होली हमारा लोकसंगीत है, इसकी ठसक-मसक बनी रहे: चन्द्रशेखर पाण्डे

बातचीज

पि.हि. प्रतिनिधि
पहाड़ की होली में अल्मोड़ा का उल्लेख पहले किया जाता है। नागर होली के लिये अल्मोड़ा की महफिलों को बहुत मानते हैं। होली बैठकों के रंग-ढंग अल्मोड़ा के अलावा अन्य स्थानों पर भी होते हैं लेकिन अल्मोड़ा सांस्कृतिक नगरी की मान्यता के साथ-साथ रसिक जनों की खासी सहभागिता इसे आगे बनाये हुए है। यहाँ कई नामी कलाकार हुए जिन्होंने बैठकी होली की महफिलें सजाई और इसके संरक्षण के लिये भी कई प्रतिष्ठित लोग हुए। होली गायकी के चले आ रहे ढांच पर गायन के अलावा बात-बहस भी अल्मोड़ा में होती रही है क्योंकि यह बुद्धिजीवियों का शहर जो है। होली को लोकसंगीत मानने और इसकी चाल को बनाये रखते हुए महफिल सजाने में माहिर 76 वर्षीय चन्द्रशेखर पाण्डे कहते हैं- ‘होली हमारा लोक संगीत है, इसकी ठसक-मसक बनी रहे।’
होली से पहले पाण्डे जी के परिवार की ही बात कर लेते हैं। पहले कभी पवेत, चम्पावत के रहने वाले पाण्डे परिवार झाकरसैम आये थे। इनकी मान्यता तांत्रिक के रूप में रही है। इन्हीं परिवारों में से रामदत्त पाण्डे का परिवार अल्मोड़ा में रहा। रामदत्त जी के असमय निधन से इनके पुत्र मनोरथ ने अल्मोड़ा के जोगालाल साह के वहाँ हलवाई का कार्य किया। बाद में मनोरथ पाण्डे जी ने अपना कारोबार किया और वह मिष्ठान के कार्य में खासी पहचान रखते थे। रामदत्त जी के दो पुत्र बच्चीराम और मनोरथ और एक पुत्री देवकी देवी हुई। मनोरथ पाण्डे जी के पुत्रों में चन्द्रशेखर पाण्डे, पूरन चन्द्र पाण्डे, गोपालदत्त, विनोद पाण्डे और कमल पाण्डे हैं। परिवार की शाखा काफी विस्तृत हो चुकी है लेकिन आज भी मनोरथ पाण्डे की पहचान से इन्हें हर कोई पचहान लेता है। परिवार के सदस्यों में अपनी कला संस्कृति के प्रति बेहद लगाव है। इसी परिवार के वरिष्ठ सदस्य चन्द्रशेखर वस्त्र व्यापारी होने के साथ सामाजिक गतिविधियों में रमे हुए हैं और होली के लिये इनकी दीवानगी देखने लायक है। वर्षभर होली सुनने वालों में से यह भी एक कलाकार हैं।
श्री पाण्डे जी अपने अतीत को याद करते हुए कहते हैं- ‘मुझे याद नहीं है होली से कब जुड़ गया। पिता जी सन्त प्रवृत्ति के और संगीत के शौकीन थे। घर मेें साधू-सन्तों का आना होता, इसी से मेरा रुझान भी इस ओर हुआ। 9-10 साल से मैंने अल्मोड़ा की होली बैठकों और रामलीला में जाना आरम्भ कर दिया था।’ वह कहते हैं- ‘होली सीखने से नहीं श्रवण से आती है। बार-बार महफिलों में सुनने का परिणाम ही है कि वह कुछ गा पाते हैं। शिवलाल वर्मा उर्फ अच्छन, चन्द्र सिंह नयाल, भवान सिंह नयाल, प्रेम लाल साह इसके बाद जवाहर लाल साह, ताराप्रसाद पाण्डेय ने मुझे प्रभावित किया। उन महफिलों की यादें मेरे मस्तिष्क में भली भांति अंकित हैं।’
लोक कलाकार संघ के सदस्य के रूप में भी चन्द्रशेखर पाण्डे सक्रिय रहे हैं और आज भी अपने पुराने साथियों का स्मरण करते हैं। वह बताते हैं कि लोक कलाकार संघ की गतिविधियों में उन्हें कई विधाएं सीखने का अवसर मिला। आज भी प्रतिदिन होली की बन्दिशें नियमित रूप से सुनने वाले चन्द्रशेखर पाण्डे का मानना है कि संगीत प्रकृति प्रदत्त होता है। पहाड़ की होली परम्परागत रूप से उपजी है, समय के साथ इसमें प्रयोग अच्छी बात है लेकिन इन प्रयोगों में इसकी सरलता-सुगमता का ध्यान रखना चाहिये। यह एकल गायकी नहीं बल्कि सामूहिक गायकी है। हमारे विद्वानों ने होली की ऐसी अद्भुद रचनाएं रचीं हो जो तय राग के अनुसार आज तक सटीक हैं। उन सुन्दर रचनाओं को वर्षों से गाया जा रहा है। इस बीच कुछ नये बोलों को लेकर गाने की करामात हुई लेकिन नई कविताएं बनाकर जबरन गाने से होली गीत नहीं हो सकता है। ऐसे गीत जुगुनू की तरह होते हैं और चलन से बाहर हो जाते हैं। नये होली रचनाकारों में चारुचन्द्र जी की मान्यता है क्योंकि उन्होंने जो भी गीत रचे वह हमारे होली थाट के लिये सटीक हैं। चारु चन्द्र जी संगीत के भी जानकार थे इसलिये उन्होंने बेहतरीन रचनाएं रचीं। पहाड़ की होली गायन का एक खांचा बना हुआ है उसमें गाने का अपना आनन्द है।
बातचीज के दौरान पाण्डे जी कुछ रचनाओें को गुनगुनाते हैं और पुराने गवैयों को याद कर भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं- ‘संगीत सरस्वती का वरदान है। ये प्रकृति प्रदत्त है। ये जहाँ भी है, सुख-शान्ति का और ईश्वर से मिलाने वाला है।’

चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरखों को क्या जबाब देंगे: के.के.साह

बातचीज
चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरखों को क्या जबाब देंगे: के.के.साह

पि.हि.प्रतिनिधि
नैनीताल में भी होली का रंग जमकर बरसता रहा है। ठाटबाट के साथ होली की महफिलें सजती रही हैं। हालांकि संस्थागत आयोजन के बाद ठोल का एक सुर सुनाई देने वाली स्थिति वर्तमान में हो चुकी है। पिफर भी होली के दीवाने मौजूद हैं। होली की दिवानगी का ऐसा ही परिवार कुमया साह लोगों का है। किसी न किसी रूप में संगीत से जुड़े परिवार के सदस्य इस समृद्ध परम्परा को हमेशा जिन्दा देखना चाहते हैं। परिवार के वरिष्ठ सदस्य 85 वर्षीय कृष्ण कुमार साह कहते हैं- ‘‘चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरुखों को क्या जबाब देंगे।’
बात नैनीताल के इस परिवार की करें तो- गंगा साह प्रतिष्ठित व्यक्ति हुए हैं। उनके चार पुत्र- दुर्गालाल, श्यामलाल, प्रेम लाल, भवानीदास साल हुए। भवानीदास जी इंस्पेक्टर नाम से ही जाने जाते रहे हैं। प्रेम लाल जी के सुपुत्र सुदर्शनलाल साह उच्च प्रशासनिक पदों को सुशोभित करने के साथ ही नैनीताल का गौरव बढ़ाते रहे हैं। भवानीदास जी पुत्र हुए कृष्णकुमार और हरीश लाल। कृष्णकुमार जी को के.के. साह के नाम से नैनीताल में हर कोई जानता और पहचानता है।
के.के.साह बचपन से ही होली महफिलों के शौकीन रहे हैं। वह बताते हैं कि उनके पिता के मित्र तारादत्त पन्त तारालाॅज वालों के वहाँ होली की बैठकें हुआ करती थी। पौष के प्रथम रविवार से छरड़ी तक होल्यार इसमें जुटते थे। पन्त जी ने पिता से कहा कि एक दिन अपने घर में भी इस प्रकार बैठक करवाया करो, उसके बाद हमारे घर में भी प्रतिवर्ष बैठकें होने लगीं। अन्य सारे आयोजनों के क्रम में होली का जो संकल्प पिता जी ने लिया वह भव्य रूप से सम्पन्न होने लगा। इसका असर मेरे दीमाग में आज तक छाया हुआ है। पहले बहुत से लोग महफिलों में आया करते थे, बिना बुलाये भी अपनेपन से लोग आ जाया करते थे। रातभर की महफिलों का दौर चलता। अब तो नई पीढ़ी में वैसा उत्साह देखने को ही नहीं मिल रहा है। मैं तड़फ कर रह जाता हँू, कोई होली गीत सुना जाता। दो-चार लोग ही अपने आप से इस कार्य में जुटे हैं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि इस कार्य में जुटे लोग मिलकर इस परम्परा को सिलसिलेवार जगह-जगह करें।
नैनीताल के पुराने दिनों को याद करते हुए साह जी बताते हैं कि वह शारदा संघ जाया करते थे जहाँ प्यारे साह पुराने गायकों में थे। वह बहुत प्यारा धमार गाते थे। नित्यानन्द पन्त, हरीश जोशी, हीराबल्लभ जी, शिवलाल, भवानीदास, मोहनलाल, विहारी लाल, पूरन साह जी महफिल में होते। इसके बाद जवाहर लाल, अच्छन मास्साब, ताराप्रसाद, उफर्बादत्त पाण्डे जी हुए। उर्बादत्त जी बहुत किया, वह अपने आप से लोगों को महफिल का निमंत्रण देते और कई दिनों तक नियमित बैठकें होती। बर्फ के दिनों में भी होली की महफिल चलती रहती थी। इसके बाद दिनेशी जोशी कन्नू, रमेश जोशी, अनूप साह, देवी उस्ताद महफिलों में रहे।
अनगिनत महफिलों के गवाह के.के.साह के पास सैकड़ों रिकार्ड मौजूद हैं। होली की इस दीवानगी ने उन्हें संगीत के महारथियों से मिलाया। नैनीताल आये ओंकारनाथ ठाकुर ने इनके घर में सिंगलपुवे खाये हैं। वह बताते हैं- ‘के.मुंशी गर्वनर थे, उस दौर में ओंकारनाथ नाथ नैनीताल आये थे। मुझे जैसे ही पता चला मैं जगदीश उप्रेती उर्फ जग्गन उस्ताद के साथ ठाकुर साहब को मिलने चला गया और आटोग्राफ मांगे। उन्हें इण्डिया होटल में ठहराया गया था। उन्होंने घूमने की इच्छा जताई, उन्हें डांडी से बिड़ला ले गये। मि.संघ वहाँ प्रधनाचार्य थे, वह भी खुश हो गये। संगीत में पी.जी. कुमार थे, उन्होंने सारे बच्चों को एकत्रित कर दिया। इसके बाद ओंकारनाथ ठाकुर ने बन्देमातरम गाया। बाद में उन्हें हरिकीर्तन मण्डली ले जाया गया।’
के.के. साह जी में संगीत के ऐसी दीवानगी है कि उन्होंने नैनीताल आने वाले किसी उस्ताद को नहीं छोड़ा। मुस्ताक हुसैन जब मैडल लगाये हुए इनके घर आये तो उन्हें देखने भीड़ जमा हो गई। अहमदजान, ध््रुव तारा जोशी, विश्वनाथ जग्गनाथ जोशी भी आये। सन् 1951-52 में नैनीताल में प्रथम म्यूजिक कांप्रफंेस उन्होंने करवाई। के.के.साह जी ने वाद्ययन्त्रों की खोज में भी समय लगाया है। बाजे-तबले के लिये वह खूब दौड़े हैं क्योंकि महफिलों के शौकीन ही जानते हैं कि कितने जतन इसमें करने पड़ते हैं। सुरों की पहचान रखने वाले साह जी ने अपने लिये कलकत्ता से हारमोनियम मंगवाया। पहाड़ की होली को संरक्षण देने में आपका योगदान अनुकरणीय है।