चाय बागान के नाम से मचता रहा हल्ला और बस गया शहर

पुराना चाय कारखाना

 

बेरीनाग चकोड़ी

पि.हि. प्रतिनिधि
सुरम्य नगरी बेरीनाग और चैकोड़ी के चाय बागान की भूमि को अपने कब्जे में लेने की सरकार की घोषणा के बाद से क्षेत्र में हलचल मची है। यह हलचल भय के साथ उम्मीदों भरी है। भय इस मायने में कि जो लोग अतिरिक्त जमीन दबाकर बैठे हैं उन्हें हिसाब देना होगा। और उम्मीद इसलिये जग रही है कि चाय बागान के नाम दर्ज भूमि के बाहर होते ही इस पर काबिज हो चुके लोग सरकार पर दबाव बना सकते हैं। इसकी तैयारी भी की जा रही है। विधयक मीना गंगोला भी जनता के इस पक्ष पर खड़ी हैं। सरकार के पफैसले से सहमे लोगों को तब ध्ैर्य हुआ जब विधायक ने कहा कि चाय बगान के कब्जेदारों को मालिकाना हक मिलेगा। सरकार ने भी इसी मंशा से फैसला लिया है। विधायक के बयान के बाद बेरीनाग और चकोड़ी में जमीन कब्जेदारों में राहत है और अनुमान लगाया जा रहा है कि जमीन की लीज समाप्त होने के बाद बागवान की भूमि से मालदार परिवार का नियंत्राण पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। सरकार के अधिपत्य में आने के बाद लोगों को मालिकाना हक मिलने में कोइ रुकावट पैदा नहीं होगी। सरकार जनहित में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाकर यहाँ रह रहे पन्द्रह हजार से अधिक परिवारों को मालिकाना हक दे सकती है।
विधयक भले ही लोगों के बीच जाकर आश्वासन दे चुकी हैं लेकिन यह देखने की बात है कि चाय बागानों पर मालदार परिवार का नियंत्रण है होने के कारण इस पर बसे लोगों को मालिकाना हक देने के मामले में हमेशा से ही पंेच फंसता रहा है। सरकार के फैसले के बाद लोगों को बेघर होने का भय भी सता रहा है। सरकार के फैसले से मचे हड़कम्प के बाद लोग विधायक से मिले। भाजपा के मण्डल अध्यक्ष ध्ीरज बिष्ट कहते हैं कि भूमि विवाद पर नया फैसला ऐतिहासिक है। विश्वास है कि सरकार लोगों के हितों को देखते हुए मालिकाना हक जरूर देगी।
उल्लेखनीय है कि कभी चाय बागानों के लिये मशहूर बेरीनाग व चैकोड़ी में दानसिंह-मोहनसिंह बिष्ट मालदार के परिवार का दबदबा रहा था और बेसकीमती जमीन पर चाय का कारोबार होने के साथ ही विदेश तक चाय सप्लाई होती थी। ग्रामीण परिवेश में रहने वालों का और चाय बागान के मालिक के बीच तालमेल ही ऐसा था कि भूमि से किसी को कोई परेशानी नहीं। समय के साथ-साथ मालदार परिवार फैलता गया और गाँव भी तरक्की के लिये फैलने लगे। कई लोगों ने मालदार परिवार के सम्पर्क में रहकर बेरीनाग व चैकोड़ी मुख्य जगहों पर अपने रहने का ठिय्या बना लिया। आगे चलकर कुछ ने खरीद की और कुछ को दान में भूमि दे दी गई। जमीन की इस बांट में चायबागान का हल्ला मचता रहा और समानान्तर शहर बसता चला गया। मालदार परिवार की शाखाएं भी इतनी ज्यादा फैल गईं कि किस जमीन पर क्या होने जा रहा है, सारा हिसाब-किताब रखना आसान नहीं था। बाद के कुछ समय में कुंवर महिराज सिंह ने चैकोड़ी में जमीन को खूब बांटा। बहुत से लोग उनके प्रशंसक बन गये। आज बेरीनाग ठसाठस भर चुका है और चकौड़ी में शिक्षा का केन्द्र बनने के साथ ही रिसोर्ट, होटल, रेस्टोरेंट, आवास बन चुके हैं।
सरकार ने बेरीनाग और चैकोड़ी में चाय बागान की करीब 1047 हेक्टेयर भूमि वापस ले ली। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने इसके लिये आदेश जारी किये। उनका कहना है कि यह भूमि चाय बागान के लिये दी गई थी लेकिन इसका उपयोग चाय उत्पादन के लिये नहीं हुआ और इस भूमि पर अवैध् कब्जे हो रहे हैं।
इसी भूमि को लेकर कोर्ट में वाद चल रहे हैं। चाय बागान के लिये दी गई भूमि सीलिंग एक्ट में नहीं थी। राजस्व ने इसे फी सिंपल इस्टेट ;ऐसी भूमि जिसके स्वामी को भू उपयोग के अधिकार प्राप्त हो माना और पाया कि चाय बागान के विकास के लिये ही यह भूमि गाँव के लोगों को दी गई थी। यह भी पाया गया कि अधिकतम स्रोत सीमा आरोपण अधिनियम ;सीलिंग एक्ट के तहत इस भूमि के लिए राज्य सरकार ने छूट भी प्रदान की थी। बेरीनाग प्रशासन ने मामले की जाँच की तो पाया कि भूमि पर कब्जे हो रहे हैं और मकान-दुकान तक बना लिए गए। प्रशासन ने भूमि की खरीद- फरोख्त पर रोक लगाई तो मामला हाईकोर्ट पहँुचा। बताया जाता है कि जिन खातेदारों के पास चाय के बगान के लिए भूमि थी, उन्होंने अन्य लोगों को यह जमीन रजिस्ट्री, दाननामा और स्टाम्प पेपर पर इकरारनामा कर बेच दी। इसके लिये राज्य सरकार की अनुमति नहीं ली गई। भूमि की खरीद- फरोख्त पर रोक के लिये जिला और उच्च न्यायालय में मामले पहँुच गये।

 

पंचायतीराज एक्ट पर बहस, जगह-जगह प्रदर्शन

नियम प्रधानों के लिये क्यों?

कार्यालय प्रतिनिधि
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव सामने है और उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रस्तुत किये गये पंचायतीराज एक्ट पर आम और खास के बीच बहस जारी है। विरोध् तेज होता देख पंचायतीराज संशोधन बिल 2019 विधनसभा की ओर से राज्यपाल को भेजा गया। राज्यपाल बेबीरानी मौर्य को बिल प्रेषित करने के साथ ही विधनसभा का सत्रावसान भी हुआ। सरकार अपना तर्क रखती रही है और जनसंख्या नियंत्रण और शिक्षा की दृष्टि से इसे महत्वपूर्ण बताया गया परन्तु इस नियम को केवल पंचायत व्यवस्था पर लागू करने का विरोध् होने लगा है। यहाँ तक की इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया जा रहा है। कई जगह प्रदर्शन भी हुए हैं। देहरादून में इस बिल के विरोध् में पंचायत जन अध्किार रक्षा मंच नाम से अस्तित्व में आये नये संगठन ने महामहीम राज्यपाल से अपील की है कि उक्त संशोधन बिल पर हस्ताक्षर न करें और इसे पुर्नर्विचार के लिये सरकार को लोटा दें। कहा कि यदि बात नहीं बनी तो हाईकोर्ट जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। कांग्रेस इस आन्दोलन के मौके पर जुटी हुई है और भाजपा रास्ते तलाश रही है। एक्ट में किए गए संशोधन के खिलाफ प्रधन संगठन ने मोर्चा खोल दिया है।प्रधानों ने संशोधन को जन प्रतिनिधि विरोधी बताते हुए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ने की चेतावनी दी है। इस सम्बन्ध् में राज्यपाल को ज्ञापन भी प्रेषित किया गया।
शासकीय प्रवक्ता मदन कौशिक कहते हैं कि कांग्रेस का विरोध् पूर्वाग्रह से ग्रसित है। जिस वक्त सदन में यह बिल पारित हो रहा था कांग्रेस ने हंगामा किया जबकि बेहतर होता वह संशोधन की मांग करते। यदि वाकेई कोई खामी रह गई है तो उसे दूर कर लेंगे। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का कहना है कि सरकार ने पंचायत में सुधर के लिये बड़ा कदम उठाया है। देर-सवेर विधनसभा और लोकसभा में भी यह व्यवस्था होनी है। यदि कोई खामी है तो दूर होगी।
पूर्व मुख्यमंत्राी हरीश रावत ने पंचायती राज एक्ट में हुए संशोधन को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा पर निशाना साध है। हरदा कहते हैं- बड़े-बड़े मंत्री फर्जी डिग्री वाले हैं, लेकिन प्रधनों से डिग्री की मांग हो रही है। उन्होंने कहा है कि व्यवहारिकता को ध्यान में रखकर फैसला होना चाहिये। हाईस्कूल की बाध्यता से सभासद नहीं मिलेंगे। पंचायत एक्ट में तीन बच्चों पर चुनाव रोक व शिक्षा की सीमा का प्रावधन राजनीति से प्रेरित है। यदि सरकार को यही सब करना थ तो डेढ़ वर्ष पहले करना चाहिये था।
चम्पावत में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जिलाध्यक्ष उत्तम देव की अगुवाई में जुलूस निकालते हुए सीएम का पुतला फूंका। पूर्व विधयक होमेश खर्कवाल ने कहा कि प्रदेश सरकार ने आनन-पफानन में इस एक्ट को पारित कर दिया है। इसमें दो बच्चों के प्रावधन का खुलासा होना चाहिये और यह कब से लागू हो यह तय होना जरूरी है। नहीं तो ऐसे कई दावेदार जिनकी तीसरी औलाद होने वाली है, वह भू्रण हत्या का शिकार हो सकती है। उनका कहना है कि केवल पंचायत में यह एक्ट लागू करना सियासत का षड़यंत्र है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।
अल्मोड़ा में आगामी पंचायत चुनाव को लेकर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने खुलकर अपनी भड़ास निकाली और लोकसभा चुनाव की हार पर चिन्ता जाहिर की। साथ ही पंचायत चुनाव से पहले पंचायती राज एक्ट के फार्मूले पर प्रदेश सरकार की आलोचना की। बैठक में हरीश रावत और डाॅ.इन्दिरा हृदयेश ने सभी से एकजुटता की अपील की ताकि पंचायत और आगामी विधनसभा चुनाव में बाजी मार सकें।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना है कि सरकार आधी-आधूरी तैयारी के साथ पंचायत राज संशोधन बिल लाई। इसमें उठ रहे सवालों का कोई जबाब सरकार के पास नहीं है। सबसे बड़ी कमी दो बच्चों की शर्त पर कट आॅफ डेट का न होना है।
हल्द्वानी में प्रदेश प्रधान संगठन की बैठक में पंचायत राज एक्ट में किए गए संशोधन को राज्य सरकार द्वारा जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि सरकार प्रदेश में पहले शिक्षा का स्तर ठीक करे तब इस तरह के अध्यादेश जारी करे। देहरादून में हुई संगठन की बैठक में प्रधन संगठन ने इस एक्ट पर आपत्ति दर्ज की है। जिलाध्यक्ष कुन्दन सिंह बोहरा ने कहा कि कई पंचायतों में पांचवी तक शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालय तक नहीं हैं। संगठन के प्रदेश महामंत्री रितेश जोशी ने कहा कि पंचायत चुनाव लड़ने के लिये शिक्षा को जरूरी करने, दो बच्चों वाला अधिनियम शिक्षा के स्तर में गुणात्मक सुधर करने तक कारगर नहीं हो सकता। उन्होंने विध्ेयक पर संशोधन करने की मांग की।
लोहाघाट में भी एक्ट में संशोधन से त्रिस्तरीय चुनाव में अयोग्य घोषित करने के राज्य सरकार के फैसले का विरोध् करते हुए प्रदर्शन हुआ है। एसडीएम को ज्ञापन सौंपते हुए पूर्व की तरह पंचायती चुनाव करवाने की मांग की गई। ग्राम प्रधान संगठन के ब्लाक अध्यक्ष चाँद सिंह बोहरा के नेतृत्व में प्रधनों ने एसडीएम को ज्ञापन देकर कहा कि राज्य सरकार ने पंचायतीराज एक्ट में किए संशोधन में त्रिस्तरीय चुनाव में प्रत्याशी को दो बच्चों की सीमा रखी है, जो न्यायसंगत नहीं है। जब कोई एक्ट पास होता है तो उसकी समय सीमा तय होती है। पिथौराढ़ में भी विरोध् प्रदर्शन हुआ। विभिन्न संगठनों ने डीएम कार्यालय पहँुचर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। किसान संगठन के अध्यक्ष सुनील जोशी ने कहा कि देश की संसद अनपढ़ और कम पढ़े-खिले नेता चला रहे हैं। इस नियमों को पहले विधनसभा और संसद में लगाया जाए। कनालीछीना में ग्राम प्रधन संगठन के ब्लाक अध्यक्ष जानकी उपाध्याय के नेतृत्व में बैठक हुई। जिसमें सरकार को चेतावनी दी गई। परिणाम चाहे जो हो, पंचायतीराज संशोधन बिल से सरकार की किरकिरी खूब हुई है।

फुस्स एच.एम.टी.

अपनी-अपनी जमीन नपाई कर रहे हैं विभाग, कर्मी परेशान

कार्यालय प्रतिनिधि
हल्द्वानी। कभी रोजगार के बड़े सपने के साथ शुरु हुआ एचएमटी घड़ी कारखाना रानीबाग फुस्स हो चुका है। इसकी बन्दी को लेकर लम्बे समय से तैयारी चल रही थी लेकिन एनडी तिवारी समेत तमाम नेताओं के दबाव में इसे पाल रखा था। कर्मचारी यूनियन के आन्दोलनों और नेताओं के आश्वासन के बाद धीरे-धीरे कर्मी भी टूटते गये और लगभग सौ कर्मचारी ही इसकी टूटी बिल्डिंगों में डेरा डाले हुए हैं। उजाड़ दिखाई दे रही एचएमटी कालौनी को देख हर कोई उदास होगा क्योंकि जिन अरमानों के साथ एकमुक्त भूमि में इतना बड़ा कैम्पस बनाया गया था, उसका हाल खराब है। कुछ भवन तो धरासायी होने की स्थिति में हैं। ऐसे में स्टाफ क्वार्टर में रह रहे परिवार काफी परेशान हैं। बताया जा रहा है कि एचएमटी प्रबन्धन उनका पीएपफ सैलरी का मार्च तक का हिसाब नहीं कर रहा है। बेंगलुरु स्थित एचएमटी प्रबन्धन ने नोटिस देकर क्र्वाटर खाली करने के निर्देश अतिरिक्त दे डाले हैं। एचएमटी कामगार संघ अध्यक्ष भगवान सिंह ने बताया है कि प्रशासन और वन विभाग अपनी-अपनी भूमि की नापजोख कर रहा है। साथ ही क्वार्टर में बिजली-पानी की समस्या भी है। ऐसे में कर्मचारी अपने भविष्य को लेकर परेशान हैं। जानकारी मिली है कि वन विभाग ने उक्त पफैक्ट्री को जो 33.33 एकड़ भूमि लीज पर दी, उसे वापस लेने की तैयारी है। सर्वे के बाद विभाग अपनी भूमि को लेगा। दूसरी ओर राज्य सरकार रानीबाग एचएमटी से अपनी 14 एकड़ भूमि लेने को नापजोख करवा चुकी है। बन्द हो चुकी फैक्ट्री से भूमि लेने के लिये जिला प्रशासन चैकन्ना है। बताते चलें कि 15 में शुरु हुई एमएमटी फैक्ट्री की स्थापना के लिए वन विभाग और राज्य सरकार ने लीज पर भूमि दी थी। फैक्ट्री का एक बड़ा हिस्सा एचएमटी प्रबन्ध्न ने स्वयं खदीदा था। 22 मार्च 2019 को पैफक्ट्री में अन्ततः ताला लगाना पड़ा। ऐसे में वन विभाग ने अपनी भूमि वापस ले ली। प्रबन्धन की 45.62 एकड़ भूमि के लिए नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन काॅरपोरेशन ने ई-टेंडर मंगाए हैं। साथ ही प्रशासन 13-14 एकड़ भूमि को कब्जा लेने के लिये सक्रिय है।

‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के 42वें साल में

गीता उप्रेती

इस अंक के साथ ही ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के 42वें साल में पहँुच चुका है। सन् 1978 में स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया ने जिस साहस और दृढ़ता के साथ इसकी शुरुआत की वह आज भी नियमित रूप से आपके सामने है। अपने लम्बे सफर में हमने संघर्ष किया है लेकिन वह मिशन जिसके लिये इसे स्थापित किया गया था जारी है। ऐसे समय में जबकि संचार व समाचार के अनगिनत साधन हैं, पिघलता हिमालय जैसे छोटे समाचार पत्र को बनाये रखना चुनौती है। फिर, स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया के मिशन पर इसे बनाये रखना और भी कठिन है लेकिन इस मिशन को चुनौतियां स्वीकार हैं। यही कारण है कि समाचार-विचार की दुनिया को रंगीन बनाकर परोसने के बजाए अपनों को जोड़ने का यह साधन है।
दुर्गा सिंह जी मात्रा 49 वर्ष आयु में इस दुनिया से विदा हो गये थे और उप्रेती जी भी 69 वर्ष आयु में हमें छोड़कर चले गये। इसके बाद श्रीमती कमला उप्रेती ने स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद दृढ़ता के साथ इस मिशन को निर्भीकता और स्वाभिमान के साथ बढ़ाया परन्तु नौ माह पूर्व वह भी 66 वर्ष की आयु में अचानक विदा हो गईं। ऐसे में एक बार फिर से हमारे सामने घोर संकट है लेकिन दिनोंदिन बढ़ती जा रही प्रतिस्पद्र्धा के बीच समय से इस पाती को परोसते हुए हमें लगता है स्व.उप्रेती, स्व.मर्तोलिया, श्रीमती कमला जी हमारे बीच हैं। उन्हीं का स्मरण करते हुए लगातार इसे आकर्षक बनाने की कोशिश की जा रही है। साधनों के आभाव के बावजूद दूरस्थ क्षेत्रों तक अपने प्रिय पाठकों के बीच पिघलता हिमालय पहँुच रहा है। इसे आॅनलाइन पढ़ने की व्यवस्था भी की गई है ताकि दूर तक समय से हमारा सन्देश पहँुचे और नई तकनीक से जुड़ी युवा पीढ़ी अपने प्रिय पत्र को आसानी से पढ़ सके। यूट्यूब चैनल सहित अन्य माध्यमों से भी पिघलता हिमालय को रफ्रतार दी है।
समय की धरा में हर हाथ मोबाइल है और हर क्षण की खबर। साथ ही विज्ञापनों की दुनिया में ‘जो दिखता है, वह बिकता है’ चल रहा है। फिर भी हमें नहीं भूलना चाहिये कि परम्परा और विश्वास हमेशा रहेगा। घोर संकट के समय भी हमारे संस्कार और हमारा विश्वास हमें उबरने में सहायक होता है। पिछले कुछ वर्षों से सरकार की विज्ञापन नीति में छोटे-मझले समाचार पत्रों को अवसर नहीं दिया जा रहा है। विज्ञापन का स्वाद बड़े मीडिया घरानों को लगाया जाता है ताकि नेताओं के बड़े और रंगीन फोटो प्रिंट मीडिया में छपें और इलक्ट्रोनिक मीडिया में दिखाये जाते रहें। इसे मीडिया मैनेजमेंट कहा जाने लगा है। हर प्रायोजित कार्यक्रम के पीछे बड़ा स्वार्थ जुड़ा है। अखबार की ऐसी फैक्ट्री में मिशन पीछे छूट जाता है और विज्ञापन का काबड़खाना शुरु हो जाता है। इस प्रकार के वातावरण में मिशन की पत्रकारिता सिर्फ अपने पाठकों के बल पर की जा सकती है।
प्रिय पाठको! आप ‘पिघलता हिमालय’ परिवार हो, आप ही इसके प्रतिनिधि हो, आप ही इसके विज्ञापनदाता हो, आप ही इसके प्रचार-प्रसार वाले भी। तभी आज ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के इक्तालिस साल पूरे कर चुका है। इसका सारा मैनेजमेंट सीमान्त से लेकर तराई-भाबर तक पफैले हमारे शुभचिन्तक हैं। उन स्थितियों में जब साप्ताहिक पत्रों का रिवाज ही लडखड़ा चुका है, पाठकों में पिघलता हिमालय का इन्तजार इसकी गहरी जड़ों को सिद्ध कर रहा है। इसके पाठकगण एक परिवार के रूप में जुड़े हैं, उनका भावनात्मक लगाव इससे जुड़ने और अपनी अगली पीढ़ी को जोड़ने में सहायक है। आपका यही स्नेह हमारा बल है। इसे आगे बढ़ाने में आप सुध्ी जनों से सहयोग की अपेक्षा है।

प्रकाश पन्त : एक सेवाभावी फार्मेसिस्ट, जो बना जनप्रिय नेता

हेम पन्त

जुलाई 2017 में GST लागू हुआ, उस महीने के अंतिम हफ्ते में रुद्रपुर के एक होटल में लगभग 250 व्यापारी और उद्योगकर्मियों को तत्कालीन वित्तमंत्री प्रकाश पन्त GST के बारे में समझा रहे थे। लगभग 1 घण्टे में उन्होंने तार्किक तरीके से, पुष्ट आंकड़ों की मदद से अपनी बात रखी और लोगों के प्रश्नों के स्वयं उत्तर दिए। मंत्री जी के बाद कर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी अपनी बात रखने के लिए आए। कर अधिकारी ने अपनी बात इन शब्दों से शुरू की – “जिस तरह से मंत्री जी ने GST के बारे में आपको समझाया है, उसके बाद मेरे कहने के लिए कुछ नहीं बचता”। सिर्फ 59 साल के ऐसे योग्य और अनुभवी राजनेता का असमय निधन उत्तराखंड राज्य के लिए बहुत बड़ी क्षति है।

11 नवम्बर 1960 को एक सामान्य परिवार में जन्मे प्रकाश पन्त जी ने द्वाराहाट से फार्मेसी की पढ़ाई के बाद फार्मासिस्ट के तौर पर लगभग 4 साल तक सरकारी सेवा की। अपने बचपन में निष्काम भाव से पिथौरागढ़ शहर और आसपास के गांवों में गरीबों की सेवा करते हुए मैंने भी उन्हें देखा। तब पन्त जी हमारे गांव-पड़ोस में देर शाम तक बीमार, अशक्त लोगों को दवाई देते हुए और इंजेक्शन लगाते हुए अक्सर दिख जाते थे। पिथौरागढ़ सेना छावनी में ठुलीगाड़ नामक जगह पर एक छोटे से कमरे में उनकी फार्मेसी क्लिनिक पर जितनी भीड़ लगती थी, उतनी शायद ही पिथौरागढ़ शहर के किसी डॉक्टर के पास लगती होगी। उनकी बहुत कम मूल्य की (और अक्सर मुफ़्त भी) दवाइयों के बारे में ग्रामीण लोग अक्सर कहते थे – “हमको तो पन्त जी के हाथ की दवाई ही असर करती है”। सौम्यता, मधुर मुस्कान, कोमल स्वर और लोगों के बीच घुलमिलकर रहना उनका मूल स्वभाव था और यह अंत तक बना रहा।

अपनी सरकारी नौकरी के दौरान वह कर्मचारी यूनियन से जुड़े और उत्तराखंड के कई हिस्सों में विभिन्न जनआंदोलनों में सक्रिय रहे। बाद में नौकरी छोड़कर पिथौरागढ़ के जिला अस्पताल से थोड़ी सी दूरी पर ‘पन्त फार्मेसी’ नाम से दवाइयों की दुकान शुरू की। खड़कोट क्षेत्र से पिथौरागढ़ नगर पालिका के सदस्य बनकर उन्होंने अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। उत्तराखंड राज्य बनने से पहले वह उत्तर प्रदेश की विधान परिषद के सदस्य बने और सन 2000 में राज्य स्थापना के बाद उत्तराखंड विधानसभा के प्रथम विधानसभा अध्यक्ष निर्वाचित किए गए। 2002 से 2007 और 2017 से मृत्युपर्यन्त पिथौरागढ़ के विधायक रहे। उनके जीवन में 2 बार उत्तराखंड राज्य के मुख्यमंत्री बनने के मौके आए, लेकिन दोनों बार वह राजनैतिक समीकरणों के कारण चूक गए। समय-समय पर उत्तराखंड सरकार में वित्त, संसदीय कार्य, पर्यटन, पेयजल, आबकारी और गन्ना सहित अनेक मंत्रालयों में उत्कृष्ट कार्य किया। दिखावे और सिफारिशी नेतागिरी से वह यथासम्भव दूर रहते थे और राज्यभर में धरातल पर सार्थक कार्य कर रहे लोगों के बारे में खुद जानकारी जुटाकर मिलने की कोशिश करते थे। देहरादून में पन्त जी के मंत्री आवास के वेटिंग रूम में चिपकाई गई एक निवेदनपूर्वक पर्ची से उनके सरल स्वभाव का अंदाजा आसानी से लग जाता है। इस पर्ची पर लिखा है – “कृपया मेरे सामने मेरी प्रशंसा व दूसरों की आलोचना न करें।”

पिथौरागढ़ शहर और आसपास के ग्रामीण लोगों के लिए प्रकाश पन्त जी एक पारिवारिक सदस्य जैसे थे। लगभग 35 वर्षों की निस्वार्थ सेवा के कारण अपने क्षेत्र के युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं के बीच वह एक चहेते नेता के रूप में लोकप्रिय रहे। पिथौरागढ़ में इंजीनियरिंग कॉलेज, हवाई सेवा, पेयजल योजनाओं और हर गांव में उनके व्यक्तिगत प्रयासों से किए गए अनेक छोटे-बड़े विकास कार्यों के कारण वह अपने क्षेत्र की जनता के दिलों पर राज करते हैं। कुशल-तार्किक वक़्ता और अध्ययनशील प्रकाश पन्त जी उत्तराखंड ही नहीं पूरे देश के राजनैतिक परिदृश्य में एक साफ छवि के राजनेता के रूप में पहचाना जाता है।

राजनीति में रहते हुए भी वह अन्य गतिविधियों में खासे सक्रिय रहे। एक कवि और लेखक के रूप में उन्होंने 4 चर्चित पुस्तकें लिखीं। राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भाग लिया और पदक भी जीते। अपने सार्वजनिक जीवन में वह जनता के लिए सदैव उपलब्ध रहे। राज्य या देश के किसी भी स्थान पर उनसे कोई भी आसानी से मिल सकता था। उत्तराखंड राज्य के वरिष्ठतम मंत्री के पद पर रहते हुए भी वह अपने मोबाइल पर हर पल लोगों की समस्याएं सुनते थे और यथासम्भव समाधान भी करते थे। छोटे-बड़े कार्यक्रमों में सिर्फ एक फोन के बुलावे पर राज्य के कोने-कोने में पहुंचने वाले नेता के रूप में लोग उनको लंबे समय तक याद रखेंगे।

ऐसे दौर में जब लोग राजनीति में स्वच्छ छवि वाले सेवाभावी लोगों की कमी होती जा रही है, उस समय प्रकाश पन्त जी जैसे सर्वप्रिय नेता और जनता के हितैषी व्यक्ति का आकस्मिक निधन उनके परिवार-पार्टी या उत्तराखंड की ही नहीं, पूरे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

भातर-तिब्बत व्यापार के वह दिन खूब थे

कृष्ण सिंह  व विशन सिंह  से बातचीज

डाॅ.पंकज उप्रेती
सीमान्त वासियों की उस पीढ़ी को भारत- तिब्बत व्यापार के पुराने मीठे दिन आज भी याद हैं जिसमें उन्होंने भागीदारी की या उसे देखा। अपनी पुरानी यादों के साथ वह वर्तमान की तुलना करते हैं और चाहते हैं कि बदलाव तो प्रकृति का नियम है परन्तु उनकी विरासत बनी रहे, उनके बुजुर्गों ने जिस परम्परा को वर्षों सहेजे रखा नई पीढ़ी उसे भूले नहीं। इन्हीं सब बातों को लेकर 81 वर्षीय कृष्ण सिंह गब्र्याल और 68 वर्षीय विशन सिंह गब्र्याल जी से बातचीत हुई।
कृष्ण सिंह जी बताते हैं कि गाँव में बचपन की पढ़ाई के बाद सन् 1951 कक्षा 6 में पढ़ने के लिये पांगू गये। उनकी पाठशाला जीवन-जगत का व्यवहार था। देखा-देखी वह अपने बुजुर्गों के साथ भारत-तिब्बत व्यापार में जुट गये। सारे परिवार अपना-अपना सामाना लेकर तिब्बत जाता थे। हिन्दुस्तान से सारा सामान तिब्बत को जाता था और वहाँ से मुख्य रूप से उन लाते थे। सन् 1962 में चीन आक्रमण के बाद सीमान्त का यह व्यापार बन्द हो गया। उससे पहले आपसी व्यापार की सुन्दर परम्परा थी। आने-जाने में कोई रोक नहीं थी। किसी प्रकार का टैक्स वहाँ नहीं पड़ता था। गाँव में घर-घर टैक्स जमा करते थे। भारत- तिब्बत व्यापार बन्द हुआ तो गाँव में टैक्स जमा होना भी बन्द हो गया। सन् 1992 में नेपाल के रास्ते व्यापार हुआ तो उसमें भारतीय व्यापारियों ने नेपाल के व्यापारियों को सामान दिया। उन्होंने बहुत कमाया। अब पुराने समय का जैसा व्यापार नहीं होता था। पहले समय में तो जितना सामान जो भी तिब्बत मण्डी जाता वह सब बिक जाता था। भारत-तिब्बत व्यापर के वह दिन खूब थे। सीमान्त के व्यापारियों के पास नकद रुपया भले ही उतना न हो लेकिन मान सम्मान के साथ सामग्री बहुत थी। परिवार के परिवार अपने कारोबार से खुश थे।
कृष्ण सिंह जी बताते हैं कि एक ओर सन् 62 में सीमान्त का व्यापार बन्द हो गया दूसरी ओर सन् 1966 में गब्र्यांग में भूस्खलन से जमीन ध्ंसती रही और खतरा बढ़ने लगा। ऐसे में मुख्यमंत्री एन.डी.तिवारी ने तराई में सितारगंज के पास बसने के लिये भूमि दी। जिसमें सिद्ध गब्र्यांग ग्राम बसा। शुरुआत में सीमान्त के परिवारों को नई जगह आने में दिक्कत हुई। क्योंकि ठण्डे इलाके के रहने वालों को भीषण गर्मी में रहने की आदत नहीं थी। तराई की भीषण गर्मी में ढलने में परिवारों को काफी समय लगा। वर्तमान में सिद्ध गब्र्यांग में परिवार रहते हैं और अपनी परम्परा के अनुसार रीति-रिवाज मनाते हैं। पूजा व अन्य विशेष अवसरों पर अपनी घाटी में जाते हैं।
विशन सिंह गब्र्याल अपने बचपन को याद करते हुए कहते हैं तब साधन नहीं थे। सुगम मार्ग नहीं थे, उनमें जानवरों के साथ पूरा लाव-लस्कर जाता था। धारचूला से गब्र्यांग जाने में ही सप्ताह भर लग जाता था। जाते समय आधे रास्ते में सिंखोला गाँव में परिवार 10-12 दिन रुकते थे और उनके जानवर हरी घास चरते थे। आजकल आने-जाने में रुकावट नहीं है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में यातायात के साध्न और मार्ग हैं। गाँवों से पलायन के बारे में वह कहते हैं कि किन्हीं कारणों से जो लोग बाहर बस चुके हैं वह लौटकर नहीं जा पाते हैं क्योंकि उनकी नई पीढ़ी पढ़ाई-नौकरी इत्यादि कारणों से वहीं की होकर रह जाती है। इन सबके बाद हमारी कोशिश है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहें। इसके लिये तमाम अवसरों पर लोग मिलन समारोह के जरिये एक-दूसरे से मिलते रहते हैं, सहयोग करते हैं।

रोहित की मौत की गुत्थी सवालों से घिरी है

पि.हि. प्रतिनिधि
रोहित शेखर उस युवा का नाम है जिसने चार बार के मुख्यमंत्री और राज्यपाल रहे नारायणदत्त तिवारी सेे लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद जीत गया था लेकिन वह छोटी उम्र में हार गया। माता उज्जवला और पिता एनडी तिवारी के पुत्र रोहित शेखर ज्यों ही अपनी निजी लड़ाई में सफल हुए और एनडी के उत्तराधिकारी के रूप में समाज के सामने आये, राजनीति के झूले में सवार दिग्गज डोलने लगे थे। विशेषकर नैनीताल लोकसभा सहित तराई की विधनसभा सीटों पर तिवारी जी चाहने वाले रोहित को घेरकर चलने लगे और माना जा रहा था वह किसी न किसी तरह जीत दर्ज कर रास्ता बना लेंगे। रोहित हवा का रुख एक ओर गया गया था। कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टी के अलावा निर्दलीय मौका उनके पास था।
पिता-पुत्र के मिलन के बाद कुछ नेताओं को परेशानी महसूस होने लगी थी कि अब रोहित के प्रकट होते ही वह मौका पा जायेगा। तिवारी जी भी पुत्र मोह में रोहित के लिये अवसर बनाने लगे थे लेकिन अपनी निजी जिन्दगी के पन्नों से जो घाव उन्हें मिले थे, ऐसे में कोई भी पार्टी उन्हें अपनाने में परहेज कर रही थी। कांग्रेस पार्टी के सिपाही के रूप में उम्र बिताने वाले एनडी से कांग्रेसी नेताओं ने दूरी कर ली थी। यहाँ तक कि जिन लोगों को तिवारी जी ने पनपाया वह भी दूर भागने लगे थे। ऐसे में एक उनके पारिवारिक दीपक बल्यूटिया ने अपने साथियों के साथ मिलकर हल्द्वानी में आयोजन कर दिया। एनडी के जन्मदिन के इस भव्य आयोजन में उज्जवला-एनडी-रोहित सहित सभी पार्टियों के दिग्गज आये। समाजवादी पार्टी का जोश सबसे ज्यादा रहा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव पं. तिवारी को बहुत मानते रहे हैं। उनके सुपुत्र और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी बुजुर्ग एनडी का सम्मान करते। उनकी इच्छा थी कि आयोजन के बहाने रोहित सपा में सम्मिलित हो जाएं और उत्तराखण्ड में पार्टी का खाता खुले। यदि उस समय रोहित सपा के टिकट पर चुनाव लड़ जाते तो निश्चित रूप से एनडी के संरक्षण में वह हल्द्वानी या तराई की किसी विधनसभा सीट पर सफल हो सकते थे। कांग्रेस से झटके खा चुके एनडी की मंशा उसी पार्टी में रोहित को स्थापित करने की थी परन्तु अपने राजनैतिक भविष्य के लिये दूसरे नेता यह पचा नहीं सकते थे। इसके बाद भाजपा में रोहित के लिये कोशिश की गई लेकिन एनडी के व्यक्तिगत जीवन के पन्नों को उघाड़ते हुए इन दोनों पार्टियों ने रोहित को अवसर नहीं दिया। समय बीता और रोहित इन तीनों पार्टियों में से किसी में भी प्रत्याशी के रूप में अनफिट मान लिये गये। जबकि हवा का रुख एक ओर करने वाले इस युवा में कई सम्भावनाएं थीं। 11 मई 2018 को सुप्रीम कोर्ट में वकील इंदौर निवासी अपूर्वा शुक्ला के साथ इनका विवाह हुआ। पिता एनडी के अस्वस्थ्य होने के कारण यह विवाह बेहद सादे रूप में की गई और वर-बध्ू अस्पताल में पिता का आशीर्वाद लेने गये।
एनडी का परिवार बनने के बाद से रोहित लगातार अपनों के बीच जुड़े रहे और 11 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के मतदान के लिये बिन्दुखत्ता आए थे। अपनी माँ उज्जवला के स्वास्थ्य खराब होने के कारण वह दिल्ली लौटना पड़ा। जहाँ उनकी संदिग्ध् हालतों में मौत हो गई।

उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन.डी.तिवारी के पुत्र रोहित शेखर का 16 अप्रैल 2019 को निध्न हो गया। 39 वर्षीय रोहित डिफंेस कालौनी में रहते थे। उन्हें दिल्ली के मैक्स साकेत अस्पताल में लाया गया, जहाँ डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। उनकी मौत को संदिग्ध् मानते हुए सवाल भी उठाये जा रहे हैं। रिपोर्ट में उनके गले पर निशान बताये गये हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद कहा गया है कि रोहित को गला घोंटकर मारा गया। मौत वाले दिन रोहित की माँ अपने घर तिलक लेन स्थित सरकारी आवास पर चली गई थीं। दिल्ली पुलिस ने पीएम रिपोर्ट के आधार पर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है। अपराध् शाखा इसकी जाँच कर रही है। इस प्रकरण में शक परिवार पर ही है। चल रही जाँच के बाद पता चला कि रोहित और उनकी पत्नी अपूर्वा के बीच विवाद था। शादी से पहले दोनों लिव इन रिलेशनशिप में थे और बाद में शादी कर ली।
रोहित की माँ उज्जवला ने बताया कि रोहित तनाव में रहता था, जिस कारण उसे नींद तक नहीं आती थी। पुलिस ने छानबीन और पूछताछ में रोहित की पत्नी अपूर्वा, उज्जवला के चचेरे भाई राजीव उसकी पत्नी कुमकुम, घर के नौकर मारथा के साथ बात की है। रोहित तो मौत के मुंह चला गया लेकिन उसका जिन्दगी अपने आगे-पीछे सवाल ही सवाल छोड़ चुकी है। इस जीवन-जगत में कौन सत्य के कितने करीब है और स्वार्थो के लिये कौन किसके साथ जुड़ा रहता है। यह सब रोहित शेखर के जीवन से देखने को मिल रहा है। रोहित भी जीवन के बहुत सारे सत्य को नजदीक से देख चुका था इसलिये वह खुलकर जीना चाहता था, जब तक रहा भिड़ता रहा। उसकी मौत का सच सबको चैंकाने वाला है।

स्मृतिशेष की स्मृतियाँ : ताकि सनद रहे

पुस्तक समीक्षा

प्रयाग जोशी

विगत वर्ष यानी 2018 में लिखी गजेन्द्र सिंह पांगती की चाौथी किताब पढ़ने को मिली। यह किताब ‘धर्म राय: जोहार का जनसेवक’ शीर्षक से छपी है, जो 1889 में, मिलम में पैदा हुए थे और 1964 में उनकी मृत्यु हुई थी। जेठुवा शौका के लड़के धर्म सिंह को उनकी जाति-विरादरी के लोग बचपन में धरमू के नाम से जानते थे। जेठुवा का परिवार शौका समुदाय के औसतन खाते-पीते परिवारों से बेहतर स्तर का था। तेजू और धरमू दो भाई थे परन्तु माता-पिता की मृत्यु के बाद वह हैसियत नहीं रही। धरमू की तो पत्नी भी मर गई तो उसने उसकी बहन से दूसरी शादी की। जिससे एक लड़की हुई। दुर्भाग्य ऐसा रहा कि कुछ ही समय के बाद वह पत्नी और उससे उत्पन्न लड़की भी जीवित नहीं पह पाए। पिता के बखत का तिब्बत के साथ व्यापार के संग-संग चला आता बकरियों और घोड़ों की तिजारत व भारवाही का धन्धा भी चैपट हो गया। समय ऐसा आया कि पशुओं के नाम पर उसके पास सिपर्फ एक झुप्पू ही शेष रह गया। विपदा ऐसी आ पड़ी कि धरमू को, नीतिघाटी के मूल निवासी और पीपलकोटी के समीप भीमतल्ला गाँव में जाकर बसे हुए अपने मामा के आसरे जाना पड़ा जिससे उसे धन्धे में लगाने के लिए पाँच बकरियाँ दीं। उनकी पीठ पर सामान लाद कर, एक पूरे मौसम में उसने पीपलकोटी और जोशीमठ के बीच फेरी का काम किया और इतनी कमाई की कि उससे उसने अपने घर भैंसखाल आकर दस और बकरियाँ खरीदीं। तीसरी बार शादी की जिससे उसका घर व व्यवसाय जमा। उस सीजन के फायदे से, बहुत बाद के वर्षों में धरमू ने पीपलकोटी में पूरे शीतकाल की अवधि के लिए दूकानदारी भी शुरु की और उस अनुभव को काॅडा में भी दुहराया।
सम्भवतः वह बीसवीं सदी का दूसरा दशक रहा होगा जब ध्रमू ने अपने पुश्तैनी भारत-तिब्बत व्यापार में हिमालय के नाके के आर-पार आने का रूटीन पकड़ा होगा।
उन दिनों मिलम मार्ग से कैलास- मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के दलों को भी शौका व्यापारियों के साथ की जरूरत पड़ती थी जिनमें अधिकांश धनीमानी देशवासी और साधू-महात्मा हुआ करते थे। कठिन यात्रा थी। सुविधओं का अभाव था। धरमू सार्थवाही के साथ-साथ यात्रियों की सुख-सुविध भी जुटाते थे। उनकी सेवा-टहल करते। मिलम में उनके रहने-खाने और विश्राम की मनोयोग से व्यवस्था करते थे और कुँगरी-बिंगरी, उटाध्ुरा और जयन्ती पहाड़ों के उस पार तिब्बत में पड़ने वाली पहली बस्ती गेरती तक पहँुचाने में सहायता करते थे।
व्यापार का रुख व किस्मत अनुकूल होती गई। मेहनत, हुनर, ईमान व सेवाभाव की बलिहारी है कि पन्द्रह बकरियों की पूँजी से शुरु हुआ धरमू का कारोबार डेढ़ सौ से दो सौ बकरियों के रेबड़ तक पहुंचा। भारवाही बकरियों के अलावा लगभग उतनी ही भेड़ें भी उसके ख्वाड़ में भर गई जो उन उत्पादन का जरिया थी। उसके पास छः सात घोड़े-खच्चर हो गए। उसने भेड़ चराने के लिये अण्वाल, बकरियों के लिये ग्वाले, सामान चढ़ाने- उतारने के लिए ढकरियाल, घोड़ों के साईस, घरेलू काम के लिए नौकर-चाकर रखे। पशु-मवेशी और व्यापार की वृद्धि के साथ मुद्रा धन भी उत्तरोत्तर बढ़ता गया। 40 वर्ष की उम्र तक धर्मसिंह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता ही गया परन्तु चालीस की उम्र आते आते उसे दमे की शिकायत होने लगी थी तो उसने हिमालय के आर-पार की आवाजाही और मवासा लेकर मिलम-मुनस्यार से नघर इलाकों में आवत-जावत धीरे-धीरे कमतर कर दी। वे जून से सितम्बर तक मिलम में रहते थे जहाँ से वे तिब्बत के साथ होने वाले व्यापार का संचालन, कैलास मानसरोवर जाने वाले तीर्थ यात्रियों व साध्ु-सन्तों की सेवा व दवा-दारु का जनसेवा की भावना से संचालन भी करते थे। अक्टूबर-नवम्बर में वे मुनस्यारी आ जाते थे। पँूजी का इश्तेमाल ब्याज पर रिण देने में शुरू किया। यह साहूकारी का धन्धा था। इसकी बढ़त से उसने तिकसेन-मुनस्यारी, तेजम-भैंसकोट आदि ठिकानों में खेत खरीदने शुरु किये। भतीजे महिमन सिंह की हिस्सेदारी खरीदने के बाद तो धर्म सिंह के पास काफी जमीन हो गई जो तल्ला जोहार के कई गाँवों में फैली हुई थी जो साठ के दसक में जमीदारी उन्मूलन के एक्ट के अन्तर्गत् सीलिंग में आई थी।
धर्म सिंह अपने खेतों को काश्तकारी के लिए बटाई पर देता और बदले में उपज का अनाज वसूलता था। धरमू , सेठ तो था ही, जमीन के मालिकाने से शौको के समुदाय ने उसे धरमूसिंह सेठ की जगह धरम राय कहना शुरु कर दिया। ंअंग्रेजों ने, मैदानों में कायस्थ जमीदारों को ‘राय’ की उपाधि देने का चलन शुरु किया था। अंग्रेजी सरकार हजार-बारह सौ सालाना लगान के मालिकाने के भू-क्षेत्रों केा इनाम के बतौर देकर भी अपने चहेतों को भी ‘राय’ बना देती थी। लोगों में ऐसे राय बहादुरों का रूतबा हो जाया करता था। किशनसिंह रावत को सर्वे आॅफ इण्डिया के लए उत्कृष्ट काम करने के लिए झलतोला स्टेट देकर रााय साहबी से नवाजा गया था। धर्मसिंह को अपने व्यापारिक जोखिम से अर्जित पँूजी से खरीदी गई जमीन के एवज में अंग्रेज भला क्यों ‘राय साहबी’ देते। लेकिन शौका समुदाय में वह राय साहब प्रसिद्ध हो गए थे। परन्तु धरमू शब्द की पारिभाषिकता न ‘सेठ’ शब्द से सार्थक होती है न ‘राय’ से। सेठ-साहूकारी और जमीदाराना राय साहबी तो उसके लिए रोजी-रोटी व कुटुमदारी के लिए जुटाए गए ‘ऐसेट’ भर थे। उसने भौतिक माया के साथ धर्म की संगति को कितनी मानवीयता से जोड़ा, इस कत्थ्य को पांगीत ने ‘धर्मिक आस्था व कार्य, जन सेवा, मापांग और दूधपानी शीर्षकों के चार परिच्छेदों में विस्तार दिया है। ये धर्मसिंह के जीवन से जुड़े हुए गैर- व्यावसायिक लोकोपकारों के लेखे-जोखे हैं जिनको रेखांकित करने के लिए कौशल्या की सटीक स्मृतियाँ उल्लेखनी हैं।
‘उनका रिंगाल से बना एक कैश बाॅक्स था। वह बाहर से बाघ के खाल से मढ़ा हुआ था। उसे प्याटरी कहते थे। पूरे घर में एक ही प्याटरी थी। उसका ताला एक अंक का प्रयोग करने पर ही खुलता था। व बन्द होता था। समय के साथ बाबा की आँखें कमजोर हो गई थीं। मैं साथ में हुई तो ताला खोलने और बन्द करने का काम मेरा ही होता था। पैसा तो उसमें ज्यादा होता नहीं था लेकिन पैसा उधर लेने वाले आते रहते थे। मैं कहती पैसा तो है नहीं क्येां दे रहे हो। वे कहते थे जरूरतमंदों को देना भला होता है। कल कोई उधर चुनाने वाला भी आएगा। तब पैंसा आ आएगा।’ इसी तरह के विचारों से उनमें जनसेवा और परोपकार की भावना जागी और उन्होंने अपना समय और धन निःशुल्क दवा वितरण, सड़क निर्माण, मिलम गाँव में पानी लाने जैसे जनसेवा के कार्यों को समर्पित कर दिया था। यद्यपि वे ऐसे कार्यों की शुरुआत अपनी दूसरी पत्नी व मृत- पुत्री के स्मारक के रूप में एक धर्मशाला का निर्माण करके बहुत पहले ही कर चुके थे। यह धर्मशाला मिलम से एक पड़ाव आगे समगों के बयाबान में बनाई गई थी जहाँ हिमालय के बकरिया बाटों में चढ़ने वालों को खुले आकाश में रात गुजारनी पड़ती थी। कोई-कोई टैंट लगाते या पत्थरों की आड़ या ओड्यारों में शरण ढूंढते थे।
धर्म सिंह नित्य सुबह शाम मिलम स्कूल से लगे विस्तृत मैदान और मिलम कचहरी में देखने जाते कि क्या कोई नया यात्री आया है। यात्री बहुधा उक्त मैदान में टैंट लगात थे। कुछ अकेले आने वाले साध्ू पांगती कचहरी में भी ठहरते थे। वे हर यात्री से अनुरोध् करते कि उनके घर भोजन करने आयें। साध्ु लोग तो निमंत्रण सहर्ष स्वीकार कर लेते लेकिन कुछ सम्पन्न यात्री असमर्थता जताते। जो भोजन के लिए नहीं मानते उनसे वे अनुरोध् करते कि कम से कम जलपान के लिए अवश्य आयें।
1936 के आसपास एक साध्ू के लिए धर्म सिंह ने पुरदुम में कुटिया बनाई थी। कौशल्या लिखती हैं, ‘हमने बचपन में किस्म-किस्म के साध्ुओं को देखा। कोई मौनी बाबा, कोई फलाहारी, कोई सिर पर ढेर सारी लट्टीधरी, कोई बहुत ज्ञानी, कोई बातूनी जिन्हें वे खाना खिलाते और कैलास व तीनध्ूरा पार करने के बारे में बताते थे। उन्हें, वे अपने घोड़ों व बकरियों के साथ भेज कर हिमालय पार कराते थे।
एक बार एक अकेली औरत कैलास जा रही थी। उस औरत को भाभियों के साथ रखा। वह पाँच दिन तक रही। जिस साध्ू के लिए उन्होंने पुरदुम में कुटिया बनाई थी, उसके लिए 15 नाली जमीनी खरीदी थी। वहाँ सुरई के सुंदर पेड़ जगाए थे। बाद में कुटिया के साथ धर्मशाला भी बनवाई।’ उक्त बाबा के संक्षिप्त वृत्त में योग के गूढ़ रहस्य पढ़ने लायक हैं।
सन् 60 के दसक में धर्मसिंह ने मिलम में भी एक नित्वाल का घर खरीदा था और उसे अपने लड़के बालमसिंह की याद में धर्मशाला के रूप में सुरक्षित कर दिया था। उन दिनों भैंसखाल से शामा होकर बागेश्वर को आने वाले रास्ते की सीधी चढ़ाई में प्यास के मारे लोगों के कंठ सूख जाया करते थे। निर्पाणी रास्ता था। धर्म सिंह ने बाखर धार में निज के खर्च से प्याउ बिठाया था। उसमें नियुक्त किया गया आदमी रामगंगा से अथवा रमारी के किसी नौले से कनस्तर में पानी भर लाता और बाॅखरधर में लाकर लोगों को पानी पिलाया करता था। धर्मसिंह ने इसी प्रकार बोग्ड्यार और मापांग के बीच अपने खर्च से अपेक्षाकृत बेहतर मार्ग का निर्माण करवाया था। इस रास्ते से चलकर पहाड़ी की चोटी पर पहँुचने वालों के लिए कुछ दिनों तक उसने चने चबेने के वितरण की भी व्यवस्था की थी। एक बोरी चना और स्टील के कंटेनर में चाय भरकर रखी रहती थी। एक आदमी दिन भर वहाँ मुश्तैद रहता था जिसकी मजदूरी धर्मसिंह देता था। आज की भाषा में ट्रेकरों के लिए जुटाई जाने वाली इस तरह की सार्वजनिक सेवाओं के तरीके, धर्मसिंह जैसे उदार और पर्वत प्रेमी बुजुर्ग के मौलिक मन में ही आ सकते थे। गांेखा गाड़ के पानी को गूल के निर्माण के जरिये मीलम गाँव में पहँुचा देना तो धर्मसिंह की अद्भुत और अचंभित कर देने वाली कार्य योजना थी। मलेथा की गूल निर्माण में जो पुरूषार्थ माधेसिंह भण्डारी ने कर दिखाया था वैसा ही पुरूषार्थ है यह धर्मसिंह का। फर्क सिर्फ एक है मलेथा में माधेसिंह के द्वारा पुत्र के बलिदान की जनश्रुति है। मीलम की पेयजल योजना धर्मवीर और दानवरी जनसेवक की चरितार्थता है। एक पहाड़ी को काटकर और गोरीगंगा जैसी बड़ी सदानीरा नदी के उफपर से लकड़ी के पनालों से मीलम गाँव में लाया गया पानी धर्मराय की जैजैकारी का कारक बना था।
भौगोलिक रूप से अति विकट और आध्ुनिक देश-काल में शून्य जमा पूँजी से सार्थवाही व्यापार प्रबन्ध शुरू करके अपनी जमात का यशभाजन बनने के उपरान्त थे, धरमू के व्यक्तिगत जीवन के महत्तर को पकड़ने की ईमानदार कोशिश की है गजेन्द्र सिंह पांगती ने। धर्मसिंह, लेखक के पितामह के भाई हैं परन्तु उसके लेखन में रिश्ता उपर नहीं है। उसमें न डींग है न अपने को महिमामंडित करने का प्रयास। यह धर्मसिंह की जीवनी तो है ही प्रकारांतर से शौका-जीवन के कत्थ्य को समूह- जीवन के विस्तार में इस ढंग से फैलाया गया है कि वह व्यक्ति की दास्तान होते हुए भी 20वीं सदी के शुरु के पचास वर्षों की शौका-समुदाय की जीवन- संधरिणी गाथा भी बन गई है। इसे, शौकों के महा-हिमालय के आर-पार चलने वाले व्यापार के साथ जोहार और भाबर के बीच चलने वाले तीन-तीन जलवायुओं में चलने वाले मवासा-मौजा परिवर्तन करते रहने की दुश्वारी के साथ उनकी विकसित हुए अर्थ-तंत्र के शास्त्रीय विवेचन की एक और किताब भी कह सकते हैं।
इस किताब का एक आधुनिक आयाम भी है। आजकल नौकरी और दूसरे धंधे के लिए लोगों की आवाजाही वैश्विक हो गई है। लोग जहाँ जा रहे हैं, वहीं घर खरीद कर बस जा रहे हैं। ऐसेे लोगों के संज्ञान में यह जानकारी रखनी जरूरी होती जा रही है कि उनके रक्त संबंधी, भाई-बिरादर कहाँ-कहाँ हैं, कैसे हैं और क्या कर रहे हैं। पैत्रिक गाँवों, नाते-रिश्तों और अपनी जड़-कंजड़ से जुड़ाव रखने वाले समझ-बूझदार लोग उन सारी सूचनाओं का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। इण्टरनेट व मोबाइलों की मदद से अपने वंशध्रों की सामूहिक सूचनाओं को एकत्रित करके दस्ताबेजी किताबों के प्रमाणिक वृहत्तर संस्करण भी छपकर आ रह हैं। इस किताब में भी कौम का दस्तावेजीकरण तो है ही, साथ ही उसका सामाजिक अध्ययन, उसकी कमियाँ, सांस्कृतिक संचेतना और उनके धर्म, नृवंश और इतिहास के तहकीकात की कोशिश है। लेखक ने जहाँ तक हो सका है पिष्ट-पेषण से बचने की कोशिश की है। लेखक की दिली इच्छा है कि शौकों पर अभी तक जितना व जो लिखा गया है उसका मूल्यांकन हो। जो खोजने को बचा हुआ है उसे खोजा जाय। उसकी जद्दोजहद 1950 के बाद अपने समाज में पैदा हुए बच्चों तक उन जातीय स्मृतियों को पहँुचाने की है जिनमें तिब्बत के साथ व्यापार करने की जोखिमें मित्रता पर आधरित व्यापार पथों पर गमनागमन, कौमी विशिष्ट जीवन शैली और कठिन जीवन-यापन से जुड़ी सहजता है। वक्त की विडम्बना है कि नयी पीढ़ी उसे विस्मृत करती जा रही है।

चुनाव 2019 : घूंसा सा जड़ रहे हैं

कार्यालय प्रतिनिधि

लोकसभा चुनाव के लिये पूरे देश में पार्टियों का प्रचार अभियान चल रहा है। प्रचार के इस अभियान में नम्बर पूरे पाने के लिये पार्टियों की कसरत हो रही है। ऐसे में उत्तराखण्ड की पांच लोकसभा सीटों को भी अपने पक्ष में करने के लिये पार्टियों का ध्यान है। मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा ज्यादा हाथ-पांव मार रहे हैं। इसके लिये स्टार प्रचारकों की झड़ी लगा दी गई है। वैसे तो नामांकन से पहले से ही बड़े कद वाले नेताओं का आना शुरु हो चुका था। अब सत्ता संग्राम में कौन कमी करेगा?
एक-दूसरे पर घूंसा सा जड़ रहे नेतागण तर्क-कुतर्क भी कर रहे हैं। अपने बयानों में वह इतनी हड़बड़ाहट में हैं कि उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा है सिवा अपने काम के। इसके लिये मोदी, राहुल, रापफेल, आतंकवाद, बेरोजगारी, चैकीदार, जुमलेबाजी, भ्रष्टाचार जैसे शब्दों को लेकर लाग-लपेट कर रहे हैं। देश के बड़े मुद्दों के अलावा पर्वतीय प्रदेश उत्तराखण्ड की बातों का उल्लेख करते हुए ‘ईजा-बाबू’ ‘दिदी-भुली’ का प्यारा सम्बोध्न सम्मोहन के लिये किया जा रहा है। वीर सैनिकों की भूमि होने के कारण पफौजी परिवारों को भी अपने पाले में करने का यत्न किया जा रहा है। किसानों, गरीबों को हर बार की तरह इस बार भी ललचाया जा रहा है। युवाओं को अपने पीछे चलाने के लिये चमक- दमक भी दिखाई जा रही है। इसके अलावा दो जून की रोटी में भटक से बहुत सारे लोग चुनाव को त्यौहार मानते हुए सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। नेताओं से लेकर पब्लिक तक हर कोई अपने-अपनी मुट्ठी बांधकर चल रहा है जिसके खुलते ही सारा खेल पता चल जायेगा। घूंसा सा जड़ रहे हैं- स्टार प्रचारक। इन्हें बताने और समझाने वाले नेता भी अपने विरोधी की काट के लिये गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं। चुनाव आयोग के सख्त निर्देशों के बाद यह भय जरूर है कि सोशल मीडिया में अनर्गल बयानबाजी न की जाए परन्तु अपनी भड़ास निकालने के लिये हर चाल नेताओें, छुटभैयों, पार्टियों द्वारा चली जा रही है। अपने सामने वाले को निशाना बनाने के लिये उनकी नई-पुरानी उघाड़ी जा रही है।
स्टार प्रचारकों में नरेन्द्र मोदी, राहुल गांधी, अमित शाह, प्रियंका, सोनिया, राजनाथ, योगी आदित्यनाथ समेत तमाम चेहरे सम्बोधन कर चुके हैं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्रियों और वर्तमान मुख्य मंत्री के साथ मंत्री, अभिनेता, संगठन के बड़े नेता और स्थानीय स्तर पर पकड़ रखने वालों का सम्बोधन सुनने को मिल रहा है। पूर्व मुख्य मंत्री हरीश रावत कहते हैं- यूपीए की सरकार केन्द्र में आने पर मोदी राज में चल रहे टैक्स टेरर से व्यापारी वर्ग को निजात मिलेगी। भाजपा का राष्ट्रवाद देश के करीब 12 हजार धनिकों का है जबकि कांग्रेस का राष्ट्रवाद सवा सौ करोड़ लोगों का है। श्री रावत ने कहा कि पांच साल तक जुमलेबाजी करने वाली भाजपा सरकार की उल्टी गिनती शुरु हो चुकी है। पूर्व विधनसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल कहते हैं कि भाजपा से आम जनता खिन्न है, जिसका परिणाम देखने को मिलेगा। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना है कि लोग कांग्रेस की तरफ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं। उनका आरोप है कि भाजपा पूरे सरकारी सिस्टम का प्रचार में दुरुपयोग कर रही है। ऐसे में देश के चैकीदार की विदाई तय है। उन्होंने कहा कि भाजपा के सत्ता में रहते हुए लोकतंत्रा को खतरा है।
केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के लोकसभा चुनाव प्रभारी थावरचंद गहलोत अपने सम्बोधन में कहते हैं यदि देश को विश्व गुरु बनाना है तो मोदी को दुबारा प्रधन मंत्री बनाना है। वह कहते हैं कांग्रेस ने 55 साल तक देश को लूटने का काम किया। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत कहते हैं कि मोदी सरकार की राष्ट्रहित की नीतियों से भाजपा एक बार फिर केन्द्र में काबिज होगी और नरेन्द्र मोदी दोबारा देश के प्रधनमंत्री बनेंगे। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू सांसद बीसी खण्डूरी के सवाल पर कहते हैं कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था और सरकार ने जो निर्णय लिया, उसके बारे में उन्हें पूरी जानकारी है। खण्डूरी को रक्षा समिति का सदस्य हमारी सरकार ने ही बनाया था। कांग्रेस इसे मुद्दा बना रही है। भाजपा के अजय भट्ट कहते हैं कि पीएम मोदी की बात पर जनता वोट देने जा रही है। भट्ट ने कहते हैं कि भाजपा की डबल इंजन की सरकार द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों को कांग्रेस पचा नहीं पा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भगतसिंह कोश्यारी का कहना है कि देश का चैकीदार जाग रहा है।
कांग्रेस के प्रदेश महामंत्राी एवं पूर्व दर्जा राज्यमंत्राी डाॅ.गणेश उपाध्याय ने कहा है कि केन्द्र सरकार द्वारा प्रधन मंत्री फसल बीमा के नाम पर बहुत बड़ा घोटाला किया जा रहा है। वह इसे राफेल से बड़ा घोटाला बता रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने कहा है कि हम सोनिया, राहुल और प्रियंका गांध्ी के सिपाही हैं। उन्होंने कहा कि हम प्रदेश की पांचों सीटें जीतेंगे, तभी कांग्रेस मजबूत होगी। टिहरी से उक्रांद के प्रत्याशी जयप्रकाश ने कहा कि राष्ट्रीय दलों को क्षेत्राीय जनता से कोई लेना-देना नही है। ऐसे में जनता को जमीन से जुड़े प्रत्याशियों को और सभी सच्चाईयों को समझ लेना चाहिये।
उत्तराखण्ड की पाँचों लोकसभा सीटों पर मुकाबला रोचक है। नैनीताल-उधम सिंह नगर सीट पर पूर्व मुख्यमंत्राी हरीश रावत और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के मैदान में उतरने से सबका ध्यान इस ओर है। इस सीट पर हरीश रावत ने पहले ही जाल बिछा दिया था और वह लोगों के बीच सक्रिय थे इसलिये उनका पलड़ा भारी दिखाई देता है। भाजपा की टीम मजबूत होने के कारण अजय भट्ट का बल बना हुआ है। सीट पर सात दावेदार हैं हरीश रावत कांग्रेस, अजय भट्ट भाजपा, नवनीत प्रकाश अग्रवाल बसपा, डाॅ.कैलाश पाण्डे भाकपा;माले, प्रेम प्रकाश आर्य, ज्योति प्रकाश टम्टा, सुकुमार विश्वास। यूकेडी से विजयपाल चैध्री प्रत्याशी बनाये गये थे लेकिन वह नांमाकन समय तक सम्बोधित दस्तावेज न ला सके जिस कारण उनका नामांकन नहीं हुआ। नैनीताल सीट पर पर्वतीय मूल का बहुसंख्यक मतदाता होने के कारण रावत और भट्ट अपने अपने तरीके से उन्हें साधने लगे हैं। इसके अलावा उध्मसिंह नगर जिले को मिलाकर हर वर्ग के मतदाताओं को रिझाना इनके लिये आसान नहीं है।
अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट पर भाजपा कांग्रेस के पुराने चेहरों पर ही मुकाबला है। भाजपा के अजय टम्टा और कांग्रेस के प्रदीप टम्टा बीच मुख्य मुकाबला माना जा रहा है। सीट पर उपपा की एडवोकेट विमला, बसपा से सुन्दर धैनी, उक्रांद के के.एल.आर्या, द्रोपदी वर्मा, सज्जन लाल याने कुल प्रत्याशियों ने नामांकन करवाया है। कांटे की टक्कर अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट पर है क्योंकि बागेश्वर-चम्पावत जिले भी इसमें हैं और दोनों टम्टा अजय-प्रदीप से कहीं कोई तो कहीं कोई ग्राम नाराज चल रहे हैं।
पौड़ी लोकसभा सीट की घमासान भी देखने लायक है। कांग्रेस प्रत्याशी मनीष खण्डूरी और भाजपा के तीरथ सिंह रावत समेत 9 प्रत्याशियों ने यहाँ हैं। कांग्रेसियों ने भाजपा पर जनरल खण्डूरी का अपमान का आरोप लगाते हुए मनीष के समर्थन में वोट मांगे हैं। ऐसे में भाजपा के पास तीरथ सिंह रावत मजबूत प्रत्याशी के रूप में हैं। यूकेडी से शान्ति प्रसाद भट्ट, दिलेन्द्रपाल सिंह, मुकेश सेमवाल, रामेन्द्र भण्डारी, विनोद प्रसाद नौटियाल, भागवत प्रसाद, आनन्दमणि जोशी इस सीट पर जोर आजमा रहे हैं। बीसी खण्डूरी जिस प्रकार से भाजपा में गुमसुम हो चुके थे उसका पूरा मौका कांग्रेस ने उनके सुपुत्र मनीष को टिकट देकर उठाया है। बांकी तो परिणाम ही बतायेंगे कि जनता के मन में क्या थी।
टिहरी लोकसभा सीट पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह समेत 12 प्रत्याशी हैं। भाजपा की सांसद माला राज्यलक्ष्मी के साथ उनका मुकाबला होना है। प्रीतम सिंह कहते हैं कि टिहरी लोकसभा में पिछले पाँच वर्षों के दौरान विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं।
इसी प्रकार हरिद्वार सीट पर सांसद, पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक सहित 17 मैदान में उतरे हैं। मुख्य मुकाबला निशंक और कांग्रेस के अंबरीश कुमार के बीच है। यहाँ उक्रांद के सुरेन्द्र कुमार उपाध्याय के साथ ही भानपाल सिंह, फुरकान अली, शिव कुमार कश्यप, ललित कुमार, कृष्णध्र पाण्डे भी मैदान में हैं। इस सीट पर रमेश पोखरियाल पहले से ही बेहद सक्रिय हैं और कांग्रेस टिकट फाइनल करने में काफी विलम्ब में रही। फिर भी मुकाबला रोचक होने जा रहा है।
नेतागर्दी के बयान और बनाई गई पार्टी रणनीति का परिणाम आने वाला समय बतायेगा

कुर्सी दौड़ शुरु

लोकसभा चुनाव 2019

कार्यालय प्रतिनिधि
लोकसभा चुनाव के लिये कुर्सी दौड़ शुरु हो चुकी है। पूरे देश में पिछली बार प्रचंड बहुमत पाने वाली भाजपा और मुख्य विपक्ष कांग्रेस सहित अन्य दलों का शोर इन दिनों सरदर्द बनकर सुनाई दे रहा है। देश के हालातों पर दुहाई देने के अलावा एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले सभी दलों की पोल खुल चुकी है। क्योंकि इन्होंने अपने शोर को तेज और तीखा करने के लिये कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी है। कांग्रेस के चैकीदार चोर है’ के जबाव में भाजपाईयों ने ‘मैं भी चैकीदार’ का कैम्पन शुरु किया है। साीशल मीडिया पर खामखां की बहस हो रही है। सभाओं, रैलियों, जन सम्पर्कों का दौर चल रहा है। मतदाताओं को रिझाने के लिये युवाओं को सपने दिखाये जा रहे हैं। सबका ध्यान युवा मतदाताओं पर है, जिसकी लहर चुनाव में परिणाम दिलाने वाली होगी। अपनी रणनीति में भी पार्टियों ने युवाओं को टिकट और युवाओं की सभा को प्रमुखता से रखा है। इसे देश की राजनीति में नया दौर कहा जा सकता है। भाजपा में ही लालकृष्ण आडवाणी समेत 23 सांसदों के टिकट इस बार कट गये। दांव-पेंच के लिये दूसरी पार्टियों ने भी अपनी रणनीति को बदला है। कई बुजुर्ग नेता स्वयं को दौड़भाग से दूर रखना बेहतर मान रहे हैं। पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब, कर्नाटक, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित सभी राज्यांे में पार्टियों की जोड़-तोड़ सर्कस की जैसी लग रही है। कितनी जल्द नेता-अभिनेता रंग बदलते हैं, यह इस बार खूब दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश की सीटों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। यहाँ भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा सभी अपनी-अपनी ताकत दिखा रहे हैं। वाराणसी, लखनउ, रामपुर और अमेठी जैसी सीटों पर यहाँ हर पल की तैयारी के लिये चैकन्नापन है। ऐसे में उत्तराखण्ड की पांच लोकसभा सीटों पर भी रोचक मुकाबला होने जा रहा है। यहाँ नैनीताल- उधमसिंह नगर सीट, अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट, टिहरी सीट, पौड़ी लोकसभा सीट, हरिद्वार सीट पर इस बार पार्टियां बहुत सतर्क होकर उम्मीदवार उतार रही हैं। उतारे गये प्रत्याशियों पर जनता कितना भरोसा करेगी, यह सन्देह है। इसलिये स्टार प्रचारकों सहित पूरा दल-बल जुटा हुआ है।
चुनाव के लिये कांग्रेस की ओर से महासचिव प्रियंका गांधी सबसे लोकप्रिय स्टार प्रचारक के रूप में दिखाई दे रही हैं जबकि भाजपा में नरेन्द्र मोदी नाम ही काफी है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका ने अपनी सभाओं में कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है कि वह अपने वोट का सही इस्तेमाल करें। वह कहती हैं कि चुनाव में सच की जीत होगी। असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की लगातार कोशिश की जाएगी लेकिन वे रोजगार, किसानों और महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दों को लेकर सवाल पूछते रहें। आने वाले दिनों में सही निर्णय लीजिए। यह देश आपका बनाया है। यह चुनाव आजादी की लड़ाई से कम नहीं है। हम मिलकर काम करें और एकजुट होकर आगे बढ़ें।
भाजपा की ओर से नरेन्द्र मोदी यह समझा रहे हैं कि भाजपा ही राष्ट्र को सही दिशा दे सकती है। इसके लिये वह अपने कार्यों को उपलब्धि भरा बता रहे हैं। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका निशाना रहा है, आतंक के समूल नाश के लिये उनका प्रण है। कांग्रेस वंशवादी पर चलती रही है जिसने लोकतन्त्र में दूसरों को मौका नहीं दिया। मोदी कहते हैं उन्होंने घोटालेबाजों में खलबली मची है। वह किसी को नहीं छोड़ेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुुल गांध्ी ने देहरादून में विशाल रैली को
सम्बोधित करते हुए कार्यकर्ताओं में जोश भरा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल ने प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जमकर बरसे और कहा मैं मोदी की गलतियों को सुधरुंगा। इस रैली में भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूरी के पुत्रा मनीष खण्डूरी ने कांग्रेस का हाथ थामा।
इन दोनों पार्टियों के स्टार प्रियंका और मोदी के अलावा अन्य बड़े व छोटे नेताओं कागरजना- बरसना जारी है। कई नेताओं ने अपनी पार्टी बदली है और कुछ ने पार्टी का झण्डा उठाया है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांध्ी का कहना है कि प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद को पीड़ित की तरह पेश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मोदी की गलत नीतियों की वजह से देशवासी पीड़ित हैं। प्रधनमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों का राजनीतिकरण किया। साथ ही अपनी नाकामयाबियों को छिपाने के लिए राष्ट्रीय हितों के मुद्दों से खिलवाड़ हुआ। इस चुनाव में बदलाव का जनादेश होना है।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने भाजपा पर तीखा प्रहार करते हुए कहा है कि अंग्रेजों का साथ देने वाले हमें राष्ट्रवाद न समझाएं। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी अनुग्रह नारायण कहते हैं कि मोदी सरकार ने युवाओं, व्यापारियों व जनता के साथ छल किया है। इसका परिणाम भाजपा को चुनाव में भुगतना होगा और कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी। मुख्यमंत्री व भाजपा नेता त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा है कि विपक्ष बौखला गया है और कुप्रचार में जोर दे रहा है। इसका जबाब जनता देगी।
टिकट बंटवारे के साथ ही वोटरों की परिक्रमा का नजारा इन दिनों दिखाई दे रहा है। नैनीताल लोकसभा सीट पर बसपा से नवनीत अग्रवाल, राजेश दुबे ने नामांकन करवाया। प्रगतिशील लोक मंच ने प्रेम प्रसाद को उतारा है। सबकी आँखों में घूम रही इस सीट पर उक्रांद के काशीसिंह ऐरी लोकप्रिय नेता के रूप में दिखाई दे रहे थे लेकिन सत्ता की भूख और दौड़ी में जब सारे हथकण्डे अपनाये जा रहे हैं, यूकेडी संगठन कितना कुछ दम दिखा सकता है, यह सवाल उठने लगा। काफी मंथन के बाद यूकेडी ने अपनी रणनीति बदली। इस सीट पर भाजपा की ओर से विधयक पुष्कर सिंह धामी और संघ से जुड़े राजू भण्डारी के नामों को लेकर चर्चाएं चलती रहीं लेकिन पार्टी ने अन्त में प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को उतारा है। उनका मुकाबला कांग्रेस के दिग्गज हरीश रावत के साथ होना है। दोनों ही पार्टियांे ने बहुत चतुराई के साथ उम्मीदवारों को उतारा है। किसमें कितना दम है यह मतदान के बाद पता चल जायेगा। यहाँ बसपा प्रत्याशी सुन्दर धैनी व निर्दलीय सज्जन लाल ने नामांकन करवाया है। टिहरी लोकसभा सीट पर माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कामरेड राजेन्द्र पुरोहित को अपना उम्मीदवार बनाया है। भाजपा ने सांसद राजलक्ष्मी शाह को ही आजमाते हुए अपनी रणनीति बनाई है जबकि कांग्रेस की ओर से प्रदेश अध्यक्ष प्रतीम सिंह के उपर सारा दारोमदार है। राजनीति के खेल में उलझे रि.कर्नल अजय कोठियाल की आवाज का भी प्रभाव दिखाई देगा। कांग्रेस और भाजपा दोनों की पसंद कर्नल रहे हैं।
अल्मोड़ा- पिथौरागढ़ से नये नामों पर सोचना कठिन था, सो कांग्रेस ने राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा को टिकट देकर सिद्ध कर दिया कि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं था। भाजपा की ओर से केन्द्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा और प्रदेश की बालविकास मंत्री रेखा आर्या के बीच टिकट की तनातनी के बाद अजय टम्टा को टिकट दिया गया। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने चुनाव में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने, चुनाव का सम्पूर्ण खर्चा निर्वाचन आयोग द्वारा वहन करने, चुनाव प्रक्रिया में व्यापक सुधर का मुद्दा उठाते हुए एडवोकेट विमला को अपना उम्मीदवार बनाया है।
पौड़ी लोकसभा सीट पर भी रोचक मुकाबला होने जा रहा है। कांग्रेस ने पूर्व मुख्य मंत्री, सांसद और भाजपा के ईमानदार नेताओं में गिने जाने वाले भुवन चन्द्र खण्डूरी के पुत्र मनीष खण्डूरी को मैदान में उतारा है। मनीष ने इस चुनाव के लिये कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर भाजपा मंे खलबली मचा रखी है। बीसी खण्डूरी की छवि का लाभ उन्हें तय है। भाजपा ने अपनी रणनीति बदलते हुए यहाँ तीरथ सिंह रावत को मैदान में उतारा है। श्री रावत ही भाजपा के पास ऐसा विकल्प बचा था जो जनरल खण्डूरी की छवि और उनके पुत्र मनीष के कांग्रेस में जाने के बाद चुनाव मैदान में टक्कर दे सके। स्थानीय मुद्दों को उठाते हुए उक्रांद ने शान्तिप्रसाद भट्ट को मैदान में उतारा है। हरिद्वार लोकसभा सीट पर भाजपा और कांग्रेस में टिकट की खींचतान के बाद भाजपा की ओर से रमेश पोखरियाल का नाम घोषित किया जो पहले से ही तय माना जा रहा था। शुरु से ही लगातार सक्रिय चतुर निशंक को चुनौती देना कांग्रेस व अन्य के लिये भारी है। देखते  हैं कुर्सी दौड़……