संस्मरण यात्रा कानपुर से नैनीताल

नवीन चन्द्र उपाध्याय

अप्रैल के मध्य में ही इस बार पारा चालीस को पार कर गया था। मैं साइकिल से बारह बजे वाली ड्यूटी के लिये घर से निकला। लू के प्रकार की गर्म हवा के थपेड़ों को चीरते हुए मेरी साइकिल के टायर दम फुलाये पिघलते डामर की सड़क को तय कर रही थी।
कानपुर के मिलों की चिमनियों का धुंवा आग उगल रहा था। गन्दी संकरी गलियों में सड़ांघ के मारे दम निकला जा रहा था। नालियों में कुछ सुअर गर्मी के से बचाव करने के लिये पसरे पड़े थे। कुछ ठेला लगाने वाले मजदूर इन गलियों में ठेलों के उपर थकान मिटा रहे थे। हलवाइयों व चाय की दुकानों में मक्खियां इस कदर मडरा रही थी कि मानो दुकान पर मिठाई न होकर मक्खियां ही बिक रही हों। मैं कुछ गलियां पार कर आगे बढ़ा ही था कि सामने एक लम्बी सी कतार भैंसा गाड़ियों की लगी थी जो चर्र मर्र की की आवाज करते कच्चा चमड़ा टेनरी को ढो रहे थे। कच्चे चमड़े की की बदबू उमस भरी गर्मी में बुरा हाल करने वाली होती है।
किसी प्रकार इस मुसीबत से पाला झाड़ आगे को बढ़ा फूलबाग चैराहा पार किया। नाम तो फूलबाग है पर फूल के नाम पर कोई पौंध तक इसमें नज़र नहीं आया। फूलबाग नाम से थोड़ा मन हलका कर कार्यालय पहँुचा, जहाँ की बिजली गुल थी। टेलीप्रिंटर मशीनों को चलाने के लिये जनरेटर चला था जिसका ध्ुंआ गरमी में और इजाफा कर रहा था।
पसीने से तरवतर होकर रूमाल से हवा फटकते हुए मैं किसी प्रकार अपनी सीट पर बैठा ही था कि कार्यालय का चपरासी दौड़ा हुआ आया। उसके हाथ में कोई कागज था, वह ठीक मेरे मेज के सामने खड़ा हो गया। मानो मुझे मुजरिम समझ कर पुलिस वाला कोई कोर्ट का समन दे रहा हो। मैं उसे देखकर थोड़ी देर के लिय घबराया। अपने आपको संयत कर थोड़ी दबी जुवान से से पूछा- क्या लाये हो? कोई गलती तो नहीं हुई? चपरासी ने मुस्करा कर जवाब दिया- बाबूजी स्थानान्तरण आदेश लाया हँू। साहब बता रहे थे कि आप बड़े भाग्यशाली हैं। गर्मी के दिनों में नैनीताल की ठण्डी हवा खाने जा रहे हो ‘आपका स्थानान्तरण हो गया है।’ चपरासी की बात सुनते ही मैंने झपट्टा मार कागज छीन लिया और मन से सारी थकान व गर्मी को अलविदा कर आगे की कार्यवाही में जुट गया।
नैनीताल के बारे में सुना ही भर था पर गया कभी नहीं था। मेरे दादाजी नैनीताल के डाकखाने में मुलाजिम थे उस जमाने में जब प्रसि( शिकारी जिम कार्बेट के पिताजी वहाँ पोस्ट मास्टर हुआ करते थे। दादाजी बताते थे कि नैनीताल में इतनी सर्दी पड़ती है कि यदि कोई आदमी सुबह नहा कर अपने कपड़े सुखाने को बाहर डाले तो वह वर्फ के समान जम कर छड़ी जैसे बन जाते थे।
इन्हीं कल्पनाओं के साथ मैं नैनीताल रवाना हुआ। यात्रा के दूसरे दिन नैनीताल बस स्टैण्ड तल्लीताल ;डांठ पर खड़ा था। चारों ओर दृष्टि डालते हुए मैं अचम्भित सा रह गया था। एकाएक ऐसी जगह पहँुच गया था या तो वह देवताओं का निवास है या कोई सपना है किसी स्वर्गलोक का! मेरी तंद्रा एक कुली ने यह कहकर तोड़ी- बाबूजी सामान ले जाना है क्या? मेरे पास थोड़ा बहुत सामान था जो कुली को पकड़ा दिया। कानपुर की उमस गर्मी को छोड़कर जब मैं नैनीताल की काली डामर की मालरोड पर चल रहा था ऐसा अनुभव हो रहा था कि मैं किसी वातानुकूलित हाॅल में कसीदा वाली मखमली कार्पेट में पैर रख रहा हँू। मुझे सड़क पर चलने में कुछ हिचकिचाहट सी हो रही थी कि कहीं मेरे पैरों के जूतों की गन्दगी सड़क को गन्दा न कर दे।
सुन्दर हरा रंग लिये हुए शान्त तालाब में सपफेद बतख झुण्ड बनाकर खेल रहीं थी, मानो मानसरोवर के हंस हों। चारों ओर पहाड़ियों में घने बांज, देवदार व पोपलर के पेड़ों की पंक्तियां शोभायमान थी जिनसे प्रतिविम्बित होकर तालाब का रंग गहरे हरे रंग में बदल गया था। जो बहुत ही मनोहारी दृश्य था।
सामने की पहाड़ियों मं सफेद बादल छिटक रहे थे। इन पहाड़ियों में छोटे-छोटे बंगलेनुमा भवन बने थे जिनकी छतें हरे व लाल रंग की चादरों से बनी थी और दीवारों का रंग सपफेद था। ऐसा मालूम हो रहा था कि ये भवन आकाश के सितारे हों। मालरोड अतिशान्त वातावरण व घने वृक्षों की शीतल छाया में यदाकदा हाथ रिक्सों की आवाजाही के अतिरिक्त कुछ पैदल यात्राी भी तल्लीताल व मल्ली ताल को सपफर करते दिख रहे थे। गज़ब की शान्ति व स्वच्छता का वातावरण था। स्थानीय वोट हाउस क्लब में किसी पिक्चर की सूटिंग चल रही थी, जिसे देखने को थोड़ी बहुत स्थानीय जनता खड़ी थी। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बड़े शहरों में इस प्रकार के आयोजन कराने में पुलिस बल की सहायता लेनी पड़ती है क्योंकि अपार भीड़ को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है लेकिन यहाँ पर पुलिस की कोई आवश्यकता नज़र नहीं आ रही थी। स्कूल कालेजों में बच्चों की उपस्थिति का आभास नहीं मालूम पड़ रहा था। जबकि इस छोटे शहर में जनसंख्या के अनुपात से कहीं अध्कि विद्यालय हैं, जहाँ पर दूसरे शहरों के विद्यार्थी अध्कि मात्रा में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। शहर का अध्किांश भाग जंगल से घिरा था, निचले इलाकों में थोड़ी बहुत दुकानें तथा एक खेल का मैदान था। मैदान के एक छोर पर देवी ;नैनादेवी का मन्दिर व दूसरे किनारे पर गुरुद्वारा साहिब व मस्जिद था, जिनमें सभी वर्गों के लोग आते जाते दिखाई दे रहे थे। आज के समय में जब राम मन्दिर व बावरी मस्जिद का विवाद उग्र रूप धारण करता जा रहा है। यहाँ नैनीताल में लोगों को ईद, दिवाली, होली, रामलीला साथ-साथ मनाते देखा गया। यहाँ तक कि मस्जिद व मन्दिर साथ-साथ हैं, जिनका आपस में किसी प्रकार से टकराव नहीं। दुर्गा पूजा के अवसर पर सारे धर्म के लोग एकसाथ पूजा में शामिल होते देखे गये। रामलीला में भी दूसरे वर्ग के लोग बढ़चढ़ कर भाग लेते देखे गये।
एक बार पुनः बीस साल के अन्तराल में उस हरी-भरी शान्त प्रकृति के गोद में पदार्पण करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मन में कई प्रकार की कल्पनाएं संजोये मैं उस देवभूमि के बारे में सोचने लगा जिसकी छाया में सुन्दर-झुरमुटों के बीच बैठ कर नामी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं को मूर्त रूप दिया तथा प्रकृति के चितेरे चित्राकारों ने अपनी कल्पनाओं को कागज में उतारा है। इन्हीं विचारों में खोया हुआ अचानक मैं तल्लीताल के बस स्टाप ;डांठ पर पुनः खड़ा था। जन सैलाब का भारी रेला, साइकिल, रिक्सा, टैक्सी, स्कूटर व वाहनों का जमघट देख तथा नेपाली कुलियों को वाहनों के उपर आक्रामक कोशिशें होटल एजेन्टों द्वारा यात्रियों से जबरन धक्का मुक्की आदि देख मैं घबरा गया और एक पल के लिये ऐसा लगा कि मैं पुनः कानपुर आ पहँुचा हँू। शहर की ओर दृष्टि डालने से पता चला कि पहाड़ियों व लेक के इर्द-गिर्द छोटे-छोटे घरौंदे व कहीं-कहीं पर विशाल इमारतों से पहाड़ी ढक चुकी है। उँची पहाड़ियों पर नालों के उपर भी छोटे-छोटे घर दिखाई दे रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि किसी गन्दी जगह पर चील कौवे बैठे हों। मालरोड की चैड़ाई अतिक्रमण होने से संकरी लग रही थी। लेक में पानी का रंग भी हरा न होकर मटमेला लग रहा था। पहाड़ियों हरे जंगल के बदले लिंटर वाले भवन बन चुके थे। कहीं-कहीं पर भूस्खलन के कारण मलवा पटा पड़ा था। सीवर लाइन ओवर फ्रलो कर रही थी।

चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरखों को क्या जबाब देंगे: के.के.साह

बातचीज
चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरखों को क्या जबाब देंगे: के.के.साह

पि.हि.प्रतिनिधि
नैनीताल में भी होली का रंग जमकर बरसता रहा है। ठाटबाट के साथ होली की महफिलें सजती रही हैं। हालांकि संस्थागत आयोजन के बाद ठोल का एक सुर सुनाई देने वाली स्थिति वर्तमान में हो चुकी है। पिफर भी होली के दीवाने मौजूद हैं। होली की दिवानगी का ऐसा ही परिवार कुमया साह लोगों का है। किसी न किसी रूप में संगीत से जुड़े परिवार के सदस्य इस समृद्ध परम्परा को हमेशा जिन्दा देखना चाहते हैं। परिवार के वरिष्ठ सदस्य 85 वर्षीय कृष्ण कुमार साह कहते हैं- ‘‘चलती रहें ये बैठकें, रुके तो अपने पुरुखों को क्या जबाब देंगे।’
बात नैनीताल के इस परिवार की करें तो- गंगा साह प्रतिष्ठित व्यक्ति हुए हैं। उनके चार पुत्र- दुर्गालाल, श्यामलाल, प्रेम लाल, भवानीदास साल हुए। भवानीदास जी इंस्पेक्टर नाम से ही जाने जाते रहे हैं। प्रेम लाल जी के सुपुत्र सुदर्शनलाल साह उच्च प्रशासनिक पदों को सुशोभित करने के साथ ही नैनीताल का गौरव बढ़ाते रहे हैं। भवानीदास जी पुत्र हुए कृष्णकुमार और हरीश लाल। कृष्णकुमार जी को के.के. साह के नाम से नैनीताल में हर कोई जानता और पहचानता है।
के.के.साह बचपन से ही होली महफिलों के शौकीन रहे हैं। वह बताते हैं कि उनके पिता के मित्र तारादत्त पन्त तारालाॅज वालों के वहाँ होली की बैठकें हुआ करती थी। पौष के प्रथम रविवार से छरड़ी तक होल्यार इसमें जुटते थे। पन्त जी ने पिता से कहा कि एक दिन अपने घर में भी इस प्रकार बैठक करवाया करो, उसके बाद हमारे घर में भी प्रतिवर्ष बैठकें होने लगीं। अन्य सारे आयोजनों के क्रम में होली का जो संकल्प पिता जी ने लिया वह भव्य रूप से सम्पन्न होने लगा। इसका असर मेरे दीमाग में आज तक छाया हुआ है। पहले बहुत से लोग महफिलों में आया करते थे, बिना बुलाये भी अपनेपन से लोग आ जाया करते थे। रातभर की महफिलों का दौर चलता। अब तो नई पीढ़ी में वैसा उत्साह देखने को ही नहीं मिल रहा है। मैं तड़फ कर रह जाता हँू, कोई होली गीत सुना जाता। दो-चार लोग ही अपने आप से इस कार्य में जुटे हैं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि इस कार्य में जुटे लोग मिलकर इस परम्परा को सिलसिलेवार जगह-जगह करें।
नैनीताल के पुराने दिनों को याद करते हुए साह जी बताते हैं कि वह शारदा संघ जाया करते थे जहाँ प्यारे साह पुराने गायकों में थे। वह बहुत प्यारा धमार गाते थे। नित्यानन्द पन्त, हरीश जोशी, हीराबल्लभ जी, शिवलाल, भवानीदास, मोहनलाल, विहारी लाल, पूरन साह जी महफिल में होते। इसके बाद जवाहर लाल, अच्छन मास्साब, ताराप्रसाद, उफर्बादत्त पाण्डे जी हुए। उर्बादत्त जी बहुत किया, वह अपने आप से लोगों को महफिल का निमंत्रण देते और कई दिनों तक नियमित बैठकें होती। बर्फ के दिनों में भी होली की महफिल चलती रहती थी। इसके बाद दिनेशी जोशी कन्नू, रमेश जोशी, अनूप साह, देवी उस्ताद महफिलों में रहे।
अनगिनत महफिलों के गवाह के.के.साह के पास सैकड़ों रिकार्ड मौजूद हैं। होली की इस दीवानगी ने उन्हें संगीत के महारथियों से मिलाया। नैनीताल आये ओंकारनाथ ठाकुर ने इनके घर में सिंगलपुवे खाये हैं। वह बताते हैं- ‘के.मुंशी गर्वनर थे, उस दौर में ओंकारनाथ नाथ नैनीताल आये थे। मुझे जैसे ही पता चला मैं जगदीश उप्रेती उर्फ जग्गन उस्ताद के साथ ठाकुर साहब को मिलने चला गया और आटोग्राफ मांगे। उन्हें इण्डिया होटल में ठहराया गया था। उन्होंने घूमने की इच्छा जताई, उन्हें डांडी से बिड़ला ले गये। मि.संघ वहाँ प्रधनाचार्य थे, वह भी खुश हो गये। संगीत में पी.जी. कुमार थे, उन्होंने सारे बच्चों को एकत्रित कर दिया। इसके बाद ओंकारनाथ ठाकुर ने बन्देमातरम गाया। बाद में उन्हें हरिकीर्तन मण्डली ले जाया गया।’
के.के. साह जी में संगीत के ऐसी दीवानगी है कि उन्होंने नैनीताल आने वाले किसी उस्ताद को नहीं छोड़ा। मुस्ताक हुसैन जब मैडल लगाये हुए इनके घर आये तो उन्हें देखने भीड़ जमा हो गई। अहमदजान, ध््रुव तारा जोशी, विश्वनाथ जग्गनाथ जोशी भी आये। सन् 1951-52 में नैनीताल में प्रथम म्यूजिक कांप्रफंेस उन्होंने करवाई। के.के.साह जी ने वाद्ययन्त्रों की खोज में भी समय लगाया है। बाजे-तबले के लिये वह खूब दौड़े हैं क्योंकि महफिलों के शौकीन ही जानते हैं कि कितने जतन इसमें करने पड़ते हैं। सुरों की पहचान रखने वाले साह जी ने अपने लिये कलकत्ता से हारमोनियम मंगवाया। पहाड़ की होली को संरक्षण देने में आपका योगदान अनुकरणीय है।

नमक लेकर बदरीनाथ तक जाते थे

बातचीज

पि.हि.प्रतिनिधि
नैनीताल जिले का रामनगर शहर कुमाउँ और गढ़वाल की पुरानी मण्डी है। कुमाउँ कमिश्नर रेमजे ने इस नगरी को 1878 से 82 के बीच बसाया था। मुहान नामक स्थान पर बाघ के हमले से 24 तीर्थयात्रियों की मौत से दुःखी रेमजे ने नामनगर बसाने की सोची। दरअसल यहाँ के प्राचीन रामामन्दिर में चारधाम यात्रियों के ठहहने का पड़ाव था। यहाँ होते हुए यात्री बदरीनाथ को जाते थे।
इसी रामनगर के पुराने व्यापारियों में सुरेश चन्द्र जी का परिवार है। इनके दादा शम्भू दयाल फिर पिता ओमप्रकाश ने जिस फर्म को चलाया वह 1910 में ‘मानकचन्द शम्भूदयाल’ नाम से शुरु हुई। फर्म को नये स्वरूप में अब सुरेशचन्द्र जी के साथ उनके सुपुत्र अनुज और उनके पौते मानस संभाले हुए हैं। सुरेश चन्द्र जी लखनउ से बीएससी करने के बाद अपने कारोबार में जुड़े। इसी प्रकार इनके पुत्रा अनुज कुमाउँ विवि से एकाॅम में टाॅपर हैं। मूल रूप से काशीपुर में व्यवसाय करने वाले इस परिवार ने जब रामनगर में अपना कारोबार शुरु किया था तब गढ़वाल के दूरस्थ क्षेत्रा तक गल्ला सप्लाई में इनकी फर्म अग्रणीय रही। श्री सुरेश चन्द्र जी बताते हैं कि उनके देखादेखी बकरियों में राशन लदकर जाता था। लाला ओमप्रकाश जी घोड़े में सवार होकर वसूली के लिये जाते थे। बदरीनाथ तक राशन सप्लाई के लिये उनके पास लाइसेंस था। नमक, चीनी, गल्ला का जिन व्यापारियों को मिलता था उन्हें ‘नोमनी’ कहते थे। राजस्थान के साम्भरलेक से रेलवे मालगाड़ी द्वारा नमक आता था और द्वाराहाट, मासी इत्यादि इलाकों में इसका वितरण किया करते थे। सुरेश चन्द जी बताते हैं कि सन् 1970 में आई बाढ़ के कारण पीपलकोटी का पुल बह गया था, जिस कारण 17 दिन तक मुश्किलों से होते हुए वह रामनगर पहँुचे थे। समय के साथ व्यापार के तरीके बदल चुके हैं लेकिन पुराने परिवारों के संस्कार उनकी पीढ़ियों को एकसूत्र में बांधने के साथ संस्कारों से भी जोड़ते हैं। इनका परिवार भी सामाजिक कार्यों में जुड़ा हुआ है। श्री सुरेश जी अग्रवाल सभा की गतिविधियों से जुड़े हैं। यहाँ के पुराने रामामन्दिर में इनके परिवार का योगदान रहा है। पहले से यहाँ आने वाले साधू-सन्यासियों को इनके नाना लाला श्यामलाल द्वारा संरक्षण दिया जाता रहा है। उनके भोजन की व्यवस्था राजाराम हलवाई के वहाँ करवाई जाती थी। सुरेश जी बताते हैं कि नाना जी चारधाम यात्रा के लिये पैदल आने वाले सन्यासियों को ठहरने के लिये रामा मन्दिर में स्थान मिल जाता था और भोजन-प्रसाद के लिये नाना जी पर्ची लिखकर राजाराम हलवाई से व्यवस्था करवा देते थे। यह पुराना मन्दिर आज भी व्यवस्था के तहत संचालित है। रामामन्दिर इन्तजामिया कमेटी के रूप में गणमान्य जन इससे जुड़े हैं। पं.जोगेन्द्र दत्त शर्मा मन्दिर और रामनगर की कई यादों के साथ मन्दिर में बने हुए हैं।

बीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट का है इतिहास

इन्द्र सिंह नेगी
नैनीताल। नैनीताल का बीरभट्टी क्षेत्र अतीत से ही अपने इतिहास में कई पन्ने जोड़े हुए है किन्तु त्रासदी तो यह है कि बलियानाले के ट्रीटेमेंट के नाम पर आज तक कोई ठोस कार्य नहीं हो पाया है। जिस कारण गन्दगी फैलने के साथ-साथ रानीबाग से सीधे इस इलाके को जोड़ने वाला मार्ग भी लुप्त हो चुका है और मुख्य हाइवे पर बना पुल भी मजबूत बनने के लिये मजबूर सा बना हुआ है। बलियानाले के ट्रीटमेंट के नाम पर हो रहे कार्यों को आज तक शासन-प्रशासन ने गम्भीरता से लिया होता तो इलाके में खतरा नहीं मंडराता और प्राचीन यात्रा पथ भी यहाँ के इतिहास की परख के लिये सुलभ होता।
जरा इतिहास की ओर नज़र दौड़ायें तो पता चलता है कि इस क्षेत्रा को ब्र्रेवरी कहा जाता था। अंग्रेजों के शासन काल में यहाँ वियन बनाने की भट्टी थी। 1987 में मनोरापीक के भूस्खलन का मलवा वीरभट्टी में आया, जिसमें 27 अंग्रेजों की मौत हो गई थी। अस्तबल, होटल, डाकखाना, पशु भी मलवे में दफन हो गये। तब वीयरभट्टी को भवाली खोल दिया गया। बाद में सिलीगुड़ी;आसाम में उसे शिफ्रट कर दिया गया था। यह इलाका नीमकरौली महाराज की कर्मस्थली भी रही है। पं. नेहरु सहित कई दिग्गज यहाँ आये हैं। पं.गोविन्द बल्लभ पन्त जी तो इसे घर ही मानते थे। ऐसे स्थान को मालदार परिवार ने अपनी कर्मस्थली बनाया। ठाकुर देव सिंह बिष्ट के पुत्र- दानसिंह-मोहनसिंह भाईयों ने जिस तल्लीनता के साथ वीरभट्टी क्षेत्रा में कार्य किये उनकी यादें आज भी हैं। दानसिंह जी की 6 पुत्रियां हुई और मोहन सिंह जी के तीन पुत्र 10 पुत्रियां। इनके ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज सिंह थे। इस बड़े कुनबे के परिजन यत्र-यत्र के साथ वीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट में भी रहते हैं। मोहन सिंह जी बहु रमा बिष्ट, पृथ्वीराज जी की पुत्री दीप्ति बिष्ट अपने बुजुर्गों की यादों को संजोये हुए हैं।
बिष्ट स्टेट वह क्षेत्र हैं जहाँ से उन्नति कर कई लोगों ने अपने भविष्य को संवारा है। इस प्रकार की धरोहरों को संवारने के लिये व्यक्तिगत प्रयासों के साथ सामूहिक कृत्य भी होने चाहिये। 1897 से लेकर 1922 तक यहाँ रामलीला मंचन भी हुआ है। इतिहास के गवाह इस इलाके के विकास की बात छोड़ शासन-प्रशासन अपने में ही उलझा है। यह क्षेत्रा बलियानाले का मुहाना है और रानीबाग तक दस हजार परिवार इससे प्रभावित हो रहे हैं। क्षेत्रवासी चाते हैं कि वृटिश कालीन पुराने मार्ग के सौन्दर्यीकरण सहित बलियानाले का ट्रीटमेंट कार्य ठोस हो।

पिघलता हिमलाय 22 फरवरी 2016 के अंक से

नारायण दत्त तिवारी: वह हलचल भरी जिंदगी से घिरे रहे

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
राजनीति के क्षेत्र में दिग्गज रहे  वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी का 18 सितम्बर 2018 को दिल्ली के मैक्स अस्पताल में निधन हो गया। 1935 में इसी तारीख को जन्मे तिवारी जी पहले ऐसे नेता थे जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री बने। तिवारी 1976-77, 1984-85, 1988-89 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। 2002- 2007 तक वे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री एवं 2007 से 2009 तक आन्ध््र प्रदेश के राज्यपाल रहे।

हलचल भरी जिन्दगी से घिरे रहने वाले तिवारी जी का जन्म नैनीताल जिले के बल्युटी ग्राम में 18 अक्टूबर 1925 को हुआ था। इनके पिता पूर्णानन्द तिवारी का विवाह हरिदत्त जोशी की पुत्री के साथ हुआ था। श्रीमती जी के आकस्मिक निधन व अन्य कष्टों से घिरे पूर्णानन्द जी ने संभलते हुए दूसरा विवाह 24 वर्ष की आयु में मातीराम बल्युटिया की पुत्री चन्द्रावती के साथ किया। पिता पूर्णानन्द जी और माता चन्द्रावती के घर 18 अक्टूबर 1925 को नारायण ने जन्म लिया। इनके छोटे भाई प्रोफेसर रमेश तिवारी हैं। नारायण/नरैण की आरम्भिक शिक्षा नैनीताल के आसपास ही हुई। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. और एल.एल.बी. करने वाले एन.डी. 1947 में इलाबाद विवि छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये। 1947 से 1949 तक वह आॅल इण्डिया स्टूडेंट कांग्रेस के सचिव रहे। 1952 में प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर नैनीताल से चुनकर यूपी की विधानसभा में सबसे कम उम्र 27 वर्ष के विधायक बनने का सौभाग्य तिवारी जी को मिला।
तिवारी जी का 1954 में सुशीला तिवारी से विवाह हुआ। 14 मई 2014 को उन्होंने उज्जवला से 88 साल की आयु में विवाह किया। एन.डी.तिवारी उज्जवला के पुत्रा रोहित शेखर के जैविक पिता थे।
1957 में दूसरी बार नैनीताल विस जीतकर यूपी विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने एन.डी. 1962 में चुनाव हार गये थे। 1963 में कांग्रेस में शामिल होकर 1965 में काशीपुर से विधायक चुने गए। 1969 के मध्यावधि चुनाव में जीतकर यूपी सरकार में पहले श्रम, योजना व पंचायतीराज मंत्री बने। यूपी में 1976 में पहली बार, 1984 में दूसरी बार, 1985 में तीसरी बार और चैथी बार मुख्यमंत्री का पद संभाला। 1980, 1996 और 1999 में वह सांसद चुने गये। 1981 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे। 1987 को केन्द्र सरकार में वित्त एवं वाणिज्य मंत्री रहे। 1989 में आम चुनाव में हल्द्वानी सीट जीती लेकिन 1991 में भाजपा के बलराज पासी से नैनीताल लोकसभा सीट हारे। 16 मई 1993 को पत्नी डाॅ.सुशीला तिवारी का न्यूयार्क में कैंसर की बीमारी से निधन हो गया। 23 अगस्त 1994 को यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने 1997 में फिर से अध्यक्ष नियुक्त किये गये। 1998 में नैनीताल से चुनाव हारे और कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दियो। 2002 से 2007 तक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रहे। केन्द्र में योजना, उद्योग, पेट्रोलियम, विदेश मंत्राी रहे एन.डी. की चर्चा प्रधन मंत्री पद तक होने लगी थी।
मृदुभाषी, मिलनसार, विपक्षियों के भी चहेते तिवारी जी ने तराई में औद्योगिक विकास के लिये श्रम किया और रानीबाग की एचएमटी फैक्ट्री को बनाये रखने के लिये श्रमिकों के साथ खड़े रहे। इस महान नेता को पि.हि.परिवार की श्रद्धांजलि।

तिवारी कांग्रेस बनाकर भी देख ली
राजनैतिक पारी खेलते हुए नारायणदत्त तिवारी ने अपने बल पर चुनाव लड़ने के लिये 1994 में अर्जुन के साथ मिलकर पार्टी भी खड़ी की थी। कांग्रेस;तिवारीद्ध के रूप में जनता के बीच उम्मीदवार भी खड़े किये गये लेकिन उसका कोई प्रभाव चुनाव में नहीं पड़ सका था।

निरन्तर विकास समिति के संस्थापक
राजनीति के दांवपेंच में काफी आगे बढ़ने के बाद झटका खा चुके एन.डी.तिवारी निरन्तर विकास समिति के संस्थापक भी रहे। इसके लिये उन्होंने युवाओं के साथ सम्पर्क अभियान चलाया और जगह-जगह सभाओं को सम्बोधित किया।

पर्वतपुत्र-धरती पुत्र की दोस्ती
एन.डी.तिवारी को कई प्रकार की संज्ञाएं दी जाती रही हैं। हिमालय पुत्र, पर्वत पुत्र, विकास पुरुष और भी कई नामों के साथ आदर दिया जाता रहा है। दूसरी ओर यूपी के दिग्गज समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को धरती पुत्र की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार पर्वतपुत्र-ध्रती पुत्रा की दोस्ती घनिष्ठ रही है। एन.डी.तिवारी का हर प्रकार से साथ देने के लिये मुलायम सिंह यादव हमेशा तैयार रहे।
नौछमी नरैणा
अपने मिजाज के कारण हमेशा चर्चा में रहने वाले तिवारी जी को लेकर नरेन्द्र सिंह नेगी का गाया हुआ ‘नौछमी नरैणा’ गीत बहुत चर्चित हुआ। अपने जीवन के कई पन्नों में तिवारी जी वाद-विवाद में रहे लेकिन आन्ध््र प्रदेश का राज्यपाल रहते हुए बुरी तरह पफंस गये और उनका राजनैतिक भविष्य ध्ुंध्ला होता चला गया। बाद में रोहित शेखर के साथ कोर्ट-कचहरी हल्ले के बाद उन्होंने स्वीकार कि वह उनका पुत्रा है। तिवारी जी को चारों ओर से घिरा देख कांग्रेस ने उनसे दूरी कर ली। उनके करीब रहने वाले भी एक-एक कर कन्नी काट गये।
स्वार्थियों ने बुरी तरह घेर लिया था
जिस समय एन.डी.तिवारी की तूती बोलती थी, उन्हें स्वार्थियों ने घेर लिया था। विद्वता से भरे एन.डी. भी पता नहीं किन कारणों से उन स्वार्थियों को नहीं छोड़ पाते थे। आम लोगों में नारे लगने लगे थे- ‘एन.डी. तेरे चारों ओर, लीसा-लकड़ी-पत्थर चोर’। तिवारी जी का नाम लेकर अरबपति बन चुके लोगों ने लाभ लेने तक उन्हें बुरी तरह घेर लिया था और बाद में एकदम छोड़ दिया। तिवारी जी बिना एक कदम भी नहीं चलने वाले ऐसे लोगों ने उन्हें धेखा ही दिया।
के.सी.पन्त को नहीं पचा पाये
राजनीति के दांवपेंच में माहिर एन.डी.तिवारी भारत रत्न पं.गोविन्द बल्लभ पन्त के सुपुत्रा के.सी.पन्त को नहीं पचा पाये। चुनाव के दौरान पं.तिवारी व पं.पन्त के नाम पर कांग्रेस की गुटबाजी सापफ दिखाई देती थी। के.सी.पन्त की विद्वता और नम्रता अपनी जगह थी लेकिन तिवारी जी के दबदबे के आगे उन्हें कांग्रेस छोड़ भाजपा की सदस्यता लेनी पड़ी। उनकी पत्नी श्रीमती ईला पन्त ;भाजपाद्ध ने एन.डी. तिवारी ;कांग्रेसद्ध को नैनीताल लोकसभा सीट पर हरा दिया।

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का संगीत और पहाड़ प्रेम

डाॅ.पंकज उप्रेती
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ जितने गहरे कलाकार थे उतने ही वैज्ञानिक। संगीत विज्ञान पर उनका ऐसा प्रभाव देखा जा सकता है। कवीन्द्र रवीन्द्र ने संगीत की जिस विधा को जन्म दिया उसे- ‘रवीन्द्र संगीत’ कहा जाता है। रवीन्द्र बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के थे और उन्होंने धर्म- कला-विज्ञान-ज्ञान की शाखाओं के मर्म को समझते हुए प्रकृति की रीति के साथ चलने का संदेश दिया। ऐसे में गुरुदेव का पहाड़ प्रेम होना स्वाभाविक है। जिस संगीत को लेकर वह शुरु होते हैं उसकी लहर यात्र और खोज के बाद उत्पन्न होती है। इस सच्चाई को मैं तक महसूस करता हँू जब पहाड़ की दुर्गम यात्रओं को अंजाम देता हँू और अंजान पथों पर पग धरता हँू। संगीत मात्र सरगम का खेल नहीं बल्कि वह एक विचार भी है। प्रकृति के बीच विचरने से दर्शन, कला, विज्ञान की कौंध् होने लगती है और एक शैली बन जाती है। टैगोर की शैली भी अपनी शैली बनी जिसे उनके गीत, कविता, नाट्य, संगीत में देखा जा सकता है। ‘रवीन्द्र संगीत’ के रूप में जिस विशिष्ट संगीत की धारा उन्होंने चलाई उसका अपना ही शास्त्र है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर बंगाल के ख्याति प्राप्त विष्णुपुर घराने से प्रभावित थे। कहते हैं इस घराने की स्थापना तानसेन के वशंज बहादुर खाँ ने की थी। रवीन्द्र के पहले संगीत शिक्षक विष्णु चक्रवर्ती थे। बंगाल संगीत विध का गढ़ रहा है, रवीन्द्रनाथ के पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ संगीत कला के संरक्षक थे। यदि रवीन्द्रनाथ की वंशावली को देखें तो पता चल जाता है कि सभी विख्यात कलाकार और पारखी थे। महर्षि देवेन्द्रनाथ, गिरीन्द्रनाथ, द्विजेन्द्रनाथ, सत्येन्द्र, हेमेन्द्र, ज्योतिरीन्द्रनाथ, स्वर्णकुमारी, गुणेन्द्रनाथ, अश्वनीन्द्र, गुरुदेव रवीन्द्र, दीपेन्द्र, इन्दिरादेवी, लेडी प्रतिभा चैध्री, क्षितीन्द्रनाथ………। इस लम्बी सूची में मंचीय कलाकार, कलावन्त, रचनाकार, स्वरलिपिकार, गायक-वादक सभी हैं। तत्कालीन विख्यात संगीतकारों का जमावड़ा इनके घर में होता था। विष्णु चक्रवर्ती, सुरेन्द्रनाथ वन्दोपाध्याय, राम प्रसाद, श्यामसुन्दर मिश्र, जगतचन्द्र गोस्वामी, राधिका प्रसाद जैसे श्रेष्ठ कलाकारों का इनके वहाँ आना-जाना था। ऐसे में रवीन्द्र भी इसमें गोता लगा रहे थे लेकिन उनके मुँह से निकलने वाले सजह स्वरों ने एक नई धरा को चलाया। उन्होंने जो रचनाएं तैयार की उनमें काव्य और संगीत को सन्तुलित रखा गया है। वह प्राकृतिक आवाज के साथ हाव-भाव का ध्यान रखते हुए होने वाली प्रस्तुति को संगीत की श्रेणी में मानते थे। ऐसे में स्वाभाविक रूप से रवीन्द्र संगीत ने अपना स्थान लोगों के बीच बना लिया।
लोक का अपना शास्त्र होता है, सो गुरुदेव के संगीत में भी उनके लोक का प्रभाव है किन्तु मात्र बांग्ला होना ही उनकी शैली नहीं है। इस बात को वह महसूस करते थे शायद इसी लिये उन्होंने उत्तराखण्ड के जनपद नैनीताल के रामगढ़ को चुना होगा। रामगढ़ ही वह स्थान है जहाँ कवियत्री महादेवी वर्मा ने भी अपनी साहित्य साधना की। वह दौर जब संसाधनों का कमी थी, कवीन्द्र रविन्द्र ने बंगाल से यात्रा कर इसे ही क्यों चुना होगा? एकदम निर्जन में जिस स्थान को इस कलावन्त ने चुना उसके खण्डहर आज भी पुकार रहे हैं। वह तो भला हो हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट सोसाइटी ने इस पुकार को सुना और पिछले कुछ सालों से निरन्तर यहाँ आयोजन करते हुए सबका ध्यान इस ओर आकर्षित किया।
लोक संगीत ही शास्त्रीय संगीत की जननी है और लोक की मान्यता समूह में होती है। लोक हमेशा नकल की बजाय स्वाभाविकता का पालन करता है। गुरुदेव का भी यह मानना था, तभी तो उन्होंने शास्त्राीय संगीत की जड़ों को जानने के बावजूद अपनी स्वाभाविकता को नहीं छोड़ा। यह एक बड़ा सत्य है कि जो भी स्वाभाविक कलाकार-चित्राकार- लेखक- विज्ञानी-ज्ञानी होगा वह अपनी छाप अपने अंदाज से छोड़ता है। शास्त्रीय संगीत कलाकारों के तमाम उदाहरण देख लीजिये- भीमसेन जोशी, जसराज, कुमार गन्ध्र्व, बिस्मिला खान, हरिप्रसाद चैरसिया, पन्नालाल घोष इत्यादि। पिफल्मी गायकों के उदाहरण भी देख लें- लता, रपफी, मुकेश इत्यादि। कहने का आशय यह है कि असल कलाकार अपने आप में एक होता है और शेष उसकी नकल करने लगते हैं। संगीत में नायकी-गायकी के बारे में बताया जाता है, जिसका मतलब है- जब शिष्य अपने गुरु/उस्ताद से सीखता है तब वह नकल करता है अर्थात नायकी और जब वह मझ कर अपनी प्रस्तुति देता है तब वह गायकी करता है। सीखने के क्रम में नकल स्वाभाविक है किन्तु अपनी प्राकृतिक स्वाभाविकता को नष्ट नहीं करना चाहिये। इस बारे में गुरुदेव का मानना था कि शास्त्रीय किलिष्टता के चक्कर में संगीत रचना और उसमें निहित भाव को गम्भीर हानि पहँुचती है। भाव के साथ ही संगीत खिलता है। भावपूर्ण संगीत ही कर्णप्रिय और रंजक होता है।
रवीन्द्र संगीत पर उत्तर भारत में प्रचलित ध््रुपद-धमार, ख्याल, टप्पा, ठुमरी, पाश्चात्य ओरल गीत, बंगाल की लोक ध्ुनों का प्रभाव रहा है। गुरुदेव ध््रुपद गायकी से प्रभावित थे ऐसे में रवीन्द्र संगीत का मूलाधर भी ध््रुपद है। ऐसे में गुरुदेव ने लगभग दो हजार गीत लिखे जिनमें हिन्दी गीतों के आधार पर रचित गीतों की संख्या 215 बताई जाती है। बंगला भाषा में ये गीत ‘भाँगा-गान’ के नाम से प्रसिद्ध हुए जिन्हें पूजा गीत या ब्रह्म संगीत के रूप में गाया जाता है। श्रदेय प्रभुलाल गर्ग ने रवीन्द्र संगीत पर गहन अध्ययन करते हुए बताया है कि रवीन्द्र संगीत की अधिकांश रचनाएं तोड़ी, भैरवी, आसावरी, पूर्वी, ईमन, मल्लार और केदार में की गईं हैं। मालकौंस और बागेश्वरी का प्रयोग भी किया गया है लेकिन अधिक नहीं। भैरवी राग में लगभग 150, मल्हार में 40 और पूर्वी में 30 रचनाएं की गई हैं। तालों में सरलता का ध्यान रखा गया है ताकि गीत का काव्यपक्ष किसी भी कारण से मन्द न पड़े। गुरुदेव के 215 गीत हिन्दुस्तानी संगीत में रूपान्तरित हैं। उनका गीत- प्रथम आदि तव शक्ति आदि ‘परमोज्जवल’ उनके प्रथम कोटि के गीतों में गिना जाता है, इसे ध्ु्रपद से लिया गया है। वर्षाकालीन गीत राग देश व दादरा ताल में निबद्ध है- ‘आई सावन की बेला’। बाउल गीत के आधार पर रची गई उनकी रचना- ‘यदि तोर डाक शुने केउ ना आसे तवे एकला चलो रे’ गांध्ी जी को अतिप्रिय थी। महात्मा गांध्ी ने ही रवीन्द्रनाथ के नाम के साथ- ‘गुरुदेव’ और ‘कविगुरु’ शब्द जोड़े थे और रवीन्द्रनाथ ने उन्हें ‘बापूजी’ नाम दिया था।
शान्तिदेव घोष द्वारा लिखित ‘रवीन्द्र संगीत’ में टैगोर की अनेक रचनाओं से सम्बन्धित राग-तालों का उल्लेख मिलता है। ‘गीत-वितान’ नामक बंगला पुस्तक में टैगोर के गीतों की स्वरलिपि का वृहद संग्रह मिलता है। इसके कई भाग हैं। उनकी रचनाओं से पता चलता है कि वह अवसर के अनुकूल तैयारी करते थे तभी यह भाव प्रधान थीं।शास्त्रीय रागों को गुरुदेव अपने ढंग से प्रस्तुत करते। ऐसे में शास्त्रीय संगीत का प्रभाव होते हुए भी उसकी अपनी धारा थी। उन्होंने वैष्णव पद, ईसाई प्रार्थनाएं, कीर्तन, आॅपेरा, समूहगान को नई ऊँचाई दी। रवीन्द्र संगीत के गीतों को 6 भागों में समझा जा सकता है- 1. पूजा गीत, 2. स्वदेश गीत, 3. प्रेम गीत, 4. प्रकृति गीत, 5. नृत्यनाटक गीत, 6. विविध् गीत। रवीन्द्रनाथ ने 1901 में नैवेद्य, 1906 में खैया, 1909 में गीतांजलि की रचना की। इनके अन्तर्गत आने वाले गीत पूजा गीत श्रेणी में हैं। इनमें ध्वनिमय व्यंजना और आदिशक्ति के लिये व्याकुलता दिखाई/सुनाई देती है। उदाहरण- ‘आजि तजो तारा सब आकाशे, सबे मोर प्राण भरि प्रकाशे।’ उनके लिखे/गाये देश गीत उच्चकोटि के हैं। एक उदाहरण- ‘ओ आमार देशेर माटी तोमार पाये छो आई माथा।’ बंगाल के महान प्रेमकाव्य रचनाकार निध्ु बाबू, मध्ुकान, बिहारी लाल का रवीन्द्र संगीत के गीतों मंे गहरा प्रभाव था। भौतिक प्रेम प्रसंगों को गुरुदेव ने आध्यात्म चेतना में ढालने के साथ ही छायावाद और रहस्यवाद की ओर ध्यान आकर्पित किया। चित्रांगदा, चंडालिका, श्यामा, कालमृगया, मायार खेला, वाल्मीकि प्रतिभा जैसे गीत तथा नृत्यनाटकों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है। प्रकृति सम्बन्ध्ी गीतों में गुरुदेव ने जड़ और चेतन दोनों के प्रति वाणी मुखर की है। नृत्य-नाटक के लिये उन्होंने रचना तैयार की तथा कथावस्तु इस प्रकार गठित की कि उसका प्रभाव श्रोता/दर्शक को तत्काल हो। उनके गीतनाट्यांे को कलामंच पर हमेशा प्रसिद्धी मिली है। इसके अलावा उन्होंने विविधगीतों को गुंथा। गुरुदेव भावपूर्ण संगीत के लिये ताल को भी सहज-सुगम करने को कहते। सांगीतिक दृष्टि से देखें तो पता चल जाता है कि भावपूर्ण गायन के लिये उन्होंने ऐसे प्रयोग किये। यही कारण है कि रवीन्द्र संगीत का प्रभाव पिफल्म संगीत पर भी पड़ा। सचिनदेव बर्मन, आर0सी0 बोड़ाल, हेमन्त कुमार, सलिल चाौैधरी, पंकज मलिक, पहाड़ी सान्याल इत्यादि संगीतकारों की रचनाएं इसके उदाहरण हैं।
रवीन्द्रनाथ के संगीत में बंगाल के लोक की छाप और पहाड़ का सा दर्द है। वह कहते थे- शास्त्रीय संगीत सीखने के लिये गले के प्राकृतिक गुण-धर्म को नष्ट करना न्यायसंगत नहीं है। आवाज मिठास युक्त और भावपूर्ण होनी चाहिये। बंगाल संगीत विध में समृद्ध रहा है, यहाँ के लोक का संगीत और शास्त्राीय संगीत का अद्भुत प्रचलन सोचने पर मजबूर करता है कि गद्य और पद्य दोनों में लयकारी है। ऐसी लयकारी जो कई सम्भावनाओं को संगीत की दृष्टि से बताता है। यहाँ राध-कृष्ण से सम्बन्धित गीतों को कीर्तन के नाम से जानते हैं और पदावलियों को दुहराते हुए गाते हैं। लोकध्ुनों की छाया भी इनमें है। बंगाल में भटियाली लोकगीत भी समृद्ध है, इसमें दीर्घ स्वरों के साथ ध्ुन गाई जाती है। बाउल संगीत के रूप में काव्य की भावप्रधन प्रस्तुति देखने को मिलती है। चटक प्रस्तुति के लिये चटका गायन भी एक शैली है। इसमें व्यंग्यवाण के साथ छेड़छाड़ भरा मनोरंजन होता है। विरह गीत के रूप में भवइया सुना जा सकता है। ऐसी ही अन्य विधएं बंगाल के लोक में हैं। जब बात पहाड़ यानी कि उत्तराखण्ड की करें तो यहाँ भी इसके लोक के अनगिनत गीत विविध् शैलियों में मिलते हैं। न्योली के रूप में दर्दभरे स्वरों का आलाप, झोड़ा-चांचरी-ढुस्का के रूप में नृत्यगीत, बैर के रूप में सवाल-जबाब का मनोरंजन, हुड़कीबौल के रूप में कृषिगीत, होली के रूप में शास्त्रीय और लोक संगीत का मिश्रण व भावप्रधन गायकी, रामलीला के रूप में गीतनाट्य शैली, सम्वाद के रूप में पांडव नृत्य, झुमौलों, बाजूबन्द, थड्या, पफाग, सगुनगीत, संस्कार गीत……और भी कितने ही प्रकार हैं। लोक बंगाल का हो, उत्तराखण्ड का हो या कहीं अन्य का, उसकी सहजता-सरलता जन्म से होती है, विकार और विकास तो उसका अगला चरण है। जब बात लोक गीतों की हो तो उनमें गेयता, व्यक्तितत्व, भावप्रवणता, रागात्मक अन्विति, आत्मद्रवणता, प्रवाहमयी शैली, भावाभिव्यंजना, प्रकृति चित्राण होता है। इसमें छन्द, लय, विम्ब, प्रतीक, अलंकार, रस का स्वाभाविक रूप से होते हैं। लोक का यह शास्त्रा ही है जो शास्त्रीयता के शास्त्र को भी दिशा देता है। लोक से उपजने वाले गीतों की सार्थकता हमेशा नवजीवन देने वाली, जन-जन में ऊर्जा संचार करने वाली रही है। रवीन्द्रनाथ जैसे विद्वान संगीत के इस पक्ष को बखूबी जानते थे। तभी उन्होंने बंगाल से पहाड़ का रुख किया होगा। प्रकृति के बीच अपनी साधना को जारी रखने का संकल्प रखने वाले रवीन्द्र का शान्तिनिकेतन रामगढ़ भी तो हो सकता है? ‘टैगोर टाप’ नाम से जिस खण्डहर को जाना जाता है, रवीन्द्र की उस धरोहर को फिर से स्थापित करने का सपना देख रही संस्था ‘हर्डस’ यदि अपनी योजना में सफल होती है तो रवीन्द्र का पहाड़ प्रेम निश्चित रूप से झलक उठेगा। यह प्रेम गीत-संगीत के रूप में ज्यादा है। गीत-संगीत ही ज्ञान-विज्ञान का सरल उपाय और ध्यान का सुगम माध्यम है। आज के परिप्रेक्ष्य में गुरुदेव का सपना सच साबित करने की जिद होनी ही चाहिये। क्योंकि यह जिद, ‘जिद’ न होकर लोक का स्वाभाविक रंग है।

पिघलता हिमालय 7 मई2018 के अंक से

ओ हो रे नैनीताल…..

कार्यालय प्रतिनिध्
पर्यटन नगरी नैनीताल में बढ़ता जा रहा दबाव और चल रही नीति-रीति से अजब हाल हो चुका है। गर्मियों में यहाँ का ताल सूखने लगा है और बरसात में अगल-बगल टूटने लगा है। देशी-विदेशी पर्यटकों की पसंदीदा जगह सरोेवर नगरी नैनीताल की रोजी-रोटी होटल उद्योग है। ऐसे में यहाँ के बाशिन्दों के अलावा बाहर से आकर कापफी संख्या में लोग रहने लगे हैं। बड़ा पैसा, बड़ा दीमाग, बड़ी पहँुच वालों ने उँफची पहाड़ियों से लेकर झील के पास तक साम्राज्य पफैला लिया जबकि पार्किंग के लिये यह पहाड़ी स्टेशन बेचैन है। नैनीताल बचाओ, इसका पर्यावरण बचाओ के नाम पर बहुत नारे लग चुके हैं लेकिन मनमापिफक सजावट पसन्द लोगों ने रातों रात कंक्रीट के ढेर लगा लिये जबकि अपनी ही जमीन पर अपना घंरौदा बनाने के लिये नियम पसन्द लोग परेशान हो चुके हैं। पीढ़ियों से नैनीताल रहने वाले चाह कर भी अपने मकान को न तो सजा पा रहे हैं और न बना पा रहे हैं जबकि नियम का पेंच लगाने वाले यह नहीं बता पा रहे हैं कि वह जिस स्थान पर बैठे हैं वहाँ किस नियम के तहत निर्माण कार्य या सजाया गया था। नैनीताल में लोअर माल रोड ध्ंसने लगी है। ऐसे में मान लिया जाता है कि शहर में बहुत दबाव है और निर्माण कार्यों को रोक कर सबकुछ ठीक कर लिया जायेगा। हाईकोर्ट ने भी झील के दो किलोमीटर के दायरे में निर्माण कार्यों पर रोक की बात कही। बाद में बात-बहस के बाद इस मामले में विचार हुआ। एनओसी लेकर अपनी जमीन पर अपना निर्माण करने वाले अभी तक भटक रहे हैं। दूसरी ओर झील को मजबूती देने के लिये हुए निर्माण कार्य की पोल खुल चुकी है। बार-बार लगाये जा रहे बजरी- सीमेंट का कोई असर नहीं है और सड़क का 25 मीटर भाग टूट कर नैनी झील में समा गया। ऐसे में अपर मालरोड से डिवाइडर लगाकर वाहनों का संचालन किया गया है। इसी समय 25 मीटर और हिस्सा में दरार आ गई।
इस बीच हाईकोर्ट के अनुपालन में नगर पालिका ने चाट पार्क व भोटिया मार्केट चार दर्जन दुकानों के अतिक्रमण हटाये। 36 दुकानों की झाप हटाने के अलावा 16 दुकानों के अतिरिक्त निर्माण को ध्वस्त किया गया। कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद प्रशासन हरकत में है और हाईकोर्ट के खिलापफ नारेबाजी करने वाले व्यापारियों ने क्षमा मांगी।
बहुत ही सीध्ी सी बात है कि चाट हो या चाकलेट, खिलौने हों या कपड़े की दुकान…..सभी ने अपनी जगह तलाशनी है। जिस जगह पर्यटकों की भीड़ और बिक्री की सम्भावना हो वहाँ दुकान जरूर सजेगी। यह बात दूसरी है कि कौन अपनी जगह पर दुकान सजाता है और कौन किराये पर या अतिक्रमण कर। चूंकि नैनीताल में हाईकोट है और न्यायमूर्ति सहित तमाम छोटे-बड़े अध्किारी यहाँ होते हैं। ऐसे में घिचपिच नैनीताल से होकर जाने में यदि इन्हें असुविध हुई तो सख्ती तो होगी ही। पिफर हाईकोर्ट के खिलापफ बोलना तो बहुत ही गलत हो जायेगा। यही सब हो रहा है इस नैनीताल में। यहाँ तक कि हाईकोर्ट को नैनीताल में पसन्द करने वाले भी चाहने लगे हैं कि यह किसी दूसरी जगह चला जाता। चारों ओर से डण्डे बरसने जैसा हो गया है इस सरोवर नगरी में। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, यहाँ के बाशिन्दों को एकजुट होकर न्यायालय का सम्मान करते हुए रास्ता तलाशना चाहिये। आंखिर नैनीताल की रंगत कुछ और ही ठैरी। इसे खूब सजाओ, खूब संवारो। पर्यावरण का ध्यान रखो, अतिक्रमण मत होने दो, जबरन के निर्माणों से बचो। नहीं तो क्याप्प से क्याप्प हो जायेगा।