तीन बार अपनी मौत का समाचार सुन चुके थे

स्व.आर.सी.पन्त स्मृतियाँ

डाॅ.पंकज उप्रेती
कुमाउँ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रमेश चन्द्र पन्त जी का 18 मई 2018 को हल्द्वानी उनके आवास में निधन हो गया। इसी दिन कुविवि का नैनीताल में दीक्षान्त समारोह भी था। मूल रूप से ग्राम जजुट, गंगोलीहाट निवासी 73 वर्षीय पन्त जी सालभर से अस्वस्थ्य थे और अपने घर पर भी स्वध्याय में लगे रहते थे। हल्द्वानी शहर के चैयरमैन रहे दयाकिशन पाण्डे की सुपुत्राी से उनका विवाह हुआ था। श्रीमती पन्त का भी दो साल पूर्व निधन हो चुका है। पन्त जी के घर में उनके एक सेवक के अलावा कोई नहीं है। उनके भाई-बहन मिलने आ जाया करते थे। ईमानदार और मृदुभाषी के रूप में आरसी पन्त की पहचान रही है। इतना नरम होने के बाद भी उनकी अपनी टेड़ के कारण कुलपति के रूप में वह कई को नाराज कर गये। जर्मन भाषा को जानने वाले पन्त जी संस्कृत के भी प्रकाण्ड थे और हिन्दी में ही कामकाज को पसन्द करते थे। एकाकी जीवन बिता रहे पन्त जी ने अपनी पत्नी के निधन के बाद उनके नाम की तराई में कीमती भूमि बेचकर दरउ क्षेत्र में एक विद्यालय भी स्थापित किया था जिसकी देखरेख के लिये वह परेशान रहने लगे थे। करीब 6 माह पूर्व अटैक पड़ने के कारण एक दिन वह अपने बाथरुम में घण्टाभर बेहोश रहे, बाद में दिल्ली में उनका इलाज हुआ। तब से उन्होंने इधर उधर जाना भी बन्द कर दिया था।
पिघलता हिमालय समाचार पत्र परिवार से उनके मध्ुर सम्बन्ध् थे और इसके संस्थापक सम्पादक स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती को वह बहुत मानते थे। इनके कई आयोजनों में वह पधरे। बुजुर्गवार पन्त जी से मिलने के लिये मैं बीच-बीच में जाया करता था। करीब दो माह पूर्व मैंने दैनिक पत्र में समाचार पढ़ा- ‘पूर्व कुलपति पन्त का निधन’। दरअसल इस नामराशि के पूर्व रजिस्ट्रार पन्त जी के निधन को गलती से पूर्व कुलपति छापा गया था। मैंने पन्त जी को बताया तो वह बोले- ‘अपनी मौत का तीन बार समाचार सुन चुके हैं। पढ़ाई के दौरान किसी के निधन पर उन्हें मान लिया गया। उसके बाद देवीदत्त पन्त के निधन पर मुझे मरा जानकर देखने आ गये थे। अब तीसरी बार तुमने मौत का सामाचार सुना दिया है।’ और हँसने लगे। अब पन्त जी हमारे बीच नहीं हैं, उनकी स्मृतियाँ बनी रहेंगी।

पिघलता हिमालय 28 मई 2018 के अंक से

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