धम सिंह गनघरिया
बागेश्वर। काण्डा से कोटमन्या जाने वाली सड़क से एक किमी नीचे बसा है ग्राम थाला। करीब 90 परिवारों वाले इस गाँव में पानी के बिना न तो खेती हो पा रही है और न ही अन्य कार्य। विकास की वाट जोह रहे ग्रामीण चाहते हैं कि शासन प्रशासन इनकी सुन ले।
भारत-तिब्बत व्यापार के जमाने में जोहार के गनघर से पड़ाव डालते हुए व्यापारी यहाँ भी ठहरते थे और व्यापार टूटने के बाद लोग यहीं बस गये। यहाँ पर चालीस जोहारी शौका परिवार हैं और संयोग से गढ़वाल के शौका परिवार भी हैं। गाँव के कुंवर सिंह नित्वाल, बालम सिंह गनघरिया, हीरा सिंह मडवाल कहते हैं कि भरण-पोषण के लिये दन-कालीन बुनाई और बकरी पालन के सिवा कुछ नहीं रह गया है। विकास की दौड़ में यह इलाका पिछड़े नहीं, इसके लिये ग्राम विकास की योजनाओं को लाना चाहिये। जनप्रतिनिध्यिों को इसकी टोह लेनी चाहिये।
ग्राम के सबसे बुजुर्ग हंसा सिंह गनघरिया बताते हैं कि उनके बुजुर्गो के जमाने से ही जोहार से थाला आया करते थे, तब यह जंगल था। तिब्बत व्यापार के समय भेड़-बकरियों के साथ वह लोग तिब्बत जाया करते थे। कपकोट होते हुए हल्द्वानी भाबर तक उनकी यात्रा होती थी। भेड़-बकरियां गुड़ की भेलियां लादकर चलती थीं। चीन यु( के बाद व्यापार बन्द होते ही जो जहाँ था, वहीं रुक गया। पहले आबादी कम थी, अब आबादी बढ़ने के बाद जरुरतें भी बढ़ गई हैं। पहले जंगल और पानी सब था। अब गाँव में पानी के लिये हाहाकार मचा हुआ है।
पिघलता हिमालय 4 जुलाई 2016 के अंक में प्रकाशित
