कर्ण की तप स्थली है अलकनन्दा और पिण्डर नदी का संगम कर्णप्रयाग

ललित नैनवाल
जनपद चमोली का कर्णप्रयाग तीर्थों का तीर्थ है। अलकनन्दा और पिण्डर नदी के संगम स्थल पर बसे कर्णप्रयाग को कर्ण की तपस्थली के रूप में जाना जाता है। यहाँ कर्णशिला ;कर्ण मन्दिर में श्रद्धालु जाते हैं। उमाशंकर मन्दिर समिति द्वारा पूर्व में इस मन्दिर का सौन्दर्यीकरण किया गया था किन्तु उसके बाद से आज तक इसमें एक पत्थर भी नहीं लगना हमारे विकास की पोल खोलता है।
कर्णप्रयाग के बाजार क्षेत्र में ही कर्ण का मन्दिर है जिसमें कर्ण की मूर्ति के साथ ही कृष्ण की मूर्ति है। स्थानीय देवता की पूजा भी यहाँ की जाती है। कर्णप्रयाग तीर्थ के महात्म्य को जानें तो पता चलता है कि गंगा और पिण्डर के संगम पर शिव के क्षेत्र में देवालयों में महाराज कर्ण ने यहाँ दीक्षा ग्रहण की। यहाँ तप करके महादेव के मंत्र से तपकर देवी भवन ;वर्तमान उमा मन्दिर में ठहर गये थे। यहाँ ;वशिष्ठ वामदेव, व्यास देव, शुक, पैल, वैशम्पायन, नारद, तुम्बरु, भृगु अश्वसथामा, सदेव, रन्ति देव, महाहनु कश्यम तथा नदो, गालब, दलभक्षक, पॅर्णशत, महानाद, कुमधन्य, तपोनिधेश शनः, शेफ, भारद्वाज, गौतम, गणरात्रिप ये तथा बहुत से ब्रह्मवादी मुनि एवं सैकड़ों ट्टषि कर्ण के यज्ञ में आये थे। सुन्दरि यजमान राजा ;कर्णद्ध ने यज्ञ में सूर्य की अराधना की। तब कुछ दिनों में ;सूर्य ने महात्मा कर्ण को वर दिया तथा अवेद्य कवच और अक्षय तरोण ;तरकश दिये। महावीरो अजेय ;न जीते जाने योग्य होने का वर दिया तथा उसी के नाम पर उस क्षेत्र का नाम रखा गया तभी यह क्षेत्र कर्णप्रयाग के नाम से स्मरण किया जाता है।

पिघलता हिमालय 23 नवम्बर 2015 अंक से

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