सामाजिक आन्दोलनों में राजनीति ठुकराई कमला जी ने

टी.सी.पपनै
कमला बहिन जी से मेरा सम्पर्क सन् 1990 से था जब मैं लोक चेतना मंच से जुड़ा। बहिन जी एक प्रखर समाज सेविका के साथ महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रबल कार्यकर्ता भी थी। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से तो मेरा सम्पर्क वर्ष 1980 से था ही जब हम लोग साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर मिला करते थे। उप्रेती परिवार से मेरा पारिवारिक सम्बन्ध् रहा है। एक दुर्घटना में जब मेरा हाथ फैक्चर हुआ था और मैं अस्पताल में भर्ती था तो बहिन जी ने जिस आत्मभाव से साथ दिया मैं कभी नहीं भूल सकता।
श्रीमती कमला उप्रेती आन्दोलनों की अगुवाई में कभी अग्रिम पंक्ति में रहती थीं तो कभी सबको धकेलने के लिये पीछे अपने साथियों के साथ। आन्दोलनों में उनका यह स्वभाव ‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन’ में खूब दिखाई दिया। पृथक राज्य के लिये लड़ी गई लड़ाई में उन्हें भी आम आन्दोलनकारियों की तरह कोई गुमान नहीं था। बस, आन्दोलनकारी होने की खुशी थी। राज्य के लिये छिड़े ऐतिहासिक आन्दोलन में वह हल्द्वानी की सड़कों पर महिला शक्ति के साथ निरन्तर रहीं। होने वाली सभाओं की अध्यक्षता करते हुए वह युवा आन्दोलनकारियों को ललकाती थीं- ‘यह लड़ाई बच्चों के भविष्य की लड़ाई थी। इसका नेतृत्व स्वयं करना होगा।’
राज्य आन्दोलन के दौरान हल्द्वानी में हुए पुलिस लाठीचार्ज में घायलों में वह भी थीं। लेकिन उन्होंने प्रतिदिन होने वाले प्रदर्शन में जाना नहीं छोड़ा। राज्य बनने और उसके नाम पर सुविधा लेने वालों की होड़ कमला जी को बेचैन करती थी। वह कहतीं- ‘राज्य की लड़ाई नेता बनने के लिये थोड़ा ही लड़ी है।’ बाद को जब राज्य आन्दोलनकारियों को सरकार की ओर से प्रमाण पत्र दिये गये तो उन्हें भी इसके लिये बुलवाया गया। जब सरकार द्वारा राज्य आन्दोलनकारियों के लिये पेंशन प्रावधन किया गया, वह हँसती और कहती- ‘‘अब मैं पेंशन वाली हो गई हँू।’ क्योंकि जरूरत के समय भी उन्होंने सरकार से ऐसी याचना नहीं की थी। न ही उनके मन में कभी ऐसा विचार आया।
नेतृत्व का गुण उन्हें नेता बनाये हुआ था लेकिन अपने संस्कार और गृहस्थी के साथ सामंजस्य रखते हुए वह केवल सामाजिक आन्दोलनों का हिस्सा बनी। भ्रष्टाचार के खिलापफ वह एकदम गरज पड़ती थी। उनकी सभी महिला साथी आज उन्हें याद करती हैं, जो जानती हैं कि सामाजिक आन्दोलनों के आगे पहली जिम्मेदारी घर-गृहस्थी है। घर को संवार देना किसी भी महिला का सबसे बड़ा आन्दोलन है। वह धर्मपरायण थी लेकिन मंच सजाकर ढोंग का प्रवचन करने वालों के खिलाफ मुखर थीं। श्रीमती उप्रेती के सामने राजनीति के कई मौके आये लेकिन वह टाल गईं। वह जानती थी कि एक-एक, दो-दो व्यक्तियों की पार्टी भी उत्तराखण्ड में बनी हुई है। उत्तराखण्ड क्रान्तिदल को क्षेत्रीय पार्टी के रूप में वह पसन्द करती थीं। इसके अलावा बड़ी पार्टियों की नीतियाँ उन्हें रास नहीं आई। भीड़ एकत्रित करने के लिये वह मनोनीत होने से भी मना कर देती। हाँ, किसी भी पार्टी की जो बात उन्हें भा जाती उसमें वह समर्थन करती। इसके लिये वह भाकपा माले के प्रदर्शन में भी शामिल हुई थी। कांग्रेस के समर्थन में जुटी थीं। कांग्रेस की अकड़ पर भाजपा के नेता का समर्थन किया था। स्पष्ट निर्णय लेने वाली समाजवादी पार्टी के लिये भी वह बोली और जनता पार्टी के समय उसकी नीतियों पर भी उसके साथ थी। राष्ट्रीय दलों से कई बार उनके मनोनयन के लिये पत्रा आए लेकिन वह टाल गईं और न ही उन्होंने किसी पार्टी की सदस्यता ली। नेतृत्व के गुण होने के कारण ही वह पालिका चुनाव से लेकर संसदीय चुनाव तक बूथ में गड़बड़ करने वाले किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता को झिड़क देती थीं।
राजनीति की हलचल को परखने और जानने के बाद वह अपने मिशन पर अडिग थीं। महिला संगठनोें के साथ जुड़कर वह शिक्षा व सामाजिक कार्यों में रुचि लेती। इसके लिये कई बार उन्हें सम्मानित किया गया था। बेवाक बोलने वाली कमला जी पत्रकारिता के घराने से थीं तो उन्हें किसी भी अधिकारी या नेता से सम्वाद करने में झिझक नहीं थी लेकिन वह अपने दायरे में रहकर ही सम्वाद करतीं। सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर वह कार्यों में जुड़ी रहीं। लोक चेतना मंच की सक्रिय महिला सदस्य के रूप में उनकी भूमिका थी। पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में उन्होेंने जनपक्षीय मुद्दों को उठाया और हिमालय संगीत शोध् समिति की अध्यक्ष के रूप में बच्चों और बड़ों का मार्गदर्शन किया।
सेनि. तहसीलदार, समाजसेवी

ट्रेडिल मशीन में हैल्पर तक बनी वह

स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व. कमला उप्रेती

डाॅ.पंकज उप्रेती
किसी की जिन्दगी पूरी तरह संग्राम बन जाती  है और इस संग्राम में जो लड़ता है वह योद्धा है। ऐसी की योद्धा ही ईजा। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी अनगिनत कहानी मुझे याद हैं। ‘पिघलता हिमालय’ को बनाने में ईजा का घोर संग्राम रहा है। यह कहानी 1964 से शुरु हो जाती है जब पिता स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी ने छापाखाना खोला होगा। मैंने ईजा-बाबू के मुँह से ही सुना था- ‘पहले छापाखाने की बहुत इज्जत थी।’ इस इज्जत को मैंने देखा भी। ‘शक्ति प्रेस’ नाम से हमारा छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास मेें चार सबसे पुराने छापाखानों में से है। पिता ने बाईडिंग, परफेटिंग, रूलिंग, कम्पोजिंग, मशीनमैन हर प्रकार का काम किया था। इसी छापेखाने में हमारी बहुत बड़ी ट्रेडिल मशीन हुआ करती थी, पूरे ट्रक के बराबर। जिसमें दैनिक पिघलता हिमालय भी छपा। बाद में छोटे आकार की ट्रेडिल मशीन वगैरह भी प्रेस में लगाई गईं। इन मशीनों में अनगिनत मशीनमैन, कम्पोजिंग में अनगिनत कई आज नये प्रकार की प्रिटिंग तकनीक के साथ सफल हैं।

बचपन की याद याद आती है, जमाना भला था। तब छापाखाने में प्रतिस्पदर्धा नहीं थी और शादीकार्ड, बिलबुक इत्यादि के ग्राहकों के अलावा लिखने-पढ़ने वालों का अड्डा छापाखाने ही हुआ करते थे। आजकल तो प्रिंटिंग प्रेस लिखना आसान हो चुका है। और प्रतिद्वंद्वी अपने ग्राहकों को ढूंढने के लिये दौड़ते हैं, सरकारी काम के लिये तिकड़मबाजी करनी पड़ती है। उन दिनों हल्द्वानी पोस्टर, पर्चे, कार्ड छपवाने वालों में आन्दोलनकारी, समाज सेवी, पुस्तकें-पफोल्डर-पर्चे छपवाने के लिये लेखक, कुछ खास-खास लोग शादीकार्ड छपवाने के लिये छापेखाने तक आते थे। प्रेस की बड़ी जिम्मेदारी थी और लोगों को भरोसा था कि उनकी गलतियां भी सुधर कर छपेगा। तब एपफएस, एपफोर, एथ्री जैसे कागज साइजों को नहीं जानते थे बल्कि रिमों के साइजों के बाद कागज कटिंग होती थी। आज भी बड़े छापेखानों में यही होता है। खैर, बात पिघलता हिमालय की हो रही थी। 1978 में पिघलता हिमालय शुरु हुई, तब मैं 6 साल का था। बहुत उत्साह था पिता आनन्द बल्लभ ज्यू और हमारे चाचा दुर्गा सिंह मर्तोलिया में। इनका जोश अखबार को दैनिक में तक बदल गया। लेकिन जीवन के संग्राम में यह उलझ कर रह गये। दुर्दिनों की वह कहानी बहुत लम्बी है, फिर कभी लिखूंगा।

ईजा कमला उप्रेती ने पिता के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर छापाखाना और अखबार सींचा। लोहे की उन भारी मशीनों की खटखट आवाजों में कागज को मशीन में लगाने और उठाने में सावधानी चाहिये। कई ऐसे अवसर थे जब ईजा मशीनमैन पिता के साथ हैल्पर बनी। तब आजकल की तरह सुविधाएं और साधन भी नहीं थे। डाक से जाने वाले अखबारों में पते लिखने में भी ईजा सहायक थी। अखबार की प्रूफरीडिंग का काम भी वह करती और कभी लिखने बैठ जाती।
मन में विचार आता है कि पत्रकारिता के उस जमीन में कितनी पवित्रता थी। पत्रकारिता का मिशन था, आन्दोलन था, सामाजिक चेतना का प्रतीक था। अब ईजा हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी जिद, उसकी लगन, उसका संघर्ष हमें याद दिलाता रहेगा कि योद्धा संग्राम में विचलित नहीं होते। उन यादों में खुशी के साथ आँसू और साहस है।

वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी…..

डाॅ.पंकज उप्रेती
‘‘संग्राम जिन्दगी है, लड़ना इसे पड़ेगा…..।’’ इस प्रकार के गीतों को गुनगुनाने वाली हमारी ईजा अब सिर्फ याद आती रहेगी। वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी। बीमारी, अस्पताल, मौत तो उसके निकट थे लेकिन अचानक वह चल देगी ऐसा पता नहीं था।
मुझे याद है पिता के साथ घोर संघर्षों में साथ देने वाली माता ने कितनी परीक्षाएं मौत के लिये दी। अपनी 66 साल का आयु में उन्होंने सौ प्रतिशत संघर्ष किया जिसमें मौत से संघर्ष भी था। बचपन में हम तीन भाई बहन ;पंकज, ध्ीरज, मीनाक्षी सोचते माँ कब ठीक होगी, उसे भवाली सेनेटोरियम में भर्ती करवाना पड़ा। ईजा की बीमारी के समय दैनिक पिघलता हिमालय को बन्द करना पड़ा था। पहाड़ टूट पड़ा था। मुनस्यारी में दुर्गा चाचा ;दुर्गा सिंह मर्तोलिया अपने जीवन संग्राम में बुरी तरह टूट चुके थे। थके-हारे पिता आनन्द बल्लभ ने छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ को बिकाउ होने का विज्ञापन दे डाला था। लेकिन नहीं, परमात्मा को यह मंजूर नहीं था। ईश्वर को हमारा लड़ना ही पसन्द है। पूरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। 6 साल का मैं और 4 साल का भाई ध्ीरज गाँव गंगोलीहाट चले गये। छोटी बहन को नैनीहाल रानीखेत भेज दिया गया। माँ अस्पताल और पिता हल्द्वानी में। संघर्षों के उन सालों में जितने टोने-टोटके, पूजा-पाठ हो सकते थे सब किये पिता ने। ताकि हमारा परिवार बन सके। दो साल के अन्तराल में बिखरा हुआ पूरा परिवार एक हो गया लेकिन कुछ समय बाद ईजा फिर से बीमार हो गई। हम तीनों बच्चे रोते थे। पिफर से दो साल तक घोर संग्राम। पिता भी परेशान थे लेकिन ‘शक्ति प्रेस’ हमारी धुरी था। ‘उप्रेती ज्यू’ को मानने वाले, उनकी ईमानदारी को पहचानने वालों की कमी नहीं रही। ईजा ठीक होकर घर आ गई लेकिन बीमारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पिघलता हिमालय को पिता ने फिर से जीवन दिया और टेªेडिल मशीन के जमाने की मशीनों पर जूझते रहे। खून में व्यापार तो था नहीं, हाँ उनकी कलम की ताकत और ईमानदारी ने परिवार को सम्मान के पद पर खड़ा रखा। बीमारियों और संघर्षों ने हम बच्चों को भी बहुत कुछ सिखाया। हमें सिखाया की दुर्दिन कैसे होते हैं, दुनिया के मेले में कितने प्रकार के चेहरे होते हैं, अपना पराया क्या होता है………..।
मुपफलिसी में दवाईयों तक को पैसे नहीं होते थे लेकिन अखबार निकालना प्रतिब(ता थी। संकल्प ले रखा था इसे चलाने का। ईश्वर कभी कोई दूत भेज देता और उम्मीदें जग जाती। एक दिन हल्द्वानी बेस अस्पताल में ईजा को बाहर रख दिया गया और डाक्टरों ने कह दिया था कि भगवान ही बचा सकता है। हम बच्चे रात्रि में रोते हुए यह कहकर नींद की गोद चले गये- ‘‘हे भगवान! हमारी मम्मी को ठीक कर देना।’’ अगले दिन पता चला कि ईजा ठीक हो गई है। पिता जी अपने कुछ साथियों के साथ रातभर अस्पताल में मौत से जूझ रही ईजा के पास थे। अस्पताल में जाने से पहले मुंह का ग्रास तक छोड़कर जाना पड़ा था उन्हें। उस दिन मेरा जनमबार था और पिता ने तय किया था बहुत दिनों बाद आज ढंग से खाना खायेंगे। उन्होंने खाना पकाया और हम लोग खाना खाने बैठे ही थे कि हमारे पड़ौसी लाला दाउ दयाल जी बताने आ गये कि अस्पताल में चलो, हालत खराब है।
अस्पताल में बहुत समय अकेले ही काटा है ईजा ने। वह हिम्मती थी तभी इतने साल तक उसका शरीर बचा रहा। बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह थकी नहीं बल्कि परेशान इसलिये थी कि उनका परिवार परेशान है। वह कहती थी- ‘‘मैं एमबीबीएस हो चुकी हँू। बीमारियों के कारण सारी दवाईयों के नाम और बीमारियों के बारे में जान चुकी हँू।’’ कई बार मरते मरते बची ईजा बताती थी- ‘‘यमराज के वहाँ आधे रास्ते से लौट कर आई हँू।’’ संघर्षों के इन घोर दिनों को कई जगह किराये के मकान में हमने काटा। इसके अलावा ‘शक्ति प्रेस’ तो हमारा केन्द्र ही रहा। इस पुराने मकान में छापाखान, आन्दोलनकारियों की बैठकें, प्रेस वार्ता, जुलूस-आन्दोलन वालों की भीड़, बच्चों की पढ़ाई और संगीत सबकुछ एकसाथ चलता रहता था। ईजा का शरीर रोग से घिर चुका था लेकिन उसने संघर्ष नहीं छोड़ा। अपनी और अपने परिवार की परेशानियों के बावजूद वह पिता जी के साथ बराबर की हिस्सेदार थी। बैठकों में भाग लेना, अखबार की तैयारी, आने-जाने वालों का तांता सबकुछ मेला सा लगा रहता था। इतना ही नहीं, गंगोलीहाट इलाके के सभी लोगों का अड्डा उस जमाने में हमारा शक्ति प्रेस था। अब तो होटलों में रहने की परम्परा हो चुकी है और फैलते हल्द्वानी में कई लोगों के परिवार-रिश्तेदार हो चुके हैं। मुनस्यारी-धरचूला के कौने-कौने से आने वाले ‘पिघलता हिमालय’ परिवार के सदस्यों को ईजा अच्छी तरह पहचानती थी। घर में रोटी की समस्या बनी रहती लेकिन ईजा-बाबू के लिये आन्दोलन और अखबार जरूरी था। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड में घनी आबादी के बीच प्राइवेट बस अड्डे को हटाने के आन्दोलन में ईजा ने कई बसों के सीसे तोड़ डाले। हम बच्चे भी पत्थर मारकर बस के सीसे तोड़ने को खेल मानकर तोड़ डालते। दरअसल उस समय कई खूंखार लोग अड्डे से जुड़ चुके थे और वह बस अड्डे को वहीं रखना चाहते थे जहाँ पर हमारा छापाखाना था। उन्होंने लोभ भी दिया कि टिकट बुक आपके छापेखाने में ही छपवायेंगे। हल्द्वानी थाने के सीओ पुष्कर सिंह सैलाल जो बाद में एसपी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ईजा को समझाने आते थे- ‘भाभी जी बस अड्डा हट जायेगा, इनके सीसे मत तोड़ना।’ हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले का संचालन ही हमारे ‘शक्ति प्रेस’ से हुआ करता था। बीमार ईजा ने मेले के झण्डे तक सिले थे। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के उस दौर के प्रबुद्धजनों की बैठक वहाँ हुआ करती थी। लोक चेतना मंच से जुड़कर ईजा ने कई जगह प्रतिभाग किया। सीखने की इच्छा में ईजा ने ट्राइसेम योजना के तहत पीपुल्स कालेज में सार्टहैंड भी सीखा। गायत्री परिवार के अभियान में जुड़कर उन्हें सहयोग किया। ईजा को राजनैतिक पार्टियों की ओर से लगातार पार्टी में शामिल होने के निमंत्राण मिलते रहे लेकिन वह कभी किसी से नहीं जुड़ी। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने लखनउ में ईजा को पार्टी से जुड़ने का निवेदन किया लेकिन वह टाल गई। कठोर संघर्षों के बाद एक दिन हमारा छोटा सा घोंसला बना और सारा परिवार एकजुट हो गया। जैसे-तैसे हम भाई-बहिन ने भी अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली। बीच-बीच में बीमारी का सफर भी चलता रहता। सन् 2004 में हल्द्वानी में हमने अपना एक आशियाना बना लिया था- जे.के.पुरम् छोटी मुखानी हल्द्वानी में। इस छोटे से मकान में अपनी नई-पुरानी यादों के साथ पड़ाव डाल दिया। सालों साल की परेशानी के बाद पटरी में आते परिवार को झटका लगा लगा जब बाबू आनन्द बल्लभ जी 22 पफरवरी 2013 को अचानक चल दिये। उनके निधन के 6 माह में ईजा को फालिश/लकवा पड़ गया। अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद ईजा अपने पैरों में खड़ी कर दी गई लेकिन पहले से ही कमजोर शरीर के कारण वह अस्पताल-दवाईयों से बधी रही। इतने के बाद भी ईजा तो ईजा थी। उसकी उपस्थिति हमारे लिये सबकुछ था। 15 सितम्बर 2018 को प्रातः उसने प्राण त्याग दिये। उसे अहसास हो गया था अपने जाना का। सच्चाई की यह कहानी बहुत लम्बी है, फिर कभी……

पिघलता हिमालय की सम्पादक कमला उप्रेती का निधन

ईजा, तुमसे जिन्दा है ये यह…….

डाॅ.पंकज उप्रेती
15 सितम्बर 2018 प्रातः 9 बजे पिघलता हिमालय की सम्पादक श्रीमती कमला उप्रेती निधन हो गया। ईजा सम्पादक के रूप में ही नहीं आन्दोलनकारी व पत्राकार के रूप में जिन्दगीभर सक्रिय रही। बीमारियों से लड़ते-लड़ते अपने मिशन के लिये जूझने वाली ईजा से ही जिन्दा था ‘पिघलता हिमालय’ और इन्हीं की यादों के साथ चलाने का संकल्प लिया है।
पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के बाद इस समाचार पत्रा को जिन्दा रखने की चाह में उन्होंने अपनी जिन्दगी की परवाह नहीं की। पति के निध्न के बाद सदमे से घायल हो चुकी श्रीमती उप्रेती बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाते रहीं। वैसे तो ईजा मौत के मुंह में कई बार जा चुकी थी लेकिन 22 पफरवरी 2013 पिता आनन्द बल्लभ जी के निध्न के समय से टूट चुकी ईजा को 6 माह के भीतर फालिस/लकुवा पड़ गया और उनके बांये हाथ-पैर में परेशानी हो गई थी। हर दिन दवाईयों के सहारे खड़े होने वाली ईजा ने हिम्मत नहीं हारी और अपने मिशन और अपने कर्तव्यों के साथ घर में बच्चों का मार्गदर्शन करती थीं। वर्तमान की पत्राकारिता पर वह चिन्तित थी और परेशानी में गुजारे हुए अपने पुराने दिनों का स्मरण करती रहती थी। अस्वस्थ्य होने के बाद भी ईजा की इच्छाएं अपनों के बीच घिरी थीं और प्रातः 4 बजे से नियमित रूप से फोन पर जगह-जगह सम्पर्क कर कुशलबात पूछना उनकी आदत में था। अस्वस्थ्य होने के बाद वह अल्मोड़ा, रानीखेत, गंगोलीहाट, मसूरी तमाम जगह मिलने के लिये पहँुची। उत्तरायणी में रानीबाग में कत्यूरियों की जागर हो या जोहार महत्व में ढुस्का, ईजा जरूर जाती। अपने स्वास्थ्य को देखते हुए वह चुपचाप जाकर दर्शक दीर्घा में पीछे से बैठ जाती, यदि किसी ने पहचान लिया तो कहती- ‘मेरी बजह से कार्यक्रम में कोई दिक्कत न हो, इसलिये पीछे बैठ गई है। चिन्ता मत करो। कार्यक्रम जारी रखो।’ हिमालय संगीत शोध् समिति के अध्यक्ष के रूप में उनका संरक्षण था। युवा कलाकारों द्वारा की रही तैयारियों को देखने के लिये वह कक्षाओं में तक जाती और होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों में मौजूद रहती थी। वह अपने पीछे पुत्र पंकज, ध्ीरज, पुत्रबध्ू गीता, आरती, पौते आशुतोष, उत्कर्ष, नवीन, पुत्री मीनाक्षी जमाई अशोक जोशी सहित भरापूरा परिवार छोड़ गई हैं।
कमला देवी का जन्म 16 नवम्बर 1951 को माता श्रीमती इन्द्रा व पिता ज्वालाप्रसाद पाण्डे जी के घर रानीखेत में हुआ। पफाल्गुन 5 गले 1971 को इनका विवाह आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ हुआ। शिक्षित होने के बाद भी उन्होंने उस दौर में सरकारी नौकरी नहीं की और उप्रेती जी के साथ उनके छापाखाना ष्शक्ति प्रेसष् में सहयोग किया। वह दौर जब अखबार टेªडिल मशीन में छपा करते थेए उसकी प्रूपफ रीडिंग से लेकर मशीन में कागज उठानेए अखबार मोड़ने तक का कार्य मिशन के रूप में किया। जीवन को संग्राम के रूप में देखने वाली श्रीमती उप्रेती ने अस्वस्थ्य होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और हमेशा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये। जीवन भर संघर्ष में घिरे परिवार की परम्पराओं को दृढ़ता के साथ पूरा करने वाली ईजा अपनी प्रतिब;ता के साथ कभी भी किसी राजनैतिक पार्टी से नहीं जुड़ी। जबकि तमाम पार्टियों के शीर्ष नेताओं द्वारा उन्हें सम्मानपूर्वक पार्टी में आने का अनुरोध् किया जाता रहा। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के रूप में वह सक्रिय रही हैंए जिसके लिये शासन द्वारा इन्हें राज्य आन्दोलकारी का प्रमाण पत्रा दिया गया। इनके संचालन में महिलाओं ने कई बड़े आयोजन किये। जनमुद्दों व तमाम महिला संगठनों के आयोजनों में इनकी भागीदारी रही है। घर.परिवार की जिम्मेदारी के के साथ पत्राकारिता के मिशन को इन्होंने बनाये रखा। पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में अपनी निष्पक्ष पत्राकारिता को संरक्षण दे रही थीं। ईजा के निधन हमारे लिये सबसे बड़ा आघात है।

स्थापना के 41वें साल में

कमला उप्रेती
इस अंक के साथ ही ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के 41वें साल में पहँुच चुका है। सन् 1978 में स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया ने जिस साहस और दृढ़ता के साथ इसकी शुरुआत की वह आज भी नियमित रूप से आपके सामने है। अब तक के 40 सालों में कई उतार-चढ़ाव इसने देखे हैं लेकिन वह मिशन जिसके लिये इसे स्थापित किया गया था जारी है। ऐसे समय में जबकि संचार व समाचार के अनगिनत साधन हैं, पिघलता हिमालय जैसे छोटे समाचार पत्रा को बनाये रखना चुनौती है। फिर, स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया के मिशन पर इसे बनाये रखना और भी कठिन है लेकिन इस मिशन को चुनौतियां स्वीकार हैं। यही कारण है कि समाचार-विचार की दुनिया को रंगीन बनाकर परोसने के बजाए अपनों को जोड़ने का यह साधन है।

दुर्गा सिंह जी मात्रा 49 वर्ष आयु में इस दुनिया से विदा हो गये थे और उप्रेती जी भी 69 वर्ष आयु में हमें छोड़कर चले गये। उनके मिशन में निर्भीकता और स्वाभिमान था। वर्तमान की पत्रकारिता में मिशन के साथ चलने वाले गिने जा सकते हैं। इनसे न तो तिकड़मबाजी होती है और न ही जीहजूरी। इस मिशन पर चलते हुए कई दिक्कतें पिघतला हिमालय के सामने भी हैं। दिनोंदिन बढ़ती जा रही प्रतिस्पद्र्धा के बीच समय से इस पाती को परोसते हुए हमें लगता है स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया जी हमारे बीच हैं। उन्हीं का स्मरण करते हुए लगातार इसे आकर्षक बनाने की कोशिश की जा रही है। साधनों के आभाव के बावजूद दूरस्थ क्षेत्रों तक अपने प्रिय पाठकों के बीच पिघलता हिमालय पहँुच रहा है। इसे आॅनलाइन पढ़ने की व्यवस्था भी की गई है ताकि दूर तक समय से हमारा सन्देश पहँुचे और नई तकनीक से जुड़ी युवा पीढ़ी अपने प्रिय पत्र को आसानी से पढ़ सके। इस बार से यूट्यूब चैनल भी पिघलता हिमालय का जारी हुआ है।

सरकार चाहे जो भी रही हो, सबका ध्यान अपना मौका भुनाना रहा है। यही कारण है कि सरकार की विज्ञापन नीति में छोटे-मझले समाचार पत्रों को अवसर नहीं दिया जा रहा है। विज्ञापन का स्वाद बड़े मीडिया घरानों को लगाया जाता है ताकि नेताओं के बड़े और रंगीन पफोटो प्रिंट मीडिया में छपें और इलक्ट्रोनिक मीडिया में दिखाये जाते रहें। इसे मीडिया मैनेजमेंट कहा जाता है और झूठ को सच और सच को झूठ की पतंग बनाकर उड़ाने वाले सक्रिय रहते हैं। स्थानीय स्तर पर भी छुटभैय्यों के चुग्गे पर पत्राकारिता करने वाले तेजी दिखाने लगे हैं। इस प्रकार के वातावरण में मिशन की पत्रकारिता सिर्फ अपने पाठकों के बल पर की जा सकती है।

प्रिय पाठको! आप ‘पिघलता हिमालय’ परिवार हो, आप ही इसके प्रतिनिधि हो, आप ही इसके विज्ञापनदाता हो, आप ही इसके प्रचार-प्रसार वाले भी। तभी आज ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के चालीस साल पूरे कर चुका है। इसका सारा मैनेजमेंट सीमान्त से लेकर तराई-भाबर तक पफैले हमारे शुभचिन्तक हैं। उन स्थितियों में जब साप्ताहिक पत्रों का रिवाज ही लडखड़ा चुका है, पाठकों में पिघलता हिमालय का इन्तजार इसकी गहरी जड़ों को सि( कर रहा है। इसके पाठकगण एक परिवार के रूप में जुड़े हैं, उनका भावनात्मक लगाव इससे जुड़ने और अपनी अगली पीढ़ी को जोड़ने में सहायक है। आपका यही स्नेह हमारा बल है।