पुस्तक समीक्षा
प्रयाग जोशी
विगत वर्ष यानी 2018 में लिखी गजेन्द्र सिंह पांगती की चाौथी किताब पढ़ने को मिली। यह किताब ‘धर्म राय: जोहार का जनसेवक’ शीर्षक से छपी है, जो 1889 में, मिलम में पैदा हुए थे और 1964 में उनकी मृत्यु हुई थी। जेठुवा शौका के लड़के धर्म सिंह को उनकी जाति-विरादरी के लोग बचपन में धरमू के नाम से जानते थे। जेठुवा का परिवार शौका समुदाय के औसतन खाते-पीते परिवारों से बेहतर स्तर का था। तेजू और धरमू दो भाई थे परन्तु माता-पिता की मृत्यु के बाद वह हैसियत नहीं रही। धरमू की तो पत्नी भी मर गई तो उसने उसकी बहन से दूसरी शादी की। जिससे एक लड़की हुई। दुर्भाग्य ऐसा रहा कि कुछ ही समय के बाद वह पत्नी और उससे उत्पन्न लड़की भी जीवित नहीं पह पाए। पिता के बखत का तिब्बत के साथ व्यापार के संग-संग चला आता बकरियों और घोड़ों की तिजारत व भारवाही का धन्धा भी चैपट हो गया। समय ऐसा आया कि पशुओं के नाम पर उसके पास सिपर्फ एक झुप्पू ही शेष रह गया। विपदा ऐसी आ पड़ी कि धरमू को, नीतिघाटी के मूल निवासी और पीपलकोटी के समीप भीमतल्ला गाँव में जाकर बसे हुए अपने मामा के आसरे जाना पड़ा जिससे उसे धन्धे में लगाने के लिए पाँच बकरियाँ दीं। उनकी पीठ पर सामान लाद कर, एक पूरे मौसम में उसने पीपलकोटी और जोशीमठ के बीच फेरी का काम किया और इतनी कमाई की कि उससे उसने अपने घर भैंसखाल आकर दस और बकरियाँ खरीदीं। तीसरी बार शादी की जिससे उसका घर व व्यवसाय जमा। उस सीजन के फायदे से, बहुत बाद के वर्षों में धरमू ने पीपलकोटी में पूरे शीतकाल की अवधि के लिए दूकानदारी भी शुरु की और उस अनुभव को काॅडा में भी दुहराया।
सम्भवतः वह बीसवीं सदी का दूसरा दशक रहा होगा जब ध्रमू ने अपने पुश्तैनी भारत-तिब्बत व्यापार में हिमालय के नाके के आर-पार आने का रूटीन पकड़ा होगा।
उन दिनों मिलम मार्ग से कैलास- मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के दलों को भी शौका व्यापारियों के साथ की जरूरत पड़ती थी जिनमें अधिकांश धनीमानी देशवासी और साधू-महात्मा हुआ करते थे। कठिन यात्रा थी। सुविधओं का अभाव था। धरमू सार्थवाही के साथ-साथ यात्रियों की सुख-सुविध भी जुटाते थे। उनकी सेवा-टहल करते। मिलम में उनके रहने-खाने और विश्राम की मनोयोग से व्यवस्था करते थे और कुँगरी-बिंगरी, उटाध्ुरा और जयन्ती पहाड़ों के उस पार तिब्बत में पड़ने वाली पहली बस्ती गेरती तक पहँुचाने में सहायता करते थे।
व्यापार का रुख व किस्मत अनुकूल होती गई। मेहनत, हुनर, ईमान व सेवाभाव की बलिहारी है कि पन्द्रह बकरियों की पूँजी से शुरु हुआ धरमू का कारोबार डेढ़ सौ से दो सौ बकरियों के रेबड़ तक पहुंचा। भारवाही बकरियों के अलावा लगभग उतनी ही भेड़ें भी उसके ख्वाड़ में भर गई जो उन उत्पादन का जरिया थी। उसके पास छः सात घोड़े-खच्चर हो गए। उसने भेड़ चराने के लिये अण्वाल, बकरियों के लिये ग्वाले, सामान चढ़ाने- उतारने के लिए ढकरियाल, घोड़ों के साईस, घरेलू काम के लिए नौकर-चाकर रखे। पशु-मवेशी और व्यापार की वृद्धि के साथ मुद्रा धन भी उत्तरोत्तर बढ़ता गया। 40 वर्ष की उम्र तक धर्मसिंह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता ही गया परन्तु चालीस की उम्र आते आते उसे दमे की शिकायत होने लगी थी तो उसने हिमालय के आर-पार की आवाजाही और मवासा लेकर मिलम-मुनस्यार से नघर इलाकों में आवत-जावत धीरे-धीरे कमतर कर दी। वे जून से सितम्बर तक मिलम में रहते थे जहाँ से वे तिब्बत के साथ होने वाले व्यापार का संचालन, कैलास मानसरोवर जाने वाले तीर्थ यात्रियों व साध्ु-सन्तों की सेवा व दवा-दारु का जनसेवा की भावना से संचालन भी करते थे। अक्टूबर-नवम्बर में वे मुनस्यारी आ जाते थे। पँूजी का इश्तेमाल ब्याज पर रिण देने में शुरू किया। यह साहूकारी का धन्धा था। इसकी बढ़त से उसने तिकसेन-मुनस्यारी, तेजम-भैंसकोट आदि ठिकानों में खेत खरीदने शुरु किये। भतीजे महिमन सिंह की हिस्सेदारी खरीदने के बाद तो धर्म सिंह के पास काफी जमीन हो गई जो तल्ला जोहार के कई गाँवों में फैली हुई थी जो साठ के दसक में जमीदारी उन्मूलन के एक्ट के अन्तर्गत् सीलिंग में आई थी।
धर्म सिंह अपने खेतों को काश्तकारी के लिए बटाई पर देता और बदले में उपज का अनाज वसूलता था। धरमू , सेठ तो था ही, जमीन के मालिकाने से शौको के समुदाय ने उसे धरमूसिंह सेठ की जगह धरम राय कहना शुरु कर दिया। ंअंग्रेजों ने, मैदानों में कायस्थ जमीदारों को ‘राय’ की उपाधि देने का चलन शुरु किया था। अंग्रेजी सरकार हजार-बारह सौ सालाना लगान के मालिकाने के भू-क्षेत्रों केा इनाम के बतौर देकर भी अपने चहेतों को भी ‘राय’ बना देती थी। लोगों में ऐसे राय बहादुरों का रूतबा हो जाया करता था। किशनसिंह रावत को सर्वे आॅफ इण्डिया के लए उत्कृष्ट काम करने के लिए झलतोला स्टेट देकर रााय साहबी से नवाजा गया था। धर्मसिंह को अपने व्यापारिक जोखिम से अर्जित पँूजी से खरीदी गई जमीन के एवज में अंग्रेज भला क्यों ‘राय साहबी’ देते। लेकिन शौका समुदाय में वह राय साहब प्रसिद्ध हो गए थे। परन्तु धरमू शब्द की पारिभाषिकता न ‘सेठ’ शब्द से सार्थक होती है न ‘राय’ से। सेठ-साहूकारी और जमीदाराना राय साहबी तो उसके लिए रोजी-रोटी व कुटुमदारी के लिए जुटाए गए ‘ऐसेट’ भर थे। उसने भौतिक माया के साथ धर्म की संगति को कितनी मानवीयता से जोड़ा, इस कत्थ्य को पांगीत ने ‘धर्मिक आस्था व कार्य, जन सेवा, मापांग और दूधपानी शीर्षकों के चार परिच्छेदों में विस्तार दिया है। ये धर्मसिंह के जीवन से जुड़े हुए गैर- व्यावसायिक लोकोपकारों के लेखे-जोखे हैं जिनको रेखांकित करने के लिए कौशल्या की सटीक स्मृतियाँ उल्लेखनी हैं।
‘उनका रिंगाल से बना एक कैश बाॅक्स था। वह बाहर से बाघ के खाल से मढ़ा हुआ था। उसे प्याटरी कहते थे। पूरे घर में एक ही प्याटरी थी। उसका ताला एक अंक का प्रयोग करने पर ही खुलता था। व बन्द होता था। समय के साथ बाबा की आँखें कमजोर हो गई थीं। मैं साथ में हुई तो ताला खोलने और बन्द करने का काम मेरा ही होता था। पैसा तो उसमें ज्यादा होता नहीं था लेकिन पैसा उधर लेने वाले आते रहते थे। मैं कहती पैसा तो है नहीं क्येां दे रहे हो। वे कहते थे जरूरतमंदों को देना भला होता है। कल कोई उधर चुनाने वाला भी आएगा। तब पैंसा आ आएगा।’ इसी तरह के विचारों से उनमें जनसेवा और परोपकार की भावना जागी और उन्होंने अपना समय और धन निःशुल्क दवा वितरण, सड़क निर्माण, मिलम गाँव में पानी लाने जैसे जनसेवा के कार्यों को समर्पित कर दिया था। यद्यपि वे ऐसे कार्यों की शुरुआत अपनी दूसरी पत्नी व मृत- पुत्री के स्मारक के रूप में एक धर्मशाला का निर्माण करके बहुत पहले ही कर चुके थे। यह धर्मशाला मिलम से एक पड़ाव आगे समगों के बयाबान में बनाई गई थी जहाँ हिमालय के बकरिया बाटों में चढ़ने वालों को खुले आकाश में रात गुजारनी पड़ती थी। कोई-कोई टैंट लगाते या पत्थरों की आड़ या ओड्यारों में शरण ढूंढते थे।
धर्म सिंह नित्य सुबह शाम मिलम स्कूल से लगे विस्तृत मैदान और मिलम कचहरी में देखने जाते कि क्या कोई नया यात्री आया है। यात्री बहुधा उक्त मैदान में टैंट लगात थे। कुछ अकेले आने वाले साध्ू पांगती कचहरी में भी ठहरते थे। वे हर यात्री से अनुरोध् करते कि उनके घर भोजन करने आयें। साध्ु लोग तो निमंत्रण सहर्ष स्वीकार कर लेते लेकिन कुछ सम्पन्न यात्री असमर्थता जताते। जो भोजन के लिए नहीं मानते उनसे वे अनुरोध् करते कि कम से कम जलपान के लिए अवश्य आयें।
1936 के आसपास एक साध्ू के लिए धर्म सिंह ने पुरदुम में कुटिया बनाई थी। कौशल्या लिखती हैं, ‘हमने बचपन में किस्म-किस्म के साध्ुओं को देखा। कोई मौनी बाबा, कोई फलाहारी, कोई सिर पर ढेर सारी लट्टीधरी, कोई बहुत ज्ञानी, कोई बातूनी जिन्हें वे खाना खिलाते और कैलास व तीनध्ूरा पार करने के बारे में बताते थे। उन्हें, वे अपने घोड़ों व बकरियों के साथ भेज कर हिमालय पार कराते थे।
एक बार एक अकेली औरत कैलास जा रही थी। उस औरत को भाभियों के साथ रखा। वह पाँच दिन तक रही। जिस साध्ू के लिए उन्होंने पुरदुम में कुटिया बनाई थी, उसके लिए 15 नाली जमीनी खरीदी थी। वहाँ सुरई के सुंदर पेड़ जगाए थे। बाद में कुटिया के साथ धर्मशाला भी बनवाई।’ उक्त बाबा के संक्षिप्त वृत्त में योग के गूढ़ रहस्य पढ़ने लायक हैं।
सन् 60 के दसक में धर्मसिंह ने मिलम में भी एक नित्वाल का घर खरीदा था और उसे अपने लड़के बालमसिंह की याद में धर्मशाला के रूप में सुरक्षित कर दिया था। उन दिनों भैंसखाल से शामा होकर बागेश्वर को आने वाले रास्ते की सीधी चढ़ाई में प्यास के मारे लोगों के कंठ सूख जाया करते थे। निर्पाणी रास्ता था। धर्म सिंह ने बाखर धार में निज के खर्च से प्याउ बिठाया था। उसमें नियुक्त किया गया आदमी रामगंगा से अथवा रमारी के किसी नौले से कनस्तर में पानी भर लाता और बाॅखरधर में लाकर लोगों को पानी पिलाया करता था। धर्मसिंह ने इसी प्रकार बोग्ड्यार और मापांग के बीच अपने खर्च से अपेक्षाकृत बेहतर मार्ग का निर्माण करवाया था। इस रास्ते से चलकर पहाड़ी की चोटी पर पहँुचने वालों के लिए कुछ दिनों तक उसने चने चबेने के वितरण की भी व्यवस्था की थी। एक बोरी चना और स्टील के कंटेनर में चाय भरकर रखी रहती थी। एक आदमी दिन भर वहाँ मुश्तैद रहता था जिसकी मजदूरी धर्मसिंह देता था। आज की भाषा में ट्रेकरों के लिए जुटाई जाने वाली इस तरह की सार्वजनिक सेवाओं के तरीके, धर्मसिंह जैसे उदार और पर्वत प्रेमी बुजुर्ग के मौलिक मन में ही आ सकते थे। गांेखा गाड़ के पानी को गूल के निर्माण के जरिये मीलम गाँव में पहँुचा देना तो धर्मसिंह की अद्भुत और अचंभित कर देने वाली कार्य योजना थी। मलेथा की गूल निर्माण में जो पुरूषार्थ माधेसिंह भण्डारी ने कर दिखाया था वैसा ही पुरूषार्थ है यह धर्मसिंह का। फर्क सिर्फ एक है मलेथा में माधेसिंह के द्वारा पुत्र के बलिदान की जनश्रुति है। मीलम की पेयजल योजना धर्मवीर और दानवरी जनसेवक की चरितार्थता है। एक पहाड़ी को काटकर और गोरीगंगा जैसी बड़ी सदानीरा नदी के उफपर से लकड़ी के पनालों से मीलम गाँव में लाया गया पानी धर्मराय की जैजैकारी का कारक बना था।
भौगोलिक रूप से अति विकट और आध्ुनिक देश-काल में शून्य जमा पूँजी से सार्थवाही व्यापार प्रबन्ध शुरू करके अपनी जमात का यशभाजन बनने के उपरान्त थे, धरमू के व्यक्तिगत जीवन के महत्तर को पकड़ने की ईमानदार कोशिश की है गजेन्द्र सिंह पांगती ने। धर्मसिंह, लेखक के पितामह के भाई हैं परन्तु उसके लेखन में रिश्ता उपर नहीं है। उसमें न डींग है न अपने को महिमामंडित करने का प्रयास। यह धर्मसिंह की जीवनी तो है ही प्रकारांतर से शौका-जीवन के कत्थ्य को समूह- जीवन के विस्तार में इस ढंग से फैलाया गया है कि वह व्यक्ति की दास्तान होते हुए भी 20वीं सदी के शुरु के पचास वर्षों की शौका-समुदाय की जीवन- संधरिणी गाथा भी बन गई है। इसे, शौकों के महा-हिमालय के आर-पार चलने वाले व्यापार के साथ जोहार और भाबर के बीच चलने वाले तीन-तीन जलवायुओं में चलने वाले मवासा-मौजा परिवर्तन करते रहने की दुश्वारी के साथ उनकी विकसित हुए अर्थ-तंत्र के शास्त्रीय विवेचन की एक और किताब भी कह सकते हैं।
इस किताब का एक आधुनिक आयाम भी है। आजकल नौकरी और दूसरे धंधे के लिए लोगों की आवाजाही वैश्विक हो गई है। लोग जहाँ जा रहे हैं, वहीं घर खरीद कर बस जा रहे हैं। ऐसेे लोगों के संज्ञान में यह जानकारी रखनी जरूरी होती जा रही है कि उनके रक्त संबंधी, भाई-बिरादर कहाँ-कहाँ हैं, कैसे हैं और क्या कर रहे हैं। पैत्रिक गाँवों, नाते-रिश्तों और अपनी जड़-कंजड़ से जुड़ाव रखने वाले समझ-बूझदार लोग उन सारी सूचनाओं का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। इण्टरनेट व मोबाइलों की मदद से अपने वंशध्रों की सामूहिक सूचनाओं को एकत्रित करके दस्ताबेजी किताबों के प्रमाणिक वृहत्तर संस्करण भी छपकर आ रह हैं। इस किताब में भी कौम का दस्तावेजीकरण तो है ही, साथ ही उसका सामाजिक अध्ययन, उसकी कमियाँ, सांस्कृतिक संचेतना और उनके धर्म, नृवंश और इतिहास के तहकीकात की कोशिश है। लेखक ने जहाँ तक हो सका है पिष्ट-पेषण से बचने की कोशिश की है। लेखक की दिली इच्छा है कि शौकों पर अभी तक जितना व जो लिखा गया है उसका मूल्यांकन हो। जो खोजने को बचा हुआ है उसे खोजा जाय। उसकी जद्दोजहद 1950 के बाद अपने समाज में पैदा हुए बच्चों तक उन जातीय स्मृतियों को पहँुचाने की है जिनमें तिब्बत के साथ व्यापार करने की जोखिमें मित्रता पर आधरित व्यापार पथों पर गमनागमन, कौमी विशिष्ट जीवन शैली और कठिन जीवन-यापन से जुड़ी सहजता है। वक्त की विडम्बना है कि नयी पीढ़ी उसे विस्मृत करती जा रही है।
