उत्तराखण्ड की उच्चशिक्षा में प्रयोग

पिघलता हिमलाय प्रतिनिधि
मान्यता है कि यदि समाज को बदलना है तो शिक्षा में बदलाव करना होगा। राज करने के लिये भी शिक्षा का ढर्रा राजा के अपने अनुकूल होना जरूरी होता है। लगता है इन्हीं सिद्धान्तों को लेकर उत्तराखण्ड की सरकार चल रही है। शिक्षा व्यवस्था की पूरी मशीनरी को प्राइमरी से लेकर उच्चशिक्षा तक हिला दिया गया है। ऐसे में कुछ बातें राज की हैं और कुछ नाराजी की भी। शिक्षा मंत्री अरविन्द पाण्डेय हों या उच्चशिक्षा स्वतंत्र प्रभार मंत्राी डाॅ.धनसिंह रावत, अपने निर्णयों व तेवरों के चलते बेहद चर्चा में हैं।
उच्चशिक्षा हमेशा चर्चा में रही है लेकिन प्रदेश में इस बार जब से भाजपा की त्रिवेन्द्र रावत सरकार आई तब से इसमें ज्यादा ही हलचल है। इस हलचल का मुख्य कारण युवा तेज-तर्रार उच्चशिक्षा मंत्राी डाॅ.धनसिंह हैं। प्रदेश में क्रिया-प्रतिक्रिया भी सबसे ज्यादा इसी विभाग में है। चार महीने तक स्थानान्तरण  का प्रचार करने के बाद सितम्बर माह के मध्य 154 प्रवक्ताओं के बम्पर तबादले आदेश कर दिये गये। तबादले किन स्थानों में किये जा रहे हैं इसे लेकर भी अन्त तक अनिश्चितता बनी रही। स्थानान्तरण सूची जारी होने से पहले तक महाविद्यालयों के वह प्रवक्ता स्थानान्तरण सूची में अपना नाम तलाशने के लिये बेचैन दिखाई दिये जो लम्बे समय से सुगम या एक जगह ठहराव में बने हुए थे। जुलाई से लेकर सितम्बर माह के प्रथम सप्ताह तक स्थानान्तरण सूची आने, बदलने, देहरादून में होने, मंत्री जी के पास होने, निदेशालय में होने, हस्ताक्षर के लिये फाइल जाने, नाम जुड़ने, नाम घटने जैसी बातों के साथ चर्चा होती रही। कालेजों में प्रवेश प्रक्रिया आरम्भ हो गई और कहा जाने लगा अब कुछ नहीं होने वाला है लेकिन पिफर से हल्ला मचने लगा। इसके बाद छात्रा संघ चुनाव की तैयारी हुई और मान लिया गया कि स्थानान्तरण लटक गये हैं। कुछ मन से और कुछ बेमन से काम में जुट गये। इस बीच कुछ प्रवक्ताओं ने इधर उधर व सीध्े मंत्री से तक सम्पर्क साध् लिया। बताते हैं कि मंत्राी ने बहुत ही तरीके से मुलाकात भी की लेकिन स्थानान्तरण में कोई छूट देना अब उनके हाथ का भी नहीं रह गया था। क्योंकि जिस स्थानान्तरण को लेकर पहले से ही दुनियाभर का हल्ला मच रहा हो उसपर हर किसी की नज़र है।
विगत दिवस शासन स्तर से उच्चशिक्षा मंत्री डाॅ.धनसिंह रावत की संस्तुति के बाद अपर मुख्य सचिव डाॅ.रणवीर सिंह के हस्ताक्षर से राज्य के 154 प्राध्यापकों के अलग-अलग स्थानान्तरण आदेश जारी कर दिए गए। स्थानान्तरण सूची में सर्वाध्कि एमबीपीजी कालेज हल्द्वानी, डिग्री कालेज कोटद्वार, रिषिकेश, डाकपत्थर, रानीखेत, काशीपुर, पिथौरागढ़, रामनगर, नई टिहरी कालेज से सर्वाधिक तबादले हुए हैं। इन्हें तैनाती के लिये रिक्त पड़े सुदूरवर्ती डिग्री कालेजों में तैनाती दी गई है।
स्थानान्तरणों को लेकर भी तमाम चर्चाएं होना स्वाभाविक है क्योंकि इसकी सूची बनने तक जितनी नाटकीय क्रम रहा है वह किसी से छुपा नहीं है। दूर दराज भेज दिये गये प्रवक्ताओं के बीच कानापफूसी और कोर्ट की बात पहले से ही हो रही थी। कुछ नामों पर आश्चर्य हो रहा है कि उन्हें किस प्रकार सुगम के करीब या दूर पहाड़ भेज दिया गया। पिफलहाल जो भी, ध्नसिंह ने जो कह दिया था वह किया। स्थानान्तरण सूची भी छात्रासंघ चुनाव निपटते ही जारी हुई। शासन जानता था कि छात्रासंघ चुनाव म कालेज प्रशासन पूरी तरह उलझा हुआ है और उस बीच स्थानान्तरण की सूची जारी होती तो अपफरा-तपफरी मच जाती और कालेजों में चुनाव कार्य सम्पन्न करवाने में दिक्कत होती। होने को तो इस समय विशेष सुधर परीक्षा कार्यक्रम चल रहा है और कई कालेजों से वरिष्ठ प्रवक्ताओं के स्थानान्तरण के कारण व्यवस्था बनाये रखने के लिये जूझना पड़ रहा है। सत्रा के बीच में हुए स्थानान्तरण को कई अर्थों में देखा जा रहा है।
सवाल है कि शिक्षा व्यवस्था में ऐसा परिवर्तन कर क्या हो जायेगा? उत्तराखण्ड में जगह-जगह डिग्री कालेज खोल दिये गये हैं और बिना सुविधओं के उनका संचालन हो रहा है। ऐसे में यह मान्यता बन जाती है कि डिग्री कालेज ऐसे ही हुआ करते होंगे। जिनमें इण्टर पास कर जाना होता है और साल में एक बार छात्रा संघ चुनाव होते हैं। इन हालातों में महाविद्यालय पठन-पाठन से ज्यादा अन्य चीजों के अड्डे बन सकते हैं। इसलिये जरूरी हो जाता है कि उच्चशिक्षा में प्रयोग की करने वाली सरकार केवल स्थानान्तरण को ही अपना लक्ष्य न रखे बल्कि इसमें सुधर के लिये ठोस पहल हो। महाविद्यालय प्रशासन के पास प्रवेश से लेकर अन्य बातों का दबाव बना रहता है, उसे दूर करने के लिये कदम उठाये जाएं। छात्रा संघ चुनाव के दौरान कालेजों में हुई घटनाओं को पुलिस व प्रशासन तक को रोकने में जूझना पड़ा था तो कैसे कल्पना करें कि महाविद्यालय प्रशासन अपने आप से दबाव व दादागिरी की परम्परा से निपट लेगा। यह भी होना चाहिये कि सड़क चलता कोई भी नेता अथवा कोई रौब दिखाता हुआ कालेजों में प्रवेश न करे। यदि सरकार इस प्रकार की व्यवस्था करवा सकी तो यह ऐतिहासिक कदम होगा। स्थानान्तरण तो एक सामान्य प्रक्रिया भी हो सकती है और नौकरी करने वाले इध्र नहीं तो उध्र कर लेंगे परन्तु महाविद्यालयों में विद्यार्थी न होने के बावजूद आ ध्मकने और ध्मकी भरे लहजे में घूमने वालों को कैसे रोका जाए? कहने को तो कालेज का अनुशासक मण्डल भी होता है लेकिन उसके पास परिचपत्रा दिखाओ कहने तक की ताकत होती है। दबंगई पर उतर आये अराजक कुछ नहीं सुनते हैं। ऐसे में इस दिशा में ही कदम उठाने जरूरी हैं।

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