मर्तोली में भी है नैनीताल

गोपालसिंह मर्तोलिया

पि.हि.प्रतिनिधि
बहुत कठिन दौर था वह जब दुनिया से कटे हुए क्षेत्र के लोग अपनी दिनचर्या में हसरतें लिये हुए आगे बढ़ रहे थे। लेकिन उन हसरतों ने ही हौंसला दिया और लोग कामयाब हुए। मल्ला जोहार के मर्तोली में ज्वाला सिंह मर्तोलिया और श्रीमती मोतिमा देवी के घर जन्म हुआ था- गोपालसिंह मर्तोलिया का। 73 वर्षीय गोपाल सिंह जी बताते हैं कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर बहुत जोश होता था बच्चों में। मर्तोली गाँव की गली-गली में बच्चे अपने हाथ का बनाया तिरंगा लेकर गाते थे- ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’। जोहार में जन्मे गोपालसिंह उन पुराने दिनों के गवाह हैं और बताते हैं कि मुनस्यारी से जोहार में माइग्रेशन में जाना-आना होता था। शिक्षक गुलाबराम जी उनके गोठ में ही रहा करते थे। प्रत्येक बच्चे की ड्यूटी थी वह बारी-बारी से राशन उनके घर पहँुचाते थे। एक बार शायद सन् 1955 में बरफ की लहर में उनका स्कूल टूट गया। प्रकृति के करीब रहने वालों ने हौंसला बनाये रखा और दूसरा स्कूल भवन बनाया गया। हमारे परिवार के पास पधानचारी थी। पिता ज्वाला सिंह जी प्रधान थे। मर्तोली में नैनीताल नामक स्थान पर हमारा मकान है। यह स्थान नैनीताल से मिलता-जुलता है। सामने दृश्य और भी मनमोहक। बुर्फू में मल्ला जोहार का पटवारी रहता था और प्रधान से टैक्स वसूली के लिये पटवारी का आना होता था। तब एक टैक्स पटवारी को देना होता था और दूसरा बागेश्वर उत्तरायणी मेले में देते थे। नन्दाष्टमी तक सारे परिवार जोहार में रहने के बाद मुनस्यारी आते थे। तब नन्दाष्टमी मेले के लिये प्रत्येक परिवार से एक बकरा बलि के लिये जाता था। वेदान्ताचार्य पुण्डरीकाक्ष महाराज के कथा प्रवचन का प्रभाव ही था कि यहाँ बलि प्रथा बन्द हो गई। अब तो पचास साल से भी ज्यादा समय हो चुका है जब बलि प्रथा बन्द है।
गोपाल सिंह बताते हैं कि आज पलायन का रोना-पीटना मचा है लेकिन पुराने कठिन समय में सारे गाँव आबाद थे। बोझा ढोकर यात्राओं पर निकले परिवारों ने ठाना था कि वह कुछ करेंगे। तब सुरिंग से मर्तोली जाने तक चार पड़ाव होते थे। खेतीबाड़ी के लिये हर साल ‘इज्जर’ बंजर भूमि खोदने का काम होता था। बंजर खोद-खोद कर आलू, सरसों, फाॅफर/उगल की खूब पैदावार होती थी। एक बार मर्तोली में घट खराब हो गया था, तब आटा पिसवाने के लिये बुर्फू तक जाते थे।
अपने बचपन की याद में भावुक होते हुए श्री मर्तोलिया कहते हैं- जोहार के बड़े ग्रामों में मर्तोली है। गाँव के बीच में कच्हरी लगती थी और सयानों के बैठने की जगह थी। नन्दाष्टमी से पहले नैनीताली पुजाई होती थी, जिसमें प्रधान पिता जी को दो बकरों का सिर मिलता था, फिर सादी पुजाई होती थी जिसमें तीन बकरों का सिर मिलता था। इसके बाद नन्दाष्टमी की पूजा होती थी। मन्दिर के पास मैदान में लगातार खेल होते थे। किसी भी विशेष सूचना के लिये छत में चढ़कर एक व्यक्ति उँफची आवाज में बोलता था, जिसे आजकल एनाउंसर के रूप में समझा जा सकता था। मेले के अवसर पर ढुस्का-चांचरी के लिये सारे ग्रामीण जुटते थे। हिलमधर में हम सभी अपनी ध्यैनियों-परिचितों को देखने जाते थे कि कौन-कौन मर्तोली आ रहे हैं। जोहार से माइग्रेसन में वापस आने से पहले सारा कामकाज समेटा जाता था। खेतों में फसल कटाई के बाद नींममुचाई याने जानवरों को छोड़ दिया जाता था ताकि रहा-बचा वह भी चर लें। उस समय के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में स्व.गोपाल सिंह और हयात सिंह ‘बनवारी’ थे। गोपाल सिंह जी यह भी बताते हैं कि पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया जब घर आते थे, उन्होंने बच्चों को गीत सिखाया था। पठन-पाठन, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम सभी में सहभागिता करते बच्चे अपनी परम्परागत पाठशाला से भी जुड़े थे। नई पीढ़ी में बहुत बदलाव आ चुका है लेकिन उन्हें अपनी जड़ों में जुड़े रहना चाहिये। अभी नन्दा माई के मन्दिर को भव्य रूप देने की तैयारी की जा रही है।

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