
पिघलता हिमालय के संस्थापक सम्पादक अपने पिता स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुण्यतिथि पर पिछले सालों की तरह इस बार भी आपस में मिलने-बैठने का यह यह अवसर बनाया है। उनकी अष्टम पुण्यतिथि 22 फरवरी 2021 के आयोजन के लिये इस बार का विषय ‘दानवीरांगना लला जसुसी शौक्याणी’ है। वैसे भी हम लोग हिमालय को लेकर हमेशा बातें करते रहते हैं। इस अवसर पर पिघलता हिमालय के संस्थापक चाचा स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया जी का स्मरण भी बना रहता है। पिता और मर्तोलिया जी ने 1978 में जिस मिशन को शुरु किया था, उसी के अनुरूप हम आज 43 साल बाद तक उसे अनवरत बनाए हुए हैं। साथ ही अपनी पूज्य माता और पिघलता हिमालय की सम्पादक रही स्व.कमला उप्रेती के त्याग को याद करते हुए किसी भी आयोजन का साहस कर पाते हैं।
जब-जब हिमालय की बात चलती है मेरे मस्तिष्क में हिमालयी संस्कृति के बहुत से रंग बादलों की तरह उमड़ने लगते हैं, इसके गीत-संगीत, कला-विज्ञान सबकुछ आंखों के सामने होता हैं। हालांकि वर्तमान की उच्छृंखलता ने पहाड़ों को भी दूषित करने की शुरुआत कर दी है। खैर, जो कुछ भी हमारी विरासत बहुत भरी हुई है। जिस काज में ईमानदारी हो, वह हमेशा स्मरण में रहते हैं। हिमालय की तमाम संस्कृतियों की पवित्रता अपनी जगह है, आपाधपी में चाहे कोई कैसा ही चित्रा बनाने लगे पर हिमालय का अपना चित्र है। वह पल-पल रंग बदलता है पर अडिग रहता है, जीवन देता है।
हिमालय की इस गोद में ही लला जसुली देवी हुईं। आश्चर्य होता है कि जिस देवी ने चार सैकड़ों धर्मशालाएं बनवाकर समाज को उपहार में दीं, उसकी ध्रोहरों को हम अपने सामने खण्डहर होता देख रहे हैं। कई में कब्जा हो चुका है और कई का नामोनिशान तक मिटा दिया गया है। यह निशानियाँ किसी एक परिवार की या एक समाज की नहीं बल्कि हम सबकी पवित्रा धरोहरें हैं। लला जसुली शौक्याणी ने तो हिमालय के अनुरूप अपना धर्म निभाया। हिमालय हमेशा से दाता है और फिर भी अडिग है।
मैंने बचपन से अनगिनत किस्से- कहानियाँ अपने माता-पिता से सुने और हिमालयी संस्कृति के उत्साह को देखा। ‘पिघलता हिमालय’ के रूप में हमारे परिवार का जितना व्यापक सम्पर्क सीमान्त घाटियों में चारों ओर है, उसके लिये में मैं अपने को धन्य मानता हूँ क्योंकि जिस हिमालय में तप के लिये रिषिमुनि रमते रहे हैं, जो शिव की तपस्थली है उसके वासियों से हम जुड़े हैं। अपनी सैकड़ों और मीलों लम्बी यात्राओं में मैने भी कई धर्मशालाएं चारों ओर देखी हैं। आश्चर्य होता था कि दुर्गम स्थानों में कितने मोह के साथ इन्हें निर्मित किया गया था। अपने स्वभाव के अनुरूप इन पवित्र धरोहरों को देख मेरी अश्रुधारा बह जाती है। किस नीयत और किस उदारता के साथ इनका निर्माण करवाया गया था और आज इनको मलवे का ढेर सा मानकर बिसरा दिया गया है। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में संगीत विभागाध्यक्ष के रूप में रहते हुए जब भी अवसर मिलता मैं नाग मन्दिर के पुराने अवशेष ;जो महाविद्यालय परिसर के उपर एक टीले में झाड़ियों से घिरा है, लला जसुली की धर्मशाला ;जो थाने के पास झाड़ियों से घिरी है, देखने जरूर जाता। अनगिनत बार इनके पास जाकर देखा और फिर कहीं कल्पनाओं में खो जाता कि अहा, कैसे बनाये हैं। इसके अलावा अन्य स्थानों में भी इस प्रकार की धरोहरों को देखा है। देखा ही नहीं, उपेक्षित बने हुए इन धर्मार्थ सरायों के भीतर जाकर भी देखा कि कितने जतन से इन्हें बनाया गया था और आज इन्हें उजाड़ने वाले ताक में बैठे हैं। चूंकि सीमान्त की घाटियों में आना-जाना रहा है तो जसुली आमा के बारे में भी बेहद जिज्ञासी थी और मेरे अनगिनत मित्र जो रं समुदाय हैं, वह जानकारी देते रहे। धरमघर के समाजसेवी शौका गंगा सिंह पांगती अक्सर फली सिंह दताल साहब के बारे में बताते रहते थे। लला जसुली के वंशज फली सिंह जी हमारे पिघलता हिमालय के संस्थापक भी हैं। अपनी बंश परम्परा अनुसार इनकी उदारदा और सच्चाई हर किसी को प्रभावित करती है। अपने पूज्य पिता की स्मृति में होने वाले आयोजन में इन्हें भी सम्मानित करने का गौरव मिला। उस अवसर पर श्री दताल द्वारा जिस प्रकार से अपनी पीड़ा को प्रकट किया गया वह हम सबकी पीड़ा थी। लला जसुली के त्याग और तपस्या को पहली बार खुले मंच से उन्होंने इतनी भावुकता से बताया कि उपस्थित गणमान्य जन चकित थे। उस अवसर पर विद्वान प्रोफेसरों ने इस विषय को महत्वपूर्ण बताया और शोध् छात्रों को भी नई जानकारियां मिलीं। मुझे तब भी आश्चर्य हुआ कि जिस दान वीरांगना का इतना बड़ा योगदान समाज में रहा है और उसकी सातवीं पीढ़ी आज भी उन ध्रोहरों को बचाने की गुहार लगा रही है, उसके बारे में अधिकांश को पता ही नहीं है। हमने उसी दिन तय कर लिया था कि इस प्रकरण पर अब चुप नहीं बैठेंगे और ‘पिघलता हिमालय’ बराबर इस प्रकरण पर लोगों का ध्यान आकृष्ट करता रहा है। खुशी होती है कि हमारे प्रशासन ने भी इस दिशा में कदम उठाए हैं। साथ ही जागरुक जन हमारे इस अभियान में साथ हैं। यह हम सबका पुनीत कर्तव्य भी है। भाई, यह पहचान मिटने न दो………..
