं, कूड़ा निस्तारण समस्या बन चुका है, सीवर लाइन के लिये हुई खुदाई के बाद से काम लटका हुआ है, परिसीमन के बाद शहर में जुड़ चुके ग्रामों में सुविधएं जुटाना है। इसके अलावा अनियोजित निर्माण कार्यों व मुख्य शहर में मनमानी करने वालों के कारण भारी दिक्कत है। समस्याओं से भरे शहर को हर कोई कहता है परन्तु व्यवहार में होता कुछ और है। आश्चर्य की बात नहीं अपनी दुकान या मकान के आगे सड़क में ठेला खड़ा करने वालों से भी कोई किराया वसूल ले। बताया जाता है कि सड़क फुटपाथ पर दुकान सजाने के लिये भी भारी दादागिरी चलती है। किसी को किसी का तो किसी को किसी दूसरे का संरक्षण मिलता है।
नशे की गिरफ्रत में नई पीढ़ी दिखाई दे रही है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अवैध् रूप से संचालित हुक्का वारों को बन्द करवाया है इसके बावजूद किशोर युवक-युवतियां नित नये अड्डे तलाशते दिखाई देते हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी में मिलने के बहाने कुछ जमा हो जाते हैं और नशे में डूबने लगते हैं। गाँव की संस्कृति से शहर और शहर से महानगर की ऐसी संस्कृति बहुत भयावह दिखाई दे रही है।
फैलते जा रहे शहर में खेतों का सफाया हो चुका है। बाजार बढ़ता जा रहा है। खिलौनों से लेकर शराब के कारोबार तक के लोग फैल चुके हैं। नेताओं के चेहरे भी बढ़ते जा रहे हैं। बिजली के खम्बों या इधर उधर नित लगने वाले होर्डिंगों से पता चलता है कि कौन-कौन माननीय कहलाने लगे हैं और कौन-कौन उभरते नेता हैं। इन्हें पोषित करने वाले भी चर्चा में रहते हैं।
शहर के फैलने और चैड़े होने में उन पुराने शहरी को ढूंढना मुश्किल होता जा रहा है जो कभी मुख्य थे। क्योंकि उनके आस-पास कई मंजिलों वाले खड़े हो चुके हैं, कारोबार दूसरे हो चुके हैं, समस्याएं अन्य प्रकार की हैं, वह वैसे ही हैं जैसे हुआ करते थे। रबड़ी मलाई, कुल्फी, पान, चाय की पुरानी दुकानें अपनी परम्परा को ढो रही हैं लेकिन चमचमाते व्यापार में जो दिखाई दे रहा है, वहाँ भीड़ है। सुविधएं बढ़ी हैं लेकिन आपफत बढ़ती जा रही है।
शहर के फैलते ही मुख्य समस्या शहर में निकलना मुश्किल हो चुका है। अब इसे सुधर के लिये डण्डे के बल पर काम चलाना मजबूरी लग रहा है। इसके लिये सबसे पहले कालाढूंगी रोड स्थित मुखानी चैराहे को चुना गया है। यहाँ प्रस्तावित फ्रलाईओवर के लिये तैयारी करनी है। इससे पहले चैराहे से दोनों ओर अतिक्रमण हटने हैं। इस जिद्दी शहर में अपने आप से कोई अतिक्रमण हटाने वाला नहीं है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस और प्रशासन ने जब कार्रवाई की तो पक्के निर्माण कार्य टूटते दिखाई दिये। मुखानी चैराहे पर वर्षों से बसे लोगों का तर्क है कि वह अपनी भूमि पर सालों से रह रहे हैं ऐसे में उन्हें न छेड़ा जाए। प्रशासन ने कोर्ट के निर्देश और अध्किारियों के आदेश का हवाला देते हुए जेसीबी के साथ धुंआधार कर दी। अब सवाल है कि अतिव्यस्त कालाढूंगी रोड में क्या मुखानी चैराहे पर ही अतिक्रमण हटेगा या पूरी सड़क पर नाली-नाले व फुटपाथ में मकान-दुकान बना चुके लोगों से भी सवाल किया जायेगा? प्रशासन की ओर से संकेत मिले हैं कि आने वाले दिनों में कोई नहीं छूटेगा। किसी भी प्रकार का अतिक्रमण हटना ही है।
ऐसे में, हे हल्द्वानी वासियो! अभी से तैयारी कर लो। आज नहीं तो कल बदल ही जाना है शहर का चेहरा। कहीं फ्रलाईओवर बनेगा, कहीं पार्क, कहीं काम्प्लेक्स बनेंगे, कहीं कुछ दूसरी चीज। फिलहाल मुखानी चैराहे पर दो दर्जन पक्के मकानों को जेसीबी ने ढहाया है जबकि कई लोग खतरा देख स्वयं से अतिक्रमण तोड़ने लगे हैं। कार्रवाई के दौरान एडीएम हरबीर सिंह, नगर आयुक्त चन्द्र सिंह मर्तोलिया सहा.नगर आयुक्त विजेन्द्र चैहान सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे।

हल्द्वानी के इतिहास के उम्रदार गवाह थे केशवदेव वशिष्ठ

पि.हि.प्रतिनिधि
24 मार्च 2017 को पं.केशवदेव बशिष्ट का सौ वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। अपने जमाने के पहलवान, संगीत रसिक, जाने-माने मुनीम स्व.बशिष्ट जी अपने पीछे पुत्र सूर्यदेव नाती-पोतों सहित भरापूरा परिवार छोड़ गये हैं। भाबर के हल्द्वानी बनने से लेकर अंग्रेजों के जमाने के तमाम किस्से जानने वाले बशिष्ट जी को लोग ‘मुनीम जी’ नाम से पहचानते थे। शहर के पुराने परिवारों में से इनका परिवार भी है। ;स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती, सम्पादक पि0हि0 की पुस्तक हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से में इनके बारे में कई रोचक जानकारियां प्राप्त की जा सकती हैं।
इनके पिता स्व.भीष्मदेव जी अपने समय के कवियों में से थे। वह दौर जब हल्द्वानी में दिन की रामलीला का मेला देखने को तराई-भाबर उमड़ पड़ता था, पहलवानों के दंगल लगते थे, संगीत प्रेमियों के अड्डे कोठे भी थे, फूलों के गजरे और पान के शौकीन लोग सायं को टहला करते थे। रासलीला की मण्डियां मथुरा से आया करती थीं। हरे-भरे खेत लहलहात थे और खुली नहरों की कलकल देखने को मिलती थी। उस दौर के पूरे नक्शे को याद करते हुए बशिष्ट जी ने समय के साथ अपने को समेट लिया। रामपुर रोड स्थित अपने पैतृक आवास में वह पुत्रों-भाईयों के बीच रहा करते थे। करीब साल भर से अपने पुत्र के तीनपानी स्थित मकान में वह रहने लगे थे। उम्र के इस पड़ाव में भी उन्होंने प्रातःकालीन योगक्रिया नहीं छोड़ी थी और राग-रागनियों को गुनगुनाया करते थे। पहाड़ की होली बैठक के बेहद शौकीन मुनीम जी को दुर्लभ होली रचनाएं याद थीं। होली गीतों को वह ठेठ ध्र्रे से हटकर तीनताल में गाया करते थे। हिमालय संगीत शोध् समिति के संरक्षक के रूप में वह हमेशा सक्रिय रहे और मार्गदर्शन करते थे। कलाकारों को प्रोत्साहन भी किया करते थे। छोटे कद के मुनीम जी को स्वाभिमानी और स्वावलम्बी थे। उन्होंने शहर के बड़े प्रतिष्ठित व्यापारियों के वहाँ मुनीमगिरी की और उम्र के साथ अरुचि हो गई थी लेकिन उनके अनुभव और शैली के कायल व्यापारी उन्हें छोड़ते ही नहीं थे। एक बार में एक सैकड़ा व्यापारियों की मुनीमी करना हर किसी के बूते की बात नहीं। इसके अलावा शहर में होने वाले प्रत्येक आयोजन विशेषकर संगीत कार्यक्रमों में वह दर्शक के रूप में जरूर दिखाई देते थे।
फैलते जा रहे शहर और बदलती जा रही जिन्दगी से हैरान बशिष्ट जी कहा करते थे- ‘जिन्दगी में सारी लपेट चलती रहेगी। अपने साथ शामिल बाजा भी होगा लेकिन सर्तकता अपनी करनी है। कोई भरोसा नहीं कब क्या हो जाए।’ पिघलता हिमालय कार्यालय, शक्ति प्रेस छापाखाना उनका प्रमुख अड्डा था।
बुजुर्गवार पं.केशवदेव बशिष्ट जी अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी स्मृतियां हमेशा बनी रहेंगी। हल्द्वानी शहर के पुराने परिवारों के रूप में उनकी जड़ें हमेशा सक्रिय रहेंगी। उनके पुत्र, बहू, नाती-पोते सभी मिलकर स्व.बशिष्ट जी की यादों को उनके बताये रास्तों को अपनायेंगे। जब-जब हल्द्वानी का इहिहास पढ़ा जायेगा, इनका स्मरण होना ही है। युवाओं को प्रोत्साहित करने वाले बुजुर्ग स्व.बशिष्ट जी को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजलि

पिघलता हिमालय 17 अप्रैल 2017 अंक से।

उनकी ‘प्रेरणा’, उनका सर्जन, हमेशा हमारा और हमारे समाज का पथ आलोकित करता रहेगा…….

स्व.आनन्द बल्लश्रभ उप्रेती

प्रो0देवसिंह पोखरिया
‘प्रेरणा’ स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती ;संस्थापक/सम्पादक पिघलता हिमालयद्ध की कविताओं का संग्रह है। ये उनकी 1965 से 1995 के बीच लिखी गई कविताएं हैं। विश्व प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डाॅ.हेम चन्द्र जोशी के सानिध्य में रहे उप्रेती जी अक्सर नैनीताल में उनके साथ का उल्लेख करते थे। डाॅ.जोशी को गुरु के रूप में मानने वाले उप्रेती जी उनसे पर्याप्त प्रभावित हुए थे, वे उनके प्रेरणा स्रोत थे। सुमित्रानन्दन पन्त जैसे महान कवि का जीवनवृत्त व कृतित्व उनकी साहित्यक अभिरुचि को गहरा करता रहा है। युवावस्था में अपने मित्रा अच्छेलाल ‘पथिक’ के साथ रुद्रपुर में ‘प्रेरणा’ नामक कविता संग्रह प्रकाशित करने वाले उप्रेती जी ने इससे पूर्व अल्मोड़ा में अपने शिक्षार्जन के दौरान काव्य रचनाकारों  की संगत की। अल्मोड़ा से आगरा और फिर लौटकर तराई के दानपुर-रुद्रपुर तक के सफर में काका हाथरसी जैसे कवियों का साथ उन्हें लगातार लिखने को उकसाता रहा। हल्द्वानी में भी कविता-पाठ का दौर चलता रहा और उन्होंने इस बीच कई कविताओं की रचना की।
स्व. आनन्द बल्लभ उ्रप्रेती जी के सुपुत्र डाॅ.पंकज उप्रेती ने उक्त कालखण्ड में लिखी गई उनकी कविताओं को ‘प्रेरणा’ के दो खण्डों में विन्यस्त कर इस संग्रह को रूपाकार दिया है। खण्ड-एक में 25 तथा खण्ड-दो में 23 कविताएं संगृहीत हैं। आनन्द उप्रेती बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार थे। कहानी, उपन्यास,व्यंग्य, कविता और पत्रकारिता कोई भी विध उनकी कलम से अछूती नहीं रही। एक पत्रकार की पैनी दृष्टि सम्पूर्ण कटाक्ष के साथ हमेशा हर विध में उनके साथ चलती उसी में अंतरनुस्यूत मिलती है। उप्रेती साहित्य को ईमानदारी से जीते हुए एक भुक्तभोगी के यथार्थ में लपेट कर उसे प्रस्तुत करते हैं।
इस संग्रह के खण्ड-एक की कविताओं में प्रकृतिपरकता, भावुकता, स्वाभाविकता, जिज्ञासा, सुकोमलता, मनुष्य मात्रा को उद्बुद्ध करने के भाव व्यक्त हुए हैं। दुख ही सुख को मापने का पैमाना है। कहीं जयशंकर प्रसाद जैसी भावाकुलता है, तो कहीं ‘मैं बजरी की बेटी हँू’ कविता निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ कविता की याद ताजा कर देती है, इसमें मानवीय सम्वेदना की चरम परिणति परिलक्षित होती है-
‘‘माँ बजरी ने बजरी मैं पैदा कर बजरी बना दिया,
बजरी में ही खेल-खेल कर बजरी कूटा करती हँू।
‘जंगल और वीरानों में’ कविता में अध्किारियों से लेकर संसद तक की देश की बदहाल स्थिति का चित्राण हुआ है। कवि दुखी है कि समाज के असली लुटेरे अब जंगलों में नहीं समाज के बीच ही रह कर सभ्यता का मुखौटा पहन कर उसे लूट रहे हैं।
‘सब कुछ लिख कर भेजना भाई’ जैसी कविता ग्रामीण जीवन के अभावों और समस्याओं को सिद्दत से चित्रित करती है। बेशर्मों पर कवि ने निर्मम एवं निष्ठुर व्यंग्य किया है-
‘‘मेरे दरवाजे के ठीक सामने
नंग धड़ंग प्रजातंत्र लेट गया है
उसकी नाक पर उग आया दरख्त
अपनी बाहें फैलाता…..’’
कवि कहीं सरस्वती के वरद् पुत्रा सुमित्रानन्द पन्त को नमन करता है और कहीं नये काव्य और छन्द ज्ञान शून्य अकवियों पर व्यंग्य करता कहता है-
‘‘जब से नागपफनी घर आई, तुलसी का विरवपा जंगल में
तब से मेरी चुभन नई है, उखड़ी सी हर सांस नई है
नागफनी पर गीत लिख रहे, छन्द लिख रहे नये अकवि हैं
तुलसी का सूना बृन्दावन, नई उदासी नया दर्द है….।’’
हताशा, निराशा, अभाव और संघर्षों के बीच भी उप्रेती दुधर््र्ष जिजीविषा के साथ कुछ नया करने की चाह रखते हैं। उनके इस दर्शन को ‘मेरा हर दिन नया वर्ष है’ कविता रूपायित करती है।
मुक्तिबोध् की फंतासी और नागार्जुन का लोक जीवन का चित्राण कवि की अंधेरे ने निगल लिया’ कविता में एकत्र एकसाथ अन्तर्भूत-सा लगता है। और यह भी कि दलित-दुर्बल-दीन-हीन के साथ सूरज भी छल करता है-
‘‘लाख मशालें लिये ढूंढता रहा आसमान
रमजनियां बरसतिया की झोपड़ी में
फुटपाथ पर लेटे
अनाम दुदमुंहे छोरे के सूखे होंठो में
किसी बहसी दरिन्दे द्वारा
उघेड़ी लिजलिजी टागों में
उसे सूरज नहीं मिला
मशालें बुझा कर
थका-हारा सोने को ही था आसमान
ठगिनी के अड्डे से सूरज बाहर निकल आया….’’
पर सूरज के उगने की बलवती आशा कवि को कमजोर नहीं पड़ने देती। ‘वातायन के बंद न कर तू द्वार बावरी’ कविता गीतात्मकता एवं ग्राम्य चित्रण की दृष्टि से नागार्जुन की कविताओं की टक्कर की है। ‘बिदका हुआ सांड’ में कवि ने सांड को निद्र्वंद्व अराजक गुण्डे के और तितली को आम आदमी के नव्य प्रतीक के रूप में चित्रित किया है। कुछ कविताएं स्वार्थलिप्सु, अपना घर भरने वाले लोभी डाॅक्टरों पर लिखी गई हैं। कुछ समर्थ लोग ‘दिशाहीन सूरज’ को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं। कुछ कविताएं सम्वाद करती-सी लगती हैं। इनमें ‘कब्र का हाल’, ‘आसमान कहाँ है?’ आदि उल्लेखनीय हैं। सामयिक परिवेश के जीवंत चित्राण की दृष्टि से ‘बोलना छोड़ दिया है’ कविता छोटी होते हुए भी प्रभावशाली है। बसंत में मिनिस्टर के दौरे के कारण कोयल तक बोलना छोड़ देती है। असहिष्णुता के माहौल में दहशतजदा लोग व्यर्थ की अफवाहों से खौपफ के मंजर में जिन्दगी बसर करते हैं, पर कवि हताश नहीं होता। आक्रोश है, किन्तु आशा भी कम बलवली नहीं, कवि को हँसती धूप का जमीन में उतर आने का इंतजार है।
कवि नए प्रतीकों के द्वारा वन बिल्लों के शाकाहारी होने और तुलसी के वृंदावन में नागफनी के पलने की बात स्वीकार करता है। वह पत्रकार के व्यंग्य-कौशल को कविता में प्रविष्ट करा कर उसे और धरदार बना देता है। प्रजातंत्रा में वैयक्तिक स्वातंत्रय और अध्किारों के बदले सौदेबाजी को लेकर वह तंज है, आज शेरों के बाड़े में ‘कुत्तों का पहरा’ है। भगतसिंह को याद करते हुए वह वर्तमान प्रजातंत्र पर सवाल खड़े करता हुआ कहता है कि आज भगतसिंह होते, तो वे डाकू और आतंकी घोषित होते और जेल में होते। आज लोग जिन्दा लाश हो गए हैं। उनमें दीन-ईमान शेष नहीं रह गया है, न प्रतिरोध् की कोई ताकत रह गई है। ‘भ्हगत सिघा’ कविता में आज के नेताओं पर व्यंग्य किया गया है। खण्ड-एक की कविताओं में श्रृंगार तिरोहित-सा है।
खण्ड-दो की पहली कविता ‘प्रेरणा’ है। इस कविता के आधर पर ही प्रस्तुत संग्रह का नामकरण किया गया है। गीत-योजना एवं विरहाकुल भावाभिव्यंजना की दृष्टि से यह कविता महादेवी वर्मा की कविताओं का स्मरण दिलाती है। प्रिय की पे्ररणा दग्ध्-अंगारों में चल कर कवि के कर्मपथ की राह प्रशस्त करती है। इस खण्ड की कविताओं में भावप्रवणता का अतिरेक दिखता है। प्रकृति में कवि मिलन के दृश्य देखता है, उसके कल्पना-प्रसून प्रकृति के उपवन में ही खिलते हैं, वह ‘प्रेम का भूखा’ है। ‘हलचल’ आदि कई कविताओं में छायावादी भावाकुलता दिखती है, साथ जीवन-सत्यों का उद्घाटन भी होता है। मांसलता और भोग के प्रति सावधनी भी बरती गई है। ‘कौन यह बाला’ एक लम्बी प्रेमपरक प्रबन्धात्मक कविता है। इसमें इंदु-बाला का रूपक बांधते हुए कवि ने सूर्य और इंदु के प्रेम को व्यंजित किया है, चाँदनी के पट से नभ रूपी सेज पर वह प्रिय सूर्य को निहारा करती है। वसुध, उषा, संध्या, रात्रि आदि का मानवीकरण कर कवि द्वारा इन सबका मनोहारी वर्णन किया गया है। कवितांत में नित्य मिलन की आशा में दो प्रेमी हृदय नित्य प्रतीक्षा में रहते हैं। क्या इन प्रेमियों का कभी मिलन होगा? क्या सूर्य का आत्म-समर्पण सार्थक होगा? इसका उत्तर पूरी कविता को पढ़कर ही मिलता है। कवि का विश्वास है कि जीवन में प्यार ही सब कुछ है, संसार की सम्पूर्ण शान्ति प्यार में ही निहित है। यह प्यार केवल प्रिय-प्रिया का प्यार नहीं अपितु प्यार के वृहत्तर अर्थ को व्यंजित करता है। विछोह, प्रियतम से मिलन की आकांक्षा, नयनों का व्यापार- उन्मीलन- निमीलन सुखद प्रेम की मध्ुर स्मृति की व्यक्तिनिष्ठता समष्टिगत प्रेम में पर्यवसित होकर उदात्त रूप ग्रहण कर लेती है। तब कवि ओज और वीरता के भावों से ओतप्रोत होकर ‘होइए तैयार’ कहता राष्ट्र प्रेम के गीत गा उठता है-
देखंे कौन हमारे सन्मुख
अब पल भर भी टिकता है।
हम सपूत, इस पावन-भू पर-
बलिदानी बेड़ा उठता है।
इस हरित-धरा के शुभ्र-क्रीट पर
आघात वक्ष पर झेले हैं।
बलिदानों के खिलवाड़ हुए नित
तन मिट्टी से मिले हुए हैं।
मनुष्य के विकास की कहानी केवल भौतिकजन्य ही नहीं, सचेतन भी है। अपने समाज के चैतन्य का जागरूक प्रहरी साहित्यवेत्ता ही होता है। वह मनुष्य मात्र को जागरण संदेश देता है, साथ ही मनुष्य की अन्तर्दृष्टि जगाने का आह्वान करता है। उप्रेती की ‘खोल रे कपाट खोल’ कविता इसी सत्य को समुद्घाटित करती है। कवि प्रकृति के आलम्बन चित्राण को माध्यम बना कहता है-
‘‘खोल रे कपाट खोल
रे मनुज कपाट खोल,
लाल हो उठे कपोल-
भोर के विभोर छोर।
तम दिया झकोर घोर
नागरी उषा विभोर।’’
क्षणभंगुरता यदि क्षणिक और सुगंध् प्रफुल्लता प्रदान करे तो वह आनन्द कई जन्मों से भी श्रेष्ठ है। कवि की खण्ड-दो की कविताएं गम्भीरता, उदादत्ता, संप्रेषणीयता एवं भाव-सौंदर्य की दृष्टि से अधिक अर्थपूर्ण हैं। ‘तम हृदय कगार पर’ जलद-नयन उमड़-घुमड़ कर विद्युत दीप बुझा देते हैं, पर ‘बचपन की याद’ अल्हड़ता की सुमधुर स्मृतियों का स्मरण करा जाती हैं। ‘कलियों की चाह’ के बहाने किशोर और युवा हृदय खिल उठता है, मन-भ्रमर पिंग पराग के लिए पुष्प-पुष्प पर जाकर डोलने लगता है। ‘जैसे सैंध् लगाने चल बैठा हँू’ थोड़ी लम्बी कविता है। इसमें सूर्य का मानवीकरण और आलम्बन चित्राण हुआ है। निशि सूर्य से उषा सुन्दरी की माँग भरवाती है। शशि, उषा पात्रा के रूप में कविता चित्रित है। कविता में सम्वाद, अलग-अलग स्थान, स्थितियां और बिम्ब चलचित्र की भाँति देखते ही बनते हैं।
वस्तुतः कविता मानव के सुख-दुखात्मक जीवन की जीवित अनुभूति का मूर्त रूप होती है, सम्वेदन ही व्यक्ति के अंतःकरण से सामंजस्य स्थापित कर उसे हृदयग्राही बनाते हैं। ‘एक भारतीय सैनिक की आत्मा’ कविता इसी प्रकार के संवेदनों से संवेदित है। यह राष्ट्रीयता एवं देशभक्ति से परिपूर्ण एक प्रभावशाली कविता है। चीनी चैकी पर तैनात सैनिक अपनी परिवेशगत स्थिति का चित्रण करता अपनी वृद्ध माँ को एक भावपूर्ण पत्रा लिखता है। यह कविता सैन्य-जीवन की एक बलिदान गाथा है। एक सैनिक किन विषम परिस्थितियों में सीमा पर अटल प्रहरी बन कर देश की रक्षा करता है, इसका चित्रण करते कवि लिखता है-
‘‘पर्वत की चोटी पर
छोटा सा टैण्ट है
बहता समीर झकझोर कर-
जाड़ों का,
हिलता है टैण्ट तो,
हिल जाता दिल भी
काँपते हैं हाथ
काँप जाती लेखनी भी।
वह वृद्ध माँ, तरुणी पत्नी को अपना अन्तिम बलिदानी ओजपूर्ण सन्देश इस प्रकार भेजता है-
‘‘होगा कलंकित
कैसे तुम्हारा दूध्,
जब तक तुम्हारा पूत
जीता जगत में।
यह एक उदात्त प्रबन्धत्मक लम्बी कविता है, जिसे भाषा, भाव और वर्णित लय की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद की ‘शेर सिंह का शस्त्र समर्पण’ कविता के समकक्ष रखा जा सकता है।
‘कविते तेरा साथ न होता’ इस खण्ड की एक अन्य महत्वपूर्ण कविता है, जिसमें काव्य की व्यापकता और उसका महत्व प्रतिपादित करते हुए कवि कहता है- फूलों में मध्ु व सुवास, शशि में प्रकाश, वन में मध्ुट्टतु, कलियों में विकास, सरिता में लहर, सागर में उछाह, निर्झर में नीर, यौवन में सौन्दर्य, वनस्पतियों व फूलों में रंग, पपीहे की ‘पिउ’, कोयल की मल्हार सब कविता के कारण ही- उसके सानिध्य में ही सम्भव हुई है। कविता न होती, तो विहँसती भोर, सरसों का स्पंदन, सम्पूर्ण जगत का व्यापार और मनुष्य में मनुष्यता कुछ भी न होती। इस कविता में जीवन की समग्रता में कविता का मूल्यांकन हुआ है।
‘किसान बाला’ सुमित्रानन्दन पन्त की ग्राम्य बाला जैसी सुन्दर, सरल हृदय युवती का चित्राण है। यह एक लम्बी प्रबन्धत्मक कविता है। अभावग्रस्त होने पर भी कवि ने जीवन को सबसे मध्ुमय, सबसे सुखमय माना है। कवि ‘किसान बाला’ का चित्राण इन शब्दों में करता है- ‘‘गेहँू की बाली बोल उठी-
‘तू सजल सरोवर में विकसे,
मकरन्द, कुमुदनी की सारी,
तू बता कौन है इस जग में,
तुम सी पुनीत सुन्दर नारी?
फूलों की शैय्या पर सोना,
क्या इस को ही कहते जीवन?’’
कली खिल कर जैसे फूल बनती है, वैसे ही उस युवती का स्वप्न तब साकार होता है, जब वह एक सैनिक की पत्नी बनती है। उसके समस्त अभाव भावों और सारे दुख, सुखों में पर्यवसित हो जाते हैं। ‘नयनों का व्यापार यहाँ’ कविता में कवि ने जहाँ एक ओर छलना एवं प्रवंचना को चित्रित किया है, वहीं यह भी प्रतिपादित किया है कि समस्त भोगलिप्साएं इहलोक तक ही सीमित रह जाती हैं। ‘ताजमहल’ कविता में प्रगतिवादी जीवन मूल्यों का चित्राण करते हुए कवि साहिर लुधियानवी की तर्ज पर कहता है कि यह पे्रम का प्रतीक नहीं शोषितों के खून पसीने के गारे और बेगारी से बना भवन है, जिसमें सैकड़ों गरीबों की आह दबी है। शाहजहाँ के इस कथन में कविता अपनी चरम परिणति को प्राप्त करती है-
‘‘ताज को बना करके,
मैंने जो पाप किया,
मुझ सा अधम-नीच
जग में न कोई है,
मेरी मुमताज आज
ताज में ही सोई है,
दिल में यदि होती तो
ताज क्यों बनाता मैं?’’
कविता में शाहजहाँ और मुमताज के सम्वाद उसे गत्यात्मक और नाटकीय बना देते हैं। ‘हे पूज्यनीय’ कविता विश्वप्रसिद्ध भाषाविद् डाॅ.हेमचन्द्र जोशी को समर्पित है। व्यक्तिनिष्ठ होने पर भी इस कविता में डाॅ.जोशी का स्मरण करते हुए कवि ने भाषाविद् और आलोचक का क्या दायित्व है, इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा है कि सच्चा समीक्षक ही लूले-लँगड़े साहित्यकारों को सहारा देकर उन्हें चलना सिखाता है। आलोचना की मध्ुरिम छाया में ही साहित्यकार भाषा की औषधीय घुट्टी पीकर बड़े होते हैं।
कविता न दार्शनिकों के दर्शन का विषय है,न अर्थशास्त्रिायों का यथार्थ। सत्य के समुद्घाटन, सौंदर्य के प्रस्थापन के साथ ही वह शितत्व का मार्ग प्रशस्त करती है, ‘आ अब उजली राह बना दे’ कविता मेें इसीलिए कवि प्रकाश को पुकारता है, जिससे मानवता की राह उज्जल हो सके।
‘प्रेरणा’ संग्रह के काव्य-शिल्प पर कुछ कहना प्रासंगिक होगा। इस संग्रह की कुछ कविताएं गीतात्मक हैं और कुछ मुक्त एवं गद्यच्छंद में निब( हैं। सरसी, ताटंक, वीर, पदपादाकुलक, मनोरमा आदि पारम्परिक छन्दों और उनकी लयों में कविताएं विन्यस्त हैं। गद्यच्छंदों में पद-मैत्राी और अर्थलय निहित है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि सादृश्यमूलक अलंकार कविताओं में प्रकृतितः समाविष्ट हो गए हैं। भाषा तत्समबहुला है, पर जन-प्रचलित अरबी-फारसी के शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। लाक्षणिकता भी पर्याप्त है। अवसरानुकूल मुहावरों और कहावतों का सटीक प्रयोग हुआ है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि उप्रेती जी ने जितनी ईमानदारी से अन्य विधाओं में सर्जना की है, उतनी ही ईमानदारी कविता रचना में भी दिखाई है। यश और अहंमन्यता से परे उनका समग्र व्यक्तित्व ही इन कविताओं में प्रतिफलित होता लगता है। वे एकाएक इतनी जल्दी और खड़े-खड़े हमारे बीच से चले गए, पर उनकी ‘प्रेरणा’, उनका सर्जन, हमेशा हमारा और हमारे समाज का पथ आलोकित करता रहेगा। उनकी रचनाओं के बहाने इन शब्दों में श्रद्धा-सुमन व्यक्त करते हुए मैं इस अवसर पर उन्हें नमन करता हँू। डाॅ.पंकज उप्रेती को साधुवाद देता हँू कि ‘प्रेरणा’ संग्रह के रूप में स्व.उप्रेती जी की कविताओं का विग्रह सम्मुख आया। आशा करता हँू, यह कविता संग्रह हिन्दी जगत में समादृत होगा।

पिघलता हिमालय 22 फरवरी 2016 के अंक में ‘पेरणा’ पुस्तक की समीक्षा

ट्रेडिल मशीन में हैल्पर तक बनी वह

स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व. कमला उप्रेती

डाॅ.पंकज उप्रेती
किसी की जिन्दगी पूरी तरह संग्राम बन जाती  है और इस संग्राम में जो लड़ता है वह योद्धा है। ऐसी की योद्धा ही ईजा। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी अनगिनत कहानी मुझे याद हैं। ‘पिघलता हिमालय’ को बनाने में ईजा का घोर संग्राम रहा है। यह कहानी 1964 से शुरु हो जाती है जब पिता स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी ने छापाखाना खोला होगा। मैंने ईजा-बाबू के मुँह से ही सुना था- ‘पहले छापाखाने की बहुत इज्जत थी।’ इस इज्जत को मैंने देखा भी। ‘शक्ति प्रेस’ नाम से हमारा छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास मेें चार सबसे पुराने छापाखानों में से है। पिता ने बाईडिंग, परफेटिंग, रूलिंग, कम्पोजिंग, मशीनमैन हर प्रकार का काम किया था। इसी छापेखाने में हमारी बहुत बड़ी ट्रेडिल मशीन हुआ करती थी, पूरे ट्रक के बराबर। जिसमें दैनिक पिघलता हिमालय भी छपा। बाद में छोटे आकार की ट्रेडिल मशीन वगैरह भी प्रेस में लगाई गईं। इन मशीनों में अनगिनत मशीनमैन, कम्पोजिंग में अनगिनत कई आज नये प्रकार की प्रिटिंग तकनीक के साथ सफल हैं।

बचपन की याद याद आती है, जमाना भला था। तब छापाखाने में प्रतिस्पदर्धा नहीं थी और शादीकार्ड, बिलबुक इत्यादि के ग्राहकों के अलावा लिखने-पढ़ने वालों का अड्डा छापाखाने ही हुआ करते थे। आजकल तो प्रिंटिंग प्रेस लिखना आसान हो चुका है। और प्रतिद्वंद्वी अपने ग्राहकों को ढूंढने के लिये दौड़ते हैं, सरकारी काम के लिये तिकड़मबाजी करनी पड़ती है। उन दिनों हल्द्वानी पोस्टर, पर्चे, कार्ड छपवाने वालों में आन्दोलनकारी, समाज सेवी, पुस्तकें-पफोल्डर-पर्चे छपवाने के लिये लेखक, कुछ खास-खास लोग शादीकार्ड छपवाने के लिये छापेखाने तक आते थे। प्रेस की बड़ी जिम्मेदारी थी और लोगों को भरोसा था कि उनकी गलतियां भी सुधर कर छपेगा। तब एपफएस, एपफोर, एथ्री जैसे कागज साइजों को नहीं जानते थे बल्कि रिमों के साइजों के बाद कागज कटिंग होती थी। आज भी बड़े छापेखानों में यही होता है। खैर, बात पिघलता हिमालय की हो रही थी। 1978 में पिघलता हिमालय शुरु हुई, तब मैं 6 साल का था। बहुत उत्साह था पिता आनन्द बल्लभ ज्यू और हमारे चाचा दुर्गा सिंह मर्तोलिया में। इनका जोश अखबार को दैनिक में तक बदल गया। लेकिन जीवन के संग्राम में यह उलझ कर रह गये। दुर्दिनों की वह कहानी बहुत लम्बी है, फिर कभी लिखूंगा।

ईजा कमला उप्रेती ने पिता के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर छापाखाना और अखबार सींचा। लोहे की उन भारी मशीनों की खटखट आवाजों में कागज को मशीन में लगाने और उठाने में सावधानी चाहिये। कई ऐसे अवसर थे जब ईजा मशीनमैन पिता के साथ हैल्पर बनी। तब आजकल की तरह सुविधाएं और साधन भी नहीं थे। डाक से जाने वाले अखबारों में पते लिखने में भी ईजा सहायक थी। अखबार की प्रूफरीडिंग का काम भी वह करती और कभी लिखने बैठ जाती।
मन में विचार आता है कि पत्रकारिता के उस जमीन में कितनी पवित्रता थी। पत्रकारिता का मिशन था, आन्दोलन था, सामाजिक चेतना का प्रतीक था। अब ईजा हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी जिद, उसकी लगन, उसका संघर्ष हमें याद दिलाता रहेगा कि योद्धा संग्राम में विचलित नहीं होते। उन यादों में खुशी के साथ आँसू और साहस है।

पिघलता हिमालय की सम्पादक कमला उप्रेती का निधन

ईजा, तुमसे जिन्दा है ये यह…….

डाॅ.पंकज उप्रेती
15 सितम्बर 2018 प्रातः 9 बजे पिघलता हिमालय की सम्पादक श्रीमती कमला उप्रेती निधन हो गया। ईजा सम्पादक के रूप में ही नहीं आन्दोलनकारी व पत्राकार के रूप में जिन्दगीभर सक्रिय रही। बीमारियों से लड़ते-लड़ते अपने मिशन के लिये जूझने वाली ईजा से ही जिन्दा था ‘पिघलता हिमालय’ और इन्हीं की यादों के साथ चलाने का संकल्प लिया है।
पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के बाद इस समाचार पत्रा को जिन्दा रखने की चाह में उन्होंने अपनी जिन्दगी की परवाह नहीं की। पति के निध्न के बाद सदमे से घायल हो चुकी श्रीमती उप्रेती बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाते रहीं। वैसे तो ईजा मौत के मुंह में कई बार जा चुकी थी लेकिन 22 पफरवरी 2013 पिता आनन्द बल्लभ जी के निध्न के समय से टूट चुकी ईजा को 6 माह के भीतर फालिस/लकुवा पड़ गया और उनके बांये हाथ-पैर में परेशानी हो गई थी। हर दिन दवाईयों के सहारे खड़े होने वाली ईजा ने हिम्मत नहीं हारी और अपने मिशन और अपने कर्तव्यों के साथ घर में बच्चों का मार्गदर्शन करती थीं। वर्तमान की पत्राकारिता पर वह चिन्तित थी और परेशानी में गुजारे हुए अपने पुराने दिनों का स्मरण करती रहती थी। अस्वस्थ्य होने के बाद भी ईजा की इच्छाएं अपनों के बीच घिरी थीं और प्रातः 4 बजे से नियमित रूप से फोन पर जगह-जगह सम्पर्क कर कुशलबात पूछना उनकी आदत में था। अस्वस्थ्य होने के बाद वह अल्मोड़ा, रानीखेत, गंगोलीहाट, मसूरी तमाम जगह मिलने के लिये पहँुची। उत्तरायणी में रानीबाग में कत्यूरियों की जागर हो या जोहार महत्व में ढुस्का, ईजा जरूर जाती। अपने स्वास्थ्य को देखते हुए वह चुपचाप जाकर दर्शक दीर्घा में पीछे से बैठ जाती, यदि किसी ने पहचान लिया तो कहती- ‘मेरी बजह से कार्यक्रम में कोई दिक्कत न हो, इसलिये पीछे बैठ गई है। चिन्ता मत करो। कार्यक्रम जारी रखो।’ हिमालय संगीत शोध् समिति के अध्यक्ष के रूप में उनका संरक्षण था। युवा कलाकारों द्वारा की रही तैयारियों को देखने के लिये वह कक्षाओं में तक जाती और होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों में मौजूद रहती थी। वह अपने पीछे पुत्र पंकज, ध्ीरज, पुत्रबध्ू गीता, आरती, पौते आशुतोष, उत्कर्ष, नवीन, पुत्री मीनाक्षी जमाई अशोक जोशी सहित भरापूरा परिवार छोड़ गई हैं।
कमला देवी का जन्म 16 नवम्बर 1951 को माता श्रीमती इन्द्रा व पिता ज्वालाप्रसाद पाण्डे जी के घर रानीखेत में हुआ। पफाल्गुन 5 गले 1971 को इनका विवाह आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ हुआ। शिक्षित होने के बाद भी उन्होंने उस दौर में सरकारी नौकरी नहीं की और उप्रेती जी के साथ उनके छापाखाना ष्शक्ति प्रेसष् में सहयोग किया। वह दौर जब अखबार टेªडिल मशीन में छपा करते थेए उसकी प्रूपफ रीडिंग से लेकर मशीन में कागज उठानेए अखबार मोड़ने तक का कार्य मिशन के रूप में किया। जीवन को संग्राम के रूप में देखने वाली श्रीमती उप्रेती ने अस्वस्थ्य होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और हमेशा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये। जीवन भर संघर्ष में घिरे परिवार की परम्पराओं को दृढ़ता के साथ पूरा करने वाली ईजा अपनी प्रतिब;ता के साथ कभी भी किसी राजनैतिक पार्टी से नहीं जुड़ी। जबकि तमाम पार्टियों के शीर्ष नेताओं द्वारा उन्हें सम्मानपूर्वक पार्टी में आने का अनुरोध् किया जाता रहा। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के रूप में वह सक्रिय रही हैंए जिसके लिये शासन द्वारा इन्हें राज्य आन्दोलकारी का प्रमाण पत्रा दिया गया। इनके संचालन में महिलाओं ने कई बड़े आयोजन किये। जनमुद्दों व तमाम महिला संगठनों के आयोजनों में इनकी भागीदारी रही है। घर.परिवार की जिम्मेदारी के के साथ पत्राकारिता के मिशन को इन्होंने बनाये रखा। पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में अपनी निष्पक्ष पत्राकारिता को संरक्षण दे रही थीं। ईजा के निधन हमारे लिये सबसे बड़ा आघात है।

स्थापना के 41वें साल में

कमला उप्रेती
इस अंक के साथ ही ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के 41वें साल में पहँुच चुका है। सन् 1978 में स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया ने जिस साहस और दृढ़ता के साथ इसकी शुरुआत की वह आज भी नियमित रूप से आपके सामने है। अब तक के 40 सालों में कई उतार-चढ़ाव इसने देखे हैं लेकिन वह मिशन जिसके लिये इसे स्थापित किया गया था जारी है। ऐसे समय में जबकि संचार व समाचार के अनगिनत साधन हैं, पिघलता हिमालय जैसे छोटे समाचार पत्रा को बनाये रखना चुनौती है। फिर, स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया के मिशन पर इसे बनाये रखना और भी कठिन है लेकिन इस मिशन को चुनौतियां स्वीकार हैं। यही कारण है कि समाचार-विचार की दुनिया को रंगीन बनाकर परोसने के बजाए अपनों को जोड़ने का यह साधन है।

दुर्गा सिंह जी मात्रा 49 वर्ष आयु में इस दुनिया से विदा हो गये थे और उप्रेती जी भी 69 वर्ष आयु में हमें छोड़कर चले गये। उनके मिशन में निर्भीकता और स्वाभिमान था। वर्तमान की पत्रकारिता में मिशन के साथ चलने वाले गिने जा सकते हैं। इनसे न तो तिकड़मबाजी होती है और न ही जीहजूरी। इस मिशन पर चलते हुए कई दिक्कतें पिघतला हिमालय के सामने भी हैं। दिनोंदिन बढ़ती जा रही प्रतिस्पद्र्धा के बीच समय से इस पाती को परोसते हुए हमें लगता है स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया जी हमारे बीच हैं। उन्हीं का स्मरण करते हुए लगातार इसे आकर्षक बनाने की कोशिश की जा रही है। साधनों के आभाव के बावजूद दूरस्थ क्षेत्रों तक अपने प्रिय पाठकों के बीच पिघलता हिमालय पहँुच रहा है। इसे आॅनलाइन पढ़ने की व्यवस्था भी की गई है ताकि दूर तक समय से हमारा सन्देश पहँुचे और नई तकनीक से जुड़ी युवा पीढ़ी अपने प्रिय पत्र को आसानी से पढ़ सके। इस बार से यूट्यूब चैनल भी पिघलता हिमालय का जारी हुआ है।

सरकार चाहे जो भी रही हो, सबका ध्यान अपना मौका भुनाना रहा है। यही कारण है कि सरकार की विज्ञापन नीति में छोटे-मझले समाचार पत्रों को अवसर नहीं दिया जा रहा है। विज्ञापन का स्वाद बड़े मीडिया घरानों को लगाया जाता है ताकि नेताओं के बड़े और रंगीन पफोटो प्रिंट मीडिया में छपें और इलक्ट्रोनिक मीडिया में दिखाये जाते रहें। इसे मीडिया मैनेजमेंट कहा जाता है और झूठ को सच और सच को झूठ की पतंग बनाकर उड़ाने वाले सक्रिय रहते हैं। स्थानीय स्तर पर भी छुटभैय्यों के चुग्गे पर पत्राकारिता करने वाले तेजी दिखाने लगे हैं। इस प्रकार के वातावरण में मिशन की पत्रकारिता सिर्फ अपने पाठकों के बल पर की जा सकती है।

प्रिय पाठको! आप ‘पिघलता हिमालय’ परिवार हो, आप ही इसके प्रतिनिधि हो, आप ही इसके विज्ञापनदाता हो, आप ही इसके प्रचार-प्रसार वाले भी। तभी आज ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के चालीस साल पूरे कर चुका है। इसका सारा मैनेजमेंट सीमान्त से लेकर तराई-भाबर तक पफैले हमारे शुभचिन्तक हैं। उन स्थितियों में जब साप्ताहिक पत्रों का रिवाज ही लडखड़ा चुका है, पाठकों में पिघलता हिमालय का इन्तजार इसकी गहरी जड़ों को सि( कर रहा है। इसके पाठकगण एक परिवार के रूप में जुड़े हैं, उनका भावनात्मक लगाव इससे जुड़ने और अपनी अगली पीढ़ी को जोड़ने में सहायक है। आपका यही स्नेह हमारा बल है।