वह सपने नहीं, सच्चाई को जीती थी…..

डाॅ. पंकज उप्रेती
‘‘संग्राम जिन्दगी है, लड़ना इसे पड़ेगा…..।’’ इस प्रकार के गीतों को गुनगुनाने वाली हमारी ईजा अब सिर्फ याद आती रहेगी। वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी। बीमारी, अस्पताल, मौत तो उसके निकट थे लेकिन अचानक वह चल देगी ऐसा पता नहीं था।
मुझे याद है पिता के साथ घोर संघर्षों में साथ देने वाली माता ने कितनी परीक्षाएं मौत के लिये दी। अपनी 66 साल की आयु में उन्होंने सौ प्रतिशत संघर्ष किया जिसमें मौत से संघर्ष भी था। बचपन में हम तीनों भाई बहन- पंकज, धीरज, मीनाक्षी सोचते माँ कब ठीक होगी, उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। परीक्षा के इस दौर में दैनिक पिघलता हिमालय को बन्द करना पड़ा था। चल रहे संग्राम में पहाड़ ही टूट पड़ा। मुनस्यारी में दुर्गा चाचा दुर्गा सिंह मर्तोलिया अपनी स्थितियों में बुरी तरह टूट चुके थे। थके-हारे पिता आनन्द बल्लभ ने छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ को बिकाउ होने का विज्ञापन दे डाला था। लेकिन नहीं, परमात्मा को यह मंजूर नहीं था। ईश्वर को हमारा लड़ना ही पसन्द है। पूरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। 6 साल का मैं और 4 साल का भाई धीरज गाँव गंगोलीहाट चले गये। छोटी बहन को नैनीहाल रानीखेत भेज दिया गया। माँ अस्पताल और पिता हल्द्वानी में। संघर्षों के उन सालों में जितने टोने-टोटके, पूजा-पाठ हो सकते थे सब किये पिता ने। ताकि हमारा परिवार बन सके। दो साल के अन्तराल में बिखरा हुआ पूरा परिवार एक हो गया लेकिन कुछ समय बाद ईजा पिफर से बीमार हो गई। हम तीनों बच्चे रोते थे। फिर से दो साल तक घोर संग्राम। पिता भी परेशान थे लेकिन ‘शक्ति प्रेस’ हमारी धुरी था। ‘उप्रेती ज्यू’ को मानने वाले, उनकी ईमानदारी को पहचानने वालों की कमी नहीं रही। ईजा ठीक होकर घर आ गई लेकिन बीमारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पिघलता हिमालय को पिता ने फिर से जीवन दिया और ट्रेडिल मशीन के जमाने की मशीनों पर जूझते रहे। खून में व्यापार तो था नहीं, हाँ उनकी कलम की ताकत और ईमानदारी ने परिवार को सम्मान के पद पर खड़ा रखा। बीमारियों और संघर्षों ने हम बच्चों को भी बहुत कुछ सिखाया। हमें सिखाया की दुर्दिन कैसे होते हैं, दुनिया के मेले में कितने प्रकार के चेहरे होते हैं, अपना-पराया क्या होता है………..। मुफलिसी कोई बात नहीं होती लेकिन आपकी प्रतिब(ता बनी रहनी चाहिये। अखबार निकालना हमारी प्रतिबद्धता थी। संकल्प ले रखा था इसे चलाने का। ईश्वर कभी कोई दूत भेज देता और उम्मीदें जग जाती। एक दिन हल्द्वानी बेस अस्पताल में ईजा को बाहर रख दिया गया और डाक्टरों ने कह दिया था कि भगवान ही बचा सकता है। हम बच्चे रात्रि में रोते हुए यह कहकर नींद की गोद चले गये- ‘‘हे भगवान! हमारी मम्मी को ठीक कर देना।’’ अगले दिन पता चला कि ईजा ठीक हो गई है। पिता जी अपने कुछ साथियों के साथ रातभर अस्पताल में मौत से जूझ रही ईजा के पास थे। अस्पताल में जाने से पहले मुंह का ग्रास तक छोड़कर जाना पड़ा था उन्हें। उस दिन मेरा जनमबार था और पिता ने तय किया था बहुत दिनों बाद आज इतमिनान से खाना खायेंगे। उन्होंने खाना पकाया और हम लोग खाना खाने बैठे ही थे कि हमारे पड़ौसी लाला दाउ दयाल जी बताने आ गये कि अस्पताल में चलो, हालत खराब है।
अस्पताल में बहुत समय अकेले ही काटा है ईजा ने। वह हिम्मती थी तभी इतने साल तक उसका शरीर बचा रहा। बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह थकी नहीं बल्कि परेशान इसलिये थी कि उनका परिवार परेशान है। वह कहती थी- ‘‘मैं एमबीबीएस हो चुकी हँू। बीमारियों के कारण सारी दवाईयों के नाम और बीमारियों के बारे में जान चुकी हँू।’’ कई बार मरते-मरते बची ईजा बताती थी- ‘‘यमराज के वहाँ आध्े रास्ते से लौट कर आई हँू।’’
ईजा की बातों मेें बहुतों को विश्वास नहीं हो सकता है। वह बहुत चैकन्नी थी कि किसी भी समय बुलावा आ सकता है। इसलिये वह अपने हिस्से की लड़ाई लड़ती रही। वह सपने नहीं सच्चाई जीती थी। नींद उसकी आँखों में नहीं थी और हर वक्त कुछ गुनने-बुनने-कहने-सुनने की आदी हो चुकी थी। उन्हें भरोसा था कि ईमानदार से काटा गया समय ईमानदारी लौटाता है। आने वाले कष्टों को वह पी जाती और समय का इन्तजार करती। उनकी दृढ़ता ही थी कि वह पिता जी के अखबारी मिशन, लेखन, सामाजिक आन्दोलनों में बराबर की भागीदार बनी। उन्होंने कभी भी बाबू जी से यह शिकायत नहीं की कि इन आन्दोलनों से क्या होगा, बच्चों की पढ़ाई नहीं हो रही है, सजने- संवरने के लिये साधन चाहिये, रहन-सहन के लिये बड़ी और खुली जगह चाहिये। वह ऐसे सपने कतई नहीं पालती थी। उनके यही सपने होते तो हमारा यह मिशन अध्ूरा रह जाता। यह ईजा का ही साहस था कि उन्होंने हर स्थितियों में अपना संसार बनाया। ऐसा संसार जिसमें सच्चाई हो। आम महिलाओं की तरह वह भी घर-गृहस्थी चलाती नाती-पौतों के साथ खेलती और गुनगुनाती लेकिन उससे पहले वह आन्दोलन थीं। उसने अपने को नहीं अपने मिशन को संवारा…..

कमला: वह वीरांगना थी

महेश पाण्डे
सबसे कठिन होता है अपने किसी नजदीकी के बारे में लिखना। जिसको आप बचपन से से देखते-सुनते आये हैं उसके बारे में लिखना तो और भी मुश्किल होता है। फिर कमला पाण्डे-उप्रेती के बारे में कलम कितनी निरपेक्ष होकर लिखेगी, कहना मुश्किल है। रानीखेत में एक ही मोहल्ले खड़ी बाजार में आमने-सामने मकानों में पाँच मकान छोड़कर कमला का घर था। उन दिनों पूरी खड़ी बाजार एक परिवार की तरह था। जाति-धर्म भाषा का विभेद कोई मायने नहीं रखता था। सब रिश्ते सहज और आत्मीयता लियेे हुए थे। हमारी ईजा, चाची या जड़जा ताई जी थी। हमारी एक बहन जानकी ताउजी की लड़की थी। जानकी के बहाने सभी का घर में आना-जाना लगा रहता था। जानकी की देखा-देखी हमारी ईजा और हम लोग एक रिश्ते में बंध्े हुए थे। कब कमला और उसकी बहनों ने मुझसे दाज्यू कहना शुरु किया, याद नहीं पड़ता लेकिन यह रिश्ता आज तक अटूट बना हुआ है। इसी रिश्ते की डोर से मैं आज पंकज, ध्ीरू और मीनाक्षी का मामा बना हुआ हँू। कमला से अन्तिम मुलाकात वर्ष 2018 में रानीखेत में उमेश डोभाल स्मृति समारोह में बस चन्द मिनटों के लिए हो पायी थी। उसे सपरिवार गंगोलीहाट अपनी ससुराल और हाटकालिका मन्दिर जाना था। इसके बाद दो-तीन बार पफोन से अशल-कुशल का आदान-प्रदान हो पाया। उसके निधन के बाद 22 सितम्बर 2018 को परिवार को शोक सम्वेदना व्यक्त करने घर गया था।
रानीखेत में कमला की परवरिश एक भरे-पूरे और सम्पन्न परिवार में हुई। किसी चीज कर कोई अभाव नहीं था। शादी के कुछ वर्षों में ही तीनों बच्चे पैदा हो गए थे। सभी 7-8 साल से कम वय के थे। उप्रेती जी का फक्कड़पन कमला ने ससुराल आते ही पूरी तरह समावेषित कर लिया था। उनका घर शक्ति प्रेस गाँव-देहात के लोगोें की आश्रय स्थली हुआ करती थी। कितने ही लोगों ने वहाँ प्रेस का काम सीखा। अखबार निकालना सीखा। वहाँ जो भी आया वह आत्मनिर्भर होकर निकला।
जिन दिनों उत्तराखण्ड चिपको आन्दोलन से गुंजायमान था उन दिनों ‘उत्तर उजाला’ के बाद ‘शक्ति प्रेस-पिघलता हिमालय’ आन्दोलनकारियों का केन्द्र बने हुए थे। रात-विरात आन्दोलन के पर्चे-पोस्टर छापने का काम उप्रेती दम्पति के जिम्मे था। उन्होंने कभी किसी से माँगा भी नहीं। उल्टे चाय-नाश्ते की जिम्मेदारी भी उनके ही हिस्से जाती थी। कमला बीमार कैसे पड़ी यह भी एक अलग किस्सा है। किस्सा क्या बहुत त्रासदी है। इसने हँसते-खेलते उप्रेती परिवार को जबरदस्त संकट में डाल दिया। यह संकट आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक तीनों ही मोर्चों पर उभरकर सामने आया। हुआ यों कि एक दिन शाम को दोनों लोग घूमने गए हुए थे। आइसक्रीम वाले को देखकर कमला ने आइसक्रीम खाने की इच्छा जताई। आइसक्रीम खाने के बाद उसे हल्की-फुल्की खाँसी आती रही। जब दो-तीन दिन में भी खाँसी नहीं रुकी तो चिन्ता होने लगी। हल्द्वानी में इलाज चलता रहा, लेकिन खाँसी ठीक नहीं हुई, कुछ महीनों बाद उसने बिस्तर पकड़ लिया तो भवाली एडमिट करना पड़ा। उसके भवाली जाने से पूरे परिवार पर संकटों का पहाड़ टूट गया। बच्चे छोटे थे, उनको ननिहाल रानीखेत भेजना पड़ा। उप्रेती जी को प्रेस और अस्पताल के बीच लगातार चक्कर काटने पड़े। परिवार के भरण-पोषण के साथ ही दवा और कमला के पौष्टिक आहार के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी। डेढ़-दो साल तक बच्चों की परवरिश रानीखेत व गंगालीहाट घर में हुई। जब कमला का स्वास्थ्य कुछ सुध्रने लगा तो पहले पंकज-ध्ीरू और पिफर मीनाक्षी कुछ समयावधि के बाद हल्द्वानी आये। इनकी वापसी के साथ ही परिवार का आर्थिक संकट गहराने लगा। साप्ताहिक से दैनिक बना पिघलता हिमालय ने उनके सामने चतुर्दिक समस्याएं खड़ी कर दीं। मित्रों और परिचितों के सहयोग से उन्हें राहत मिली लेकिन तकादों की भरमार ने उन्हें काफी परेशान भी किए रखा। घर के जेवर तक उन्हें या तो गिरवी रखने पड़े या बेचने पड़े। परिवार की बड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें पिघलता हिमालय दैनिक से साप्ताहिक करना पड़ा। तब तक दुर्गा सिंह मर्तोलिया भी आर्थिक संकट से घिर चुके थे। किसी तरह उप्रेती जी, कमला और पंकज तब तक हाथ बँटाने और काम करने वाला हो गया था कड़ी मेहनत और घोर अभावों के बीच भी अखबार छापने से कभी पीछे नहीं हटे। यही कड़ी मेहनत आज भी पिघलता हिमालय के पीछे लगी हुई है।
बाद के वर्षों में शक्ति प्रेस बौद्धिक और सम्भ्रान्त नागरिकों का सबसे प्रिय केन्द्र बन चुका था। प्रसिद्ध रंगकर्मी बांकेलाल साह, साहित्कार गोबिन्द बल्लभ पन्त, डिग्री कालेज के शिक्षक, व्यापारी आदि वहाँ की बैठकी को अघोषित क्लब का स्वरूप दे चुके थे। इसी शक्ति प्रेस में कई दिनों की लम्बी बैठकों और विचार-विमर्श के बाद पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच ने आकार लेना शुरु किया। उन्हीं बैठकों का नतीजा आज हल्द्वानी की पहचान बन चुके पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच है। एक गृहणी के रूप में कमला भी कभी-कभार बैठकों में भाग लेती थी, उसके विचारों को भी लोग गम्भीरता से सुुनते थे। मंच में महिलाओं की भागीदारी का जो दृश्य आज हम देखते हैं उसके पीछे कमला की मेहनत भी है।
बाद के दिनों/वर्षों में कमला ने कई स्वैच्छिक संगठनों में काफी सक्रियता से भाग लिया, लम्बी यात्राएं भी कीं। उत्तराखण्ड आन्दोलन में उसकी सक्रियता से कोई अपरिचित नहीं है। उप्रेती दम्पति की संगीत के प्रति अत्यधिक लगाव ने तीनों बच्चों को अभावों के बीच भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से अलग-अलग विधाओं में दीक्षित कराया और आज तीनों की अपनी-अपनी विधाओं में अलग पहचान है। तीनों बच्चों और उप्रेती दम्पति के कठोर परिश्रम और साधना के रूप में हमें आज ‘हिमालय संगीत शोध् समिति’ जैसी बहुमुखी संस्था की विरासत मिली हुई है। उप्रेती जी के न रहने पर कमला ने तमाम शारीरिक कमजोरियों और बीमारी के बावजूद परिवार को एकजुट बनाये रखने में काफी दक्षता और कठिन श्रम से काम किया। वास्तव में वह वीरांगना थी। अभावों और कष्टों के बीच कैसे जिया जाता है कोई उससे सीखता। आज वह भौतिक रूप से जरूर हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी बोयी फसल अब सोने की तरह दमक रही है। माँ-बाप की विरासत को निरन्तर आगे बढ़ा रहे उनके बच्चों से यही उम्मीद है कि उनकी जलाई मशाल उनके साथ-साथ और लोगों के जीवन में भी उजाला करते रहे। जिस पिघलता हिमालय को वो छोड़ गये हैं उसकी पिघलन गंगा-यमुना का सदा नीरा जल हमेशा बहता रहे। आमीन।
9/1006 इन्दिरा नगर, लखनउ

मर्तोली में भी है नैनीताल

गोपालसिंह मर्तोलिया

पि.हि.प्रतिनिधि
बहुत कठिन दौर था वह जब दुनिया से कटे हुए क्षेत्र के लोग अपनी दिनचर्या में हसरतें लिये हुए आगे बढ़ रहे थे। लेकिन उन हसरतों ने ही हौंसला दिया और लोग कामयाब हुए। मल्ला जोहार के मर्तोली में ज्वाला सिंह मर्तोलिया और श्रीमती मोतिमा देवी के घर जन्म हुआ था- गोपालसिंह मर्तोलिया का। 73 वर्षीय गोपाल सिंह जी बताते हैं कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर बहुत जोश होता था बच्चों में। मर्तोली गाँव की गली-गली में बच्चे अपने हाथ का बनाया तिरंगा लेकर गाते थे- ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’। जोहार में जन्मे गोपालसिंह उन पुराने दिनों के गवाह हैं और बताते हैं कि मुनस्यारी से जोहार में माइग्रेशन में जाना-आना होता था। शिक्षक गुलाबराम जी उनके गोठ में ही रहा करते थे। प्रत्येक बच्चे की ड्यूटी थी वह बारी-बारी से राशन उनके घर पहँुचाते थे। एक बार शायद सन् 1955 में बरफ की लहर में उनका स्कूल टूट गया। प्रकृति के करीब रहने वालों ने हौंसला बनाये रखा और दूसरा स्कूल भवन बनाया गया। हमारे परिवार के पास पधानचारी थी। पिता ज्वाला सिंह जी प्रधान थे। मर्तोली में नैनीताल नामक स्थान पर हमारा मकान है। यह स्थान नैनीताल से मिलता-जुलता है। सामने दृश्य और भी मनमोहक। बुर्फू में मल्ला जोहार का पटवारी रहता था और प्रधान से टैक्स वसूली के लिये पटवारी का आना होता था। तब एक टैक्स पटवारी को देना होता था और दूसरा बागेश्वर उत्तरायणी मेले में देते थे। नन्दाष्टमी तक सारे परिवार जोहार में रहने के बाद मुनस्यारी आते थे। तब नन्दाष्टमी मेले के लिये प्रत्येक परिवार से एक बकरा बलि के लिये जाता था। वेदान्ताचार्य पुण्डरीकाक्ष महाराज के कथा प्रवचन का प्रभाव ही था कि यहाँ बलि प्रथा बन्द हो गई। अब तो पचास साल से भी ज्यादा समय हो चुका है जब बलि प्रथा बन्द है।
गोपाल सिंह बताते हैं कि आज पलायन का रोना-पीटना मचा है लेकिन पुराने कठिन समय में सारे गाँव आबाद थे। बोझा ढोकर यात्राओं पर निकले परिवारों ने ठाना था कि वह कुछ करेंगे। तब सुरिंग से मर्तोली जाने तक चार पड़ाव होते थे। खेतीबाड़ी के लिये हर साल ‘इज्जर’ बंजर भूमि खोदने का काम होता था। बंजर खोद-खोद कर आलू, सरसों, फाॅफर/उगल की खूब पैदावार होती थी। एक बार मर्तोली में घट खराब हो गया था, तब आटा पिसवाने के लिये बुर्फू तक जाते थे।
अपने बचपन की याद में भावुक होते हुए श्री मर्तोलिया कहते हैं- जोहार के बड़े ग्रामों में मर्तोली है। गाँव के बीच में कच्हरी लगती थी और सयानों के बैठने की जगह थी। नन्दाष्टमी से पहले नैनीताली पुजाई होती थी, जिसमें प्रधान पिता जी को दो बकरों का सिर मिलता था, फिर सादी पुजाई होती थी जिसमें तीन बकरों का सिर मिलता था। इसके बाद नन्दाष्टमी की पूजा होती थी। मन्दिर के पास मैदान में लगातार खेल होते थे। किसी भी विशेष सूचना के लिये छत में चढ़कर एक व्यक्ति उँफची आवाज में बोलता था, जिसे आजकल एनाउंसर के रूप में समझा जा सकता था। मेले के अवसर पर ढुस्का-चांचरी के लिये सारे ग्रामीण जुटते थे। हिलमधर में हम सभी अपनी ध्यैनियों-परिचितों को देखने जाते थे कि कौन-कौन मर्तोली आ रहे हैं। जोहार से माइग्रेसन में वापस आने से पहले सारा कामकाज समेटा जाता था। खेतों में फसल कटाई के बाद नींममुचाई याने जानवरों को छोड़ दिया जाता था ताकि रहा-बचा वह भी चर लें। उस समय के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में स्व.गोपाल सिंह और हयात सिंह ‘बनवारी’ थे। गोपाल सिंह जी यह भी बताते हैं कि पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया जब घर आते थे, उन्होंने बच्चों को गीत सिखाया था। पठन-पाठन, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम सभी में सहभागिता करते बच्चे अपनी परम्परागत पाठशाला से भी जुड़े थे। नई पीढ़ी में बहुत बदलाव आ चुका है लेकिन उन्हें अपनी जड़ों में जुड़े रहना चाहिये। अभी नन्दा माई के मन्दिर को भव्य रूप देने की तैयारी की जा रही है।

1930 में पद्मसिंह नैनीताल आये और 1958 से बना जोहार भवन

गोविन्द सिंह गड़बगी से बातचीज

डाॅ.पंकज उप्रेती
नैनीताल। सरोवर नगरी का जोहार भवन अपने आप में एक इतिहास बन चुका है। 1930 में नैनीताल आये पद्मसिंह गड़बगी ने 1958 में नवाब आॅफ छत्तारे प्रोस्पेक्ट लाॅज के नाम के इस भवन को खरीदा और फिर जोहार भवन का निर्माण शुरु किया। इस परिवार के मूल जनों के जोहार के पांछू ग्राम से माइग्रेसन समय में वह लोग धरमघर सिमगड़ी आया करते थे। गर्मी में जोहार और जाड़ों में सिमगड़ी की यह परम्परा थी। धीरे-धीरे यह पूरी परम्परा ही सिमट गई और जो जहाँ था वहीं बस गया। परिवार के वरिष्ठ सदस्य गोविन्द सिंह गड़बगी जो कि परिवहन निगम के वरिष्ठ लेखाकार पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, वह बताते हैं कि उनके पूर्वज मूल रूप से गढ़वाल के गड़बगा गाँव के थे जो जोहार आये। पुराने समय में उनके पिता पद्मसिंह जी 1930 में नैनीताल आये और तल्लीताल में किराये के मकान में रहते थे। 1954 में छत्तार नवाब के भवन को उन्होंने खरीदा और जोहार भवन नाम से इसका नवनिर्माण करवाया और यहीं के होकर रह गये। पद्मसिंह जी के तीन पुत्र स्व.उमेश सिंह, गोविन्द सिंह और रणजीत सिंह हुए। स्व. उमेशसिंह के दो पुत्र महेन्द्र और धीरज थे। गोविन्द सिंह जी के पुत्र ललितमोहन और पुत्री दीप्ति हैं। लक्ष्मण सिंह टेलीपफोन विभाग की पुत्री कंचन और हेमा हैं।
गड़बगी परिवार के पास पहले मल्लीताल में काफी सम्पत्ति थी। समय बीतने के साथ इसका स्वरूप बदला है। स्व. पद्मसिंह ने 1964 में शहीद सैनिक स्कूल को अपनी भूमि में बने हुए कमरे दान में दिये। इस विद्यालय के जमजमाव में उनका योगदान हमेशा स्मरण किया जाता रहेगा।
वर्तमान में जबकि जोहार के लोग देश भर व विश्व के तमाम देशों में फैल चुके हैं, नैनीताल के जोहार भवन सहित अपने बुजुर्गों की धरोहरों को निश्चित रूप से याद करते हैं। ऐसे में नैनीताल का जोहार भवन भी याद किया जाता है। जो जरूरतमंदों के अलावा जोहार के लोगों के लिये एक आश्रय का यह केन्द्र रहा है। नैनीताल के इतिहास में कई बदलाव होते रहे हैं लेकिन कुछ स्थान आज भी अपनी मौजूदगी को दर्शा रहे हैं। सरोवर नगरी की यह शान बनी रहे, इन्हीं कामनाओं के साथ।

पिघलता हिमालय 22 अप्रैल 2013 अंक से

कश्मीर फैसले पर प्रतिक्रिया

कार्यालय प्रतिनिधि
मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जो बड़ा फैसला लिया उसका जश्न पहाड़ से लेकर मैदान तक चारों ओर है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिये सरकार ने जिस प्रकार रणनीति बनाई और कदम उठाया है उसे लेकर विपक्ष चाह कर भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। कश्मीर को लेकर कोई बड़ा ऐलान कभी तो होना ही थी, जिसे सरकार ने कर डाला। मोदी-शाह के कदम से हर मौका पार्टी के लिये बनता जा रहा है। देश के इस बड़े मसले को राजनीति के चश्मे से हटकर देखें तो एक देश एक सिद्धान्त की बात जरूरी थी। गुनगुन करते हुए या विरोध् ही करना है सोचकर विरोध् किया गया तो विकास नहीं हो सकता है। इसलिये सरकार के फैसले को और सच्चाई को समझना चाहिये। देश को जोड़ने के लिये, आतंक के खात्मे के लिये इस प्रकार के कदम उठाने जरूरी हैं। राजनीति के चश्मे से देखें तो- बड़ी सीधी सी बात है कि विपक्ष चाहे कुछ कहे आम जनता मोदी के हर फैसले से खुश है। यदि नहीं होती तो उन्हें दूसरी बार अथाह समर्थन देकर सरकार बनाने का मौका नहीं देती। इसे नरेन्द्र मोदी की चतुरता कहें, उनकी रणनीति कहें, उनका मिशन कहें, उनकी लहर कहें, उनकी सनक कहें………कुछ तो है।
जम्मू-कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बांटने वाले बिल पर संसद की मुहर लगते से पहले ही मैदान से लेकर पहाड़ तक जश्न होने लगा था। इस प्रकरण पर प्रतिक्रिया भी होने लगी लेकिन बहुमत सिर्फ यह देख रहा है कि कश्मीर का हल देशहित में हो। आम जनता के दिलो-दीमांग में पैठ चुका है कि कश्मीर में दोगली नीति चलने वाले भारत और पाकिस्तान के बीच अपने स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं, ऐसे में एक बार फैसला हो ही जाए। इसीलिए पूरे देश की आम जनता सिर्फ यह जान रही है कि धरा 370 हटने का लाभ होने जा रहा है। इसी बात का जश्न है। कुछ जानकारी रखने वाले अपने तर्क दे रहे हैं लेकिन उनके लिये कोई मौका नहीं है।
उल्लेखनीय है कि अपनी रणनीति में सफल रहे प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित साह ने प्रस्ताव को सदन में रखा। इसके पक्ष में 370 मत पड़े जबकि 70 मत विरोध् में थे। इस मौके पर गृहमंत्री ने कहा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इसके बारे में कोई कानूनी या संवैधनिक विवाद नहीं है। इसके लिए कानून बनाने के लिये देश की संसद पूरी तरह सक्षम है। संसद ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा सम्बन्धी अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने के प्रस्ताव सम्बन्धी संकल्प और जम्मू कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख में विभाजित करने वाले विधेयक को मंजूरी दी। गृहमंत्राी ने सदन को विश्वास आश्वासन दियचा कि स्थिति सामान्य होते ही जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने मंे इस सरकार को कोई परेशानी नहीं है।
जम्मू-कश्मीर में विशेष दर्जा समाप्त होते ही 70 साल पुराने अनुच्छेद 370 से जुड़ा जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को विशेषाधिकार देने वाला अनुच्छेद 35-ए भी समाप्त हो गया। इस साहसी फैसले से आजादी के 72 साल बाद कन्याकुमारी से कश्मीर तक देश में अब एक ही संबिधन और एक निशान लागू हो गया।
इध्र उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भी केन्द्र सरकार के जम्मू-कश्मीर पर लिए गए ऐतिहासिक निर्णय पर उत्तराखण्ड की जनता की ओर से प्रधनमंत्री मोदी और केन्द्रीय गृहमंत्री शाह को बधाई दी है। सचिवालय में मीडिया से बातचीज में उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 हटाने से जम्मू कश्मीर में विकास को बढ़ावा मिलेगा और वहाँ के लोग देश की मुख्य धारा में शामिल हो सकेंगे। प्रधनमंत्री ने अपने वायदे को निभाया है। उन्होंने कहा कि आज जम्मू कश्मीर का पुनर्जन्म हुआ है। प्रधनमंत्री मोदी ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 का प्रभाव खत्म करने का साहस दिखाया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व सांसद अजय भट्ट ने कहा कि भाजपा ने साबित कर दिया कि उसकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है। विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचन्द्र अग्रवाल ने कहा कि जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी का सपना वास्तव में आज पूरा हुआ। नेता प्रतिपक्ष इन्दिरा हृदयेश समेत अन्य ने भी केन्द्र सरकार के निर्णय को सराहा है।
इस ऐतिहासिक फैसले से कश्मीर की पीड़ा से यत्र-तत्र रह रहे कश्मीरी पण्डितों में विशेष खुशी है। हल्द्वानी व देहरादून में भी बसे ऐसे परिवारों ने खुशी मनाते हुए कश्मीर की चर्चा मीडिया से की और कहा अब वह दिन आ गया जिसका उन्हें इन्तजार था।

चाय बागान के नाम से मचता रहा हल्ला और बस गया शहर

पुराना चाय कारखाना

 

बेरीनाग चकोड़ी

पि.हि. प्रतिनिधि
सुरम्य नगरी बेरीनाग और चैकोड़ी के चाय बागान की भूमि को अपने कब्जे में लेने की सरकार की घोषणा के बाद से क्षेत्र में हलचल मची है। यह हलचल भय के साथ उम्मीदों भरी है। भय इस मायने में कि जो लोग अतिरिक्त जमीन दबाकर बैठे हैं उन्हें हिसाब देना होगा। और उम्मीद इसलिये जग रही है कि चाय बागान के नाम दर्ज भूमि के बाहर होते ही इस पर काबिज हो चुके लोग सरकार पर दबाव बना सकते हैं। इसकी तैयारी भी की जा रही है। विधयक मीना गंगोला भी जनता के इस पक्ष पर खड़ी हैं। सरकार के पफैसले से सहमे लोगों को तब ध्ैर्य हुआ जब विधायक ने कहा कि चाय बगान के कब्जेदारों को मालिकाना हक मिलेगा। सरकार ने भी इसी मंशा से फैसला लिया है। विधायक के बयान के बाद बेरीनाग और चकोड़ी में जमीन कब्जेदारों में राहत है और अनुमान लगाया जा रहा है कि जमीन की लीज समाप्त होने के बाद बागवान की भूमि से मालदार परिवार का नियंत्राण पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। सरकार के अधिपत्य में आने के बाद लोगों को मालिकाना हक मिलने में कोइ रुकावट पैदा नहीं होगी। सरकार जनहित में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाकर यहाँ रह रहे पन्द्रह हजार से अधिक परिवारों को मालिकाना हक दे सकती है।
विधयक भले ही लोगों के बीच जाकर आश्वासन दे चुकी हैं लेकिन यह देखने की बात है कि चाय बागानों पर मालदार परिवार का नियंत्रण है होने के कारण इस पर बसे लोगों को मालिकाना हक देने के मामले में हमेशा से ही पंेच फंसता रहा है। सरकार के फैसले के बाद लोगों को बेघर होने का भय भी सता रहा है। सरकार के फैसले से मचे हड़कम्प के बाद लोग विधायक से मिले। भाजपा के मण्डल अध्यक्ष ध्ीरज बिष्ट कहते हैं कि भूमि विवाद पर नया फैसला ऐतिहासिक है। विश्वास है कि सरकार लोगों के हितों को देखते हुए मालिकाना हक जरूर देगी।
उल्लेखनीय है कि कभी चाय बागानों के लिये मशहूर बेरीनाग व चैकोड़ी में दानसिंह-मोहनसिंह बिष्ट मालदार के परिवार का दबदबा रहा था और बेसकीमती जमीन पर चाय का कारोबार होने के साथ ही विदेश तक चाय सप्लाई होती थी। ग्रामीण परिवेश में रहने वालों का और चाय बागान के मालिक के बीच तालमेल ही ऐसा था कि भूमि से किसी को कोई परेशानी नहीं। समय के साथ-साथ मालदार परिवार फैलता गया और गाँव भी तरक्की के लिये फैलने लगे। कई लोगों ने मालदार परिवार के सम्पर्क में रहकर बेरीनाग व चैकोड़ी मुख्य जगहों पर अपने रहने का ठिय्या बना लिया। आगे चलकर कुछ ने खरीद की और कुछ को दान में भूमि दे दी गई। जमीन की इस बांट में चायबागान का हल्ला मचता रहा और समानान्तर शहर बसता चला गया। मालदार परिवार की शाखाएं भी इतनी ज्यादा फैल गईं कि किस जमीन पर क्या होने जा रहा है, सारा हिसाब-किताब रखना आसान नहीं था। बाद के कुछ समय में कुंवर महिराज सिंह ने चैकोड़ी में जमीन को खूब बांटा। बहुत से लोग उनके प्रशंसक बन गये। आज बेरीनाग ठसाठस भर चुका है और चकौड़ी में शिक्षा का केन्द्र बनने के साथ ही रिसोर्ट, होटल, रेस्टोरेंट, आवास बन चुके हैं।
सरकार ने बेरीनाग और चैकोड़ी में चाय बागान की करीब 1047 हेक्टेयर भूमि वापस ले ली। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने इसके लिये आदेश जारी किये। उनका कहना है कि यह भूमि चाय बागान के लिये दी गई थी लेकिन इसका उपयोग चाय उत्पादन के लिये नहीं हुआ और इस भूमि पर अवैध् कब्जे हो रहे हैं।
इसी भूमि को लेकर कोर्ट में वाद चल रहे हैं। चाय बागान के लिये दी गई भूमि सीलिंग एक्ट में नहीं थी। राजस्व ने इसे फी सिंपल इस्टेट ;ऐसी भूमि जिसके स्वामी को भू उपयोग के अधिकार प्राप्त हो माना और पाया कि चाय बागान के विकास के लिये ही यह भूमि गाँव के लोगों को दी गई थी। यह भी पाया गया कि अधिकतम स्रोत सीमा आरोपण अधिनियम ;सीलिंग एक्ट के तहत इस भूमि के लिए राज्य सरकार ने छूट भी प्रदान की थी। बेरीनाग प्रशासन ने मामले की जाँच की तो पाया कि भूमि पर कब्जे हो रहे हैं और मकान-दुकान तक बना लिए गए। प्रशासन ने भूमि की खरीद- फरोख्त पर रोक लगाई तो मामला हाईकोर्ट पहँुचा। बताया जाता है कि जिन खातेदारों के पास चाय के बगान के लिए भूमि थी, उन्होंने अन्य लोगों को यह जमीन रजिस्ट्री, दाननामा और स्टाम्प पेपर पर इकरारनामा कर बेच दी। इसके लिये राज्य सरकार की अनुमति नहीं ली गई। भूमि की खरीद- फरोख्त पर रोक के लिये जिला और उच्च न्यायालय में मामले पहँुच गये।

 

पंचायतीराज एक्ट पर बहस, जगह-जगह प्रदर्शन

नियम प्रधानों के लिये क्यों?

कार्यालय प्रतिनिधि
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव सामने है और उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रस्तुत किये गये पंचायतीराज एक्ट पर आम और खास के बीच बहस जारी है। विरोध् तेज होता देख पंचायतीराज संशोधन बिल 2019 विधनसभा की ओर से राज्यपाल को भेजा गया। राज्यपाल बेबीरानी मौर्य को बिल प्रेषित करने के साथ ही विधनसभा का सत्रावसान भी हुआ। सरकार अपना तर्क रखती रही है और जनसंख्या नियंत्रण और शिक्षा की दृष्टि से इसे महत्वपूर्ण बताया गया परन्तु इस नियम को केवल पंचायत व्यवस्था पर लागू करने का विरोध् होने लगा है। यहाँ तक की इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया जा रहा है। कई जगह प्रदर्शन भी हुए हैं। देहरादून में इस बिल के विरोध् में पंचायत जन अध्किार रक्षा मंच नाम से अस्तित्व में आये नये संगठन ने महामहीम राज्यपाल से अपील की है कि उक्त संशोधन बिल पर हस्ताक्षर न करें और इसे पुर्नर्विचार के लिये सरकार को लोटा दें। कहा कि यदि बात नहीं बनी तो हाईकोर्ट जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। कांग्रेस इस आन्दोलन के मौके पर जुटी हुई है और भाजपा रास्ते तलाश रही है। एक्ट में किए गए संशोधन के खिलाफ प्रधन संगठन ने मोर्चा खोल दिया है।प्रधानों ने संशोधन को जन प्रतिनिधि विरोधी बताते हुए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ने की चेतावनी दी है। इस सम्बन्ध् में राज्यपाल को ज्ञापन भी प्रेषित किया गया।
शासकीय प्रवक्ता मदन कौशिक कहते हैं कि कांग्रेस का विरोध् पूर्वाग्रह से ग्रसित है। जिस वक्त सदन में यह बिल पारित हो रहा था कांग्रेस ने हंगामा किया जबकि बेहतर होता वह संशोधन की मांग करते। यदि वाकेई कोई खामी रह गई है तो उसे दूर कर लेंगे। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का कहना है कि सरकार ने पंचायत में सुधर के लिये बड़ा कदम उठाया है। देर-सवेर विधनसभा और लोकसभा में भी यह व्यवस्था होनी है। यदि कोई खामी है तो दूर होगी।
पूर्व मुख्यमंत्राी हरीश रावत ने पंचायती राज एक्ट में हुए संशोधन को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा पर निशाना साध है। हरदा कहते हैं- बड़े-बड़े मंत्री फर्जी डिग्री वाले हैं, लेकिन प्रधनों से डिग्री की मांग हो रही है। उन्होंने कहा है कि व्यवहारिकता को ध्यान में रखकर फैसला होना चाहिये। हाईस्कूल की बाध्यता से सभासद नहीं मिलेंगे। पंचायत एक्ट में तीन बच्चों पर चुनाव रोक व शिक्षा की सीमा का प्रावधन राजनीति से प्रेरित है। यदि सरकार को यही सब करना थ तो डेढ़ वर्ष पहले करना चाहिये था।
चम्पावत में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जिलाध्यक्ष उत्तम देव की अगुवाई में जुलूस निकालते हुए सीएम का पुतला फूंका। पूर्व विधयक होमेश खर्कवाल ने कहा कि प्रदेश सरकार ने आनन-पफानन में इस एक्ट को पारित कर दिया है। इसमें दो बच्चों के प्रावधन का खुलासा होना चाहिये और यह कब से लागू हो यह तय होना जरूरी है। नहीं तो ऐसे कई दावेदार जिनकी तीसरी औलाद होने वाली है, वह भू्रण हत्या का शिकार हो सकती है। उनका कहना है कि केवल पंचायत में यह एक्ट लागू करना सियासत का षड़यंत्र है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।
अल्मोड़ा में आगामी पंचायत चुनाव को लेकर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने खुलकर अपनी भड़ास निकाली और लोकसभा चुनाव की हार पर चिन्ता जाहिर की। साथ ही पंचायत चुनाव से पहले पंचायती राज एक्ट के फार्मूले पर प्रदेश सरकार की आलोचना की। बैठक में हरीश रावत और डाॅ.इन्दिरा हृदयेश ने सभी से एकजुटता की अपील की ताकि पंचायत और आगामी विधनसभा चुनाव में बाजी मार सकें।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना है कि सरकार आधी-आधूरी तैयारी के साथ पंचायत राज संशोधन बिल लाई। इसमें उठ रहे सवालों का कोई जबाब सरकार के पास नहीं है। सबसे बड़ी कमी दो बच्चों की शर्त पर कट आॅफ डेट का न होना है।
हल्द्वानी में प्रदेश प्रधान संगठन की बैठक में पंचायत राज एक्ट में किए गए संशोधन को राज्य सरकार द्वारा जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि सरकार प्रदेश में पहले शिक्षा का स्तर ठीक करे तब इस तरह के अध्यादेश जारी करे। देहरादून में हुई संगठन की बैठक में प्रधन संगठन ने इस एक्ट पर आपत्ति दर्ज की है। जिलाध्यक्ष कुन्दन सिंह बोहरा ने कहा कि कई पंचायतों में पांचवी तक शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालय तक नहीं हैं। संगठन के प्रदेश महामंत्री रितेश जोशी ने कहा कि पंचायत चुनाव लड़ने के लिये शिक्षा को जरूरी करने, दो बच्चों वाला अधिनियम शिक्षा के स्तर में गुणात्मक सुधर करने तक कारगर नहीं हो सकता। उन्होंने विध्ेयक पर संशोधन करने की मांग की।
लोहाघाट में भी एक्ट में संशोधन से त्रिस्तरीय चुनाव में अयोग्य घोषित करने के राज्य सरकार के फैसले का विरोध् करते हुए प्रदर्शन हुआ है। एसडीएम को ज्ञापन सौंपते हुए पूर्व की तरह पंचायती चुनाव करवाने की मांग की गई। ग्राम प्रधान संगठन के ब्लाक अध्यक्ष चाँद सिंह बोहरा के नेतृत्व में प्रधनों ने एसडीएम को ज्ञापन देकर कहा कि राज्य सरकार ने पंचायतीराज एक्ट में किए संशोधन में त्रिस्तरीय चुनाव में प्रत्याशी को दो बच्चों की सीमा रखी है, जो न्यायसंगत नहीं है। जब कोई एक्ट पास होता है तो उसकी समय सीमा तय होती है। पिथौराढ़ में भी विरोध् प्रदर्शन हुआ। विभिन्न संगठनों ने डीएम कार्यालय पहँुचर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। किसान संगठन के अध्यक्ष सुनील जोशी ने कहा कि देश की संसद अनपढ़ और कम पढ़े-खिले नेता चला रहे हैं। इस नियमों को पहले विधनसभा और संसद में लगाया जाए। कनालीछीना में ग्राम प्रधन संगठन के ब्लाक अध्यक्ष जानकी उपाध्याय के नेतृत्व में बैठक हुई। जिसमें सरकार को चेतावनी दी गई। परिणाम चाहे जो हो, पंचायतीराज संशोधन बिल से सरकार की किरकिरी खूब हुई है।

फुस्स एच.एम.टी.

अपनी-अपनी जमीन नपाई कर रहे हैं विभाग, कर्मी परेशान

कार्यालय प्रतिनिधि
हल्द्वानी। कभी रोजगार के बड़े सपने के साथ शुरु हुआ एचएमटी घड़ी कारखाना रानीबाग फुस्स हो चुका है। इसकी बन्दी को लेकर लम्बे समय से तैयारी चल रही थी लेकिन एनडी तिवारी समेत तमाम नेताओं के दबाव में इसे पाल रखा था। कर्मचारी यूनियन के आन्दोलनों और नेताओं के आश्वासन के बाद धीरे-धीरे कर्मी भी टूटते गये और लगभग सौ कर्मचारी ही इसकी टूटी बिल्डिंगों में डेरा डाले हुए हैं। उजाड़ दिखाई दे रही एचएमटी कालौनी को देख हर कोई उदास होगा क्योंकि जिन अरमानों के साथ एकमुक्त भूमि में इतना बड़ा कैम्पस बनाया गया था, उसका हाल खराब है। कुछ भवन तो धरासायी होने की स्थिति में हैं। ऐसे में स्टाफ क्वार्टर में रह रहे परिवार काफी परेशान हैं। बताया जा रहा है कि एचएमटी प्रबन्धन उनका पीएपफ सैलरी का मार्च तक का हिसाब नहीं कर रहा है। बेंगलुरु स्थित एचएमटी प्रबन्धन ने नोटिस देकर क्र्वाटर खाली करने के निर्देश अतिरिक्त दे डाले हैं। एचएमटी कामगार संघ अध्यक्ष भगवान सिंह ने बताया है कि प्रशासन और वन विभाग अपनी-अपनी भूमि की नापजोख कर रहा है। साथ ही क्वार्टर में बिजली-पानी की समस्या भी है। ऐसे में कर्मचारी अपने भविष्य को लेकर परेशान हैं। जानकारी मिली है कि वन विभाग ने उक्त पफैक्ट्री को जो 33.33 एकड़ भूमि लीज पर दी, उसे वापस लेने की तैयारी है। सर्वे के बाद विभाग अपनी भूमि को लेगा। दूसरी ओर राज्य सरकार रानीबाग एचएमटी से अपनी 14 एकड़ भूमि लेने को नापजोख करवा चुकी है। बन्द हो चुकी फैक्ट्री से भूमि लेने के लिये जिला प्रशासन चैकन्ना है। बताते चलें कि 15 में शुरु हुई एमएमटी फैक्ट्री की स्थापना के लिए वन विभाग और राज्य सरकार ने लीज पर भूमि दी थी। फैक्ट्री का एक बड़ा हिस्सा एचएमटी प्रबन्ध्न ने स्वयं खदीदा था। 22 मार्च 2019 को पैफक्ट्री में अन्ततः ताला लगाना पड़ा। ऐसे में वन विभाग ने अपनी भूमि वापस ले ली। प्रबन्धन की 45.62 एकड़ भूमि के लिए नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन काॅरपोरेशन ने ई-टेंडर मंगाए हैं। साथ ही प्रशासन 13-14 एकड़ भूमि को कब्जा लेने के लिये सक्रिय है।

‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के 42वें साल में

गीता उप्रेती

इस अंक के साथ ही ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के 42वें साल में पहँुच चुका है। सन् 1978 में स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया ने जिस साहस और दृढ़ता के साथ इसकी शुरुआत की वह आज भी नियमित रूप से आपके सामने है। अपने लम्बे सफर में हमने संघर्ष किया है लेकिन वह मिशन जिसके लिये इसे स्थापित किया गया था जारी है। ऐसे समय में जबकि संचार व समाचार के अनगिनत साधन हैं, पिघलता हिमालय जैसे छोटे समाचार पत्र को बनाये रखना चुनौती है। फिर, स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया के मिशन पर इसे बनाये रखना और भी कठिन है लेकिन इस मिशन को चुनौतियां स्वीकार हैं। यही कारण है कि समाचार-विचार की दुनिया को रंगीन बनाकर परोसने के बजाए अपनों को जोड़ने का यह साधन है।
दुर्गा सिंह जी मात्रा 49 वर्ष आयु में इस दुनिया से विदा हो गये थे और उप्रेती जी भी 69 वर्ष आयु में हमें छोड़कर चले गये। इसके बाद श्रीमती कमला उप्रेती ने स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद दृढ़ता के साथ इस मिशन को निर्भीकता और स्वाभिमान के साथ बढ़ाया परन्तु नौ माह पूर्व वह भी 66 वर्ष की आयु में अचानक विदा हो गईं। ऐसे में एक बार फिर से हमारे सामने घोर संकट है लेकिन दिनोंदिन बढ़ती जा रही प्रतिस्पद्र्धा के बीच समय से इस पाती को परोसते हुए हमें लगता है स्व.उप्रेती, स्व.मर्तोलिया, श्रीमती कमला जी हमारे बीच हैं। उन्हीं का स्मरण करते हुए लगातार इसे आकर्षक बनाने की कोशिश की जा रही है। साधनों के आभाव के बावजूद दूरस्थ क्षेत्रों तक अपने प्रिय पाठकों के बीच पिघलता हिमालय पहँुच रहा है। इसे आॅनलाइन पढ़ने की व्यवस्था भी की गई है ताकि दूर तक समय से हमारा सन्देश पहँुचे और नई तकनीक से जुड़ी युवा पीढ़ी अपने प्रिय पत्र को आसानी से पढ़ सके। यूट्यूब चैनल सहित अन्य माध्यमों से भी पिघलता हिमालय को रफ्रतार दी है।
समय की धरा में हर हाथ मोबाइल है और हर क्षण की खबर। साथ ही विज्ञापनों की दुनिया में ‘जो दिखता है, वह बिकता है’ चल रहा है। फिर भी हमें नहीं भूलना चाहिये कि परम्परा और विश्वास हमेशा रहेगा। घोर संकट के समय भी हमारे संस्कार और हमारा विश्वास हमें उबरने में सहायक होता है। पिछले कुछ वर्षों से सरकार की विज्ञापन नीति में छोटे-मझले समाचार पत्रों को अवसर नहीं दिया जा रहा है। विज्ञापन का स्वाद बड़े मीडिया घरानों को लगाया जाता है ताकि नेताओं के बड़े और रंगीन फोटो प्रिंट मीडिया में छपें और इलक्ट्रोनिक मीडिया में दिखाये जाते रहें। इसे मीडिया मैनेजमेंट कहा जाने लगा है। हर प्रायोजित कार्यक्रम के पीछे बड़ा स्वार्थ जुड़ा है। अखबार की ऐसी फैक्ट्री में मिशन पीछे छूट जाता है और विज्ञापन का काबड़खाना शुरु हो जाता है। इस प्रकार के वातावरण में मिशन की पत्रकारिता सिर्फ अपने पाठकों के बल पर की जा सकती है।
प्रिय पाठको! आप ‘पिघलता हिमालय’ परिवार हो, आप ही इसके प्रतिनिधि हो, आप ही इसके विज्ञापनदाता हो, आप ही इसके प्रचार-प्रसार वाले भी। तभी आज ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के इक्तालिस साल पूरे कर चुका है। इसका सारा मैनेजमेंट सीमान्त से लेकर तराई-भाबर तक पफैले हमारे शुभचिन्तक हैं। उन स्थितियों में जब साप्ताहिक पत्रों का रिवाज ही लडखड़ा चुका है, पाठकों में पिघलता हिमालय का इन्तजार इसकी गहरी जड़ों को सिद्ध कर रहा है। इसके पाठकगण एक परिवार के रूप में जुड़े हैं, उनका भावनात्मक लगाव इससे जुड़ने और अपनी अगली पीढ़ी को जोड़ने में सहायक है। आपका यही स्नेह हमारा बल है। इसे आगे बढ़ाने में आप सुध्ी जनों से सहयोग की अपेक्षा है।

प्रकाश पन्त : एक सेवाभावी फार्मेसिस्ट, जो बना जनप्रिय नेता

हेम पन्त

जुलाई 2017 में GST लागू हुआ, उस महीने के अंतिम हफ्ते में रुद्रपुर के एक होटल में लगभग 250 व्यापारी और उद्योगकर्मियों को तत्कालीन वित्तमंत्री प्रकाश पन्त GST के बारे में समझा रहे थे। लगभग 1 घण्टे में उन्होंने तार्किक तरीके से, पुष्ट आंकड़ों की मदद से अपनी बात रखी और लोगों के प्रश्नों के स्वयं उत्तर दिए। मंत्री जी के बाद कर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी अपनी बात रखने के लिए आए। कर अधिकारी ने अपनी बात इन शब्दों से शुरू की – “जिस तरह से मंत्री जी ने GST के बारे में आपको समझाया है, उसके बाद मेरे कहने के लिए कुछ नहीं बचता”। सिर्फ 59 साल के ऐसे योग्य और अनुभवी राजनेता का असमय निधन उत्तराखंड राज्य के लिए बहुत बड़ी क्षति है।

11 नवम्बर 1960 को एक सामान्य परिवार में जन्मे प्रकाश पन्त जी ने द्वाराहाट से फार्मेसी की पढ़ाई के बाद फार्मासिस्ट के तौर पर लगभग 4 साल तक सरकारी सेवा की। अपने बचपन में निष्काम भाव से पिथौरागढ़ शहर और आसपास के गांवों में गरीबों की सेवा करते हुए मैंने भी उन्हें देखा। तब पन्त जी हमारे गांव-पड़ोस में देर शाम तक बीमार, अशक्त लोगों को दवाई देते हुए और इंजेक्शन लगाते हुए अक्सर दिख जाते थे। पिथौरागढ़ सेना छावनी में ठुलीगाड़ नामक जगह पर एक छोटे से कमरे में उनकी फार्मेसी क्लिनिक पर जितनी भीड़ लगती थी, उतनी शायद ही पिथौरागढ़ शहर के किसी डॉक्टर के पास लगती होगी। उनकी बहुत कम मूल्य की (और अक्सर मुफ़्त भी) दवाइयों के बारे में ग्रामीण लोग अक्सर कहते थे – “हमको तो पन्त जी के हाथ की दवाई ही असर करती है”। सौम्यता, मधुर मुस्कान, कोमल स्वर और लोगों के बीच घुलमिलकर रहना उनका मूल स्वभाव था और यह अंत तक बना रहा।

अपनी सरकारी नौकरी के दौरान वह कर्मचारी यूनियन से जुड़े और उत्तराखंड के कई हिस्सों में विभिन्न जनआंदोलनों में सक्रिय रहे। बाद में नौकरी छोड़कर पिथौरागढ़ के जिला अस्पताल से थोड़ी सी दूरी पर ‘पन्त फार्मेसी’ नाम से दवाइयों की दुकान शुरू की। खड़कोट क्षेत्र से पिथौरागढ़ नगर पालिका के सदस्य बनकर उन्होंने अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। उत्तराखंड राज्य बनने से पहले वह उत्तर प्रदेश की विधान परिषद के सदस्य बने और सन 2000 में राज्य स्थापना के बाद उत्तराखंड विधानसभा के प्रथम विधानसभा अध्यक्ष निर्वाचित किए गए। 2002 से 2007 और 2017 से मृत्युपर्यन्त पिथौरागढ़ के विधायक रहे। उनके जीवन में 2 बार उत्तराखंड राज्य के मुख्यमंत्री बनने के मौके आए, लेकिन दोनों बार वह राजनैतिक समीकरणों के कारण चूक गए। समय-समय पर उत्तराखंड सरकार में वित्त, संसदीय कार्य, पर्यटन, पेयजल, आबकारी और गन्ना सहित अनेक मंत्रालयों में उत्कृष्ट कार्य किया। दिखावे और सिफारिशी नेतागिरी से वह यथासम्भव दूर रहते थे और राज्यभर में धरातल पर सार्थक कार्य कर रहे लोगों के बारे में खुद जानकारी जुटाकर मिलने की कोशिश करते थे। देहरादून में पन्त जी के मंत्री आवास के वेटिंग रूम में चिपकाई गई एक निवेदनपूर्वक पर्ची से उनके सरल स्वभाव का अंदाजा आसानी से लग जाता है। इस पर्ची पर लिखा है – “कृपया मेरे सामने मेरी प्रशंसा व दूसरों की आलोचना न करें।”

पिथौरागढ़ शहर और आसपास के ग्रामीण लोगों के लिए प्रकाश पन्त जी एक पारिवारिक सदस्य जैसे थे। लगभग 35 वर्षों की निस्वार्थ सेवा के कारण अपने क्षेत्र के युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं के बीच वह एक चहेते नेता के रूप में लोकप्रिय रहे। पिथौरागढ़ में इंजीनियरिंग कॉलेज, हवाई सेवा, पेयजल योजनाओं और हर गांव में उनके व्यक्तिगत प्रयासों से किए गए अनेक छोटे-बड़े विकास कार्यों के कारण वह अपने क्षेत्र की जनता के दिलों पर राज करते हैं। कुशल-तार्किक वक़्ता और अध्ययनशील प्रकाश पन्त जी उत्तराखंड ही नहीं पूरे देश के राजनैतिक परिदृश्य में एक साफ छवि के राजनेता के रूप में पहचाना जाता है।

राजनीति में रहते हुए भी वह अन्य गतिविधियों में खासे सक्रिय रहे। एक कवि और लेखक के रूप में उन्होंने 4 चर्चित पुस्तकें लिखीं। राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भाग लिया और पदक भी जीते। अपने सार्वजनिक जीवन में वह जनता के लिए सदैव उपलब्ध रहे। राज्य या देश के किसी भी स्थान पर उनसे कोई भी आसानी से मिल सकता था। उत्तराखंड राज्य के वरिष्ठतम मंत्री के पद पर रहते हुए भी वह अपने मोबाइल पर हर पल लोगों की समस्याएं सुनते थे और यथासम्भव समाधान भी करते थे। छोटे-बड़े कार्यक्रमों में सिर्फ एक फोन के बुलावे पर राज्य के कोने-कोने में पहुंचने वाले नेता के रूप में लोग उनको लंबे समय तक याद रखेंगे।

ऐसे दौर में जब लोग राजनीति में स्वच्छ छवि वाले सेवाभावी लोगों की कमी होती जा रही है, उस समय प्रकाश पन्त जी जैसे सर्वप्रिय नेता और जनता के हितैषी व्यक्ति का आकस्मिक निधन उनके परिवार-पार्टी या उत्तराखंड की ही नहीं, पूरे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है।