महान जनसेवक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. जगत सिंह पांगती

लक्ष्मण सिंह पांगती
स्व.जगत सिंह पांगती का जन्म 30 जून 1908 को भारत-तिब्बत सीमान्त गाँव मिलम के एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ था। उनके पिता स्व.खड्गराय पांगती, आर्य समाजी विचारधारा के प्रबुद्ध एवं कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता थे, जिन्होंने 1929 में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया, उनके ज्येष्ठ भ्राता स्व. भगत सिंह पांगती जोहार के प्रसि द्ध व्यापारी एवं उदार प्रकृति के व्यक्ति थे, जिनके पूर्ण सहयोग से ही वे सामाजिक क्षेत्र में एकाग्र होकर कार्य कर पाए।
जगत सिंह पांगती की प्रारम्भिक शिक्षा जोहार घाटी में सम्पन्न हुई। सन् 1923 की मिडिल स्कूल परीक्षा में पूरे प्रान्त की मेरिड में प्रथम स्थान पर रहे। सन् 1927 की हाईस्कूल परीक्षा में राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए तथा सम्पूर्ण कुमाउँ मण्डल में सर्वश्रेष्ठ छात्र घोषित हुए। इतना ही नहीं वे हाईस्कूल परीक्षा 1927 में सम्पूर्ण प्रान्त की मैरिट सूची में तृतीय स्थान पर भी रहे। राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा के सम्मान-पट्ट;आॅनर बोर्ड में अंकित आपका नाम आज भी देखा जा सकता है।
जगत सिंह पांगती के हृदय में प्रारम्भ से ही आजादी के लिए तड़प थी। मेरिट छात्रवृत्ति प्राप्त होने के बावजूद वे छात्र जीवन को वहीं छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े तथा राष्ट्र को समर्पित होने वाले जोहार के प्रथम तरुण बने। सन् 1928 में ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ आन्दोलन तथा विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार आदि जैसे देशभक्ति के कार्यों में सक्रिय रहे।
यह उनके जीवन का सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहला पड़ाव था। सन् 1929 में लाहौर अधिवेशन में भाग लेने की प्रबल इच्छा होते हुए भी वे सामाजिक कार्य में व्यस्त रहने के कारण उक्त अधिवेशन में न जा सके और उनके पिता स्व. खड्गराय पांगती ने लाहौर अधिवेशन में भाग लिया। इस अधिवेशन में स्व. खड्गराय पांगती के साथ स्व. दुर्गा सिंह रावत, स्व. राम सिंह पांगती तथा स्व. हरिमल सिंह बुर्फाल ने भी भाग लिया। लाहौर अधिवेशन में पारित ‘पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव’ को गाँव गाँव मंे उल्लास से कार्यानवयन में आपका महत्वपूर्ण सहयोग रहा। सन् 1934 तक क्षेत्रा में सार्वजनिक रचनात्मक कार्यों जैसे ग्राम सुधार, ग्राम स्वच्छता, पुस्तकालयों की स्थापना एवं शराबबन्दी आदि जैसे सामाजिक कार्यों में लिप्त रहे। सन् 1935 में कांग्रेस स्वर्ण जयन्ती को सफलतापूर्वक मनाने में पूर्ण सहयोग दिया। 1936 में कांग्रेस का सदस्य बनकर कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय हो गए। सन् 1938 में प्रदेश के कांग्रेस मंत्रिमण्डल ने आपको ग्राम सुधार संयोजक;आर्गनाइजर नियुक्त किया और 1940 तक आपने इस पद पर रहकर कुशलतापूर्वक कार्य सम्पादित किया।
सन् 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन का संचालन करते हुए स्थान ‘लाबगड़’ में 1 मई 1941 को आपको अन्य साथियों के साथ कैद कर तीन माह का सशक्त कारावास तथा रु. 50/- का आर्थिक दण्ड दिया गया। 12 मई से 2 अगस्त 1941 तक जिला कारागार अल्मोड़ा में आप बन्दी रहे और जेल से मुक्त होने के पश्चात जिला सत्याग्रह का संचालन करने लगे। 24 अगस्त 1942 को मुनस्यारी के दरकोट, देवीधार के मेले में हाथ में तिरंगा झण्डा लेकर आप तथा स्वामी भागवतानन्द जी के साथ पं.बचीराम जोशी के सभापत्तित्व में विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में शामिल हुए। 25 अगस्त 1942 को आन्दोलनकारियों के समूह के साथ मल्ला जोहार गोरीफाट में सत्याग्रह का प्रचार करते हुए मिलम से मुनस्यारी, तेजम आदि स्थानों से होते हुए 28 सितम्बर को अन्य 30 सत्याग्रहियों सहित बांसबगड़ में अंग्रेज पल्टन द्वारा गिरफ्रतार किए गए, जिसके फलस्वरूप उन्हें ग्राम थल में दो वर्ष का कठोर कारावास का दण्ड सुनाकर 11 अक्टूबर से 20 नवम्बर 1942 तक अल्मोड़ा एवं 21 नवम्बर से 5 अगस्त 1943 तक बरेली कारागार में में रखा गया। 6 अगस्त को उन्हें कैम्प जेल लखनउ में स्थानान्तरित कर दिया गया। बाद में आपको 26 जून 1944 को कारागार जीवन से मुक्ति मिली। इसके पश्चात वे अपने क्षेत्र में सहकारिता, कुटीर उद्योग और समाज सुधर जैसे विकास कार्यों के साथ-साथ कांग्रेस संगठन को मजबूत करने का कार्य करने लगे। उन्होंने पूज्य गांध्ी जी के वर्धा आश्रम के अनुरूप कुटीर उद्योगों की स्थापना की और जोहार में सहकारी संघ समितियों के द्वारा जनता को सहकारिता का लाभ दिलाया। इस प्रकार जोहार में सहकारी संघ समिति की स्थापना में आपका प्रमुख योगदान रहा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जोहार मण्डल कांग्रेस कमेटी के अनुरोध् पर शासन से पूज्य महात्मा गांध्ी जी के एक ‘अस्ति कलश को मानसरोवर में विसर्जित करने की स्वीकृति सरकार से प्राप्त की। स्व. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में जोहार के अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधि मण्डल लेकर आप अस्थि कलश के साथ मानसरोवर गए। जोहार के लोगों ने अस्थि कलश का जोदरार स्वागत करते हुए पूज्य बापूजी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
सन् 1949 से सन् 1952 तक आप पंचायत राज इंस्पेक्टर के पद पर रह कर आपने देश सेवा की परन्तु सामाजिक सेवा कार्य को अपना जीवन का परम लक्ष्य मानते हुए तथा इस समाजसेवा के कार्य में इस पद को बाधा मानते हुए आपने इस पद को त्याग कर समाज के सामने एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। सरकारी सेवा से पदमुक्त होने के बाद जिला कांग्रेस नियोजन समिति अन्तरिम जिला परिषद अल्मोड़ा के सदस्य तथा विकासखण्ड मुनस्यारी के अध्यक्ष बने। सन् 1962 से से 1971 तक के विधान सभा चुनावों तथा ग्राम सुधार कार्यक्रमों में आपने अपने को व्यस्त रखते हुए उत्तरी सीमान्त की समस्याएं लेकर तथा डेलीगेशन के प्रबन्धकर्ता बनकर दिल्ली तथा लखनउ जाकर कई सुविधाएं प्रदान करवायीं। आप अत्यन्त दूरदर्शी थे। सन् 1962 में भारत चीन युद्ध के कारण सीमान्त क्षेत्रा जोहार, दारमा तथा गढ़वाल नीति-माणा आदि के निवासियों का तिब्बत व्यापार ठप हो गया जिसके कारया तीनों घाटियों के प्रबुद्ध एवं जागरुक समाजसेवियों को साथ लेकर तत्कालीन माननीय प्रधानमंत्री स्व. पं.जवाहरलाल नेहरू जी से मिले, उन्हें सूत से बनी माला पहना कर उनका अभिनन्दन किया तथा उन्हंे ज्ञापन प्रस्तुत किया। जिसमें इन सभी क्षेत्रों की आर्थिक समस्याओं की ओर ध्यान दिलाते हुए इन सभी इलाकों को जनजाति क्षेत्रा घोषित करने का अनुरोध् किया गया था। परिणामस्वरूप ये क्षेत्र जनजाति क्षेत्रा घोषित हुए और तब से आज तक उन्नति की ओर अग्रसर हैं। इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिये पूरा सीमान्त क्षेत्र हमेशा आपका आभारी रहेगा।
भोटिया पड़ाव हल्द्वानी की जमीन की लीज को ‘जोहार संघ’ के नाम स्थानान्तरित करने का पूर्ण श्रेय भी आपको जाता है। भोटिया पड़ाव को आदर्श पड़ाव बनाने का आपका सपना था जो अब एक विकसित आवासीय काॅलोनी बन चुकी है। यह स्वर्गीय जगत सिंह पांगती जी की प्रतिष्ठित सामाजिक धरोहर के रूप में याद की जाती रहेगी। इस प्रकार आप आजीवन जनसेवा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहे। स्व. जगत सिंह पांगती जी का देहावसान 6 मई 1977 को नई दिल्ली में हुआ।

कठिन दौर के लोग- भवानी देवी पंचपाल

बा बोक बोकबेर जांछि
डाॅ.पंकज उप्रेती
कठिन दौर हमें बहुत कुछ सिखा जाता है। वर्तमान की आरामतलब पीढ़ी को यदि कठिन दौर के किस्से सुनाये जाएं तो वह आश्चर्य करती हैं लेकिन उन्हें यह जरूर बताये जाने चाहिये ताकि वह अपनी जड़ों से जुड़े रहेें। और जान सकें कि जितना भी वह आज बन पाये हैं इसके पीछे संघर्षों की लम्बी गाथा है। कठिन दौर सबका होता है, हर युग में होता है लेकिन किसी की परीक्षा ज्यादा ही होती है। कई दुश्वारियों के साथ कुछ लोग रास्ता बना लेते हैं और कुछ हार मानकर टूट जाते हैं। हमारे सीमान्त क्षेत्रा में तो यह स्थिति और भी विकट रही है। सड़क, बिजली, अस्पताल, स्कूल, संचार से दूर रहकर भी हौंसले के साथ रहना पहाड़ की आदत रही है परन्तु यदि इसमें भी आपदा-विपदा हमें घेर ले तो परीक्षा कई गुना हो जाती है। इसी प्रकार की तमाम परेशानियों में घिरकर आगे बढ़ी हैं- भवानी देवी पंचपाल। मुनस्यारी के तल्लाघोरपट्टा से अपने परिवार के साथ यह ध्रमघर की होकर रह गई। 82 वर्षीय भवानी देवी अतीत के उस दौर को याद कर फफकते हुए रो पड़ती हैं। पति के निधन के बाद जिन परेशानियों से वह घिरी उससे उबरने का साहस उन्हें हिमालय ने दिया। वह हिमालय जो दृढ़ रहता है, अटल रहता है, पिघल कर भी जीवन देता है।
भवानी देवी कहती हैं- ‘‘बा बोक बोकबेर जांछि।’’ कनोल ;नाचनी के पास निवासी पिता केशर सिंह धर्मशक्तू व माता कुशा धर्मशक्तू के घर में जन्मी भवानी देवी का सात वर्ष की आयु में तल्ला घोरपट्टा निवासी रामसिंह पंचपाल के साथ विवाह हो गया था। तब छुटपन में ही विवाह का रिवाज था। इनके ससुर रतन सिंह छुटपुट कारोबार करते थे। परिवार के सदस्य अपने जानवरों सहित जोहार यात्रा पर जाता था और परिवार की गुजर-बसर चल रही थी। घोड़ा, भेड़-बकरी, गाय-बैल सहित परिवार एक छोर से दूसरे छोर परम्परागत माइग्रेशन क्रम से अपने में जुटा था। रामसिंह पत्थर तक तोड़कर मजदूरी करने में पीछे नहीं थे। कठोर लेकिन प्रकृति के करीब की इस दिनचर्या में भी परिवार खुश था लेकिन एक दिन अचानक राम सिंह का निधन हो गया। इस समय परिवार में चार छोटे-छोटे बच्चे अपनी माँ भवानी के साथ थे। इसमें बसन्ती पांगती, प्रेमा बृजवाल, जगत सिंह पंचपाल ;बैक से सेवानिवृत्त, डी.एस. पंचपाल ;वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी भा.कृषि अनुसंधान केन्द्र अल्मोड़ा हैं। वर्षों के संघर्ष के बाद परिवार ने समाज में अपनी जगह अपने आप से बनाई।
भवानी देवी बताती हैं कि पति रामसिंह जी के निधन के समय सबसे छोटो पुत्र देबू; देवसिंह चार साल का था। परिवार को नानी गोविन्दी पांगती ने पाला। मुनस्यारी तल्ला घोरपट्टा छोड़कर परिवार धरमघर आ गया। सबलोग मिलकर उन के कारोबार, दन-चुटके बनाने से लेकर कृषि कर्म में जुट गये। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी इधर-उधर कई जगह हुई लेकिन साहस के साथ उन्होंने पढ़ाई भी की। बाद के दिनों मंे बहन बसन्ती अपने भाई जगह-देवेन्द्र की संरक्षक के रूप में सक्रिय हो गई और पठन-पाठन में यह आगे बढ़ गये।
भवानी देवी पंचपाल आज अपने भरेपूरे परिवार के साथ है लेकिन उन घटनाओं का स्मरण करती है जब कठिन दौर में उन्हें किसी ने संरक्षण दिया। साथ ही उन घटनाओं को भी नहीं भूली है जिन लोगों ने उन्हें चुनौती दी और दूरी बना ली। बचपन के श्रम और जीवन की सच्चाई से दो-चार हुए डी.एस. पंचपाल कहते हैं कि स्कूल जाने से पहले वह धान कूटते थे।
सचमुच संघर्ष की कहानी आनन्ददायी होती है, जो हमें अपनों से जोड़े रखती है। जीवन-जगह का सत्य पहचाने में मदद करती है।

जानवर भी शान थे हरिप्रदर्शनी के

कर्ण सिंह जंगपांगी से बातचीज
पि.हि. प्रतिनिधि
आज स्वच्छता को लेकर तमाम तरह के अभियान चलाये जा रहे हैं, उसके बाद गन्दगी से निजात नहीं मिल रही है। इसका एक ही तरकी है कि हम अपने आप से सुधर जाएं। इसके लिये सीमान्त क्षेत्र जोहार के पुराने उदाहरण देखे जा सकते हैं। किसी भी त्यौहार पर ग्रामवासी मिलकर चारों ओर सफाई अभियान चलाते थे। इसी प्रकार घरों में सफाई होती थी, बाद में एक टीम घर-घर निरीक्षण करती थी, जो घर सबसे स्वच्छ हो उसे पुरस्कार दिया जाता था।
जोहार और हरिप्रदर्शनी पर बातचीत करते हुए कर्ण सिंह जंगपांगी यह जानकारी देेते हैं। केदार सिंह जंगपांगी और श्रीमती राजी देवी के पुत्र लखनउ निवासी कर्ण सिंह चार भाई-बहिनों में सबसे बड़े हैं। कर्ण सिंह, बहादुर सिंह, दिनेश सिंह भाईयों के अलावा इनकी बहन जमुना हैं। सीमान्त के इस परिवार ने उन्हीं परम्पराओं का अनुसरण किया जो देखा। कर्मठता और दृढ़ता के साथ परिवार के सदस्य आज उच्चपदों पर हैं।
जोहार से लेकर निचली घाटियों तक की यात्राओं के किस्सों के साथ ही मल्ला दुम्मर की हरिप्रदर्शन की यादें कर्ण सिंह को ताजा हैं। वह बताते हैं कि प्रदर्शनी में लोग अपने-अपने जानवर भी लाते थे। घोड़े, भेड़-बकरियों के साथ प्रदर्शनी में प्रतियोगिता होती थी। तकुला दंगल ;चरखा कताई के लिये भी उत्सुकता रहती थी। निश्चित समय पर जो सबसे अच्छा और ज्यादा उन कातता था उसे पुरस्कृत किया जाता था। इसी प्रकार जड़ी-बूटियों, कृषि औजार, घरेलू उत्पात, उनी कारोबार को लेकर बहुत उत्साह था। समय के साथ लोगों की रुचियाँ बदली हैं। बाजार न होने के कारण भी इस प्रकार के उद्योग-धन्धे पर प्रभाव पड़ा है। श्री जंगपांगी सभी से अपील करते हैं कि वह अपनी जड़ों को टटोलें, जिन कठिनाईयों से घरेलू उद्योग धन्धे स्थापित किये गये थे, उन्हें बरकरार रखा जाए। इन्हीं सब बातों के लिये हरि प्रदर्शनी की परिकल्पना थी। जोहार के स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने के साथ ही नई पीढ़ियों का मिलन मल्ला जोहार का यह आयोजन है।

समर्पित गुरुजनों से संवारा जीवन जो हमेशा याद रहेंगे

चन्दन सिंह रावत बातचीज: तेजम का बचपन
पि.हि. प्रतिनिधि
हल्द्वानी। आज स्कूल-कालेजों में नवाचार को लेकर बहुत हल्ला किया जा रहा है जबकि पहले से गुरुजन पढ़ाने के साथ साथ समाज संवारने को अपनी जिम्मेदारी समझते थे और उनका समर्पण विद्यार्थियों का जीवन संवारने वाला था।
तेजम के पुराने दिनों को याद करते हुए चन्दन सिंह रावत बताते हैं कि विशम्भरदत्त जोशी जी प्रा.पाठशाला में गुरु जी थे, जिन्होंने खेल-खेल में बच्चों का जीवन संवारा। वह पहले धापा में भी रहे। धापा से तेजम आने के बाद ग्रामीण परिस्थितियों में वहां के अनुरूप बच्चों को सिखाते थे। बताते चलें कि तेजम के प्रहलाद सिंह जी के पुत्रों में चन्दन सिंह, डाॅ.प्रद्युमन सिंह, लक्ष्मण सिंह;लखनउ, ईश्वर सिंह ;देहरादून हैं। सारी स्थितियों को जीतने के बाद भी रावतों का यह परिवार अपने ग्राम, अपने गुरुजनों का स्मरण करता है और जुड़ा हुआ है। यह प्रेरणादायक है, यही नवाचार है।
चन्दन सिंह जी बतात हैं कि विशनदत्त मास्साब 1960 से 64 तक तेजम में रहे, जो इससे पहले मुनस्यारी के धापा में थे। स्कूल में पढ़ाई के लिये पूरा समय देने के अलावा प्रातःकाल प्रार्थना के समय ही उत्कृष्ट कार्यों के लिये बच्चों को प्रोत्साहित किया जाता था ताकि साथी बच्चे भी उससे उत्साहित हो। उदाहरण के लिये- मास्साब कहते आज फलां बालक बहुत साफ-सुथरा बनकर आया है। उसे प्रार्थना में आगे बुलाया जाता था। उसे देखकर अन्य साथी भी तैयारी करते। ग्राम को स्वच्छ रखना, जानवरों को किसी के भी खेतों में जाने से रोकने, एक-दूसरे की मदद करने जैसे विचार गुरुजन मन के भीतर कर देते थे जो आज भी हैं।

घोरपट्टा में आये थे तिब्बती तब हुई हचल-पहल

मोहनी टोलिया से बातचीज
पि.हि. प्रतिनिधि
अपनी आँखों के सामने परिवार व मित्रों को तिब्बत व्यापार को जाते देखना, माइग्रेशन में इधर से उधर घुमन्तू जीवन बिताना, जोहार के अन्तिम गाँव मिलम से टोला फिर तमाम पड़ाव होते हुए दिगतड़ ;डीडीहाट और अब अपने पुत्रों के साथ हल्द्वानी और दिल्ली तक की लम्बी यात्रा के अनुभवों से भरी 85 वर्षीय मोहनी टोलिया पिघलता हिमालय से खास बातचीज में बताती है कि जब दलाईलामा तिब्बत छोड़ भारत आये तो उनके साथ कई तिब्बती दिगतड़ भी आये जो घोरपट्टा नामक स्थान पर रहे। उन दिनों दिगतड़ में काफी चहल-पहल रही। सरकार ने तिब्बत से आये लोगों के लिये घोरपट्टा में व्यवस्था की। यहां पर इन लोगों ने सड़क का कार्य भी किया। बाद में यह लोग देहरादून, हिमांचल चले गये।
मोहनी देवी मिलम के अमर सिंह सयाना की पुत्री हैं, जिनका विवाह टोला के खुशाल सिंह जी से हुआ। सीमान्त के प्राकृतिक जीवन में रमी श्रीमती मोहनी जी अपने अतीत का स्मरण करते हुए बताती हैं कि अन्तिम गांव मिलम में होने के कारण तिब्बत व्यापार का हाल देखने का सौभाग्य हुआ। तब पुरुष व्यापार के लिये तिब्बत जाते थे और महिलाएं घर में उनी कारोबार और खेती का छुटपुट कार्य करती थीं। खेतों में फांफर, आलू खूब होता था। विवाह के बाद वह अपने ससुराल टोला में थीं लेकिन व्यापार और व्यवहार की दिनचर्या वैसी ही थी। जोहार, टोला, साईपोलू, भैंसकोट बारी-बारी से वह लोग आते-जाते रहते थे। मौसम के अनुसार जोहार से लेकर मुनस्यारी तक वह लोग आते थे। तब गर्मी होते ही जोहार भागने की तैयारी करते थे। लोगों को मुनस्यारी तक की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती थी, अब महानगरों में गर्मी सह रहे हैं। बचपन से लेकर कई सालों तक की जीवन यात्रा का सिलसिलेबार वृत्तांत सुनाती हैं। इनके पुत्र-पुत्रियों में वीरेन्द्र, नवीन, लीला हुए। टोला में बालक वीरेन्द्र की बाल लीलाओं को याद करने के साथ ही वह बताती हैं कि नवीन बचपन से ही गीत-संगीत का शौकीन था। बच्चों का स्कूल दूर होने के कारण वह उनका परिवार दिगतड़ आ गया। तब लोग अपने जानवरों को लेकर दूर-दूर तक यात्राएं करते थे। दिगड़त में बड़ा सा मैदान था, जोहार से तीन परिवार शुरुआत में बसने के लिहाज से आये। हाट लगने के कारण दिगतड़ का नाम ही डीडीहाट हो गया। यहां बच्चों की पढ़ाई की सुविधा थी। पुराने परिवार में धनसिंह पांगती, कृष्ण सिंह टोलिया हुए। तब नन्दा मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर भी बनाया ताकि अपने ईष्ट को याद करने का स्थल नियत हो जाए।
आज के डीडीहाट पर चर्चा करते हुए वह कहती हैं कि बहुत बदल गया है। जिस जगह एक मैदान मात्र था, आज बाजार हो गया है और गांव से बड़ी संख्या में लोग बस चुके हैं। जब तिब्बती दिगतड़ आये थे वह मैदान में होने वाले कार्यक्रमों में अपने सांस्कृतिक प्रोग्राम दिखाने आया करते थे। स्कूल में विद्वान गुरुजन बुलाए जाते थे। शौका मास्टर भी थे जिनमें बहादुर सिंह लस्पाल भी हुए। इसके अलावा तिब्बती मास्टर भी रखे गये जो अपनी भाषा में सिखाते थे।
श्रीमती मोहनी टोलिया पि0हि0 के वरिष्ठ सदस्य रहे स्व.उमेदसिंह मर्तोलिया का स्मरण करते हुए बताती हैं कि जिस समय दलाईलामा के साथ तिब्बती दिगतड़ आये थे दरोगा साहब मर्तोलिया जी की तैनाती भी यहीं थी। उनके साथ पुत्र सुरेन्द्र भी था। वह लोग यहां रहे। समय की सीमा में बहुत कुछ बदल जाता है। आज श्रीमती टोलिया जीवन का उत्तरार्द अपने योग्य पुत्रों के साथ बिता रही हैं। वह जोहार मौसम से लेकर दिल्ली के मौसम और रहन-सहन पर खुलकर बोलती हैं। उनके मन में हमेशा जोहार बसता है और वह युवा पीढ़ी से चाहती हैं कि वह अपने संस्कृति से जुड़े रहें।

कला-संगीत प्रेमियों के लिये उत्साह जगाने और जनमानस को झकझोरने वाला आयोजन

पि.हि. कला-संगीत समीक्षक
हल्द्वानी शहर में ‘आवाहन’ नाम से लोक उत्सव का वृहद आयोजन कला-संगीत प्रेमियों के लिये उत्साह जगाने वाला और जनमानस को झकझोरने वाला था। व्यापारिक मण्डी के अलावा तमाम तरह के अड्डों में बदलते जा रहे हल्द्वानी भाबर में इस प्रकार के आयोजन के सूत्रधार मनोज चन्दोला की जितनी प्रसंशा की जाए कम है। क्योंकि महोत्सव की बाढ़ में फंसे उत्तराखण्ड में इस प्रकार के आयोजन मुश्किल से हो हो पा रहे हैं। आयोजन को लेकर चिन्तन करने वालों में चारु तिवारी का योगदान सबसे आगे है। चन्दोला जी और तिवारी जी की जुगलबन्दी ने इस आयोजन को मूर्त रूप दिया और कई विचारधाराओं के लोगों को एकसाथ करने का काम किया। गीत-संगीत के अलावा संगीत-साहित्य के मर्मज्ञों को मंच देकर प्रोत्साहित किया।
अभिव्यक्ति कार्यशाला की ओर से देवभूमि उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत एवं लोक विधओं को सहेजने के लिये तीन दिवसीय आयोजन में दिन में सेमिनार और रात्रि में कार्यक्रम का हिस्सा था। कार्यक्रम का शुभारम्भ सांसद अजय भट्ट ने रैली को हरी झण्डी दिखाकर किया। शहर के तमाम विद्यालयों के बच्चों ने सुन्दर प्रस्तुतियों के साथ इसमें भाग लिया। मय झांकी के बच्चों ने रंग बिरंगे परिधनों में अपनी अभिव्यक्ति की। शेष तो वही होना था जो उन्हें उनके विद्यालय में तैयार करवाया गया था। सनातन धर्म संस्कृत महाविद्यालय, सिंथिया स्कूल, ललित आर्य महिला इण्टर कालेज, बीयरशिवा, रा.मा.विद्यालय नया गांव लछमपुर, द्रोण पब्लिक स्कूल, गांध्ीनगर राजकीय मा.विद्यालय, एमबी इण्टर कालेज, लक्ष्मी शिशु मन्दिर, खालसा इण्टर कालेज, रा.पूर्व.मा.विद्यालय कालाढूंगी रोड, टिक्कू माडर्न, रा.इण्टर कालेज बनभूलपुरा, महात्मा गांध्ी इण्टर कालेज के विद्यार्थी रैली में शामिल थे। आयोजन स्थल पर स्वयं सहायता समूहों की ओर से स्टाल भी लगाए गये थे। कार्यक्रम में रेशमा शाह ने जौनसारी, प्रहलाद मेहरा ने कुमाउनी गीत प्रस्तुत किये।
सेमिनार में उत्तराखण्ड की वर्तमान सांस्कृतिक परिस्थितियों पर बोलते हुए अनिल कार्की ने कहा कि इसे अपने से शुरु करना होगा, तब दूसरों से कहने के हकदार हैं। प्राध्यापक डाॅ.प्रभा पन्त ने कहा कि संस्कृति और पलायन बाधा नहीं है। जितना पलायन होगा उतना विस्तार होगा। कवि और साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली ने कहा कि भगनौल, बैर गीत हमसे दूर होते जा रहे हैं, जो चिन्ता की बात है। पत्रकार और चिन्तक ओ.पी.पाण्डे ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन संस्कृति के आधर पर हुआ था लेकिन सरकार ने आज तक संस्कृति को बचाने का रोड मैप तक तैयार नहीं किया है। लोेक गायक हीरा सिंह राणा ने ‘मुख में लागी ताई’ व्यंग गीत से कालाकारों की पीड़ा को व्यक्त किया।
दूसरे दिन के आयोजन में दिल्ली के भगवत मनराल ग्रुप का कार्यक्रम था। युगमंच की ओर से गोपुली बुब का एकाकी मंचन हुआ। नन्दलाल भारती टीम ने जौनसारी संस्कृति प्रदर्शित की। इसके अलावा फृयूजन के नाम पर शहर में हो रहे कनफ्रयूज करने वाले कार्यक्रम हुए। कार्यक्रम के अतिथि मेयर डाॅ.जोगेन्द्र रौतेला थे। इस दिन के सेमिनार में सिने कर्मी हेमन्त पाण्डे ने कहा कि लोक संस्कृति सरकार नहीं, संस्कार से बचेगी। संगीतज्ञ डाॅ.पंकज उप्रेती ने महोत्सवों के नाम पर हो रहे छलावे पर चिन्ता व्यक्त की। नन्दलाल भारती ने कहा कि आर्थिक उदारीकरण होने के बाद अपसंस्कृति का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। डाॅ.माध्ुरी बड़थ्वाल ने कई शानदार उदाहरण देकर अपने लोग गीतों को बचाने का आहवान किया।
समारोह के तीसरे यानी अन्तिम दिन भगवत मनराल व साथियों के अलावा अमित गोस्वामी, दीपा नगरकोटी, मनोज चड्ढा, रोहन भारद्वाज, करिश्मा, खुशी जोशी ने प्रस्तुति दी। आयोजन के तीनों दिनों में शहर की स्थानीय संस्थाओं ने प्रस्तुतियां दीं। जिसमें शास्त्राीय संगीत को लेकर फृयूजन कहा गया लेकिन संगीत की दृष्टि से वह खरा नहीं कहा जा सकता है। दरअसल अपने प्रचार के लिये व बहलावे के लिये इस प्रकार के प्रयोग किये जाने लगे हैं जिसमें गायन, वादन, नृत्य के धमाल को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। चूंकि सीखने वाले बच्चे वही करने लगते हैं जो उन्हें बताया गया है सो वह एक शो के रूप में भीड़ के आगे परोस दिया जाता है। ऐसे में न शास्त्रीयता होती है और न लोक का नृत्यगीत। तीसरे दिन के सेमिनार में उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना और यथार्थ विषय पर वक्ताओं ने विचार रखते हुए संघर्षश्ीाल ताकतों को आगे आने को ललकारा। कवि बल्लीसिंह चीमा ने कविता के माध्यम से अपना दर्द कहा- ‘मैं किसान हँू, मेरा हाल क्या, मैं तो आसमां की दया से हँू।’’ उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पी.सी. तिवारी कहा कि राज्य गठन के बाद कांग्रेस और भाजपा के हाथ में प्रदेश की सत्ता आने से राज्य गठन की परिकल्पना ध्वस्त हो गई। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक रूप से राज्य पिछड़ गया। उत्तराखण्ड पत्रकारिता विभाग के प्रो.भूपेन सिंह ने कहा कि सरकारों ने पर्वतीय राज्य की अवधरणा को पूरी तरह मटियामेट कर दिया है। नया भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग उभर रहा है। सत्ता में बदल-बदल कर आ रहे इन चेहरों ने समाज को भी भ्रष्ट बना दिया है। एंकर आरजे काव्या ने कहा कि हमारी संस्कृति के संरक्षण के लिये हमें स्वयं ही पहल करनी होगी। पत्रकार रूपेश ने कहा कि 10 साल के राज्य में मूल्यांकन का समय है। आयोजन के दौरान डाॅ.प्रयाग जोशी, नवीन वर्मा, मोहन बोरा, हेमन्त बोरा, अमिशा पाण्डे, नवीन पाण्डे, योगेश पन्त, विजय बिष्ट, टीसी उप्रेती, दीपक बल्यूटिया, प्रवीन रौतेला, भावना पन्त, प्रकाश भट्ट, लता कुंजवाल, कमल मठपाल, जीत राम, ललित पन्त, बबीता उप्रेती उपस्थित थे।

कुमाउँ विश्वविद्यालय को याद नहीं आ रहे हैं संस्थापक कुलपति

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
कुमाउँ विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति, भौतिक विज्ञानी प्रो.डी.डी.पन्त का जन्म शताब्दी समारोह उनके चाहने वाले, उनके साथी, उनके शिष्य ध्ूमधम से मना रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय पन्त जी को भूल ही गया। इसके अलावा किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह पहाड़ के इस विवि प्रशासन से कह सके कि आयोजन के लिये आगे आओ। महान भौतिक विज्ञानी, कुविवि के कुलपति, उक्रांद के संस्थापक, समाज विज्ञानी प्रो. पन्त की याद में विवि में कुछ होना ही चाहिये, ऐसी मंशा सभी की है परन्तु अपनी कारगुजारी के लिये बेहद चर्चा में बने हुए इस विवि इस बारे में कुछ सोच भी सकता है ऐसा अभी नहीं लगता। कारण विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.एस.राणा को विश्वविद्यालय से ज्यादा उत्तराखण्ड की चिन्ता हो रही है। उनके कई चर्चित बयान सबकी जुंवा पर हैं। साथ ही विवेकानन्द, रविन्द्रनाथ टौगोर को लेकर वह कुछ नया करने की बात कर रहे हैं। पूर्व प्रधानीमंत्री अटल जी के नाम पर भी एक विभाग का नाम रख दिया गया है। लगता है राणा जी बहुत दूर की सोच कर चल रहे हैं शायद तभी उनके बयान भी आते-आते जारी हो गये थे। स्व.डी.डी.पन्त जो पहाड़ के बारे में सोचते थे, विज्ञान के बारे में सोचते थे, समाज के बारे में सोचते थे, उनपर सोचने के लिये अब विवि के पास अवसर ही नहीं है। ऐसे समय में जबकि प्रो.पन्त की जन्म शताब्दी समारोह पर दांये बांये कई गतिविधियां हुई, विवि मौन रहा।
उल्लेखनीय है कि प्रो.पन्त के शताब्दी समारोह को भव्य बनाने को लेकर नैनीताल में बैठक हुई थी और पिछले कुलपित प्रो. डी.के. नोडियाल ने विवि की ओर से इस बारे में सकारात्मक बात दोहराई थी। हालांकि बैठक करवाने वाले नैनीताल के लोग, पन्त जी से जुड़े लोग, उनके शिष्य, उनके चाहने वाले, समाजसेवी थे। समय गतिमान है। प्रो.नोडियाल को कुविवि की लीला जितनी समझ आती उससे पहले उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। दरअसल कुलपति अकादमिक कार्य करने वाले थे और वह प्रशासनिक कार्यों में राजनीति का घोल नहीं बना पा रहे थे। इसके बाद प्रो.राणा को कुलपति बनाकर भेजा गया। आगरा निवासी राणा के आने से पहले ही चर्चा फैल गई कि बहुत पकड़ वाले हैं। अब स्थायी कुलपति के लिये चल कार्यवाही में भी इनकी बात सबसे आगे है। उत्तराखण्ड राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिये यूपी के तीन मैदानी जिलों को इसमें मिलाने का बयान देने वाले प्रो. राणा शायद पता न हो कि प्रो.डी.डी.पन्त वैज्ञानिक होने के साथ ही समाजविज्ञानी थे। समाज की व्यवहारिकता को जानते थे और इसी लिये उन्होंने उत्तराखण्ड क्रान्तिदल में रहना पसन्द किया। राजनीति से दूर पन्त जी पहाड़ के दर्द को जानते थे। इसीलिये तमाम अवसरों के बावजूद वह नैनीताल में ही रहे और अन्त में हल्द्वानी में रहने लगे थे।
कुलपति डाॅ. डी.डी.पन्त के जन्म शताब्दी समारोह को लेकर पहाड़ सहित अन्य संस्थाओं ने शुरुआत की। यहाँ पर सबसे पहले आशुतोष उपाध्याय का उल्लेख करना जरूरी है क्योंकि डी.डी. पन्त को लेकर वह शुरु से ही कुछ करते रहे हैं। उनके सद्प्रयास से डी.डी.पन्त खोजशाला के रूप में गतिविधियां होती रहती हैं। बेरीनाग में इस प्रकार के आयोजन वह करवाते रहे हैं। अन्य स्थानों में भी वैज्ञानिक सोच पैदा करने के लिये वह संस्था के रूप में संलग्न हैं। आशुतोश उपाध्याय की सोच पहले से इस ओर थी कि प्रो.पन्त जैसे महान व्यक्ति को भुलाया जाना गलत होगा, कुछ होना चाहिये। इस बीच शताब्दी समारोह आयोजन को लेकर जो श्रृंखला शुरु हुई उसमें बेरीनाग, काण्डा, हल्द्वानी, पिथौरागढ़ में लोग जुटे। संस्था चाहे कोई हो, पन्त को समझने वाले लोगों का जुटना बड़ी उपलब्धि कहा जायेगा। इसी क्रम में हल्द्वानी में हुए आयोजन में वक्ताओं ने कहा कि डाॅ. पन्त जैसे व्यक्तित्व कभी कभार ही पैदा होते हैं। उन्होंने कुमाउँ विश्वविद्यालय को जिस तरह से अकादमिक उँचाईयों पर पहँुचाया, वह आज भी एक उपलब्धिहै। डाॅ.पन्त को अपने देश व समाज से बहुत ही प्यार था, इसी कारण से उन्होंने अमेरिका में अपना भविष्य तलाशने की बजाय भारत में ही रहना पसन्द किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महापौर डाॅ. जोगेन्द्र पाल सिंह रौतेला ने कहा कि डाॅ. पन्त हमारी विशिष्ट पहचान थे। उनका कुमाउँ विश्वविद्यालय से जुड़ा रहना हमारे लिए गौरव की बात रही है। उन्होंने अपने निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों को उच्चकोटि के शोध् कार्य करवाए। वरिष्ठ पत्रकार राजीवलोचन साह ने कहा कि उत्तराखण्ड के विकास को लेकर उनकी अपनी अलग सोच थी, इसी छटपटाहट में वह यूकेडी से भी जुड़े जबकि वह राजनीति से वास्ता नहीं रखते थे। पन्त के मायने आज भी समझने की जरूरत है। प्रो. शेखर पाठक ने उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डाॅ.पन्त नैनीताल के डीएसबी कालेज में भौतिक विषय के संस्थापक रहे। उन्होंने प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो.सी.वी.रमन के निर्देशन में भौतिकी में अपना शोध् पूरा किया। प्रो.रमन ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें भविष्य का वैज्ञानिक घोषित किया था। बाद में अपनी प्रतिभा के कारण ही उन्हें एक फेलोशिप के लिये अमेरिका जाने का अवसर मिला। वहाँ शोध् करने के दौरान उन्हें अमेरिका के अनेक उच्च कोटि के संस्थानों ने अपने यहाँ नौकरी करने का अनुरोध् किया। पर डाॅ.पन्त ने अमेरिका में अच्छी सुविधओं वाली नौकरी करने के बजाय अपने देश और अपनी मातृभूमि उत्तराखण्ड लौटना स्वीकार किया। अपने इसी प्रण के कारण उन्होंने कुमाउँफ विवि के सहारे यहाँ की उच्चशिक्षा को एक नया आयाम दिया।
प्रो.गिरिजा पाण्डे ने कहा कि डाॅ.पन्त को समझना और जानना अपने पूरे समाज को समझने और जानने की तरह है। उनके शताब्दी समारोह के बहाने हम पूरे पहाड़ को भी पूरी समग्रता के साथ समझ सकते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो.कविता पाण्डे ने कहा कि भौतिक विज्ञान के क्षेत्रा में उनके द्वारा किये गये शोध् कार्यों को हमेशा याद रखा जायेगा। प्रो. बीएस बिष्ट पूर्व कुलपति, प्रो. केसी जोशी पूर्व कुलपति, प्रो. एचबी त्रिपाठी, प्रो.प्रीति गंगोला जोशी, डाॅ.आई.डी. पाण्डे, ध्नेश पाण्डे, हृदयेश मिश्रा, प्रो.प्रभात उप्रेती, उमेश तिवारी विश्वास, ओपी पाण्डे ने डाॅ.पन्त की स्मृतियों को श्रोताओं के सम्मुख रखा। जन्म शताब्दी समारोह में हरीश पन्त, जगमोहन रौतेला, ओ.पी.पाण्डे, दिवाकर भट्ट, बबीता उप्रेती, प्रदीप लोहनी, मयंक जोशी, सहर्ष पाण्डे, अनिल कार्की, पंकज उप्रेती, विनोद जीना, रेखा जोशी, सतीश जोशी, पंकज पाण्डे, सुनील पन्त, कर्नल आलोक पाण्डे, पूरन बिष्ट सहित तमाम लोग थे।

टलकपुर से टनकपुर का सफर

कभी तो लहर आयेगी इस माल-भाबर में

चन्द्र सिंह वृजवाल
चम्पावत/टनकपुर। टनकपुर का ‘मिशन हाउस’ 19वीं शताब्दी के उत्तराद्ध में निर्मित, यह शहर के उत्तर पूर्व में शारदा नदी के तट पर स्थित है जो आज इस जर्जर हालत में भी अपने शहर के समृद्ध इतिहास और नैसर्गिक सुन्दरता का गवाह है।

उत्तराखण्ड राज्य बने वर्षों बीत चुके हैं लेकिन पुरानी मण्डी और पहाड़ के प्रवेश द्वार के रूप में विख्यात टनकपुर विकास की रफ्रतार नहीं पकड़ सका। माँ पूर्णागिरी का प्रवेश द्वार भी टनकपुर है। फिर भी उम्मीद है कि कभी तो लहर आयेगी इस माल-भाबर क्षेत्र में।

यह नेपाल की सीमा से लगा एक छोटा सा गाँव था। यहाँ से तीन मील की दूरी पर ब्रह्मदेव मण्डी थी, जिसे कत्यूरी राजाओं ने बसाया, कालान्तर में भूस्खलन होने के कारण ब्रह्मदेव मण्डी समाप्त हो गई। और इस नगर का निर्माण 1898 में नेपाल की ब्रह्मदेव मण्डी के विकल्प के रूप में किया गया था। आंकड़ों की बात करें तो सन् 1901 में इसकी कुल जनसंख्या मात्र 692 थी।
सर्वप्रथम सन् 1890 में एक अंग्रेज सैलानी मि. टलक यहाँ आया और उन्हें इस स्थल की प्राकृतिक सुन्दरता ने बेहद प्रभावित किया और उन्होंने सबसे पहले बगडोरा ;सैलानी गोठद्ध में आवास के लिये एक बंगला बनवाया और ध्ीरे-ध्ीरे सुनियोजित ढंग से कस्बे को स्थापित किया। आगे चलकर इस कस्बे को टलक के नाम से ‘टलकपुर’ कहा जाने लगा। कालान्तर में शहर के तस्वीर के साथ नाम के उच्चारण में भी बदलाव आया और इतिहास को नजरअंदाज करते हुए स्थानीय लोगों ने टलकपुर को टनकपुर कहना प्रारम्भ कर दिया। मुड़ कर देखें तो देश की आजादी के साथ शहर के नाम का विवाद भी दफन हो गया।
यहाँ की सुनियोजित ढंग से निर्मित बाजार, चैड़ी खुली हुई सड़कें, फैले हुए फुटपाथ, खुली हवादार कालोनियां इसकी विशिष्टता वयां करता है। पूर्णागिरी मन्दिर के मुख्य द्वार के रूप में शारदा नदी के तट पर बसा यह कुमाउँ की प्रमुख मण्डी ;व्यापारिक केन्द्र था, जहाँ कत्यूरी शासन से लेकर देश की आजादी के कई वर्षों बाद तक जोहार, दारमा और व्यास घाटियों के भोटिया ;शौका, नेपाल से नेपाली, देश के मैदानी क्षेत्र से व विदेशी व्यापारी यहाँ आकर व्यापार करते थे। टनकपुर ब्रिटिश शासन भारत में कुमाउँ का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था। क्षेत्र के स्थानीय उत्पादों में इमारती लकड़ी, कत्था, पेड़ों की छाल, शहद और अन्य छोटे जंगली उत्पाद आदि शामिल थे, जिनका व्यापार नवम्बर और मई के बीच होता था। यहाँ भोटिया ;शौका व्यापारी तिब्बत से उन और सुहागा नीचे लाया करते थे, और बदले में शक्कर व कपड़े वापस ले जाते थे। दूसरी ओर चीनी, नमक, हल्दी, मिर्च और घी अल्मोड़ा और नेपाल के पहाड़ी बाजारों से आयात किया जाता था। 19वीं शताब्दी के  उत्तराद्ध में यहाँ अवध्-तिरहुत रेल कम्पनी द्वारा पीलीभीत टनकपुर रेल लाइन निर्माण किया गया जो चम्पावत तथा पिथौरागढ़ के लिये अन्तिम रेलवे स्टेशन है।

यद्यपि इस शहर ने अनेक मुश्किलों के दौर देखे हैं किन्तु अब यह शहर रेलवे बड़ी लाइन व राष्ट्रीय राजमार्ग से देश के प्रमुख शहरों से जुड़ने के बाद बहुत उम्मीदों के साथ आगे बढ़ रहा है। यहाँ पर्यटन, व्यापार व परिवहन क्षेत्र में रोजगार वृद्धि की पूरी सम्भावना है। टनकपुर अब ध्ीरे-ध्ीरे शिक्षा-चिकित्सा व यातायात के कारण विशेष आकर्षण केन्द्र बन गया है।

संघर्षमय रहा जिनका पूरा जीवन

पत्रकारिता के मिशन को जिस लगन से स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने शुरू किया था, उसे बनाये रखने वाली कमला उप्रेती की 15 सितम्बर 2019 को प्रथम पुण्यतिथि है।
जिन्दगी को आन्दोलन बना चुके आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते हुए आपने किसी से कोई शिकायत नहीं की। जिन्दगी के सफर में रोग-शोक से लड़कर भी बच्चों को हौंसला दिया। घर-परिवार और गाँव के सारे लोगों को आपका ममतामयी स्पर्श हमेशा बांधे रहा। अपने सीमित साधनों में घर-गृहस्थी चलाते हुए सामाजिक आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका आपने निभाई। बहुत विपरीत स्थितियों में भी आपके बोल संस्कारों से भरे थे। ‘जशौदा मैया तेर कन्हैया बड़ो झगड़ी, झन लगाया गोरु-ग्व्ाला हमन दगड़ी’ जैसे भजनों से लेकर होली के आशीष तक के गीत गाने वाली इस माँ ने जीवन की सच्चाई को हमेशा सामने रखा और गुनगुनाया- ‘संग्राम जिन्दगी है लड़ना इसे पड़ेगा….।’
66 वर्ष की आयु में अन्तिम सांस तक अपने मिशन के लिये जिस साहस से आप लड़ीं वह चिंगारी बुझ नहीं सकती है। पिघलता हिमालय का यह अंक आपको समर्पित।

पत्रकार ऐसे ही नहीं बन जाते हैं

स्व.कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि पर सम्पादकीय
आज जब पत्रकारिता की बात होती है तो इसे बहुत हल्के में लिया जाता है, कारण इसे बना ही ऐसा दिया गया है। पत्र और पत्रकार जन चेतना के अग्रदूत होते हैं। उनसे आन्दोलन और आन्दोलन से वह होते हैं। उनका पठन-पाठन और उनके संस्कार उनकी कलम में दिखाई देते हैं। वर्तमान में जब समाचार-संदेश देने के लिये द्रुतगामी व्यवस्थायें हैं पत्रकारिता जगत में हलचल मच चुकी है। होड़ में जल्द से जल्द समाचार परोसने और कारोबार को बढ़ाने के लिये विज्ञापनों के लिये सर माथा पीटने का अभियान चल पड़ा है। समाचार पत्रों की दयनीयता इससे ही समझी जा सकती है कि उन्हें बाजार में स्थापित होने के लिये नित नये अभियान चलाने पड़ रहे हैं। प्रबुद्ध पाठक चर्चा करने लगा है कि अखबार में समाचार पढ़ें या विज्ञापन। कई पेजों के विज्ञापन का पुलिन्दा और उपर से सैकड़ों नामों से भरी कोई सूचना या चटपटी प्रस्तुति को आज का युवा पत्रकार पत्रकारिता बता रहे हैं। यदि कोई पत्रकारिता के ज्ञान को लेकर प्रयोग करना चाहे तो उसके लिये शायद ही किसी मीडिया घराने के दरवाजे खुलें, क्योंकि भीड़ में अपनी मुंडी उपर निकालने के लिये सार्टकट रास्ता तलाशा जा रहा है। ऐसे में साहित्य की पत्रकारिता वाली धारा की बात हो ही नहीं सकती है। यदि कोई अपने आप से हिम्मत करता है तो वह छोटे या मझले समाचार पत्रों की श्रेणी में है। ऐसे समाचार पत्रों के सामने चुनौती ज्यादा हैं। तुरन्त लाभ के लिये कोई भी सरकार उन समाचार पत्रों को चुनने लगी है जिसे वह तत्काल विज्ञापन देकर अपनी बात मनवा सके। ऐसा ही लाभ निजी संस्थान व धन्धेबाज भी चाहने लगे हैं। यदि नहीं चाहते हैं तो उन्हें विज्ञापन के लिये मजबूर किया जा रहा है। सोचनीय है कि आजादी के 70 साल बाद भी भीड़ में खड़े रहने के लिये इतना ही साहस बटोर सके हैं हम।

पत्र और पत्रकारिता के लिये मिशन का होना जरूरी है। इस मिशन को यदि हम स्वीकारते हैं तो पूरी ईमानदारी जरूरी है। लेकिन क्या हमारी व्यवस्था का ढांचा ऐसा होने दे रहा है? वह कागजों में उलझाये रखना चाहता है और सारे मीडिया घराने चिल्लाते हैं- ‘नम्बर वन’। इन सबके बाद भी पत्रकारिता के मिशन को बनाये रखने के लिये दुनिया में बहुत से महानुभाव संकल्पित हैं। उन्हीं में से थीं- कमला उप्रेती। किसी की जिन्दगी पूरी तरह संग्राम बन जाती है और इस संग्राम में जो लड़ता है वह योद्धा है। ऐसी ही योद्धा थी ईजा। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उसने जुड़ी अनगिनत यादें हैं। ‘पिघलता हिमालय’ को बनाने में ईजा का घोर संग्राम रहा है। यह कहानी 1964 से शुरु हो जाती है जब स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी ने छापाखाना खोला। पहले छापाखाने की बहुत इज्जत हुआ करती थी। ‘शक्ति प्रेस’ नाम से खुले छापाखाना में बाईडिंग, परफेटिंग, रूलिंग, कम्पोजिंग, प्रिंटिंग हर प्रकार का काम होता था। इसी छापेखाने में बहुत बड़ी टेªडिल मशीन हुआ करती थी, पूरे ट्रक के बराबर। जिसमें दैनिक पिघलता हिमालय भी छपा। बाद में छोटे आकार की टैªडिल मशीन वगैरह भी प्रेस में लगाई गईं। इन मशीनों में अनगिनत मशीनमैन, कम्पोजिंग में अनगिनत कम्पोजिटर रहे हैं। छापाखाने मे प्रतिस्पद्र्धा नहीं थी और शादीकार्ड, बिलबुक इत्यादि के ग्राहकों के अलावा लिखने-पढ़ने वालों का अड्डा छापाखाने ही हुआ करते थे। आजकल तो प्रिंटिंग प्रेस लिखना आसान हो चुका है। और प्रतिद्वंद्वी अपने ग्राहकों को ढूंढने के लिये दौड़ते हैं, सरकारी काम के लिये तिकड़मबाजी करनी पड़ती है। पहले पोस्टर, पर्चे, कार्ड छपवाने वालों में आन्दोलनकारी, समाज सेवी, पुस्तकें-फोल्डर-पर्चे छपवाने के लिये लेखक, कुछ खास-खास लोग शादीकार्ड छपवाने के लिये छापेखाने तक आते थे। प्रेस की बड़ी जिम्मेदारी थी और लोगों को भरोसा था कि उनकी गलतियों को भी सुधर कर छापा जायेगा। तब एफएस, एफोर, एथ्री जैसे कागज साइजों को नहीं जानते थे बल्कि रिमों के साइजों के बाद कागज कटिंग होती थी। आज भी बड़े छापेखानों में यही होता है। खैर, बात पिघलता हिमालय की हो रही थी। 1978 में पिघलता हिमालय शुरु हुई, बहुत उत्साह था आनन्द बल्लभ उप्रेती जी और दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी में। इनका जोश अखबार को दैनिक में तक बदल गया। लेकिन जीवन के संग्राम में यह उलझ कर रह गये। दुर्दिनों की वह कहानी बहुत लम्बी है………….

कमला उप्रेती ने अपने पति के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर छापाखाना और अखबार सींचा। लोहे की उन भारी मशीनों की खटखट आवाजों में कागज को मशीन में लगाने और उठाने में सावधनी चाहिये। कई ऐसे अवसर थे जब कमला जी मशीनमैन आनन्द बल्लभ जी के साथ हैल्पर बनी। तब आजकल की तरह सुविधाएं और साधन भी नहीं थे। डाक से जाने वाले अखबारों में पते लिखने में भी वह सहायक थी। अखबार की प्रूफरीडिंग का काम भी वह करती और कभी लिखने बैठ जाती। पत्रकार बनने की शुरुआत ही पठन-पाठन के अलावा कम्पोजिंग से होती थी जैसे आजकल कम्प्यूटर की जानकारी जरूरी है। उप्रेती जी के निधन के बाद उन्होंने पत्र का सम्पादन किया। समय बदला है लेकिन हमारे मूल्य और संस्कार बने रहने चाहिये। पत्रकारिता के कोई मायने होते हैं। इसकी पवित्रता बनी रहे, इसका मिशन बना रहे, इसका आन्दोलन चलता रहे। इसके लिये आम पाठकगण को भी विचार करना चाहिये। आज ईजा स्व. कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि में उनका स्मरण हमें खुशी और आँसू के साथ साहस दे रहा है। उसकी जिद, उसकी लगन, उसका संघर्ष हमें याद दिलाता रहेगा कि योद्धा संग्राम में विचलित नहीं होते।