संस्मरण यात्रा कानपुर से नैनीताल

नवीन चन्द्र उपाध्याय

अप्रैल के मध्य में ही इस बार पारा चालीस को पार कर गया था। मैं साइकिल से बारह बजे वाली ड्यूटी के लिये घर से निकला। लू के प्रकार की गर्म हवा के थपेड़ों को चीरते हुए मेरी साइकिल के टायर दम फुलाये पिघलते डामर की सड़क को तय कर रही थी।
कानपुर के मिलों की चिमनियों का धुंवा आग उगल रहा था। गन्दी संकरी गलियों में सड़ांघ के मारे दम निकला जा रहा था। नालियों में कुछ सुअर गर्मी के से बचाव करने के लिये पसरे पड़े थे। कुछ ठेला लगाने वाले मजदूर इन गलियों में ठेलों के उपर थकान मिटा रहे थे। हलवाइयों व चाय की दुकानों में मक्खियां इस कदर मडरा रही थी कि मानो दुकान पर मिठाई न होकर मक्खियां ही बिक रही हों। मैं कुछ गलियां पार कर आगे बढ़ा ही था कि सामने एक लम्बी सी कतार भैंसा गाड़ियों की लगी थी जो चर्र मर्र की की आवाज करते कच्चा चमड़ा टेनरी को ढो रहे थे। कच्चे चमड़े की की बदबू उमस भरी गर्मी में बुरा हाल करने वाली होती है।
किसी प्रकार इस मुसीबत से पाला झाड़ आगे को बढ़ा फूलबाग चैराहा पार किया। नाम तो फूलबाग है पर फूल के नाम पर कोई पौंध तक इसमें नज़र नहीं आया। फूलबाग नाम से थोड़ा मन हलका कर कार्यालय पहँुचा, जहाँ की बिजली गुल थी। टेलीप्रिंटर मशीनों को चलाने के लिये जनरेटर चला था जिसका ध्ुंआ गरमी में और इजाफा कर रहा था।
पसीने से तरवतर होकर रूमाल से हवा फटकते हुए मैं किसी प्रकार अपनी सीट पर बैठा ही था कि कार्यालय का चपरासी दौड़ा हुआ आया। उसके हाथ में कोई कागज था, वह ठीक मेरे मेज के सामने खड़ा हो गया। मानो मुझे मुजरिम समझ कर पुलिस वाला कोई कोर्ट का समन दे रहा हो। मैं उसे देखकर थोड़ी देर के लिय घबराया। अपने आपको संयत कर थोड़ी दबी जुवान से से पूछा- क्या लाये हो? कोई गलती तो नहीं हुई? चपरासी ने मुस्करा कर जवाब दिया- बाबूजी स्थानान्तरण आदेश लाया हँू। साहब बता रहे थे कि आप बड़े भाग्यशाली हैं। गर्मी के दिनों में नैनीताल की ठण्डी हवा खाने जा रहे हो ‘आपका स्थानान्तरण हो गया है।’ चपरासी की बात सुनते ही मैंने झपट्टा मार कागज छीन लिया और मन से सारी थकान व गर्मी को अलविदा कर आगे की कार्यवाही में जुट गया।
नैनीताल के बारे में सुना ही भर था पर गया कभी नहीं था। मेरे दादाजी नैनीताल के डाकखाने में मुलाजिम थे उस जमाने में जब प्रसि( शिकारी जिम कार्बेट के पिताजी वहाँ पोस्ट मास्टर हुआ करते थे। दादाजी बताते थे कि नैनीताल में इतनी सर्दी पड़ती है कि यदि कोई आदमी सुबह नहा कर अपने कपड़े सुखाने को बाहर डाले तो वह वर्फ के समान जम कर छड़ी जैसे बन जाते थे।
इन्हीं कल्पनाओं के साथ मैं नैनीताल रवाना हुआ। यात्रा के दूसरे दिन नैनीताल बस स्टैण्ड तल्लीताल ;डांठ पर खड़ा था। चारों ओर दृष्टि डालते हुए मैं अचम्भित सा रह गया था। एकाएक ऐसी जगह पहँुच गया था या तो वह देवताओं का निवास है या कोई सपना है किसी स्वर्गलोक का! मेरी तंद्रा एक कुली ने यह कहकर तोड़ी- बाबूजी सामान ले जाना है क्या? मेरे पास थोड़ा बहुत सामान था जो कुली को पकड़ा दिया। कानपुर की उमस गर्मी को छोड़कर जब मैं नैनीताल की काली डामर की मालरोड पर चल रहा था ऐसा अनुभव हो रहा था कि मैं किसी वातानुकूलित हाॅल में कसीदा वाली मखमली कार्पेट में पैर रख रहा हँू। मुझे सड़क पर चलने में कुछ हिचकिचाहट सी हो रही थी कि कहीं मेरे पैरों के जूतों की गन्दगी सड़क को गन्दा न कर दे।
सुन्दर हरा रंग लिये हुए शान्त तालाब में सपफेद बतख झुण्ड बनाकर खेल रहीं थी, मानो मानसरोवर के हंस हों। चारों ओर पहाड़ियों में घने बांज, देवदार व पोपलर के पेड़ों की पंक्तियां शोभायमान थी जिनसे प्रतिविम्बित होकर तालाब का रंग गहरे हरे रंग में बदल गया था। जो बहुत ही मनोहारी दृश्य था।
सामने की पहाड़ियों मं सफेद बादल छिटक रहे थे। इन पहाड़ियों में छोटे-छोटे बंगलेनुमा भवन बने थे जिनकी छतें हरे व लाल रंग की चादरों से बनी थी और दीवारों का रंग सपफेद था। ऐसा मालूम हो रहा था कि ये भवन आकाश के सितारे हों। मालरोड अतिशान्त वातावरण व घने वृक्षों की शीतल छाया में यदाकदा हाथ रिक्सों की आवाजाही के अतिरिक्त कुछ पैदल यात्राी भी तल्लीताल व मल्ली ताल को सपफर करते दिख रहे थे। गज़ब की शान्ति व स्वच्छता का वातावरण था। स्थानीय वोट हाउस क्लब में किसी पिक्चर की सूटिंग चल रही थी, जिसे देखने को थोड़ी बहुत स्थानीय जनता खड़ी थी। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बड़े शहरों में इस प्रकार के आयोजन कराने में पुलिस बल की सहायता लेनी पड़ती है क्योंकि अपार भीड़ को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है लेकिन यहाँ पर पुलिस की कोई आवश्यकता नज़र नहीं आ रही थी। स्कूल कालेजों में बच्चों की उपस्थिति का आभास नहीं मालूम पड़ रहा था। जबकि इस छोटे शहर में जनसंख्या के अनुपात से कहीं अध्कि विद्यालय हैं, जहाँ पर दूसरे शहरों के विद्यार्थी अध्कि मात्रा में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। शहर का अध्किांश भाग जंगल से घिरा था, निचले इलाकों में थोड़ी बहुत दुकानें तथा एक खेल का मैदान था। मैदान के एक छोर पर देवी ;नैनादेवी का मन्दिर व दूसरे किनारे पर गुरुद्वारा साहिब व मस्जिद था, जिनमें सभी वर्गों के लोग आते जाते दिखाई दे रहे थे। आज के समय में जब राम मन्दिर व बावरी मस्जिद का विवाद उग्र रूप धारण करता जा रहा है। यहाँ नैनीताल में लोगों को ईद, दिवाली, होली, रामलीला साथ-साथ मनाते देखा गया। यहाँ तक कि मस्जिद व मन्दिर साथ-साथ हैं, जिनका आपस में किसी प्रकार से टकराव नहीं। दुर्गा पूजा के अवसर पर सारे धर्म के लोग एकसाथ पूजा में शामिल होते देखे गये। रामलीला में भी दूसरे वर्ग के लोग बढ़चढ़ कर भाग लेते देखे गये।
एक बार पुनः बीस साल के अन्तराल में उस हरी-भरी शान्त प्रकृति के गोद में पदार्पण करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मन में कई प्रकार की कल्पनाएं संजोये मैं उस देवभूमि के बारे में सोचने लगा जिसकी छाया में सुन्दर-झुरमुटों के बीच बैठ कर नामी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं को मूर्त रूप दिया तथा प्रकृति के चितेरे चित्राकारों ने अपनी कल्पनाओं को कागज में उतारा है। इन्हीं विचारों में खोया हुआ अचानक मैं तल्लीताल के बस स्टाप ;डांठ पर पुनः खड़ा था। जन सैलाब का भारी रेला, साइकिल, रिक्सा, टैक्सी, स्कूटर व वाहनों का जमघट देख तथा नेपाली कुलियों को वाहनों के उपर आक्रामक कोशिशें होटल एजेन्टों द्वारा यात्रियों से जबरन धक्का मुक्की आदि देख मैं घबरा गया और एक पल के लिये ऐसा लगा कि मैं पुनः कानपुर आ पहँुचा हँू। शहर की ओर दृष्टि डालने से पता चला कि पहाड़ियों व लेक के इर्द-गिर्द छोटे-छोटे घरौंदे व कहीं-कहीं पर विशाल इमारतों से पहाड़ी ढक चुकी है। उँची पहाड़ियों पर नालों के उपर भी छोटे-छोटे घर दिखाई दे रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि किसी गन्दी जगह पर चील कौवे बैठे हों। मालरोड की चैड़ाई अतिक्रमण होने से संकरी लग रही थी। लेक में पानी का रंग भी हरा न होकर मटमेला लग रहा था। पहाड़ियों हरे जंगल के बदले लिंटर वाले भवन बन चुके थे। कहीं-कहीं पर भूस्खलन के कारण मलवा पटा पड़ा था। सीवर लाइन ओवर फ्रलो कर रही थी।

अल्मोड़ा शहर: जब लोग पान खाने के बहाने शिब्बन की दुकान में जाया करते थे

संस्मरण

नवीन चन्द्र उपाध्याय

बचपन की यादें बहुत मधुर होती हैं जो कोमल हृदय और अपरिपक्व मस्तिष्क में एक सुन्दर सपने की भांति जीवन भर मंडराती रहती हैं। मेरी बचपन व शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा शहर में हुई अतः यह स्वाभाविक है कि उस वक्त की सारी खट्टी-मीठी यादें अभी भी मन को गुदगुदाती रहती हैं। चूंकि यह शहर एक सांस्कृतिक व प्राचीन सम्भ्यता को अपने में संजोये हुए है, जहाँ पर हर मुहल्ले व गली में संगीत की धारा बहती है। खासतौर पर शुद्ध शास्त्रीय संगीत की झलक यहाँ की बैठकोंहोली में मिलती है। यहाँ कुमाउनी संस्कृति व रीति-रिवाज का सम्पुट अन्य धर्मावलम्बी वर्गों में भी मिलता है। होली, दिवाली, ईद व क्रिसमस साथ-साथ मनाई जाती है। जहाँ दीवाली की बात आती है बचपन में सभी बच्चे शहर की दीवाली देखने जाया करते थे वहाँ उनको खेल-खिलौने मिठाई खाने को मिलती थी। बिजली आने से पूर्व मोमबत्ती व दिये से शहर को रोशन किया जाता था। पचासवें दशक की बात है जब पहले पहल बिजली के बल्बों की रोशनी में दिवाली मनाई गई तो सारा शहर रोशनी से नहा रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शहर आसमान के तारों से जा मिला या तारे शहर में उतर आये हों। कुछ भी रहा हो, बच्चों के लिये यह एक आश्चर्यजनक नजारा था। कभी-कभी ऐसा दृश्य तब देखने को मिलता था जब बरसात या जाड़ों में कोहरा आने पर जमीन व आसमान एक ही नजर आते थे। इसीदृश्य को देखते हुए गीतकारों ने भी गीत लिखा था-
‘‘ये आसमां छू रहा है जमीं पर
ये मिलन हमने देखा यहीं पर………..।’’
विद्यार्थी जीवन के कई रोचक प्रसंग अभी भी याद आ रहे हैं। मैं रामजे हाईस्कूल में पढ़ता था, जहाँ पर प्रार्थना सभा में बाइविल की आयात का पाठ किया जाता था क्योंकि स्कूल ईसाई मिशनरी के प्रबन्ध् न में था। अतः अधिकांश शिक्षक क्रिश्चियन वर्ग के थे। एक दिन मेरे गाँव से एक परिचित मुझे विद्यालय में मिलने आये, वे गेट पर से मुझे बाइविल का पाठ करते देख रहे थे जब प्रार्थना सभा समाप्ति पर थी वे अचानक मेरे बगल में खड़े हो गये मुझे बाइविल न पढ़ने के लिये कहने लगे तथा स्कूल बदलने को कहा। इस पर चुप होकर मैं उनको सुनने लगा जब उनका भाषण खत्म हो गया मैं उन्हें विद्यालय के भीतर ले गया जहाँ हर कमरे की दीवार में बाईविल की आयतें लिखी थी वे इस प्रकार से थी-
‘‘ईश्वर सबका एक है। ईश्वर से प्रेम करो। भगवान का भय बुद्धि का प्रारम्भ है।…..।’’ वे सज्जन इनको
पढ़कर कहने लगे- यह तो हमारे धर्मग्रन्थ में भी लिख रहता है। तब मैंने उनसे कहा कि अधिकांश लोग अन्ध्कार में रह कर एक-दूसरे के धर्म की निन्दा करते देखे गये हैं। वे सज्जन सन्तुष्ट होकर वापस चले गये और मैं अपनी कक्षा में। उस समय मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ता था, मेरी हिन्दी की कक्षा थी, हमको हिन्दी पढ़ाने वाले अध्यापक श्री केशवदत्त पाण्डे जी थे जो साधरण सा लिवास पहने रहते थे तथा उच्च विचारों के एक योग्य अध्यापक थे। उनके पढ़ाने का तरीका ऐसा था कि कक्षा के बच्चे एकदम शान्तचित्त होकर उनको सुना करते थे, वे बीच-बीच में कुछ कहानियां व रोचक प्रसंग भी सुनाया करते थे। एक बार उन्होंने एक रोचक प्रसंग विद्यालय के बारे में सुनाया। प्रसंग इस प्रकार था कि विद्यालय में कुछ अंग्रेज अधिकारी पैनल मुआयने में आये थे उनमें से एक अधिकारी अंग्रेजी अध्यापक की कक्षा का निरीक्षण करने गया, साथ में काजेल के प्रधनाचार्य मि.रावत भी थे अध्यापक को सम्बोधित करते हुए अधिकारी ने कहा- ‘मि.आपका शाब्दिक उच्चारण ठीक नहीं है, ठीक से अंग्रेजी के शब्द बोलिये।’ रावत जी भी अध्यापक का उच्चारण सुन रहे थे। उन्हें लगा कि उच्चारण
सही हो रहा है। उन्होंने अधिकारी से कहा- महाशय! अध्यापक बिल्कुल सही बोल रहे हैं। इस पर अधिकारी नाराज हो गये। रावत जी ने अंग्रेज से कहा मि. क्या आप कुमाउनी भाषा के शब्दों को ठीक से बोल सकते हैंयदि हाँ तो मैं कुछ शब्द बोलता हँू आप उन्हें ठीक उसी प्रकार दुहरायेंगे
बोलें- मडुवाक रऽवाट’, अंग्रेज अधिकारी के मुख से निकला- ‘मडुवाक ल्वात’। इस पर सभी बच्चे हँसने लगे तब रावत जी ने उन्हें समझाया कि भौगोलिक परिस्थितियों व जलवायुके अनुसार ही हमारी जीभ व मँुह का संचालन होता है। ठण्डी जलवायु के लोग अपना मँुह गर्म जलवायु के व्यक्तियो की अपेक्षा कम खोलते हैं जिससे उनका उच्चारण प्रभावित होता है। इस पर अंग्रेज अफसर चुप होकर चला गया।
मध्यान्तर हुआ हम सभी विद्यार्थी बाहर निकले और इसी प्रसंग की चर्चा में हँसते रहे। बाजार में
कन्हैयालाल नन्दलाल के यहाँ दूध् पीने चले गये जो उस वक्त एकआने में एक गिलास मलाई डालकर मिलता था, वह दूध् आज भी याद आता है। अगली कक्षाओं के लिये कुछ समय अभी बचा था, हम सभी शिब्बन पान वाले की दुकान के सामने रेडियो सुनने चले गये। वहाँ पर अधिकांश लोग पान खाने के बहाने रेडियो समाचार व आजाद कश्मीर रेडियो के गाने सुना करते थे। छुट्टी के दिन या इतवार को हम लोग ब्राइटन कार्नर घूमने जाया करते थे और लौटते समय रीगल सिनेमा के सामने ठेला लगाये बाबा के यहाँ स्वादिष्ट गोलगप्पे का आनन्द लेते हुए बसंल होटल के गुलाब जामुन खाना नहीं भूलते थे।
इस प्रकार विद्यार्थी जीवन की छोटी-मोटी बातें आज भी दिलो-दिमांग में घूमती रहती हैं। एक बार नन्दादेवी के मेले में मुझे अपने फूफा जी केसाथ जाने का अवसर प्राप्त हुआ। फूफा जी मुझे अपने कन्ध्े में बिठा कर बावन सीड़ियां चढ़कर मन्दिर परिसर में ले गये, जहाँ बहुत भीड़ एकत्रित थी कारण था भैंस की बलि चढ़ाना लोग देख रहे थे। मैं फूफा जी के कन्ध्े में बैठा सबसे आगे वाली कतार में था। बलि का भैंसा लाया गया साथ में एक खड्ग हाथ में लिये खटिक भी था। राजा काशीपुर के हाथ में खड्ग पकड़ा कर खटिक ने एक ही बार में भैंस की गरदन से सिर अलग कर दिया, खून की धारा बहने लगी। हृदय विदारक दृश्य को देखकर मेर बाल मन विकल हो उठा और मैं बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा। साथ ही मेरे फूफा जी भी गिर पड़े। दोनों को चोटें आई। किसी प्रकार हम लोग घर पहँुच पाये। कई दिनों तक मेरे दिमाग में वह वीभत्स घटना तैरती रही जिससे मुझे रात नींद में चिल्लाने व उठ कर बैठ जाने की शिकायत हो गई। आज भी मैं सोचता हँू कि मनुष्य ने अपनी सुख सुविधा व मनोकामना के लिये या कहें मनोरंजन के लिये निरीह प्राणियों पर किस प्रकार से अत्याचार करते हैं जो एक जघन्य पाप की श्रेणी में आता है। अभी तक यहप्रथा चली आ रही है। कुछ हद तक सरकार ने इसको प्रतिबन्धित किया है। फिर भी लोग चोरी-छिपे ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं जो अनुचित है।

पिघलता हिमालय 1 दिसम्बर 2014 के अंक से