कैलास मानसरोवर को जाने वाले परम्परागत मार्ग के सभी बगड़ रड़ रहे हैं

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि

बागेश्वर। उत्तराखण्ड के विकास की कहानी कितनी कोरी है इसका एक उदाहरण कपकोट-विनायक-शामा रोड से पता चलती है। भराड़ी बाजार के बाद पिण्डारी रोड से कटने वाला यह मार्ग कैलास मानसरोवर का परम्परागत मार्ग रहा है लेकिन वर्तमान में इसमें सड़क निर्माण का सुस्त कार्य चल रहा है। दर्जनों गाँव सुविधओं के आभाव में उजाड़ होते जा रहे हैं। यह क्षेत्र बगड़ों का का है। ;नदी किनारे बसे इलाकों को बगड़ कहा जाता है। तिमलाबगड़, कासूबगड़, रीसाबगड़, खारबगड़, देबीबगड़, हरसिंगिया बगड़, डोटिलाबगड़ इत्यादि। यहाँ रेवती गंगा, गांसूगंगा, सरयूगंगा नदियां बहती हैं और इनके संगम स्थान पर तीर्थ है। ये सारे बगड़ रड़ ;बग रहे हैं। पिछली आपदा में तो खारबगड़ में आये मलवे से कापफी नुकसान हुआ था। नदी आर-पार के तमाम ग्रामों का मुख्य व्यवसाय कृषि है लेकिन किसी भी प्रकार की सुविधाओं के न होने से गाँव के गाँव खाली हो चुके हैं। खारबगड़ होते हुए विनायक को जाने वाले मार्ग पर इन दिनों कार्य हो रहा है किन्तु एकदुम दुर्गम के इस क्षेत्र में देखरेख न होने से कार्य की सुस्ती देखने को मिली। यह मार्ग आगे विनायक के बाद शामा तक मिलता है। कैलास मानसरोवर जाने के लिये पुराने मार्गों में इसकी गणना होती है। मानसरोवर में महात्मा गांध्ी की अस्तियां विसर्जन के लिये इसी मार्ग से गये थे। इस मार्ग पर कभी बहुत आवत-जावत थी। पैदल यात्रा के समय घोड़े-खच्चर, भेड़-बकरियों के साथ व्यापारी जाते थे। जोहार के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोपाल सिंह मर्तोलिया के परिजन आज भी देवीबगड़ में निवास करते हैं। धरचूला में बूबू के नाम से विख्यात रहे स्वतंत्राता सेनानी जोगा सिंह मर्तोलिया का भी यहाँ मकान था। इनके परिजन आज धरचूला व हल्द्वानी में रहते हैं।
प्रहलाद सिंह मर्तोलिया बताते हैं कि तिब्बत को जाने के लिये इस मार्ग का प्रयोग होता था। पुराने समय में अल्मोड़ा से गिनती करते हुए व्यापारी विभिन्न पड़ावों में रुकते हुए जाते थे। इस गिनती में उन्हें मालूम था कि किस गिनती के अंक के बाद कौन सा स्थान आने वाला है। उन स्थानों का नामकरण भी कर दिया गया था जैसे- खारबगड़, मिलमढुंग।
इस क्षेत्रा में उत्तरभारत प्रा.लि. द्वारा जलविद्युत परियोजना का कार्य भी किया जा रहा है। परियोजना के कामकाज के तौर-तरीकों पर आरोप लगते रहे हैं लेकिन बात पिफर वही है कि इस दूरस्थ क्षेत्रा में कोई सुनवाई नहीं। नेतागर्दी का हाल यह है कि छुटभैय्ये से लेकर बड़े नेताओं तक का दबाव रहता है, खनन वाले भी मौका देखते रहते हैं। इन सारे हालातों में दूर-दराज के ग्रामीण विकास की राह जोह रहे हैं। वह चाहते हैं कि सड़क-संचार-शिक्षा जैसी मलभूत समस्या दूर हो जाये तो काफी राहत मिलेगी।
पिघलता हिमालय 9 मई 2016 के अंक में प्रकाशित

ढाकर बोकने का अपना मजा था, लाछुली से भराड़ी जाते थे

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
अल्मोड़ा। तिब्बत व्यापार के दिनों में जोहार के रावत परिवार में से एक तेजम से तीन किमी आगे लाछुली और एक जलद बस गया। व्यापार के सिलसिले में इध्र से उध्र जाने वालों ने दुरुह दिन देखे हैं और अपने को स्थापित किया है। अपनी उन पुरानी यादों के साथ पिघलता हिमालय से बात करते हुए 66 वर्षीय रघुनाथ सिंह रावत कहते हैं कि बचपन में उन्होंने भी ढाकर बोका है। लाछुली से बाखड़धर, शामा, हरसिंगियाबगड़ होते हुए भराड़ी तक वह लोग जाते थे। ये व्यापार के पड़ाव थे और बकरियों-भेड़ों ेके साथ सामान लेकर जाना होता था। ढाकर बोकने का अपना मजा था। समूह में जब कई लोग अपने जानवरों के साथ जाते थे तो छोटों को कुछ जानवरों के साथ आगे-आगे भेजा जाता था। पीछे से बड़े-सयाने आते थे। वह बताते हैं कि मुनस्यारी रुट से वह नामिक भी गये। नामिक में रावतों की जमीनें हैं।
श्री रावत के पिता 103 वर्षीय गोविन्द सिंह रावत तो कई बार तिब्बत व्यापार में शामिल हुए हैं। माइग्रेसन के समय यह परिवार लाछुली से शंखाध्ुरा ;मुनस्यारी पिफर मिलम जाता था। इसी अवरोही क्रम में उतरते थे। गोविन्द सिंह जी इस समय शंखाध्ुरा में रहते हैं।
रघुनाथ सिंह जी बताते हैं कि जलद वाले गंगासिंह रावत अभी भी हर साल मिलम जाते हैं। कई पुरानी यादों के साथ रघुनाथ जी अल्मोड़ा में निवास कर रहे हैं। शंखाध्ुरा में भी इनका परिवार है।
पिघलता हिमालय 6 जून 2016 के अंक में प्रकाशित