कला-संगीत प्रेमियों के लिये उत्साह जगाने और जनमानस को झकझोरने वाला आयोजन

पि.हि. कला-संगीत समीक्षक
हल्द्वानी शहर में ‘आवाहन’ नाम से लोक उत्सव का वृहद आयोजन कला-संगीत प्रेमियों के लिये उत्साह जगाने वाला और जनमानस को झकझोरने वाला था। व्यापारिक मण्डी के अलावा तमाम तरह के अड्डों में बदलते जा रहे हल्द्वानी भाबर में इस प्रकार के आयोजन के सूत्रधार मनोज चन्दोला की जितनी प्रसंशा की जाए कम है। क्योंकि महोत्सव की बाढ़ में फंसे उत्तराखण्ड में इस प्रकार के आयोजन मुश्किल से हो हो पा रहे हैं। आयोजन को लेकर चिन्तन करने वालों में चारु तिवारी का योगदान सबसे आगे है। चन्दोला जी और तिवारी जी की जुगलबन्दी ने इस आयोजन को मूर्त रूप दिया और कई विचारधाराओं के लोगों को एकसाथ करने का काम किया। गीत-संगीत के अलावा संगीत-साहित्य के मर्मज्ञों को मंच देकर प्रोत्साहित किया।
अभिव्यक्ति कार्यशाला की ओर से देवभूमि उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत एवं लोक विधओं को सहेजने के लिये तीन दिवसीय आयोजन में दिन में सेमिनार और रात्रि में कार्यक्रम का हिस्सा था। कार्यक्रम का शुभारम्भ सांसद अजय भट्ट ने रैली को हरी झण्डी दिखाकर किया। शहर के तमाम विद्यालयों के बच्चों ने सुन्दर प्रस्तुतियों के साथ इसमें भाग लिया। मय झांकी के बच्चों ने रंग बिरंगे परिधनों में अपनी अभिव्यक्ति की। शेष तो वही होना था जो उन्हें उनके विद्यालय में तैयार करवाया गया था। सनातन धर्म संस्कृत महाविद्यालय, सिंथिया स्कूल, ललित आर्य महिला इण्टर कालेज, बीयरशिवा, रा.मा.विद्यालय नया गांव लछमपुर, द्रोण पब्लिक स्कूल, गांध्ीनगर राजकीय मा.विद्यालय, एमबी इण्टर कालेज, लक्ष्मी शिशु मन्दिर, खालसा इण्टर कालेज, रा.पूर्व.मा.विद्यालय कालाढूंगी रोड, टिक्कू माडर्न, रा.इण्टर कालेज बनभूलपुरा, महात्मा गांध्ी इण्टर कालेज के विद्यार्थी रैली में शामिल थे। आयोजन स्थल पर स्वयं सहायता समूहों की ओर से स्टाल भी लगाए गये थे। कार्यक्रम में रेशमा शाह ने जौनसारी, प्रहलाद मेहरा ने कुमाउनी गीत प्रस्तुत किये।
सेमिनार में उत्तराखण्ड की वर्तमान सांस्कृतिक परिस्थितियों पर बोलते हुए अनिल कार्की ने कहा कि इसे अपने से शुरु करना होगा, तब दूसरों से कहने के हकदार हैं। प्राध्यापक डाॅ.प्रभा पन्त ने कहा कि संस्कृति और पलायन बाधा नहीं है। जितना पलायन होगा उतना विस्तार होगा। कवि और साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली ने कहा कि भगनौल, बैर गीत हमसे दूर होते जा रहे हैं, जो चिन्ता की बात है। पत्रकार और चिन्तक ओ.पी.पाण्डे ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन संस्कृति के आधर पर हुआ था लेकिन सरकार ने आज तक संस्कृति को बचाने का रोड मैप तक तैयार नहीं किया है। लोेक गायक हीरा सिंह राणा ने ‘मुख में लागी ताई’ व्यंग गीत से कालाकारों की पीड़ा को व्यक्त किया।
दूसरे दिन के आयोजन में दिल्ली के भगवत मनराल ग्रुप का कार्यक्रम था। युगमंच की ओर से गोपुली बुब का एकाकी मंचन हुआ। नन्दलाल भारती टीम ने जौनसारी संस्कृति प्रदर्शित की। इसके अलावा फृयूजन के नाम पर शहर में हो रहे कनफ्रयूज करने वाले कार्यक्रम हुए। कार्यक्रम के अतिथि मेयर डाॅ.जोगेन्द्र रौतेला थे। इस दिन के सेमिनार में सिने कर्मी हेमन्त पाण्डे ने कहा कि लोक संस्कृति सरकार नहीं, संस्कार से बचेगी। संगीतज्ञ डाॅ.पंकज उप्रेती ने महोत्सवों के नाम पर हो रहे छलावे पर चिन्ता व्यक्त की। नन्दलाल भारती ने कहा कि आर्थिक उदारीकरण होने के बाद अपसंस्कृति का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। डाॅ.माध्ुरी बड़थ्वाल ने कई शानदार उदाहरण देकर अपने लोग गीतों को बचाने का आहवान किया।
समारोह के तीसरे यानी अन्तिम दिन भगवत मनराल व साथियों के अलावा अमित गोस्वामी, दीपा नगरकोटी, मनोज चड्ढा, रोहन भारद्वाज, करिश्मा, खुशी जोशी ने प्रस्तुति दी। आयोजन के तीनों दिनों में शहर की स्थानीय संस्थाओं ने प्रस्तुतियां दीं। जिसमें शास्त्राीय संगीत को लेकर फृयूजन कहा गया लेकिन संगीत की दृष्टि से वह खरा नहीं कहा जा सकता है। दरअसल अपने प्रचार के लिये व बहलावे के लिये इस प्रकार के प्रयोग किये जाने लगे हैं जिसमें गायन, वादन, नृत्य के धमाल को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। चूंकि सीखने वाले बच्चे वही करने लगते हैं जो उन्हें बताया गया है सो वह एक शो के रूप में भीड़ के आगे परोस दिया जाता है। ऐसे में न शास्त्रीयता होती है और न लोक का नृत्यगीत। तीसरे दिन के सेमिनार में उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना और यथार्थ विषय पर वक्ताओं ने विचार रखते हुए संघर्षश्ीाल ताकतों को आगे आने को ललकारा। कवि बल्लीसिंह चीमा ने कविता के माध्यम से अपना दर्द कहा- ‘मैं किसान हँू, मेरा हाल क्या, मैं तो आसमां की दया से हँू।’’ उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पी.सी. तिवारी कहा कि राज्य गठन के बाद कांग्रेस और भाजपा के हाथ में प्रदेश की सत्ता आने से राज्य गठन की परिकल्पना ध्वस्त हो गई। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक रूप से राज्य पिछड़ गया। उत्तराखण्ड पत्रकारिता विभाग के प्रो.भूपेन सिंह ने कहा कि सरकारों ने पर्वतीय राज्य की अवधरणा को पूरी तरह मटियामेट कर दिया है। नया भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग उभर रहा है। सत्ता में बदल-बदल कर आ रहे इन चेहरों ने समाज को भी भ्रष्ट बना दिया है। एंकर आरजे काव्या ने कहा कि हमारी संस्कृति के संरक्षण के लिये हमें स्वयं ही पहल करनी होगी। पत्रकार रूपेश ने कहा कि 10 साल के राज्य में मूल्यांकन का समय है। आयोजन के दौरान डाॅ.प्रयाग जोशी, नवीन वर्मा, मोहन बोरा, हेमन्त बोरा, अमिशा पाण्डे, नवीन पाण्डे, योगेश पन्त, विजय बिष्ट, टीसी उप्रेती, दीपक बल्यूटिया, प्रवीन रौतेला, भावना पन्त, प्रकाश भट्ट, लता कुंजवाल, कमल मठपाल, जीत राम, ललित पन्त, बबीता उप्रेती उपस्थित थे।

कुमाउँ विश्वविद्यालय को याद नहीं आ रहे हैं संस्थापक कुलपति

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
कुमाउँ विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति, भौतिक विज्ञानी प्रो.डी.डी.पन्त का जन्म शताब्दी समारोह उनके चाहने वाले, उनके साथी, उनके शिष्य ध्ूमधम से मना रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय पन्त जी को भूल ही गया। इसके अलावा किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह पहाड़ के इस विवि प्रशासन से कह सके कि आयोजन के लिये आगे आओ। महान भौतिक विज्ञानी, कुविवि के कुलपति, उक्रांद के संस्थापक, समाज विज्ञानी प्रो. पन्त की याद में विवि में कुछ होना ही चाहिये, ऐसी मंशा सभी की है परन्तु अपनी कारगुजारी के लिये बेहद चर्चा में बने हुए इस विवि इस बारे में कुछ सोच भी सकता है ऐसा अभी नहीं लगता। कारण विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.एस.राणा को विश्वविद्यालय से ज्यादा उत्तराखण्ड की चिन्ता हो रही है। उनके कई चर्चित बयान सबकी जुंवा पर हैं। साथ ही विवेकानन्द, रविन्द्रनाथ टौगोर को लेकर वह कुछ नया करने की बात कर रहे हैं। पूर्व प्रधानीमंत्री अटल जी के नाम पर भी एक विभाग का नाम रख दिया गया है। लगता है राणा जी बहुत दूर की सोच कर चल रहे हैं शायद तभी उनके बयान भी आते-आते जारी हो गये थे। स्व.डी.डी.पन्त जो पहाड़ के बारे में सोचते थे, विज्ञान के बारे में सोचते थे, समाज के बारे में सोचते थे, उनपर सोचने के लिये अब विवि के पास अवसर ही नहीं है। ऐसे समय में जबकि प्रो.पन्त की जन्म शताब्दी समारोह पर दांये बांये कई गतिविधियां हुई, विवि मौन रहा।
उल्लेखनीय है कि प्रो.पन्त के शताब्दी समारोह को भव्य बनाने को लेकर नैनीताल में बैठक हुई थी और पिछले कुलपित प्रो. डी.के. नोडियाल ने विवि की ओर से इस बारे में सकारात्मक बात दोहराई थी। हालांकि बैठक करवाने वाले नैनीताल के लोग, पन्त जी से जुड़े लोग, उनके शिष्य, उनके चाहने वाले, समाजसेवी थे। समय गतिमान है। प्रो.नोडियाल को कुविवि की लीला जितनी समझ आती उससे पहले उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। दरअसल कुलपति अकादमिक कार्य करने वाले थे और वह प्रशासनिक कार्यों में राजनीति का घोल नहीं बना पा रहे थे। इसके बाद प्रो.राणा को कुलपति बनाकर भेजा गया। आगरा निवासी राणा के आने से पहले ही चर्चा फैल गई कि बहुत पकड़ वाले हैं। अब स्थायी कुलपति के लिये चल कार्यवाही में भी इनकी बात सबसे आगे है। उत्तराखण्ड राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिये यूपी के तीन मैदानी जिलों को इसमें मिलाने का बयान देने वाले प्रो. राणा शायद पता न हो कि प्रो.डी.डी.पन्त वैज्ञानिक होने के साथ ही समाजविज्ञानी थे। समाज की व्यवहारिकता को जानते थे और इसी लिये उन्होंने उत्तराखण्ड क्रान्तिदल में रहना पसन्द किया। राजनीति से दूर पन्त जी पहाड़ के दर्द को जानते थे। इसीलिये तमाम अवसरों के बावजूद वह नैनीताल में ही रहे और अन्त में हल्द्वानी में रहने लगे थे।
कुलपति डाॅ. डी.डी.पन्त के जन्म शताब्दी समारोह को लेकर पहाड़ सहित अन्य संस्थाओं ने शुरुआत की। यहाँ पर सबसे पहले आशुतोष उपाध्याय का उल्लेख करना जरूरी है क्योंकि डी.डी. पन्त को लेकर वह शुरु से ही कुछ करते रहे हैं। उनके सद्प्रयास से डी.डी.पन्त खोजशाला के रूप में गतिविधियां होती रहती हैं। बेरीनाग में इस प्रकार के आयोजन वह करवाते रहे हैं। अन्य स्थानों में भी वैज्ञानिक सोच पैदा करने के लिये वह संस्था के रूप में संलग्न हैं। आशुतोश उपाध्याय की सोच पहले से इस ओर थी कि प्रो.पन्त जैसे महान व्यक्ति को भुलाया जाना गलत होगा, कुछ होना चाहिये। इस बीच शताब्दी समारोह आयोजन को लेकर जो श्रृंखला शुरु हुई उसमें बेरीनाग, काण्डा, हल्द्वानी, पिथौरागढ़ में लोग जुटे। संस्था चाहे कोई हो, पन्त को समझने वाले लोगों का जुटना बड़ी उपलब्धि कहा जायेगा। इसी क्रम में हल्द्वानी में हुए आयोजन में वक्ताओं ने कहा कि डाॅ. पन्त जैसे व्यक्तित्व कभी कभार ही पैदा होते हैं। उन्होंने कुमाउँ विश्वविद्यालय को जिस तरह से अकादमिक उँचाईयों पर पहँुचाया, वह आज भी एक उपलब्धिहै। डाॅ.पन्त को अपने देश व समाज से बहुत ही प्यार था, इसी कारण से उन्होंने अमेरिका में अपना भविष्य तलाशने की बजाय भारत में ही रहना पसन्द किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महापौर डाॅ. जोगेन्द्र पाल सिंह रौतेला ने कहा कि डाॅ. पन्त हमारी विशिष्ट पहचान थे। उनका कुमाउँ विश्वविद्यालय से जुड़ा रहना हमारे लिए गौरव की बात रही है। उन्होंने अपने निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों को उच्चकोटि के शोध् कार्य करवाए। वरिष्ठ पत्रकार राजीवलोचन साह ने कहा कि उत्तराखण्ड के विकास को लेकर उनकी अपनी अलग सोच थी, इसी छटपटाहट में वह यूकेडी से भी जुड़े जबकि वह राजनीति से वास्ता नहीं रखते थे। पन्त के मायने आज भी समझने की जरूरत है। प्रो. शेखर पाठक ने उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डाॅ.पन्त नैनीताल के डीएसबी कालेज में भौतिक विषय के संस्थापक रहे। उन्होंने प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो.सी.वी.रमन के निर्देशन में भौतिकी में अपना शोध् पूरा किया। प्रो.रमन ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें भविष्य का वैज्ञानिक घोषित किया था। बाद में अपनी प्रतिभा के कारण ही उन्हें एक फेलोशिप के लिये अमेरिका जाने का अवसर मिला। वहाँ शोध् करने के दौरान उन्हें अमेरिका के अनेक उच्च कोटि के संस्थानों ने अपने यहाँ नौकरी करने का अनुरोध् किया। पर डाॅ.पन्त ने अमेरिका में अच्छी सुविधओं वाली नौकरी करने के बजाय अपने देश और अपनी मातृभूमि उत्तराखण्ड लौटना स्वीकार किया। अपने इसी प्रण के कारण उन्होंने कुमाउँफ विवि के सहारे यहाँ की उच्चशिक्षा को एक नया आयाम दिया।
प्रो.गिरिजा पाण्डे ने कहा कि डाॅ.पन्त को समझना और जानना अपने पूरे समाज को समझने और जानने की तरह है। उनके शताब्दी समारोह के बहाने हम पूरे पहाड़ को भी पूरी समग्रता के साथ समझ सकते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो.कविता पाण्डे ने कहा कि भौतिक विज्ञान के क्षेत्रा में उनके द्वारा किये गये शोध् कार्यों को हमेशा याद रखा जायेगा। प्रो. बीएस बिष्ट पूर्व कुलपति, प्रो. केसी जोशी पूर्व कुलपति, प्रो. एचबी त्रिपाठी, प्रो.प्रीति गंगोला जोशी, डाॅ.आई.डी. पाण्डे, ध्नेश पाण्डे, हृदयेश मिश्रा, प्रो.प्रभात उप्रेती, उमेश तिवारी विश्वास, ओपी पाण्डे ने डाॅ.पन्त की स्मृतियों को श्रोताओं के सम्मुख रखा। जन्म शताब्दी समारोह में हरीश पन्त, जगमोहन रौतेला, ओ.पी.पाण्डे, दिवाकर भट्ट, बबीता उप्रेती, प्रदीप लोहनी, मयंक जोशी, सहर्ष पाण्डे, अनिल कार्की, पंकज उप्रेती, विनोद जीना, रेखा जोशी, सतीश जोशी, पंकज पाण्डे, सुनील पन्त, कर्नल आलोक पाण्डे, पूरन बिष्ट सहित तमाम लोग थे।

टलकपुर से टनकपुर का सफर

कभी तो लहर आयेगी इस माल-भाबर में

चन्द्र सिंह वृजवाल
चम्पावत/टनकपुर। टनकपुर का ‘मिशन हाउस’ 19वीं शताब्दी के उत्तराद्ध में निर्मित, यह शहर के उत्तर पूर्व में शारदा नदी के तट पर स्थित है जो आज इस जर्जर हालत में भी अपने शहर के समृद्ध इतिहास और नैसर्गिक सुन्दरता का गवाह है।

उत्तराखण्ड राज्य बने वर्षों बीत चुके हैं लेकिन पुरानी मण्डी और पहाड़ के प्रवेश द्वार के रूप में विख्यात टनकपुर विकास की रफ्रतार नहीं पकड़ सका। माँ पूर्णागिरी का प्रवेश द्वार भी टनकपुर है। फिर भी उम्मीद है कि कभी तो लहर आयेगी इस माल-भाबर क्षेत्र में।

यह नेपाल की सीमा से लगा एक छोटा सा गाँव था। यहाँ से तीन मील की दूरी पर ब्रह्मदेव मण्डी थी, जिसे कत्यूरी राजाओं ने बसाया, कालान्तर में भूस्खलन होने के कारण ब्रह्मदेव मण्डी समाप्त हो गई। और इस नगर का निर्माण 1898 में नेपाल की ब्रह्मदेव मण्डी के विकल्प के रूप में किया गया था। आंकड़ों की बात करें तो सन् 1901 में इसकी कुल जनसंख्या मात्र 692 थी।
सर्वप्रथम सन् 1890 में एक अंग्रेज सैलानी मि. टलक यहाँ आया और उन्हें इस स्थल की प्राकृतिक सुन्दरता ने बेहद प्रभावित किया और उन्होंने सबसे पहले बगडोरा ;सैलानी गोठद्ध में आवास के लिये एक बंगला बनवाया और ध्ीरे-ध्ीरे सुनियोजित ढंग से कस्बे को स्थापित किया। आगे चलकर इस कस्बे को टलक के नाम से ‘टलकपुर’ कहा जाने लगा। कालान्तर में शहर के तस्वीर के साथ नाम के उच्चारण में भी बदलाव आया और इतिहास को नजरअंदाज करते हुए स्थानीय लोगों ने टलकपुर को टनकपुर कहना प्रारम्भ कर दिया। मुड़ कर देखें तो देश की आजादी के साथ शहर के नाम का विवाद भी दफन हो गया।
यहाँ की सुनियोजित ढंग से निर्मित बाजार, चैड़ी खुली हुई सड़कें, फैले हुए फुटपाथ, खुली हवादार कालोनियां इसकी विशिष्टता वयां करता है। पूर्णागिरी मन्दिर के मुख्य द्वार के रूप में शारदा नदी के तट पर बसा यह कुमाउँ की प्रमुख मण्डी ;व्यापारिक केन्द्र था, जहाँ कत्यूरी शासन से लेकर देश की आजादी के कई वर्षों बाद तक जोहार, दारमा और व्यास घाटियों के भोटिया ;शौका, नेपाल से नेपाली, देश के मैदानी क्षेत्र से व विदेशी व्यापारी यहाँ आकर व्यापार करते थे। टनकपुर ब्रिटिश शासन भारत में कुमाउँ का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था। क्षेत्र के स्थानीय उत्पादों में इमारती लकड़ी, कत्था, पेड़ों की छाल, शहद और अन्य छोटे जंगली उत्पाद आदि शामिल थे, जिनका व्यापार नवम्बर और मई के बीच होता था। यहाँ भोटिया ;शौका व्यापारी तिब्बत से उन और सुहागा नीचे लाया करते थे, और बदले में शक्कर व कपड़े वापस ले जाते थे। दूसरी ओर चीनी, नमक, हल्दी, मिर्च और घी अल्मोड़ा और नेपाल के पहाड़ी बाजारों से आयात किया जाता था। 19वीं शताब्दी के  उत्तराद्ध में यहाँ अवध्-तिरहुत रेल कम्पनी द्वारा पीलीभीत टनकपुर रेल लाइन निर्माण किया गया जो चम्पावत तथा पिथौरागढ़ के लिये अन्तिम रेलवे स्टेशन है।

यद्यपि इस शहर ने अनेक मुश्किलों के दौर देखे हैं किन्तु अब यह शहर रेलवे बड़ी लाइन व राष्ट्रीय राजमार्ग से देश के प्रमुख शहरों से जुड़ने के बाद बहुत उम्मीदों के साथ आगे बढ़ रहा है। यहाँ पर्यटन, व्यापार व परिवहन क्षेत्र में रोजगार वृद्धि की पूरी सम्भावना है। टनकपुर अब ध्ीरे-ध्ीरे शिक्षा-चिकित्सा व यातायात के कारण विशेष आकर्षण केन्द्र बन गया है।

संघर्षमय रहा जिनका पूरा जीवन

पत्रकारिता के मिशन को जिस लगन से स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने शुरू किया था, उसे बनाये रखने वाली कमला उप्रेती की 15 सितम्बर 2019 को प्रथम पुण्यतिथि है।
जिन्दगी को आन्दोलन बना चुके आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते हुए आपने किसी से कोई शिकायत नहीं की। जिन्दगी के सफर में रोग-शोक से लड़कर भी बच्चों को हौंसला दिया। घर-परिवार और गाँव के सारे लोगों को आपका ममतामयी स्पर्श हमेशा बांधे रहा। अपने सीमित साधनों में घर-गृहस्थी चलाते हुए सामाजिक आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका आपने निभाई। बहुत विपरीत स्थितियों में भी आपके बोल संस्कारों से भरे थे। ‘जशौदा मैया तेर कन्हैया बड़ो झगड़ी, झन लगाया गोरु-ग्व्ाला हमन दगड़ी’ जैसे भजनों से लेकर होली के आशीष तक के गीत गाने वाली इस माँ ने जीवन की सच्चाई को हमेशा सामने रखा और गुनगुनाया- ‘संग्राम जिन्दगी है लड़ना इसे पड़ेगा….।’
66 वर्ष की आयु में अन्तिम सांस तक अपने मिशन के लिये जिस साहस से आप लड़ीं वह चिंगारी बुझ नहीं सकती है। पिघलता हिमालय का यह अंक आपको समर्पित।

पत्रकार ऐसे ही नहीं बन जाते हैं

स्व.कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि पर सम्पादकीय
आज जब पत्रकारिता की बात होती है तो इसे बहुत हल्के में लिया जाता है, कारण इसे बना ही ऐसा दिया गया है। पत्र और पत्रकार जन चेतना के अग्रदूत होते हैं। उनसे आन्दोलन और आन्दोलन से वह होते हैं। उनका पठन-पाठन और उनके संस्कार उनकी कलम में दिखाई देते हैं। वर्तमान में जब समाचार-संदेश देने के लिये द्रुतगामी व्यवस्थायें हैं पत्रकारिता जगत में हलचल मच चुकी है। होड़ में जल्द से जल्द समाचार परोसने और कारोबार को बढ़ाने के लिये विज्ञापनों के लिये सर माथा पीटने का अभियान चल पड़ा है। समाचार पत्रों की दयनीयता इससे ही समझी जा सकती है कि उन्हें बाजार में स्थापित होने के लिये नित नये अभियान चलाने पड़ रहे हैं। प्रबुद्ध पाठक चर्चा करने लगा है कि अखबार में समाचार पढ़ें या विज्ञापन। कई पेजों के विज्ञापन का पुलिन्दा और उपर से सैकड़ों नामों से भरी कोई सूचना या चटपटी प्रस्तुति को आज का युवा पत्रकार पत्रकारिता बता रहे हैं। यदि कोई पत्रकारिता के ज्ञान को लेकर प्रयोग करना चाहे तो उसके लिये शायद ही किसी मीडिया घराने के दरवाजे खुलें, क्योंकि भीड़ में अपनी मुंडी उपर निकालने के लिये सार्टकट रास्ता तलाशा जा रहा है। ऐसे में साहित्य की पत्रकारिता वाली धारा की बात हो ही नहीं सकती है। यदि कोई अपने आप से हिम्मत करता है तो वह छोटे या मझले समाचार पत्रों की श्रेणी में है। ऐसे समाचार पत्रों के सामने चुनौती ज्यादा हैं। तुरन्त लाभ के लिये कोई भी सरकार उन समाचार पत्रों को चुनने लगी है जिसे वह तत्काल विज्ञापन देकर अपनी बात मनवा सके। ऐसा ही लाभ निजी संस्थान व धन्धेबाज भी चाहने लगे हैं। यदि नहीं चाहते हैं तो उन्हें विज्ञापन के लिये मजबूर किया जा रहा है। सोचनीय है कि आजादी के 70 साल बाद भी भीड़ में खड़े रहने के लिये इतना ही साहस बटोर सके हैं हम।

पत्र और पत्रकारिता के लिये मिशन का होना जरूरी है। इस मिशन को यदि हम स्वीकारते हैं तो पूरी ईमानदारी जरूरी है। लेकिन क्या हमारी व्यवस्था का ढांचा ऐसा होने दे रहा है? वह कागजों में उलझाये रखना चाहता है और सारे मीडिया घराने चिल्लाते हैं- ‘नम्बर वन’। इन सबके बाद भी पत्रकारिता के मिशन को बनाये रखने के लिये दुनिया में बहुत से महानुभाव संकल्पित हैं। उन्हीं में से थीं- कमला उप्रेती। किसी की जिन्दगी पूरी तरह संग्राम बन जाती है और इस संग्राम में जो लड़ता है वह योद्धा है। ऐसी ही योद्धा थी ईजा। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उसने जुड़ी अनगिनत यादें हैं। ‘पिघलता हिमालय’ को बनाने में ईजा का घोर संग्राम रहा है। यह कहानी 1964 से शुरु हो जाती है जब स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी ने छापाखाना खोला। पहले छापाखाने की बहुत इज्जत हुआ करती थी। ‘शक्ति प्रेस’ नाम से खुले छापाखाना में बाईडिंग, परफेटिंग, रूलिंग, कम्पोजिंग, प्रिंटिंग हर प्रकार का काम होता था। इसी छापेखाने में बहुत बड़ी टेªडिल मशीन हुआ करती थी, पूरे ट्रक के बराबर। जिसमें दैनिक पिघलता हिमालय भी छपा। बाद में छोटे आकार की टैªडिल मशीन वगैरह भी प्रेस में लगाई गईं। इन मशीनों में अनगिनत मशीनमैन, कम्पोजिंग में अनगिनत कम्पोजिटर रहे हैं। छापाखाने मे प्रतिस्पद्र्धा नहीं थी और शादीकार्ड, बिलबुक इत्यादि के ग्राहकों के अलावा लिखने-पढ़ने वालों का अड्डा छापाखाने ही हुआ करते थे। आजकल तो प्रिंटिंग प्रेस लिखना आसान हो चुका है। और प्रतिद्वंद्वी अपने ग्राहकों को ढूंढने के लिये दौड़ते हैं, सरकारी काम के लिये तिकड़मबाजी करनी पड़ती है। पहले पोस्टर, पर्चे, कार्ड छपवाने वालों में आन्दोलनकारी, समाज सेवी, पुस्तकें-फोल्डर-पर्चे छपवाने के लिये लेखक, कुछ खास-खास लोग शादीकार्ड छपवाने के लिये छापेखाने तक आते थे। प्रेस की बड़ी जिम्मेदारी थी और लोगों को भरोसा था कि उनकी गलतियों को भी सुधर कर छापा जायेगा। तब एफएस, एफोर, एथ्री जैसे कागज साइजों को नहीं जानते थे बल्कि रिमों के साइजों के बाद कागज कटिंग होती थी। आज भी बड़े छापेखानों में यही होता है। खैर, बात पिघलता हिमालय की हो रही थी। 1978 में पिघलता हिमालय शुरु हुई, बहुत उत्साह था आनन्द बल्लभ उप्रेती जी और दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी में। इनका जोश अखबार को दैनिक में तक बदल गया। लेकिन जीवन के संग्राम में यह उलझ कर रह गये। दुर्दिनों की वह कहानी बहुत लम्बी है………….

कमला उप्रेती ने अपने पति के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर छापाखाना और अखबार सींचा। लोहे की उन भारी मशीनों की खटखट आवाजों में कागज को मशीन में लगाने और उठाने में सावधनी चाहिये। कई ऐसे अवसर थे जब कमला जी मशीनमैन आनन्द बल्लभ जी के साथ हैल्पर बनी। तब आजकल की तरह सुविधाएं और साधन भी नहीं थे। डाक से जाने वाले अखबारों में पते लिखने में भी वह सहायक थी। अखबार की प्रूफरीडिंग का काम भी वह करती और कभी लिखने बैठ जाती। पत्रकार बनने की शुरुआत ही पठन-पाठन के अलावा कम्पोजिंग से होती थी जैसे आजकल कम्प्यूटर की जानकारी जरूरी है। उप्रेती जी के निधन के बाद उन्होंने पत्र का सम्पादन किया। समय बदला है लेकिन हमारे मूल्य और संस्कार बने रहने चाहिये। पत्रकारिता के कोई मायने होते हैं। इसकी पवित्रता बनी रहे, इसका मिशन बना रहे, इसका आन्दोलन चलता रहे। इसके लिये आम पाठकगण को भी विचार करना चाहिये। आज ईजा स्व. कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि में उनका स्मरण हमें खुशी और आँसू के साथ साहस दे रहा है। उसकी जिद, उसकी लगन, उसका संघर्ष हमें याद दिलाता रहेगा कि योद्धा संग्राम में विचलित नहीं होते।

सामाजिक आन्दोलनों में राजनीति ठुकराई कमला जी ने

टी.सी.पपनै
कमला बहिन जी से मेरा सम्पर्क सन् 1990 से था जब मैं लोक चेतना मंच से जुड़ा। बहिन जी एक प्रखर समाज सेविका के साथ महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रबल कार्यकर्ता भी थी। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से तो मेरा सम्पर्क वर्ष 1980 से था ही जब हम लोग साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर मिला करते थे। उप्रेती परिवार से मेरा पारिवारिक सम्बन्ध् रहा है। एक दुर्घटना में जब मेरा हाथ फैक्चर हुआ था और मैं अस्पताल में भर्ती था तो बहिन जी ने जिस आत्मभाव से साथ दिया मैं कभी नहीं भूल सकता।
श्रीमती कमला उप्रेती आन्दोलनों की अगुवाई में कभी अग्रिम पंक्ति में रहती थीं तो कभी सबको धकेलने के लिये पीछे अपने साथियों के साथ। आन्दोलनों में उनका यह स्वभाव ‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन’ में खूब दिखाई दिया। पृथक राज्य के लिये लड़ी गई लड़ाई में उन्हें भी आम आन्दोलनकारियों की तरह कोई गुमान नहीं था। बस, आन्दोलनकारी होने की खुशी थी। राज्य के लिये छिड़े ऐतिहासिक आन्दोलन में वह हल्द्वानी की सड़कों पर महिला शक्ति के साथ निरन्तर रहीं। होने वाली सभाओं की अध्यक्षता करते हुए वह युवा आन्दोलनकारियों को ललकाती थीं- ‘यह लड़ाई बच्चों के भविष्य की लड़ाई थी। इसका नेतृत्व स्वयं करना होगा।’
राज्य आन्दोलन के दौरान हल्द्वानी में हुए पुलिस लाठीचार्ज में घायलों में वह भी थीं। लेकिन उन्होंने प्रतिदिन होने वाले प्रदर्शन में जाना नहीं छोड़ा। राज्य बनने और उसके नाम पर सुविधा लेने वालों की होड़ कमला जी को बेचैन करती थी। वह कहतीं- ‘राज्य की लड़ाई नेता बनने के लिये थोड़ा ही लड़ी है।’ बाद को जब राज्य आन्दोलनकारियों को सरकार की ओर से प्रमाण पत्र दिये गये तो उन्हें भी इसके लिये बुलवाया गया। जब सरकार द्वारा राज्य आन्दोलनकारियों के लिये पेंशन प्रावधन किया गया, वह हँसती और कहती- ‘‘अब मैं पेंशन वाली हो गई हँू।’ क्योंकि जरूरत के समय भी उन्होंने सरकार से ऐसी याचना नहीं की थी। न ही उनके मन में कभी ऐसा विचार आया।
नेतृत्व का गुण उन्हें नेता बनाये हुआ था लेकिन अपने संस्कार और गृहस्थी के साथ सामंजस्य रखते हुए वह केवल सामाजिक आन्दोलनों का हिस्सा बनी। भ्रष्टाचार के खिलापफ वह एकदम गरज पड़ती थी। उनकी सभी महिला साथी आज उन्हें याद करती हैं, जो जानती हैं कि सामाजिक आन्दोलनों के आगे पहली जिम्मेदारी घर-गृहस्थी है। घर को संवार देना किसी भी महिला का सबसे बड़ा आन्दोलन है। वह धर्मपरायण थी लेकिन मंच सजाकर ढोंग का प्रवचन करने वालों के खिलाफ मुखर थीं। श्रीमती उप्रेती के सामने राजनीति के कई मौके आये लेकिन वह टाल गईं। वह जानती थी कि एक-एक, दो-दो व्यक्तियों की पार्टी भी उत्तराखण्ड में बनी हुई है। उत्तराखण्ड क्रान्तिदल को क्षेत्रीय पार्टी के रूप में वह पसन्द करती थीं। इसके अलावा बड़ी पार्टियों की नीतियाँ उन्हें रास नहीं आई। भीड़ एकत्रित करने के लिये वह मनोनीत होने से भी मना कर देती। हाँ, किसी भी पार्टी की जो बात उन्हें भा जाती उसमें वह समर्थन करती। इसके लिये वह भाकपा माले के प्रदर्शन में भी शामिल हुई थी। कांग्रेस के समर्थन में जुटी थीं। कांग्रेस की अकड़ पर भाजपा के नेता का समर्थन किया था। स्पष्ट निर्णय लेने वाली समाजवादी पार्टी के लिये भी वह बोली और जनता पार्टी के समय उसकी नीतियों पर भी उसके साथ थी। राष्ट्रीय दलों से कई बार उनके मनोनयन के लिये पत्रा आए लेकिन वह टाल गईं और न ही उन्होंने किसी पार्टी की सदस्यता ली। नेतृत्व के गुण होने के कारण ही वह पालिका चुनाव से लेकर संसदीय चुनाव तक बूथ में गड़बड़ करने वाले किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता को झिड़क देती थीं।
राजनीति की हलचल को परखने और जानने के बाद वह अपने मिशन पर अडिग थीं। महिला संगठनोें के साथ जुड़कर वह शिक्षा व सामाजिक कार्यों में रुचि लेती। इसके लिये कई बार उन्हें सम्मानित किया गया था। बेवाक बोलने वाली कमला जी पत्रकारिता के घराने से थीं तो उन्हें किसी भी अधिकारी या नेता से सम्वाद करने में झिझक नहीं थी लेकिन वह अपने दायरे में रहकर ही सम्वाद करतीं। सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर वह कार्यों में जुड़ी रहीं। लोक चेतना मंच की सक्रिय महिला सदस्य के रूप में उनकी भूमिका थी। पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में उन्होेंने जनपक्षीय मुद्दों को उठाया और हिमालय संगीत शोध् समिति की अध्यक्ष के रूप में बच्चों और बड़ों का मार्गदर्शन किया।
सेनि. तहसीलदार, समाजसेवी

जन चेतना का गढ़ रहा है शक्ति प्रेस

धीरज उप्रेती
महानगर की शक्ल ले चुके हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड की सूरत भी अब बदलती जा रही है। कभी इस सड़क पर फड़ों का छोटा सा बाजार और दूर जाकर पीलीकोठी मुख्य स्थान हुआ करता था। उसके बाद उँचापुल। तब कहीं जाकर कठघरिया, फतेहपुर का ग्रामीण इलाका। मुखानी नहर चैराहे के बाद यह सारे गाँव बसे थे। आज कुछ पहचान नहीं आता है। चारों ओर फैल रहा शहर महानगर का आकार ले चुका है। कालाढूंगी चैराहा शहर का मुख्य चैराहा है, इसी सड़क पर हमारा छापाखाना शक्ति प्रेस तमाम सामाजिक आन्दोलनों का मुख्यालय बनकर रहा। इस पुराने भवन में छापाखान, आन्दोलनकारियों की बैठकें, प्रेसवार्ता, आन्दोलनकारियों की भीड़ हमेशा रही। यही मेरा जन्म स्थान है। बचपन के खेलकूद, पढ़ाई और संगीत सबकुछ इसी माहौल में हुआ। जन चेतना के इस गढ़ का अपना इतिहास है।
समय के साथ सब बदलता जायेगा लेकिन कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो केन्द्रबिन्दु बनकर इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। शक्ति प्रेस का यह ठिकाना भी ऐसा ही है। मैंने बचपन से प्रेस/घर के हिस्से में अन्तर ही महसूस नहीं किया। सबकुछ तो हँसीखुशी के माहौल में होता था। आज घुट से रहे हल्द्वानी शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है लेकिन अपनापन नहीं है। अपनों के बीच बसने की चाह लेकर पलायन कर रहे लोग भीड़ में खो चुके हैं। बैठने के पुराने अड्डे नहीं रहे। दौड़भाग की शक्ल वाला यह शहर सिर्फ बाजार बनकर खड़ा है, जिसमें बेचने और बिकने वालों की बात हो रही है। ऐसे में सावधान रहने की जरूरत है। पुराने जमाने की लकीर भले न पीटी जाए लेकिन उसकी मान्यताओं को रखना जरूरी है।
हमारे गाँव कुंजनपुर, गंगोलीहाट इलाके के सभी लोगों का अड्डा उस जमाने में शक्ति प्रेस था। अब तो होटलों में रहने की परम्परा हो चुकी है और फैलते हल्द्वानी में कई लोगों के परिवार-रिश्तेदार हो चुके हैं। मुनस्यारी-धरचूला के सीमान्त से ‘पिघलता हिमालय’ परिवार के सदस्यों के अलावा तमाम जगह से लोगों का आना-जाना था। रामनगर, काशीपुर, बाजपुर के लिये चार-पाँच बसों का अड्डा हमारे छापाखाने के बगल में खुल गया। वर्षाें बाद 80 के दशक में यह बस अड्डा बड़ा आकार ले चुका था और करीब अस्सी बसें इसमें थीं लेकिन इसे हटाना जरूरी था। तब कालाढूंगी रोड में घनी आबादी के बीच प्राइवेट बस अड्डे को हटाने के लिये शासन-प्रशासन बौना दिखाई दिया। ऐसे में उग्र आन्दोलन ही सहारा था। मैंने यह पहला आन्दोलन देखा जिसकी अगुवाई ईजा ने की। इसमें धरना- प्रदर्शन, ज्ञापन से कुछ होने वाला नहीं था। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती ने कई बसों के शीशे तोड़ डाले। हम बच्चे भी पत्थर मारकर बस के शीशे तोड़ने को खेल मानकर जुट जाते। दरअसल उस समय कई खूंखार लोग बस अड्डे से जुड़ चुके थे और मनमानी चाहते थे। ऐसे में सबकी नज़रे ‘शक्ति प्रेस’ पर होती। हल्द्वानी थाने के सीओ पुष्कर सिंह सैलाल जो बाद में डीआईजी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, ईजा को समझाने आते थे- ‘भाभी जी बस अड्डा हट जायेगा, इनके शीशे मत तोड़ना।’ हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले का संचालन ही हमारे ‘शक्ति प्रेस’ से हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के उस दौर के प्रबुद्ध जनों की बैठक यहाँ हुआ करती थी। लोक चेतना मंच से जुड़कर ईजा ने कई जगह प्रतिभाग किया। सीखने की इच्छा में ईजा ने ट्राइसेम योजना के तहत पीपुल्स कालेज में जुड़ीं। गायत्री परिवार के अभियान से जुड़कर उन्हें सहयोग किया। आन्दोलन के साथ विचार-विमर्श के इस अड्डे से कई अन्य आन्दोलन भी संचालित हुए, जो सामाजिक सौहार्द व दिशा देने वाले थे।

फरवरी 2019

हिमवंत कवि चन्द्र कुंवर बरतवाल जन्म शताब्दी

रुद्रप्रयाग। प्रतिकूल परिस्थितियों में हिन्दी जगत को विशाल काव्य भण्डार देने वाले हिमवंत कवि चन्द्र कुँवर बत्र्वाल का जन्म शताब्दी समारोह धूमधाम से मनाया गया। हरिदत्त बेंजवाल राजकीय आर्दश इण्टर कालेज अगस्त्यमुनि में चन्द्र कुँवर बत्र्वाल स्मृति शोध् संस्थान द्वारा मुख्य समारोह आयोजित किया।
रुद्रप्रयाग जिले के तल्ला नागपुर पट्टी के प्रसिद्ध मालकोटी गाँव में 20 अगस्त 1919 को भोपाल सिंह एवं श्रीमती जानकी देवी के घर में चन्द्र कुँवर बत्र्वाल का जन्म हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा उडामांडा प्राथमिक स्कूल और मिडिल शिक्षा नागनाथ पोखरी से हुई। बाद में पौड़ी, देहरादून और इलाहाबाद से उच्चशिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रसिद्ध कृतियां हैं- नंदिनी, पयस्विनी, विराट ज्योति, हिमतंत का एक कवि, काफल पाक्कू, हिरण्यगर्भ, गीत माधवी, साकेत, उदय के द्वारों पर, प्रणयनी, हिम ज्योत्सना। उनके मित्रा शम्भू प्रसाद बहुगुणा ने उनकी विलुप्त हो रही रचनाओं को प्रकाशित किया। तभी से काव्य जगत में चन्द्र कुँवर बत्र्वाल का दूसरा नाम हिमतंत कवि प्रसिद्ध हुआ।
जन्मशताब्दी समारोह के मुख्य अतिथि रा.स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो.जी.एस.रजवार, विशिष्ट अतिथि वयोवृद्ध साहित्यकार योगम्बर बत्र्वाल थे जबकि अध्यक्षता नगर पंचायत अगस्त्य मुनि के अध्यक्ष अरूणा बेंजवाल ने की। कवि स्मृतियों को सांझा करते हुए डाॅ.योगम्बर बत्र्वाल ने कहा कि चन्द्र कुँवर आमजन का कवि मानकर जीने वाले आज भी हैं, इसलिये बिना किसी विभेद के जगह-जगह उन्हें याद किये जाने का सिलसिला चल पड़ा है।
आयोजन के दूसरे  सत्र का आयोजन राजकीय महाविद्यालय के सभागार में हुआ। हिन्दी साहित्य अकादमी नई दिल्ली के तत्वावधान में राज्य और देशभर से विद्वतजनों ने इसमें भागीदारी की। इस वर्ष का चन्द्र कुँवर बत्र्वाल स्मृति सम्मान प्रतिष्ठित साहित्यकार कुमाउनी भाषा पत्रिका दुदबोली के सम्पादक मथुरादत्त मठपाल को दिया गया। उनके सुपुत्र नवेन्दु मठपाल आयोजन में पधारे थे। आयोजन में प्रतिष्ठित पोस्टर चित्र कविता के चर्चित स्व.बी.मोहन नेगी के चित्रों की प्रदर्शन आकर्षण का केन्द्र थी। खुशी हुई कि उनके दो पुत्रों ने नेगी जी की परम्परा को बनाए रखा।

उनका संस्कार, धैर्य, साहस बनाने वाला था

मथुरादत्त मठपाल
स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से मेरा परिचय कोई 37-38 वर्ष पूर्व हुआ था। मैं एक कुमाउनी काव्य समारोह में भाग लेने हेतु हल्द्वानी आया हुआ था। एक अति साधरण सा दिखने वाला व्यक्ति वहाँ एक मकान की छत लगाई गई रसोई में भोजन व्यवस्था में संलग्न था। पास ही एक दुबली-पतली सी महिला बैठी उनका हाथ बटा रही थी। उन्होंने अपना परिचय स्वयं ही दिया कि वे आनन्द बल्लभ उप्रेती हैं, ये कमला जी हैं। मैंने मजाक में कहा, ‘आप दोनों एक ही पार्टी के लगते हैं।’ हम तीनों ही हँस पड़े। तब से मैं जब भी हल्द्वानी आता प्रायः उनके ‘शक्ति प्रेस’ में कुछ देर अवश्य बैठता था। वही सैंतिस-अड़तिस वर्ष पूर्व देखे गये आनन्द जी-कमला जी में कोई फर्क मैंने कभी अनुभव नहीं किया। भीतर के अंधेरे कमरे में उनका ट्रेडिल प्रेस चलता रहता, बाहर के कमरे में ‘पिघलता हिमालय’ साप्ताहिक पत्र का काम चलता रहता। दो-तीन अति साधरण सी कुर्सियाँ-एक बैंच और कोने पर सटा कर रखा हुआ एक बड़ा सा बैंच। आगे चलकर जब कम्प्यूटर- फोटोस्टेट का काम खोला कमरे का हुलिया वही रहा। हाँ भीतर के कमरे में खटर-पटर अब नहीं होती थी। बहुत धीरे से स्वर में आनन्द जी बतियाते- प्रायः कुमाउंनी में ही। ‘ओहो, और्री है गो’ जैसा कोई तकिया कलाम बीच-बीच में लगता रहता।
समय के साथ-साथ ज्यों-ज्यों आनन्द जी से मेरा परिचय गहराता गया मुझे उनके अन्दर एक बालक की तरह सरल-निष्कपट- सपाट व्यक्ति के दर्शन होते गये। एक पत्राकार की उनकी गहरी ईमानदारी, आर से पार तक और बहुत दूर तक देखने की सामथ्र्य वाली उनकी दृष्टि, बिना लाग- लपेट या कोई मुलम्मा चढ़ाये पत्रकारिता के अपने मिशन के प्रति कर्तव्य निष्ठता, सुख-दुःख में समभाव रख सकने की उनकी चारित्रिक विशेषता, अपने समकालीन समाज और राजनीति की गहरी समझ रखने वाले एक जागरूक मनीषि की सी मेध से सम्पन्न व्यक्तित्व आदि गुणों के कारण में उत्तरोत्तर उनके व्यक्तित्व का कायल होेता गया। लेकिन उनके जीवन के अनेक पहलू मेरी नजरों में तब उजागर हुए जब मैंने उनके विस्तृत साहित्य का अध्ययन किया। अपने प्रारम्भिक प्रकाशन तो उन्होंने स्वयं ही मुझे दिये थे, बाद वाली कृतियाँ उनके परिजनों ने मुझे सुलभ करवायीं थीं। मुझे सुखमय विस्मय होता है कि आनन्द जी जितने प्रखर पत्रकार थे उतने ही मेधावी रचनाकार भी। वे एक भावुक कवि, मानव मन के सफल चितेर कहानीकार, एक सतत यायावर, निबन्धकार आदि बहुत कुछ थे।
कमला जी के साथ आनन्द जी का विवाह फरवरी 1971 में हुआ था। कमला जी रानीखेत के एक सम्भ्रान्त परिवार की कन्या थी। मुझे याद है वर्षों पहले रानीखेत सदर बाजार में ज्वाला प्रसाद एण्ड सन्स में हम लोग जाया करते थे, जो इन्हीं परिवार का है। प्रतिष्ठित व्यवसायी ज्वालाप्रसाद जी स्वयं गद्दी पर बैठे दिखाई देते थे। शहर में रहने के कारण कमला जी ने गाँव का जीवन कम ही देखा था। उप्रेती जी का जीवन एक फक्कड़ का जीवन था। ‘काम-क्रोध्-मद-मान न मोहा’ वाली स्थिति थी। सौभाग्य से उन्हें जीवन-संगिनी के रूप में एक ऐसी महिला मिली जो उनके साथ पग से पग मिला कर चलीं। इससे एकदम अकेले संघर्ष कर रहे उप्रेती जी को जीवन का एक स्थायी सम्बल प्राप्त हुआ। वे हल्द्वानी में अपना प्रेस चलाते, पत्र निकालते और सामाजिक- सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी करते रहते थे।वे किसी दल, धड़े या मोर्चे से कभी नहीं जुड़े। एक ईमानदार पत्रकार की भाँति वे आम जन के सुख-दुःखों को ही अपनी लेखनी से उजागर करते रहे। उधर कमला जी को अपनी ससुराल गंगोलीहाट में अपने बड़े परिवार के साथ रहना था। ग्रामीण परिवेश में रहकर उन्होंने ग्राम्य जीवन के सारे काम-काज सम्भाल लिये थे। बड़े पुत्र के जन्म के पश्चात पति-पत्नी एक माह के नन्हें शिशु को लेकर हल्द्वानी चले आये। ‘शक्ति प्रेस’ भवन में गृहस्थी जम गई। छोटे पुत्र और कन्या के जन्म के पश्चात कमला जी अस्वस्थ रहने लगीं। घर-गृहस्थी और व्यवसाय की सारी जिम्मेदारी आनन्द जी के कन्धें पर आ पड़ी। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने अपने पत्र ‘पिघलता हिमालय’ का प्रकाशन बनाये रखा। कमला जी अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही थीं। इस अन्धकार में प्रकाश की किरण के रूप में उनके सामने तीनों बच्चे ही थे। समय बीता, कमला जी भी कुछ स्वस्थ हो गईं, ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एवं उन्हें संस्कारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ‘पिघलता हिमालय’ भी गति पकड़ चुका था। नन्हा पंकज भी पिता के कामों में हाथ बटाने लगा था।
समय ने अपने कितने ही रूप दिखाये- रंग दिखाये लेकिन उप्रेती दम्पत्ति ने न अपना धैर्य छोड़ा और न अपना पत्रकारिता का मिशन ही छोड़ा। वे स्वयं में एक संस्था थे- एक आन्दोलन थे। कुछ पँूजी का प्रबन्ध् हुआ तो उन्होंने जे.के.पुरम्, सेक्टर-डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में अपने परिवार की आवश्यकता भर की पूर्ति कर सकने में सक्षम एक छोटे से आशियाने को बनाया। इसी बीच 22 फरवरी 2013 ई. के दिन वे आनन्द जी एकाएक चिरनिद्रा में सो गये। ऐसे में उनकी अद्र्धांगिनी कमला जी ने साहस के साथ उनके मिशन को संभाला और अपने बच्चों को सौंपकर 15 सितम्बर 2018 को वह भी विदा हो गईं। उनका संस्कार, धैर्य, साहस बनाने वाला था। सामाजिक कार्यों में उनका हस्तक्षेप दिशा देने वाला था।

आप तो हमारे साथ ही रहोगी हमेशा हमेशा!

हरीश पन्त
कहते हैं तूफान में जब दिशा बोध् असम्भव हो जाता है तो दीप स्तम्भ की बत्ती अपने स्थान से उठ जहाज के आगे पानी में तैरते हुए नाविकों का मार्ग दर्शन करती है। कुछ ऐसी ही व्यक्तित्व था पिघलता हिमालय परिवार के लिए स्व. कमला उप्रेती का।
अस्वस्थ्य होने के बावजूद विषम परिस्थितियों में आनन्द बल्लभ उप्रेती जी के सारे संघर्षों, उपलब्धियों और पारिवारिक सामाजिक कार्यों को संवारने की विलक्षणता उनमें अद्वितीय थी।
वेदना में एक शक्ति है जो दृष्टि देती है और जो वेदना में है वही दृष्टा हो सकता है। सन् 1977-78 के दौरान नैनीताल समाचार के प्रकाशन शुरू होने के बाद ही पिघलता हिमालय परिवार यानि उप्रेती जी के संसर्ग में कालाढूंगी रोड शक्ति प्रेस से सम्पर्क हुआ तो आज तक वह अपना ही लगता है बावजूद न उप्रेती जी रहे न कमला जी! पर वह आत्मीयता आज भी पंकज, धीरज व परिवार के साथ यथावत है।
स्व. उप्रेती दम्पति के साथ औपचारिक दाज्यू-भाभी वाला सम्बोधन न हो कर आनौपचारिक साहब! और काँ छाँ हो, कै कर्न छा हो! ही रहा।
90 के दशक में गम्भीर बीमार हो कर हल्द्वानी में चैकअप के दौरान एक महीने तक जिस ममत्व से उन्होंने मेरी देखभाल की उससे उरिण तो मैं ता जिन्दगी नहीं हो पाउँगा पर उनका यह भाव बिना किसी लाग लपेट के सभी आगंतुक परेशानी में घिरे लोगों के साथ निस्वार्थ रहता था।
शक्ति प्रेस व पिघलता हिमालय की आर्थिकी को सम्भालने में कमला उप्रेती की विशेष भूमिका रहती थी जो कि उदारमना उप्रेती जी में कम ही थी।
वह बहुत ही स्पष्ट खरी-खरी कहने की वजह से शायद कुछ लोगों को खटकती हो पर वह खुली व स़ापफगोई पसन्द व्यक्तित्व की स्वामिनी थी।
उप्रेती जी के नहीं रहने के बाद जिस कुशलता और एकजुटता से पूरे परिवार को खराब होते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने संभाला वह हिमालय संगीत शोध् समिति की उत्तरोत्तर प्रगति का स्पष्ट प्रमाण है। होली आयोजन, उप्रेती जी की पुण्यतिथि के आयोजन व सम्मान समारोह, संगीत की बैठकें सब में उनका सक्रिय सहयोग, मार्गदर्शन और आतिथ्य अद्भुत व पूरे परिवार को साहस से आगे बढ़ने की प्रेरणा देता था और अब उनके ना रहने पर भी उनकी अमिट छाप पिघलता हिमालय व हिमालय संगीत शोध् समिति पर छाई रहेगी। कवि रुस्तम की कविता के साथ-
समय कुछ ढँूढता था।
समय कुछ टटोलता था।
रात को, अकेला,
शहर की गलियों में
अपने आप कुछ बोलता था।
उसकी आँखों में क्या बिम्ब होते थे?
समय क्या सोचता था?
किसे याद करता था समय?
किसी अन्य समय को?
और किसे भूलता?
मैं दूर से उसके पीछे पीछे घूमता था,
सिर्फ दूर से।
कमला उप्रेती आप तो हमारे साथ ही रहोगी हमेशा हमेशा!