
इसलिए हम चाहते हैं कि ऐसी नीतियाँ बनायी जायें जिनमें नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को प्राथमिकता देने के साथ साथ जीवाश्म ईंधन, कोयले के प्रयोग को कम किया जाए. जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम हो. हम ऐसा भविष्य चाहते हैं जिसमें धरती का तापमान मनुष्यों के साथ साथ अन्य पशु पक्षियों के भी रहने लायक हो. लेकिन ऐसे भविष्य के लिए हमें अपनी रोज़मर्रा की कार्यप्रणाली में बदलाव लाना ही होगा, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर को शून्य करना होगा. इसी उद्देश्य से यह वैश्विक मुहिम चलायी जा रही है, जिससे लोग जलवायु परिवर्तन के संकट के बारे में जागरूक होंगे और फ़िर नीतियों के निर्णयकर्ता भी सही नीतियाँ लाने के लिए प्रेरित होंगे.
इस अभियान की कुछ माँगे हैं कि कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों को मिलने वाली आर्थिक सहायता बन्द हो. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को प्राथमिकता मिले एवं भविष्य में सारी बिजली सौर और पवन ऊर्जा जैसे केवल नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त हो. जिससे धरती का “औसत तापमान” 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा ना हो. धरती के कई इलाकों में तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस को पहले ही पार कर चुका है, इससे हमें यह पता चला कि जलवायु परिवर्तन पूरी धरती पर एक तरह का प्रभाव नहीं डालता है. यदि किसी स्थान पर तापमान साल दर साल बढ़ रहा है, तो अन्य किसी स्थान पर यह भी सम्भव है कि तापमान साल दर साल गिरता ही जाय. अगर धरती का औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक को जाता है तो, चक्रवात, बाढ़, सूखा पड़ना, आम बातें हो जाएंगी.
एक रिपोर्ट के अनुसार यह पता लगा कि केवल 100 कम्पनियां ही 71% वैश्विक ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार हैं. यदि ऐसी कम्पनियों पर कार्बन टैक्स लगाया जाय, तो यह सम्भव है कि वो अपने उत्सर्जन के स्तर में कमी लायेंगें व जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को कम करेंगे. और इस टैक्स से मिली राशि से हम नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को और आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए उपयोग कर सकते हैं.
150 साल पहले ही, करीब 1850 में ही यह पता लगा लिया गया था कि जीवाश्म ईंधन जैसे तेल और कोयला ज़मीन से निकालकर इस्तेमाल करने से जो हानिकारक गैसें उत्सर्जित होती हैं वो धरती पर एक कवच की तरह इकट्ठी होकर सूरज की गरमी को कैद कर लेती हैं, जिससे धरती का तापमान बढ़ता है और यही ग्लोबल वार्मिंग जलवायु परिवर्तन को ईजाद करती है.
इतना शोध होने के बाद भी जीवाश्म ईंधन के उपयोग में बढ़ॊत्तरी देखने को मिल रही है, क्यूँकि इससे हमारी अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है और हमारी कार्यप्रणाली में बदलाव लाना भी मुश्किल है. लेकिन नीतियाँ बनाने वाले लोगों को यह आभास होना ज़रूरी है कि अल्पकालिक आर्थिक लाभ वाली नीतियाँ ही सदियों तक चलने वाले जलवायु परिवर्तन के लिये ज़िम्मेदार हैं.
और यह कहना गलत होगा कि यह जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक कारणों से हो रहा है. आईपीसीसी (IPCC) की रिपोर्ट के अनुसार औद्योगीकरण के बाद से मनुष्यों का ही जलवायु परिवर्तन में सबसे बड़ा योगदान रहा है. हमारा कार्बन फ़ुटप्रिन्ट इस बात की गवाही देता है कि हर एक व्यक्ति अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों का कितना उत्सर्जन करता है. उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति पास ही के किसी स्थान पर जाने के लिये किसी जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहन का प्रयोग करता है तो उसका कार्बन फ़ुटप्रिन्ट उस व्यक्ति से बहुत ज़्यादा होगा जो कि पैदल ही वह सफ़र तय करता है. इस उदाहरण में कार्बन फ़ुटप्रिन्ट आपके वाहन से उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों कि राशि को कहा जाएगा. इससे साबित होता है कि हमारी दैनिक दिनचर्या भी किस हद तक जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है.
यदि हम अभी भी जलवायु परिवर्तन को जलवायु संकट के रूप में नहीं देखेंगे और अपनी कार्यप्रणाली में परिवर्तन नहीं लायेंगें तो धरती का तापमान यूँ ही बढ़ता जायेगा. यह ग्रह अन्य प्रजातियों के लिए ही नहीं बल्कि मनुष्य जाति के लिए भी बसने योग्य नहीं रह जाएगा.
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में हम सबको ही एकजुट होने की, लोगों को जागरूक करने की व इसके बारे में और अध्ययन करने की आवश्यकता है क्यूँकि जलवायु परिवर्तन को यदि अभी ही रोका नहीं गया तो आनेवाली पीढ़ी को ही नहीं हमें भी आजीवन पछताना पड़ेगा.
हिमानी मिश्र
हल्द्वानी
