COVID-19 खतरे में न डालें किसी को

कोरोना वायरस से पूरी दुनिया खतरे में है। मानव जाति पर तेजी से फैल रहे इस संक्रमण का सबसे ज्यादा प्रभाव अमेरिका में हो चुका है। स्पेन, प्फांस, इंग्लैण्ड, जर्मन सहित तमाम देशों में सुविधाएं होने के बावजूद कोरोना का कहर बढ़ता जा रहा है। चीन को तो पूरे विश्व में संदिग्ध् देश के रूप में देखा जाने लगा है क्यांेकि यहीं से कोरोना की शुरुआत हुई थी। इसके अलावा पाकिस्तान जैसे आतंक को पनाह देने वाले देश में भी कोरोना का असर है परन्तु वहाँ के प्रधानमंत्री इमरान खान का अड़ियल रुख आम जन के हित को नहीं नहीं देख रहा है। अपने देश की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार व प्रशासन मुस्तैद है लेकिन कतिपय लोगों को लापरवाही के कारण सख्ती करनी पड़ रही है।
यदि इसी प्रकार सभी देशों की स्थितियों पर विचार करने लगें तो कुछ न कुछ वाद-विवाद मिल जायेंगे लेकिन यह समय वाद-विवाद को छोड़ एक ऐसे वायरस से लड़ने का है जो मानव समाज के लिये मौत बनकर फैल रहा है। इस दिशा में दुनिया के देशों ने एक-दूसरे की मदद भी की है और अपने अपने देशों में जूझ रहे हैं। हालात जब इतने खतरनाक हैं तो प्रत्येक आम नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वह अपनी सरकार को ही न ताके बल्कि बचाव के लिये उपाय करे। भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश व दुनिया के गरीब देशों के सामने समस्या बहुत विकट है क्योंकि स्थिति से निपटने के लिये लाॅकडाउन में गरीबों को परेशानी उठानी पड़ रही है। हमारे आस-पास ही लाॅकडाउन में पुलिस द्वारा की जा रही निगरानी, फैक्ट्रियों के बन्द होने, यातायात के थम जाने, कफ्रर्यू की स्थिति में मजदूरों/श्रमिकों को भूखा मरने की नौबत आ गई है। ऐसे में कुछ लोगों ने इनकी सहायता के लिये हाथ भी बढ़ाकर पुण्य किया है।
किसी भी सरकार या प्रशासन की नीयत अपनी जनता को परेशान करने की नहीं है लेकिन कोरोना के फैलते संक्रमण को रोकने के लिये सख्ती करनी मजबूरी है। यह संक्रमण जितनी तेजी से फैल रहा है उसमें यदि थोड़ा भी चूक होती है तो मौतों की बारात बन जायेगी। इस भयानक स्थिति को रोकने के लिये ही शासन-प्रशासन को न चाह कर भी सख्त होना पड़ रहा है। इसलिये हम सभी का कर्तव्य होता है कि किसी को खतरे में न डालें। अपने और अपने परिवार, अपने मित्रों, अपने पड़ौस, अपने गाँव, अपने जिले, अपने प्रदेश, अपने देश को मौत के मुंह से बचाने में सहयोगी बनें।
कार्यालय प्रतिनिधि
कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव ही इस समय सबकी प्राथमिकमता है। इसे लेकर किसी भी तरह की लापरवाही मौत है। इस संक्रमण ने पूरी दुनिया को वर्षों पीछे धकेलते हुए सोचने पर मजबूर कर दिया है कि प्रकृति का सच क्या है। विश्व के कई देशों की तरह भारत में भी लाॅकडाउन के बाद सन्नाटा और अपनों के बीच रहने की होड़, भूख की लड़ाई, भय बना हुआ है। खतरनाक हालातों में घिरा मजदूर वर्ग और शहरों में जैसे-तैसे दिन गुजार रहे लोग अपने गाँव-घर जाने के लिये परेशान हैं। विदेशों से भी कई भारतीयों को सरकार स्वदेश ला चुकी है।
कोरोना वायरस से पूरी दुनिया घिरी है। चीन से शुरु हुए इस रोग ने दुनिया के देशों को अपने चपेट में ले रखा है। इससे सबसे ज्यादा मौतें इटली में हुई हैं। दुनियाभर के डाक्टर, वैज्ञानिक करोना से बचाव के लिये खोज में जुटे हैं और टीके बनाने की तैयारी की जा रही है जो इससे बचाव करे। लेकिन यदि ऐसा टीका बन भी जाता है तो सालभर का समय तो लग ही जायेगा। ऐसे में प्रत्येक आम जन की सूझबूझ व समझदारी ही समाज को बचा सकती है। भारत में भी इस महामारी से बचाव के लिये कदम उठाये गये हैं। सरकार की अपील के बाद भी लापरवाह बने लोगों को सख्ती के साथ रोका गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद 25 मार्च से देश को लाॅकडाउन कर दिया गया। इससे पहले पहले जनता कफ्रर्यू पिफर अघोषित कफ्रर्यू लगाया गया। छूट पर लापरवाही करने वालों के कारण राज्यों में सख्ती के साथ कफ्रर्यू लगाया गया ताकि कोरोना जैसी घातक महामारी को रोका जा सके। आश्चर्य हो रहा है कि जब दुनियाभर में इस महामारी से हाहाकार मच चुका है, हमारे यहाँ कुछ लोग अड़ियलपना करते रहे। अपने घर से बाहर निकलने को बेताब ऐसे लोगों को पुलिस के डण्डे से हटाया गया। इसके अलावा सोशल मीडिया पर हँसी-मजाक, गीत-संगीत के अलावा सरकार के कदमों पर नुख्ता निकालने वाले शुरुआत में नहीं मान रहे थे लेकिन कोरोना के कहर से सब जान चुके हैं कि यदि किसी भी प्रकार की लापरवाही हुई तो मोहल्ले के मोहल्ले मरघट बन जायेंगे। इसी खतरे को देखते हुए दिल्ली सहित पूरे देश के मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च में सामुहिक प्रार्थना-पूठा-अजान जैसे कार्यक्रम स्थगित कर तय हुआ कि अपने घरों पर ही रहकर पूठा-पाठ करें। संकट की इस घड़ी में लाॅकडाउन से किसी भी कर्मचारी का वेतन न काटने का निर्देश प्रधानमंत्री ने दिया है और अपील की कि लोग अपने परिवार को घर पर ही रहकर खतरे से बचाएं।
कोरोना के संक्रमण का प्रकोप रोकने के लिये भारत सरकार और प्रदेश की सरकारें जुटी हुई हैं। पुलिस, प्रशाासन, बैंक की ड्यूटी के अलावा चिकित्सक और स्वच्छकों द्वारा किये जा रहे कार्यों की जितनी सराहना की जाए कम है। खतरे में रहकर इन लोगों द्वारा जो सेवा की जा रही है वह इस लड़ाई के असल हीरो हैं। कुछ समाजसेवियों द्वारा भी असहाय व परेशान लोगों की सेवा के लिये हाथ बढ़ाया गया है।
कोरोना संक्रमण की भयावह स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस विषय पर दूसरी बार देश को सम्बोधित करते हुए जब 21 दिन के लाॅकडाउन की घोषणा की, उनकी बातों में देश व दुनिया को बचाने का दर्द था। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान के हर नागरिक को बचाने के लिए घरों से बाहर निकलने पर बापंदी लगाई जायेगी। ये एक तरह से कफ्रर्यू ही है। लाॅकडाउन की कीमत देश को उठानी पड़ेगी। लेकिन आपके परिवार को बचाना, आपके जीवन को बचाना, इस समय मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इस समय देश में जो जहाँ हैं, वहीं रहें। अभी 21 दिन का लाॅकडाउन है। अगर ये 21 दिन नहीं संभले तो हमारा देश 21 वर्ष पीछे चला जायेगा। प्रधानमंत्री के सम्बोधन का जबर्दस्त प्रभाव हुआ और सभी लोग लाॅक डाउन के लिये तैयार हो गए। कोरोना की महामारी को रोकने के लिये यही एक तरीका है कि इस वायरस की चैन को तोड़ा जाए ताकि यह न फैले। केन्द्र द्वारा कोरोना वायरस के कहर से निपटने के लिये 15,000 करोड़ रुपए के फंड का प्रावधान किया है। वर्तमान संकट को देखते हुए बड़े पिफल्मी कलाकारों, उद्योगपतियों, समाजसेवियों ने अपनी तिजोरी खोल दी। इसमें स्वामी रामदेव ने 800 करोड़ देने की घोषणा के साथ सन्देश दिया। फिल्मी कलाकार अक्षय कुमार ने 25 करोड़ रुपये, क्रिकेटर सचिन तंदेलुकर ने 50 लाख दिये। अजीम प्रेम जी फांउडेशन ने बड़ी राशि देकर सहायता की है।
उत्तराखण्ड में भी प्रदेश की सीमाएं सील करते हुए कफ्रूर्य लगाया गया है ताकि कोरोना वायरस की लड़ाई को लड़ा जा सके। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सभी प्रदेश वासियों से सहयोगी बनने को कहा है। मुख्यमंत्री ने जनता से प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सम्पूर्ण लाॅकडाउन के आह्वान में पूरा सहयोग देने की अपील की। उन्होंने कहा कि जब भी देश पर और मानवता पर संकट आया है, हम सभी की एकजुटता से संकट को दूर करने में कामयाब हुए हैं। लाॅकडाउन को कारगरबनाने के लिये प्रदेश में टास्क पफोर्स गठित की गई है। साथ ही अति आवश्यक सेवाओं में लगे वाहनों के लिये पास जारी किये गये हैं।
पुलिस महानिदेश अपराध् एवं कानून व्यवस्था अशोक कुमार ने बताया कि प्रदेश में लाॅकडाउन के दौरान कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये 6000 पुलिस कर्मी और 20 कम्पनी पीएसी तैनात हैं। प्रदेश को 102 जोन और 500 सेक्टर में बांटा गया है।
इस बीच देहरादून सचिवालय में प्रदेश कैबिनेट की बैठक में महत्वपूर्ण फैसले लिये गये। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में मंत्राी सतपाल महाराज, यशपाल आर्य, मदन कौशिक, डाॅ.हरक सिंह रावत, सुबोध् उनियाल और अरविन्द पाण्डे मौजूद थे। प्रदेश सरकार के शासकीय प्रवक्ता मदन कौशिक ने सचिवालय मीडिया सेंटर में कोरोना वायरस ;कोविड 19 से बचाव को लेकर प्रदेश सरकार के फैसलों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कालेजों देहरादून, हल्द्वानी, श्रीनगर और अल्मोड़ा मेडिकल कालेज को मुख्य रूप से कोरोना रोगियों के उपचार के लिये आरक्षित रखा जाएगा। शेष विभागों को अन्य हास्पिटल में शिफ्रट किया जाएगा। कैबेटिन के फैसलों पर अमल करते हुए शासन ने निर्देश जारी कर दिये हैं। इसके तहत बड़े निजी अस्पतालों से कहा गया है कि वे 25 फीसदी बेड कोरोना रोगियोें के लिये रखें। इसके अलावा आईआईपी देहरादून और एम्स ट्टषिकेश में केविड-19 की जाँच हेतु इजाजत दी गई है। श्रीनगर, हल्द्वानी, दून मेडिकल कालेजों के विभाग अध्यक्ष तीन महीने के लिये डाक्टर भर्ती कर सकते हैं। जिलाधिकारी भी अपने जिलों के अस्पतालों में तीन माह के लिये डाक्टर भर्ती कर सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग में सृजित 958 रिक्त पदों के सापेक्ष 479 सर्जन को 11 माह के रखने की अनुमति, असंगठित मजदूर जरूरतमन्द जनता की तात्कालिक मदद के लिये चार जनपदों के जिलाधिकारियों को तीन व अन्य को दो करोड़ रुपये का फंड, गेहूं किा खरीद मूल्य बढ़ाकर कर 1925 रुपये प्रति क्विंटल से अब 1945 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है।
कोरोना से बचाव की यह लड़ाई लम्बी है, सभी ने सावधान रहना होगा।
कोरोना का भस्मासुर

पिघलता हिमालय
कोरोना वायरस ने पूरे विश्व में हड़कम्प मचा दिया है। चीन से शुरु होकर अमेरिका व ईरान में सैकड़ों लोगों की मौत के बाद दक्षिण-पूर्वी एशिया में सैकड़ों मामले सामने हैं। थाइलैंड, भारत, इंडोनेशिया, श्रीलंका, मालदीव, बंग्लादेश, नेपाल, भूटान सहित चारों ओर यह वायरस फैला है। कोरोना महामारी से निपटने के लिये विश्व के देशों ने हाथ-पैर मारने शुरु कर दिये हैं और अपने नागरिकों से घर में सिमट कर रहने को कहा है ताकि वायरस फैलने से बचा जा सके।
कोरोना वायरस के बारे में विशेषज्ञ जुटे हुए हैं और इसकी रोकथाम के लिये जितना ज्यादा हो सकता है किया जा रहा है। लेकिन यह तो जान ही लेना चाहिये कि कोरोना का भस्मासुर क्या है? दरअसल दुनियाभर की तेज रफ्रतार में यह भुला दिया गया है कि प्रकृति के अपने नियम हैं। नियम विरुद्ध आचरण और मनमानी का परिणाम ही कोरोना है। चीन जैसे शक्तिशाली देश को ही सबसे पहले कोरोना ने निवाला बनाया। अपने विकास के लिये दूसरे के विनाश का रास्ता चुनने वाले व्यक्ति और देश यह कतई नहीं जानते हैं कि कोई भी वरदान तब विनाश बन जाता है जब उसका दुरुपयोग किया जाने लगे। कोरोना वायरस भी इसी प्रकार का भस्मासुर है। इसका नाच इतना ताण्डव मचा चुका है कि दुनिया के देशों में हाहाकार मचा है। इन्तजार है शिव रूप में कोई इसे नचाए और भस्म कर दे।
शिव और भस्मासुर की कथा को जानने वाले बातों को आसानी से समझ सकते हैं। भस्मासुर नामक दैत्य ने शिव को प्रसन्न कर ऐसा वरदान मांगा कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जायेगा। वरदान मिलने के बाद भस्मासुर शिव को ही भस्म करने दौड़ पड़ा था। परेशान शिव ने बचने के लिये मोहनी रूप धर नृत्य किया और भस्मासुर भी नाचने लगा। नाचते नाचते उसने अपना हाथ अपने ही सिर पर रख दिया और भस्म हो गया था। ऐसा ही कुछ कोरोना भी है। चीन ने जो प्रयोग अपने वहाँ किये, उसे पता नहीं था कि वह उसे ही भस्म करने वाला है। कोराना ही क्या, ऐसे न जाने कितने वायरस दुनिया में फैल चुके हैं जो भविष्य में भी परीक्षा बनकर सामने होंगे। इसलिये जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने और अपने परिवार को संभाले। हमारे संस्कार, हमारे नियम-ध्र्म, हमारी मान्यताएं कोरी बकवास नहीं हैं। इनके साथ ही विज्ञान को जानना भी जरूरी है। अपने को अनुशासन में रखने से अपने समाज और अपने देश को सुरक्षित किया जा सकता है। कोराना ने पूरी दुनिया में यह सन्देश दे डाला है कि यदि महामारी पफैली तो सबकुछ मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी।
ठहर सा गया है जन-जीवन
कार्यालय प्रतिनिधि
कोरोना वायरस से बचाव के लिये सारे उपायों के साथ उत्तराखण्ड भी अलर्ट है। पूरा मार्च का महीना कोरोना कफ्रर्यू से घिरा रहने के बाद अब अप्रैल भी सामान्य नहीं है। सुरक्षा इन्तजामों का जाल शासन प्रशासन ने बिछाया है लेकिन वह भी उतना ही कर सकते हैं जितना उसके पास है। ऐसे में सभी ने जागरुकता दिखानी है। कोरोना के भय से सबकुछ ठहर सा गया और इससे सारी व्यवस्थाएं चरमरा चुकी हैं। स्कूल-कालेज प्रतियोगिता-परीक्षा सभी प्रभावित हैं। नव संवत्सर ‘प्रमादी’ का स्वागत भी सादा ही रहा। इस अवसर पर होने वाले जलसे-जुलूस स्थगित रहे। प्रसिद्ध मन्दिरों व मेलों में रोक का असर भी रहा। प्रदेश में होने वाली धर्मिक यात्राएं भी प्रभाव में हैं। ऐसे में ग्रीष्मकालीन पर्यटन को भी सन्देह से देखा जा रहा है। पर्यटन के मौसम में छुटपुट कारोबार कर रोटी जुटाने वाले ताक रहे हैं कि स्थिति ठीक हो और यात्राी पहाड़ आएं लेकिन अधिकांश बुकिंग रद्द होने से मायूस हैं।
देशभर में फैले कोरोना वायरस के संक्रामित लोगों तादाद बढ़ती जा रही है। पचास से ज्यादा लोगों के सैंपल लेकर हल्द्वानी भेजे गये हैं। पन्तनगर एयरपोर्ट में तैनात स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा थर्मल स्कैनिंग की जा रही है। पन्तनगर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक डेयरी फार्म द्वारा परिसर में दूध् बांटने के लिये लगाए लगाए गए कैंनों ;दूध् के बर्तनद्ध में अब टोटियांे की सहायता से दूध् दिया जा रहा है। पहले यह दूध् बर्तन का ढक्कन खोल कर खुले में दिया जाता था।
संक्रमण से बचाव के लिये सबसे पहले प्रदेश का सुप्रसिद्ध पूर्णागिरी मेले पर प्रतिबन्ध् लगाया गया। इसके बाद अन्य मेले, मन्दिरों में रोक लगा दी गई। मन्दिर समितियों ने भी इसमें योगदान दिया है। धर्मिक आयोजनों को भी सीमित किया गया है। धर्मिक नगरी हरिद्वार में इन दिनों जहाँ हजारों श्रद्धालु पहँुचते थे, सन्नाटा पसरा हुआ है। यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों पर नजर रखी जा रही है। हैड़ाखान मन्दिर में इटली समेत अन्य देशों के विदेशी पर्यटकों को मन्दिर से हटा दिया गया है। कोरोना का व्यावसायिक कार्यों में तो जबर्दस्त प्रभाव पड़ा है। स्थितियों को देखते हुए होटल व्यावसायियों ने सहयोग किया है। नैनीतात, मसूरी सहित पर्यटक स्थलों पर होटल, रिजाॅर्ट बन्द कर लोगों को जागरुक किया है। मुक्तेश्वर, भीमताल, रामनगर, मुनस्यारी सभी जगत पर्यटकों की बुकिंग न होने से सन्नाटा है।
राजनीतिक पार्टियों ने भी अपने कार्यक्रमों को परिवर्तित कर दिया है। भाजपा ने अपनी बैठकों व प्रस्ताविक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है। आम आदमी पार्टी का सदस्यता अभियान आॅनलाइन है लेकिन इसने भी अपने सम्पर्क अभियान को रोका है। कांग्रेस द्वारा भी अपने कार्यक्रमों को बदल दिया गया है। सभी ने मिलकर कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव की अपील की है। मंत्रिमण्डल की बैठक के बाद जन प्रतिनिध्यिों को सभाओं, जनता दरबार कार्यक्रम रद्द करने को कहा गया।
कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए सरकार ने स्टेडियम, कालेज और गेस्ट हाउसों को क्वारंटीन सेन्टर बनाया है। अस्थायी अस्पताल की तैयारियां भी हो चुकी हैं। किसी भी स्थिति से निपटने के लिये सरकार ने रेडअलर्ट जारी किया है। सेना ने भी कोरोना के कहर से बचने की तैयारी की है। छुट्टी पर गए जवानों की वापसी पर पिफलहाल रोक लगा दी है। जो लोग छुट्टी काटकर वापस आए हैं, उन्हें 14 दिन क्वारंटीन पर रखा जा रहा है।
कोरोना वायरस के बचाव के लिये हाईकोट की ओर से तय किया गया है कि 15 अप्रैल तक केवल अति आवश्यक मुकदमों की ही सुनवाई होगी। निर्देश के अनुसार हाईकोर्ट में केवल मृत्युदण्ड, बन्दी प्रत्यक्षीकरण सुरक्षा, सम्पत्ति ध्वस्तीकरण, जमानत प्रार्थना पत्रा ही सुनवाई होगी। उपरोक्त में मृत्युदण्ड के अलावा अन्य त्वरित मामलों की सुनवाई के लिये अधिवक्ताओं को मामले की अर्जेंसी का कारण बताना होगा।
इस प्रकार जन-जीवन ठहर सा गया है लेकिन यह सब करना भी जरूरी है ताकि किसी प्रकार का नुकसान न हो। इसमें सभी को सहयोग देना है।
करोड़ों भक्तों की आस्था का प्रतीक है पूर्णागिरी दरबार

डाॅ.पंकज उप्रेती
हिमालय के उत्तरपूर्व में नेपाल सीमान्त पर समुद्रतल से लगभग तीन हजार फीट की ऊँची अन्नपूर्णा की चोटी पर स्थित है करोड़ों भक्तो की आस्था का प्रतीक पूर्णाेिगरी दरबार। उत्तर भारत के इस प्रसिद्ध मेले में इन दिनों भारी भीड़ जुटी हुई है। मान्यता के अनुसार पूर्णागिरी दर्शन करने वाले सीमा पार नेपाल ब्रह्मदेव में सि(बाबा मन्दिर के दर्शन भी जरूर करते हैं। नाचते-झूमते भक्तों के जत्थों को इन दिनों टनकपुर से लेकर मन्दिर तक देखा जा सकता है। मेले का यह क्रम पूरी ग्रीष्म रितु तक चलेगा। जिसमें लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामना लिये पहँुचते हैं।
चैत्र मास की प्रतिपदा से लेकर बैसाख के अन्त तक दूर-दूर से आने वाले नर-नारियों का जमघट यहाँ प्रतिवर्ष लगता है। पूर्णागिरी माई की जय, पहाड़ वाली माई की जय, शेरावाली की जय, सच्चे दरवार की जय इत्यादि नारे लगाते हुए यात्री दल मीलों पैदल चलकर पूर्णागिरी मन्दिर दरबार पहँुचते हैं। आरोग्य, गृहस्थ, सुख सन्तान, ऐश्वर्य तथा दर्शन की लालसा लिये यात्रियों की मान्यता है कि उनकी यात्रा से मनोवांछित इच्छाएं पूर्ण होगी। दुर्गा-सप्तष्ती में देवी की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा गया है- ‘‘जो सिंह की पीठ पर विराजमान है। जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है जो मरकत मणि के समान कान्तिवाली अपने चारों भुजाओं मे शंख, चक्र, धनुष वाण धरण करती है व तीन नेत्रों से सुशोभित होती है। जिनके भिन्न-भिन्न अंग बंध्े हुए बाजूबन्द, कंकण, हार, खनखनाती हुई करघनी व नूपुरों से सुशोभित हैं। जिनके कानों में रत्न जड़ित, कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। वे भगवती हमारी दुर्गति दूर करने वाली है।’’
पूर्णागिरी नाम क्यों पड़ा, इस बारे में कहा जाता है कि प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती द्वारा स्वयं को भस्म कर देने पर क्रुद्ध शिवजी जब सती की क्षत-विक्षत देह को आकाश मार्ग से ले चले तब मार्ग में लगभग 51 स्थलों पर देवी सती के अंग गिरे। पूर्णागिरी शिखर पर देवी का नाभि अंग गिरने से यह शिखर एक पुनीत स्थल माना जाने लगा। देवी के मन्दिर के बीच में एक बाॅबी/सुराख है। वह सती की नाभि ही है जिसका निचला छोर शारदा नदी तक गया है। कहा जाता है कि कालान्तर में काठियाबाड़, गुजरात निवासी श्री चन्द्र तिवारी सम्वत् 1621 मे यवनों के अत्याचार से पीड़ित हो कुमायूं के चन्द्रवंशी राजा ज्ञानचंद के दरबार पहँुचे। इस प्राीचन देवी-स्थल की महिमा व स्वप्न में देवी का आदेश होने पर ब्रह्मकुण्ड/बोम के निकट स्नान कर सम्वत् 1632 में माँ पूर्णागिरी की मूर्ति की स्थापना की। इस प्राचीन मन्दिर का पूजा कार्य बाद में तिवारी और बल्हेड़िया वंश के लोगों ने परस्पर बांट लिया। खिलपति में अखिलतारिणी मन्दिर, उग्रतारा व बाराही मन्दिरों की स्थापना का श्रेय भी श्री चन्द्र तिवारी को है।
ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार अन्नपूर्णा शिखर के निकट सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी में, जो शारदा नदी के दूसरी ओर स्थित थी, एक विशाल यज्ञ आयोजित किया था जिसमें सभी देवताओं सहित भगवान शिव-पार्वती भी पधारे थे। निकटवर्ती पर्वत श्रेणियों की रमणीक दृृृश्यावली ने देवी पार्वती का मन मोह लिया और उन्होंने शिव से वहीं निवास करने की आज्ञा मांगी तभी से ब्रह्माजी की प्राचीन यज्ञ स्थली ब्रह्मदेव मण्डी तथा देवी पार्वती का वास स्थल पूर्णागिरी के नाम से विख्यात हुआ।
शारदा नदी के बायें तट पर बरमदेव/बूम के ठीक सामने सि(नाथ का प्राचीन मन्दिर एवं पूर्णागिरी मन्दिर के ठीक नीेचे देवी के चरण-स्थलों पर बना मन्दिर मार्ग की जटिलता के कारण प्रायः भक्तों की पहंँुच से बाहर ही हैं चैत्र मास में शारदा नदी में नावें डालकर बूम से ठाकुर जी की सवारी असली सिद्ध बाबा मन्दिर तक जाती व पूजन आदि कर वापस लौट आती है। सिद्धबाबा एक सिद्ध सन्त व देवी के अनन्य उपासक थे जिस पर पूर्णागिरी माता की विशेष कृपा थी। शक्ति स्वरूपा देवी भगवती ही उनकी इष्ट थी। दिन रात खड़े रहकर सच्चे मन से देवी की अराधना कर उन्हें सम्पूर्ण सिद्धियां व देवी से प्राप्त साक्षात्कार व संभाषण शक्ति प्राप्त हो चुकी थी। किवदन्ती है कि देवी उपासक बाबा सदानन्द व सिद्धमणि पर्वत पर तपस्या रत बाबा सिद्धनाथ में परिचय होने पर देवी की महिमा व चमत्कारों को सुन सिद्धनाथ देवी दर्शन को अष्टमी की महारात्रि को सिंह की चिन्ता किए बिना अन्नपूर्णा शिखर की ओर चल दिये। एकान्त-विश्राम के इन क्षणों में पर पुरुष का आभास पाकर देवी क्रोधित हुए बिना न रह सकी और अपने इस भक्त को दो टुकड़ों में खण्डित कर शिखर से उछाल दिया। जिसका एक भाग शारदा नदी के पार नेपाल राज्य में व दूसरा भारत में बनखण्डी स्थान पर गिरा। देवी के इस कृत्य पर नेपथ्य आत्र्तनाद गूंज उठा- ‘‘देवी! क्या तुम्हारे भक्तों की यही दुर्गति होती है।’ देवी ने अपने भक्त सि द्ध नाथ को दर्शन दिये और आशीर्वाद देकर अन्र्तध्यान हो गई। बाबा लम्बे समय तक देवी-चरणों में सेवारत रहकर देवीधम सिधारे। अन्नपूर्णा शिखर के सामने नेपाल राष्ट्र में बाबा सि द्ध नाथ का प्राचीन मन्दिर व समाधि आस्थावानों के लिये श्र द्ध का केन्द्र है।
यात्रा की कठिन चढ़ाई-
माँ पूर्णागिरी के पुनीत स्थल की यात्रा कठिन चढ़ाई वाली है। देश-विदेश से यात्राीगण टनकपुर भाबर मण्डी में रात्रि विश्राम करते हैं। पैदल आने वाले जत्थे व वाहनों, रेल यात्रा द्वारा पहँुचे यात्राी टनकपुर से ठूलीगाड़ नामक स्थान पर पहँुचते हैं। प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी, महावली भीम द्वारा रोपित चीड़ वृक्ष, पाण्डव रसोई तथा उनकी उत्तराखण्ड यात्रा के पड़ाव स्थल इसी के समीप हैं। ठूलीगाड़ में प्रथम पड़ाव के साथ ही लगभग 5 किमी. की पथरीली पहाड़ की चढ़ाई पूरी करनी होती है। इस मार्ग पर बासी की चढ़ाई पूरी कर हनुमान चट्टी, ढलान पर लादी खोलाा, हल्की चढ़ाई पूरी कर पानी की टंकी व पर्यटक आवास दिखाई देता है। कुछ और चलने के बाद भैरोंचट्टी, पुरानी बाँवली व टुन्नास, काली मन्दिर, झूठा मन्दिर के बाद माता का दरबार मिलता है।
मान्यता है कि पहाड़ वाली माई की कृपा अबोध् बालकों, अशक्त महिलाओं तथा वृ(जनों को अपनी शरण में खींच लेती है।
टुन्नास से पवित्रा होकर यात्राीगण काली मन्दिर से आगे लगभग एक किमी की दुर्गम चढ़ाई, जो अब सीढ़ियाँ बनने तथा लोहे के पाइप लगने से सुगम हो गई है, प्रारम्भ करते हैं। इस मार्ग में झूठा मन्दिर, काली मन्दिर इत्यादि के दर्शन के साथ ही नैसर्गिक शोभा को निहारते यात्राी माता के नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। सामने की पर्वत श्रृंखला में मित्रा राष्ट्र नेपाल की सीमा पर देवी के अनन्य उपासक सि द्ध बाबा के प्राचीन मन्दिर के दर्शन भी यात्राी जरूर करते हैं। इसके बिना यह यात्रा अपूर्ण मानी जाती है।
टुन्नास बनाम इन्द्रभवन-
देवराज इन्द्र द्वारा गौतम ट्टषि की पत्नी अहिल्या से छलपूर्वक मिलने की कथा सर्वविदित है। कुपित ट्टषि के शाप से मुक्ति पाने के लिये भगवान शिव के परामर्श से इन्द्र ने जिस स्थान पर यज्ञ किया वही प्राचीन स्थल इन्द्रभवन या टुन्नास के नाम से जाना जाता है। जो इस मनोहारी यात्रा का मुख्य पड़ाव है। यात्राीगण आते-जाते समय यहीं विश्राम करते है। व बालकों का मुण्डन, पूजा-पाठ व हवन आदि कराते हैं।
झूठे मन्दिर की कहानी-
वर्षों पहले एक सम्पन्न दम्पत्ति सन्तान की कामना लेकर माँ के दरबार में पधरा और सन्तान प्राप्ति पर देवी को सोने का मन्दिर चढ़ाने का वचन दिया। मनोकामना पूर्ण होने पर सेठ ने तांबे का मन्दिर बना उपर से सोने का पानी चढ़वा दिया। कई किमी से बनवाकर लाया गया यह मन्दिर सच्चे दरबार तक नहीं आ सकता और लाख प्रयत्न पर भी नहीं उठा। देवी ने सेठ की भेंट अस्वीकार कर दी, जिसे आज भी झूठे मन्दिर के रूप में जाना जाता है। टुन्नास के निकट रखा यह मन्दिर सच्चे दरबार की महिमा का बखान कर रहा है।
काली मन्दिर व भैरों बाबा-
झूठे मन्दिर से कुछ आगे चलकर काली देवी तथा भैरों बाबा का प्राचीन स्थल है। इसकी स्थापना कूर्मांचल नरेश राजा ज्ञानचन्द के विद्वान दरबारी पण्डित श्री चन्द्र त्रिपाठी ने की थी। राजा ने पण्डित को 6 गाँव उपहार में दिये थे। आज भी इन बिल्हा गाँव के निवासी बल्हेड़िया तथा तिराही गाँव के निवासी त्रिपाठी कहलाते हैं। मन्दिर का समस्त पूजा-कार्य इनके द्वारा किया जाता है। भैरों चट्टी पर देवी के अनन्य उपासक महाकाल भैंरो का प्राचीन स्थल व काली मन्दिर के निकट देवी के काली का रौद्र रूप धरण कर तूर्णा राक्षस का वध् स्थल भी है।
सिद्ध बाबा की समाधि-
एक दिन जब रात्रि में देवी सिंह की सवारी पर निकली तो निर्जन स्थल पर किसी पुरुष की उपस्थिति का आभास पाकर शेर ने गर्जना की और देवी ने समाधिस्थ बाबा सिद्ध मणि के दो टुकड़े कर पफंेक दिये। एक तो नीचे जाकर बनखण्डी नामक स्थान पर गिरा जहाँ आज भी मेला लगता है, दूसरा टुकड़ा सामने पहाड़ पर जाकर गिरा जहाँ समाधि स्थल सिद्ध बाबा का प्राचीन मन्दिर विद्यमान है। देवी के वरदान के कारण ही सिद्ध बाबा के दर्शन किये बिना पूर्णागिरी की यात्रा अपूर्ण समझी जाती है। इस कारण यात्राीगण देवी के दर्शन के बाद सिद्ध बाबा के दर्शन करना अपना पुनीत कर्तव्य समझते हैं।
माँ का दरबार-
चट्टान के उपर-नीचे रास्ते पार कर उँची चोटी पर पूर्णागिरी माता का दरावार है। जिसकी प्रधन शक्ति पीठों में गणना की जाती है। चबूतने पर नाभि, त्रिशूल व मूर्ति आदि चिन्ह हैं, जिसकी पूजा की जाती है। मन्दिर के पाश्र्व भाग में अति प्राचीन पत्रा, पुष्प फल रहित सूखा वृक्ष है। जिस पर अनेकों घंटियाँ व ध्वज पताकायें बंध्ी हैं और पास में त्रिशूल गढ़े हैं। नाभि स्थल ढका है।
दरवारी और सामंती सीमा लांघकर जनता के बीच पहाड़ की होली गायन परम्परा

लोकमंच वह है जहाँ हमारी पुरातन कथाएं-गाथाएं गीत-संगीत मिलता है, यह श्रुति परम्परा है। एक पीढ़ी से दूसरी तक अपनी बात-व्यवहार, कला-संस्कृति, इतिहास को हस्तान्तरित करने का बड़ा उपक्रम ‘होली’ भी है। इसमें हमारे ग्राम्य जीवन का अल्हड़पन, अख्खटपन, अपनापन है। तभी हम आसानी से गाने लगते हैं-
आओ सनमुख खेलें होरी।
अब घर जाने न दूंगी लला हो। आओ.
कंकर मारि छयल जसो भाजै,
मैं तो लोंगी मों बदला हो। आओ.
स्योंनि के माथे बिन्दी बिराजे,
नैनन बीच हों कजरा हो। आओ.
ताल मृदंगा और डफ बाजै,
मजीरन को झनकार लला हो। आओ.
उत्तराखण्ड के लोक जीवन में होली ने जो रंग घोले हैं उसकी खड़ी और बैठकी शैली यहाँ दिखाई देती है। इसमें जहाँ ग्रामीण सामुहिकता के सुर-ताल हैं वही नागर रौबदारी। बैठकी होली की गायन शैली दरवारी और सामंती सीमा लांघकर जनता के बीच सुहा रही है। जिसने एक परम्परा को जन्म दिया जो बनारस की ठुमरी, पंजाब के टप्पे की तरह अपना निराला अंदाज रखती है। चैती, कजरी, माण की तरह इसमें भी इसका भी अपना अंदाज है। कन्नौज व रामपुर की गायकी का प्रभाव इसमें है। इसके लिये अनामत अली उस्ताद का नाम ठुमरी के रूप को सोलह मात्रा में पिरोने के लिये याद किया जाता है। उस्तादों, पेशेवर गायकों का योगदान इसमें रहा है। मुगल शासकों को भी होली की बैठकी रिझा गई। तभी तो आज तक गाते हैं- ‘किसी मस्त के आने की आरजू है’। दरवारी शान और बादशाह के हाल को बैठ होली में गाया जाने लगा- ‘केशर बाग लगाया, मजा बादशाह ने पाया’। वर्तमान मंे मनोरंजनों के तमाम साधनों और बदलती जीवन शैली का प्रभाव हमारे त्यौहारों में पड़ा है। इसकी परम्परागत ठसक को बनाये रखने लिये संस्थागत प्रयास भी पिछले दो दशकों से हो रहे हैं जिसके सुखद परिणाम दिखाई दे रहे हैं। हालांकि होली गायन की हमारी शैली को ‘होली गजल’ के रूप में भी प्रस्तुत करने का अटपटा प्रयोग हुआ है लेकिन वह हजम होने वाला नहीं है। इसी प्रकार हमारे लोक जीवन की खड़ी होली के अधिकांश दिखाये जाने वाले वीडियो प्रदर्शन मूल से मेल नहीं खाते हंै। क्योंकि उसमें यह मान लिया गया है कि झोड़े की तरह वृत्ताकार घूमने मात्र से होली हो जाती है। जबकि हमारी होली शैली की अपनी विधा है। यहाँ पुरुषों और महिलाओं की पृथक-पृथक होलियों का रिवाज पहले से है और कई गाँवों में तो होली होती ही नहीं है। ऐसे गाँवों में आठू-सातू को होली से भी जबर्दस्त तरीके से मनाया जाता रहा है।
इस पर्वतीय प्रदेश में विशेषकर कुमाऊँ अंचल में होली का जबर्दस्त प्रभाव है। यहाँ एक ओर बैठकी यानी नागर होली आम जनता के बीच जगह बनाने की प्रक्रिया में आज भी है। वहीं खड़ी होली का रंग विशुद्ध लोक का रंग है। इसमें ढोल, मजीरे की थाप पर मस्त होकर होल्यार गाते-झूमते हैं। खड़ी होली में यद्यपि संगीत शास्त्र का अनुशासन न हो किन्तु परम्परा से सीखते हुए लोग लय-ताल के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हंे देख लगता है कि यह लय-ताल, पद संचलन का अभ्यास करते हैं। जबकि वास्तव में मदमस्त लोग सिर्फ इस त्यौहार में ही ऐसी भागीदारी करते हैं। बड़े-बूढ़ों को देख युवा व बच्चे भी उसके अभ्यस्त हो जाते हैं। इसकी तालें भी ढोल में कर्णप्रिय लगती हैं। विष्णुपदी होली से इसकी शुरुआत हो जाती है-
श्याम मुरारी के दरसन को जब
विप्र सुदामा आये लला।।
बिप्र सुदामा द्वार खड़े हैं,
पूछत कृष्ण कहाँ हैं हरी। बिप्र.
हाँजर वासी गये जब भीतर,
द्वार खड़ो है बिप्र हरी। बिप्र.
बालापन के मित्र हमारे,
रोको नहीं क्षणमात्र हरी। बिप्र.
बांह पकड़ के निकट बैठाए,
रुकमणि चरण दबार हरी। बिप्र……
खड़ी होली गायन के गीतों में क्रम का बहुत ध्यान रखा जाता है। विष्णुपदी होली में कई गीत बैठकर गाये जाते हैं। जिसमें दो पक्ष बनाकर बैठा जाता है और एक पक्ष द्वारा गीत प्रारम्भ कर देने के बाद दूसरा पक्ष दोहराता है। पूरी लय ताल के साथ होल्यार इसमें भावाभिव्यक्ति करते हैं। ‘होली कैसो खेलन वन जाई’ जैसे गीत बैठकर गाये जाते हैं। इन गीतों को ढोल-मजीरे की ताल में समवेत स्वर में गाया जाता है। खड़ी होली गाने वाले गीतों में नृत्य की कुछ विशेषताएं हैं। पांवों को गीत के बोल के साथ विशेष तरीके से मोड़ा जाता है, कमर झुकाकर नाचना, हाथों को घुमाना, कहीं-कहीं पर हाथों में रूमाल और छड़ी पकड़कर नाचना इन गीतों को अधिक प्रभावपूर्ण बना देता है। इन गीतों की नई पंक्ति के बीच-बीच में एक प्रमुख होल्यार द्वारा ‘बखारा’ भी जाता है। ‘बृज कुंजन में धूम मचै होरी’ जैसे गीत इसमें गाये जाते हैं। खड़ी होली में ही बंजारा हाली का चलन भी है, जिसे समवेत स्वरों में टोली गाती है। ‘गोरी प्यारो लगो तेरो झनकारो’ जैसे गीत इसमें गाये जाते हैं। और फिर होली के बहाने पूरी चुलबुलाहट गूंजने लगती है-
वृन्दावन की कुंज गलिन में,
दधि लूटे नन्द जी को लाल,
बेचन ना जाइयो।
ना जाइयो मेरे लाल बेचन न जाइयो।।
सोल सौ गोपिनी न्हान चली,
जमुना जी को लम्बो घाट। बेचन.
कौन जाने जसोदा को लड़को,
वो है लौंडा लभार। बेचन.
आपूं जो कान्हा पार उतर गये,
हो धींवर मझधार। बेचन.
दधि माखन सब लूट लियो है,
उलटि मांग लगाई। बेचन…
ब्रज मण्डल की होली की तरह ही देवभूमि की होली भी आध्यात्म से धूम तक चलती है। यहाँ तक की इस होली में श्रृंगार का तड़का इसे और भी आगे ले जाता है-
अरे हाँ रे गोरी चादर दाग कहाँ लागो।।
अरे हाँ रे सासू पनिया भरन हँू चली,
गागर दे छलकाय सासू चादर दाग वहाँ लागो।।
अरे हाँ रे गोरी पनिया दोष न दीजिये,
वहीं खड़ो तेरो यार गोरी चादर दाग कहाँ लगो।।
अरे हाँ रे सासू यार को नौ मत लीजिये,
जहर खा मर जाऊँ यार को नौ मत लीलिये।
अरे हाँ रे सासू खरक दुहावन हँू चली,
बछड़ा मारे लात सासू चादर दाग वहाँ लागो।।
अरे हाँ रे गोरी बछिया दोष न दीजिये,
वहीं खड़ो तेरो यार गोरी चादर दाग कहाँ लागो।……
खड़ी होली की धूम के समानान्तर बैठकी होली पहाड़ में चलती है, जिसका शुभारम्भ पौष के प्रथम रविवार से कर दिया जाता है। इसमें भी पहले विष्णुपदी होली गीत गाने का रिवाज है, जिसे निर्वाण की होली कहते हैं। यह होली गीत विभिन्न राग-रागनियों में गाये जाते हैं। अनुमान है कि जब बाहर से लोगों का इस पर्वत प्रदेश में आगमन हुआ तो मनोरंजन के साधनों के अन्तर्गत राज्याश्रय में महफिलें होती थीं। मिरासी व पेशेवर कलाकारों के नृत्य-गीतों का क्रम चला। जब दरवार से निकल कर यह गायकी सम्भ्रान्त लोगों के पास आई, उस दौर में होली बैठक किसी सक्षम व्यक्ति के घर होने लगी। शिष्ट जनों की होली भ्ीा इसे कहा गया क्योंकि घरों में सीमित लोग इसमें जुटते थे। बस, यहीं से आम जन को चस्का लगा था बैठकी होली का। धमार के रूप में जोरदार आवाज में सुर गूंजने लगे-
‘दय्या आई री, सब गोपियन बन ठन, मोसे करत इतरार मुरार।
कोई चमकत कोई मटकत, कोई नाचत दे दे ताल मुरार।।’
अस्सी फीसदी गीत राग काफी के स्वरों में हैं। महफिल में नियमित बैठने वाले कुछ दिनों तक सुनने के बाद धड़ाधड़ गाने लगते हैं। राम, श्याम के प्रसंगों के अलावा बसन्त और शिव की स्तुति के बाद श्रृंगार की रचनाएं इस राग में सुनने को मिलती हैं-
‘सैय्या तू प्रीत न जाने, अंगिया मोरी रंग ही में साने।
अंग-अंग को रंग गया, कर होली के बहाने।’
राग काफी की भांति ही दिन में पीलू राग पर होल्यार खूब गाते हैं। एक रचना जिसमें मथुरा शहर के भीगने का वर्णन है-
‘मथुरा शहर के लोग सभी, भीगन लागे भिगावन लागे।
हमरी चुनरिया पिया की पगरिया, और केशरिया फाग।’
जंगलाकाफी में कर्णप्रिय रचनाओं का गायन पौष माह के प्रथम रविवार से लेकर टीके की होली तक होता रहता है। एक होली गीत-
‘गोरी धीरे चलो लुट जाओगी डगर,
तेरे सिर से ढुरक ना जाये गगर।
या रसिया है ब्रज को रंगीलो,
या को रहत घट-घट की खबर।’
पहाड़ की रामलीला की तरह होली में भी विहाग और जयजयवन्ती राग की मदमस्त करने वाली धुन रसिकों को मुग्ध करती है। एक रचना-
‘गोरी के नैनन में श्याम बसत हैं, लोग कहें वाके नैन कजरारे।
घूंघट ओट में झिलमिल चमकें, झीनी बदरिया जैसे नभ के तारे।’
इस प्रकार पहाड़ की होली में ठैठ ग्रामीण के साथ सामंती गोद से निकल कर आई नागर होली की सामुहिकता, भावाभिव्यक्ति मुखरित होती है। इसके गीत लगभग तीन माह तक रस घोलते हैं ओर टीके की बैठक में विदाई के साथ फिर से अगले वर्ष मिलने की कामना करते हैं। वाकेई जीवन का उल्लास होली के बिना अधूरा है। यह उल्लास हमारे जीवन को रंगों से सरावोर करता है और हमारे मन को तरंगित करता है।
महान जनसेवक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. जगत सिंह पांगती

स्व.जगत सिंह पांगती का जन्म 30 जून 1908 को भारत-तिब्बत सीमान्त गाँव मिलम के एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ था। उनके पिता स्व.खड्गराय पांगती, आर्य समाजी विचारधारा के प्रबुद्ध एवं कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता थे, जिन्होंने 1929 में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया, उनके ज्येष्ठ भ्राता स्व. भगत सिंह पांगती जोहार के प्रसि द्ध व्यापारी एवं उदार प्रकृति के व्यक्ति थे, जिनके पूर्ण सहयोग से ही वे सामाजिक क्षेत्र में एकाग्र होकर कार्य कर पाए।
जगत सिंह पांगती की प्रारम्भिक शिक्षा जोहार घाटी में सम्पन्न हुई। सन् 1923 की मिडिल स्कूल परीक्षा में पूरे प्रान्त की मेरिड में प्रथम स्थान पर रहे। सन् 1927 की हाईस्कूल परीक्षा में राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए तथा सम्पूर्ण कुमाउँ मण्डल में सर्वश्रेष्ठ छात्र घोषित हुए। इतना ही नहीं वे हाईस्कूल परीक्षा 1927 में सम्पूर्ण प्रान्त की मैरिट सूची में तृतीय स्थान पर भी रहे। राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा के सम्मान-पट्ट;आॅनर बोर्ड में अंकित आपका नाम आज भी देखा जा सकता है।
जगत सिंह पांगती के हृदय में प्रारम्भ से ही आजादी के लिए तड़प थी। मेरिट छात्रवृत्ति प्राप्त होने के बावजूद वे छात्र जीवन को वहीं छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े तथा राष्ट्र को समर्पित होने वाले जोहार के प्रथम तरुण बने। सन् 1928 में ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ आन्दोलन तथा विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार आदि जैसे देशभक्ति के कार्यों में सक्रिय रहे।
यह उनके जीवन का सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहला पड़ाव था। सन् 1929 में लाहौर अधिवेशन में भाग लेने की प्रबल इच्छा होते हुए भी वे सामाजिक कार्य में व्यस्त रहने के कारण उक्त अधिवेशन में न जा सके और उनके पिता स्व. खड्गराय पांगती ने लाहौर अधिवेशन में भाग लिया। इस अधिवेशन में स्व. खड्गराय पांगती के साथ स्व. दुर्गा सिंह रावत, स्व. राम सिंह पांगती तथा स्व. हरिमल सिंह बुर्फाल ने भी भाग लिया। लाहौर अधिवेशन में पारित ‘पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव’ को गाँव गाँव मंे उल्लास से कार्यानवयन में आपका महत्वपूर्ण सहयोग रहा। सन् 1934 तक क्षेत्रा में सार्वजनिक रचनात्मक कार्यों जैसे ग्राम सुधार, ग्राम स्वच्छता, पुस्तकालयों की स्थापना एवं शराबबन्दी आदि जैसे सामाजिक कार्यों में लिप्त रहे। सन् 1935 में कांग्रेस स्वर्ण जयन्ती को सफलतापूर्वक मनाने में पूर्ण सहयोग दिया। 1936 में कांग्रेस का सदस्य बनकर कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय हो गए। सन् 1938 में प्रदेश के कांग्रेस मंत्रिमण्डल ने आपको ग्राम सुधार संयोजक;आर्गनाइजर नियुक्त किया और 1940 तक आपने इस पद पर रहकर कुशलतापूर्वक कार्य सम्पादित किया।
सन् 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन का संचालन करते हुए स्थान ‘लाबगड़’ में 1 मई 1941 को आपको अन्य साथियों के साथ कैद कर तीन माह का सशक्त कारावास तथा रु. 50/- का आर्थिक दण्ड दिया गया। 12 मई से 2 अगस्त 1941 तक जिला कारागार अल्मोड़ा में आप बन्दी रहे और जेल से मुक्त होने के पश्चात जिला सत्याग्रह का संचालन करने लगे। 24 अगस्त 1942 को मुनस्यारी के दरकोट, देवीधार के मेले में हाथ में तिरंगा झण्डा लेकर आप तथा स्वामी भागवतानन्द जी के साथ पं.बचीराम जोशी के सभापत्तित्व में विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में शामिल हुए। 25 अगस्त 1942 को आन्दोलनकारियों के समूह के साथ मल्ला जोहार गोरीफाट में सत्याग्रह का प्रचार करते हुए मिलम से मुनस्यारी, तेजम आदि स्थानों से होते हुए 28 सितम्बर को अन्य 30 सत्याग्रहियों सहित बांसबगड़ में अंग्रेज पल्टन द्वारा गिरफ्रतार किए गए, जिसके फलस्वरूप उन्हें ग्राम थल में दो वर्ष का कठोर कारावास का दण्ड सुनाकर 11 अक्टूबर से 20 नवम्बर 1942 तक अल्मोड़ा एवं 21 नवम्बर से 5 अगस्त 1943 तक बरेली कारागार में में रखा गया। 6 अगस्त को उन्हें कैम्प जेल लखनउ में स्थानान्तरित कर दिया गया। बाद में आपको 26 जून 1944 को कारागार जीवन से मुक्ति मिली। इसके पश्चात वे अपने क्षेत्र में सहकारिता, कुटीर उद्योग और समाज सुधर जैसे विकास कार्यों के साथ-साथ कांग्रेस संगठन को मजबूत करने का कार्य करने लगे। उन्होंने पूज्य गांध्ी जी के वर्धा आश्रम के अनुरूप कुटीर उद्योगों की स्थापना की और जोहार में सहकारी संघ समितियों के द्वारा जनता को सहकारिता का लाभ दिलाया। इस प्रकार जोहार में सहकारी संघ समिति की स्थापना में आपका प्रमुख योगदान रहा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जोहार मण्डल कांग्रेस कमेटी के अनुरोध् पर शासन से पूज्य महात्मा गांध्ी जी के एक ‘अस्ति कलश को मानसरोवर में विसर्जित करने की स्वीकृति सरकार से प्राप्त की। स्व. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में जोहार के अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधि मण्डल लेकर आप अस्थि कलश के साथ मानसरोवर गए। जोहार के लोगों ने अस्थि कलश का जोदरार स्वागत करते हुए पूज्य बापूजी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
सन् 1949 से सन् 1952 तक आप पंचायत राज इंस्पेक्टर के पद पर रह कर आपने देश सेवा की परन्तु सामाजिक सेवा कार्य को अपना जीवन का परम लक्ष्य मानते हुए तथा इस समाजसेवा के कार्य में इस पद को बाधा मानते हुए आपने इस पद को त्याग कर समाज के सामने एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। सरकारी सेवा से पदमुक्त होने के बाद जिला कांग्रेस नियोजन समिति अन्तरिम जिला परिषद अल्मोड़ा के सदस्य तथा विकासखण्ड मुनस्यारी के अध्यक्ष बने। सन् 1962 से से 1971 तक के विधान सभा चुनावों तथा ग्राम सुधार कार्यक्रमों में आपने अपने को व्यस्त रखते हुए उत्तरी सीमान्त की समस्याएं लेकर तथा डेलीगेशन के प्रबन्धकर्ता बनकर दिल्ली तथा लखनउ जाकर कई सुविधाएं प्रदान करवायीं। आप अत्यन्त दूरदर्शी थे। सन् 1962 में भारत चीन युद्ध के कारण सीमान्त क्षेत्रा जोहार, दारमा तथा गढ़वाल नीति-माणा आदि के निवासियों का तिब्बत व्यापार ठप हो गया जिसके कारया तीनों घाटियों के प्रबुद्ध एवं जागरुक समाजसेवियों को साथ लेकर तत्कालीन माननीय प्रधानमंत्री स्व. पं.जवाहरलाल नेहरू जी से मिले, उन्हें सूत से बनी माला पहना कर उनका अभिनन्दन किया तथा उन्हंे ज्ञापन प्रस्तुत किया। जिसमें इन सभी क्षेत्रों की आर्थिक समस्याओं की ओर ध्यान दिलाते हुए इन सभी इलाकों को जनजाति क्षेत्रा घोषित करने का अनुरोध् किया गया था। परिणामस्वरूप ये क्षेत्र जनजाति क्षेत्रा घोषित हुए और तब से आज तक उन्नति की ओर अग्रसर हैं। इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिये पूरा सीमान्त क्षेत्र हमेशा आपका आभारी रहेगा।
भोटिया पड़ाव हल्द्वानी की जमीन की लीज को ‘जोहार संघ’ के नाम स्थानान्तरित करने का पूर्ण श्रेय भी आपको जाता है। भोटिया पड़ाव को आदर्श पड़ाव बनाने का आपका सपना था जो अब एक विकसित आवासीय काॅलोनी बन चुकी है। यह स्वर्गीय जगत सिंह पांगती जी की प्रतिष्ठित सामाजिक धरोहर के रूप में याद की जाती रहेगी। इस प्रकार आप आजीवन जनसेवा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहे। स्व. जगत सिंह पांगती जी का देहावसान 6 मई 1977 को नई दिल्ली में हुआ।
कठिन दौर के लोग- भवानी देवी पंचपाल

डाॅ.पंकज उप्रेती
कठिन दौर हमें बहुत कुछ सिखा जाता है। वर्तमान की आरामतलब पीढ़ी को यदि कठिन दौर के किस्से सुनाये जाएं तो वह आश्चर्य करती हैं लेकिन उन्हें यह जरूर बताये जाने चाहिये ताकि वह अपनी जड़ों से जुड़े रहेें। और जान सकें कि जितना भी वह आज बन पाये हैं इसके पीछे संघर्षों की लम्बी गाथा है। कठिन दौर सबका होता है, हर युग में होता है लेकिन किसी की परीक्षा ज्यादा ही होती है। कई दुश्वारियों के साथ कुछ लोग रास्ता बना लेते हैं और कुछ हार मानकर टूट जाते हैं। हमारे सीमान्त क्षेत्रा में तो यह स्थिति और भी विकट रही है। सड़क, बिजली, अस्पताल, स्कूल, संचार से दूर रहकर भी हौंसले के साथ रहना पहाड़ की आदत रही है परन्तु यदि इसमें भी आपदा-विपदा हमें घेर ले तो परीक्षा कई गुना हो जाती है। इसी प्रकार की तमाम परेशानियों में घिरकर आगे बढ़ी हैं- भवानी देवी पंचपाल। मुनस्यारी के तल्लाघोरपट्टा से अपने परिवार के साथ यह ध्रमघर की होकर रह गई। 82 वर्षीय भवानी देवी अतीत के उस दौर को याद कर फफकते हुए रो पड़ती हैं। पति के निधन के बाद जिन परेशानियों से वह घिरी उससे उबरने का साहस उन्हें हिमालय ने दिया। वह हिमालय जो दृढ़ रहता है, अटल रहता है, पिघल कर भी जीवन देता है।
भवानी देवी कहती हैं- ‘‘बा बोक बोकबेर जांछि।’’ कनोल ;नाचनी के पास निवासी पिता केशर सिंह धर्मशक्तू व माता कुशा धर्मशक्तू के घर में जन्मी भवानी देवी का सात वर्ष की आयु में तल्ला घोरपट्टा निवासी रामसिंह पंचपाल के साथ विवाह हो गया था। तब छुटपन में ही विवाह का रिवाज था। इनके ससुर रतन सिंह छुटपुट कारोबार करते थे। परिवार के सदस्य अपने जानवरों सहित जोहार यात्रा पर जाता था और परिवार की गुजर-बसर चल रही थी। घोड़ा, भेड़-बकरी, गाय-बैल सहित परिवार एक छोर से दूसरे छोर परम्परागत माइग्रेशन क्रम से अपने में जुटा था। रामसिंह पत्थर तक तोड़कर मजदूरी करने में पीछे नहीं थे। कठोर लेकिन प्रकृति के करीब की इस दिनचर्या में भी परिवार खुश था लेकिन एक दिन अचानक राम सिंह का निधन हो गया। इस समय परिवार में चार छोटे-छोटे बच्चे अपनी माँ भवानी के साथ थे। इसमें बसन्ती पांगती, प्रेमा बृजवाल, जगत सिंह पंचपाल ;बैक से सेवानिवृत्त, डी.एस. पंचपाल ;वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी भा.कृषि अनुसंधान केन्द्र अल्मोड़ा हैं। वर्षों के संघर्ष के बाद परिवार ने समाज में अपनी जगह अपने आप से बनाई।
भवानी देवी बताती हैं कि पति रामसिंह जी के निधन के समय सबसे छोटो पुत्र देबू; देवसिंह चार साल का था। परिवार को नानी गोविन्दी पांगती ने पाला। मुनस्यारी तल्ला घोरपट्टा छोड़कर परिवार धरमघर आ गया। सबलोग मिलकर उन के कारोबार, दन-चुटके बनाने से लेकर कृषि कर्म में जुट गये। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी इधर-उधर कई जगह हुई लेकिन साहस के साथ उन्होंने पढ़ाई भी की। बाद के दिनों मंे बहन बसन्ती अपने भाई जगह-देवेन्द्र की संरक्षक के रूप में सक्रिय हो गई और पठन-पाठन में यह आगे बढ़ गये।
भवानी देवी पंचपाल आज अपने भरेपूरे परिवार के साथ है लेकिन उन घटनाओं का स्मरण करती है जब कठिन दौर में उन्हें किसी ने संरक्षण दिया। साथ ही उन घटनाओं को भी नहीं भूली है जिन लोगों ने उन्हें चुनौती दी और दूरी बना ली। बचपन के श्रम और जीवन की सच्चाई से दो-चार हुए डी.एस. पंचपाल कहते हैं कि स्कूल जाने से पहले वह धान कूटते थे।
सचमुच संघर्ष की कहानी आनन्ददायी होती है, जो हमें अपनों से जोड़े रखती है। जीवन-जगह का सत्य पहचाने में मदद करती है।
जानवर भी शान थे हरिप्रदर्शनी के

पि.हि. प्रतिनिधि
आज स्वच्छता को लेकर तमाम तरह के अभियान चलाये जा रहे हैं, उसके बाद गन्दगी से निजात नहीं मिल रही है। इसका एक ही तरकी है कि हम अपने आप से सुधर जाएं। इसके लिये सीमान्त क्षेत्र जोहार के पुराने उदाहरण देखे जा सकते हैं। किसी भी त्यौहार पर ग्रामवासी मिलकर चारों ओर सफाई अभियान चलाते थे। इसी प्रकार घरों में सफाई होती थी, बाद में एक टीम घर-घर निरीक्षण करती थी, जो घर सबसे स्वच्छ हो उसे पुरस्कार दिया जाता था।
जोहार और हरिप्रदर्शनी पर बातचीत करते हुए कर्ण सिंह जंगपांगी यह जानकारी देेते हैं। केदार सिंह जंगपांगी और श्रीमती राजी देवी के पुत्र लखनउ निवासी कर्ण सिंह चार भाई-बहिनों में सबसे बड़े हैं। कर्ण सिंह, बहादुर सिंह, दिनेश सिंह भाईयों के अलावा इनकी बहन जमुना हैं। सीमान्त के इस परिवार ने उन्हीं परम्पराओं का अनुसरण किया जो देखा। कर्मठता और दृढ़ता के साथ परिवार के सदस्य आज उच्चपदों पर हैं।
जोहार से लेकर निचली घाटियों तक की यात्राओं के किस्सों के साथ ही मल्ला दुम्मर की हरिप्रदर्शन की यादें कर्ण सिंह को ताजा हैं। वह बताते हैं कि प्रदर्शनी में लोग अपने-अपने जानवर भी लाते थे। घोड़े, भेड़-बकरियों के साथ प्रदर्शनी में प्रतियोगिता होती थी। तकुला दंगल ;चरखा कताई के लिये भी उत्सुकता रहती थी। निश्चित समय पर जो सबसे अच्छा और ज्यादा उन कातता था उसे पुरस्कृत किया जाता था। इसी प्रकार जड़ी-बूटियों, कृषि औजार, घरेलू उत्पात, उनी कारोबार को लेकर बहुत उत्साह था। समय के साथ लोगों की रुचियाँ बदली हैं। बाजार न होने के कारण भी इस प्रकार के उद्योग-धन्धे पर प्रभाव पड़ा है। श्री जंगपांगी सभी से अपील करते हैं कि वह अपनी जड़ों को टटोलें, जिन कठिनाईयों से घरेलू उद्योग धन्धे स्थापित किये गये थे, उन्हें बरकरार रखा जाए। इन्हीं सब बातों के लिये हरि प्रदर्शनी की परिकल्पना थी। जोहार के स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने के साथ ही नई पीढ़ियों का मिलन मल्ला जोहार का यह आयोजन है।
समर्पित गुरुजनों से संवारा जीवन जो हमेशा याद रहेंगे

पि.हि. प्रतिनिधि
हल्द्वानी। आज स्कूल-कालेजों में नवाचार को लेकर बहुत हल्ला किया जा रहा है जबकि पहले से गुरुजन पढ़ाने के साथ साथ समाज संवारने को अपनी जिम्मेदारी समझते थे और उनका समर्पण विद्यार्थियों का जीवन संवारने वाला था।
तेजम के पुराने दिनों को याद करते हुए चन्दन सिंह रावत बताते हैं कि विशम्भरदत्त जोशी जी प्रा.पाठशाला में गुरु जी थे, जिन्होंने खेल-खेल में बच्चों का जीवन संवारा। वह पहले धापा में भी रहे। धापा से तेजम आने के बाद ग्रामीण परिस्थितियों में वहां के अनुरूप बच्चों को सिखाते थे। बताते चलें कि तेजम के प्रहलाद सिंह जी के पुत्रों में चन्दन सिंह, डाॅ.प्रद्युमन सिंह, लक्ष्मण सिंह;लखनउ, ईश्वर सिंह ;देहरादून हैं। सारी स्थितियों को जीतने के बाद भी रावतों का यह परिवार अपने ग्राम, अपने गुरुजनों का स्मरण करता है और जुड़ा हुआ है। यह प्रेरणादायक है, यही नवाचार है।
चन्दन सिंह जी बतात हैं कि विशनदत्त मास्साब 1960 से 64 तक तेजम में रहे, जो इससे पहले मुनस्यारी के धापा में थे। स्कूल में पढ़ाई के लिये पूरा समय देने के अलावा प्रातःकाल प्रार्थना के समय ही उत्कृष्ट कार्यों के लिये बच्चों को प्रोत्साहित किया जाता था ताकि साथी बच्चे भी उससे उत्साहित हो। उदाहरण के लिये- मास्साब कहते आज फलां बालक बहुत साफ-सुथरा बनकर आया है। उसे प्रार्थना में आगे बुलाया जाता था। उसे देखकर अन्य साथी भी तैयारी करते। ग्राम को स्वच्छ रखना, जानवरों को किसी के भी खेतों में जाने से रोकने, एक-दूसरे की मदद करने जैसे विचार गुरुजन मन के भीतर कर देते थे जो आज भी हैं।
घोरपट्टा में आये थे तिब्बती तब हुई हचल-पहल

पि.हि. प्रतिनिधि
अपनी आँखों के सामने परिवार व मित्रों को तिब्बत व्यापार को जाते देखना, माइग्रेशन में इधर से उधर घुमन्तू जीवन बिताना, जोहार के अन्तिम गाँव मिलम से टोला फिर तमाम पड़ाव होते हुए दिगतड़ ;डीडीहाट और अब अपने पुत्रों के साथ हल्द्वानी और दिल्ली तक की लम्बी यात्रा के अनुभवों से भरी 85 वर्षीय मोहनी टोलिया पिघलता हिमालय से खास बातचीज में बताती है कि जब दलाईलामा तिब्बत छोड़ भारत आये तो उनके साथ कई तिब्बती दिगतड़ भी आये जो घोरपट्टा नामक स्थान पर रहे। उन दिनों दिगतड़ में काफी चहल-पहल रही। सरकार ने तिब्बत से आये लोगों के लिये घोरपट्टा में व्यवस्था की। यहां पर इन लोगों ने सड़क का कार्य भी किया। बाद में यह लोग देहरादून, हिमांचल चले गये।
मोहनी देवी मिलम के अमर सिंह सयाना की पुत्री हैं, जिनका विवाह टोला के खुशाल सिंह जी से हुआ। सीमान्त के प्राकृतिक जीवन में रमी श्रीमती मोहनी जी अपने अतीत का स्मरण करते हुए बताती हैं कि अन्तिम गांव मिलम में होने के कारण तिब्बत व्यापार का हाल देखने का सौभाग्य हुआ। तब पुरुष व्यापार के लिये तिब्बत जाते थे और महिलाएं घर में उनी कारोबार और खेती का छुटपुट कार्य करती थीं। खेतों में फांफर, आलू खूब होता था। विवाह के बाद वह अपने ससुराल टोला में थीं लेकिन व्यापार और व्यवहार की दिनचर्या वैसी ही थी। जोहार, टोला, साईपोलू, भैंसकोट बारी-बारी से वह लोग आते-जाते रहते थे। मौसम के अनुसार जोहार से लेकर मुनस्यारी तक वह लोग आते थे। तब गर्मी होते ही जोहार भागने की तैयारी करते थे। लोगों को मुनस्यारी तक की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती थी, अब महानगरों में गर्मी सह रहे हैं। बचपन से लेकर कई सालों तक की जीवन यात्रा का सिलसिलेबार वृत्तांत सुनाती हैं। इनके पुत्र-पुत्रियों में वीरेन्द्र, नवीन, लीला हुए। टोला में बालक वीरेन्द्र की बाल लीलाओं को याद करने के साथ ही वह बताती हैं कि नवीन बचपन से ही गीत-संगीत का शौकीन था। बच्चों का स्कूल दूर होने के कारण वह उनका परिवार दिगतड़ आ गया। तब लोग अपने जानवरों को लेकर दूर-दूर तक यात्राएं करते थे। दिगड़त में बड़ा सा मैदान था, जोहार से तीन परिवार शुरुआत में बसने के लिहाज से आये। हाट लगने के कारण दिगतड़ का नाम ही डीडीहाट हो गया। यहां बच्चों की पढ़ाई की सुविधा थी। पुराने परिवार में धनसिंह पांगती, कृष्ण सिंह टोलिया हुए। तब नन्दा मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर भी बनाया ताकि अपने ईष्ट को याद करने का स्थल नियत हो जाए।
आज के डीडीहाट पर चर्चा करते हुए वह कहती हैं कि बहुत बदल गया है। जिस जगह एक मैदान मात्र था, आज बाजार हो गया है और गांव से बड़ी संख्या में लोग बस चुके हैं। जब तिब्बती दिगतड़ आये थे वह मैदान में होने वाले कार्यक्रमों में अपने सांस्कृतिक प्रोग्राम दिखाने आया करते थे। स्कूल में विद्वान गुरुजन बुलाए जाते थे। शौका मास्टर भी थे जिनमें बहादुर सिंह लस्पाल भी हुए। इसके अलावा तिब्बती मास्टर भी रखे गये जो अपनी भाषा में सिखाते थे।
श्रीमती मोहनी टोलिया पि0हि0 के वरिष्ठ सदस्य रहे स्व.उमेदसिंह मर्तोलिया का स्मरण करते हुए बताती हैं कि जिस समय दलाईलामा के साथ तिब्बती दिगतड़ आये थे दरोगा साहब मर्तोलिया जी की तैनाती भी यहीं थी। उनके साथ पुत्र सुरेन्द्र भी था। वह लोग यहां रहे। समय की सीमा में बहुत कुछ बदल जाता है। आज श्रीमती टोलिया जीवन का उत्तरार्द अपने योग्य पुत्रों के साथ बिता रही हैं। वह जोहार मौसम से लेकर दिल्ली के मौसम और रहन-सहन पर खुलकर बोलती हैं। उनके मन में हमेशा जोहार बसता है और वह युवा पीढ़ी से चाहती हैं कि वह अपने संस्कृति से जुड़े रहें।
