हिमालयी संस्कृति का परिचय- बारापटिया समाज की संस्कृति

पुस्तक समीक्षा
डा.पंकज उप्रेती
हिमालय संस्कृतियों का जनक है और आज भी इसकी आदि संस्कृति उपस्थित है। समय के साथ बहुत कुछ बदला है लेकिन बीज हमेशा अंकुरित होते हैं। हिमालयी संस्कृतियों में जोहार घाटी के जेष्ठरा बारापटिया समाज की संस्कृति भी इस प्रकार की पुरातन संस्कृति है। कभी गोरी नदी के दोनों ओर इस समाज का काफी जमजमाव था। इन्हीं का एक गाँव है- बोथी। बोथी के बोथियालों को जेष्ठरा यानी ज्येष्ठ/सयाना/बड़ा माना जाता है। जैसा कि सभी समाजों में प्रचलित है कि ज्येष्ठ को अधिक अधिकार दिये जाते हैं और उसकी जिम्मेदारी भी ज्यादा होती है। वही स्थिति बारापटिया ज्येष्ठराओं की भी रही है।
अपने समाज को आगे बढ़ाना, उसे सुरक्षित रखना ज्येष्ठ यानी बड़े का धर्म भी है। अपने इसी धर्म के पालन के लिये इस समाज के बुजुर्गों ने जब जोहार घाटी में कदम रखा तो यह जनशून्य स्थान उन्हें अनुकूल लगा। घोर जंगल और जंगली जानवरों के बीच हिमालय के कई रंग उन्होंने निहारे और तय कर लिया कि यहीं अपने घरौंध्े बनायेंगे। बस, फिर क्या था। कृषि योग्य भूमि को तराश कर खेतीबाड़ी की जाने लगी, पशुपालन किया जाने लगा। शान्तिप्रिय और आस्थावान लोग कैलास मानसरोवर के दर्शन को भी जाने लगे। व्यापार के सिलसिले में तिब्बत में भी इनकी यात्राएं होती थीं। इस प्रकार बारपटिया संस्कृति फैलती चली गई। यहीं से शुरू हुआ है ‘बारह पाट का घाघरा’ वाला किस्सा। याने इनके परम्परागत वस्त्राभूषण इतने भारी और रौबदार होते थे कि हर किसी के बस की बात नहीं। इस क्षेत्र के पुरुष बारह पाट का उफनी लमकोट बखुला और सिर में बारह हाथ लम्बी पगड़ी पहनते थे। महिलाएं बारह पाट घाघरा आघरा और सिर में सफेद खौंपी पहनती थी। जोहार-गोरीफाट के विभिन्न बाहर पट्टियों में सदियों से ज्येष्ठरा लोग बसे हुए थे। तेहरवीं-चैदहवीं सदी में इनका बड़ा व्यापारिक काम था। ज्येष्ठराओं में धील्ली गोल्फाल और हरपू बनिया बड़े व्यापारी बताये जाते हैं। किन्तु उच्च हिमालयी परिस्थितियों एवं तिब्बत क्षेत्र में लूटपाट की वहज से ज्येष्ठराओं ने व्यापार की अपेक्षा जमीदारी का कार्य अपना लिया। पुरातन संस्कृति के वाहक इन लोगों द्वारा दुर्गमता का वह स्वाद चखा गया जो इन्हें विपरीत स्थितियों में भी हौंसला देता है। आज भले ही समाज का फैलाव पहाड़ से मैदान तक हो चुका है और गाँव से शहर बनने की होड़ है लेकिन किसी भी समाज की जड़ें उसके मूल में होती हैं। उसका यह मूल उसका गाँव, उसकी संस्कृति है।
दुर्गा सिंह बोथियाल बारपटिया समाज के उन अनुभवी व बुद्धिजीवियोें में से हैं जिन्होंने वर्तमान के हालात और अवसरों को जानते हुए ‘‘बोथी’’ के बहाने अपनी संस्कृति को उजागर किया है। सीमान्त की दुर्गम स्थितियों से तपकर निकले दुर्गा सिंह जी बैंकिंग सेवा में रहे हैं लेकिन उनके लिखने-पढ़ने और समाज के लिये सजगता का भाव हिमालयी संस्कृति के एक हिस्से का परिचय करवा रहा है। ‘बोथी’ के बहाने यह यह एक दस्तावेज होगा। श्री दुर्गा सिंह जी के लेखन में ठैठ ग्रामीण परिवेश के शब्दों का आना स्वाभाविक है, जिससे इसकी संस्कृति और सांस्कृतिक झांकी को समझना आसान हो जाता है। वह अपने बचपन के जिये हुए को इस पुस्तक की भूमिका में धाराप्रवाह लिखते हैं और अपने बुजुर्गों को याद करते हैं। बोथी में बसासत की कहानी इतनी रोमांचक और सच्ची है कि वह पुरातन समाज के सच्चे रिश्तों को उजागर करती है। बोथियाल द्वारा लोहार को किसी सुरक्षित और उन्नत स्थान की खोज के लिये भेजने पर लोहार ठीक उसी प्रकार अपने गुसांई के लिये निकल पड़ता है जैसे भगवान राम जी के आदेश पर हनुमान निकल पड़ते थे। हनुमान की सी सेवा और भक्ति हम बोथी के लोहार की भी देखते हैं।
इस पुस्तक में ‘पारिवारिक वृक्ष’ के रूप में श्री दुर्गा सिंह जी ने बुजुर्गों से लेकर वर्तमान पीढ़ी तक जिस प्रकार उल्लेख कर दिया है वह आने वाली पीढ़ियों के लिये महत्वूपर्ण होगा। साथ ही ‘लोहार’ परिवार की भूमिका को उन्होंने बहुत आदर के साथ बताया है। उनकी भी पीढ़ियों का उल्लेख इसमें है, जो सीमान्त क्षेत्र के उन लोगों के बारे में जानकारी दे रहा है अपने हुनर के अलावा अपनी परम्परा को बनाये रखने में निरन्तर रहे हैं।
श्री बोथियाल जी ने अपने बचपन के खेलों और ग्रामीण परिवेश का वर्णन करने के साथ ही बोथियालों के बारे में बताया है कि या तो वे महर लोगों में से हैं या कुथलिया बोरा। क्योंकि इनके पास इस प्रकार के प्रमाण मिले हैं और उन्होंने स्वयं भी देखा है। यह सब शोधार्थियों के लिये भी शोध् का विषय हो सकते हैं। इतना जरूर है कि महर और कुथलिया बोरा दोनों कुछ दूरी पर आज भी हैं। रा.स्ना.महाविद्यालय पिथौरागढ़ के संगीत विभाग में रहते हुए मैंने स्वयं कुमौड़ सहित महरों की शानदार परम्पराओं को देखा है। इसी प्रकार रा.स्ना.महाविद्यालय बेरीनाग के संगीत विभाग में रहते हुए कुथलिया बोरा संस्कृति को नजदीक से देखा। गंगोलीहाट के बौराणी क्षेत्र में भांग की पौध से चीजें बनाने की वही संस्कृति रही है जिसका उल्लेख श्री बोथियाल जी कर रहे हैं। यह इतना विशद विषय है कि इस पर अध्ययन जरूरी है।
फिलहाल, बोथी को लेकर हिमालय की जिस संस्कृति का यह दस्तावेज है, वह सिर्फ एक गाँव का नहीं बल्कि पूरे समाज का है। इस प्रकार के अध्ययन से उन भूली-विसरी जानकारियांे के बारे में पता चलता है जिसकी बहुत से लोग केवल कल्पना मात्रा करते होंगे। दुर्गा सिंह बोथियाल जी के सद्प्रयासों का लाभ समाज को होगा इन्हीं कामनाओं के साथ।
-डाॅ. पंकज उप्रेती

पाटी विकासखण्ड में पर्यटन की अपार संभावनाएं

सूरज लडवाल
चम्पावत – जिला अंतर्गत पाटी विकासखण्ड में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं । लेकिन सरकार द्वारा अब तक विकासखण्ड के कई पर्यटन संभावित क्षेत्रों में कोई भी सकारात्मक पहल नहीं की गई है । जिससे खुद की अलग पहचान बनाने की संभावनाओं वाला ये क्षेत्र लगातार पिछड़ता जा रहा है । गातव्य हो कि ब्लॉक मुख्यालय से 15 किलोमीटर की दूरी पर कूँण गाँव में बाँज के जंगलों से घिरी पहाड़ी में स्थित जैचम निर्मांसी का मन्दिर स्वयं में एक पर्यटक स्थल है । जिसे मन्दिर में बीते दशकों से रह रहे महात्मा ने एक रमणीक स्थल बनाने में मुख्य व अहम योगदान दिया है । बताते चलें कि चोटी पर स्थित इस मन्दिर से आस – पास का समूचा क्षेत्र दिखाई देता है । शाम के वक्त मन्दिर से आसपास की पहाड़ियों का दिखाई देने वाला अनूठा नजारा मन को शान्ति प्रदान करने वाला तो होता ही है इसके अलावा मंद हवाओं के बीच प्रकृति की गोद में बैठकर इन नजारों को देखना सांसारिक थकान को भी दूर करता है । और आसपास के इलाके से इस पहाड़ी का अनूठा दृश्य देखने को मिलता है । यह क्षेत्र सुबह हल्के कोहरे से ढका रहता है , तो दोपहर में साफ मौसम के साथ पहाड़ी के ऊपर बादल मंडराते नजर आते हैं । और सूर्य ढलने के बाद शाम के वक्त अगर कोई इस दृश्य को देखता है तो फोटोग्राफी करने से खुद को नहीं रोक पाता है । शाम के वक्त आसमान में हल्की लालिमा लिए बादलों का जमावड़ा पहाड़ी को और भी खूबसूरत बना देता है । और ये लालिमा सूर्य ढलने के काफी देर रात होने तक दिखाई देती है । इसके साथ – साथ पास में ही कणकश्वेर त्रिवेणी के समीप रौलमेल में देवदार वनी के बीच स्थित शिव मन्दिर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है । लेकिन सरकार की उदासीनता के चलते इन ऐतिहासिक , पौराणिक व सुरम्य स्थानों पर विकासकार्य ठप नजर आ रहे हैं । इन पर्यटन संभावित स्थानों में विकास के नाम पर जनप्रतिनिधि सिर्फ चुनावों में नजर आते हैं । जानकारों के मुताबिक अगर सरकार इन स्थानों पर पर्यटन को विकसित करने के लिए कदम उठाती है तो ये स्थान बहुत जल्दी बेहतरीन पर्यटन स्थलों की सूची में शुमार हो जायेंगे ।
( सूर्य ढलने के बाद दिखाई देने वाला जैचम पहाड़ी का मनोरम दृश्य – छाया व विवरण सूरज लडवाल )

युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित कर रहे हैं उद्द्यान अधिकारी

युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित कर रहे हैं उद्द्यान अधिकारी

सूरज लडवाल
चम्पावत – जिला अन्तर्गत पाटी ब्लॉक के देवीधुरा उद्द्यान विभाग में कार्यरत उद्द्यान अधिकारी प्रदीप पचौली क्षेत्र के युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित कर रहे हैं । जहाँ एक ओर क्षेत्रीय लोग जंगली जानवरों से परेशान होकर कृषि से मुँह मोड़ते नजर आ रहे हैं तो दूसरी ओर प्रदीप पचौली आलू , अरबी , पिनालू , बैंगन , शिमला , टमाटर , फूलों की खेती व बागवानी कर रहे हैं । और सोसल मीडिया के माध्यम से जानकारी व फ़ोटो शेयर कर लोगों को खेती और बागवानी करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं । तमाम लोग पचौली की खेती के प्रति लगन की सराहना कर रहे हैं । औऱ क्षेत्र के तमाम लोग उनके मार्गदर्शन में खेती औऱ बागवानी भी करने लगे हैं । उद्द्यान अधिकारी से जानकारियां और मार्गदर्शन लेते हुए अनेक क्षेत्रीय लोगों ने कृषि औऱ बागवानी को अपनी आमदनी का जरिया बना लिया है । बताते चलें कि प्रदीप पचौली की जानकारियां साझा करने की इस आदत के चलते क्षेत्रीय लोग उनके ऑफिस जाकर उनसे जानकारी प्राप्त करने लगे हैं । कई बार तो उन्हें ऑफिस जाते समय किसानों को जानकारी देते हुए भी देखा गया है । बीच रास्ते में गाड़ी से उतरकर किसानों को जानकारी देने की यह आदत उनकी कार्यप्रणाली में चार चाँद लगाती है । बातचीत के दौरान प्रदीप पचौली ने कहा अगर हम खेती करेंगे तो खेती को जंगली जानवर खाएँगे ही । इसका मतलब ये नहीं कि गिरने के डर से चलना ही छोड़ दिया जाय । हाँ बस हमें अगली बार थोड़ा संभलकर चलने की आदत डालनी होगी । हाल ही में उनके द्वारा सोसल मीडिया में अरबी की खेती की फ़ोटो के साथ शेयर की गई पंक्तियाँ खूब सराही जा रही हैं । जिसमें उन्होंने खेती करने के साथ – साथ उसकी रखवाली पर भी जोर दिया गया है ।

घरै की लौकी घरै क आलू
घरै क आद ( अदरक ) और घर क पिनालू
के बानर खाल , के सुगर पचाल,
जी बचलो उ हमार काम आलो l
क़े न हुन क़े न हुन कै बैर
इन गड़ (खेत ) भीड़ि बठे ,
तरीके ले करला त बहुत कुछ है जालो
थोड़ तुम पौर (रखवाली ) करा
थोड़ भगवान सहयोग कराल l

इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने खेती की रखवाली और खेती से जुड़े रहने की बात कही है । जो आधुनिक पीढ़ी के लिए काफी प्रेरणादायी है । प्रवासी लोगों को उनने खेती और बागवानी के प्रति जागरूक करते हुए लाभप्रद योजनाओं व जानकारियों के लिए संपर्क करने की बात भी कही ।

राम अनन्त हैं—पार्टी का बनाकर नहीं देखा जाना चाहिये। वह सबके हैं।

गीता उप्रेती
अयोध्या में 5 अगस्त 2020 को राम मन्दिर भूमि पूजन के बाद से अभी तक वही चर्चा है। चर्चा हो भी क्यों ना, राम अनन्त हैं। हाँ, राम को किसी पार्टी का बनाकर नहीं देखा जाना चाहिये। राम सनातन धर्म की परम्परा हैं। वह सबके हैं। लेकिन भूमि पूजन के बाद जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं इसे चुनाव के रंग में रंगने का खेल शुरु होने लगा है। उत्तराखण्ड में 2022 में विधानसभा चुनाव भी होंगे, ऐसे में मन्दिर काज में अपने को अगुवा सिद्ध करने के लिये नेतागण जुटने लगे हैं। एक-दूसरे को खिजाना मर्यादा के विपरीत होगा। इसे चुनाव चर्चा बनाना भी ठीक नहीं। राम काम में जुटना भारतीय संस्कृति का प्रतीक हो सकता है लेकिन जिस प्रकार से ‘सड़क-ताण्डव’ होने लगे हैं वह रुक जाने चाहिये।
रामजन्म भूमि पूजन कार्यक्रम ऐतिहासिक रहा। प्रधानमंत्री मोदी और यूपी के मुख्य मंत्री आदित्य योगी के साथ यह पूरा आयोजन ऐसा संयोग है जो सदियों बाद बना, इसलिये भी लोग उमंगित हैं। आम जनता की उमंगों के बीच अच्छी बात है कि सभी पाटियों के लोगों ने भागीदारी की। सीध्ी सी बात है जब हम रामलीला, होली, दीपावली बड़े त्यौहार साथ-साथ करते हैं तो भारतवर्ष के इस बड़े आयोजन को भी मिलकर ही करना था। हाँ, संयोग से जो सत्ता में है वह अगुवाई करेगा। ऐसा ही हुआ भी। पूरा आयोजन भव्य हो गया लेकिन बात को उघाड़ कर अर्थ-अनर्थ करने वाले सक्रिय हैं। ऐसे में पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं को भी स्पष्ट शब्दों में कहना चाहिये कि इसे किसी धारा का नहीं बनाया जाए क्योंकि सारी धाराएं ‘राम’ के लिये ही हैं।
पूरे देश की तरह उत्तराखण्ड में भी लोगों ने भूमि पूजन के दिन खूब खुशियाँ मनाईं। दिनभर पाठ किये, भजन-कीर्तन हुए, झांकी निकाली, ध्वज वितरण किया, मिष्ठान बांटा, सायंकाल दीप जलाए और आतिशबाजी की। वैसे भी देवभूमि आस्था का केन्द्र है। भूमि पूजन कार्यक्रम को लेकर प्रमुख सन्त यहाँ से अयोध्या गये। मन्दिर निर्माण के लिये चाँदी की ईंटें भी भेजी गईं। पहाड़ से लेकर मैदान तक आम जनता का जश्न उनकी आस्था थी लेकिन राजनीति के कुचक्र में फंसे मर्यादा भूल न करें। अयोध्या आस्था के अलावा वोटों का मीटर भी रहा था। अयोध्या में मन्दिर के नाम पर सारी पार्टियाँ कूदती रही हैं और वर्तमान तो भाजपा का है। मन्दिर के इस काज में भी इस पार्टी को ही बढ़त मिली है। इसके बाद कांग्रेस ने यह बताया कि ताला खुलवाने से लेकर मन्दिर का रास्ता प्रशस्त करने में प्रधन मंत्री स्व. राजीव गांध्ी का योगदान रहा था। आस्था का उबाल देखते हुए सभी बड़े नेताओं ने राम नाम का जाप किया है।
एक बात और- भाजपा से घृणा करने वाले, मोदी से नफरत करने वाले, तथाकथित कामरेड, नास्तिक बनने का दिखावा करने वालों ने इस पूरे आयोजन के दौरान और आज तक भी चुप्पी कर ली। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि यदि कोई कुछ बोलता है तो उसे उत्पीड़ित किया जायेगा। जबकि सच्चाई यह है कि किसी न किसी रूप में सभी जुड़े हुए थे। जबकि शीतल हृदय लोगों ने बेबाक टिप्पणी कर विरोध् भी किया। विरोध् इस बात का कि राम को किसी एक का मत कहो। यही सत्य भी है कि राम अनन्त हैं, उनकी महिमा अनन्त है।

मोक्षदायिनी गंगा को है भगीरथ का इंतजार

डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट/प्रो. पुष्पा नेगी
हिमालय से निकलने वाली सदानीरा, पवित्र सलिला, नदियां सभ्यता, संस्कृति के साथ-साथ करोड़ों लोगों को जीवन देने की अनमोल शक्ति रखती है। गंगा और यमुना, सिंधु, सतलुज, काली, रामगंगा जैसी सदाबहार नदियों को हिमालय प्राणवायु देता है। हिमालय जब तक है, ये नदियां लोगों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जरूरतें पूरी करती रहेंगी। हिमालय की विशिष्ट संरचना से इन नदियों को उपयुक्त ढलान मिलने के कारण इनके पानी में आॅक्सीजन की मात्रा भी अधिक होती है। देश में अधिकांश पानी की आवश्यकता की आपूर्ति हिमालय से निकलने वाली नदियों से होती है। पेयजल कृषि के अलावा देश में पनबिजली के उत्पादन में हिमालय से प्राप्त होने वाले पानी का बड़ा महत्व है। पानी के अतिरिक्त हिमालय से बेशकीमती वनोपज भी मिलती है। भारत के अनेक विश्व प्रसिद्ध मनोरम पर्यटन स्थल इसकी गोद में बसे है। हिमालय व उसके आस-पास उगने वाले पेड़ों और वहां रहने वाले जीव-जन्तुओं की विविधता, जलवायु, वर्षा, ऊंचाई और मिट्टी के अनुसार बदलती रहती है। हिमालय का अब तक हमने अपनी आवश्यकता से अधिक दोहन किया है यदि यह गैर जरूरी और अवैज्ञानिक सिलसिला अब भी नहीं रूका तो इस मनोवृति से हिमालय को भारी नुकसान पहुंच सकता है। नौ राज्यों में फैले हिमालय का विस्तार देश की 17 प्रतिशत जमीन पर है जिसके 67 प्रतिशत भू-भाग में जंगल है। जल बैंक के नाम से प्रतिष्ठित हिमालय देश के 65 प्रतिशत लोगों की पानी की आपूर्ति करता है और यह उनकी रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण हिमालय को देश का मुकुट कहा गया है जो देश की सीमा का रक्षक है। हिमालय हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है, इसलिए लोकगीतों से लेकर राष्ट्रगान तक में इसे विशेष महत्व दिया गया है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संतुलन के सूत्र को दृष्टिगत रखते हुए पाषाण में भी देवत्व देखने का जो मंत्र दिया, उसके कारण देश में प्रकृति को समझने व उससे व्यवहार करने की परम्परायें जन्मी। वेदों में वर्णित नदी, सागर, सूर्य, चंद्र, जल और वायु हमारी आस्था के स्रोत रहे हैं। हमने तो वृक्षों से वरदान मांगना भी अपनी संस्कृति में समाहित कर लिया है। वृक्षों का समय-समय पर पूजन करके हम यश और कीर्ति के अनुगामी बनते है। अथर्ववेद में वृक्षों एवं वनों को संसार के समस्त सुखों का स्रोत कहा गया है। वन, वायु, जल, भूमि, आकाश हमारे लिए प्रकृति के अमूल्य उपहार हैं और मानव ने अपनी संस्कृति व सभ्यता का सर्वप्रथम विकास इन्हीं नदी-घाटियों के इर्द-गिर्द किया है। नदियां हमारे अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अमृत तुल्य जल देती हैं, इसलिए ये हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। वायु और जल पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए नितांत आवश्यक हैं इनके बिना जीवन की कल्पना भी नही की जा सकती है।
उत्तराखण्ड में विभिन्न निर्माण कार्य जैसे सड़क, बांध परियोजना, रेलवे लाइन के लिए भूवैज्ञानिक फाॅल्ट लाइन, वनों की कटाई, विस्फोटक के इस्तेमाल, भूस्खलन के जोखिम को नजरअंदाज किया जा रहा है। सैकड़ों पनबिजली परियोजनायें यहां निर्माणाधीन है और कुछ प्र्रस्तावित है, जिनके निर्माण ने पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव के साथ-साथ यहां आपदाओं को बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। श्रीनगर परियोजना का मलवा 2013 की आपदा में पूरे शहर में भर गया, जिससे हजारों घर मलवे में दब गये, आई0 टी0 आई0 आज भी उसकी गवाही दे रहा है। वर्षा का होना प्राकृतिक प्रक्रिया है, किन्तु नदियों के मुहानों पर अनियमित, असुरक्षित और अनियोजित बुनियादी ढांचे का विकास तो मानवजनित है जिसने इन आपदाओं को त्रासदी बनाने का काम किया है। देश में नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जाता रहा है जिसमें उत्तराखण्ड भी पीछे नही है। यही कारण है कि आपदाओं से जो क्षति होती है उससे स्पष्ट पता चलता है कि प्रकृति प्रलोभन को कभी भी स्वीकार नही करती। उत्तराखण्ड में राज्य प्रशासन द्वारा 15, 16 और 17 जून, 2013 को भारी बारिश की चेतावनी की अनदेखी का नुकसान तीर्थयात्रियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भी भुगतना पड़ा था।
वर्तमान में जो प्रकृति से हमें निशुल्क में मिल रहा है यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में उसको भी शुद्धिकरण करके लेना होगा। न हवा शुद्ध, न पानी शुद्ध पूरी प्रकृति ही प्रदूषित होती जा रही है। शहर तो पहले ही प्रदूषण की चपेट में आ चुके थे परन्तु गांव और पहाड़ भी इसकी जद से नही बच पाये हैं। प्रदूषण के कारण धीरे-धीरे जलीय जीव समाप्त होते जा रहे है जो प्रदूषको को निस्तारित करने में महत्पूर्ण योगदान देते हैं। प्रकृति के सफाई करने वाले जीव गिद्ध, चील-कौवे, सियार आदि संकटग्रस्त है जो अब दिखाई देने मुश्किल हो गये हैं। यदि वन धरती को शुद्ध एवं शीतल छाया, हवा प्रदान करते है तो वहां से निकलनी वाली सदावहार नदियां हमें शीतल और निर्मल जल देती है जो जीवन का आधार है यानि जल, थल, नभ हमारे लिए प्रकृति के अमूल्य उपहार है। आज मानव भौतिक रूप से जितना समृद्ध होता जा रहा है सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से उतना ही विपन्न हो रहा है।
अनादिकाल से ही गंगा जीवनदायिनी और मोक्ष दायिनी रही है, भारतीय संस्कृति, सभ्यता और अस्मिता की प्रतीक रही गंगा की अविरल और निर्मल सतत् धारा के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। गंगा को सम्पूर्णता में देखने और समझने की आवश्यकता है, क्योंकि वह केवल धरती की सतह पर ही नही है, वरन् सतत् तौर पर भूमिगत जल धाराओं, बादलों और वायुमण्डल में भी प्रवाहमान है। समुद्र तटीय क्षेत्रों के आसपास ताजे पानी की धाराओं के गठन और नदी का सागर में मिलन, फिर वाष्पीकरण द्वारा बादलों का निर्माण और भारतीय भूखण्ड में मानसून ये सब घटनायें एक दूसरे से अभिन्न तौर पर जुड़ी हैं। इन सब प्रक्रियाओं को समग्रता से समझना होगा। मनुष्य के हस्तक्षेप ने जाने-अनजाने, लोभ-लिप्सा के वशीभूत होकर कई तरीकों से इस पूरे चक्र को नष्ट और बाधित किया हैं, जिसे ईमानदारी से स्वीकारने और समझने की जरूरत है। सम्भवतः ईश्वर ने मनुष्य को सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते प्रकृति का संरक्षक नियुक्त किया, ताकि प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन हो सके। यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो सच्चाई यह है कि हम विपरीत दिशा यानि विध्वंस और विनाश की ओर जा रहें है।
आजादी के बाद आधुनिक विकास के नाम पर कल-कारखाने खुलने शुरू हुए। कस्बों व नगरों मे रहने वालों की संख्या बढ़ी और इसी अनुपात में कूड़ा-करकट व रासायनिक अपशिष्टों में भी बढोतरी हुई और यह सब गंदगी गंगा में समाहित होने से लगातार गंगा मैली होती चली गई। जबकि उसकी सफाई पर कोई विशेष ध्यान नही दिया गया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जिन्होंने खुद गंगा की महिमा पर लिखा था “हिमालय और गंगा का नाम आते ही आम भारतीय के मन में उसकी पवित्र और मनोहारी छवि उतर आती है”, परन्तु उनके प्रधानमंत्रित्व काल में भी गंगा कुछ कम प्रदूषित नही हुई। प्रधानमंत्री राजीव गाॅधी के कार्यकाल में गंगा एक्शन प्लान तथा डाॅ0 मनमोहनसिंह सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर इसकी सफाई के नाम पर अरबों रूपये खर्च तो किये, परन्तु गंगा स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त तो नही हुई परन्तु देश का अरबों रूपये खर्च अवश्य हो गया। भारतवर्ष में समाज, सभ्यता, संस्कृति और अकूत सम्पदा का निर्माण जल-जंगल-जमीन को विस्तार देकर ही हुई है और आज भी इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नही है। धार्मिक अंधविश्वास, स्नान व अस्थि विसर्जन नदियों के प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।
वनों का बेतहाशा विनाश किया जा रहा है वायु, जल प्रदूषण में व्यापक वृद्धि हुई है, भारी भूस्खलन एवं बाढ़ की समस्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। कृषि में कीटनाशकों के व्यापक प्रयोग ने प्राकृतिक संतुलन को अपार क्षति पहुंचाई है, अनेक कीट-पतंगों की प्रजातियां समाप्त हो गई हैं या हो रही है, जिनका प्राकृतिक रूप से परागण करने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। आज स्थिति इतनी विषम हो चुकी है कि परागण को कृत्रिम विधि द्वारा किया जाने लगा है। फूलों का रस चूसने वाले कीट-पतंगे खत्म हो जायेंगे तो परागण की समस्या उत्पन्न हो जायेगी जिससे प्राकृतिक रूप से जंगलों में नई पौधे उत्पन्न नही हो पायेंगी और वृक्षों की कमी के कारण मिटटी का बहाव बढ जायेगा। गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियाँ, जिनको भारतीय संस्कृति में मोक्ष एवं पापों के निवारणकर्ता के रूप में माना गया है और पुराणों में कहा गया है, ”गंगे तव दर्शनात मुक्तिः“। आज सामाजिक मूल्यों और जीवन शैली में इतना अभूतपूर्व परिवर्तन हो गया है कि राजा भागीरथ के पुरखों का कलुष धोने वाली गंगा, शहरों का मलमूत्र व फैक्ट्रियों का कचरा ढोते-ढोते इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि उसका पानी पीने योग्य तो दूर नहाने योग्य तक नहीं रहा। यही नही गंगा अपने उद्गम स्थल से ही प्रदूषित हो चुकी है और सारे उत्तरी भारत को सुख समृद्धि देने वाली गंगा-यमुना का उद्गम स्थल भोगवादी पर्यटन के कारण गंदगी एवं कूड़े कचडे के ढेर से प्रदूषित होकर विपन्नता व नाना प्रकार की बीमारियों की प्रतीक बन गई है। गंगा भारतीय संस्कृति एवं आस्था से जुड़ी हुई है जिसकी सफाई पर खरबों रुपये खर्च किये जाने के बाद भी गंगा जस की तस बनी हुई है।
एक तरफ हम नदियों को देवीस्वरूप मानते है तो दूसरी तरफ उन्हें रात-दिन कूड़े-करकट से भर रहे है। गंगा, गोमती, यमुना कोई भी नदी कितनी ही पूजनीय हो सब गंदगी से कराह रही है, इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। गंगा सफाई का अभियान तभी सफल होगा, जब इससे सीधे लोगों को जोड़ा जाएगा। इस अभियान को आंदोलन बनाना होगा। लोगो को यह बताना होगा कि गंगा मानव जीवन के लिए कितनी उपयोगी है कि इनका अस्तित्व में रहना हमारे लिए अपने अस्तित्व को बचाये रखने जैसा है। इस अभियान की सफलता के लिए सबसे पहला और प्रवाही कदम शहरी और औद्योगिक कचरे को गंगा में गिरने से रोकना होगा। इसके लिए उन प्रमुख शहरों में जो गंगा के किनारे बसे हैं उनसे निकलने वाले नालों के पानी के लिए जल संशोधन संयत्रों की स्थापना करनी होगी। कचरे का रूप परिवर्तित कर उसके उपयोग का विकल्प ढूढना होगा। जल संशोधन के जरिए गंदे पानी को साफ कर फिर उसे सम्बन्धित कम्पनियों के उपयोग लायक बनाना होगा, जिससे गंगा में गिरती रासायनिक गंदगी को रोका जा सके। प्रश्न यहां मात्र गंगा की स्वच्छता का नही बल्कि नदियों की स्वच्छता एवं संरक्षण का है जिससे गंगा एवं अन्य नदियां अविरल एवं अनवरत रूप से बहती रहे। जब तक सभी नदियां प्रदूषण मुक्त एवं संरक्षित नही होगी तब तक गंगा का स्वच्छ एवं संरक्षित होना असम्भव है, क्योंकि गंगा में मिलने वाली छोटी-बड़ी नदियां ही काफी हद तक गंगा को जीवीत रखे हुए है इसलिए यदि गंगा को बचाना है तो उनका संरक्षण, संवर्द्धन किया जाना नितांत आवश्यक है। आज खुद मोक्षदायिनी गंगा भगीरथ के इंतजार में है जो उसे इस गंदगी से मुक्ति दिला सके।
डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट-असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान
प्रो. पुष्पा नेगी प्राचार्य
अनुसुइया प्रसाद बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग

उत्तराखण्ड की संस्कृति को बढ़ा रहे हैैं शमशाद

पि.हि.प्रतिनिधि
पिथौरागढ़ के शमशाद अहमद पिछले बीस सालों से लखनउ में रहकर उत्तराखण्ड की सांस्कृति विरासत को बढ़ा रहे हैं। अपनी चित्रकारी के द्वारा पहाड़ की समृद्ध् संस्कृति को इस कलाकार ने देश के कौने-कौने तक पहंुचाया है। उनका उद्देश्य उत्तराखण्ड में पर्यटन के साथ पर्यटकों को आकर्षित करना है।
शमशाद की पेन्टिंग में ऐपण, छोलिया, कंडाली, वाद्ययन्त्र, आभूषण, हिमालय, परिधान, तीज-त्यौहारों का आकर्षण है। अपने तैलचित्रों में शमशाद बहुत बारीकी से पहाड़ की संस्कृति के दर्शन कराते हैं। देश की जानी-मानी हस्तियों को वह अपने हाथों आकर्षक पेन्टिंग भेंट करते रहे हैं। उनका सन्देश है कि पलायन करने के बजाय अपने गांव से ही अपने हुनर की शुरुआत की जानी चाहिये। आज बहुत से साधन और सहुलितें हैं। साथ ही इनकी परख करने वाले भी।
बचपन से ही पेन्टिंग में रमने वाले शमशाद का 1983 में गोपेश्वर में जन्म हुआ एक वर्ष आयु से पिथौरागढ़ में रहना हुआ। 12 साल तक ठेठ पर्वतीय संस्कृति में रमने के दौरान इनका मन चित्रकारी और संगीत ओर गया। वह बताते हैं कि 1995 में छोलिया नर्तकों की बड़ी पेन्टिंग उन्होंने बनाई जो कापफी चर्चित रही। स्थानीय अखबारों ने उसे प्रमुखता से प्रकाशित कर दिया। बचपन था और मिल रहे सन्देशों से हौंसला बढ़ने लगा। उस समय स्व.गोपाल बाबू गोस्वामी का एक गाना रेडियो में सुना- ‘‘दिन आने जाने रयां, रितु रिमि फरी रया। हम गोबरी कीड़ा जस गोबरी में रया।’’ यह गीत अन्दर तक प्रभावित कर गया कि हमें गोबरी कीड़ा बन कर नहीं रहना है। अपनी जन्मभूमि के लिये कुछ करना है। 1997 में पर्वतीय कला केन्द्र द्वारा छलिया महोत्सव का आयोजन किया गया, इसकी पेंटिंग का कार्य मुझे मिला। हेमराज बिष्ट जी ने सन् 1998 और 1999 में भी मौका दिया। इससे पिथौरागढ़ ने मुझे नई पहचान दी। तभी से मैं एक लाइन लिखने लगा- ‘‘आपण संस्कृति बढ़ा, आपण पच्छाण बना।’’ दुःख इस बात का नहीं था कि पहाड़ छूट रहा, खुशी इस बात की थी कि ये संस्कृति अब बड़े स्तर से उत्तर प्रदेश में शुरु करूंगा। बस तभी से 1995 से शुरु किया उत्तराखण्डी संस्कृति पर कार्य जारी है। मैं उत्तराखण्डी पुराने दौर की पेन्टिंग से युवा पीढ़ी को सन्देश देता हूं कि कहीं भी रहो इसे बढ़ाओ फैलाओ यही हमारी धरोहर है, पहचान है।
मैं पेन्टिंग में रंगवाली-पिछौड़ी पुराने दौर के ही बनाता हूं जब गांव में शुभ कार्य से पहले हाथ से बनती थी। कुदरती रंगाों जैसे पीलेे हल्दी के पानी में रंगी जाती और बाद में गोल हाथ से लाल व मेहरून टिप्पे गोल निशान चवन्नी या अंगूठे से बनाई जाती थी। उस वक्त पिछौड़ी में लचका गोटा या चमकने वाली किनर का इस्तेमाल नहीं होता था। किनारे में हल्की सी बेल व बीच-बीच में स्वास्तिक के निशान व उं लिखा होता, जिसे शुभ माना जाता, वही मेरी सभी पेन्टिंग में दिखेगा। उस वक्त गले का गलोबन्द शनील व वेलवेट के कपड़े पर हाथ से गुंथा हुआ सुनार बनाता था जो अब आध्ुनिक दौर में स्वरूप ही बदल गया है।
पूरी तरह पहाड़ की संस्कृति में रमे शमशाद ने पेन्टिंग की कहीं विधिवत शिक्षा नहीं ली लेकिन जो हुनर उनमें हैं और जो तहजीव उनमें है वह वाकेई प्रेरित करने वाली है।

चीन की बदमाशी और नेपाल के दावे के बाद उठे कदम

कार्यालय प्रतिनिधि
उत्तराखण्ड से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर चाौकसी बढ़ा दी गई है। चीन की बदमाशी और नेपाल के दावे के बाद भारत की ओर से सीमा पर सख्ती की गई है। चीन तो भरोसे लायक कतई नहीं है इसे पूरी दुनिया जानती है लेकिन नेपाल के साथ भारत के रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। ऐसे में सीमा पर रहने वालों को नेपाल के कदम से असहजता बनी हुई है। नेपाल की नेशनल असेम्बली ने देश के राजनीतिक एवं प्रशासनिक नक्शे में भारत के तीन क्षेत्रों को शामिल करने के लिये संविधन संशोध्न विधेयक को पारित किया है। लिपुलेख, कालापानी और लिपिंयाध्ुरा इलाकों पर भी वह दावा कर रह रहा है। भारत और नेपाल के बीच उस समय तनाव पैदा हो गया था जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने आठ मई को प्रदेश में लिपुलेख दर्रे को धरचूला से जोड़ने वाली रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 80 किमी लम्बी सड़क का उद्घाटन किया था। नेपाल इस सड़क के उद्घाटन के समय से क्षेत्रा पर अपना दावा कर रहा है जबकि भारत ने स्पष्ट किया है कि यह सड़क पूरी तरह उसके अपने भू-भाग पर स्थित है।
चीन की हरकत के बाद सीमा पर भारतीय जवान सक्रिय हैं। वहीं नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्रा को अपना बताकर नक्शा जारी करने के बाद से सीमा पर गश्त बढ़ा दी गई है। झूलाघाट, जौलजीवी, धारचूला, बनबसा सहित सारे रास्तों पर एसएसबी के जवान चप्पे-चप्पे पर हैं। अन्तर्राष्ट्रीय झूला पुलों की निगरानी के साथ ही महाकाली नदी के किनारे बल बढ़ाया है। नेपाल की कार्रवाई से बुद्धिजीवियों ने नाराजी जताई है। रोटी-बेटी का सम्बन्ध् होने के बावजूद इस प्रकार की फितरत नेपाल में कैसे पनपी इसके पीछे चीन की साजिश की बू को माना जा रहा है। नेपाल के फैसले से सीमा क्षेत्र के लोगों में रोष है क्योंकि नेपाल से हजारों लोगों की रोटी भारत में ही है। साथ ही आम जनता हर प्रकार के दुःख-दर्द में एक-दूसरे के साथ सहभागी हैं। शादी-विवाह, पूजा-पाठ से लेकर रश्मों को साथ-साथ निभाया जाता है। पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखण्ड एवं मुख्य केन्द्रीय संरक्षक नृपसिंह नपलच्याल ने नेपाल की एकतरफा कार्रवाई को अचरज भरा बताते हुए कहा कि दोनों राष्ट्रों को मैत्राीपूर्ण वातावरण में वार्ता से विवाद का समाधान निकालना चाहिये। श्री नपलच्याल ने सीमान्त के सभी भारतीय व नेपाली बन्ध्ुओं से अपील की कि वह भड़काउ बयाजबानी न करें।
पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी पर चीन के सम्प्रभुता के दाबे को भारत ने पूरी तरह खारिज किया है और चीन की हरकतों को देखते हुए सीमाओं पर हाईअलर्ट किया है। अकड़ में रहने वाले चीन ने भारत के रुख और उसके उत्पादों के बहिष्कार की बात सुनकर बातचीत में सकारात्मकता दिखाई है। लेकिन वह धोखेबाज के रूप में है। ऐसे में उत्तराखण्ड की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर भी कड़े इन्तजाम कर दिये गये हैं। उल्लेखनीय है कि सन् 1962 मंे चीन द्वारा छल किया गया था। उस युद्ध में उसकी हड़प नीति सबने समझ ली थी। तिब्बत को पूरी तरह अपने कब्जे में करने वाले चीन के कारण तिब्बतियों को परेशान होना पड़ा है। उत्तराखण्ड की सीमान्त घाटियों के व्यापारियों का पूरा कारोबार तिब्बत पर केन्द्रित था और तिब्बती व्यापारियों के साथ उनकी अच्छी मित्रता रही है। चीन की हरकत के बाद तिब्बत व्यापार बन्द हो गया और सीमान्तवासियों के कारोबार भी बदले, पलायन हुआ। तिब्बत से बड़ी संख्या में लोग भारत आ गये।

उत्तराखण्ड में लोकरंग पर आधारित पर्यटन

धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक तहजीब से आकर्षित हो सकेंगे पर्यटक
डाॅ.पंकज उप्रेती
देवभूमि उत्तराखण्ड का धार्मिक पर्यटन यहाँ की आजीविका का बड़ा आधार है, इसमें यदि सांस्कृतिक तहजीब को जोड़ दिया जाए तो पर्यटन का यह ग्राफ ऊँचाईयों को छू सकता है। इस दिशा में कुछ प्रयोग होने भी लगे हैं। विश्व के पर्यटन स्थलों की पहचान वहाँ के लोकरंगों से होती है। लोक का यह रंग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ होता है। उत्तराखण्ड के पर्यटन में भी ऐसा है परन्तु इस दिशा में अभी काफी कार्य होना है।
      उत्तराखण्ड में पर्यटन के लिये सुरम्भ वादियाँ तो हैं ही, आध्यात्म-योग-संगीत जैसे विषयों को लेकर पहले से यहाँ आवत रही है। ऋषि-मुनियों द्वारा साधना के लिये हिमालय को सबसे प्रिय माना गया है। मध्य हिमालय के पहाड़ इनके पड़ाव रहे हैं और कैलास-मानसरोवर जैसी यात्राएं इनके जीवन का हिस्सा रही हैं। चारधाम यात्रा, पूर्णागिरी दर्शन, महाकाली-पातालभुवनेश्वर में उपस्थिति हो या जागनाथ-बागनाथ को पूजना हो………..देश-दुनिया के लोगों ने स्वीकारा है। ऐसे में क्यांे न सुविधाओं के साथ इन यात्राओं को सरल बना दिया जाए और सुविधाएं जुटाकर पर्यटन को बढ़ावा दें। धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक तहजीब की जुगलबन्दी से उत्तराखण्ड बहुत विकसित हो सकता है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम और गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने होम-स्टे योजना से इस दिशा में एक कदम बढ़ाया है। इस योजना के तहत पलायन से खाली हो चुके गाँवों को पर्यटकों के लिहाज से तैयार किया जा रहा है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम ने कैलास-मानसरोवर यात्रियों को ठहराने के लिये इस प्रकार की तैयारी की, जिसके सुखद परिणाम भी दिखाई दिये हैं। सीमान्त क्षेत्र के खाली हो चुके ग्रामों में लोगों ने अपने पैतृक मकानों को सुधार कर यात्रियों के लिये तैयार किया। इस प्रकार उनकी आमदनी भी बढ़ सकती है। रोजगार होने से एक ओर भागने वाली भीड़ में नियंत्रण लगेगा और खाली होते गाँवों का विकास होगा। होम स्टे की यह योजना मानसरोवर रूट के अतिरिक्त अन्य यात्रा पथों पर भी संचालित की जा सकती है। इससे यात्रियों को नई जानकारियां भी मिलेंगी। इस बीच उत्तराखण्ड सरकार ने धर्मिक तीर्थयात्रा को बढ़ावा देने के लिये ध्यान केन्द्रित किया है। इसके लिये पैदल मार्गों की यात्रा को जीवन्त किया जायेगा। सरकार ने पूर्व के पैदल मार्गों को खोजने का निर्णय लिया है, इससे साहसिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। इस खोज के लिये ग्यारह सदस्यीय दल ने सर्वे किया। उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद द्वारा नेहरू पर्वतारोहण संस्था, उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष केन्द्र तथा वन विभाग के सहयोग से चारधम पैदल मार्ग को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से ग्यारह सदस्यीय दल को एक माह के सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण का उद्देश्य पैदल यात्रा मार्ग के स्थानीय पड़ावों और चट्टियों को पुनर्जीवित करना है। ताकि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सके। साथ ही वहाँ की जैव विविध्ता सम्पदा एवं संस्कृति का अभिलेखीकरण भी किया जाएगा। चारधम यात्रा को पैदल मार्ग के रूप में विकसित किये जाने से तीर्थयात्रियों की संख्या में वृद्धि भी होगी। इसके लिये मार्ग मंे हर प्रकार से जरूरी सुविधएं भी सरकार उपलब्ध् कराएगी। इसके लिये इन पैदल मार्गों का प्रचार प्रसार भी किया जायेगा।
    पिघलता हिमालय की रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘सर्वेक्षण दल देहरादून से स्याना चट्टी होते हुए पैदल मार्ग से गया इसके बाद जानकी चट्टी, दरवा पास, डोडीताल, संगमचट्टी और गंगोत्री तक सर्वे किया। इसके बाद दल ने लाटा, बेलक, बूढ़ाकेदार, भैरों चट्टी, घुत्तू पंवाली कांठा, त्रियुगीनारायण और गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ जायेगा। यहाँ से श्वेत पर्वत, कलउफं, मन्दानिया, द्वाराखाल, मार्डंग गंगा, काश्नी खर्क, ग्लेशियर कैम्प होते हुए नीलकंठ बेस से बद्रीनाथ पहँुचा। दल में एनआईएम के प्रधनाचार्य कर्नल बिष्ट के अतिरिक्त वन विभाग के चार प्रशिक्षक, एसडीआरएफ तथा एक भू वैज्ञानिक शामिल थे।’ इसी प्रकार अन्य पैदल मार्गों की खोज कर उन्हें विकसित किया जाए तो रोजगार के नये अवसर बढ़ेेंगे। यह चुनौतीपूर्ण कार्य है परन्तु सरकार और हम सबने मिलकर इसे साकार करना चाहिये।
 
      होम-स्टे के साथ ही उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक ढांचे को भी पूरी तहत इससे जोड़ दिया जाना चाहिये। अभी तक संस्कृति के नाम पर छोलिया नर्तकों के साथ यात्रियों को नचा देना और रंगवाली-पिछौड़ा पहनी महिलाओं द्वारा स्वागत करवा देना संस्कृति मान लिया गया है। इससे संस्कृति की मौलिकता नहीं रह जाती। सांस्कृतिक पर्यटन के पूरे स्वरूप में हमारा संगीत, हमारी कला, हमारा रहन-सहन, खानपान सभी है, जो पर्यटकों को लुभायेगा। सीधी सी बात है कि मेहमानों का स्वागत सड़क में नाचकर करने के बजाय घर बुलाकर किया जाए। रंगोली-पिछौड़ा हमारे धार्मिक अनुष्ठानों में पहना जाता है। इसका प्रदर्शन हर मौके पर शोभा नहीं देता है। आजकल तमाम नृत्यगीतों से लेकर सड़कों पर निकलने वाले जुलूस में इसे पहन कर पर्वतीय संस्कृति का उत्थान मान लिया गया है। इसी प्रकार पहाड़ के अन्य समुदायों द्वारा भी उनके जो परम्परागत वस्त्राभूषण हैं, उनकी शोभा स्थान विशेष पर दिखाई देती है। मिलावट के इस दौर में जिस प्रकार का प्रस्तुतिकरण किया जाने लगा है वह हमें हमारी संस्कृति से बहुत दूर कर देगा, इसलिये जागरुकता जरूरी है। लोक की इन तमाम परम्पराओं से अनभिज्ञ लोग निर्माता-निर्देशक बनकर फिल्म रूप में भी समाज के सामने अजीबोगरीब परोस रहे हैं। जिसका प्रभाव नई पीढ़ी में होने लगा है। नई पीढ़ी जो कुछ देख रही है, उसे  अपनी संस्कृति मानकर उसी रंग में ढल रही है।

केशवदत्त अवस्थी अग्रणीय शिक्षकों में रहे हैं



अस्कोट राजा के दीवान परिवार से सम्बन्ध्
स्व. केशवदत्त अवस्थी अस्कोट गर्खा के उन बुद्धिजीवियों में रहे हैं जिन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिये अपने को समर्पित किया। इनका सम्बन्ध् अस्कोट राजा के दीवान अवस्थी परिवार से है। इनके पिता मोतीराम अवस्थी राजा के दीवान थे। इसी परम्परा में इनके बड़े भाई भी पदवी संभाले हुए रहे। केशवदत्त बचपन से ही बिलक्षण प्रतिभा के थे और शिक्षा में विशेष रुचि के कारण इन्हें उसी प्रकार की सुविधा दी गई।
   केशवदत्त जी का जन्म अस्कोट गर्खा इलाके के नरेत ग्राम में सन् 1902 को हुआ था। इनके पिता स्व. मोतीराम अवस्थी व माता स्व. श्रीमती हंसा अवस्थी थे। बाल्यकाल से ही प्रखर बुद्धि के केशव ने मिडिल की परीक्षा जूनियर हाईस्कूल बजेटी में प्राप्त की। हाईस्कूल व इण्टर की परीक्षा रैमजे इण्टर कालेज अल्मोड़ा से पूर्ण की। स्नाकत की पढ़ाई 1927 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। पढ़ाई के साथ-साथ बेहतर खिलाड़ी केशवदत्त जी मेरठ यूनिवर्सिटी की फुटबाल टीम का नेतृत्व किया। इनके बड़े भाई हरिबल्लभ अवस्थी अस्कोट राजा के दीवान थे।

   केशवदत्त अवस्थी ने स्नातक उत्तीर्ण करने के बार काशीपुर के एक विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक नियुक्त हो गये। एक वर्ष बाद इनका स्थानान्तरण लोहाली ;नैनीताल में हो गया। उसके बाद भाॅतड़ ;थल, दशाईथल में रहे। गंगोलीहाट के जाह्नदेवी नौले के पास इन्होंने संस्कृत पाठशाला की स्थापना की। बाद में गर्खा जनता कालेज के प्रथम प्रधानाध्यापक बने। अवस्थी जी गणित, अंग्रेजी, संस्कृत, इतिहास, उर्दू के प्रकाण्ड विद्वान थे।
    इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इनके इतिहास के गुरु सी.आर.गोरखपुरी व ईश्वरी प्रसाद थे। एक बार नारायण नगर ;डीडीहाट में नारायण स्वामी ने इन्हें अपने विद्यालय में आने का प्रस्ताव किया लेकिन स्वतंत्रात प्रकृति के केशवदत्त जी ने जाने से मना कर दिया। सन् 1942 में  अंग्रेज पता लगाते हुए इनके ग्राम नरेत पहँुचे और पूछा- यहाँ कौन व्यक्ति ग्रेजुएट करके आया है। जानकारी मिलने पर कि केशवदत्त ग्रेजुएट हैं उन्हें प्रस्ताव दिया गया कि अंग्रेजी सेना में सीध्े लेफ्रिटनेंट बनाया जायेगा लेकिन अवस्थी जी ने अंग्रेजों के साथ जाने से मना कर दिया। उन्होंने आजीवन शिक्षण कार्य को ही अपनाया।
    सेवानिवृत्ति के बाद नेपाल सरकार ने उन्हें अपने बुलावा भेजा और वह दो वर्ष नेपाल के थाराकोट में प्रधानाध्यापक रहे। इनके प्रमुख शिष्यों में मोती लाल चैधरी, वंशीलाल विश्वकर्मा, फकीर दत्त ओझा, महिपाल सिंह भैसोड़ा, कृपाल सिंह भैसोड़ा, भुवनचन्द्र गुणवन्त आदि रहे। इनके दो पुत्र थे। बड़े पुत्र स्व. गोविन्द बल्लभ अवस्थी एमईएस पिथौरागढ़ में एसडीओ के पद पर रहे तथा छोटे पुत्र जगदीश चन्द्र अवस्थी काॅपरेटिव बैंक से सेवानिवृत्त हो गए हैं। अवस्थी जी का का 13 जून 1979 को अपने पैतृक निवास नरेत में निधन हुआ। इनके तीन पौते हैं- सी.एम.अवस्थी डहरिया हल्द्वानी, प्रदीप अवस्थी विवेकानन्द इण्टर कालेज पिथौरागढ़, दिनेश अवस्थी मीडिया से जुड़े हैं। स्व.अवस्थी के भतीजे ध्रणीध्र जी लखनउ विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान विभाग में रीडर थे और छोटे भाई आनन्दमोहन नाॅर्थ जोन देहरादून ओएनजीसी में जनरल मैनेजर से सेवानिवृत्त हुए।
    इस प्रकार हम देखते हैं कि अवस्थी परिवार की शाखाएं तमाम जगह फैल चुकी हैं लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े भाई बन्ध्ु परम्पराओं को बरकरार रखे हुए हैं

यौगिक क्रियाओं से कोरोना का बचाव

डाॅ.दीपिका जोशी
कोरोना वायरस कई प्रकार के विषाणुओं का एक समूह है जो स्तनधरियों और पक्षियों में रोग उत्पन्न करता है। यह आर.एन.ए. वायरस होता हैं। इनके कारण मानव में श्वसन तंत्रा संक्रमण पैदा हो सकता है। जिसकी गहनता हल्की सर्दी जुकाम से लेकर अति गम्भरी जैसे मृत्यु तक हो सकती है। गाय और सुअर में इनके कारण अतिसार हो सकता है जबकि इनके कारण मुर्गियों में श्वास तंत्र के रोग उत्पन्न हो सकते हैं। इनकी रोकथाम के लिये कोई टीका ;वैक्सीन या विषाणुरोध्ी अभी उपलब्ध् नहीं है और उपचार के लिए प्राणी की प्रतिरक्षा प्रणाली निर्भर करती है। अभी तक रोग लक्षणों का उपाचार किया जा रहा है ताकि संक्रमण से लड़ते हुए शरीर की शक्ति बनी रहे। अभी तक इस वायरस से विश्व में दस लाख 26 हजार से ज्यादा व्यक्ति प्रभावित हुए हैं तथा 54 हजार से अधिक मृत्यु हो चुकी हैं। जिसमें भारत में 2567 लोग प्रभावित हैं तथा 70 ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। योग तथा आयुर्वेद के ज्ञान के कारण विकसित देशों की तुलना में भारत की मृत्यु दर तथा कोरोना का प्रभाव कम है।
योग भारत में प्रचलित एक आध्यात्मिक प्रक्रिया को कहते हैं, जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम होता है। पहली बार 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष 22 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी है।
योग चिकित्सा एक प्राचीन पद्धति है। यह सरल और सर्वसुलभी है। वर्तमान समय में कोई भी योग से अनभिज्ञ नहीं है। इससे हम स्वयं और अपने परिवार की चिकित्सा कर सकते हैं। इसमें मन व शरीर भी स्वस्थ्य होता है। योग चिकित्सामें अनुशासन का पालन किया जाता है जिससे मनुष्य में अनुशासन व संयम का विकास होता है।
आध्ुनिक चिकित्सा दमनकारी दिकित्सा है जो शरीर में उभरने वाले विकारों को दबाती है। जबकि योग चिकित्सा रोग के लक्षणों को ही नहीं बल्कि रोग का ही समूल नाश करती है। वर्तमान में हम सभी कोरोना कोविड-19 जैसी महामारी से जूझ रहे हैं। इससे बचाव के लिए कुछ यौगिक क्रियाएं उपयोगी हैं। यौगिक क्रियाओं से हमारी रोग प्रतिरोध्क क्षमता बढ़ती है। साथ ही वायरस से बचने के लिए हमें अपने श्वसन तंत्रा को भी मजबूत व स्वस्थ्य बनान होगा। वर्तमान परिस्थिति में व्यक्ति को साधरण फ्रलू ;जुकाम, खांसी आदिद्ध में दवा खाने व अस्पताल जाने से बचना चाहिये ओर अपनी दिनचर्या में यौगिक क्रियाओं को शामिल करके स्वयं व अपने परिवार की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना चाहिये।
हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका के लए प्राणवायु आवश्यक है। श्वसन क्रिया दो पूर्णतः भिन्न-भिन्न क्रियाओं श्वास और प्रश्वास का सम्मिलित रूप है। जिस क्रिया के द्वारा श्वसन को अन्दर लिया जाता है उसे श्वास करते हैं और जिस क्रिया से त्याज्य गैसों को बाहर निकाला जाता है उसे प्रश्वास कहा जाता है।
कोरोना से बचाव के लिये मुख्य यौगिक क्रियाएं-
क. आसन- 1. सूर्य नमस्कार , 2. भुजंगासन, 3. उष्ट्राासन, 4. सर्पासन, 5. धनुरासन, 6. मार्जरी आसन, 7. शशांकासन, 8. गोमुखासन, 9. कमरासन।
ख. प्राणायाम- 1. सूर्यभेदी, 2. भस्त्रिाका, 3. नाड़ी शोध्न, 4. भ्रामरी, 5. उज्जायी।
ग. बन्ध्- 1. जालन्ध्र बन्ध्
च. मुद्रा- 1. खेचरी मुद्रा, 2. हृदय मुद्रा, 3. तड़ागी मुद्रा
छ. षटकर्म- 1. नेति, 2. वमन
ज. हवन
झ. ध्यान- उ स्तवन, गायत्राी मंत्र व महामृत्युंजय मंत्रा उच्चारण
प्राकृतिक चिकित्सा- प्रातःकाल ध्ूप का सेवन अति आवश्यक है। गुनगुने पानी का ही सेवन करें। सप्ताह में एक दिन पूरे शरीर की गीली लपट व भाप स्नान, पीठ व पैरों की सिकाई करनी चाहिये। लाल रंग के तेल से पीठ व छाती की मालिश करें व फेशियल स्टीम प्रतिदिन लें। कटि स्नान, पाद स्नान एवं एनिमा लें। छाती पर सरसों के तेल की मालिश करनी चाहिये।