संस्मरण यात्रा कानपुर से नैनीताल

नवीन चन्द्र उपाध्याय

अप्रैल के मध्य में ही इस बार पारा चालीस को पार कर गया था। मैं साइकिल से बारह बजे वाली ड्यूटी के लिये घर से निकला। लू के प्रकार की गर्म हवा के थपेड़ों को चीरते हुए मेरी साइकिल के टायर दम फुलाये पिघलते डामर की सड़क को तय कर रही थी।
कानपुर के मिलों की चिमनियों का धुंवा आग उगल रहा था। गन्दी संकरी गलियों में सड़ांघ के मारे दम निकला जा रहा था। नालियों में कुछ सुअर गर्मी के से बचाव करने के लिये पसरे पड़े थे। कुछ ठेला लगाने वाले मजदूर इन गलियों में ठेलों के उपर थकान मिटा रहे थे। हलवाइयों व चाय की दुकानों में मक्खियां इस कदर मडरा रही थी कि मानो दुकान पर मिठाई न होकर मक्खियां ही बिक रही हों। मैं कुछ गलियां पार कर आगे बढ़ा ही था कि सामने एक लम्बी सी कतार भैंसा गाड़ियों की लगी थी जो चर्र मर्र की की आवाज करते कच्चा चमड़ा टेनरी को ढो रहे थे। कच्चे चमड़े की की बदबू उमस भरी गर्मी में बुरा हाल करने वाली होती है।
किसी प्रकार इस मुसीबत से पाला झाड़ आगे को बढ़ा फूलबाग चैराहा पार किया। नाम तो फूलबाग है पर फूल के नाम पर कोई पौंध तक इसमें नज़र नहीं आया। फूलबाग नाम से थोड़ा मन हलका कर कार्यालय पहँुचा, जहाँ की बिजली गुल थी। टेलीप्रिंटर मशीनों को चलाने के लिये जनरेटर चला था जिसका ध्ुंआ गरमी में और इजाफा कर रहा था।
पसीने से तरवतर होकर रूमाल से हवा फटकते हुए मैं किसी प्रकार अपनी सीट पर बैठा ही था कि कार्यालय का चपरासी दौड़ा हुआ आया। उसके हाथ में कोई कागज था, वह ठीक मेरे मेज के सामने खड़ा हो गया। मानो मुझे मुजरिम समझ कर पुलिस वाला कोई कोर्ट का समन दे रहा हो। मैं उसे देखकर थोड़ी देर के लिय घबराया। अपने आपको संयत कर थोड़ी दबी जुवान से से पूछा- क्या लाये हो? कोई गलती तो नहीं हुई? चपरासी ने मुस्करा कर जवाब दिया- बाबूजी स्थानान्तरण आदेश लाया हँू। साहब बता रहे थे कि आप बड़े भाग्यशाली हैं। गर्मी के दिनों में नैनीताल की ठण्डी हवा खाने जा रहे हो ‘आपका स्थानान्तरण हो गया है।’ चपरासी की बात सुनते ही मैंने झपट्टा मार कागज छीन लिया और मन से सारी थकान व गर्मी को अलविदा कर आगे की कार्यवाही में जुट गया।
नैनीताल के बारे में सुना ही भर था पर गया कभी नहीं था। मेरे दादाजी नैनीताल के डाकखाने में मुलाजिम थे उस जमाने में जब प्रसि( शिकारी जिम कार्बेट के पिताजी वहाँ पोस्ट मास्टर हुआ करते थे। दादाजी बताते थे कि नैनीताल में इतनी सर्दी पड़ती है कि यदि कोई आदमी सुबह नहा कर अपने कपड़े सुखाने को बाहर डाले तो वह वर्फ के समान जम कर छड़ी जैसे बन जाते थे।
इन्हीं कल्पनाओं के साथ मैं नैनीताल रवाना हुआ। यात्रा के दूसरे दिन नैनीताल बस स्टैण्ड तल्लीताल ;डांठ पर खड़ा था। चारों ओर दृष्टि डालते हुए मैं अचम्भित सा रह गया था। एकाएक ऐसी जगह पहँुच गया था या तो वह देवताओं का निवास है या कोई सपना है किसी स्वर्गलोक का! मेरी तंद्रा एक कुली ने यह कहकर तोड़ी- बाबूजी सामान ले जाना है क्या? मेरे पास थोड़ा बहुत सामान था जो कुली को पकड़ा दिया। कानपुर की उमस गर्मी को छोड़कर जब मैं नैनीताल की काली डामर की मालरोड पर चल रहा था ऐसा अनुभव हो रहा था कि मैं किसी वातानुकूलित हाॅल में कसीदा वाली मखमली कार्पेट में पैर रख रहा हँू। मुझे सड़क पर चलने में कुछ हिचकिचाहट सी हो रही थी कि कहीं मेरे पैरों के जूतों की गन्दगी सड़क को गन्दा न कर दे।
सुन्दर हरा रंग लिये हुए शान्त तालाब में सपफेद बतख झुण्ड बनाकर खेल रहीं थी, मानो मानसरोवर के हंस हों। चारों ओर पहाड़ियों में घने बांज, देवदार व पोपलर के पेड़ों की पंक्तियां शोभायमान थी जिनसे प्रतिविम्बित होकर तालाब का रंग गहरे हरे रंग में बदल गया था। जो बहुत ही मनोहारी दृश्य था।
सामने की पहाड़ियों मं सफेद बादल छिटक रहे थे। इन पहाड़ियों में छोटे-छोटे बंगलेनुमा भवन बने थे जिनकी छतें हरे व लाल रंग की चादरों से बनी थी और दीवारों का रंग सपफेद था। ऐसा मालूम हो रहा था कि ये भवन आकाश के सितारे हों। मालरोड अतिशान्त वातावरण व घने वृक्षों की शीतल छाया में यदाकदा हाथ रिक्सों की आवाजाही के अतिरिक्त कुछ पैदल यात्राी भी तल्लीताल व मल्ली ताल को सपफर करते दिख रहे थे। गज़ब की शान्ति व स्वच्छता का वातावरण था। स्थानीय वोट हाउस क्लब में किसी पिक्चर की सूटिंग चल रही थी, जिसे देखने को थोड़ी बहुत स्थानीय जनता खड़ी थी। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बड़े शहरों में इस प्रकार के आयोजन कराने में पुलिस बल की सहायता लेनी पड़ती है क्योंकि अपार भीड़ को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है लेकिन यहाँ पर पुलिस की कोई आवश्यकता नज़र नहीं आ रही थी। स्कूल कालेजों में बच्चों की उपस्थिति का आभास नहीं मालूम पड़ रहा था। जबकि इस छोटे शहर में जनसंख्या के अनुपात से कहीं अध्कि विद्यालय हैं, जहाँ पर दूसरे शहरों के विद्यार्थी अध्कि मात्रा में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। शहर का अध्किांश भाग जंगल से घिरा था, निचले इलाकों में थोड़ी बहुत दुकानें तथा एक खेल का मैदान था। मैदान के एक छोर पर देवी ;नैनादेवी का मन्दिर व दूसरे किनारे पर गुरुद्वारा साहिब व मस्जिद था, जिनमें सभी वर्गों के लोग आते जाते दिखाई दे रहे थे। आज के समय में जब राम मन्दिर व बावरी मस्जिद का विवाद उग्र रूप धारण करता जा रहा है। यहाँ नैनीताल में लोगों को ईद, दिवाली, होली, रामलीला साथ-साथ मनाते देखा गया। यहाँ तक कि मस्जिद व मन्दिर साथ-साथ हैं, जिनका आपस में किसी प्रकार से टकराव नहीं। दुर्गा पूजा के अवसर पर सारे धर्म के लोग एकसाथ पूजा में शामिल होते देखे गये। रामलीला में भी दूसरे वर्ग के लोग बढ़चढ़ कर भाग लेते देखे गये।
एक बार पुनः बीस साल के अन्तराल में उस हरी-भरी शान्त प्रकृति के गोद में पदार्पण करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मन में कई प्रकार की कल्पनाएं संजोये मैं उस देवभूमि के बारे में सोचने लगा जिसकी छाया में सुन्दर-झुरमुटों के बीच बैठ कर नामी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं को मूर्त रूप दिया तथा प्रकृति के चितेरे चित्राकारों ने अपनी कल्पनाओं को कागज में उतारा है। इन्हीं विचारों में खोया हुआ अचानक मैं तल्लीताल के बस स्टाप ;डांठ पर पुनः खड़ा था। जन सैलाब का भारी रेला, साइकिल, रिक्सा, टैक्सी, स्कूटर व वाहनों का जमघट देख तथा नेपाली कुलियों को वाहनों के उपर आक्रामक कोशिशें होटल एजेन्टों द्वारा यात्रियों से जबरन धक्का मुक्की आदि देख मैं घबरा गया और एक पल के लिये ऐसा लगा कि मैं पुनः कानपुर आ पहँुचा हँू। शहर की ओर दृष्टि डालने से पता चला कि पहाड़ियों व लेक के इर्द-गिर्द छोटे-छोटे घरौंदे व कहीं-कहीं पर विशाल इमारतों से पहाड़ी ढक चुकी है। उँची पहाड़ियों पर नालों के उपर भी छोटे-छोटे घर दिखाई दे रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि किसी गन्दी जगह पर चील कौवे बैठे हों। मालरोड की चैड़ाई अतिक्रमण होने से संकरी लग रही थी। लेक में पानी का रंग भी हरा न होकर मटमेला लग रहा था। पहाड़ियों हरे जंगल के बदले लिंटर वाले भवन बन चुके थे। कहीं-कहीं पर भूस्खलन के कारण मलवा पटा पड़ा था। सीवर लाइन ओवर फ्रलो कर रही थी।

गुरुजनों ने जीवन संवार दिया

नारायण सिंह मर्तोलिया से बातचीज

पि.हि.प्रतिनिधि
आज जब हम शिक्षा और शिक्षकों की बात करते हैं तो बाजार का कुरूप चित्र दीमांग में बनने लगता है। वैसा बाजार जिसमें किसी को कोई सुनवाई नहीं होती। पैसे के बल पर लेन-देन। किसी को किसी के भविष्य की चिन्ता नहीं। लेकिन असल गुरुजनों का मान-सम्मान हमेशा रहेगा। गुरु की भूमिका अपने शिष्यों को आगे बढ़ाने में पहले होती है। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा हुआ है। यहाँ पर नारायण सिंह मर्तोलिया जी से उनकी शिक्षा और बचपन की यादों के साथ गुरुजनों की भूमिका पर बातचीज के आधर पर प्रस्तुति है-
मुनस्यारी के मिनाल ग्राम के उमेद सिंह के परिवार से यह कहानी शुरु होती है। उनके दो पुत्र  नारायण सिंह, धरम सिंह हुए। ग्रामीण परिवेश का सीध सरल परिवार अपनी दिनचर्या में रहता। वह ग्राम जिसमें मर्तोलियाओं के कई परिवार रहते थे अब अधिकांश हल्द्वानी आकर बस चुके हैं। जब नारायण सिंह हाईस्कूल में पढ़ रहे थे, उनके पिता का निधन हो गया। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी सहित अपनी पढ़ाई का दबाव इनपर था।  ग्राम्य जीवन के घोर श्रम में नारायणसिंह मर्तोलिया ने इण्टरमीडिएट किया। इस बीच पालीटेक्निक के लिये बाहर चले गये लेकिन मौसम और स्वास्थ्य के साथ न देने से वह मुनस्यारी अपने गाँव लौट आए। घर की स्थिति-परिस्थिति देखते हुए 1967-68 में अध्यापन का कार्य किया। उसके बाद भारतीय पोस्टल विभाग में आ गये।
नारायण सिंह जी अपने जीवन में अपने गुरुजनों का हमेशा स्मरण बनाये रखते हैं और कहते हैं कर्मठ, ईमानदार और परिस्थितियों को जानने वाले वैसे गुरुजनों का मिलना दुर्लभ है। अतीत को याद करते हुए मर्तोलिया जी बताते हैं कि खेतीबाड़ी, पशुपालन का काम ग्राम्य जीवन का पहला हिस्सा होता है। इसके अलावा निजी संघर्ष लगे रहते हैं। वह बताते हैं- ‘‘जब मैं लखनउ से अस्वस्थ्य होकर मुनस्यारी आ चुका था और एक दिन बाजार में टहल रहा था। कवीन्द्र शेखर उप्रेती ने मुझे बुलाया और कहा- 6, 7, 8 में पढ़ाने के लिये कोई नहीं है। तुम जिला विद्यालय निरीक्षक पिथौरागढ़ को मिलो। मैं पत्र बनवाता हूं कि जब तक स्थायी व्यवस्था नहीं हो जाती है तब तक पढ़ाई के लिये इन्हें अस्थायी रूप से रख दिया जाए। विद्यालय के हैड क्लर्क रमेश उप्रेती जी ने पत्र बनाया। उस पत्र को लेकर मैं पैदल तेजम गया और अगले दिन पिथौरागढ़। सरकारी कार्यालयों की प्रणाली से मैं परिचित नहीं था अतः दो दिन तक चक्कर लगाता रहा। इसके बाद किसी तरह मेरी अस्थायी नियुक्ति का पत्र बन गया।’’ मर्तोलिया जी कहते हैं कि गुरुजनों को अपने शिष्यों का पूरा ध्यान रहता था और वह पग-पग पर मार्गदर्शन करते थे। वह विजय सिंह पांगती जी को भी अपना गुरु मानते हैं, जिनके कहने पर वह डाक विभाग से जुडे़।
मर्तोलिया जी सामने शिक्षा और डाक में से एक विभाग चुनने का अवसर था। विजय सिंह जी ने इन्हें समझाया कि शिक्षा में फिलहाल तो लग चुके हो लेकिन अस्थायी व्यवस्था में न जाने कब तक रहना पड़े। डाक विभाग में जाओ। इसके बाद नारायण सिंह आगरा में पोस्ट क्लर्क बन गये। 1974 में परीक्षा पास करते हुए प्रमोशन की प्रक्रिया में मुनस्यारी आए। अपने गाँव के नारायण को पोस्टआफिस में साहब बनकर आता देख ग्रामीण खुश थे। राजकाज में इधर-उधर तो जाना ही होता है। इसके बाद मर्तोलिया जी पिथौरागढ़, कर्णप्रयाग, बेरीनाग, जलौन कानपुर, इटावा होते हुए शहजहांपुर हैड पोस्टमास्टर बने और कुछ दिन हल्द्वानी भी रहे। इनकी कार्यदक्षता और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए आसाम भेज दिया गया। 1990-92 तक असम में अध्ीक्षक रहने के बाद यूपी के सहारनपुर, बरेली, बदांयू रहे। लखनउ, हरिद्वार सहित देहरादून में सेवा की। 31 मई 2009 को सहा. पोस्ट मास्टर जनरल उत्तराखण्ड के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद हल्द्वानी के दुर्गेश कालोनी में रह रहे हैं। इनके सुपुत्र जीतेन्द्र मर्तोलिया भी पोस्टल डिपार्टमेंट में हैं और अपनी कला-संस्कृति के लिये समर्पित हैं। पुत्र विनोद मर्तोलिया और जगदीश मर्तोलिया भी पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ अपने कर्मक्षेत्र में हैं। सामाजिक सरोकारों से जुड़े इस परिवार को शुभकामनाएं।

हल्द्वानी के इतिहास के उम्रदार गवाह थे केशवदेव वशिष्ठ

पि.हि.प्रतिनिधि
24 मार्च 2017 को पं.केशवदेव बशिष्ट का सौ वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। अपने जमाने के पहलवान, संगीत रसिक, जाने-माने मुनीम स्व.बशिष्ट जी अपने पीछे पुत्र सूर्यदेव नाती-पोतों सहित भरापूरा परिवार छोड़ गये हैं। भाबर के हल्द्वानी बनने से लेकर अंग्रेजों के जमाने के तमाम किस्से जानने वाले बशिष्ट जी को लोग ‘मुनीम जी’ नाम से पहचानते थे। शहर के पुराने परिवारों में से इनका परिवार भी है। ;स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती, सम्पादक पि0हि0 की पुस्तक हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से में इनके बारे में कई रोचक जानकारियां प्राप्त की जा सकती हैं।
इनके पिता स्व.भीष्मदेव जी अपने समय के कवियों में से थे। वह दौर जब हल्द्वानी में दिन की रामलीला का मेला देखने को तराई-भाबर उमड़ पड़ता था, पहलवानों के दंगल लगते थे, संगीत प्रेमियों के अड्डे कोठे भी थे, फूलों के गजरे और पान के शौकीन लोग सायं को टहला करते थे। रासलीला की मण्डियां मथुरा से आया करती थीं। हरे-भरे खेत लहलहात थे और खुली नहरों की कलकल देखने को मिलती थी। उस दौर के पूरे नक्शे को याद करते हुए बशिष्ट जी ने समय के साथ अपने को समेट लिया। रामपुर रोड स्थित अपने पैतृक आवास में वह पुत्रों-भाईयों के बीच रहा करते थे। करीब साल भर से अपने पुत्र के तीनपानी स्थित मकान में वह रहने लगे थे। उम्र के इस पड़ाव में भी उन्होंने प्रातःकालीन योगक्रिया नहीं छोड़ी थी और राग-रागनियों को गुनगुनाया करते थे। पहाड़ की होली बैठक के बेहद शौकीन मुनीम जी को दुर्लभ होली रचनाएं याद थीं। होली गीतों को वह ठेठ ध्र्रे से हटकर तीनताल में गाया करते थे। हिमालय संगीत शोध् समिति के संरक्षक के रूप में वह हमेशा सक्रिय रहे और मार्गदर्शन करते थे। कलाकारों को प्रोत्साहन भी किया करते थे। छोटे कद के मुनीम जी को स्वाभिमानी और स्वावलम्बी थे। उन्होंने शहर के बड़े प्रतिष्ठित व्यापारियों के वहाँ मुनीमगिरी की और उम्र के साथ अरुचि हो गई थी लेकिन उनके अनुभव और शैली के कायल व्यापारी उन्हें छोड़ते ही नहीं थे। एक बार में एक सैकड़ा व्यापारियों की मुनीमी करना हर किसी के बूते की बात नहीं। इसके अलावा शहर में होने वाले प्रत्येक आयोजन विशेषकर संगीत कार्यक्रमों में वह दर्शक के रूप में जरूर दिखाई देते थे।
फैलते जा रहे शहर और बदलती जा रही जिन्दगी से हैरान बशिष्ट जी कहा करते थे- ‘जिन्दगी में सारी लपेट चलती रहेगी। अपने साथ शामिल बाजा भी होगा लेकिन सर्तकता अपनी करनी है। कोई भरोसा नहीं कब क्या हो जाए।’ पिघलता हिमालय कार्यालय, शक्ति प्रेस छापाखाना उनका प्रमुख अड्डा था।
बुजुर्गवार पं.केशवदेव बशिष्ट जी अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी स्मृतियां हमेशा बनी रहेंगी। हल्द्वानी शहर के पुराने परिवारों के रूप में उनकी जड़ें हमेशा सक्रिय रहेंगी। उनके पुत्र, बहू, नाती-पोते सभी मिलकर स्व.बशिष्ट जी की यादों को उनके बताये रास्तों को अपनायेंगे। जब-जब हल्द्वानी का इहिहास पढ़ा जायेगा, इनका स्मरण होना ही है। युवाओं को प्रोत्साहित करने वाले बुजुर्ग स्व.बशिष्ट जी को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजलि

पिघलता हिमालय 17 अप्रैल 2017 अंक से।

होली हमारा लोकसंगीत है, इसकी ठसक-मसक बनी रहे: चन्द्रशेखर पाण्डे

बातचीज

पि.हि. प्रतिनिधि
पहाड़ की होली में अल्मोड़ा का उल्लेख पहले किया जाता है। नागर होली के लिये अल्मोड़ा की महफिलों को बहुत मानते हैं। होली बैठकों के रंग-ढंग अल्मोड़ा के अलावा अन्य स्थानों पर भी होते हैं लेकिन अल्मोड़ा सांस्कृतिक नगरी की मान्यता के साथ-साथ रसिक जनों की खासी सहभागिता इसे आगे बनाये हुए है। यहाँ कई नामी कलाकार हुए जिन्होंने बैठकी होली की महफिलें सजाई और इसके संरक्षण के लिये भी कई प्रतिष्ठित लोग हुए। होली गायकी के चले आ रहे ढांच पर गायन के अलावा बात-बहस भी अल्मोड़ा में होती रही है क्योंकि यह बुद्धिजीवियों का शहर जो है। होली को लोकसंगीत मानने और इसकी चाल को बनाये रखते हुए महफिल सजाने में माहिर 76 वर्षीय चन्द्रशेखर पाण्डे कहते हैं- ‘होली हमारा लोक संगीत है, इसकी ठसक-मसक बनी रहे।’
होली से पहले पाण्डे जी के परिवार की ही बात कर लेते हैं। पहले कभी पवेत, चम्पावत के रहने वाले पाण्डे परिवार झाकरसैम आये थे। इनकी मान्यता तांत्रिक के रूप में रही है। इन्हीं परिवारों में से रामदत्त पाण्डे का परिवार अल्मोड़ा में रहा। रामदत्त जी के असमय निधन से इनके पुत्र मनोरथ ने अल्मोड़ा के जोगालाल साह के वहाँ हलवाई का कार्य किया। बाद में मनोरथ पाण्डे जी ने अपना कारोबार किया और वह मिष्ठान के कार्य में खासी पहचान रखते थे। रामदत्त जी के दो पुत्र बच्चीराम और मनोरथ और एक पुत्री देवकी देवी हुई। मनोरथ पाण्डे जी के पुत्रों में चन्द्रशेखर पाण्डे, पूरन चन्द्र पाण्डे, गोपालदत्त, विनोद पाण्डे और कमल पाण्डे हैं। परिवार की शाखा काफी विस्तृत हो चुकी है लेकिन आज भी मनोरथ पाण्डे की पहचान से इन्हें हर कोई पचहान लेता है। परिवार के सदस्यों में अपनी कला संस्कृति के प्रति बेहद लगाव है। इसी परिवार के वरिष्ठ सदस्य चन्द्रशेखर वस्त्र व्यापारी होने के साथ सामाजिक गतिविधियों में रमे हुए हैं और होली के लिये इनकी दीवानगी देखने लायक है। वर्षभर होली सुनने वालों में से यह भी एक कलाकार हैं।
श्री पाण्डे जी अपने अतीत को याद करते हुए कहते हैं- ‘मुझे याद नहीं है होली से कब जुड़ गया। पिता जी सन्त प्रवृत्ति के और संगीत के शौकीन थे। घर मेें साधू-सन्तों का आना होता, इसी से मेरा रुझान भी इस ओर हुआ। 9-10 साल से मैंने अल्मोड़ा की होली बैठकों और रामलीला में जाना आरम्भ कर दिया था।’ वह कहते हैं- ‘होली सीखने से नहीं श्रवण से आती है। बार-बार महफिलों में सुनने का परिणाम ही है कि वह कुछ गा पाते हैं। शिवलाल वर्मा उर्फ अच्छन, चन्द्र सिंह नयाल, भवान सिंह नयाल, प्रेम लाल साह इसके बाद जवाहर लाल साह, ताराप्रसाद पाण्डेय ने मुझे प्रभावित किया। उन महफिलों की यादें मेरे मस्तिष्क में भली भांति अंकित हैं।’
लोक कलाकार संघ के सदस्य के रूप में भी चन्द्रशेखर पाण्डे सक्रिय रहे हैं और आज भी अपने पुराने साथियों का स्मरण करते हैं। वह बताते हैं कि लोक कलाकार संघ की गतिविधियों में उन्हें कई विधाएं सीखने का अवसर मिला। आज भी प्रतिदिन होली की बन्दिशें नियमित रूप से सुनने वाले चन्द्रशेखर पाण्डे का मानना है कि संगीत प्रकृति प्रदत्त होता है। पहाड़ की होली परम्परागत रूप से उपजी है, समय के साथ इसमें प्रयोग अच्छी बात है लेकिन इन प्रयोगों में इसकी सरलता-सुगमता का ध्यान रखना चाहिये। यह एकल गायकी नहीं बल्कि सामूहिक गायकी है। हमारे विद्वानों ने होली की ऐसी अद्भुद रचनाएं रचीं हो जो तय राग के अनुसार आज तक सटीक हैं। उन सुन्दर रचनाओं को वर्षों से गाया जा रहा है। इस बीच कुछ नये बोलों को लेकर गाने की करामात हुई लेकिन नई कविताएं बनाकर जबरन गाने से होली गीत नहीं हो सकता है। ऐसे गीत जुगुनू की तरह होते हैं और चलन से बाहर हो जाते हैं। नये होली रचनाकारों में चारुचन्द्र जी की मान्यता है क्योंकि उन्होंने जो भी गीत रचे वह हमारे होली थाट के लिये सटीक हैं। चारु चन्द्र जी संगीत के भी जानकार थे इसलिये उन्होंने बेहतरीन रचनाएं रचीं। पहाड़ की होली गायन का एक खांचा बना हुआ है उसमें गाने का अपना आनन्द है।
बातचीज के दौरान पाण्डे जी कुछ रचनाओें को गुनगुनाते हैं और पुराने गवैयों को याद कर भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं- ‘संगीत सरस्वती का वरदान है। ये प्रकृति प्रदत्त है। ये जहाँ भी है, सुख-शान्ति का और ईश्वर से मिलाने वाला है।’

चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरखों को क्या जबाब देंगे: के.के.साह

बातचीज
चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरखों को क्या जबाब देंगे: के.के.साह

पि.हि.प्रतिनिधि
नैनीताल में भी होली का रंग जमकर बरसता रहा है। ठाटबाट के साथ होली की महफिलें सजती रही हैं। हालांकि संस्थागत आयोजन के बाद ठोल का एक सुर सुनाई देने वाली स्थिति वर्तमान में हो चुकी है। पिफर भी होली के दीवाने मौजूद हैं। होली की दिवानगी का ऐसा ही परिवार कुमया साह लोगों का है। किसी न किसी रूप में संगीत से जुड़े परिवार के सदस्य इस समृद्ध परम्परा को हमेशा जिन्दा देखना चाहते हैं। परिवार के वरिष्ठ सदस्य 85 वर्षीय कृष्ण कुमार साह कहते हैं- ‘‘चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरुखों को क्या जबाब देंगे।’
बात नैनीताल के इस परिवार की करें तो- गंगा साह प्रतिष्ठित व्यक्ति हुए हैं। उनके चार पुत्र- दुर्गालाल, श्यामलाल, प्रेम लाल, भवानीदास साल हुए। भवानीदास जी इंस्पेक्टर नाम से ही जाने जाते रहे हैं। प्रेम लाल जी के सुपुत्र सुदर्शनलाल साह उच्च प्रशासनिक पदों को सुशोभित करने के साथ ही नैनीताल का गौरव बढ़ाते रहे हैं। भवानीदास जी पुत्र हुए कृष्णकुमार और हरीश लाल। कृष्णकुमार जी को के.के. साह के नाम से नैनीताल में हर कोई जानता और पहचानता है।
के.के.साह बचपन से ही होली महफिलों के शौकीन रहे हैं। वह बताते हैं कि उनके पिता के मित्र तारादत्त पन्त तारालाॅज वालों के वहाँ होली की बैठकें हुआ करती थी। पौष के प्रथम रविवार से छरड़ी तक होल्यार इसमें जुटते थे। पन्त जी ने पिता से कहा कि एक दिन अपने घर में भी इस प्रकार बैठक करवाया करो, उसके बाद हमारे घर में भी प्रतिवर्ष बैठकें होने लगीं। अन्य सारे आयोजनों के क्रम में होली का जो संकल्प पिता जी ने लिया वह भव्य रूप से सम्पन्न होने लगा। इसका असर मेरे दीमाग में आज तक छाया हुआ है। पहले बहुत से लोग महफिलों में आया करते थे, बिना बुलाये भी अपनेपन से लोग आ जाया करते थे। रातभर की महफिलों का दौर चलता। अब तो नई पीढ़ी में वैसा उत्साह देखने को ही नहीं मिल रहा है। मैं तड़फ कर रह जाता हँू, कोई होली गीत सुना जाता। दो-चार लोग ही अपने आप से इस कार्य में जुटे हैं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि इस कार्य में जुटे लोग मिलकर इस परम्परा को सिलसिलेवार जगह-जगह करें।
नैनीताल के पुराने दिनों को याद करते हुए साह जी बताते हैं कि वह शारदा संघ जाया करते थे जहाँ प्यारे साह पुराने गायकों में थे। वह बहुत प्यारा धमार गाते थे। नित्यानन्द पन्त, हरीश जोशी, हीराबल्लभ जी, शिवलाल, भवानीदास, मोहनलाल, विहारी लाल, पूरन साह जी महफिल में होते। इसके बाद जवाहर लाल, अच्छन मास्साब, ताराप्रसाद, उफर्बादत्त पाण्डे जी हुए। उर्बादत्त जी बहुत किया, वह अपने आप से लोगों को महफिल का निमंत्रण देते और कई दिनों तक नियमित बैठकें होती। बर्फ के दिनों में भी होली की महफिल चलती रहती थी। इसके बाद दिनेशी जोशी कन्नू, रमेश जोशी, अनूप साह, देवी उस्ताद महफिलों में रहे।
अनगिनत महफिलों के गवाह के.के.साह के पास सैकड़ों रिकार्ड मौजूद हैं। होली की इस दीवानगी ने उन्हें संगीत के महारथियों से मिलाया। नैनीताल आये ओंकारनाथ ठाकुर ने इनके घर में सिंगलपुवे खाये हैं। वह बताते हैं- ‘के.मुंशी गर्वनर थे, उस दौर में ओंकारनाथ नाथ नैनीताल आये थे। मुझे जैसे ही पता चला मैं जगदीश उप्रेती उर्फ जग्गन उस्ताद के साथ ठाकुर साहब को मिलने चला गया और आटोग्राफ मांगे। उन्हें इण्डिया होटल में ठहराया गया था। उन्होंने घूमने की इच्छा जताई, उन्हें डांडी से बिड़ला ले गये। मि.संघ वहाँ प्रधनाचार्य थे, वह भी खुश हो गये। संगीत में पी.जी. कुमार थे, उन्होंने सारे बच्चों को एकत्रित कर दिया। इसके बाद ओंकारनाथ ठाकुर ने बन्देमातरम गाया। बाद में उन्हें हरिकीर्तन मण्डली ले जाया गया।’
के.के. साह जी में संगीत के ऐसी दीवानगी है कि उन्होंने नैनीताल आने वाले किसी उस्ताद को नहीं छोड़ा। मुस्ताक हुसैन जब मैडल लगाये हुए इनके घर आये तो उन्हें देखने भीड़ जमा हो गई। अहमदजान, ध््रुव तारा जोशी, विश्वनाथ जग्गनाथ जोशी भी आये। सन् 1951-52 में नैनीताल में प्रथम म्यूजिक कांप्रफंेस उन्होंने करवाई। के.के.साह जी ने वाद्ययन्त्रों की खोज में भी समय लगाया है। बाजे-तबले के लिये वह खूब दौड़े हैं क्योंकि महफिलों के शौकीन ही जानते हैं कि कितने जतन इसमें करने पड़ते हैं। सुरों की पहचान रखने वाले साह जी ने अपने लिये कलकत्ता से हारमोनियम मंगवाया। पहाड़ की होली को संरक्षण देने में आपका योगदान अनुकरणीय है।

कभी पेड़ों में फल लदे रहते थे, अब बद्री-केदार हाईवे में ट्रैफिक लद चुका है

बातचीज

पि.हि.प्रतिनिधि
बदरीनाथ और केदारनाथ हाईवे आज ट्रैफिक के दबाव से लद चुका है। पहले इस स्थान पर पेड़ों में फल लदे रहते थे। किसी प्रकार की हाय-तौबा नहीं थी। कर्णप्रयाग ;चमोली के समाज सेवी राधकृष्ण भट्ट अपने अतीत का स्मरण करते हुए कहते हैं कि उनके पूर्वज पिथौरागढ़ जिले के विषाड़ से आकर यहाँ बसे। उनकी काफी जमीन थी, कुछ सड़क, कुछ थाने, कुछ तहसील, कुछ इण्टर कालेज भवन इत्यादि में चली गई लेकिन व्यवस्था का खेल ऐसा कि भूमि का पैसा नहीं मिल सका है।
करीब 150 साल पूर्व विषाड़ से श्रीराम कृष्ण भट्ट और उनके भाई रामप्रसाद भट्ट व्यापार कर्णप्रयाग आये थे। इससे पहले ये लोग चैखुटिया गेवाड़ रहे। इन्हीं के वंशज सफल कारोबारियों के रूप में जाने जाते हैं। श्री राधकृष्ण बताते हैं कि पूरा बचपन ही कर्णप्रयाग बीत गया ऐसे में विषाड़ यदा-कदा जाते हैं। मन्दिर में हाथ जोड़कर वापस फिर यहीं………। पहले साधन न होने के कारण उनके परदादा गाँव से चले आये। अब वर्षों के बाद यदि परिवार को कोई गाँव जाता है तो विकास के मायने फिर शून्य दिखाई दे रहे हैं। नदियों में स्टोन क्रशर लग चुके हैं। कोई जाना-पहचाना सा नहीं दिखाई दिया तो चाय की दुकान में चाय पीकर गाँव निहार भर लेने का मलाल रहता है। भट्ट जी बताते हैं- उनके पिता कामरेड स्व. श्रीकृष्ण भट्ट को नेहरु जी के समय नजरबन्द किया गया था। उनके साथ गरुड़ के तिवारी जी और विद्यासागर नौटियाल ;जो टिहरी के विधयक रहे थे। ये लोग 1964 की रात्रि को रिहा होकर घर आये। पिता जी ने कभी भी राजनीति के साथ टिकट लेने में दिलचस्पी नहीं ली। वह अपने कारोबार के अलावा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहते थे। कभी कोर्ट कचहरी तो कभी तिहाड़ जेल तक की यात्रा उनके भाग्य में थी। सन् 1971 में स्व.नरेन्द्र सिंह भण्डारी ;जो विधयक भी रहे अपने साथ पिता जी को कांग्रेस में ले गये। श्री भट्ट कहते हैं कि तब राजनीति की अपनी मर्यादा थी। वर्तमान राजनीति में उच्छृंखलता बढ़ती जा रही है। जो विकास की सोच से दूर है।

पिघलता हिमालय 16 नवम्बर 2015 से

पेटशाल, पनुवानौला में रुकते थे पैदल यात्री

बातचीज

पि.हि. प्रतिनिधि

अल्मोड़ा जिले के पेटशाल इलाका बहुत चर्चित है। चितई गोलज्यू मन्दिर के कारण तो पेटशाल को लोग जानते ही हैं, लखुडियार के कारण भी इसकी चर्चा होती है। इसके अलावा पेटशाली परिवार भी चर्चा का बड़ा कारण है। कला-साहित्य-संस्कृति के लिये इन लोगों को याद करते हैं। इन्हीं परिवारों में से संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर पेटशाली भी हैं। हंसादत्त पेटशाली के पुत्र- प्रेम बल्लभ ;इनके पुत्र जानकी प्रसाद, लीला हैं, पद्मादत्त ;इनके पुत्र रमेश चन्द्र हैं।, हरिदत्त पेटशाली ;इनके पुत्र हुए जुगलकिशोर, कैलाश, ललितमोहन।
संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर बताते हैं कि इनके बुजुर्ग मूल रूप से नेपाल से आये। चम्पावत जिले के पुण्यागिरी के पास टुन्यास में वह लोग रहा करते थे। गोरखों की मारकाट में एक बुजुर्ग महिला और सात साल का बालक कृष्णदेव जान बचाकर भाग निकले। समझदार बुजुर्ग ने पेटशाल में 200 रुपये में जमीन खरीद ली। पेटशाली जी कहते हैं- अंग्रेजों के समय स्थान के नाम पर वहाँ के वासियों को पुकारा जाने लगा। जैसे- कपकोट से कपकोटी, बाराकोट से बाराकोटी, पेटशाल से पेटशाली।
संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर जी ने पेटशाली में पर्वतीय वाद्ययन्त्रों का संग्रहालय स्थापित कर रखा है। कई पुस्तकों का लेखन व सम्पादन इनके द्वारा किया गया है। पहाड़ के गीत-संगीत की वर्तमान स्थिति को देख वह बेहद खिन्न हैं और कहते हैं कि ग्राम्य पृष्ठभूमि में लोक संस्कृति होती है और अब मंचों पर जो कुछ दिखाई-सुनाई दे रहा है अधिकतर वह जानकारी से अनभिज्ञ लोगों का तमाशा है। लोकविधा की जानकारी इन स्टार कलाकारों को नहीं होती है।
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए पेटशाली जी बताते हैं कि पैदल रास्तों के जमाने में गंगोलीहाट से तक लोग नैनी होते हुए पैदल आते थे। कृपालदत्त ताउ की दुकान में रुकने का अड्डा था। पनुवानौला में गंगादत्त बिनवाल का डेरा रुकने का स्थान था। तब चितई में अनावश्यक भीड़ नहीं होती थी। बाद में जब गिनीचुनी बसें चलनी शुरु हुई। यात्राी बस रुकवाकर मन्दिर में भेंट चढ़ाने असिका लेने आते-जाते थे। ग्राम्य जीवन शुद्ध वातावरण का था।

नमक लेकर बदरीनाथ तक जाते थे

बातचीज

पि.हि.प्रतिनिधि
नैनीताल जिले का रामनगर शहर कुमाउँ और गढ़वाल की पुरानी मण्डी है। कुमाउँ कमिश्नर रेमजे ने इस नगरी को 1878 से 82 के बीच बसाया था। मुहान नामक स्थान पर बाघ के हमले से 24 तीर्थयात्रियों की मौत से दुःखी रेमजे ने नामनगर बसाने की सोची। दरअसल यहाँ के प्राचीन रामामन्दिर में चारधाम यात्रियों के ठहहने का पड़ाव था। यहाँ होते हुए यात्री बदरीनाथ को जाते थे।
इसी रामनगर के पुराने व्यापारियों में सुरेश चन्द्र जी का परिवार है। इनके दादा शम्भू दयाल फिर पिता ओमप्रकाश ने जिस फर्म को चलाया वह 1910 में ‘मानकचन्द शम्भूदयाल’ नाम से शुरु हुई। फर्म को नये स्वरूप में अब सुरेशचन्द्र जी के साथ उनके सुपुत्र अनुज और उनके पौते मानस संभाले हुए हैं। सुरेश चन्द्र जी लखनउ से बीएससी करने के बाद अपने कारोबार में जुड़े। इसी प्रकार इनके पुत्रा अनुज कुमाउँ विवि से एकाॅम में टाॅपर हैं। मूल रूप से काशीपुर में व्यवसाय करने वाले इस परिवार ने जब रामनगर में अपना कारोबार शुरु किया था तब गढ़वाल के दूरस्थ क्षेत्रा तक गल्ला सप्लाई में इनकी फर्म अग्रणीय रही। श्री सुरेश चन्द्र जी बताते हैं कि उनके देखादेखी बकरियों में राशन लदकर जाता था। लाला ओमप्रकाश जी घोड़े में सवार होकर वसूली के लिये जाते थे। बदरीनाथ तक राशन सप्लाई के लिये उनके पास लाइसेंस था। नमक, चीनी, गल्ला का जिन व्यापारियों को मिलता था उन्हें ‘नोमनी’ कहते थे। राजस्थान के साम्भरलेक से रेलवे मालगाड़ी द्वारा नमक आता था और द्वाराहाट, मासी इत्यादि इलाकों में इसका वितरण किया करते थे। सुरेश चन्द जी बताते हैं कि सन् 1970 में आई बाढ़ के कारण पीपलकोटी का पुल बह गया था, जिस कारण 17 दिन तक मुश्किलों से होते हुए वह रामनगर पहँुचे थे। समय के साथ व्यापार के तरीके बदल चुके हैं लेकिन पुराने परिवारों के संस्कार उनकी पीढ़ियों को एकसूत्र में बांधने के साथ संस्कारों से भी जोड़ते हैं। इनका परिवार भी सामाजिक कार्यों में जुड़ा हुआ है। श्री सुरेश जी अग्रवाल सभा की गतिविधियों से जुड़े हैं। यहाँ के पुराने रामामन्दिर में इनके परिवार का योगदान रहा है। पहले से यहाँ आने वाले साधू-सन्यासियों को इनके नाना लाला श्यामलाल द्वारा संरक्षण दिया जाता रहा है। उनके भोजन की व्यवस्था राजाराम हलवाई के वहाँ करवाई जाती थी। सुरेश जी बताते हैं कि नाना जी चारधाम यात्रा के लिये पैदल आने वाले सन्यासियों को ठहरने के लिये रामा मन्दिर में स्थान मिल जाता था और भोजन-प्रसाद के लिये नाना जी पर्ची लिखकर राजाराम हलवाई से व्यवस्था करवा देते थे। यह पुराना मन्दिर आज भी व्यवस्था के तहत संचालित है। रामामन्दिर इन्तजामिया कमेटी के रूप में गणमान्य जन इससे जुड़े हैं। पं.जोगेन्द्र दत्त शर्मा मन्दिर और रामनगर की कई यादों के साथ मन्दिर में बने हुए हैं।

दशौली गाँव भी जाते थे माइग्रेसन में

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्तवासियों की घुमन्तू जीवनचर्या में दशौली भी एक पड़ाव था। थल से आगे पुंगराउ घाटी में वृजवाल परिवार जाड़ों में आया करते थे और धरमघर में पंचपाल। उसी प्रकार पांखू के दशौली में गनघरिया परिवार भी आये, जिनकी काफी जमीन आज भी गाँव में है। इन जानकारियों के साथ अल्मोड़ा में जोहार सिंह गनघरिया से बातचीत प्रस्तुत है-
जोहार घाटी के गनघर में व्यापारी धनसिंह गनघरिया हुए। तिब्बत व्यापार सहित स्थानीय व्यापार में यह सक्रिय थे। कहते हैं इस रौबीले व्यापारी के घोड़े-बकरियां जब जाते थे तो अन्य रुक जाते थे। इनकी पत्नी मालती देवी बहुत दयालु प्रवृत्ति की थी और ग्रामीणों को सहयोग में आगे रहती। धनसिंह जी के पुत्र हुए केशर सिंह। फिर इनके तीन पुत्र हुए- त्रिलोक सिंह ;इनके पुत्र हैं- चन्दन और कन्हैया, जगत सिंह ;इनके पुत्र हैं धीरेन्द्र और जोहार सिंह सिंह ;इनके पुत्र हैं राहुल। गनघर से थाला ;बागेश्वर आकर भी गनघरिया परिवार बसे हैं। माइग्रेसन के उस दौर गनघर, तल्लाघोरपट्टा मुनस्यारी और थाला में यह परिवार रहते थे। जोहार सिंह जी बताते हैं कि दशौली में करीब ढाई सौ नाली भूमि उनके परिवार की है। इनके पिता पीएसी में थे, इनके बचपन में ही उनका निधन हो गया। ऐसे में दादी मालती देवी, माता गोपुली देवी, भाईयों के संरक्षण में इनका जीवन बीता। घोरपट्टा में रहकर बचपन की पढ़ाई के बाद पिथौरागढ़ कालेज से पढ़ाई की। बाक्सिंग व फुटबाल के बेहतरीन खिलाड़ी के अलावा यह छात्रासंघ के अध्यक्ष भी चुने गये। अल्मोड़ा आकर बीएड किया।
गनघरिया परिवार स्थित-परिस्थिति में अल्मोड़ा सहित कई जगह फैल चुका है परन्तु इनका मन आज भी अपने गनघर पर है। वाकेई अपने मूल ग्राम के विकास में योगदान के लिये जुड़ना अपनी संस्कृति से सच्चा प्यार है।

अल्मोड़ा शहर: जब लोग पान खाने के बहाने शिब्बन की दुकान में जाया करते थे

संस्मरण

नवीन चन्द्र उपाध्याय

बचपन की यादें बहुत मधुर होती हैं जो कोमल हृदय और अपरिपक्व मस्तिष्क में एक सुन्दर सपने की भांति जीवन भर मंडराती रहती हैं। मेरी बचपन व शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा शहर में हुई अतः यह स्वाभाविक है कि उस वक्त की सारी खट्टी-मीठी यादें अभी भी मन को गुदगुदाती रहती हैं। चूंकि यह शहर एक सांस्कृतिक व प्राचीन सम्भ्यता को अपने में संजोये हुए है, जहाँ पर हर मुहल्ले व गली में संगीत की धारा बहती है। खासतौर पर शुद्ध शास्त्रीय संगीत की झलक यहाँ की बैठकोंहोली में मिलती है। यहाँ कुमाउनी संस्कृति व रीति-रिवाज का सम्पुट अन्य धर्मावलम्बी वर्गों में भी मिलता है। होली, दिवाली, ईद व क्रिसमस साथ-साथ मनाई जाती है। जहाँ दीवाली की बात आती है बचपन में सभी बच्चे शहर की दीवाली देखने जाया करते थे वहाँ उनको खेल-खिलौने मिठाई खाने को मिलती थी। बिजली आने से पूर्व मोमबत्ती व दिये से शहर को रोशन किया जाता था। पचासवें दशक की बात है जब पहले पहल बिजली के बल्बों की रोशनी में दिवाली मनाई गई तो सारा शहर रोशनी से नहा रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शहर आसमान के तारों से जा मिला या तारे शहर में उतर आये हों। कुछ भी रहा हो, बच्चों के लिये यह एक आश्चर्यजनक नजारा था। कभी-कभी ऐसा दृश्य तब देखने को मिलता था जब बरसात या जाड़ों में कोहरा आने पर जमीन व आसमान एक ही नजर आते थे। इसीदृश्य को देखते हुए गीतकारों ने भी गीत लिखा था-
‘‘ये आसमां छू रहा है जमीं पर
ये मिलन हमने देखा यहीं पर………..।’’
विद्यार्थी जीवन के कई रोचक प्रसंग अभी भी याद आ रहे हैं। मैं रामजे हाईस्कूल में पढ़ता था, जहाँ पर प्रार्थना सभा में बाइविल की आयात का पाठ किया जाता था क्योंकि स्कूल ईसाई मिशनरी के प्रबन्ध् न में था। अतः अधिकांश शिक्षक क्रिश्चियन वर्ग के थे। एक दिन मेरे गाँव से एक परिचित मुझे विद्यालय में मिलने आये, वे गेट पर से मुझे बाइविल का पाठ करते देख रहे थे जब प्रार्थना सभा समाप्ति पर थी वे अचानक मेरे बगल में खड़े हो गये मुझे बाइविल न पढ़ने के लिये कहने लगे तथा स्कूल बदलने को कहा। इस पर चुप होकर मैं उनको सुनने लगा जब उनका भाषण खत्म हो गया मैं उन्हें विद्यालय के भीतर ले गया जहाँ हर कमरे की दीवार में बाईविल की आयतें लिखी थी वे इस प्रकार से थी-
‘‘ईश्वर सबका एक है। ईश्वर से प्रेम करो। भगवान का भय बुद्धि का प्रारम्भ है।…..।’’ वे सज्जन इनको
पढ़कर कहने लगे- यह तो हमारे धर्मग्रन्थ में भी लिख रहता है। तब मैंने उनसे कहा कि अधिकांश लोग अन्ध्कार में रह कर एक-दूसरे के धर्म की निन्दा करते देखे गये हैं। वे सज्जन सन्तुष्ट होकर वापस चले गये और मैं अपनी कक्षा में। उस समय मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ता था, मेरी हिन्दी की कक्षा थी, हमको हिन्दी पढ़ाने वाले अध्यापक श्री केशवदत्त पाण्डे जी थे जो साधरण सा लिवास पहने रहते थे तथा उच्च विचारों के एक योग्य अध्यापक थे। उनके पढ़ाने का तरीका ऐसा था कि कक्षा के बच्चे एकदम शान्तचित्त होकर उनको सुना करते थे, वे बीच-बीच में कुछ कहानियां व रोचक प्रसंग भी सुनाया करते थे। एक बार उन्होंने एक रोचक प्रसंग विद्यालय के बारे में सुनाया। प्रसंग इस प्रकार था कि विद्यालय में कुछ अंग्रेज अधिकारी पैनल मुआयने में आये थे उनमें से एक अधिकारी अंग्रेजी अध्यापक की कक्षा का निरीक्षण करने गया, साथ में काजेल के प्रधनाचार्य मि.रावत भी थे अध्यापक को सम्बोधित करते हुए अधिकारी ने कहा- ‘मि.आपका शाब्दिक उच्चारण ठीक नहीं है, ठीक से अंग्रेजी के शब्द बोलिये।’ रावत जी भी अध्यापक का उच्चारण सुन रहे थे। उन्हें लगा कि उच्चारण
सही हो रहा है। उन्होंने अधिकारी से कहा- महाशय! अध्यापक बिल्कुल सही बोल रहे हैं। इस पर अधिकारी नाराज हो गये। रावत जी ने अंग्रेज से कहा मि. क्या आप कुमाउनी भाषा के शब्दों को ठीक से बोल सकते हैंयदि हाँ तो मैं कुछ शब्द बोलता हँू आप उन्हें ठीक उसी प्रकार दुहरायेंगे
बोलें- मडुवाक रऽवाट’, अंग्रेज अधिकारी के मुख से निकला- ‘मडुवाक ल्वात’। इस पर सभी बच्चे हँसने लगे तब रावत जी ने उन्हें समझाया कि भौगोलिक परिस्थितियों व जलवायुके अनुसार ही हमारी जीभ व मँुह का संचालन होता है। ठण्डी जलवायु के लोग अपना मँुह गर्म जलवायु के व्यक्तियो की अपेक्षा कम खोलते हैं जिससे उनका उच्चारण प्रभावित होता है। इस पर अंग्रेज अफसर चुप होकर चला गया।
मध्यान्तर हुआ हम सभी विद्यार्थी बाहर निकले और इसी प्रसंग की चर्चा में हँसते रहे। बाजार में
कन्हैयालाल नन्दलाल के यहाँ दूध् पीने चले गये जो उस वक्त एकआने में एक गिलास मलाई डालकर मिलता था, वह दूध् आज भी याद आता है। अगली कक्षाओं के लिये कुछ समय अभी बचा था, हम सभी शिब्बन पान वाले की दुकान के सामने रेडियो सुनने चले गये। वहाँ पर अधिकांश लोग पान खाने के बहाने रेडियो समाचार व आजाद कश्मीर रेडियो के गाने सुना करते थे। छुट्टी के दिन या इतवार को हम लोग ब्राइटन कार्नर घूमने जाया करते थे और लौटते समय रीगल सिनेमा के सामने ठेला लगाये बाबा के यहाँ स्वादिष्ट गोलगप्पे का आनन्द लेते हुए बसंल होटल के गुलाब जामुन खाना नहीं भूलते थे।
इस प्रकार विद्यार्थी जीवन की छोटी-मोटी बातें आज भी दिलो-दिमांग में घूमती रहती हैं। एक बार नन्दादेवी के मेले में मुझे अपने फूफा जी केसाथ जाने का अवसर प्राप्त हुआ। फूफा जी मुझे अपने कन्ध्े में बिठा कर बावन सीड़ियां चढ़कर मन्दिर परिसर में ले गये, जहाँ बहुत भीड़ एकत्रित थी कारण था भैंस की बलि चढ़ाना लोग देख रहे थे। मैं फूफा जी के कन्ध्े में बैठा सबसे आगे वाली कतार में था। बलि का भैंसा लाया गया साथ में एक खड्ग हाथ में लिये खटिक भी था। राजा काशीपुर के हाथ में खड्ग पकड़ा कर खटिक ने एक ही बार में भैंस की गरदन से सिर अलग कर दिया, खून की धारा बहने लगी। हृदय विदारक दृश्य को देखकर मेर बाल मन विकल हो उठा और मैं बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा। साथ ही मेरे फूफा जी भी गिर पड़े। दोनों को चोटें आई। किसी प्रकार हम लोग घर पहँुच पाये। कई दिनों तक मेरे दिमाग में वह वीभत्स घटना तैरती रही जिससे मुझे रात नींद में चिल्लाने व उठ कर बैठ जाने की शिकायत हो गई। आज भी मैं सोचता हँू कि मनुष्य ने अपनी सुख सुविधा व मनोकामना के लिये या कहें मनोरंजन के लिये निरीह प्राणियों पर किस प्रकार से अत्याचार करते हैं जो एक जघन्य पाप की श्रेणी में आता है। अभी तक यहप्रथा चली आ रही है। कुछ हद तक सरकार ने इसको प्रतिबन्धित किया है। फिर भी लोग चोरी-छिपे ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं जो अनुचित है।

पिघलता हिमालय 1 दिसम्बर 2014 के अंक से