भातर-तिब्बत व्यापार के वह दिन खूब थे

कृष्ण सिंह  व विशन सिंह  से बातचीज

डाॅ.पंकज उप्रेती
सीमान्त वासियों की उस पीढ़ी को भारत- तिब्बत व्यापार के पुराने मीठे दिन आज भी याद हैं जिसमें उन्होंने भागीदारी की या उसे देखा। अपनी पुरानी यादों के साथ वह वर्तमान की तुलना करते हैं और चाहते हैं कि बदलाव तो प्रकृति का नियम है परन्तु उनकी विरासत बनी रहे, उनके बुजुर्गों ने जिस परम्परा को वर्षों सहेजे रखा नई पीढ़ी उसे भूले नहीं। इन्हीं सब बातों को लेकर 81 वर्षीय कृष्ण सिंह गब्र्याल और 68 वर्षीय विशन सिंह गब्र्याल जी से बातचीत हुई।
कृष्ण सिंह जी बताते हैं कि गाँव में बचपन की पढ़ाई के बाद सन् 1951 कक्षा 6 में पढ़ने के लिये पांगू गये। उनकी पाठशाला जीवन-जगत का व्यवहार था। देखा-देखी वह अपने बुजुर्गों के साथ भारत-तिब्बत व्यापार में जुट गये। सारे परिवार अपना-अपना सामाना लेकर तिब्बत जाता थे। हिन्दुस्तान से सारा सामान तिब्बत को जाता था और वहाँ से मुख्य रूप से उन लाते थे। सन् 1962 में चीन आक्रमण के बाद सीमान्त का यह व्यापार बन्द हो गया। उससे पहले आपसी व्यापार की सुन्दर परम्परा थी। आने-जाने में कोई रोक नहीं थी। किसी प्रकार का टैक्स वहाँ नहीं पड़ता था। गाँव में घर-घर टैक्स जमा करते थे। भारत- तिब्बत व्यापार बन्द हुआ तो गाँव में टैक्स जमा होना भी बन्द हो गया। सन् 1992 में नेपाल के रास्ते व्यापार हुआ तो उसमें भारतीय व्यापारियों ने नेपाल के व्यापारियों को सामान दिया। उन्होंने बहुत कमाया। अब पुराने समय का जैसा व्यापार नहीं होता था। पहले समय में तो जितना सामान जो भी तिब्बत मण्डी जाता वह सब बिक जाता था। भारत-तिब्बत व्यापर के वह दिन खूब थे। सीमान्त के व्यापारियों के पास नकद रुपया भले ही उतना न हो लेकिन मान सम्मान के साथ सामग्री बहुत थी। परिवार के परिवार अपने कारोबार से खुश थे।
कृष्ण सिंह जी बताते हैं कि एक ओर सन् 62 में सीमान्त का व्यापार बन्द हो गया दूसरी ओर सन् 1966 में गब्र्यांग में भूस्खलन से जमीन ध्ंसती रही और खतरा बढ़ने लगा। ऐसे में मुख्यमंत्री एन.डी.तिवारी ने तराई में सितारगंज के पास बसने के लिये भूमि दी। जिसमें सिद्ध गब्र्यांग ग्राम बसा। शुरुआत में सीमान्त के परिवारों को नई जगह आने में दिक्कत हुई। क्योंकि ठण्डे इलाके के रहने वालों को भीषण गर्मी में रहने की आदत नहीं थी। तराई की भीषण गर्मी में ढलने में परिवारों को काफी समय लगा। वर्तमान में सिद्ध गब्र्यांग में परिवार रहते हैं और अपनी परम्परा के अनुसार रीति-रिवाज मनाते हैं। पूजा व अन्य विशेष अवसरों पर अपनी घाटी में जाते हैं।
विशन सिंह गब्र्याल अपने बचपन को याद करते हुए कहते हैं तब साधन नहीं थे। सुगम मार्ग नहीं थे, उनमें जानवरों के साथ पूरा लाव-लस्कर जाता था। धारचूला से गब्र्यांग जाने में ही सप्ताह भर लग जाता था। जाते समय आधे रास्ते में सिंखोला गाँव में परिवार 10-12 दिन रुकते थे और उनके जानवर हरी घास चरते थे। आजकल आने-जाने में रुकावट नहीं है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में यातायात के साध्न और मार्ग हैं। गाँवों से पलायन के बारे में वह कहते हैं कि किन्हीं कारणों से जो लोग बाहर बस चुके हैं वह लौटकर नहीं जा पाते हैं क्योंकि उनकी नई पीढ़ी पढ़ाई-नौकरी इत्यादि कारणों से वहीं की होकर रह जाती है। इन सबके बाद हमारी कोशिश है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहें। इसके लिये तमाम अवसरों पर लोग मिलन समारोह के जरिये एक-दूसरे से मिलते रहते हैं, सहयोग करते हैं।

तिब्बत व्यापार के दिनों गढ़वाल में व्यापार का अपना महत्व था

डाॅ.पंकज उप्रेती
आजादी से पूर्व जब भारत-तिब्बत खुला व्यापार चलता था तब व्यापारियों के आन्तरिक व्यापार का नेटवर्क भी जबर्दस्त था। व्यापार के उन दिनों की चर्चा में अक्सर तिब्बत व्यापार की बात होती है जबकि कुमाउॅ-गढ़वाल के बीच होने वाले व्यापार का अपना महत्व था। व्यापार की इन रोचक जानकारियों के साथ 74 वर्षीय मोहन सिंह धर्मशक्तू बताते हैं कि व्यापार के दिनों में एक व्यापार तिब्बत की ओर होता था, दूसरा गढ़वाल की ओर। बरसात में तिब्बत जाते थे ;जुलाई से नवम्बर तक फिर गढ़वाल में व्यापार होता था।
जब माइग्रेशन में परिवारों के पड़ाव लगते थे तब मिलम, दरकोट, लोधिया बगड़ ;टिमटिया, तेजम के प्रसिद्ध इन धर्मशक्तू परिवार का आना-जाना होता था। माता केसी देवी व पिता हीरा सिंह के घर जन्मे मोहन सिंह, भूपेन्द्र सिंह, स्व.प्रद्युमन सिंह की वाल्यकाल का पढ़ाई दरकोट;मुनस्यारी हुई। पठन-पाठन के बाद सभी नौकरी-पेशा में इधर उधर रहे। मोहन सिंह धर्मशक्तू ने रेमजे अल्मोड़ा से हाईस्कूल, नैनीताल से इण्टर और लखनउ से डिप्लोमा करने के बाद विद्युत विभाग में अपनी नई शुरुआत की। गढ़वाल में उन्हें नौकरी का अवसर मिला और चमोली में कई अनुभवन उन्हें हुए। वह बताते हैं कि जब वह गढ़वाल में थे, स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया से चर्चा होती रहती थी। और बात निकल कर आती- ‘हमारा हिमालय पिघल रहा है।’ पिघलता हिमालय के शुरुआती दिनों में इसके नाम को लेकर चर्चा में सुमार था।
श्री धर्मशक्तू व्यापार के दिनों की पुरानी यादों पर लौटते हुए बताते हैं कि गढ़वाल में उनका व्यापार ज्यादा होता रहा है। कार्तिक माह में जब व्यापारियों का मुनस्यारी निवास होता था, तब गढ़वाल को जाते थे। गढ़वाल में ज्यादातर काला उफन की मां थी क्योंकि वहां काला कम्बल-लवादा पहनने का रिवाज है। तब जोहार के व्यापारियों की कई दुकानें भी गढ़वाल व्यापार के लिये थीं। ग्वालदम, थराली, देवाल, मीनगदेरे, उज्जवलपुर, सिमली, आदीबद्री, तिलवाड़ा, रुद्रप्रयाग, भुनारघाट, महलचैरी, चैखुटिया में जगह-जगह इनकी दुकानें थीं। अक्टूबर से अप्रैल तक व्यापारी इनमें दुकानदारी करते थे। तब तिब्बत से सीधे बकरियों द्वारा सामग्री पहुंचती थी। दुकानदार सम्पर्क कर इन सामग्री को पहुंचाते। भेड़-बकरियों की पीठ में सामान लादने का ‘बिल्च्या’ ;फांचा निकाल कर इनके द्वारा आलू, कोयला, चूना इत्यादि ढुलान करतवाते थे। तब दानसिंह मालदार के कारोबार भी काफी फैलता जा रहा था और व्यापार का सामान लेकर आये भेड़-बकरी पालक मालदार का सामान भी लदवाकर ले जाते थे। तब घोड़े वाले हल्द्वानी, रामनगर भाबर की मण्डी को जाते थे और भेड़-बकरी से समान ढोने वाले गढ़वाल की ओर ज्यादातर आते। व्यापार में उधारी भी होती थी और वसूली/उघाई करने वाले को ‘पगाली’ कहते थे। इस प्रकार गढ़वाल व्यापार का वृहद इतिहास रहा है। ;श्री मोहनसिंह जी से निवेदन भी है कि इस बारे में वह विस्तृत लेखन करेंगे
पिघलता हिमालय 5 दिसम्बर 2016 के अंक में प्रकाशित

तिब्बत व्यापार बन्द के बाद थाला में ही रहने लगे गनघरिया परिवार

धम सिंह गनघरिया
बागेश्वर। काण्डा से कोटमन्या जाने वाली सड़क से एक किमी नीचे बसा है ग्राम थाला। करीब 90 परिवारों वाले इस गाँव में पानी के बिना न तो खेती हो पा रही है और न ही अन्य कार्य। विकास की वाट जोह रहे ग्रामीण चाहते हैं कि शासन प्रशासन इनकी सुन ले।
भारत-तिब्बत व्यापार के जमाने में जोहार के गनघर से पड़ाव डालते हुए व्यापारी यहाँ भी ठहरते थे और व्यापार टूटने के बाद लोग यहीं बस गये। यहाँ पर चालीस जोहारी शौका परिवार हैं और संयोग से गढ़वाल के शौका परिवार भी हैं। गाँव के कुंवर सिंह नित्वाल, बालम सिंह गनघरिया, हीरा सिंह मडवाल कहते हैं कि भरण-पोषण के लिये दन-कालीन बुनाई और बकरी पालन के सिवा कुछ नहीं रह गया है। विकास की दौड़ में यह इलाका पिछड़े नहीं, इसके लिये ग्राम विकास की योजनाओं को लाना चाहिये। जनप्रतिनिध्यिों को इसकी टोह लेनी चाहिये।
ग्राम के सबसे बुजुर्ग हंसा सिंह गनघरिया बताते हैं कि उनके बुजुर्गो के जमाने से ही जोहार से थाला आया करते थे, तब यह जंगल था। तिब्बत व्यापार के समय भेड़-बकरियों के साथ वह लोग तिब्बत जाया करते थे। कपकोट होते हुए हल्द्वानी भाबर तक उनकी यात्रा होती थी। भेड़-बकरियां गुड़ की भेलियां लादकर चलती थीं। चीन यु( के बाद व्यापार बन्द होते ही जो जहाँ था, वहीं रुक गया। पहले आबादी कम थी, अब आबादी बढ़ने के बाद जरुरतें भी बढ़ गई हैं। पहले जंगल और पानी सब था। अब गाँव में पानी के लिये हाहाकार मचा हुआ है।
पिघलता हिमालय 4 जुलाई 2016 के अंक में प्रकाशित