कश्मीर फैसले पर प्रतिक्रिया

कार्यालय प्रतिनिधि
मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जो बड़ा फैसला लिया उसका जश्न पहाड़ से लेकर मैदान तक चारों ओर है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिये सरकार ने जिस प्रकार रणनीति बनाई और कदम उठाया है उसे लेकर विपक्ष चाह कर भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। कश्मीर को लेकर कोई बड़ा ऐलान कभी तो होना ही थी, जिसे सरकार ने कर डाला। मोदी-शाह के कदम से हर मौका पार्टी के लिये बनता जा रहा है। देश के इस बड़े मसले को राजनीति के चश्मे से हटकर देखें तो एक देश एक सिद्धान्त की बात जरूरी थी। गुनगुन करते हुए या विरोध् ही करना है सोचकर विरोध् किया गया तो विकास नहीं हो सकता है। इसलिये सरकार के फैसले को और सच्चाई को समझना चाहिये। देश को जोड़ने के लिये, आतंक के खात्मे के लिये इस प्रकार के कदम उठाने जरूरी हैं। राजनीति के चश्मे से देखें तो- बड़ी सीधी सी बात है कि विपक्ष चाहे कुछ कहे आम जनता मोदी के हर फैसले से खुश है। यदि नहीं होती तो उन्हें दूसरी बार अथाह समर्थन देकर सरकार बनाने का मौका नहीं देती। इसे नरेन्द्र मोदी की चतुरता कहें, उनकी रणनीति कहें, उनका मिशन कहें, उनकी लहर कहें, उनकी सनक कहें………कुछ तो है।
जम्मू-कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बांटने वाले बिल पर संसद की मुहर लगते से पहले ही मैदान से लेकर पहाड़ तक जश्न होने लगा था। इस प्रकरण पर प्रतिक्रिया भी होने लगी लेकिन बहुमत सिर्फ यह देख रहा है कि कश्मीर का हल देशहित में हो। आम जनता के दिलो-दीमांग में पैठ चुका है कि कश्मीर में दोगली नीति चलने वाले भारत और पाकिस्तान के बीच अपने स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं, ऐसे में एक बार फैसला हो ही जाए। इसीलिए पूरे देश की आम जनता सिर्फ यह जान रही है कि धरा 370 हटने का लाभ होने जा रहा है। इसी बात का जश्न है। कुछ जानकारी रखने वाले अपने तर्क दे रहे हैं लेकिन उनके लिये कोई मौका नहीं है।
उल्लेखनीय है कि अपनी रणनीति में सफल रहे प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित साह ने प्रस्ताव को सदन में रखा। इसके पक्ष में 370 मत पड़े जबकि 70 मत विरोध् में थे। इस मौके पर गृहमंत्री ने कहा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इसके बारे में कोई कानूनी या संवैधनिक विवाद नहीं है। इसके लिए कानून बनाने के लिये देश की संसद पूरी तरह सक्षम है। संसद ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा सम्बन्धी अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने के प्रस्ताव सम्बन्धी संकल्प और जम्मू कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख में विभाजित करने वाले विधेयक को मंजूरी दी। गृहमंत्राी ने सदन को विश्वास आश्वासन दियचा कि स्थिति सामान्य होते ही जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने मंे इस सरकार को कोई परेशानी नहीं है।
जम्मू-कश्मीर में विशेष दर्जा समाप्त होते ही 70 साल पुराने अनुच्छेद 370 से जुड़ा जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को विशेषाधिकार देने वाला अनुच्छेद 35-ए भी समाप्त हो गया। इस साहसी फैसले से आजादी के 72 साल बाद कन्याकुमारी से कश्मीर तक देश में अब एक ही संबिधन और एक निशान लागू हो गया।
इध्र उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भी केन्द्र सरकार के जम्मू-कश्मीर पर लिए गए ऐतिहासिक निर्णय पर उत्तराखण्ड की जनता की ओर से प्रधनमंत्री मोदी और केन्द्रीय गृहमंत्री शाह को बधाई दी है। सचिवालय में मीडिया से बातचीज में उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 हटाने से जम्मू कश्मीर में विकास को बढ़ावा मिलेगा और वहाँ के लोग देश की मुख्य धारा में शामिल हो सकेंगे। प्रधनमंत्री ने अपने वायदे को निभाया है। उन्होंने कहा कि आज जम्मू कश्मीर का पुनर्जन्म हुआ है। प्रधनमंत्री मोदी ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 का प्रभाव खत्म करने का साहस दिखाया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व सांसद अजय भट्ट ने कहा कि भाजपा ने साबित कर दिया कि उसकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है। विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचन्द्र अग्रवाल ने कहा कि जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी का सपना वास्तव में आज पूरा हुआ। नेता प्रतिपक्ष इन्दिरा हृदयेश समेत अन्य ने भी केन्द्र सरकार के निर्णय को सराहा है।
इस ऐतिहासिक फैसले से कश्मीर की पीड़ा से यत्र-तत्र रह रहे कश्मीरी पण्डितों में विशेष खुशी है। हल्द्वानी व देहरादून में भी बसे ऐसे परिवारों ने खुशी मनाते हुए कश्मीर की चर्चा मीडिया से की और कहा अब वह दिन आ गया जिसका उन्हें इन्तजार था।

लद्दाख से उत्तराखण्ड तक फैले हिमालयी दर्रों को नाप रहे हैं तीन पर्वतारोही

केशव भट्ट
भारत में हिमलयी क्षेत्रा में बसे गाँवों को पर्यटन से जोड़ उनकी आर्थिकी मजबूत करने के इरादों से से तीन युवा पर्वतारोही लद्दाख से उत्तराखण्ड तक फैले पश्चिमी हिमालयी दर्रों को नाप रहे हैं। यह दल अपने यात्र अभियान में बीस दर्रे, जिसमें 5950 मीटर उँचे कालिंदी पास को पार कर लगभग 870 किमी की पैदल यात्रा कर चुके हैं। वेस्टर्न हिमालयन ट्रेवर्स का यह दल अब अपने अभियान के अन्तिम चरण में है। अगले कुछ दिनों में नेपाल के बार्डर धरचूला में पहँुचेंगे। जहाँ इनकी ये यात्रा समाप्त होगी।
पर्वतारोही भारत भूषण ने ट्रवर्स यात्रा मार्ग में जोहार घाटी के बुंई गाँव से फोन से बताया कि वेस्टर्न हिमालयन ट्रेवर्स के इस अभियान में उनके अलावा प्रणव रावत और शेखर सिंह शामिल हैं। उन्होंने लद्दाख के मार्खा वैली में चिलिंग ब्रिज से 27 अगस्त को अपनी यह यात्रा शुरु की। रूमसे, शोकर लेक, सुमररी लेक तथा 5580 मीटर उँफचे परंगला को पार कर उनके दल ने हिमांचल की घाटी में प्रवेश किया। मुद से काफलू गाँव, करछम होते हुए सांगला निकले और लमखागा होते हुए उत्तराखण्ड के हर्षिल में पहँुचे। यहाँ से गंगोत्री होते हुए हर्षिल में आये। यहाँ से पाणा, आला, सिथेल, कनोल, वान, अली बुग्याल, हिमनी गाँव होते हुए दानपुर घाटी में सोराग होते खाती गाँव में प्रवेश किया। इसके बाद जोहार घाटी में लीलम होते हुए उनकी यात्रा जारी है। इस दल के युवा पर्वतारोही उत्तराखण्ड में हिमालय के सीमान्त गाँवों में होते हुए जा रहे हें। अपने पड़ाव में वे गाँव में रुक कर ग्रामीणों समेत स्कूलों में इस यात्रा के महत्व के बारे में सन्देश देते जा रहे हैं कि किस तरह से पर्यटकों की आवाजाही से उनकी आर्थिकी मजबूत होगी। भारत भूषण ने कहा कि विदेशों में कई तरह के हिमालयी यात्रा मार्ग हैं, जिन्हें ट्रेल कहा जाता है। नेपाल में में ग्रेट हिमालियन ट्रेल विश्व प्रसिद्ध है।

तिब्बत व्यापार बन्द के बाद थाला में ही रहने लगे गनघरिया परिवार

धम सिंह गनघरिया
बागेश्वर। काण्डा से कोटमन्या जाने वाली सड़क से एक किमी नीचे बसा है ग्राम थाला। करीब 90 परिवारों वाले इस गाँव में पानी के बिना न तो खेती हो पा रही है और न ही अन्य कार्य। विकास की वाट जोह रहे ग्रामीण चाहते हैं कि शासन प्रशासन इनकी सुन ले।
भारत-तिब्बत व्यापार के जमाने में जोहार के गनघर से पड़ाव डालते हुए व्यापारी यहाँ भी ठहरते थे और व्यापार टूटने के बाद लोग यहीं बस गये। यहाँ पर चालीस जोहारी शौका परिवार हैं और संयोग से गढ़वाल के शौका परिवार भी हैं। गाँव के कुंवर सिंह नित्वाल, बालम सिंह गनघरिया, हीरा सिंह मडवाल कहते हैं कि भरण-पोषण के लिये दन-कालीन बुनाई और बकरी पालन के सिवा कुछ नहीं रह गया है। विकास की दौड़ में यह इलाका पिछड़े नहीं, इसके लिये ग्राम विकास की योजनाओं को लाना चाहिये। जनप्रतिनिध्यिों को इसकी टोह लेनी चाहिये।
ग्राम के सबसे बुजुर्ग हंसा सिंह गनघरिया बताते हैं कि उनके बुजुर्गो के जमाने से ही जोहार से थाला आया करते थे, तब यह जंगल था। तिब्बत व्यापार के समय भेड़-बकरियों के साथ वह लोग तिब्बत जाया करते थे। कपकोट होते हुए हल्द्वानी भाबर तक उनकी यात्रा होती थी। भेड़-बकरियां गुड़ की भेलियां लादकर चलती थीं। चीन यु( के बाद व्यापार बन्द होते ही जो जहाँ था, वहीं रुक गया। पहले आबादी कम थी, अब आबादी बढ़ने के बाद जरुरतें भी बढ़ गई हैं। पहले जंगल और पानी सब था। अब गाँव में पानी के लिये हाहाकार मचा हुआ है।
पिघलता हिमालय 4 जुलाई 2016 के अंक में प्रकाशित