चेतनाशून्यता की स्थिति है

काशीसिंह ऐरी से बातचीत
कार्यालय प्रतिनिधि
उत्तराखण्ड क्रान्तिदल के शीर्ष नेता काशीसिंह ऐरी का कहना है, ‘राष्ट्रीय पार्टियों ने पहाड़ की जनता को मून सा दिया है, यह चिन्ता है। इन पार्टियों का ने आम जनता की आँखों में धूल झौंकी है जिसे समझना होगा। आज चेतनाशून्यता की स्थिति है। युवाओं को बरगलाया जा रहा है और प्रलोभन में फंसाया जा रहा है।’
श्री ऐरी आगे कहते हैं कि आज उत्तराखण्ड की स्थिति को सबको समझना चाहिये। पहले विकास की योजनाएं बनती थी लेकिन पहाड़ नहीं चढ़ पाती थी। इसीलिए उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना की गई थी ताकि छोटे राज्य में विकास हो, युवाओं का रोजगार मिले, यहाँ की समस्याओं की सुनवाई हो। लेकिन राज्य बनने के बाद से सब उल्टा होने लगा है। उल्टे-पुल्टे कार्यों पर लगाम नहीं है। यदि किसी को टोका जाता है तो वह किसी न किसी सम्बन्ध्-सम्पर्क से अपना बचाव कर लेता है। सम्वेदन शीलता नहीं रह गई है कि जनता क्या कहेगी। यह जानते हैं उनकी मनमानी पर कोई कुछ नहीं कहने वाला है। चाहे जो कुछ कर लो, जनता इन्हें वोट दे देगी। उपर से नीचे तक भ्रष्टाचारियों की चैन बनी हुई है। तमाम योजनाओं में घपले उजागर भी हुए है लेकिन सबकुछ दबा दिया जाता है। इनकी ओर से जनता को सुविधा मिले या न मिले, विकास हो या न हो, वोट मिल जायेगा। इन्होंने जनता को मून लिया है। चेतनाशून्यता की यह स्थिति खतरनाक है। उत्तराखण्ड किधर जा रहा है, राज्य कितने कर्ज में डूब गया है, विकास योजनाएं किस तरह से धरातल में नहीं उतर रही हैं, करोड़ों के भ्रष्टाचार के मामले उजागर होकर भी लीपापोती में हैं, इन्हें कोई पफर्क नहीं पड़ता। ये सब मौज में हैं और जनता को भ्रमित कर राज कर रहे हैं।
उत्तराखण्ड राज्य बनाने के पीछे रोजगार की बात, विकास की बात के अलावा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना चाहते थे। सपना था हमारा राज्य बनेगा तो शिकायतों की सुनवाई होगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा परन्तु यहाँ तो कोई सुनने वाला ही नहीं है। मंत्री ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। सन्निर्माण श्रमिक बोर्ड में ही करोड़ों का घपला है, जाँच की लीपापोती होती रहती है। घपला करने वाले ही जाँच करने वाले हो जाएंगे तो क्या उम्मीद की जा सकती है। इस बेहाल राज्य को सुधार के लिये सबने जगना होगा।

उत्तराखण्ड के परिदृश्य में खत्तों की खेती

हिमाँशु कफल्टिया
खत्ते, गोठ अथवा झाले उत्तराखण्ड के परिदृश्य में समय-समय पर चर्चाओं में आते रहते हैं। कभी वन भूमि पर अवैध् कब्जे के तौर पर तो कभी वन उपज की तस्करी या फिर खुद को राजस्व ग्राम घोषित करने हेतु आन्दोलन। ये खत्ते समाचार पत्रों का हिस्सा बने ही रहते हैं। खत्ते जिन्हें गोठ अथवा झाले के नाम से भी जाना जाता है वह वन ग्राम हैं जो वन भूमि पर बसे हैं एवं सरकार की नजरों में अवैध् कब्जे हैं। बिन्दुखत्ता, गैण्डीखत्ता, छीनीगोठ गढ़ीगोठ, भैंसाझाला कुछ उदारहण हैं। इन गाँवों में वन गुज्जरों के अलावा कई अन्य लोग जो मुख्यतः पहाड़ के लोग हैं निवास करते हैं।
खत्तों का अपना एक इतिहास रहा है। राज्य की तराई-भाबर काफी उपजाउ भूमि है परन्तु यहाँ गर्मी और उमस भरा मौसम, खतरनाक जंगली जानवर, मच्छर जनित मलेरिया एवं अन्य बीमारियों के कारण यह क्षेत्रा कभी भी पहाड़ी लोगोें द्वारा रहने योग्य नहीं माना गया। कत्यूरों, चन्दों व गढ़वाल के पवारों के शासन काल में भी यहाँ बसावटें म ही थी। थारू एवं बुक्सा जनजाति ही यहाँ के स्थाई निवासी थे तथा पहाड़ से लोग केवल शीत ट्टतु में ही कड़ाके की ठण्ड से बचने एवं जानवरों के लिए चारागाह ढूंढने आते थे।
जिन स्थानों पर पहाड़ के लोग शीत ट्टतु में अपने जानवरों समेत डेरा डालते थे उसे खत्ता/गोठ अथवा झाला के नाम से जाना गया।
अंग्रेजी हुकूमत ने तराई-भाबर की उपजाउ जमीन के महत्व को समझा व यह माना कि यह क्षेत्रा राजस्व वृद्धि जो कि उनका एकमात्र ध्येय था, हेतु उपयोगी सिद्ध हो सकता है। एक ओर अंग्रेजी शासन द्वारा इस क्षेत्रा में कृषि विकास हेतु नहरों, मार्गों एवं बांधें का निर्माण किया वहीं उनके द्वारा पहाड़ के लोगों को इन क्षेत्रा में स्थाई तौर पर बसाने के लिए भी प्रोत्साहित किया लेकिन उनकी ये कोशिशें कम ही रंग लाई तथा पहाड़ के लोगों का अस्थाई तौर पर आना-जाना बना रहा।
स्वतंत्रता के पश्चात पं. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में एक बार फिर पहाड़ के लोगों को यहाँ स्थाई तौर पर बसाने हेतु आमंत्रित किया गया। अब परिस्थितियाँ भी बदलने लगी, जहाँ एक ओर क्षेत्रा का तेजी से विकास हो रहा था वहीं भारत-पाकिस्तान के विभाजन के पश्चात बड़ी संख्या में सिक्ख समुदाय के लोगों द्वारा विपरीत परिस्थितियांे के मध्य मेहनत कर इस उपजाउफ जमीन को तरासा। पन्तनगर में कृषि विश्वविद्यालय, तराई बीज कार्पोरेशन की स्थापना और अवस्थापना जैसे विकास के लिये उठाये गये कदमों ने इस क्षेत्रा को भारत की हरित क्रान्ति का जनक बना दिया।
बदली हुई परिस्थितियों में धीरे-धीरे पहाड़ के लोगों ने खत्तोे में स्थाई तौर पर निवास करना शुरु किया। पहले कुछ परिवार बसे और शनैः-शनै- खत्तों की बसावटें बढ़ती चली गई। जहाँ पहले पहाड़ एक आकर्षण था वहीं अब विकास की बदली हवा ने मैदान को आकर्षण बना दिया। खत्ते सस्ती जमीन और अपने लोगोें की जगह माने गये और अधिक से अधिक लोग यहाँ बसते चले गये।
खत्ते सरकारों/राज्यों के लिए राजस्व का स्रोत भी बने रहे। चन्द शसकों के समय चरवाहों से राजस्व लिया जाता था। रुहेलों व अंग्रेजों द्वारा भी लगान लिया गया। आजादी के पश्चात भी राजस्व जिसे चराई कहा जाता था, की वसूली जारी रही।
इस बीच परिदृश्य फिर र बदलने लगा। 1970 के दशक और उसके पश्चात वन एवं पर्यावरण कानूनों में बड़ा परिवर्तन आया। अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर कड़े वन एवं पर्यावरण संध्यिों व कानून बनाये गये। इस बीच संरक्षित वनों व आरक्षित वनों में भी वृद्धि हुई। तराई-भाबर में कार्बेट राष्ट्रीय पार्क, कार्बेट बाघ रिजर्व, राजाजी, नन्धैर अभ्यारण इत्यादि बनाये गये और अधिकतर खत्ते/गोठ/झाले इनकी सीमाओं में आ गये। आज भी खत्ते/गोठों में रहने वाले परिवारों के पास उस समय की चराई;लगान की रसीदें व खसरे मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि दशकों तक राजस्व दिये जाने के बाद इन खत्तों को संरक्षित वन अथवा आरक्षित क्षेत्रा घोषित किया गया। जिन लोगोें ने सदियों से बड़ी मशक्कत के पश्चात इन क्षेत्रों को बसाया था, अचानक से उनके निवास स्थान अवैध् कब्जे की श्रेणी में आ गये और यहीं से शुरु हुआ खत्ते में रहने वालों का संघर्ष।
आज इन खत्तांे/गोठों में कई परिवार निवास करते हैं। उन्होंने दशकों की मेहनत से पक्के मकान बना लिये हैं तथा कई पीढ़ियों से यहाँ खेती करते आ रहे हैं। सरकार द्वारा भी कुछ सुविधयें जैसे बिजली, स्वास्थ्य मुहैया कराई गई हैं। कुछ खत्ते जैसे बिन्दुखत्ता तो शहर का रूप ले चुके हैं और यहाँ के लोग खुद को राजस्व ग्राम अथवा नगरीय क्षेत्रा घोषित करने के लिए आन्दोलनरत हैं।
खत्ते सरकारों के लिए एक चुनौती भी बन रहे हैं। जहाँ एक ओर ये वन भूमि पर अवैध् कब्जे हैं वहीं यहाँ वन उपज की अवैध् तस्करी, वन्यजीव अपराध्, अवैध् लकड़ी कटान जैसी चुनौतियाँ बनी रहती हैं। पिछले दशकों में तो कुछ खत्ते नक्सली गतिविधियों के लिए भी समाचारों में रहे।
खत्तों का एक मानवीय पहलू भी है। यहाँ के निवासी आज स्वयं को ठगा महसूस करते हैं। दशकों तक सरकार द्वारा प्रोत्साहित किये जाने के पश्चात इनके पूर्वज यहाँ बसे थे। दशकों तक इनके द्वारा चराई;राजस्व भी दिया गया। पीढ़ियों की मेहनत लग गई घर बनाने व खेती योग्य जमीन तैयार करने में, परन्तु इनकी पहचान आज भी अवैध् है। अवैध् कब्जों में आने के कारण इन क्षेत्रों में न तो अवस्थापना विकास हो पाता है और न ही सरकारी योजनाओं का सही से क्रियान्वयन। फलस्वरूप मनरेगा, विधायक या सांसद निधि का व्यय इन क्षेत्रों में नहीं हो पाता और यह क्षेत्र पिछड़े रह जाते हैं। गरीबी व पिछड़ेपन ने भी इन खत्तों को अपनी जकड़ में बनाये रखा है तथा यहाँ के निवासी अपना घरबार व आजीविका खोने के डर से भयभीत रहते हैं। अवैध् कब्जों की श्रेणी में आने वाले ये निवास स्थान अपने भविष्य एवं आने वाली पीढ़ियों के लिए चिन्तारत हैं।
हमें खत्तों के मानवीय पहलुओं को समझना होगा। यहाँ के मुद्दे अलग हैं। पर्यावरण एवं वनों के स्तर पर एक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सोच आवश्यक है परन्तु खत्तों/गोठों/झालों को स्थानीय नजरिये से देखना होगा। इनके निवासी हमारे अपने लोग हैं। पिछड़े व गरीब इन गाँवों के बारे में बुद्धिजीवी वर्ग, प्रशासन को गहन चिन्तन की आवश्यकता है ताकि इस विषय को समय रहते सुुलझा लिया जाये।
लेखक- उपजिलाधिकारी पूर्णागिरी, टनकपुर जनपद चम्पावत। टनकपुर भाबर भी खत्तों से घिरा क्षेत्र है। हिमाँशु कफल्टिया हिमाँशु कफल्टिया
खत्ते, गोठ अथवा झाले उत्तराखण्ड के परिदृश्य में समय-समय पर चर्चाओं में आते रहते हैं। कभी वन भूमि पर अवैध् कब्जे के तौर पर तो कभी वन उपज की तस्करी या फिर खुद को राजस्व ग्राम घोषित करने हेतु आन्दोलन। ये खत्ते समाचार पत्रों का हिस्सा बने ही रहते हैं। खत्ते जिन्हें गोठ अथवा झाले के नाम से भी जाना जाता है वह वन ग्राम हैं जो वन भूमि पर बसे हैं एवं सरकार की नजरों में अवैध् कब्जे हैं। बिन्दुखत्ता, गैण्डीखत्ता, छीनीगोठ गढ़ीगोठ, भैंसाझाला कुछ उदारहण हैं। इन गाँवों में वन गुज्जरों के अलावा कई अन्य लोग जो मुख्यतः पहाड़ के लोग हैं निवास करते हैं।
खत्तों का अपना एक इतिहास रहा है। राज्य की तराई-भाबर कापफी उपजाउ भूमि है परन्तु यहाँ गर्मी और उमस भरा मौसम, खतरनाक जंगली जानवर, मच्छर जनित मलेरिया एवं अन्य बीमारियों के कारण यह क्षेत्रा कभी भी पहाड़ी लोगोें द्वारा रहने योग्य नहीं माना गया। कत्यूरों, चन्दों व गढ़वाल के पवारों के शासन काल में भी यहाँ बसावटें म ही थी। थारू एवं बुक्सा जनजाति ही यहाँ के स्थाई निवासी थे तथा पहाड़ से लोग केवल शीत ट्टतु में ही कड़ाके की ठण्ड से बचने एवं जानवरों के लिए चारागाह ढूंढने आते थे।
जिन स्थानों पर पहाड़ के लोग शीत ट्टतु में अपने जानवरों समेत डेरा डालते थे उसे खत्ता/गोठ अथवा झाला के नाम से जाना गया।
अंग्रेजी हुकूमत ने तराई-भाबर की उपजाउ जमीन के महत्व को समझा व यह माना कि यह क्षेत्रा राजस्व वृद्धि जो कि उनका एकमात्र ध्येय था, हेतु उपयोगी सिद्ध हो सकता है। एक ओर अंग्रेजी शासन द्वारा इस क्षेत्रा में कृषि विकास हेतु नहरों, मार्गों एवं बांधें का निर्माण किया वहीं उनके द्वारा पहाड़ के लोगों को इन क्षेत्रा में स्थाई तौर पर बसाने के लिए भी प्रोत्साहित किया लेकिन उनकी ये कोशिशें कम ही रंग लाई तथा पहाड़ के लोगों का अस्थाई तौर पर आना-जाना बना रहा।
स्वतंत्रता के पश्चात पं. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में एक बार फिर पहाड़ के लोगों को यहाँ स्थाई तौर पर बसाने हेतु आमंत्रित किया गया। अब परिस्थितियाँ भी बदलने लगी, जहाँ एक ओर क्षेत्र का तेजी से विकास हो रहा था वहीं भारत-पाकिस्तान के विभाजन के पश्चात बड़ी संख्या में सिक्ख समुदाय के लोगों द्वारा विपरीत परिस्थितियांे के मध्य मेहनत कर इस उपजाउफ जमीन को तरासा। पन्तनगर में कृषि विश्वविद्यालय, तराई बीज कार्पोरेशन की स्थापना और अवस्थापना जैसे विकास के लिये उठाये गये कदमों ने इस क्षेत्रा को भारत की हरित क्रान्ति का जनक बना दिया।
बदली हुई परिस्थितियों में धीरे-धीरे पहाड़ के लोगों ने खत्तोे में स्थाई तौर पर निवास करना शुरु किया। पहले कुछ परिवार बसे और शनैः-शनै- खत्तों की बसावटें बढ़ती चली गई। जहाँ पहले पहाड़ एक आकर्षण था वहीं अब विकास की बदली हवा ने मैदान को आकर्षण बना दिया। खत्ते सस्ती जमीन और अपने लोगोें की जगह माने गये और अधिक से अधिक लोग यहाँ बसते चले गये।
खत्ते सरकारों/राज्यों के लिए राजस्व का स्रोत भी बने रहे। चन्द शसकों के समय चरवाहों से राजस्व लिया जाता था। रुहेलों व अंग्रेजों द्वारा भी लगान लिया गया। आजादी के पश्चात भी राजस्व जिसे चराई कहा जाता था, की वसूली जारी रही।
इस बीच परिदृश्य फिर र बदलने लगा। 1970 के दशक और उसके पश्चात वन एवं पर्यावरण कानूनों में बड़ा परिवर्तन आया। अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर कड़े वन एवं पर्यावरण संधियों व कानून बनाये गये। इस बीच संरक्षित वनों व आरक्षित वनों में भी वृद्धि हुई। तराई-भाबर में कार्बेट राष्ट्रीय पार्क, कार्बेट बाघ रिजर्व, राजाजी, नन्धैर अभ्यारण इत्यादि बनाये गये और अधिकतर खत्ते/गोठ/झाले इनकी सीमाओं में आ गये। आज भी खत्ते/गोठों में रहने वाले परिवारों के पास उस समय की चराई;लगान की रसीदें व खसरे मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि दशकों तक राजस्व दिये जाने के बाद इन खत्तों को संरक्षित वन अथवा आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। जिन लोगोें ने सदियों से बड़ी मशक्कत के पश्चात इन क्षेत्रों को बसाया था, अचानक से उनके निवास स्थान अवैध् कब्जे की श्रेणी में आ गये और यहीं से शुरु हुआ खत्ते में रहने वालों का संघर्ष।
आज इन खत्तांे/गोठों में कई परिवार निवास करते हैं। उन्होंने दशकों की मेहनत से पक्के मकान बना लिये हैं तथा कई पीढ़ियों से यहाँ खेती करते आ रहे हैं। सरकार द्वारा भी कुछ सुविधयें जैसे बिजली, स्वास्थ्य मुहैया कराई गई हैं। कुछ खत्ते जैसे बिन्दुखत्ता तो शहर का रूप ले चुके हैं और यहाँ के लोग खुद को राजस्व ग्राम अथवा नगरीय क्षेत्रा घोषित करने के लिए आन्दोलनरत हैं।
खत्ते सरकारों के लिए एक चुनौती भी बन रहे हैं। जहाँ एक ओर ये वन भूमि पर अवैध् कब्जे हैं वहीं यहाँ वन उपज की अवैध् तस्करी, वन्यजीव अपराध्, अवैध् लकड़ी कटान जैसी चुनौतियाँ बनी रहती हैं। पिछले दशकों में तो कुछ खत्ते नक्सली गतिविधियों के लिए भी समाचारों में रहे।
खत्तों का एक मानवीय पहलू भी है। यहाँ के निवासी आज स्वयं को ठगा महसूस करते हैं। दशकों तक सरकार द्वारा प्रोत्साहित किये जाने के पश्चात इनके पूर्वज यहाँ बसे थे। दशकों तक इनके द्वारा चराई;राजस्व भी दिया गया। पीढ़ियों की मेहनत लग गई घर बनाने व खेती योग्य जमीन तैयार करने में, परन्तु इनकी पहचान आज भी अवैध् है। अवैध् कब्जों में आने के कारण इन क्षेत्रों में न तो अवस्थापना विकास हो पाता है और न ही सरकारी योजनाओं का सही से क्रियान्वयन। फलस्वरूप मनरेगा, विधायक या सांसद निधि का व्यय इन क्षेत्रों में नहीं हो पाता और यह क्षेत्र पिछड़े रह जाते हैं। गरीबी व पिछड़ेपन ने भी इन खत्तों को अपनी जकड़ में बनाये रखा है तथा यहाँ के निवासी अपना घरबार व आजीविका खोने के डर से भयभीत रहते हैं। अवैध् कब्जों की श्रेणी में आने वाले ये निवास स्थान अपने भविष्य एवं आने वाली पीढ़ियों के लिए चिन्तारत हैं।
हमें खत्तों के मानवीय पहलुओं को समझना होगा। यहाँ के मुद्दे अलग हैं। पर्यावरण एवं वनों के स्तर पर एक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सोच आवश्यक है परन्तु खत्तों/गोठों/झालों को स्थानीय नजरिये से देखना होगा। इनके निवासी हमारे अपने लोग हैं। पिछड़े व गरीब इन गाँवों के बारे में बुद्धिजीवी वर्ग, प्रशासन को गहन चिन्तन की आवश्यकता है ताकि इस विषय को समय रहते सुुलझा लिया जाये।
लेखक- उपजिलाधिकारी पूर्णागिरी, टनकपुर जनपद चम्पावत।
टनकपुर भाबर भी खत्तों से घिरा क्षेत्र है।

सच्चे मन की हर मनोकामना पूरी करती है माँ झूलादेवी

भुवन बिष्ट
इस समय पूरा विश्व वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से त्रास्त है और हर कोई ईश्वर से इस संकट अतिशीघ्र मुक्ति दिलाने की प्रार्थना कर रहा है। कोरोना से निबटने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग व मास्क पहनकर अपनी-अपनी सुरक्षा का ध्यान भी हर आमजनमास इस समय अपनाने का प्रयास कर रहा है। अनलाक में कुछ मन्दिरों को भी पूजा अर्चना के लिए खोला गया है किन्तु फिर भी सभी कोरोना से बचने के लिए सोशल डिसटेंसिंग, हैंड सैनेटराईज, मास्क दो गज की दूरी आदि इसके उपायों को अपना रहे हैं। देवभूमि उत्तराखण्ड सदैव ही देवों की तपोभूमि रहा है, इस कारण यह अटूट एवं अगाध् आस्था का केन्द्र भी रहा है। नवरात्रों में मन्दिरों में चहल पहल एवं भीड़ बढ़ जाती है। भले ही इस बार कोरोना महामारी ने नवरात्र आयोजनों पर भी अपनी मार से सभी को परेशान किया है किन्तु आस्था सभी के मन कूट कूट कर भरी है और सच्चे मन से हर भक्त अपने आराध्य देवी देवताओं की आराध्ना करके इस संकट से मुक्ति की प्रार्थना कर रहे हैं। देवभूमि उत्तराखण्ड के रानीखेत के आसपास झूलादेवी, कालिका, मनकामेश्वर, पंचेश्वर, हैड़ाखान, शिव आदि मन्दिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है। इनमें एक प्रमुख स्थान माँ झूला देवी का है। माँ झूलादेवी पर भक्तों की अगाध् आस्था है। रानीखेत नगर से चैबटिया मार्ग पर रानीखेत से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है भव्य माँ झूलादेवी का मन्दिर। यह देवदार एवं बुरांश के वनों के मध्य स्थित है। मान्यता है कि सच्चे मन से जो भी इस दरबार में आता है उसकी हर मुराद माँ झूलादेवी पूरा करती है। झूलादेवी को माँ सिंहसवारी, दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है लगभग आठवीं सदी में यह स्थान सुनसान चरागाह था। इस मन्दिर का निर्माण जंगली जानवरों से रक्षा के उद्देश्य को लेकर किया गया था। रानीखेत नगर से लगभग आठ किलोमीटर दूर शान्त एवं एकान्त रमणीक स्थल पर झूलादेवी मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि यह स्थान चैबटिया, पन्याली, पिलखोली, जैनोली, उपराड़ी, एवं आसपास के ग्रामीणों के जानवरों का चरागाह था, और आसपास का क्षेत्र घनघोर वनों से घिरा हुआ था। इस कारण खंूखार वन्य जीव आए दिन ग्रामीणों के मवेशियों को शिकार बना लेते थे। इससे चरवाहे एवं आसपास के ग्रामीण अत्यधिक दुःखी हो गये थे । एक दिन रात्राी में एक चरवाहे को माँ शेरोवाली ने दर्शन दिये और कहा कि चारागाह के पास की जमीन में माता की एक मूर्ति दबी हुई है, उसे निकालकर तुम मेरा मन्दिर बनाओ। चरवाहे ने सपने में माता के बताये के अनुसार ही चारागाह से मूर्ति निकालकर माता का मन्दिर उस स्थान पर बना दिया। इसके बाद वन्य जीव ग्रामीणों के मवेशियों का शिकार नहीं करते थे । माँ झूलादेवी पर पर लोगों की अटूट आस्था का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां पर केवल नवरात्रों में ही नहीं अपितु पूरे वर्ष भर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, क्योंकि माँ झूलादेवी सबकी मनोकामना पूरी करती है। मन्दिर के चारों तरफ टंगी छोटी बड़ी सैकड़ो घण्टियां भक्तों के अगाध् आस्था के गवाह हैं । श्रावण मास में व चैत्रा की नवरात्रों में श्रद्धालु सुबह से पूजा अर्चना के लिए झूलादेवी के दरबार में पहुँच जाते हैं। रमणीय एवं एकान्त स्थल पर स्थित झूलादेवी के मन्दिर में आने पर मन को एक शान्ति प्राप्ति होती है। झूलादेवी के मन्दिर में मनोकामनाऐं पूरी होने पर श्रद्धालु घण्टियाँ चढ़ाते हैं। झूलादेवी का मन्दिर भव्य एवं आकर्षक है मन्दिर के बाहर माँ की सवारी सिंह ;शेरद्ध की बड़ी प्रतिमा बनी हुई है, मन्दिर के चारों ओर घण्टियाँ सजी हुई हैं।
वैश्विक महामारी कोरोना के कारण सभी धर्मिक आयोजनों को सीमित कर दिया गया है तो अधिकांश स्थानों पर कोरोना के सुरक्षा नियमों को अपनाकर ही पूजा अर्चना सम्पन्न करायी जा रही हैं। सभी जनमानस ईश्वर से वैश्विक महामारी कोरोना से जल्दी से जल्दी मुक्ति दिलाने की प्रार्थना कर रहे हैं। शीघ्र ही इस वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से सभी जनमानस को मुक्ति मिल जायेगी और पूरे विश्व में पुनः खुशहाली आ जाये, सभी जनमानस इसकी कामना कर रहे हैं।

देवेन्द्रा ज्योति चेरिटेबल ट्रस्ट के रूप में उनका सहयोग हमेशा याद किया जायेगा

स्मृतियां शेष:
डाॅ.पंकज उप्रेती
10 अक्टूबर 2020 को सायं 3 बजे श्रीमती देविन्द्रा (देवेन्द्रा) रावत का निधन हो गया। उनके साथ ही श्री एवं श्रीमती रावत की भरपूर सहयोग की कहानी यादें छोड़ गई है। 91 वर्षीय सबकी आंटी के रूप में पहचान रखने वाली श्रीमती देवेन्द्रा बलवन्त कालोनी, दोनहरिया, हल्द्वानी में निवास करती थीं। जीवन के उत्तराद्र्ध में भी वही बचपन सी उमंग और बहिनों का आपसी लाड़-प्यार सबकी जुवां पर था। इनकी कोशिश रहती है कि हर गतिविधियों में भागीदारी करूँ। उम्र के इस पड़ाव में भी, वह सभी आयोजनों में खुशी से सम्मिलित होती ताकि सबसे भेंटघाट हो सके। इधर-उधर सबकी कुशल पूछती थीं।
उनके निधन के समय ईष्ट-मित्रों का तांता लगा और चित्राशिला घाट, रानीबाग में उन्हें अन्तिम विदाई दी गई। अल्मोड़ा से आकर भतीजे दिग्विजय सिंह रावत ने अन्तिम संस्कार की क्रियाएं कीं। दिग्विजय ‘दीपू’ सामाजिक सरोकारों से जुड़े और रावत परिवार के समझदार व सहनशील युवाओं में से हैं।
बात करते हैं ‘ज्योति-देवेन्द्रा’ की। इस दम्पत्ति का अपने समाज के प्रति अटूट विश्वास था और सहयोग की भावना इनमें थी। कमाण्डर ज्योति सिंह रावत उच्च पदों पर रहते हुए भी सहज-सरल व्यक्ति थे। पारिवारिक विरासत का जो संस्कार उनमें था, वह तो था ही लेकिन स्वयं के बूते भी उन्होंने बहुत कुछ जोड़ा। उनके असमय निधन से श्रीमती देवेन्द्रा जी अकेले रह गईं और अपने इष्ट-मित्रों के साथ हल्द्वानी में रहने लगीं। बलवन्त कालोनी में श्री दुर्गा सिंह रावत और उनके परिवार के साथ देवेन्द्रा जी का समय व्यतीत हो रहा था। डाॅ.एन.एस.पांगती सहित उनके सभी पारिवारिक जन सुधबुध लेते रहते थे। और उन्हें कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने दिया।
अपनों के बीच देविन्द्रा (देवेन्द्रा) सुख थीं। माघ की खिचड़ी, होली मिलन से लेकर जोहार महोत्सव तक के हर कार्यक्रम की दर्शकदीर्घा में उनकी उपस्थिति होती। ध्नबल जैसा कोई अहंकार उनमें कभी नहीं रहा। उनके संस्कार उन्हें रौबदार बनाए रहे। तभी वह कहीं भी अपने सहयोग में पीछे नहीं हटती। पिघलता हिमालय की आजीवन सदस्य होने के बावजूद वह हमेशा इसकी चिन्ता करती थी कि किन स्थितियों में यह प्रकाशित होता है और सभी को इससे जोड़ती। ज्योति-देवेन्द्रा दम्पत्ति ने महरौली दिल्ली में भी कापफी सम्पत्ति जोड़ी थी लेकिन सबकुछ सौदा कर समय के साथ इन्हें सिमटना पड़ा। ‘देवेन्द्रा ज्योति चेरिटेबल ट्रस्ट’ के रूप में गठित समिति द्वारा नेक कार्यों के लिये निर्णय लिये जाने लगे। मुनस्यारी, अल्मोड़ा, हल्द्वानी सहित तमाम संस्थाओं में इनका योगदान याद रहेगा।
अब जबकि कमाण्डर ज्योतिसिंह व श्रीमती देवेन्द्रा हमारे बीच नहीं हैं, उनकी यादों को सजोने के लिये शुभचिन्तकों को बेहतर करना होगा। इनकी जीवनी हमें त्याग करना सिखाती है। स्व. देवेन्द्रा रावत को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजजि।

जल विद्युत परियोजना को लेकर सीमावासी मुखर

मुनस्यारी।
चीन सीमा पर जिले की पहली प्रस्तावित बहुप्रतिक्षित जल विद्युत परियोजना को लेकर सीमावासी मुखर हो गए है. इसी के चलते निगम की 120 मेघावाट की रुपसियाबगड़ – सरकारी भेल जल विद्युत परियोजना को वित्तीय स्कीकृति दिए जाने की मांग तेज हो गई है. जिपं सदस्य जगत मर्तोलिया ने आज प्रदेश के मुख्यमंत्री को इस आशय का पत्र भेजकर इस मांग को हवा दे दी है. कहा कि इस वित्तीय वर्ष में सीएम नहीं माने तो चीन सीमा क्षेत्र के लोग आंदोलन करेंगे.
उत्तराखंड जल विद्युत निगम ने इस चीन सीमा पर बनने वाले बहुप्रतिक्षित परियोजना का डीपीआर तैयार कर शासन को भेज दिया है. पिथौरागढ़ जिला चीन सीमा से लगा हुआ है. जिले के व्यास, चौदास, रालम व जोहार क्षेत्र चीन सीमा से लगा हुआ है. चीन सीमा के जोहार क्षेत्र से लगे इस क्षेत्र में प्रस्तावित यह परियोजना चीन सीमा पर भारत की पहली विद्युत परियोजना होगी.
जिपं सदस्य जगत मर्तोलिया ने कहा कि इस परियोजना के बनने के बाद चीन सीमा से लगे लास्पा, रिलकोट, मर्तोली, ल्वां,पांछू, गनघर, मापा, मिलम, बिलजू, बुर्फू, टोला, खिलांच,रालम सहित सेना व अर्द्ध सैनिक बलो की अंतिम चौकियों को भी बिजली मिलने का रास्ता सांफ हो जाएगा. इससे बेरोजगारी कम होगी तथा चीन सीमा क्षेत्र से पलायन भी कम होगा.
मर्तोलिया ने कहा कि चीन सीमा क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भी इस परियोजना का निर्माण किया जाना बेहद जरूरी है. कहा कि राज्य सरकार को इस परियोजना के संचालन से राजस्व मिलेगा.
जिपं सदस्य मर्तोलिया ने कहा हम क्षेत्रवासी इस वित्तीय वर्ष सरकार के फैसले का इंतजार करेंगे, उसके बाद चीन सीमा क्षेत्र के लोग आंदोलन कर सरकारो पर दबाव बनायेंगे.

अब लुप्त होते देख रहे हैं अपने ही ताम्र शिल्प को शिल्पी कारीगर

केशव भट्ट
बागेश्वर जिले के खर्कटम्टा गांव में कभी तांबे से बनने वाले बर्तनों की टन्न..टन्न की गूंज दूर घाटियों में सुनाई पड़ती थी, लेकिन वक्त की मार के चलते ये धुने अब कम ही सुनाई देती हैं. हांलाकि, आजादी से पहले की ताम्र शिल्प की इस अद्भुत कला को अब मजबूरी में इस गांव में तीन परिवार आज तक भी संजोए हुए हैं. लेकिन ताम्र शिल्प की उपेक्षा से ये कलाकार बहुत आहत हैं. रही बची कसर कोरोना काल के लॉकडाउन ने पूरी कर दी है.
देवलधार स्टेट के नाम से मशहूर जगह के पास ही है खर्कटम्टा गांव. मित्र जगदीश उपाध्याय ने एक बार बताया कि यहां कुछेक परिवार तांबे के बर्तन बनाने का काम करते हैं. जगदीश ने वहां के शिल्प कारीगर सुंदर लाल का नंबर दिया तो मैंने उनसे बात की. सुंदरजी से बातचीत में पता चला कि अब तो काम काफी कम है, गांव में अब तीन ही परिवार इस काम को करते हैं, उप्पर से लॉकडाउन ने रही बची कसर पूरी कर दी है. फोन में बातें करते हुए वो उदास से महसूस हो रहे थे. मौसम ठीक होने पर मैंने गांव में आने की बात कही. चारेक दिन बाद उन्हें फोन कर आने के बावत् पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी उनका सांथी मजदूरी में गया है दो दिन बाद आएगा तो हमारा आना ठीक रहेगा. दो दिन बाद सुबह उनका फोन आया, ‘साबजी आज आ जाओ.. सांथी आ गया है..’ उस दिन मैंने असमर्थता जताई तो मायूस हो वो बोले कि उनका सांथी सागर आज का अपना काम छोड़कर आया है, तो मैंने उन्हें दोपहर तक गांव पहुंचने का वादा किया. दोएक घंटे में काम निपटाने के बाद खर्कटम्टा गांव का रूख किया. पौड़ीधार से आगे पाटली पहुंचने के बाद सुंदरजी से फोन पर गांव के रास्ते बावत् पूछा और पाटली से खर्कटम्टा गांव की मीठी पैदल चढ़ाई नापनी शुरू कर दी. इस गांव के ग्रामप्रधान मनोज कुमार भी हमारे सांथ हो लिए. खेतों के किनारे के रास्ते में देखा तो धान की फसल खराब हो चुकी थी. एक तो कोविड काल और उप्पर से किसानों की मेहनत में प्रकृति की ये मार.
गांव की गलियों को पार किया तो पेड़ों के झुरमुट में आंगन में चारेक कुर्सियां लगी कुछेक लोगों को इंतजार करते पाया तो अनुमान लगाया कि यही सुंदरजी होंगे. तब तक पसीने से तरबतर हो प्रधानजी भी पहुंच चुके थे. पेड़ों की छांव में चारेक कुर्सियां लगाई गई थी. सुंदरजी और अन्यों से अभिवादन के बाद कुर्सियों में बैठे तो सुंदरजी आंगन के किनारे में बैठने लगे तो उन्हें भी कुर्सी में बैठने की गुजारिश की तो सकुचाते हुए वो कुर्सी में समा गए. तभी एक बालक ट्रै में कोल्ड डिंक के सांथ ही कुछेक गिलास ले आया तो सुंदरजी ने हमसे इसे लेने का आग्रह किया.
अनमना सा हो मैंने उन्हें पानी पीने की ईच्छा जताई तो कुछेक पल उन्होंने हैरान हो नजरों ही नजरों में आपस में बात की और पानी का लोटा ले आए. थोड़ा सा पानी गिलास में डाला तो मैं इंतजार करते रहा कि कब ये गिलास को पूरा भरें. थोड़ा पानी डालने का उनका आशय समझ मैंने लोटा पकड़ा और गिलास भरकर दो बार पानी पी उन्हें आश्वस्त कराया कि मैं भी हाड़—मांस का बना उन्हीं की तरह ही इस धरती का इंसान हूं.
मैं बैठा तो उनके सांथ था लेकिन मन कहीं पीछे चला गया था. बचपन में सिर के बालों की छटनी के बाद पीछे की ओर कुछेक बालों के गुच्छे को छोड़ दिया जाता था, जिसे चुटिया नाम दिया गया. हर बार वो बढ़ते चले जाते तो उस गुच्छे में गांठ लगाने की कोशिश की जाती थी, जो कभी सफल नहीं हो पाती थी. सांथियों के सांथ ही मास्टरजी के लिए यह एक अमोघ अस्त्र होती थी जिसे खींचकर जिंदा मां—बाप के सांथ ही धरती से गायब हो चुके आमा—बूबू के भी साक्षात दर्शन स्कूल में ही हो जाते थे. इस पर दु:खी हो मैं खुद ही चुपचाप उस शैतानी झुरमुट को दराती से काट कर छोटा कर लिया करता था. बाद में चप्पल के सांथ दोएक मुक्के की धमक भी पीठ में पड़ती थी, लेकिन मैं अपनी आदत से बाज नहीं आता था. बचपन में हरएक वो काम करने में मजा आता था जिसके लिए सख्त मनाही होती थी. ये सिलसिला वर्षों तक चलते रहा. एक बार बगावत कर डाली और बमुश्किल इससे मैं मुक्त हुवा तो असीम शांति मिली.
मन के भटकाव से वापस लौटा और मैंने सुंदरजी को समझाया कि, हम पर्वतारोही हैं और पर्वतारोहियों का कोई धर्म—जात—पात नहीं होता, हमारा धर्म तो सिर्फ इंसानियत का ही होता है. मेरी बातों से वो थोड़ा सहज हुए.
सुंदरजी से बातों का दौर चला तो वो अपनी पुरानी यादों में खोते चले गए. परिवार के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि, ‘बेटियों की शांदी हो गई, कुछेक साल पहले एकलौता बेटा भी दुनियां छोड़ उन्हें अकेला कर गया..’
मैंने तांबे के उनके पुश्तैनी ईतिहास के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि, ‘तांबे से बर्तन बनाने का काम तो उनकी पुश्तों में आजादी से पहले से ही होता आ रहा है. पहले तांबे का काम हर घर में होता था. कई बार हम कुछेक सांथी कारीगर गांव—गांव जाकर तांबे के पुराने बर्तनों की भी मरम्मत को चले जाते थे. गांव—घरों में टूटे गागर, तौले हम ठीक कर देते तो उन्हें भी राहत मिलती और नई डिमांड भी मिल जाती थी. हमारी आजीविका भी चलती रहती थी. बाद में धीरे—धीरे युवा पीढ़ी बाहर नौकरी में लगे तो यह काम कम होते चला गया. अब गांव में सिर्फ सागर, नंदन प्रसाद और मुझे मिलाकर तीन परिवार ही इस काम को कर अपनी आजीविका जुटाने में लगे हैं. लॉकडाउन के बाद से अब ये काम भी ठप्प पड़ गया है. अब सभी लोग मजदूरी कर परिवार का भरण—पोषण करने में जुटे पड़े हैं. सरकारें आती—जाती रहती हैं, हां! हमारे काम में मदद करने की बात पर आश्वासन जरूर देती रहती हैं, लेकिन किया किसी ने कुछ भी नहीं. हमारे क्षेत्र के नेता तो विधायक, सांसद भी रहे.. वोट के वक्त इन्हें भाई—भतीजावाद याद आ जाने वाला ठैरा.. जीतने के बाद ये फिर कभी दिखने ही वाले नहीं हुए..’
सुंदरजी ने अपने सांथी सागर को कारखाने में आग जलाने को कहा और हमें लेकर अपने कारखाना भट्टी में गए. भट्टी दहकने लगी तो उन्होंने चिमटे से तांबे के अधबने हुड़के को आग की लौ में तपाना शुरू कर दिया. हुड़का लाल हुवा तो उन्होंने उसे अपने औजारों से कलात्मक ढंग से हुड़के की शक्ल में ढालना शुरू कर दिया. ठंडा करने के बाद उसे जब साफ किया तो तांबे की सुनहरे चमक में वो हुड़का दमक उठा.
मैं उनके काम को देख सोचने लगा, आग में तपने के बाद तांबे को कुशल कारीगरों के हाथ जब लगते हैं तो वो हर रोज की दिनचर्या में काम आने वाले नाना प्रकार के बर्तनों में ढलते चले जाते हैं.
तांबे की प्लेट से किस तरह से नाना प्रकार के बर्तन बनते हैं उन्होंने हमें इस बारे में बताया. उनसे बातों में मालूम हुवा कि, खर्कटम्टा गांव को ताम्र शिल्पियों के गांव के नाम से जाना जाता है. आजादी से पहले खर्कटम्टा समेत जोशीगांव, देवलधार, टम्टयूड़ा, बिलौना आदि गांवों में ताम्र शिल्पी, तांबे से परम्परागत तरीके के उपयोगी बर्तन गागर, तौले, वाटर फिल्टर के सांथ ही पूजा, धार्मिक अनुष्ठान एवं वाद्य यन्त्र, तुरही, रणसिंघी बनाते थे. इस काम में महिलाएं भी उनकी मदद किया करती थी. तब ताम्र शिल्प उनका परम्परागत उद्यम माना जाता था. आजादी के बाद यह उद्यम काफी फैला भी और अपने औजारों को सांथ लेकर शिल्पी भी गांव—गांव जाकर लोगों के तांबे के पुराने बर्तनों की मरम्मत किया करते थे. तांबे व पीतल को जोड़कर बने गंगा जमुनी उत्पाद और पात्रों के विभिन्न हिस्सों को गर्म कर व पीटकर जोड़ने की तकनीक इस शिल्प व शिल्पियों की खासियत होती है. सुंदर लाल के सांथी सागर चन्द्र का कहना था कि अब गिने-चुने कारीगर ही विपरीत परिस्थितियों में भी अपने इस पैतृक व्यवसाय को जीवित रखे हुए हैं. वो बताते हैं कि तांबे से वो गागर, तौला, फिल्टर, परात, सुरई, फौला, वाद्ययंत्र रणसिंह, तुतरी, ढोल, मंदिर की सामग्री व शो-पीस आदि बनाते हैं जो कि अत्यंत शुद्ध माने जाते हैं. हांलाकि घरेलू ताम्र शिल्पियों की आजीविका पर मशीनी प्लांटों में बन रहे सामान से भी असर पड़ा तो है लेकिन अभी भी लोग हाथ से बनाए तांबे के बर्तनों को ही ज्यादा तव्वजो देते हैं.
पुराने दिनों को याद कर सुंदरजी बताते हैं कि, ‘हम तीनों ने बीस साल तक रामनगर में कई बनियों के वहां काम किया. तांबे के बर्तनों की बहुत मांग होती थी. तब नेपाल समेत बड़े महानगरों में भी काफी सामान जाता था. बाद में हम अपने गांव में वापस चले आए. यहां भी हम मिलकर काम करते थे और पचास से साठ हजार रूपयों तक की बिक्री हो जाती थी. अब काम कम हो गया है. नई पीढ़ी का झुकाव मशीनों से बनी चीजों की ओर ज्यादा होने लगा है. जबकि हाथ से बने तांबे के बर्तन काफी मजबूत और शुद्वता लिए होते हैं.’
गौलाआगर में प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक के पद पर तैनात खर्कटम्टा क्षेत्र के निवासी अध्यापक संजय कुमार बताते हैं कि, चन्द्रवंशीय राजाओं के जमाने में उनके पूर्वज भी तांबे के सिक्कों को ढ़ालने का काम किया करते थे.
ताम्र व्यवसाय को उसकी पहचान दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने एससीएसटी हब योजना बनाई है ताकि ताम्र शिल्पियों को इसका फायदा मिल सके. इस योजना के तहत हस्तनिर्मित तांबे से बने पूजा पात्रों को चारधाम में बेचे जाने की योजना है. अब ये अलग बात है कि इस योजना से स्थानीय शिल्पियों को रोजगार मिलेगा या फिर ये काम भी मशीनों के हवाले कर दिया जाएगा.
शिल्प कारीगर सुंदर लाल और उनके सांथियों को उनकी शिल्पकला के लिए पूर्व में उत्तराखंड सरकार के सांथ ही उद्योग विभाग से भी सम्मानित तो किया गया लेकिन उसके बाद उनकी किसी ने भी सुध नहीं ली. उम्र के इस पड़ाव में भी वो आजीविका के लिए तांबे में अपना हुनर निखारने में लगे ही रहते हैं. उन्हें बस मलाल इस बात का है कि उनकी ये कला उनके सांथ ही लुप्त होने जा रही है. जबकि वो कई बार विभाग से कह चुके हैं कि वो मुफत में अपनी जमीन देने को तैंयार हैं बशर्तें सरकार यहां शिल्प ट्रैनिंग सेंटर तो खोल दे.

9 सितम्बर हिमालय दिवस- हिमालय बचाओ प्रतिज्ञा

डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट
आधुनिक समय में वैज्ञानिक हिमालय की तमाम अनुकूलताओं का अध्ययन
कर अधिक से अधिक लाभ लेने की खोज में लगे हुए है, परन्तु जब हिमालय की
सुरक्षा का प्रश्न उठता है तो उस पर चिंता अवश्य व्यक्त की जाती है पर इस मुद्दे
को गम्भीरता से नही लिया जाता है। यही कारण है कि ऐवरेस्ट जैसी दुनिया
की सबसे ऊँची पर्वतश्रृंखला भी मानव गतिविधियों का केन्द्र बनी हुई
है। उत्तराखण्ड हिमालय से लेकर हिमाचल, जम्मू-ंकश्मीर तथा पूर्वोतर
हिमालय की विभिन्न पर्वत श्रृंखलाओं को फतेह करने की प्रतिस्पर्धा लगातार
बढ़ती जा रही है। फलस्वरूप, पर्वतारोहियों, सौन्दर्य प्रेमियों, पर्यटकों
द्वारा हिमालय पर्वत श्रृंखला ओं के साथ-साथ धार-खाल, नदी-नाले,
गाड-गदेरे विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक कचरे से पटते जा रही है जो कि
पर्यावरणीय दृष्टि से खतरनाक प्रवृति की ओर संकेत कर रहा है। वनों के
विनाश से हिमालय की अद्भुत संतुलनकारी शक्ति क्षीण होने से जलवायु
में अनेक विघटनकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।
भूवैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय पर्वत श्रृंखला अभी नवीनतम पर्वत
श्रृंखला है जिसके कारण वह अपनी जगह पर ठीक से स्थिर नहीं हो पाई है।
हिमालय की स्थिर दिखने वाली इन चट्टानों की मोटी-मोटी परतों के
भीतर बड़ी-बड़ी दरारें है, जिनके संधिस्थलों में
भूगर्भिक हलचल के कारण उथल-पुथल होती रहती है। इसी कारण यहां
निरन्तर भूकम्प, भूस्खलन, भूक्षरण एवं बा-सजय जैसी घटनायें होती रहती
है और इनको बढ़ाने में बाह्य कारक जैसे; सड़क एवं बांध निर्माण में
हो रहे विस्फोटों तथा भारी मशीनों का महत्त्वपूर्ण हाथ हैं।
क्योंकि पहले से नाजुक चट्टानों के सन्धिस्थल इन विस्फोटों से
और भी जीर्ण-शीर्ण हो जाते है जो भूकम्प आदि के झटकों को
सहन नही कर पाने के कारण एक बड़ी त्रासदी का कारण बन जाते हैं। एक ओर
जहाँ सभ्यता के साथ-साथ मनुष्य ने विकास के कई महत्त्वपूर्ण आयाम खोज
निकाले है, तो वहीं दूसरी ओर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करके उसने
सारे जैव-मण्डल में पर्यावरण असंतुलन की स्थिति पैदा कर दी है। पर्यावरण
में परिवर्तन के प्रमुख कारण बड़े पैमाने पर हो रहे औद्योगिकीकरण के
लिए वनों का कटान, परिवहन सुविधाओं के विस्तार के लिए सड़कों का
निर्माण, संचार एवं अन्य आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ आबादी में
बेतहाशा वृद्धि ने स्वच्छ पर्यावरण के संरक्षण में कठिनाइयां पैदा कर दी
है। प्राकृतिक रूप से बहने वाली वेगवान नदियों की धारा को मोड़कर
मनुष्य ने अपने विकास और उत्थान की अंधी दौड़ में प्राकृतिक
नियमों के विरूद्ध जो कार्य किये है। उसी का नतीजा है कि कुछ वर्षों से
प्रकृति में ऐसी घटनायें घट रही है जिनका शायद ही किसी को कभी
आभास रहा हो। लेकिन जिस प्रकार से प्रकृति धीरे-धीरे अपना विध्वंसक रूप
धारण कर रही है उससे स्वंय मनुष्य का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है जिसके
लिए वह खुद जिम्मेदार है।
हिमालय हमारी धार्मिक आस्था का आधार ही नही है, वरन् लाखों
प्रजाति के पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों और बहुमूल्य
जीव-जंतुओं का निवास स्थल भी हैं। हिमालय का आज हम जिस प्रकार
दोहन करते जा रहे है उससे हिमालय को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
गाँधी जी ने कहा था कि ”यह धरती अपने प्रत्येक निवासी की आवश्यकताओं
को पूरा करने के लिए यथेष्ट साधन उपलब्ध करती है परन्तु व्यक्ति के लालच
की पूर्ति नही कर सकती है।” हिमालय से निकलनी वाली नदियां जीवन के लिए
अमृततुल्य है जिन पर देश की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी का जीवन निर्भर करता
है जो उनकी रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। देश की जलवायु एवं
मौसम को नियंत्रित करने के साथ ही उत्तरी ध्रुव की ओर से आने वाली
तेज एवं ठंड़ी हवाओं से भी हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की रक्षा करता
हैं। हिमालय अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण भारतीय उपमहाद्वीप
के लिए युगों-युगों से एक प्रहरी की भूमिका भी निभाता आ रहा है
जो हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है।
विश्व में भोगवादी व्यवस्था एवं मनुष्य की प्रकृति पर विजय पाने की
प्रतिस्पर्धा ने सम्पूर्ण हिमालयी पर्यावरण को तहस-नहस करके रख दिया है,
जिसके कारण आज प्राकृतिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा का प्रश्न
खड़ा हो गया है। यही नही विभिन्न प्रकार की पादप एवं जीव-जन्तुओं की
प्रजातियां जो लगातार इस जैव-ंउचयमण्ड़ल से लुप्त होती जा रही है, उनके
अस्तित्व को बचाये रखने के चुनौती भी सबके सामने है। विकास नदियों
में बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण, उद्योगों के नाम पर खनन, वन
उपज का शोषण एवं दोहन करके वे चीजें चलन में लाना चाहता है जिनकी
बुनियादी आवश्यकता तो नही है, परन्तु उनके उपभोग के द्वारा अधिक से
अधिक सुख-सुविधायें भोगना चाहता है जिसे विकास की दृष्टिसे प्रगति कहा
जाता है। लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से अत्याचार, शोषण एवं विनाश का
प्रतीक है। जिसका दण्ड प्रकृति कभी जानलेवा गर्मी, सर्दियों में अत्यधिक
ठंड, बरसात में अनियंत्रित वर्षा, भूस्खलन, भूक्षरण, बा-सजय, बादल फटना,
हिमालयी सुनामी जैसे प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देती रहती है और यदि
यहीं स्थिति बनी रही तो आगे भी मनुष्य को प्रकृति के कोपभाजन बनने
से कोई नहीं बचा सकता है।
यहां प्रश्न उठता है कि जबसे हमने हिमालय बचाओं प्रतिज्ञा लेनी शुरू
की है तब से हिमालय के संरक्षण में क्या कोई परिवर्तन आया है या नही?
पर्यावरण दिवस के नाम पर प्रतिवर्ष बरसात के मौसम में स्कूल, कालेज,
महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों विधानसभाओं, संसद भवन एवं विभिन्न
सरकारी सस्थाओं में लाखों पेड़ लगाये जाते है जिनको लगाते हुए
खूब फोटो खीची जाती हैं पर इनमें कितने वृक्ष जीवीत हैं इसका किसी
को पता है? यदि वृक्षारोपण के समय लगाये गये पेड़ जीवीत है तो इन
संस्थाओं में गिनती के ही वृक्ष क्यों नजर आते है? और यदि हम उन
वृक्षों को बचा नही पाये हैं तो ऐसे वृक्षारोपण का क्या लाभ है? वन
विभाग भी प्रतिवर्ष वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाकर लाखों वृक्षों को
लगाता/लगवाता है आखिर हर वर्ष इतनी संख्या में वृक्षारोपण की आवश्यकता
क्यों पड़ रही है? क्या यह मात्र खानापूर्ति तो नही है? ऐसे में हिमालय
बचाओं की प्रतिज्ञा भी पर्यावरण दिवस की तरह प्रतिवर्ष प्रतिज्ञा लेने तक ही
सीमित न रह जाय? क्योंकि हिमालय में प्रतिवर्ष दावाग्नि से ही लाखों
पेड़-पौधे, जीव-जन्तु यानि पूरी जैव-विविधता नष्ट होती है जिसको
बचाने का हम कोई उपाय नही ढूंढ पाये है? क्योंकि वैज्ञानिक भी
धरती के बजाय दूसरे ग्रंहों पर जीवन की चिंता में रत है। इसीलिए सूर्य,
चन्द्रमा पर जीवन की खोज करने में तो सफल हो गये है पर धरती पर जीवन को
कैसे बचाया जाय इस पर सोचने का समय ही नही है। भविष्य की चिंता में हम
वर्तमान को खोते जा रहे है जबकि आज अगर सुरक्षित होगा तो कल अपने आप
खुशहाल होगा, परन्तु वास्तव में हम हिमालय के प्रति गम्भीर नही है।
अतः यदि हम हिमालय के वनों को केवल आग से ही बचा पाने में सफल हो
गये ंतो यही हिमालय बचाने की सबसे बड़ी प्रतिज्ञा होगी।
( असिस्टेंट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान,
अ. प्र. बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग)

पर्वतारोही पद्मश्री हुकुम सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
मुनस्यारी। पर्वतारोही पद्मश्री हुकुम सिंह पांगती को याद किया गया। क्षेत्रवासियों द्वारा स्मृति पार्क में स्थिति उनकी मूर्ति पर पुष्पांजलि दी गई और उनके कार्यों का उल्लेख किया। स्व. हुकुम सिंह के मूर्ति स्थापना दिवस पर आईटीबीपी व विभूति संस्थान द्वारा यह आयोजन किया गया था।
इस अवसर पर आईटीबीपी के मुनस्यारी प्रभारी सुभाष सिंह के नेतृत्व में जवानों ने पुष्पगुच्छ अर्पित किये। लक्ष्मण सिंह पांगती लछबू ने स्व. हुकुम सिंह की जीवन गाथा को सुनाया कि कितनी विपरीत स्थितियों में वह आगे बढ़े। आयोजन में श्रीरामसिंह धर्मशक्तू, हयात सिंह रावत, हरेन्द्र सिंह धर्मशक्तू, उषापति द्विवेदी, तारा पांगती ने विचार रखे। संचालय जगत सिंह मर्तोलिया ने करते हुए कहा कि समाज ने इस शहीद स्थल को अपने हाथ में लेकर नया लुक दिया है। इस मौके पर आईटीबीपी के उप निरीक्षक हीरा सिंह मर्तोलिया, नन्दा धर्मशक्तू, हेमा पांगती, बलवन्त पांगती, नीमा देवी, मथुरा मर्तोलिया, लक्ष्मण धर्मशक्तू, देवेन्द्र धर्मशक्तू , सीता लस्पाल, जानकी मर्तोलिया, हिमांशु सिंह धर्मशक्तू, नीमा पांगती सहित तमाम लोग मोजूद थे।
कोरोना काल में क्षेत्रवासियों द्वारा अति भव्यता के साथ इस कार्यक्रम कांे किया गया। सामाजिक दूरी रखते हुए सर्वप्रथम स्मृति पार्क की साफ-सफाई की। इसके लिये मुनस्यारी ब्वाइज द्वारा समाजसेवियों के सहयोग से इस पार्क को शानदार सजाया गया था।
बताते चलें कि पद्मश्री हुकुम सिंह पांगती की मूर्ति की स्थापना आईटी बीपी के तत्कालीपन डीआईजी मंगल सिंह दानू एवं डीआईजी हीरा सिंह पंचपाल द्वारा की गई थी। रक्षामंत्री बचीसिंह रावत एवं पुष्पा पांगती द्वारा 29 अगस्त 2003 को इसका उद्घाटन किया गया था।
सीमान्त के दरकोट ग्राम में 26 फरवरी 1938 को जन्मे हुकुम सिंह बचपन से ही पर्वतारोही बनने की चाह रखते थे। सीमा पुलिस में भर्ती होने के पश्चात उन्होंने पर्वतारोहण के क्षेत्रा को चुना और वे इसकी बुलन्दियों तक जा पहुंचे। जापान, ताईवान, ईरान और अन्तर्राष्ट्रीय पर्वतीय संघ के सात अभियान संयुक्त रूप से सम्पन्न कराने वाले इस पर्वतारोही ने 28 पर्वतारोहण अभियानों की योजना तैयार की और 14 अभियानों का नेतृत्व भी किया। इस पर्वतारोही को कराकोरम पर्वत श्रृंखला का विशेषज्ञ माना जाता था। सीमा पुलिस में रहते हुए वह कई बार राष्ट्रीय स्कीइंग चैम्पियन भी रहे।
हुकुम सिंह पांगती 1963 में गोरखा राइपफल में कमीशन अधिकारी के रूप मेें चयनित हुए और उन्होंने 1967 से भारत तिब्बत सीमा पुलिस में नौकरी शुरु कर दी। उन्होंने नेहरू पर्वतारोहण संस्था उत्तरकाशी, आर्मी स्कीइंग एवं पर्वतारोहण संस्था गुलगर्म, सोनमर्ग में प्रशिक्षण लिया। आस्ट्रेलिया से एडवांस माउण्टेन गाइड एण्ड रेस्क्यू टेªनिंग भी उन्होंने की थी। पद्मश्री सम्मान से सम्मानित पांगती जी ने वर्ष 1970 में त्रिशूल, मान्चेस्टर नाम्पा, 1985 में माउण्ट सासेर काकड़ी, 1989 में नौ देशों की माउंट नन-कुन, 1990 में ईरान की सबसे बड़ी चोटी माउण्ट देमावंद, 1972 में माउण्ट देववन, 1972 में ही पंचाचूली का नेतृत्व किया। इस अभियान के अलावा वर्ष 1973 में माउण्ट बालकुन, 1974 में माउण्ट शिवलिंग, 1976 में स्काइ त्रिशूल, 1990 में माउण्ट सासेर कांगड़ी, 1991 में माउण्ट कंचनजंगा पूर्वी छोर से, 1992 में एलबर्ट विले ;फ्रांस, इसी वर्ष माउण्ट एवरेस्ट पर फतह पर जा रहे पर्वतरोही दल का नेतृत्व किया।
1988 में इण्डियन माउण्टेनिंग पफाउण्डेशन के द्वारा उन्हें स्वर्ण पदक से अलंकृत किया गया। भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों देखते हुए वर्ष 1992 में पद्मश्री से अलंकृत किया। उ.प्र.सरकार द्वारा के द्वारा भी इस पर्वतारोही को यूपी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनके योगदान को देखते हुए भारतीय शीतकालीन खेल फैडरेशन ने इन्हें अपना सचिव बनाया था।

देवभूमि उत्तराखंड में देवी नंदा सुनंदा का होता गुणगान

भुवन बिष्ट
 इस समय पूरा विश्व वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से त्रस्त है और हर कोई ईश्वर से इस संकट अतिशीघ्र मुक्ति दिलाने की प्रार्थना कर रहा है। कोरोना से निबटने के लिए सोशल डिस्टेंसिंंग व अपनी-अपनी सुरक्षा का ध्यान भी हर आमजनमास इस समय अपनाने का प्रयास कर रहा है। अनलाक में कुछ मंदिरों को भी पूजा अर्चना के लिए खोला गया है किन्तु फिर भी सभी कोरोना से बचने के लिए सोशल डिसटेंसिंग, हैंड सैनेटराईज, आदि इसके उपायों को अपना रहे हैं। इस समय मां नंदा सुनंदा की जयकारे के साथ मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती थी किन्तु महामारी कोरोना के कारण अभी लगभग सभी धार्मिक आयोजनों को रोका गया है और कोरोना से बचने के उपायों और नियमों को अपनाकर ही विधि विधान के साथ पूजा अर्चना की जा रही है। कोरोना के कारण सभी अपने अपने घरों से ही अपने आराध्य देवी देवताओं से कोरोना से मुक्ति की प्रार्थना कर रहे हैं। देवभूमि में सदैव होता है अटूट आस्था का संगम। देवभूमि उत्तराखण्ड में हो रहे है आजकल मां नंदा सुनंदा के जयकारे । नंदा देवी समूचे उत्तराखण्ड गढ़वाल मंडल और कुमाऊं मंडल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं देवी अल्मोड़ा हो या नैना देवी नैनीताल व कुमांऊ के सभी शहरों व कस्बों में हो रहे है मां नंदा सुनंदा के भक्तिमय वातावरण से समस्त देवभूमि में नंदा देवी महोत्सवों की धूम मची हुई है। नंदा देवी मंदिर परिसर रानीखेत , प्रसिद्ध नंदा देवी मंदिर अल्मोड़ा, नैना देवी नैनीताल , पिथौरागढ़ , गरूड़, बागेश्वर, द्वाराहाट , चौखुटिया, सहित कुमांऊ एंव देवभूमि में सभी स्थानों में मां नंदा सुनंदा की कदली वृक्ष को लाकर स्थापना की जाती है और होता है गुणगान…
देवभूमि की मां नंदा दैण है जाये,
ओ माता सुनंदा तू दैण है जाये,..
              नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं। रूप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है। भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है। नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है। भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हरसिद्धी हैं। शिवपुराण में वर्णित नंदा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है। शक्ति के रूप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं। मान्यता है कि चंद्रवंशीय राजा के घर नंदा के रूप में देवी प्रकट हुईं. उनके जन्म के कुछ समय बाद ही सुनंदा प्रकट हुईं. इनके संदर्भ में हिमालय में एक मान्यता यह भी है कि राज्यद्रोही षडयंत्रकारियों ने उन्हें कुटिल नीति अपना कर भैंसे से कुचलवा दिया था. भैंसे से बचने के लिए देवी ने कदली वृक्ष में छिपने का प्रयास किया. इसी दौरान एक जंगली बकरे ने केले के पत्ते खाकर उन्हें भैंसे के सामने कर दिया. बाद में वही कन्याएं पुनर्जन्म लेकर नंदा, सुनंदा के रूप में अवतरित हुईं और राजद्रोहियों के विनाश का कारण भी बनीं. एक मूर्ति को नंदा और दूसरी को गौरा देवी की मान्यता प्राप्त है।
              किंवदंती के अनुसार एक मूर्ति हिमालय क्षेत्र की आराध्य देवी पर्वत पुत्री नंदा एवं दूसरी गौरा पार्वती की हैं। इसीलिए प्रतिमाओं को पर्वताकार बनाने का प्रचलन है। माना जाता है कि नंदा का जन्म गढ़वाल की सीमा पर अल्मोड़ा जनपद के ऊंचे नंदगिरि पर्वत पर हुआ था। गढ़वाल के राजा उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में ले आऐ थे, और अपने गढ़ में स्थापित कर लिया था। इधर कुमाऊं में उन दिनों चंदवंशीय राजाओं का राज्य था। 1563 में चंद वंश की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानांतरित की गई। इस दौरान 1673 में चंद राजा कुमाऊं नरेश बाज बहादुर चंद (1638 से 1678) ने गढ़वाल के जूनागढ़ किले पर विजय प्राप्त की और वह विजयस्वरूप मां नंदा की मूर्ति को डोले के साथ कुमाऊं ले आए। कहा जाता है कि इस बीच रास्ते में राजा का काफिला गरुड़ के पास स्थित झालामाली गांव में रात्रि विश्राम के लिए रुका। दूसरी सुबह जब काफिला अल्मोड़ा के लिए चलने लगा तो मां नंदा की मूर्ति आश्चर्यजनक रूप से नहीं हिल पायी, (एक अन्य मान्यता के अनुसार दो भागों में विभक्त हो गई।) इस पर राजा ने मूर्ति के एक हिस्से (अथवा मूर्ति के न हिलने की स्थिति में पूरी मूर्ति को ही) स्थानीय पंडितों के परामर्श से पास ही स्थित भ्रामरी के मंदिर में रख दिया। भ्रामरी कत्यूर वंश में पूज्य देवी थीं, और उनका मंदिर कत्यूरी जमाने के किले यानी कोट में स्थित था। मंदिर में भ्रामरी शिला के रूप में विराजमान थीं। ‘कोट भ्रामरी’ मंदिर में अब भी भ्रामरी की शिला और नंदा देवी की मूर्ति अवस्थित है, यहां नंदा अब ‘कोट की माई’ के नाम से जानी जाती हैं। लोक इतिहास के अनुसार नन्दा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुँमाऊ के कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थी। ईष्टदेवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी को पार्वती की बहन के रूप में देखा जाता है परन्तु कहीं-कहीं नन्दादेवी को ही पार्वती का रूप माना गया है। नन्दा के अनेक नामों में प्रमुख हैं शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी। देवभूमि उत्तराखण्ड में समान रूप से पूजे जाने के कारण मां नंदा सुनंदा को धार्मिक एकता के सूत्र के रूप में देखा गया है। विद्वानों के अनुसार मां नंदा चंद वंशीय राजाओं के साथ संपूर्ण उत्तराखंड की विजय देवी थीं। हालांकि  कुछ विद्वान उन्हें राज्य की कुलदेवी की बजाय शक्तिस्वरूपा माता के रूप में भी मानते हैं।
        देवभूमि के सभी क्षेत्रों में मां नंदा देवी महोत्सवों की धूम मची रहती है और नंदा देवी महोत्सव में विभिन्न प्रतियोगिताओं आदि का भी आयोजन किया जाता है। देवभूमि सदैव ही देवों की तपोभूमि रही है । महोत्सव सदैव ही एकता के सूत्र में हमें बांधते हैं और प्रत्येक आयोजन महोत्सव भी कुछ न कुछ प्रेरणा अवश्य देते हैं । आधुनिक चकाचौंध में तेजी से आ रहे सांस्कृतिक शून्यता की ओर जाते दौर में भी यह महोत्सव न केवल अपनी पहचान कायम रखने में सफल रहे हैं वरन इसने सर्वधर्म संभाव की मिशाल भी पेश की है। पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी यह देता है नंदा देवी महोत्सव।एकता अखण्डता व सांस्कृतिक विरासत की पहचान महोत्सवों को संजोये रखने की आवश्यकता है।वैश्विक महामारी कोरोना के कारण सभी धार्मिक आयोजनों को सीमित कर दिया गया है तो अधिकाशं स्थानों पर कोरोना के सुरक्षा नियमों को अपनाकर ही पूजा अर्चना संपन्न करायी जा रही हैं। सभी जनमानस ईश्वर से वैश्विक महामारी कोरोना से जल्दी से जल्दी मुक्ति दिलाने की प्रार्थना कर रहे हैं। शीघ्र ही इस वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से सभी जनमानस को मुक्ति मिल जायेगी और पूरे विश्व में पुनः खुशहाली आ जाये ,सभी जनमानस इसकी कामना कर रहे हैं।
 कुमांऊनी रचना (जय नंदा सुनंदा)
जय जय नंदा सुनंदा,  
                माता दिये वरदान। 
देवभूमि की माता प्यारी, 
                भौते छन महान। 
माता गौरी अवतारा, 
                 सदा माँ कहलायी। 
कदली सेवा में माता, 
                  हांम सब ल्यायी। 
अल्मोड़ा में नंदा देवी, 
                   माता नैना नैनीताला। 
करिं दिये माता आब, 
                जय देवभूमि खुशहाला। 
द्वार ऐंरीं भक्त माता, 
                करणीं सबै ध्यान।… 
जय  नंदा  सुनंदा,
                माता दिये वरदान। 
देवभूमि की माता प्यारी, 
                भौते छन महान।……
चारों ओर आब हैरै, 
                 माता की जयकारा, 
जो साँची मनल आयो,
                 माता सुण छै पुकारा। 
लाज माता हर बात, 
                 आब हामरिं धरिये, 
विनती हे नंदा सुनंदा,
                  यौ सफल करिये। 
भारत समृद्ध हैजो,  
                   गौं घर खुशहाला ।
माँ नंदा सुनंदा कैं, 
                   गुण सबैं गाला। 
मिटै दिये अन्यार माता,  
                   दिये आब ज्ञान। …
जय नंदा सुनंदा, 
                   माता दिये वरदान। 
देवभूमि की माता प्यारी,
                   भौते छन महान…..
                     रचनाकार -भुवन बिष्ट 
                     मौना, रानीखेत (उत्तराखंड )


रायबहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा

हरि ने हरे पिछड़े भूमिहीनों के दर्द
डॉ दुर्गा प्रसाद
अल्मोड़ा: एतिहासिक नगरी में एक सपूत ने जन्म लिया जिसका नाम था हरि प्रसाद टम्टा। उत्तराखंड के सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक रूप से पिछडे़ भूमिहीन शिल्पकारों को संगठित करने, हक-हकूक की लड़ाई लड़ने वाले अल्मोड़ा के रायबहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा ने सामाजिक सौहार्द की दिशा दी। असुविधा के उस दौर में अल्मोड़ा में जन सुविधाओं के लिए भी उन्होंने काफी संघर्ष किया। 19वीं शताब्दी के शुरू में समाज हित में संघर्ष करने वालों समाज सुधारकों में मुंशी हरि प्रसाद टम्टा का नाम भी प्रमुखता से शामिल है। वह आजन्म एक निष्काम कर्मयोगी की भांति परोपकार के कार्यो में जुटे रहे।
उन्होंने सामाजिक हितों व हक-हकूकों के लिए संघर्ष करते हुए उत्तराखंड में विभिन्न उप जातियों में बंटे उपेक्षित वर्ग के लोगों को एकजुट किया और उनके स्वाभिमान को जगाने का काम किया। भले ही रूढि़वादिता के कारण समाज में उन्हें कई बार अपमान का सामना करना पड़ा। अपमान की घटनाओं में
सन् 1913 में म्यूनिसिपल बोर्ड अल्मोड़ा में मुंशी हरि प्रसाद टम्टा के मामा कृष्ण टम्टा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए, तो उस दौर में रूढि़वादी विचारों के चलते विरोधी स्वर के जरिये अपमान सहना पडा। इसके अलावा सन् 1911 में जार्ज पंचम की राजनैतिक ताजपोशी पर बद्रेश्वर अल्मोड़ा में सजे जश्न कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित करने पर भी हरि प्रसाद टम्टा व उनके मामा को रूढि़वादिता के चलते अपमान का झेलना पड़ा। सन् 1925 में अल्मोड़ा में कुमाऊं व गढ़वाल के शिल्पकारों के सम्मेलन के दौरान भी नगर में अपमान का सामना करना पड़ा।
ऐसी घटनाओं के बावजूद वह अपने मकसद से डिगे नहीं, बल्कि सहनशील बनकर आगे बढ़े। उनकी सहनशीलता व धैर्य समाज में सामाजिक समरसता का भाव पैदा करता गया। उन्होंने अल्मोड़ा में बिजली, पानी, सडक, शिक्षा व स्वच्छता के लिए भी संघर्ष किया और सच्चे समाज सेवक के रूप में पहचान बनाई। उनके इसी व्यक्तित्व, सहनशीलता व समाज सेवा का परिणाम है कि आज भी उन्हें लोग भूले नहीं। पर्वतीय क्षेत्र में यातायात की व्यवस्था उस दौर में नगण्य थी, उन्होंने यह सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सन् 1920 में हिल मोटर ट्रांसपोर्ट की स्थापना अपने अनुज स्व. लालता प्रसाद के सहयोग से सर्वप्रथम आरंभ की। उनकी जयंती पर हर वर्ग के लोग एकजुट होकर उन्हें याद कर करते हैं। उनसे समाज सेवा की प्रेरणा लेकर सामाजिक समरसता की दिशा में कदम बढ़ाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।