चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरखों को क्या जबाब देंगे: के.के.साह

बातचीज
चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरखों को क्या जबाब देंगे: के.के.साह

पि.हि.प्रतिनिधि
नैनीताल में भी होली का रंग जमकर बरसता रहा है। ठाटबाट के साथ होली की महफिलें सजती रही हैं। हालांकि संस्थागत आयोजन के बाद ठोल का एक सुर सुनाई देने वाली स्थिति वर्तमान में हो चुकी है। पिफर भी होली के दीवाने मौजूद हैं। होली की दिवानगी का ऐसा ही परिवार कुमया साह लोगों का है। किसी न किसी रूप में संगीत से जुड़े परिवार के सदस्य इस समृद्ध परम्परा को हमेशा जिन्दा देखना चाहते हैं। परिवार के वरिष्ठ सदस्य 85 वर्षीय कृष्ण कुमार साह कहते हैं- ‘‘चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरुखों को क्या जबाब देंगे।’
बात नैनीताल के इस परिवार की करें तो- गंगा साह प्रतिष्ठित व्यक्ति हुए हैं। उनके चार पुत्र- दुर्गालाल, श्यामलाल, प्रेम लाल, भवानीदास साल हुए। भवानीदास जी इंस्पेक्टर नाम से ही जाने जाते रहे हैं। प्रेम लाल जी के सुपुत्र सुदर्शनलाल साह उच्च प्रशासनिक पदों को सुशोभित करने के साथ ही नैनीताल का गौरव बढ़ाते रहे हैं। भवानीदास जी पुत्र हुए कृष्णकुमार और हरीश लाल। कृष्णकुमार जी को के.के. साह के नाम से नैनीताल में हर कोई जानता और पहचानता है।
के.के.साह बचपन से ही होली महफिलों के शौकीन रहे हैं। वह बताते हैं कि उनके पिता के मित्र तारादत्त पन्त तारालाॅज वालों के वहाँ होली की बैठकें हुआ करती थी। पौष के प्रथम रविवार से छरड़ी तक होल्यार इसमें जुटते थे। पन्त जी ने पिता से कहा कि एक दिन अपने घर में भी इस प्रकार बैठक करवाया करो, उसके बाद हमारे घर में भी प्रतिवर्ष बैठकें होने लगीं। अन्य सारे आयोजनों के क्रम में होली का जो संकल्प पिता जी ने लिया वह भव्य रूप से सम्पन्न होने लगा। इसका असर मेरे दीमाग में आज तक छाया हुआ है। पहले बहुत से लोग महफिलों में आया करते थे, बिना बुलाये भी अपनेपन से लोग आ जाया करते थे। रातभर की महफिलों का दौर चलता। अब तो नई पीढ़ी में वैसा उत्साह देखने को ही नहीं मिल रहा है। मैं तड़फ कर रह जाता हँू, कोई होली गीत सुना जाता। दो-चार लोग ही अपने आप से इस कार्य में जुटे हैं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि इस कार्य में जुटे लोग मिलकर इस परम्परा को सिलसिलेवार जगह-जगह करें।
नैनीताल के पुराने दिनों को याद करते हुए साह जी बताते हैं कि वह शारदा संघ जाया करते थे जहाँ प्यारे साह पुराने गायकों में थे। वह बहुत प्यारा धमार गाते थे। नित्यानन्द पन्त, हरीश जोशी, हीराबल्लभ जी, शिवलाल, भवानीदास, मोहनलाल, विहारी लाल, पूरन साह जी महफिल में होते। इसके बाद जवाहर लाल, अच्छन मास्साब, ताराप्रसाद, उफर्बादत्त पाण्डे जी हुए। उर्बादत्त जी बहुत किया, वह अपने आप से लोगों को महफिल का निमंत्रण देते और कई दिनों तक नियमित बैठकें होती। बर्फ के दिनों में भी होली की महफिल चलती रहती थी। इसके बाद दिनेशी जोशी कन्नू, रमेश जोशी, अनूप साह, देवी उस्ताद महफिलों में रहे।
अनगिनत महफिलों के गवाह के.के.साह के पास सैकड़ों रिकार्ड मौजूद हैं। होली की इस दीवानगी ने उन्हें संगीत के महारथियों से मिलाया। नैनीताल आये ओंकारनाथ ठाकुर ने इनके घर में सिंगलपुवे खाये हैं। वह बताते हैं- ‘के.मुंशी गर्वनर थे, उस दौर में ओंकारनाथ नाथ नैनीताल आये थे। मुझे जैसे ही पता चला मैं जगदीश उप्रेती उर्फ जग्गन उस्ताद के साथ ठाकुर साहब को मिलने चला गया और आटोग्राफ मांगे। उन्हें इण्डिया होटल में ठहराया गया था। उन्होंने घूमने की इच्छा जताई, उन्हें डांडी से बिड़ला ले गये। मि.संघ वहाँ प्रधनाचार्य थे, वह भी खुश हो गये। संगीत में पी.जी. कुमार थे, उन्होंने सारे बच्चों को एकत्रित कर दिया। इसके बाद ओंकारनाथ ठाकुर ने बन्देमातरम गाया। बाद में उन्हें हरिकीर्तन मण्डली ले जाया गया।’
के.के. साह जी में संगीत के ऐसी दीवानगी है कि उन्होंने नैनीताल आने वाले किसी उस्ताद को नहीं छोड़ा। मुस्ताक हुसैन जब मैडल लगाये हुए इनके घर आये तो उन्हें देखने भीड़ जमा हो गई। अहमदजान, ध््रुव तारा जोशी, विश्वनाथ जग्गनाथ जोशी भी आये। सन् 1951-52 में नैनीताल में प्रथम म्यूजिक कांप्रफंेस उन्होंने करवाई। के.के.साह जी ने वाद्ययन्त्रों की खोज में भी समय लगाया है। बाजे-तबले के लिये वह खूब दौड़े हैं क्योंकि महफिलों के शौकीन ही जानते हैं कि कितने जतन इसमें करने पड़ते हैं। सुरों की पहचान रखने वाले साह जी ने अपने लिये कलकत्ता से हारमोनियम मंगवाया। पहाड़ की होली को संरक्षण देने में आपका योगदान अनुकरणीय है।

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