ईजा, तुमसे जिन्दा है ये यह…….
डाॅ.पंकज उप्रेती
15 सितम्बर 2018 प्रातः 9 बजे पिघलता हिमालय की सम्पादक श्रीमती कमला उप्रेती निधन हो गया। ईजा सम्पादक के रूप में ही नहीं आन्दोलनकारी व पत्राकार के रूप में जिन्दगीभर सक्रिय रही। बीमारियों से लड़ते-लड़ते अपने मिशन के लिये जूझने वाली ईजा से ही जिन्दा था ‘पिघलता हिमालय’ और इन्हीं की यादों के साथ चलाने का संकल्प लिया है।
पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के बाद इस समाचार पत्रा को जिन्दा रखने की चाह में उन्होंने अपनी जिन्दगी की परवाह नहीं की। पति के निध्न के बाद सदमे से घायल हो चुकी श्रीमती उप्रेती बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाते रहीं। वैसे तो ईजा मौत के मुंह में कई बार जा चुकी थी लेकिन 22 पफरवरी 2013 पिता आनन्द बल्लभ जी के निध्न के समय से टूट चुकी ईजा को 6 माह के भीतर फालिस/लकुवा पड़ गया और उनके बांये हाथ-पैर में परेशानी हो गई थी। हर दिन दवाईयों के सहारे खड़े होने वाली ईजा ने हिम्मत नहीं हारी और अपने मिशन और अपने कर्तव्यों के साथ घर में बच्चों का मार्गदर्शन करती थीं। वर्तमान की पत्राकारिता पर वह चिन्तित थी और परेशानी में गुजारे हुए अपने पुराने दिनों का स्मरण करती रहती थी। अस्वस्थ्य होने के बाद भी ईजा की इच्छाएं अपनों के बीच घिरी थीं और प्रातः 4 बजे से नियमित रूप से फोन पर जगह-जगह सम्पर्क कर कुशलबात पूछना उनकी आदत में था। अस्वस्थ्य होने के बाद वह अल्मोड़ा, रानीखेत, गंगोलीहाट, मसूरी तमाम जगह मिलने के लिये पहँुची। उत्तरायणी में रानीबाग में कत्यूरियों की जागर हो या जोहार महत्व में ढुस्का, ईजा जरूर जाती। अपने स्वास्थ्य को देखते हुए वह चुपचाप जाकर दर्शक दीर्घा में पीछे से बैठ जाती, यदि किसी ने पहचान लिया तो कहती- ‘मेरी बजह से कार्यक्रम में कोई दिक्कत न हो, इसलिये पीछे बैठ गई है। चिन्ता मत करो। कार्यक्रम जारी रखो।’ हिमालय संगीत शोध् समिति के अध्यक्ष के रूप में उनका संरक्षण था। युवा कलाकारों द्वारा की रही तैयारियों को देखने के लिये वह कक्षाओं में तक जाती और होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों में मौजूद रहती थी। वह अपने पीछे पुत्र पंकज, ध्ीरज, पुत्रबध्ू गीता, आरती, पौते आशुतोष, उत्कर्ष, नवीन, पुत्री मीनाक्षी जमाई अशोक जोशी सहित भरापूरा परिवार छोड़ गई हैं।
कमला देवी का जन्म 16 नवम्बर 1951 को माता श्रीमती इन्द्रा व पिता ज्वालाप्रसाद पाण्डे जी के घर रानीखेत में हुआ। पफाल्गुन 5 गले 1971 को इनका विवाह आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ हुआ। शिक्षित होने के बाद भी उन्होंने उस दौर में सरकारी नौकरी नहीं की और उप्रेती जी के साथ उनके छापाखाना ष्शक्ति प्रेसष् में सहयोग किया। वह दौर जब अखबार टेªडिल मशीन में छपा करते थेए उसकी प्रूपफ रीडिंग से लेकर मशीन में कागज उठानेए अखबार मोड़ने तक का कार्य मिशन के रूप में किया। जीवन को संग्राम के रूप में देखने वाली श्रीमती उप्रेती ने अस्वस्थ्य होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और हमेशा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये। जीवन भर संघर्ष में घिरे परिवार की परम्पराओं को दृढ़ता के साथ पूरा करने वाली ईजा अपनी प्रतिब;ता के साथ कभी भी किसी राजनैतिक पार्टी से नहीं जुड़ी। जबकि तमाम पार्टियों के शीर्ष नेताओं द्वारा उन्हें सम्मानपूर्वक पार्टी में आने का अनुरोध् किया जाता रहा। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के रूप में वह सक्रिय रही हैंए जिसके लिये शासन द्वारा इन्हें राज्य आन्दोलकारी का प्रमाण पत्रा दिया गया। इनके संचालन में महिलाओं ने कई बड़े आयोजन किये। जनमुद्दों व तमाम महिला संगठनों के आयोजनों में इनकी भागीदारी रही है। घर.परिवार की जिम्मेदारी के के साथ पत्राकारिता के मिशन को इन्होंने बनाये रखा। पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में अपनी निष्पक्ष पत्राकारिता को संरक्षण दे रही थीं। ईजा के निधन हमारे लिये सबसे बड़ा आघात है।

