भातर-तिब्बत व्यापार के वह दिन खूब थे

कृष्ण सिंह  व विशन सिंह  से बातचीज

डाॅ.पंकज उप्रेती
सीमान्त वासियों की उस पीढ़ी को भारत- तिब्बत व्यापार के पुराने मीठे दिन आज भी याद हैं जिसमें उन्होंने भागीदारी की या उसे देखा। अपनी पुरानी यादों के साथ वह वर्तमान की तुलना करते हैं और चाहते हैं कि बदलाव तो प्रकृति का नियम है परन्तु उनकी विरासत बनी रहे, उनके बुजुर्गों ने जिस परम्परा को वर्षों सहेजे रखा नई पीढ़ी उसे भूले नहीं। इन्हीं सब बातों को लेकर 81 वर्षीय कृष्ण सिंह गब्र्याल और 68 वर्षीय विशन सिंह गब्र्याल जी से बातचीत हुई।
कृष्ण सिंह जी बताते हैं कि गाँव में बचपन की पढ़ाई के बाद सन् 1951 कक्षा 6 में पढ़ने के लिये पांगू गये। उनकी पाठशाला जीवन-जगत का व्यवहार था। देखा-देखी वह अपने बुजुर्गों के साथ भारत-तिब्बत व्यापार में जुट गये। सारे परिवार अपना-अपना सामाना लेकर तिब्बत जाता थे। हिन्दुस्तान से सारा सामान तिब्बत को जाता था और वहाँ से मुख्य रूप से उन लाते थे। सन् 1962 में चीन आक्रमण के बाद सीमान्त का यह व्यापार बन्द हो गया। उससे पहले आपसी व्यापार की सुन्दर परम्परा थी। आने-जाने में कोई रोक नहीं थी। किसी प्रकार का टैक्स वहाँ नहीं पड़ता था। गाँव में घर-घर टैक्स जमा करते थे। भारत- तिब्बत व्यापार बन्द हुआ तो गाँव में टैक्स जमा होना भी बन्द हो गया। सन् 1992 में नेपाल के रास्ते व्यापार हुआ तो उसमें भारतीय व्यापारियों ने नेपाल के व्यापारियों को सामान दिया। उन्होंने बहुत कमाया। अब पुराने समय का जैसा व्यापार नहीं होता था। पहले समय में तो जितना सामान जो भी तिब्बत मण्डी जाता वह सब बिक जाता था। भारत-तिब्बत व्यापर के वह दिन खूब थे। सीमान्त के व्यापारियों के पास नकद रुपया भले ही उतना न हो लेकिन मान सम्मान के साथ सामग्री बहुत थी। परिवार के परिवार अपने कारोबार से खुश थे।
कृष्ण सिंह जी बताते हैं कि एक ओर सन् 62 में सीमान्त का व्यापार बन्द हो गया दूसरी ओर सन् 1966 में गब्र्यांग में भूस्खलन से जमीन ध्ंसती रही और खतरा बढ़ने लगा। ऐसे में मुख्यमंत्री एन.डी.तिवारी ने तराई में सितारगंज के पास बसने के लिये भूमि दी। जिसमें सिद्ध गब्र्यांग ग्राम बसा। शुरुआत में सीमान्त के परिवारों को नई जगह आने में दिक्कत हुई। क्योंकि ठण्डे इलाके के रहने वालों को भीषण गर्मी में रहने की आदत नहीं थी। तराई की भीषण गर्मी में ढलने में परिवारों को काफी समय लगा। वर्तमान में सिद्ध गब्र्यांग में परिवार रहते हैं और अपनी परम्परा के अनुसार रीति-रिवाज मनाते हैं। पूजा व अन्य विशेष अवसरों पर अपनी घाटी में जाते हैं।
विशन सिंह गब्र्याल अपने बचपन को याद करते हुए कहते हैं तब साधन नहीं थे। सुगम मार्ग नहीं थे, उनमें जानवरों के साथ पूरा लाव-लस्कर जाता था। धारचूला से गब्र्यांग जाने में ही सप्ताह भर लग जाता था। जाते समय आधे रास्ते में सिंखोला गाँव में परिवार 10-12 दिन रुकते थे और उनके जानवर हरी घास चरते थे। आजकल आने-जाने में रुकावट नहीं है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में यातायात के साध्न और मार्ग हैं। गाँवों से पलायन के बारे में वह कहते हैं कि किन्हीं कारणों से जो लोग बाहर बस चुके हैं वह लौटकर नहीं जा पाते हैं क्योंकि उनकी नई पीढ़ी पढ़ाई-नौकरी इत्यादि कारणों से वहीं की होकर रह जाती है। इन सबके बाद हमारी कोशिश है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहें। इसके लिये तमाम अवसरों पर लोग मिलन समारोह के जरिये एक-दूसरे से मिलते रहते हैं, सहयोग करते हैं।

रोहित की मौत की गुत्थी सवालों से घिरी है

पि.हि. प्रतिनिधि
रोहित शेखर उस युवा का नाम है जिसने चार बार के मुख्यमंत्री और राज्यपाल रहे नारायणदत्त तिवारी सेे लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद जीत गया था लेकिन वह छोटी उम्र में हार गया। माता उज्जवला और पिता एनडी तिवारी के पुत्र रोहित शेखर ज्यों ही अपनी निजी लड़ाई में सफल हुए और एनडी के उत्तराधिकारी के रूप में समाज के सामने आये, राजनीति के झूले में सवार दिग्गज डोलने लगे थे। विशेषकर नैनीताल लोकसभा सहित तराई की विधनसभा सीटों पर तिवारी जी चाहने वाले रोहित को घेरकर चलने लगे और माना जा रहा था वह किसी न किसी तरह जीत दर्ज कर रास्ता बना लेंगे। रोहित हवा का रुख एक ओर गया गया था। कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टी के अलावा निर्दलीय मौका उनके पास था।
पिता-पुत्र के मिलन के बाद कुछ नेताओं को परेशानी महसूस होने लगी थी कि अब रोहित के प्रकट होते ही वह मौका पा जायेगा। तिवारी जी भी पुत्र मोह में रोहित के लिये अवसर बनाने लगे थे लेकिन अपनी निजी जिन्दगी के पन्नों से जो घाव उन्हें मिले थे, ऐसे में कोई भी पार्टी उन्हें अपनाने में परहेज कर रही थी। कांग्रेस पार्टी के सिपाही के रूप में उम्र बिताने वाले एनडी से कांग्रेसी नेताओं ने दूरी कर ली थी। यहाँ तक कि जिन लोगों को तिवारी जी ने पनपाया वह भी दूर भागने लगे थे। ऐसे में एक उनके पारिवारिक दीपक बल्यूटिया ने अपने साथियों के साथ मिलकर हल्द्वानी में आयोजन कर दिया। एनडी के जन्मदिन के इस भव्य आयोजन में उज्जवला-एनडी-रोहित सहित सभी पार्टियों के दिग्गज आये। समाजवादी पार्टी का जोश सबसे ज्यादा रहा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव पं. तिवारी को बहुत मानते रहे हैं। उनके सुपुत्र और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी बुजुर्ग एनडी का सम्मान करते। उनकी इच्छा थी कि आयोजन के बहाने रोहित सपा में सम्मिलित हो जाएं और उत्तराखण्ड में पार्टी का खाता खुले। यदि उस समय रोहित सपा के टिकट पर चुनाव लड़ जाते तो निश्चित रूप से एनडी के संरक्षण में वह हल्द्वानी या तराई की किसी विधनसभा सीट पर सफल हो सकते थे। कांग्रेस से झटके खा चुके एनडी की मंशा उसी पार्टी में रोहित को स्थापित करने की थी परन्तु अपने राजनैतिक भविष्य के लिये दूसरे नेता यह पचा नहीं सकते थे। इसके बाद भाजपा में रोहित के लिये कोशिश की गई लेकिन एनडी के व्यक्तिगत जीवन के पन्नों को उघाड़ते हुए इन दोनों पार्टियों ने रोहित को अवसर नहीं दिया। समय बीता और रोहित इन तीनों पार्टियों में से किसी में भी प्रत्याशी के रूप में अनफिट मान लिये गये। जबकि हवा का रुख एक ओर करने वाले इस युवा में कई सम्भावनाएं थीं। 11 मई 2018 को सुप्रीम कोर्ट में वकील इंदौर निवासी अपूर्वा शुक्ला के साथ इनका विवाह हुआ। पिता एनडी के अस्वस्थ्य होने के कारण यह विवाह बेहद सादे रूप में की गई और वर-बध्ू अस्पताल में पिता का आशीर्वाद लेने गये।
एनडी का परिवार बनने के बाद से रोहित लगातार अपनों के बीच जुड़े रहे और 11 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के मतदान के लिये बिन्दुखत्ता आए थे। अपनी माँ उज्जवला के स्वास्थ्य खराब होने के कारण वह दिल्ली लौटना पड़ा। जहाँ उनकी संदिग्ध् हालतों में मौत हो गई।

उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन.डी.तिवारी के पुत्र रोहित शेखर का 16 अप्रैल 2019 को निध्न हो गया। 39 वर्षीय रोहित डिफंेस कालौनी में रहते थे। उन्हें दिल्ली के मैक्स साकेत अस्पताल में लाया गया, जहाँ डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। उनकी मौत को संदिग्ध् मानते हुए सवाल भी उठाये जा रहे हैं। रिपोर्ट में उनके गले पर निशान बताये गये हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद कहा गया है कि रोहित को गला घोंटकर मारा गया। मौत वाले दिन रोहित की माँ अपने घर तिलक लेन स्थित सरकारी आवास पर चली गई थीं। दिल्ली पुलिस ने पीएम रिपोर्ट के आधार पर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है। अपराध् शाखा इसकी जाँच कर रही है। इस प्रकरण में शक परिवार पर ही है। चल रही जाँच के बाद पता चला कि रोहित और उनकी पत्नी अपूर्वा के बीच विवाद था। शादी से पहले दोनों लिव इन रिलेशनशिप में थे और बाद में शादी कर ली।
रोहित की माँ उज्जवला ने बताया कि रोहित तनाव में रहता था, जिस कारण उसे नींद तक नहीं आती थी। पुलिस ने छानबीन और पूछताछ में रोहित की पत्नी अपूर्वा, उज्जवला के चचेरे भाई राजीव उसकी पत्नी कुमकुम, घर के नौकर मारथा के साथ बात की है। रोहित तो मौत के मुंह चला गया लेकिन उसका जिन्दगी अपने आगे-पीछे सवाल ही सवाल छोड़ चुकी है। इस जीवन-जगत में कौन सत्य के कितने करीब है और स्वार्थो के लिये कौन किसके साथ जुड़ा रहता है। यह सब रोहित शेखर के जीवन से देखने को मिल रहा है। रोहित भी जीवन के बहुत सारे सत्य को नजदीक से देख चुका था इसलिये वह खुलकर जीना चाहता था, जब तक रहा भिड़ता रहा। उसकी मौत का सच सबको चैंकाने वाला है।

स्मृतिशेष की स्मृतियाँ : ताकि सनद रहे

पुस्तक समीक्षा

प्रयाग जोशी

विगत वर्ष यानी 2018 में लिखी गजेन्द्र सिंह पांगती की चाौथी किताब पढ़ने को मिली। यह किताब ‘धर्म राय: जोहार का जनसेवक’ शीर्षक से छपी है, जो 1889 में, मिलम में पैदा हुए थे और 1964 में उनकी मृत्यु हुई थी। जेठुवा शौका के लड़के धर्म सिंह को उनकी जाति-विरादरी के लोग बचपन में धरमू के नाम से जानते थे। जेठुवा का परिवार शौका समुदाय के औसतन खाते-पीते परिवारों से बेहतर स्तर का था। तेजू और धरमू दो भाई थे परन्तु माता-पिता की मृत्यु के बाद वह हैसियत नहीं रही। धरमू की तो पत्नी भी मर गई तो उसने उसकी बहन से दूसरी शादी की। जिससे एक लड़की हुई। दुर्भाग्य ऐसा रहा कि कुछ ही समय के बाद वह पत्नी और उससे उत्पन्न लड़की भी जीवित नहीं पह पाए। पिता के बखत का तिब्बत के साथ व्यापार के संग-संग चला आता बकरियों और घोड़ों की तिजारत व भारवाही का धन्धा भी चैपट हो गया। समय ऐसा आया कि पशुओं के नाम पर उसके पास सिपर्फ एक झुप्पू ही शेष रह गया। विपदा ऐसी आ पड़ी कि धरमू को, नीतिघाटी के मूल निवासी और पीपलकोटी के समीप भीमतल्ला गाँव में जाकर बसे हुए अपने मामा के आसरे जाना पड़ा जिससे उसे धन्धे में लगाने के लिए पाँच बकरियाँ दीं। उनकी पीठ पर सामान लाद कर, एक पूरे मौसम में उसने पीपलकोटी और जोशीमठ के बीच फेरी का काम किया और इतनी कमाई की कि उससे उसने अपने घर भैंसखाल आकर दस और बकरियाँ खरीदीं। तीसरी बार शादी की जिससे उसका घर व व्यवसाय जमा। उस सीजन के फायदे से, बहुत बाद के वर्षों में धरमू ने पीपलकोटी में पूरे शीतकाल की अवधि के लिए दूकानदारी भी शुरु की और उस अनुभव को काॅडा में भी दुहराया।
सम्भवतः वह बीसवीं सदी का दूसरा दशक रहा होगा जब ध्रमू ने अपने पुश्तैनी भारत-तिब्बत व्यापार में हिमालय के नाके के आर-पार आने का रूटीन पकड़ा होगा।
उन दिनों मिलम मार्ग से कैलास- मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के दलों को भी शौका व्यापारियों के साथ की जरूरत पड़ती थी जिनमें अधिकांश धनीमानी देशवासी और साधू-महात्मा हुआ करते थे। कठिन यात्रा थी। सुविधओं का अभाव था। धरमू सार्थवाही के साथ-साथ यात्रियों की सुख-सुविध भी जुटाते थे। उनकी सेवा-टहल करते। मिलम में उनके रहने-खाने और विश्राम की मनोयोग से व्यवस्था करते थे और कुँगरी-बिंगरी, उटाध्ुरा और जयन्ती पहाड़ों के उस पार तिब्बत में पड़ने वाली पहली बस्ती गेरती तक पहँुचाने में सहायता करते थे।
व्यापार का रुख व किस्मत अनुकूल होती गई। मेहनत, हुनर, ईमान व सेवाभाव की बलिहारी है कि पन्द्रह बकरियों की पूँजी से शुरु हुआ धरमू का कारोबार डेढ़ सौ से दो सौ बकरियों के रेबड़ तक पहुंचा। भारवाही बकरियों के अलावा लगभग उतनी ही भेड़ें भी उसके ख्वाड़ में भर गई जो उन उत्पादन का जरिया थी। उसके पास छः सात घोड़े-खच्चर हो गए। उसने भेड़ चराने के लिये अण्वाल, बकरियों के लिये ग्वाले, सामान चढ़ाने- उतारने के लिए ढकरियाल, घोड़ों के साईस, घरेलू काम के लिए नौकर-चाकर रखे। पशु-मवेशी और व्यापार की वृद्धि के साथ मुद्रा धन भी उत्तरोत्तर बढ़ता गया। 40 वर्ष की उम्र तक धर्मसिंह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता ही गया परन्तु चालीस की उम्र आते आते उसे दमे की शिकायत होने लगी थी तो उसने हिमालय के आर-पार की आवाजाही और मवासा लेकर मिलम-मुनस्यार से नघर इलाकों में आवत-जावत धीरे-धीरे कमतर कर दी। वे जून से सितम्बर तक मिलम में रहते थे जहाँ से वे तिब्बत के साथ होने वाले व्यापार का संचालन, कैलास मानसरोवर जाने वाले तीर्थ यात्रियों व साध्ु-सन्तों की सेवा व दवा-दारु का जनसेवा की भावना से संचालन भी करते थे। अक्टूबर-नवम्बर में वे मुनस्यारी आ जाते थे। पँूजी का इश्तेमाल ब्याज पर रिण देने में शुरू किया। यह साहूकारी का धन्धा था। इसकी बढ़त से उसने तिकसेन-मुनस्यारी, तेजम-भैंसकोट आदि ठिकानों में खेत खरीदने शुरु किये। भतीजे महिमन सिंह की हिस्सेदारी खरीदने के बाद तो धर्म सिंह के पास काफी जमीन हो गई जो तल्ला जोहार के कई गाँवों में फैली हुई थी जो साठ के दसक में जमीदारी उन्मूलन के एक्ट के अन्तर्गत् सीलिंग में आई थी।
धर्म सिंह अपने खेतों को काश्तकारी के लिए बटाई पर देता और बदले में उपज का अनाज वसूलता था। धरमू , सेठ तो था ही, जमीन के मालिकाने से शौको के समुदाय ने उसे धरमूसिंह सेठ की जगह धरम राय कहना शुरु कर दिया। ंअंग्रेजों ने, मैदानों में कायस्थ जमीदारों को ‘राय’ की उपाधि देने का चलन शुरु किया था। अंग्रेजी सरकार हजार-बारह सौ सालाना लगान के मालिकाने के भू-क्षेत्रों केा इनाम के बतौर देकर भी अपने चहेतों को भी ‘राय’ बना देती थी। लोगों में ऐसे राय बहादुरों का रूतबा हो जाया करता था। किशनसिंह रावत को सर्वे आॅफ इण्डिया के लए उत्कृष्ट काम करने के लिए झलतोला स्टेट देकर रााय साहबी से नवाजा गया था। धर्मसिंह को अपने व्यापारिक जोखिम से अर्जित पँूजी से खरीदी गई जमीन के एवज में अंग्रेज भला क्यों ‘राय साहबी’ देते। लेकिन शौका समुदाय में वह राय साहब प्रसिद्ध हो गए थे। परन्तु धरमू शब्द की पारिभाषिकता न ‘सेठ’ शब्द से सार्थक होती है न ‘राय’ से। सेठ-साहूकारी और जमीदाराना राय साहबी तो उसके लिए रोजी-रोटी व कुटुमदारी के लिए जुटाए गए ‘ऐसेट’ भर थे। उसने भौतिक माया के साथ धर्म की संगति को कितनी मानवीयता से जोड़ा, इस कत्थ्य को पांगीत ने ‘धर्मिक आस्था व कार्य, जन सेवा, मापांग और दूधपानी शीर्षकों के चार परिच्छेदों में विस्तार दिया है। ये धर्मसिंह के जीवन से जुड़े हुए गैर- व्यावसायिक लोकोपकारों के लेखे-जोखे हैं जिनको रेखांकित करने के लिए कौशल्या की सटीक स्मृतियाँ उल्लेखनी हैं।
‘उनका रिंगाल से बना एक कैश बाॅक्स था। वह बाहर से बाघ के खाल से मढ़ा हुआ था। उसे प्याटरी कहते थे। पूरे घर में एक ही प्याटरी थी। उसका ताला एक अंक का प्रयोग करने पर ही खुलता था। व बन्द होता था। समय के साथ बाबा की आँखें कमजोर हो गई थीं। मैं साथ में हुई तो ताला खोलने और बन्द करने का काम मेरा ही होता था। पैसा तो उसमें ज्यादा होता नहीं था लेकिन पैसा उधर लेने वाले आते रहते थे। मैं कहती पैसा तो है नहीं क्येां दे रहे हो। वे कहते थे जरूरतमंदों को देना भला होता है। कल कोई उधर चुनाने वाला भी आएगा। तब पैंसा आ आएगा।’ इसी तरह के विचारों से उनमें जनसेवा और परोपकार की भावना जागी और उन्होंने अपना समय और धन निःशुल्क दवा वितरण, सड़क निर्माण, मिलम गाँव में पानी लाने जैसे जनसेवा के कार्यों को समर्पित कर दिया था। यद्यपि वे ऐसे कार्यों की शुरुआत अपनी दूसरी पत्नी व मृत- पुत्री के स्मारक के रूप में एक धर्मशाला का निर्माण करके बहुत पहले ही कर चुके थे। यह धर्मशाला मिलम से एक पड़ाव आगे समगों के बयाबान में बनाई गई थी जहाँ हिमालय के बकरिया बाटों में चढ़ने वालों को खुले आकाश में रात गुजारनी पड़ती थी। कोई-कोई टैंट लगाते या पत्थरों की आड़ या ओड्यारों में शरण ढूंढते थे।
धर्म सिंह नित्य सुबह शाम मिलम स्कूल से लगे विस्तृत मैदान और मिलम कचहरी में देखने जाते कि क्या कोई नया यात्री आया है। यात्री बहुधा उक्त मैदान में टैंट लगात थे। कुछ अकेले आने वाले साध्ू पांगती कचहरी में भी ठहरते थे। वे हर यात्री से अनुरोध् करते कि उनके घर भोजन करने आयें। साध्ु लोग तो निमंत्रण सहर्ष स्वीकार कर लेते लेकिन कुछ सम्पन्न यात्री असमर्थता जताते। जो भोजन के लिए नहीं मानते उनसे वे अनुरोध् करते कि कम से कम जलपान के लिए अवश्य आयें।
1936 के आसपास एक साध्ू के लिए धर्म सिंह ने पुरदुम में कुटिया बनाई थी। कौशल्या लिखती हैं, ‘हमने बचपन में किस्म-किस्म के साध्ुओं को देखा। कोई मौनी बाबा, कोई फलाहारी, कोई सिर पर ढेर सारी लट्टीधरी, कोई बहुत ज्ञानी, कोई बातूनी जिन्हें वे खाना खिलाते और कैलास व तीनध्ूरा पार करने के बारे में बताते थे। उन्हें, वे अपने घोड़ों व बकरियों के साथ भेज कर हिमालय पार कराते थे।
एक बार एक अकेली औरत कैलास जा रही थी। उस औरत को भाभियों के साथ रखा। वह पाँच दिन तक रही। जिस साध्ू के लिए उन्होंने पुरदुम में कुटिया बनाई थी, उसके लिए 15 नाली जमीनी खरीदी थी। वहाँ सुरई के सुंदर पेड़ जगाए थे। बाद में कुटिया के साथ धर्मशाला भी बनवाई।’ उक्त बाबा के संक्षिप्त वृत्त में योग के गूढ़ रहस्य पढ़ने लायक हैं।
सन् 60 के दसक में धर्मसिंह ने मिलम में भी एक नित्वाल का घर खरीदा था और उसे अपने लड़के बालमसिंह की याद में धर्मशाला के रूप में सुरक्षित कर दिया था। उन दिनों भैंसखाल से शामा होकर बागेश्वर को आने वाले रास्ते की सीधी चढ़ाई में प्यास के मारे लोगों के कंठ सूख जाया करते थे। निर्पाणी रास्ता था। धर्म सिंह ने बाखर धार में निज के खर्च से प्याउ बिठाया था। उसमें नियुक्त किया गया आदमी रामगंगा से अथवा रमारी के किसी नौले से कनस्तर में पानी भर लाता और बाॅखरधर में लाकर लोगों को पानी पिलाया करता था। धर्मसिंह ने इसी प्रकार बोग्ड्यार और मापांग के बीच अपने खर्च से अपेक्षाकृत बेहतर मार्ग का निर्माण करवाया था। इस रास्ते से चलकर पहाड़ी की चोटी पर पहँुचने वालों के लिए कुछ दिनों तक उसने चने चबेने के वितरण की भी व्यवस्था की थी। एक बोरी चना और स्टील के कंटेनर में चाय भरकर रखी रहती थी। एक आदमी दिन भर वहाँ मुश्तैद रहता था जिसकी मजदूरी धर्मसिंह देता था। आज की भाषा में ट्रेकरों के लिए जुटाई जाने वाली इस तरह की सार्वजनिक सेवाओं के तरीके, धर्मसिंह जैसे उदार और पर्वत प्रेमी बुजुर्ग के मौलिक मन में ही आ सकते थे। गांेखा गाड़ के पानी को गूल के निर्माण के जरिये मीलम गाँव में पहँुचा देना तो धर्मसिंह की अद्भुत और अचंभित कर देने वाली कार्य योजना थी। मलेथा की गूल निर्माण में जो पुरूषार्थ माधेसिंह भण्डारी ने कर दिखाया था वैसा ही पुरूषार्थ है यह धर्मसिंह का। फर्क सिर्फ एक है मलेथा में माधेसिंह के द्वारा पुत्र के बलिदान की जनश्रुति है। मीलम की पेयजल योजना धर्मवीर और दानवरी जनसेवक की चरितार्थता है। एक पहाड़ी को काटकर और गोरीगंगा जैसी बड़ी सदानीरा नदी के उफपर से लकड़ी के पनालों से मीलम गाँव में लाया गया पानी धर्मराय की जैजैकारी का कारक बना था।
भौगोलिक रूप से अति विकट और आध्ुनिक देश-काल में शून्य जमा पूँजी से सार्थवाही व्यापार प्रबन्ध शुरू करके अपनी जमात का यशभाजन बनने के उपरान्त थे, धरमू के व्यक्तिगत जीवन के महत्तर को पकड़ने की ईमानदार कोशिश की है गजेन्द्र सिंह पांगती ने। धर्मसिंह, लेखक के पितामह के भाई हैं परन्तु उसके लेखन में रिश्ता उपर नहीं है। उसमें न डींग है न अपने को महिमामंडित करने का प्रयास। यह धर्मसिंह की जीवनी तो है ही प्रकारांतर से शौका-जीवन के कत्थ्य को समूह- जीवन के विस्तार में इस ढंग से फैलाया गया है कि वह व्यक्ति की दास्तान होते हुए भी 20वीं सदी के शुरु के पचास वर्षों की शौका-समुदाय की जीवन- संधरिणी गाथा भी बन गई है। इसे, शौकों के महा-हिमालय के आर-पार चलने वाले व्यापार के साथ जोहार और भाबर के बीच चलने वाले तीन-तीन जलवायुओं में चलने वाले मवासा-मौजा परिवर्तन करते रहने की दुश्वारी के साथ उनकी विकसित हुए अर्थ-तंत्र के शास्त्रीय विवेचन की एक और किताब भी कह सकते हैं।
इस किताब का एक आधुनिक आयाम भी है। आजकल नौकरी और दूसरे धंधे के लिए लोगों की आवाजाही वैश्विक हो गई है। लोग जहाँ जा रहे हैं, वहीं घर खरीद कर बस जा रहे हैं। ऐसेे लोगों के संज्ञान में यह जानकारी रखनी जरूरी होती जा रही है कि उनके रक्त संबंधी, भाई-बिरादर कहाँ-कहाँ हैं, कैसे हैं और क्या कर रहे हैं। पैत्रिक गाँवों, नाते-रिश्तों और अपनी जड़-कंजड़ से जुड़ाव रखने वाले समझ-बूझदार लोग उन सारी सूचनाओं का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। इण्टरनेट व मोबाइलों की मदद से अपने वंशध्रों की सामूहिक सूचनाओं को एकत्रित करके दस्ताबेजी किताबों के प्रमाणिक वृहत्तर संस्करण भी छपकर आ रह हैं। इस किताब में भी कौम का दस्तावेजीकरण तो है ही, साथ ही उसका सामाजिक अध्ययन, उसकी कमियाँ, सांस्कृतिक संचेतना और उनके धर्म, नृवंश और इतिहास के तहकीकात की कोशिश है। लेखक ने जहाँ तक हो सका है पिष्ट-पेषण से बचने की कोशिश की है। लेखक की दिली इच्छा है कि शौकों पर अभी तक जितना व जो लिखा गया है उसका मूल्यांकन हो। जो खोजने को बचा हुआ है उसे खोजा जाय। उसकी जद्दोजहद 1950 के बाद अपने समाज में पैदा हुए बच्चों तक उन जातीय स्मृतियों को पहँुचाने की है जिनमें तिब्बत के साथ व्यापार करने की जोखिमें मित्रता पर आधरित व्यापार पथों पर गमनागमन, कौमी विशिष्ट जीवन शैली और कठिन जीवन-यापन से जुड़ी सहजता है। वक्त की विडम्बना है कि नयी पीढ़ी उसे विस्मृत करती जा रही है।

चुनाव 2019 : घूंसा सा जड़ रहे हैं

कार्यालय प्रतिनिधि

लोकसभा चुनाव के लिये पूरे देश में पार्टियों का प्रचार अभियान चल रहा है। प्रचार के इस अभियान में नम्बर पूरे पाने के लिये पार्टियों की कसरत हो रही है। ऐसे में उत्तराखण्ड की पांच लोकसभा सीटों को भी अपने पक्ष में करने के लिये पार्टियों का ध्यान है। मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा ज्यादा हाथ-पांव मार रहे हैं। इसके लिये स्टार प्रचारकों की झड़ी लगा दी गई है। वैसे तो नामांकन से पहले से ही बड़े कद वाले नेताओं का आना शुरु हो चुका था। अब सत्ता संग्राम में कौन कमी करेगा?
एक-दूसरे पर घूंसा सा जड़ रहे नेतागण तर्क-कुतर्क भी कर रहे हैं। अपने बयानों में वह इतनी हड़बड़ाहट में हैं कि उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा है सिवा अपने काम के। इसके लिये मोदी, राहुल, रापफेल, आतंकवाद, बेरोजगारी, चैकीदार, जुमलेबाजी, भ्रष्टाचार जैसे शब्दों को लेकर लाग-लपेट कर रहे हैं। देश के बड़े मुद्दों के अलावा पर्वतीय प्रदेश उत्तराखण्ड की बातों का उल्लेख करते हुए ‘ईजा-बाबू’ ‘दिदी-भुली’ का प्यारा सम्बोध्न सम्मोहन के लिये किया जा रहा है। वीर सैनिकों की भूमि होने के कारण पफौजी परिवारों को भी अपने पाले में करने का यत्न किया जा रहा है। किसानों, गरीबों को हर बार की तरह इस बार भी ललचाया जा रहा है। युवाओं को अपने पीछे चलाने के लिये चमक- दमक भी दिखाई जा रही है। इसके अलावा दो जून की रोटी में भटक से बहुत सारे लोग चुनाव को त्यौहार मानते हुए सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। नेताओं से लेकर पब्लिक तक हर कोई अपने-अपनी मुट्ठी बांधकर चल रहा है जिसके खुलते ही सारा खेल पता चल जायेगा। घूंसा सा जड़ रहे हैं- स्टार प्रचारक। इन्हें बताने और समझाने वाले नेता भी अपने विरोधी की काट के लिये गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं। चुनाव आयोग के सख्त निर्देशों के बाद यह भय जरूर है कि सोशल मीडिया में अनर्गल बयानबाजी न की जाए परन्तु अपनी भड़ास निकालने के लिये हर चाल नेताओें, छुटभैयों, पार्टियों द्वारा चली जा रही है। अपने सामने वाले को निशाना बनाने के लिये उनकी नई-पुरानी उघाड़ी जा रही है।
स्टार प्रचारकों में नरेन्द्र मोदी, राहुल गांधी, अमित शाह, प्रियंका, सोनिया, राजनाथ, योगी आदित्यनाथ समेत तमाम चेहरे सम्बोधन कर चुके हैं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्रियों और वर्तमान मुख्य मंत्री के साथ मंत्री, अभिनेता, संगठन के बड़े नेता और स्थानीय स्तर पर पकड़ रखने वालों का सम्बोधन सुनने को मिल रहा है। पूर्व मुख्य मंत्री हरीश रावत कहते हैं- यूपीए की सरकार केन्द्र में आने पर मोदी राज में चल रहे टैक्स टेरर से व्यापारी वर्ग को निजात मिलेगी। भाजपा का राष्ट्रवाद देश के करीब 12 हजार धनिकों का है जबकि कांग्रेस का राष्ट्रवाद सवा सौ करोड़ लोगों का है। श्री रावत ने कहा कि पांच साल तक जुमलेबाजी करने वाली भाजपा सरकार की उल्टी गिनती शुरु हो चुकी है। पूर्व विधनसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल कहते हैं कि भाजपा से आम जनता खिन्न है, जिसका परिणाम देखने को मिलेगा। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना है कि लोग कांग्रेस की तरफ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं। उनका आरोप है कि भाजपा पूरे सरकारी सिस्टम का प्रचार में दुरुपयोग कर रही है। ऐसे में देश के चैकीदार की विदाई तय है। उन्होंने कहा कि भाजपा के सत्ता में रहते हुए लोकतंत्रा को खतरा है।
केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के लोकसभा चुनाव प्रभारी थावरचंद गहलोत अपने सम्बोधन में कहते हैं यदि देश को विश्व गुरु बनाना है तो मोदी को दुबारा प्रधन मंत्री बनाना है। वह कहते हैं कांग्रेस ने 55 साल तक देश को लूटने का काम किया। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत कहते हैं कि मोदी सरकार की राष्ट्रहित की नीतियों से भाजपा एक बार फिर केन्द्र में काबिज होगी और नरेन्द्र मोदी दोबारा देश के प्रधनमंत्री बनेंगे। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू सांसद बीसी खण्डूरी के सवाल पर कहते हैं कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था और सरकार ने जो निर्णय लिया, उसके बारे में उन्हें पूरी जानकारी है। खण्डूरी को रक्षा समिति का सदस्य हमारी सरकार ने ही बनाया था। कांग्रेस इसे मुद्दा बना रही है। भाजपा के अजय भट्ट कहते हैं कि पीएम मोदी की बात पर जनता वोट देने जा रही है। भट्ट ने कहते हैं कि भाजपा की डबल इंजन की सरकार द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों को कांग्रेस पचा नहीं पा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोश्यारी का कहना है कि देश का चैकीदार जाग रहा है।
कांग्रेस के प्रदेश महामंत्राी एवं पूर्व दर्जा राज्यमंत्राी डाॅ.गणेश उपाध्याय ने कहा है कि केन्द्र सरकार द्वारा प्रधन मंत्री फसल बीमा के नाम पर बहुत बड़ा घोटाला किया जा रहा है। वह इसे राफेल से बड़ा घोटाला बता रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने कहा है कि हम सोनिया, राहुल और प्रियंका गांध्ी के सिपाही हैं। उन्होंने कहा कि हम प्रदेश की पांचों सीटें जीतेंगे, तभी कांग्रेस मजबूत होगी। टिहरी से उक्रांद के प्रत्याशी जयप्रकाश ने कहा कि राष्ट्रीय दलों को क्षेत्राीय जनता से कोई लेना-देना नही है। ऐसे में जनता को जमीन से जुड़े प्रत्याशियों को और सभी सच्चाईयों को समझ लेना चाहिये।
उत्तराखण्ड की पाँचों लोकसभा सीटों पर मुकाबला रोचक है। नैनीताल-उधम सिंह नगर सीट पर पूर्व मुख्यमंत्राी हरीश रावत और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के मैदान में उतरने से सबका ध्यान इस ओर है। इस सीट पर हरीश रावत ने पहले ही जाल बिछा दिया था और वह लोगों के बीच सक्रिय थे इसलिये उनका पलड़ा भारी दिखाई देता है। भाजपा की टीम मजबूत होने के कारण अजय भट्ट का बल बना हुआ है। सीट पर सात दावेदार हैं हरीश रावत कांग्रेस, अजय भट्ट भाजपा, नवनीत प्रकाश अग्रवाल बसपा, डाॅ.कैलाश पाण्डे भाकपा;माले, प्रेम प्रकाश आर्य, ज्योति प्रकाश टम्टा, सुकुमार विश्वास। यूकेडी से विजयपाल चैध्री प्रत्याशी बनाये गये थे लेकिन वह नांमाकन समय तक सम्बोधित दस्तावेज न ला सके जिस कारण उनका नामांकन नहीं हुआ। नैनीताल सीट पर पर्वतीय मूल का बहुसंख्यक मतदाता होने के कारण रावत और भट्ट अपने अपने तरीके से उन्हें साधने लगे हैं। इसके अलावा उध्मसिंह नगर जिले को मिलाकर हर वर्ग के मतदाताओं को रिझाना इनके लिये आसान नहीं है।
अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट पर भाजपा कांग्रेस के पुराने चेहरों पर ही मुकाबला है। भाजपा के अजय टम्टा और कांग्रेस के प्रदीप टम्टा बीच मुख्य मुकाबला माना जा रहा है। सीट पर उपपा की एडवोकेट विमला, बसपा से सुन्दर धैनी, उक्रांद के के.एल.आर्या, द्रोपदी वर्मा, सज्जन लाल याने कुल प्रत्याशियों ने नामांकन करवाया है। कांटे की टक्कर अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट पर है क्योंकि बागेश्वर-चम्पावत जिले भी इसमें हैं और दोनों टम्टा अजय-प्रदीप से कहीं कोई तो कहीं कोई ग्राम नाराज चल रहे हैं।
पौड़ी लोकसभा सीट की घमासान भी देखने लायक है। कांग्रेस प्रत्याशी मनीष खण्डूरी और भाजपा के तीरथ सिंह रावत समेत 9 प्रत्याशियों ने यहाँ हैं। कांग्रेसियों ने भाजपा पर जनरल खण्डूरी का अपमान का आरोप लगाते हुए मनीष के समर्थन में वोट मांगे हैं। ऐसे में भाजपा के पास तीरथ सिंह रावत मजबूत प्रत्याशी के रूप में हैं। यूकेडी से शान्ति प्रसाद भट्ट, दिलेन्द्रपाल सिंह, मुकेश सेमवाल, रामेन्द्र भण्डारी, विनोद प्रसाद नौटियाल, भागवत प्रसाद, आनन्दमणि जोशी इस सीट पर जोर आजमा रहे हैं। बीसी खण्डूरी जिस प्रकार से भाजपा में गुमसुम हो चुके थे उसका पूरा मौका कांग्रेस ने उनके सुपुत्र मनीष को टिकट देकर उठाया है। बांकी तो परिणाम ही बतायेंगे कि जनता के मन में क्या थी।
टिहरी लोकसभा सीट पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह समेत 12 प्रत्याशी हैं। भाजपा की सांसद माला राज्यलक्ष्मी के साथ उनका मुकाबला होना है। प्रीतम सिंह कहते हैं कि टिहरी लोकसभा में पिछले पाँच वर्षों के दौरान विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं।
इसी प्रकार हरिद्वार सीट पर सांसद, पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक सहित 17 मैदान में उतरे हैं। मुख्य मुकाबला निशंक और कांग्रेस के अंबरीश कुमार के बीच है। यहाँ उक्रांद के सुरेन्द्र कुमार उपाध्याय के साथ ही भानपाल सिंह, फुरकान अली, शिव कुमार कश्यप, ललित कुमार, कृष्णध्र पाण्डे भी मैदान में हैं। इस सीट पर रमेश पोखरियाल पहले से ही बेहद सक्रिय हैं और कांग्रेस टिकट फाइनल करने में काफी विलम्ब में रही। फिर भी मुकाबला रोचक होने जा रहा है।
नेतागर्दी के बयान और बनाई गई पार्टी रणनीति का परिणाम आने वाला समय बतायेगा

कुर्सी दौड़ शुरु

लोकसभा चुनाव 2019

कार्यालय प्रतिनिधि
लोकसभा चुनाव के लिये कुर्सी दौड़ शुरु हो चुकी है। पूरे देश में पिछली बार प्रचंड बहुमत पाने वाली भाजपा और मुख्य विपक्ष कांग्रेस सहित अन्य दलों का शोर इन दिनों सरदर्द बनकर सुनाई दे रहा है। देश के हालातों पर दुहाई देने के अलावा एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले सभी दलों की पोल खुल चुकी है। क्योंकि इन्होंने अपने शोर को तेज और तीखा करने के लिये कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी है। कांग्रेस के चैकीदार चोर है’ के जबाव में भाजपाईयों ने ‘मैं भी चैकीदार’ का कैम्पन शुरु किया है। साीशल मीडिया पर खामखां की बहस हो रही है। सभाओं, रैलियों, जन सम्पर्कों का दौर चल रहा है। मतदाताओं को रिझाने के लिये युवाओं को सपने दिखाये जा रहे हैं। सबका ध्यान युवा मतदाताओं पर है, जिसकी लहर चुनाव में परिणाम दिलाने वाली होगी। अपनी रणनीति में भी पार्टियों ने युवाओं को टिकट और युवाओं की सभा को प्रमुखता से रखा है। इसे देश की राजनीति में नया दौर कहा जा सकता है। भाजपा में ही लालकृष्ण आडवाणी समेत 23 सांसदों के टिकट इस बार कट गये। दांव-पेंच के लिये दूसरी पार्टियों ने भी अपनी रणनीति को बदला है। कई बुजुर्ग नेता स्वयं को दौड़भाग से दूर रखना बेहतर मान रहे हैं। पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब, कर्नाटक, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित सभी राज्यांे में पार्टियों की जोड़-तोड़ सर्कस की जैसी लग रही है। कितनी जल्द नेता-अभिनेता रंग बदलते हैं, यह इस बार खूब दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश की सीटों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। यहाँ भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा सभी अपनी-अपनी ताकत दिखा रहे हैं। वाराणसी, लखनउ, रामपुर और अमेठी जैसी सीटों पर यहाँ हर पल की तैयारी के लिये चैकन्नापन है। ऐसे में उत्तराखण्ड की पांच लोकसभा सीटों पर भी रोचक मुकाबला होने जा रहा है। यहाँ नैनीताल- उधमसिंह नगर सीट, अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट, टिहरी सीट, पौड़ी लोकसभा सीट, हरिद्वार सीट पर इस बार पार्टियां बहुत सतर्क होकर उम्मीदवार उतार रही हैं। उतारे गये प्रत्याशियों पर जनता कितना भरोसा करेगी, यह सन्देह है। इसलिये स्टार प्रचारकों सहित पूरा दल-बल जुटा हुआ है।
चुनाव के लिये कांग्रेस की ओर से महासचिव प्रियंका गांधी सबसे लोकप्रिय स्टार प्रचारक के रूप में दिखाई दे रही हैं जबकि भाजपा में नरेन्द्र मोदी नाम ही काफी है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका ने अपनी सभाओं में कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है कि वह अपने वोट का सही इस्तेमाल करें। वह कहती हैं कि चुनाव में सच की जीत होगी। असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की लगातार कोशिश की जाएगी लेकिन वे रोजगार, किसानों और महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दों को लेकर सवाल पूछते रहें। आने वाले दिनों में सही निर्णय लीजिए। यह देश आपका बनाया है। यह चुनाव आजादी की लड़ाई से कम नहीं है। हम मिलकर काम करें और एकजुट होकर आगे बढ़ें।
भाजपा की ओर से नरेन्द्र मोदी यह समझा रहे हैं कि भाजपा ही राष्ट्र को सही दिशा दे सकती है। इसके लिये वह अपने कार्यों को उपलब्धि भरा बता रहे हैं। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका निशाना रहा है, आतंक के समूल नाश के लिये उनका प्रण है। कांग्रेस वंशवादी पर चलती रही है जिसने लोकतन्त्र में दूसरों को मौका नहीं दिया। मोदी कहते हैं उन्होंने घोटालेबाजों में खलबली मची है। वह किसी को नहीं छोड़ेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुुल गांध्ी ने देहरादून में विशाल रैली को
सम्बोधित करते हुए कार्यकर्ताओं में जोश भरा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल ने प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जमकर बरसे और कहा मैं मोदी की गलतियों को सुधरुंगा। इस रैली में भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूरी के पुत्रा मनीष खण्डूरी ने कांग्रेस का हाथ थामा।
इन दोनों पार्टियों के स्टार प्रियंका और मोदी के अलावा अन्य बड़े व छोटे नेताओं कागरजना- बरसना जारी है। कई नेताओं ने अपनी पार्टी बदली है और कुछ ने पार्टी का झण्डा उठाया है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांध्ी का कहना है कि प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद को पीड़ित की तरह पेश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मोदी की गलत नीतियों की वजह से देशवासी पीड़ित हैं। प्रधनमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों का राजनीतिकरण किया। साथ ही अपनी नाकामयाबियों को छिपाने के लिए राष्ट्रीय हितों के मुद्दों से खिलवाड़ हुआ। इस चुनाव में बदलाव का जनादेश होना है।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने भाजपा पर तीखा प्रहार करते हुए कहा है कि अंग्रेजों का साथ देने वाले हमें राष्ट्रवाद न समझाएं। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी अनुग्रह नारायण कहते हैं कि मोदी सरकार ने युवाओं, व्यापारियों व जनता के साथ छल किया है। इसका परिणाम भाजपा को चुनाव में भुगतना होगा और कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी। मुख्यमंत्री व भाजपा नेता त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा है कि विपक्ष बौखला गया है और कुप्रचार में जोर दे रहा है। इसका जबाब जनता देगी।
टिकट बंटवारे के साथ ही वोटरों की परिक्रमा का नजारा इन दिनों दिखाई दे रहा है। नैनीताल लोकसभा सीट पर बसपा से नवनीत अग्रवाल, राजेश दुबे ने नामांकन करवाया। प्रगतिशील लोक मंच ने प्रेम प्रसाद को उतारा है। सबकी आँखों में घूम रही इस सीट पर उक्रांद के काशीसिंह ऐरी लोकप्रिय नेता के रूप में दिखाई दे रहे थे लेकिन सत्ता की भूख और दौड़ी में जब सारे हथकण्डे अपनाये जा रहे हैं, यूकेडी संगठन कितना कुछ दम दिखा सकता है, यह सवाल उठने लगा। काफी मंथन के बाद यूकेडी ने अपनी रणनीति बदली। इस सीट पर भाजपा की ओर से विधयक पुष्कर सिंह धामी और संघ से जुड़े राजू भण्डारी के नामों को लेकर चर्चाएं चलती रहीं लेकिन पार्टी ने अन्त में प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को उतारा है। उनका मुकाबला कांग्रेस के दिग्गज हरीश रावत के साथ होना है। दोनों ही पार्टियांे ने बहुत चतुराई के साथ उम्मीदवारों को उतारा है। किसमें कितना दम है यह मतदान के बाद पता चल जायेगा। यहाँ बसपा प्रत्याशी सुन्दर धैनी व निर्दलीय सज्जन लाल ने नामांकन करवाया है। टिहरी लोकसभा सीट पर माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कामरेड राजेन्द्र पुरोहित को अपना उम्मीदवार बनाया है। भाजपा ने सांसद राजलक्ष्मी शाह को ही आजमाते हुए अपनी रणनीति बनाई है जबकि कांग्रेस की ओर से प्रदेश अध्यक्ष प्रतीम सिंह के उपर सारा दारोमदार है। राजनीति के खेल में उलझे रि.कर्नल अजय कोठियाल की आवाज का भी प्रभाव दिखाई देगा। कांग्रेस और भाजपा दोनों की पसंद कर्नल रहे हैं।
अल्मोड़ा- पिथौरागढ़ से नये नामों पर सोचना कठिन था, सो कांग्रेस ने राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा को टिकट देकर सिद्ध कर दिया कि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं था। भाजपा की ओर से केन्द्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा और प्रदेश की बालविकास मंत्री रेखा आर्या के बीच टिकट की तनातनी के बाद अजय टम्टा को टिकट दिया गया। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने चुनाव में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने, चुनाव का सम्पूर्ण खर्चा निर्वाचन आयोग द्वारा वहन करने, चुनाव प्रक्रिया में व्यापक सुधर का मुद्दा उठाते हुए एडवोकेट विमला को अपना उम्मीदवार बनाया है।
पौड़ी लोकसभा सीट पर भी रोचक मुकाबला होने जा रहा है। कांग्रेस ने पूर्व मुख्य मंत्री, सांसद और भाजपा के ईमानदार नेताओं में गिने जाने वाले भुवन चन्द्र खण्डूरी के पुत्र मनीष खण्डूरी को मैदान में उतारा है। मनीष ने इस चुनाव के लिये कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर भाजपा मंे खलबली मचा रखी है। बीसी खण्डूरी की छवि का लाभ उन्हें तय है। भाजपा ने अपनी रणनीति बदलते हुए यहाँ तीरथ सिंह रावत को मैदान में उतारा है। श्री रावत ही भाजपा के पास ऐसा विकल्प बचा था जो जनरल खण्डूरी की छवि और उनके पुत्र मनीष के कांग्रेस में जाने के बाद चुनाव मैदान में टक्कर दे सके। स्थानीय मुद्दों को उठाते हुए उक्रांद ने शान्तिप्रसाद भट्ट को मैदान में उतारा है। हरिद्वार लोकसभा सीट पर भाजपा और कांग्रेस में टिकट की खींचतान के बाद भाजपा की ओर से रमेश पोखरियाल का नाम घोषित किया जो पहले से ही तय माना जा रहा था। शुरु से ही लगातार सक्रिय चतुर निशंक को चुनौती देना कांग्रेस व अन्य के लिये भारी है। देखते  हैं कुर्सी दौड़……

हल्द्वानी: आज नहीं तो कल बदल ही जाना है शहर का चेहरा

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
हल्द्वानी महानगर बनने के साथ ही तेजी से बदलने लगा है। जन दबाव के कारण यहाँ की सड़कें जाम होने लगी हैं, गलियों में निकलने में दिक्कत हो रही है, नालियां बजबजा रही हैं, कूड़ा निस्तारण समस्या बन चुका है, सीवर लाइन के लिये हुई खुदाई के बाद से काम लटका हुआ है, परिसीमन के बाद शहर में जुड़ चुके ग्रामों में सुविधएं जुटाना है। इसके अलावा अनियोजित निर्माण कार्यों व मुख्य शहर में मनमानी करने वालों के कारण भारी दिक्कत है। समस्याओं से भरे शहर को हर कोई कहता है परन्तु व्यवहार में होता कुछ और है। आश्चर्य की बात नहीं अपनी दुकान या मकान के आगे सड़क में ठेला खड़ा करने वालों से भी कोई किराया वसूल ले। बताया जाता है कि सड़क फुटपाथ पर दुकान सजाने के लिये भी भारी दादागिरी चलती है। किसी को किसी का तो किसी को किसी दूसरे का संरक्षण मिलता है।
नशे की गिरफ्रत में नई पीढ़ी दिखाई दे रही है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अवैध् रूप से संचालित हुक्का वारों को बन्द करवाया है इसके बावजूद किशोर युवक-युवतियां नित नये अड्डे तलाशते दिखाई देते हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी में मिलने के बहाने कुछ जमा हो जाते हैं और नशे में डूबने लगते हैं। गाँव की संस्कृति से शहर और शहर से महानगर की ऐसी संस्कृति बहुत भयावह दिखाई दे रही है।
फैलते जा रहे शहर में खेतों का सफाया हो चुका है। बाजार बढ़ता जा रहा है। खिलौनों से लेकर शराब के कारोबार तक के लोग फैल चुके हैं। नेताओं के चेहरे भी बढ़ते जा रहे हैं। बिजली के खम्बों या इधर उधर नित लगने वाले होर्डिंगों से पता चलता है कि कौन-कौन माननीय कहलाने लगे हैं और कौन-कौन उभरते नेता हैं। इन्हें पोषित करने वाले भी चर्चा में रहते हैं।
शहर के फैलने और चैड़े होने में उन पुराने शहरी को ढूंढना मुश्किल होता जा रहा है जो कभी मुख्य थे। क्योंकि उनके आस-पास कई मंजिलों वाले खड़े हो चुके हैं, कारोबार दूसरे हो चुके हैं, समस्याएं अन्य प्रकार की हैं, वह वैसे ही हैं जैसे हुआ करते थे। रबड़ी मलाई, कुल्फी, पान, चाय की पुरानी दुकानें अपनी परम्परा को ढो रही हैं लेकिन चमचमाते व्यापार में जो दिखाई दे रहा है, वहाँ भीड़ है। सुविधएं बढ़ी हैं लेकिन आपफत बढ़ती जा रही है।
शहर के फैलते ही मुख्य समस्या शहर में निकलना मुश्किल हो चुका है। अब इसे सुधर के लिये डण्डे के बल पर काम चलाना मजबूरी लग रहा है। इसके लिये सबसे पहले कालाढूंगी रोड स्थित मुखानी चैराहे को चुना गया है। यहाँ प्रस्तावित फ्रलाईओवर के लिये तैयारी करनी है। इससे पहले चैराहे से दोनों ओर अतिक्रमण हटने हैं। इस जिद्दी शहर में अपने आप से कोई अतिक्रमण हटाने वाला नहीं है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस और प्रशासन ने जब कार्रवाई की तो पक्के निर्माण कार्य टूटते दिखाई दिये। मुखानी चैराहे पर वर्षों से बसे लोगों का तर्क है कि वह अपनी भूमि पर सालों से रह रहे हैं ऐसे में उन्हें न छेड़ा जाए। प्रशासन ने कोर्ट के निर्देश और अध्किारियों के आदेश का हवाला देते हुए जेसीबी के साथ धुंआधार कर दी। अब सवाल है कि अतिव्यस्त कालाढूंगी रोड में क्या मुखानी चैराहे पर ही अतिक्रमण हटेगा या पूरी सड़क पर नाली-नाले व फुटपाथ में मकान-दुकान बना चुके लोगों से भी सवाल किया जायेगा? प्रशासन की ओर से संकेत मिले हैं कि आने वाले दिनों में कोई नहीं छूटेगा। किसी भी प्रकार का अतिक्रमण हटना ही है।
ऐसे में, हे हल्द्वानी वासियो! अभी से तैयारी कर लो। आज नहीं तो कल बदल ही जाना है शहर का चेहरा। कहीं फ्रलाईओवर बनेगा, कहीं पार्क, कहीं काम्प्लेक्स बनेंगे, कहीं कुछ दूसरी चीज। फिलहाल मुखानी चैराहे पर दो दर्जन पक्के मकानों को जेसीबी ने ढहाया है जबकि कई लोग खतरा देख स्वयं से अतिक्रमण तोड़ने लगे हैं। कार्रवाई के दौरान एडीएम हरबीर सिंह, नगर आयुक्त चन्द्र सिंह मर्तोलिया सहा.नगर आयुक्त विजेन्द्र चैहान सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे।

स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती की षष्टम् पुण्यतिथि का आयोजन

अखबारी मिशन के साथ लोक परम्पराओं को जानना जरूरी

हल्द्वानी। पिघलता हिमालय के संस्थापक सम्पादक स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती की षष्टम् पुण्यतिथि के अवसर पर 22 व 23 फरवरी 2019 को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में उच्चशिक्षा निदेशक प्रो.बी.सी.मेलकानी, इतिहासकार व पर्यावरणविद् प्रो.अजय रावत सहित आठ महानुभावों को सम्मानित किया गया। इस मौके पर ‘हिमालयी लोक परम्परा’ विषय पर विद्वानों ने भरपूर जानकारियां सांझा की और हिमालय संगीत शोध् समिति के कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से समा बांध।
जे.के.पुरम् छोटी मुखानी स्थिति आनन्द भवन में समारोह का शुभारम्भ पिघलता हिमालय के वरिष्ठ सदस्य दुर्गा सिंह बोथियाल ने दीप प्रज्जवलित कर किया। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षाविद् विपिन चन्द्र पाण्डे के संचालन में चल रहे समारोह में मुख्य अतिथि जसुली बूढ़ी शौक्याणी के वंशज फली सिंह दताल ने अपनी वंश परम्परा, ग्राम, जसुली के बारे में रोचक प्रसंगों को सुनाया और ‘पिघलता हिमालय’ को हिमालयी जन सरोकारों का पत्र बताया। दुर्गा सिंह बोथियाल ने स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती के साहित्य को उनकी हमेशा उपस्थिति का प्रमाण कहा। हिमालयी लोक परम्परा विषय पर आधर व्याख्यान देते हुए डाॅ.प्रयाग जोशी ने जसुली, तीलू रौतेली, माधे सिंह, संग्राम कार्की सहित कई महापुरुषों का नामोल्लेख करते हुए कहा कि हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिये। हम अंग्रेजों के बनाये गये दस्तावेजों को ही अपना इतिहास न मानें। डाॅ.प्रयाग ने स्व.उप्रेती के मिशन को चलते रहने की कामना की और कहा कि छोटे अखबारोें की सच्ची परम्परा को पिघलता हिमालय सजोये हुए है। शिक्षाविद् ताराचन्द्र त्रिपाठी ने अखबारी मिशन के साथ लोक परम्पराओं को जानने की बात कही। उन्होंने एशिया यूरोप के देशों सहित स्थानीय परम्पराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे पास जो है, उसे हम भूलते जा रहे हैं। जबकि आगे बढ़ने के साथ हमें अपनी विरासतों को संवारना चाहिये। साहित्यकार प्रो.शेरसिंह बिष्ट ने कथाकार-पत्राकार स्व.उप्रेती का स्मरण करते हुए उन्होंने कभी भी अपने को दिखावे का प्रयास नहीं किया। उनका साहित्य देश के बड़े साहित्यकारों के मुकाबले का है। दिल्ली, इलाहाबाद इत्यादि स्थानों को छोड़ वह स्थानीय स्थिति-परिस्थितियों में ही अपने को गढ़ते रहे, जिसे हम लोग समझा नहीं गया है। डाॅ.बिष्ट ने हिमालयी लोक परम्परा में भाषा-लिपि पर विशेष जोर दिया। डी.एस.बी.परिसर नैनीताल वाणिज्य संकायध्यक्ष प्रो.अतुल जोशी, महिला महाविद्यालय के प्रो.एच.डी.तिवारी व राजकीय महाविद्यालय अमोड़ी;चम्पावत की प्राचार्य डाॅ.कमला जोशी ने जल- जंगल-जमीन की बात करते हुए युवाओं को आने वाले दिनों के लिये सजग किया। कुमाउँ विश्वविद्यालय कार्य परिषद के सदस्य डाॅ.सुरेश डालाकोटी, डाॅ.निर्मल चन्द्र मुनगली ने आयोजन के तरीके को सराहते हुए कहा कि अपने मिशन के मुताबिक इस प्रकार के आयोजन बहुत जरूरी हैं। राम सिंह सोनाल ने सीमान्त क्षेत्रा की संस्कृति को विकृत कर पहचानने वालों को आगाह किया और समझाया कि उनकी समृद्ध परम्परा को बनाने और बचाने में पीढ़ियों का योगदान है। उच्चशिक्षा के पूर्व संयुक्त निदेशक प्रो.बहादुर सिंह बिष्ट और निदेशक प्रो.बीसी मेलकानी ने स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती को कलम का सच्चा सिपाही बताते हुए कहा कि उनकी परम्परा बनी हुई है। इस अवसर पर उच्चशिक्षा निदेशक प्रो.बी.सी. मेलकानी, इतिहासकार पर्यावरण विद् प्रो.अजय रावत, संस्कृति के संरक्षण में जुटे फली सिंह दताल, पत्रकार भगवान सिंह गंगोला, कैलाश पाठक, दीप भट्ट, गणेश जोशी को सम्मानित किया गया। प्रोपफेसर विपिन उप्रेती, प्रो.सन्तोष मिश्रा, प्रो.अनिल जोशी, प्रो.दीपा गोवाड़ी, प्रो.जयश्री भण्डारी, प्रो. आशा हर्बोला, प्रो.सुरेश टम्टा, प्रो.एच.एस. भाकुनी ने इसमें सहयोग कर रहे थे। अध्यक्षता कर रहे उच्चशिक्षा उत्तराखण्ड के संस्थापक निदेशक प्रो.पी.सी.बाराकोटी ने आनन्द बल्लभ उप्रेती की पूरी परम्परा को विस्तार से बताते हुए कहा कि कोई भी समाज एकाएक नहीं बनता है। उसे बनाने के लिये लम्बी प्रक्रिया है। जिस मिशन के साथ यह अभियान चल रहा है वह सपफल होगा। कार्यक्रम में स्व.उप्रेती की कृति राजजात के बहाने;तृतीय संस्करण आदमी की बू ;द्वितीय संस्करण और डाॅ.गीता पन्त के कविता संग्रह अनुभूतियों का विमोचन किया गया। इस अवसर पर देवसिंह दरियाल, फलसिंह बोनाल, राजेन्द्र सिंह कुटियाल, पुष्पराज गब्र्याल, प्रो.रीतेश साह, एन.सी.तिवारी, डाॅ.दीपा काण्डपाल, संस्था के संरक्षक गिरीश उप्रेती, डाॅ.लता काण्डपाल डाॅ.मनोज उप्रेती, उदय किरौला, डाॅ.ओंकार नाथ कोष्टा, डाॅ.भुवन तिवारी, शुभम कुमार, सुरेश चन्द्र पाण्डे, ललितमोहन जोशी, अमित पाण्डे, डाॅ.मंजू काण्डपाल, ध्ीरज सिंह फत्र्याल, मदन सिंह बिष्ट, चन्द्रशेखर जोशी, डाॅ.टी.सी.पाण्डे, सम्पादक श्रीमती गीता उप्रेती, ध्ीरज उप्रेती सहित बड़ी संख्या में उपस्थिति थी। अन्त में आयोजन सचिव डाॅ.पंकज उप्रेती ने सभी का आभार प्रकट किया।

वाद्ययंत्र भौंकर और मलयनाथ के भक्त रावल परिवार

नवीन टोलिया

डीडीहाट। भौंकर वाद्ययन्त्र हमारे लोकवाद्यो में प्रमुख स्थान रखता है। अनुष्ठानों, विवाह इत्यादि आयोजनों पर इसकी धुन सुनाई देती है। एक सपाट सा दिखाई देने वाले इस वाद्ययन्त्र की संख्या सीमित ही रह गई है। कुछ लोक कलाकार जरूर इसके साथ दिखाई देते हैं। इन्हीं में से एक हैं- 76 वर्षीय रूप सिंह रावल। श्री रावल भौंकर के दो वर्ष पुराने इतिहास की गणना करते हैं।
रूप सिंह जी बताते हैं कि 200 वर्ष पूर्व धेलेत ग्राम में मेरे दादा राय सिंह रावल रहते थे, उनकी दो पत्नियां थीं। पहली पत्नी से 3 पुत्रा व एक पुत्राी पैदा हुई। दूसरी पत्नी से कोई सन्तान नहीं हुई। ऐसे में दूसरी पत्नी हमेशा दुःखी रहती थी। यहाँ के क्षेत्रावासियों की आस्था का केन्द्र मलयनाथ मन्दिर शुरू से रहा है। तब डीडीहाट का आज का बाजार क्षेत्रा दिगतड़ था। 4-5 मवाशे इस जंगल में रहते थे। माइग्रेसन में आने वाले सीमान्त वासियों के जानवरों को ठहराने का पड़ाव भी यह इलाका था। इस घोर जंगल और गौचर में दुःखी रावल दम्पत्ति ने मलयनाथ के पूजन की ठानी और मन्दिर में जागरण शुरु कर दिया। तब गरजते हुए देवचुला ;भानलिंग की ओर देख कर रुदन करने लगे। ऐसे में मलयनाथ शेर के रूप में प्रकट हुए और आशीर्वाद दिया। कुछ समय बाद उनके घर दो पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ। उन्होंने सन्तान होने पर भखड़ा ;भौंकर देने का वादा किया था। रूप सिंह का दावा है कि उनके पास जो भौंकर है वह उनके पूर्वजों का है। वह बताते हैं कि पहले इस भौंकर को बजाने से जंगली जानवर, बाघ, सुअर इत्यादि भाग जाते थे। मलयनाथ में असीम श्रद्धा रखते हुए उनका परिवार भौंकर संभाले हुए है, जिसे अनुष्ठानों व विशेष अवसरों पर बजाया जाता है। सरल प्रवृत्ति के रूप सिंह इस वाद्ययन्त्रा को श्रद्धापूर्वक अपने साथ ले जाते हैं।

पिघलता हिमालय 5 मार्च 2018 के अंक से

लोकवाद्य विलुप्त हो गई विणई

डाॅ. पंकज उप्रेती

मानव सभ्यता के साथ संगीत भी चला आ रहा है। अपनी अभिव्यक्तियों को व्यक्त करने के लिये लोकजीवन में पहले पहल कुछ इशारे, कुछ स्वरों से इसकी शुरुआत रही होगी। जो धीरे-धीरे विकसित होते हुए धुनों में बनती चली गई, वाद्ययन्त्र विकसित होते गये। विकास की इस प्रक्रिया में कई वाद्ययन्त्र विसरा दिये गये हैं। ऐसा ही यन्त्रा है- ‘विणई’। विणई/मुरचंग प्रायः सभी जगह रहा है परन्तु उन स्थानों पर ज्यादा प्रचार में रहा जहाँ पशुचारण व वन कर्मों में लोग जुटे रहे। देश-विदेश में मोरसिंग, मुखरशंखु, मोरछंग नाम भी सुनाई दिये हैं। अंग्रेजी में इसका नाम Jaw Harp है। उत्तराखण्ड के अलावा राजस्थान, बंगाल, कर्नाटक, आसाम, उड़ीसा, आन्ध््र प्रदेश, तमिलनाडु में इसका प्रचलन रहा है। नेपाल, पाकिस्तान के सिंध् प्रान्त, चीन, नाॅर्वे, रूस, ईरान, इटली, हंगरी, फ्रांस, के लोक संगीत में भी इसका प्रयोग होता रहा। वाद्य संगीत के विशेषज्ञ डाॅ. लालमणि मिश्र कहते हैं- ‘‘प्राकृतिक संगीत ही लोकगीतों की परिभाषा है। मानव जब असभ्य था, तक वह अपने उद्गारों को प्रकट करने के लिए वाणी द्वारा कुछ अस्पष्ट शब्दों का उच्चारण करता था। उस सयम वही वाणी उसकी कविता और वही अस्पष्ट शब्द अथवा ध्वनियुक्त स्फुरण उसका संगीत होता था।’’वाद्य
संगीत की बात होते ही सबसे प्रथम गायन की चर्चा होती है परन्तु यह स्वयंसिद्ध है कि गायन को लय देने के लिये वाद्य होते हैं। इसके अलावा वाद्यों की अपनी तरंग हमें रंजित करती रही है। आज भी बचपन के खेल में बच्चे मुंह में धागा वगैरह दबाकर एक अंगुली से उसे बजाते हैं, आम की कोमल गुठली को घिसकर उसे बाजते हैं, माचिस की खाली डिब्बी में धगा या सुतली बांध् कर एक से दूसरे साथी को सुनाते हैं। पत्थरों को आपस में बजाकर उनकी आवाल से प्रसन्न होते हैं। वर्तमान की भागमभाग और साधनों की भरमार के कारण हो सकता है शहरी बच्चे इस प्रकार के खेलों से दूर हों लेकिन वह भी किसी न किसी रूप में इस प्रकार के खेल खेलते हैं और झिंग-झिंग, टिन-टिन, डम-डम इत्यादि आवाजों के साथ आनन्दित होते हैं। ऐसा ही कुछ मानव जीवन के शुरुआत में हुआ था। सभ्यता विकसित होती रही लेकिन वनों में ग्वालवालों ने मनोरंजन के लिये इसी प्रकार के लोकगीतों लोकवाद्यों का प्रयोग किया। वंशी, अलगोजा, मुरचंग/विणई इत्यादि बजाकर मनोरंजन व अपने पशुओं को संकेत के लिये धुनों का छेड़ा। इन्हीं में से वंशी के प्रकार बांसुरी खूब सुहाई और शास्त्रीय संगीत के मंचों तक धूम मचा रही है। अवनद्ध वाद्य विकसित होकर तबले के रूप में गायन व अन्य संगतों में श्रेष्ठ है। तंत्रवाद्य, गजवाद्यों ने भी शास्त्रीय संगीत का श्रृंगार किया है। दूसरी ओर लोक के कई वाद्ययन्त्र विलुप्त होते जा रहे हैं। इन्हीं में से एक है- ‘विणई’। लोक अपनी प्रकृति व प्रवृत्ति के अनुसार वाद्ययन्त्रों का प्रयोग करता रहा है। जो कुछ हमें उपलब्ध् है, उसी अनुरूप संगत के लिये वाद्ययन्त्र को गढ़ते चले जाते हैं। डाॅ.लालमणि मिश्र लोक-संगीत-वाद्यों के बारे में कहते हैं- ‘‘सामन्यतः लोक-संगीत के वाद्यों की समस्त सामग्री प्रकृति-जन्य होती है। जिसमें मिट्टी, काठ, खाल मुख्य हैं किन्तु उनकी बनावट में कहीं-कहीं कारीगरी के अद्भुत नमूने देखने को मिलते हैं।’’
‘मुरचंग’ को ‘मुखचंग’ की संज्ञा भी दी गई है। इसके दो कारण हैं- पहला तो, इसके बीच के भाग को दातों से दबा कर बजाते हैं। दूसरा, इसकी ‘भन्न-भन्न’ व ‘भिन्न-भिन्न’ की आवाज द्वारा ताल वाद्य चंग जैसा ही बजाकर गीत की संगति की जाती है। इस प्रकार दांतों से दबाकर बजाने के कारण ‘मुंह’ ‘चंग’- मुंहचंग/मुखचंग नाम उपयुक्त है। यह वाद्ययंत्र बहुत ही सीमित हो चुका है। उत्तराखण्ड प्रदेश की बात करें तो यहाँ विलुप्त होने को है। लेखक ने जगह-जगह जाकर इसे ढूंढा लेकिन इसे बनाने वाले शिल्पी भी इसे नहीं बना रहे हैं। सुरम्य स्थल बेरीनाग के बोराखेत में रहने वाले सेना के रिटायर्ड सूबेदार व काष्ठकला में प्रवीण श्री अर्जुनराम चम्याल जी ने एक बिणई सन् 2014 में लेखक को दी थी। इस छोटे से वाद्ययन्त्रा को हिपफाजत से रखने के लिये उन्होंने लकड़ी की एक आकृति भी बनाई ताकि डोरी से लपेट कर विणई को इसमें रखा जा सके। लेखक के पास यह वाद्ययन्त्र सुरक्षित है।
‘मुरचंग’ लोहे की शिल्पकारी का एक अद्भुत लोकवाद्य है। उत्तराखण्ड में दस्तकारी में लगे लोक समूह को उसी सामान्य रूप से शिल्पकार की जातीय संज्ञा प्रदान की गयी है, जिस प्रकार से बंगाल प्रदेश में लोहे के दस्तकारों को कर्मकार की प्रदान की गई है। लोहे को घन, हथौड़े, निहाई, भट्टी की मदद से ठोक-पीटकर तरह-तरह के औजारों की शक्ल में बदलने वाले पर्वतीय शिल्पकार जहाँ कृषि यन्त्रा- खुरपी, कुटला, कुदाल आदि और अन्य औजार- चाकू, भाला, तलवार इत्यादि तथा साधरण उपयोग की परम्परागत जरूरी चीजें बनाते हैं, वहीं ये कुछ कलात्मक और असाधरण चीजें उदाहरणार्थ- कुण्डे, ताले, मुरचंग/बिणई आदि बनाने की परम्परा संयोये हुए हैं। प्रचलन में न होने से विणई नहीं बनाई जा रही है। इसे बजाने वाले भी सीमित हैं। कुमाउँ में इसे ‘विणैं’ भी कहा जाता है। विणई को लेकर अद्भुत प्रयोग लोककलाकार श्री जुयाल द्वारा किया गया है। लेखक ने संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली द्वारा चण्डीगढ़ में आयोजित ‘वृहद्देशी संगीत समारोह’ में लोकगायक श्री नरेन्द्र सिंह के साथ पधरे श्री जुयाल का विणई में अद्भुत एकल मंचीय प्रदर्शन देखा। सीधी ताल, आड़ी ताल व पल्टों की गुंजाहट में श्रोता भावविभोर हो गये थे। अपने एक अध्ययन में मासी जिला अल्मोड़ा की संस्था इन्हेयर का कहना है- ‘‘विणैं के स्वर बड़े सुमधुर होते हैं। इन स्वरों में कारूणिकता विद्यमान रहती है। वर्तमान में यह वाद्ययन्त्र प्रायः लुप्त सा हो गया है।’’
पूर्णतः लोहे के बने इस लोक वाद्य की इस पर्वतीय प्रदेश में बहुत उपयोगिता पशुचारण में लगे लोगों के बीच रही है। बांसुरी या मुरचंग ही इनमें लोकप्रिय व मन बहलाने का साधन रहा है। इसके अलावा पैदल यात्राओं के जमाने में दूर-दूर तक यात्रा पर जाने वाले व्यापारियों के पास भी विणई मिल जाती थी। समय बदला, मनोरंजन के साध्न बढ़ते चले गये, रहन-सहन, कार्य- व्यवहार बदले, ऐसे में ‘विणई’ जैसे वाद्ययन्त्रा विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्ति के कगार पर हैं। मुरचंग के बारे में गीत रचनाओं में कापफी जगह उल्लेख आया है। उदाहरण के लिये पहाड़ की बैठ होली की धमार का रचना प्रस्तुत है-
‘‘मनसुख लाओ मृदंग, नाचत आई चन्द्रावलि पग बांध् घुंघरवा।
ताल पखावज बाजन लागे, अरु डफली मुरचंग।’’
विणई चिमटी में पिन लगा जैसा छोटा या वाद्ययन्त्रा है, जिसे आसानी से जेब में रखा जा सकता हे। इससे दो-तीन भिन्न-भिन्न स्वरों में दो-तीन पटाक्षर- भुन्न-भुन्न और भन्न-भन्न उत्पन्न होते हैं। उन पटाक्षरों की मदद से इस लोक वाद्य पर विभिन्न लयों की चमत्कारी संगतियां सम्भव हैं। इसे कभी एकल और कभी गीत की संगति में लोक कलाकार बजाते हैं। डाॅ.लालमणि मिश्र ने लोक-संगीत वाद्यों को उद्देश्य की दृष्टि से दो वर्गों में बांटा है। पहला वर्ग उन वाद्यों का है जिन्हें हम लय अथवा ताल के लिये बजाते हैं। स्वर के लिए बजाये जाने वाले तत तथा सुषिर वर्ग के वाद्य होते हैं जिनकी संख्या तथा भेद लोक-संगीत में अधिक नहीं है। लय अथवा ताल के लिए बजाये जाने वाले अवनद्ध तथा घन के अन्तर्गत आते हैं। भारतीय लोक-संगीत में इनकी संख्या इतनी अधिक है कि देखकर आश्चर्य होता है।
विणई की विशेषता है कि इसमें ट्यूनिंग की बड़ी ही संवेदनशील गुंजाइश होती है। वाद्य की ‘भन्न-भन्न’ पटाक्षर प्रदान करने वाली स्टील या लोहे मुख्य पतली सी चपटी पट्टी पर थोड़ाी मोम जमाकर या उस मोम को कम ज्यादा करके इसके मुख्य स्वर को थोड़ा चढ़ाया या उतारा जा सकता है। इसका ठीक से समझने के लिये कहना उपयुक्त होगा कि जिस प्रकार मृदंग के मंुह पर आटे को लगाकर उसमें बायंे को दाहिने केे समानान्तर स्वर में मिलाते हैं, उसी प्रकार से मुखचंग/ मुंहचंग/विणई को भी मिलाया जा सकता है। इस प्राचीन और चिमटीनुमा वाद्ययन्त्रा की यादें अब किवाड़ों में बन्द सी होती जा रही हैं। जो भी हो, इनके बारे में जानकारी तो होनी ही चाहिये।

संगीत साधक पं. शीतल प्रसाद मिश्र

भरत कुमार मिश्र

पं. शीतल प्रसाद मिश्र का जन्म उत्तरी बिहार के मिथिला प्रान्त के मधुबनी मिथिला के एक सांगीतिक घराने में हुआ। इनके पूर्वज, काशीराज के कथाकार, गायक, कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित थे। काशीराज नरेश, रीवां नरेश एवं दरभंगा नरेश मैत्री के पफलस्वरूप आदान-प्रदान के कारण काशी से कुछ कलाकार मिथिला आये। इन्हें दरभंगा, मधुबनी राज्य से गाँव-जमीन आदि देकर बसाया गया। इनमें से भरत कुमार मिश्र ;लेखक लगभग सातवीं पीढ़ी के कलाकार हैं।
पं. शीतल प्रसाद मिश्र के बाल्यकाल का नाम घूरन मिश्र था। पं. शीतल जी अपने परिवार के सबसे कनिष्ठ पुत्र हैं। सबसे बड़े भाई स्मृति शेष पं.दुर्गा प्रसाद मिश्र, कमशः उमा देवी;पत्नी पं. गामा महाराज, श्याम देवी ;पत्नी पं. बद्री महाराज, पं. दिनेश मिश्र, स्वयं पं. शीतल प्रसाद मिश्र हैं। कहा जाता है कि पं.शीतल प्रसाद मिश्र के जन्म के समय इनकी माता जी ;दादी श्रीद्ध मूर्छित हो गई थीं। काफी समय तक लोग इन्हें मृत समझकर इस शिशु को अशुभ जानकर घूरे पर, जहाँ कूड़ा-करकट झाड़-बुहार कर रखा जाता है, खिसका दिया…….। काफी देर बाद, दादी जी की चेतना वापस आने पर इन्होंने शिशु की खोज की और महिलायें घूरे पर से वापस ले लाईं, और इस कारण पं.शीतल जी को घूरन पुकारा जाने लगा। गाँव में अभी भी घूरन बाबू, दुर्गा बाबू, दमन बाबू उर्फ दिनेश मिश्र नाम प्रचलन में हैं।
पं.शीतल जी के पिता स्मृति शेष पं. अनन्त मिश्र जी, स्वयं भी एक अच्छे एवं छिपे हुए लोग संगीत के कलाकार थे। ताउ जी पं.आद्या मिश्र भी शास्त्रीय गायक थे, चाचा पं. हरिशंकर ;लल्लू जी एक कुशल तबला वादक थे। पं. अनन्त मिश्र के पिता शेष स्मृति पं. परमेश्वरी मिश्र, दरभंगा, मधुबनी के रियासत के तहसीलदार पद पर कार्यरत थे। उस समय, इन्हें घोड़े की सवारी मिली थी। उस जमाने में महिलायें घोड़ों की बग्घी-गाड़ी में पर्दे में सवारी करती थीं।
भावातिरेक में कभी पिता श्री शीतल जी ने भी अपने बारे में कहा था जैसा कि इन्होंने अपनी दादी, नानी से सुना था कि पैदाइश के समय माता श्री जी का मूर्छित होना, चार वर्ष की आयु में दादा पं. परमेश्वरी जी का एवं पाँच वर्ष की आयु में पिता पं.अनन्त मिश्र जी का निधन और तत्पश्चात परिवार का विघटन…..यह सब मेरी अभाग्यता का सूचक ही तो है। उसके बाद यह परिवार अपने मायके अर्थात पं.शीतल जी अपने ननिहाल, जो कि उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के मोंढ़ जिला भदोही स्थित नाना पं.शम्भू मिश्र एवं मामा पं. बेचन मिश्र जी के यहाँ पले बढ़े। यह सौभाग्य बन गया कि छः वर्ष की अल्प आयु में इन्हें ;पं.शीतल जी को बड़े बहनोई पं. गामा महाराज जी के साथ कबीर-चैरा, वाराणसी भेज दिया गया। कालान्तर में पं. गामा महाराजा जी, आरा बिहार प्रदेश में शिक्षक के रूप में प्रतिष्ठत हुए। यहाँ बनारस में इनकी देखरेख पं. बद्री महाराज जी, जो कि स्वयं कंठे महाराज जी के शिष्य थे, उनकी देखरेख में प्रारम्भिक कायदे-पल्टे विस्तार से अभ्यास कराया गया। तत्पश्चात गुरु पूर्णिमा के अवसा पर वे अपने गुरु पं. कंठे महाराज ;वाद्य शिरोमणि जी से गंडा-बंधन करवाया। इस प्रकार, प्रारब्धवश, पं.शीतल प्रसाद जी के पूर्वज वाराणसी काशीराज से बिहार के मिथिलांचल घराने की छाप लेते हुए पुनः बनारस घराने के गंडा-बंध् शिष्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
अतः इनकी शिक्षा-दीक्षा वाराणसी में हुई। आदर्श सेवा विद्यालय में कक्षा 8 की पढ़ाई के समय कभी-कभी पं.गोपाल जी मिश्र एक उद्भट्ट सारंगी वादक, अपने बैठक में रियाज करते थे और पं.शीतल जी के शब्दों में- ‘‘मैं उनकी सारंगी के आलाप, बंदिश और तानों की झड़ी-लड़ी में खो जाता और पंडित जी ‘गोपाल मामा’ एवं पं. हनुमान प्रसाद मिश्र ‘हनुमान मामा’ अपने बैठक से देखते और बुला लेते, फटा सा ढीला बायां दे देते और कहते कि तिताला ठको लगाव। मैं देखता विस्मय से, खाली ढीले बायें से ठको कसे बजाई? तो खुद बायां लेक बेताया ‘ना ध्े ध्े ना। ना ध्े ध्े ना। ना क के नो। ना ध्े ध्े ना।’ बस हम शुरु हो जाते, घंटों अभ्यास करते और कराते भी, यह हमारे ध्ैर्य की परीक्षा, आदर की भावना की परीक्षा थी और इस प्रकार हमें पीतल की इकन्नी देते और कहते कि पिफर आये। पं. हनुमान मिश्र एवं पं. गोपाल मिश्र मामा द्वय, पं. राजन एवं साजन मिश्र बन्ध्ु के पोते एवं चाचाची थे। इन्हीं के घर मेरे बहनोई पं. बदरी महाराज जी उपनाम खदेर जी ने प्रथम प्रदर्शन के रेपू में सोलो तबला वादन कराया था। गत फरद, टुकड़ा, बांट आदि का खूब अभ्यास करक ले गये थे। उसके बाद राजन-साजन मिश्र बन्ध्ु का युगल गान बंदिश, ‘सुमरन कर मनु राम नाम को’ आज भी कानों में गुंजायमान होता है।’’
पं.शीतल जी आगे बताते हैं कि शायद आज पद्मभूषण पं. राजन जी एवं पद्मभूषण साजन जी को याद हो और प्रथम प्रदर्शन के फलस्वरूप मैंने ठेका लगाया था। पं.शीतल जी के शब्दों में, ‘‘स्वर साम्राज्ञी श्रीमती गिरिजा देवी जी के यहाँ तीन रुपये महिने की ट्यूशन करने जाते थे…….कभी-कभी लय लय बढ़ जाने पर दीदी ‘गिरिजा दीदी’ टोकती रहती थीं…….इस प्रकार हमें अच्छे- अच्छे धुरंधर कलाकारों का सहयोग, आशीर्वाद व मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ।’’
गुरु सेवा में तत्पर……किसी प्रकार की सेवा जो लोग न कर पाये, वह करने में कभी भी ‘ना’ शब्द से इनको लगाव नहीं था। जूता पालिश, तेल मालिश, कपड़े धेना, लंगोट आदि……बाजार से सामान ढूंढकर जहाँ से भी हो, ले आते, कभी-कभी ‘गुरुवर’ कह देते कि फलनवां का नाहीं मलिल, तै कहाँ से लै अइले….., वाह बेटा, हनुमान जी जैसन ढूंढ के लैै अइले खुश रह ;बनारसी बोली में।
गुरु गृह में शिक्षा के दौरान पं. पूरन मिश्र सुपुत्र पद्म विभूषण पं. किशन महाराज, पौत्रा पं. कंठे महाराज जी के पूछने पर ओस्ताद, हम लोग गुरुवर को ओस्ताद सम्बोधन से पुकारते……..कि शीतल नाम गुरुवर के खानदान में किसी का न था, अतः बार-बार किसी बुजुर्ग का नाम न दुहराया जाय, अतः पूरन जी ने अपने बब्बा से पूछा इनके हम का कही?………पहले लोगबाग, नाउ-काका धोबी-चाचा, दर्जी-मामा आदि नाम से सम्बोधित करते थे। अतः गुरुवर ने शीतल नाम बदल के ‘सार’ नाम दे दिया कि फलनवां ;बद्री के के तू भैय्या कहल और इ ओकर सार हौ, अतः तोहू इनके ‘सार’ कहल कर…….इस प्रकार घरभर ‘सार’ नाम से सम्बोधित करते, बचपन से छोटे-छोटे जीव जंतु भी पैर से न कुचल जाय, अतः ये जमीन देखकर चलने के कारण गुरुवर कभी-कभी कहते भुइंतक्का ‘जमीन देखके चलने वाला।’
कबीर चैरा से चैकाघाट लकड़ी का गट्ठर लाद के मजदूर लाता पैदल……..उसके सिर से कुछ लकड़ियां गिरती, उसे उठाकर घर आते-आते उस समय तक मेरे पास भी 6-7 लकड़ियां हो जातीं, यह सेवाभाव था।
नौकरी सन् 1967 ई. में भातरखण्डे संगीत महाविद्यालय लखनउफ में तबला संगतकर्ता पद वेतनमान रु. 100-160 पर रु. 04/- वेतन वृद्धि का नियुक्ति का पत्र पाकर गुरुवर से आज्ञा लेकर अमीनाबाद श्री हनुमान मन्दिर, लखनउ, जहाँ पं. रमाकान्त पाठक जी मेरे अयोध्या कार्यक्रम के दौरान मैत्री हुई थी, के पास पहँुचे, कुछ दिन वहीं रहे……..बाद में किराया रु. 30/- माह पर अलग निशातगंज लखनउ में निवास बना। पहला वेतन रु. 150/- प्राप्त हुआ, वेतन तो काफी कम था, पर यहाँ गुणी गायक-वादक-नर्तक कलाकारों का सानिध्य प्राप्त किया, उसी के कारण यहाँ टिक गया। स्वनामधन्य पं. हरिशंकर ;चाचा जी, पं.रंगनाथ मिश्र जी जिनसे मैं कबीरा चैरा, वाराणसी से परिचित था, पं. रंगनाथ मिश्र के सुपुत्र पं. गामा महाराज जी के कारण ये मेरे रिश्ते के भांजे थे, पर ये उम्र मं बड़े थे, अतः भांजे वैसे भी आदरणीय होत हैं। और भी प्रधनाचार्य श्री श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर, उपप्रधनाचार्य श्री गोविन्द नारायण जी ;नातू जी, श्री मोहनराव शंकर कल्याण पुरकर जी एवं श्री विक्रम सिंघे क्रमशः प्रोफेसर एवं सहायक प्रोफेसर कथक नर्तक, उस्ताद इलियास खाँ साहब प्रोफेसर सितार स्वर वाद्य………उसके बाद पं. गणेश प्रसाद मिश्र ;भैया एवं डाॅ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी जी ने पदभार संभाला………शनैः शनैः और भी साथियों सहयोगियों के साथ-साथ 42 वर्ष समय बीत गया और पता नहीं चला।
पं. शीतल जी के शब्दों में मंत्र मूलं गुरूर्वाक्यम् से संगीत समाज की भूरि-भूरि प्रशंसा प्राप्त की। पं. शीतल जी को उनके उत्कृष्ट वादन ;एकल, युगल, नृत्य, गायन, वादन-तंत्रा, गज, सुषिर हेतु अनेकानेक उपाधियां मान-सम्मान प्राप्त हुए। इसमें हैं- सुरसिंगार संसद;मुम्मई द्वारा तालमणि तबला, लालमणि वाद्या ‘पखावज’ सुरसिंगार संसद ;मुम्मई बहुत विरले लोगों मंे से किसी एक को अलग-अलग वाद्यों मंे तालमणि प्राप्त होती है। पं. शीतल जी को तबला एवं पखावज दोनों ही वाद्यों में तालमणि प्राप्त हुई। आईसीसीआर के मानित कलाकार हैं। संस्कार भारती एवं गुरुपूर्णिमा ;व्यास पूर्णिमाद्ध पर व्यास सम्मान। ‘तबला पारंगत’ स्वामी हरिदास संस्था द्वारा। व्यावसायिक कलाकार वर्ग में पं. शीतल जी ने प्रथम विशिष्ट स्थान प्राप्त किया, उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी, लखनउ। वर्ष 1994 में अकादमी अवार्ड प्राप्त, उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी लखनउ। ‘संगीत कला रत्न’ आगरा, विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जयन्ती के सुअवसर पर। विदेशी छात्रों को भी पंडित जी ने सिखया और फ्रंास, बर्लिंन, पेरिस, जर्मनी आदि की यात्रा की। ‘तबला मनीषी’, ‘संगीत साधक’ निखिल बनर्जी पुरस्कार प्राप्त शीतल प्रसाद जी ने देश के अनेक चोटी के नामचीन कलाकारों के साथ संगीत सम्मेलनों में सुसंगत की। आप आकाशवाणी के ए ग्रेड के उच्च श्रेणी के कलाकार हैं। आप भातखण्डे संगीत संस्थान लखनउ में ताल वाद्य विभाग में विभागाध्यक्ष रहे एवं वर्ष 1967 से 2009 तक लगभग 42 वर्ष तक संगीत की सेवा करते हुए 2009 मंे सेवानिवृत्त हुए।
गुरु समर्पण- पं. कंठे महाराज जी की पे्ररणा से उन्होंने कई नवरात्रों की जागरण-साधना-अराधना की सिद्धि की है, उनकी कृपा से वर्ष 1978 में प्रतिपदा गुरु जी की जन्मतिथि शारदीय नवरात्रि की प्रथम तिथि मेें पं. ब्रजभूषण मिश्र ‘ग्रामवासी’ जी के निवास स्थान पर कृपाल स्वर संस्थान में 15 घंटे 18 मिनट तक एकल वादन का अनूठा रिकार्ड बनाया जो शास्त्राीय संगीत जगत, लखनउ में एक उपलब्धि है। उसी याद में, प्रतिवर्ष अपने निवास स्थान ;सेक्टर 19/260, इन्दिरा नगर लखनउ पर शारदीय नवरात्रि में 9 रात्रि तक शास्त्राीय एवं सुगम संगीत का उत्सव हर्षोल्लास से मनाते हैं, जिसमें देश के कई नामी कलाकारगण स्वेच्छा से अपनी सांगीतिक कला का प्रदर्शन कर चुके हैं एवं करते हैं।
कठोर-अनुशासक प्रिय, निष्कपट गुरु, छल प्रपंच रहित शिक्षक, मितभाषी, सरल स्वभाव, आत्म सम्मानी, ताल विद्या में दक्ष लयकारी में निपुण, संगत में सि(, वाहब, गायक या नर्तक के साथ एकाकार होकर, बोलों में स्पष्टता, दायें-बायें का सुन्दर सामंजस्य कवित्त, छंदों में शुद्ध उच्चारण करने वाले पं.शीतल जी यथा नाम तथा गुण हैं।
मृदुभाषी पं.शीतल जी के दो पुत्र- भरत मिश्र तबला वादक, भातखण्डे संगीत संस्थान सम विश्वविद्यालय लखनउ में कार्यरत एवं अनुज मिश्र गायक व सारंगी वादक तथा एक पुत्री अब श्रीमती ज्योत्सना दुबे सितार वादिका, गायिका एवं तबला वादिका हैं। पं.शीतल जीे के शिष्यों में उदय शंकर मिश्र, सचिन वर्मा, प्रदीप द्विवेदी, उदय नाटू, मुकेश, कृष्णानन्द, विभा मिश्रा, कुसुम श्रीवास्तव, रजनीश मौये व पुत्रा भरत मिश्र संगीत के क्षेत्रा में अग्रणी पंक्ति के तबला वादक हैं।
जिन ख्यातिनाम कलाकारों के साथ पं.शीतल जी ने संगत की व सानिध्य रहा उनमें से डाॅ.श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर, गोविन्दनारायण नाटू, पं.जसराज, पं.हरिशंकर मिश्र, पं.गणेशप्रसाद मिश्र, पं.महादेव प्रसाद, सुमति मुठाटकर ध्ु्रपद, असगरी बेगम, सविता देवी, के.जी.गिंडे, वाणी जयराम, पं.काशीनाथ शंकर बोडस, वी.जी.जोग, डी.के.दातार, बुद्धदेवदास गुप्त, श्रीमती एन. राजम, इन्द्रनील भट्टाचार्य, गिरिराज, भजन सपोरी, पं.शम्भू महाराज, पं.लच्छू माहाराज, पं.बिरजू महाराज, सितारा देवी, वन्दना सेन, उर्मिला नागर, तरुणकांत, वासंती सुब्रमण्यम, नरेन्द्रनाथ धर, अभयशंकर मिश्र। शोधर्थियों का मार्गदर्शन, मूल्यांकन सहित आज भी वह सक्रिय हैं।