स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया जोहार का अनमोन नगीना

जब दुर्गा की याद में स्मृति अंक लेकर मुनस्यारी गये आनन्द

डॉ.पंकज उप्रेती
‘पिघलता हिमालय’ इस अंक के साथ ही अपनी स्थापना के 48 वर्ष पूर्ण कर चुका है। अगला अंक स्थापना के 49वें वर्ष में प्रवेश कर जाएगा। समाचार-विचार की इस लम्बी यात्रा में स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया की 86वीं जयन्ती भी है। मात्र 50साल की उम्र में वह महकता सितारा टूट गया था जिसकी यादें आज भी ‘पिघलता हिमालय’ के रूप में हैं।
समाचारों की दुनिया इस पूरी दुनिया में हिलोरे लेने लगी है और तरह-तरह के मनोरंजन के साध्नों पर लोग व्यस्त हैं परन्तु जीवन-जगत की सच्चाई तो यही है कि जब आप एकान्त या अकेले में हो तो आपकी अपनी दुनिया आपके मस्तिष्क में घूमने लगती है। अपने साथी के जाने के बाद ‘पिघलता हिमालय’ का एक विशेष अंक लेकर स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती मुनस्यारी गये थे। विश्व पर्यावरण दिवस पर जिस दिन स्व. मर्तोलिया की जन्मदिन होता है उसी दिन को याद करते हुए 1994 को दुर्गासिंह की स्मृति में यह अंक निकला था। यह केवल अंक नहीं बल्कि अपनों को जोड़ने का सीधा सा यत्न था। अंक की तैयारी के लिये नैनीताल से गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ भी हमारे घर/प्रेस ‘शक्ति प्रेस हल्द्वानी’ आए और विचार किया गया। उस दौर के संसाधनों के हिसाब से मुरादाबाद से ब्लाक बनवाना, स्क्रीन प्रिंटिग करवाना जैसे कार्य करवाए गए। इस अंक में नागार्जुन की कविता के अलावा काशीसिंह ऐरी की पहाड़ को लेकर लम्बी कविता प्रकाशित है। स्व. उमेद सिंह मर्तोलिया ने अपने भाई दुर्गा की जीवनी लिखी। सम्पादकीय मेें स्व. आनन्द बल्लभ जी ने ‘जनम अखबार का’ शीर्षक से उस सत्य को सबके सामने रख दिया जो आपाधापी में उलझे लोगों को झकझोर सकता है। कितनी पवित्रता के साथ ‘पिघलता हिमालय’ की कल्पना है इससे पता चलता है।
अंक में उम्मेद सिंह जी लेख ‘लिपू लेख पास के इस और उस पार’, श्रीराम सिंह धर्मशक्तू का लेख- ‘पिघलता हिमालय पिघलता समाज’ है। नेत्र सिंह रावत को याद करते हुए ‘पत्थर और पानी’ यात्रा संस्मरण का उल्लेख है। शेर सिंह पांगती का लेख- ‘तिब्बती शौका मित्रता’ उत्तम सिंह सयाना का जड़ीबूटियों से सम्बन्धी लेख है।
अंक की इस महक को लेकर स्व. आनन्द बल्लभ जी अपने मित्र स्व. दुर्गा सिंह की कर्मभूमि/जन्मभूमि मुनस्यारी गये। साधन/संसाध्नों की कमी अपनी जगह थी लेकिन जलाए गये दिए को बचाए रखने की जिद अपनी जगह। मुनस्यारी में उप्रेती जी के साथ पत्रकार स्व.पारसनाथ और श्री हरीश पन्त भी गये। आयोजन में ‘दुर्गा स्मृति अंक’ वितरित करने के साथ ही सभा हुई। हर कोई इस बात को कह रहा था ‘पिघलता हिमालय’ के रूप में दुर्गा सिंह की यादें जिन्दा हैं। इस सभा में गणमान्य जनों ने सीमान्त की समस्याओं के साथ ही उन क्षणों का स्मरण किया जब दुर्गा सिंह व्यवस्था के लिये शासन प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल देते थे। दुर्गा सिंह का भोलापन, फक्कड़पन, पियक्कड़ी, घुमक्कड़ी से लेकर अपने समाज को स्थापित करने के लिये जुनून का उल्लेख हुआ। इसी सभा में आनन्द बल्लभ उप्रेती ने हिमालय की गोद में बसी संस्कृति से लेकर जीवन के सच का यादगार व्याख्यान दिया था।
वर्षों की इस यात्रा में हमारे बीच पिघलता हिमालय के संस्थापक आनन्द बल्लभ उप्रेती, दुर्गासिंह मर्तोलिया और श्रीमती कमला उप्रेती नहीं हैं लेकिन उनकी व उनके साथ अनन्त यात्रा पर निकले तमाम साथियों की यादें धरोहर के रूप में है। यह केवल समाचार पत्र नहीं बल्कि इतिहास का भण्डार हो चुका है और जब-जब सीमान्त की वादियों पर शोध होंगे यह दस्तावेज बुनियाद होगा।

जोहार महोत्सव : समय बदलने की आहट है

डाॅ.पंकज उप्रेती
जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी हल्द्वानी द्वारा इस बार भी दो दिवसीय जोहार महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। महोत्सवों की बाढ़ में इस आयोजन की जो विशेषता दिखाई देती है वह एक घाटी की संस्कृति तो है ही लेकिन प्रतिस्पद्र्धा और द्वन्द के बीच यह साफ हो चुका है कि ‘समय बदलने की आहट है’।
हल्द्वानी की बसासत के साथ किस प्रकार से भोटिया पड़ाव बसा वह लम्बी कहानी है। (पिघलता हिमालय के सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे से’ विस्तार से दिया गया है।) तब तिकोनिया पर से घोड़े-बकरियों के झुण्ड लम्बी कतार में लग जाया करते थे। डीएफओ हीरासिंह पांगती साहब सहित दो-तीन परिवार सबसे पुराने परिवार यहाँ बसे। दोनहरिया में लक्ष्मण निवास भी मिलने जुलने वालों का केन्द्र बना। पुष्कर सिंह जंगपांगी जी का आवास ‘प्रताप भवन’ बनते समय नहर के पास बहुत संघर्ष की कहानी है। ‘शंकर निवास’ पुरानी यादों का परिवार है। खैर पहाड़ में कुछ परिवारों का जम-जमाव हो गया। पड़ाव के बीचोंबीच पांगती परिवार का ‘मिलम निवास’ भी बुद्धिजीवियों का अखाड़ा बन गया। उस दौर में हल्द्वानी के होल्यार बंजारा होली के रूप में दोनहरिया शिवमन्दिर तक जाया करते थे।
समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है परन्तु भोटिया पड़ाव में जाते ही अलग प्रकार की अनुभूति होती थी। हाँ, यहाँ मोहल्ले में आबादी घनी होने लगी थी और जोहार-मुनस्यार से आने वाले व्यापारियों का अड्डा दीवान सिंह जी का ‘सीमान्त ट्रान्सपोर्ट’ हो चुका था। मुख्य बाजार में ओके होटल के पास इस ट्रान्सपोर्ट कम्पनी की धक थी। 1968 में कालाढूंगी रोड स्थित हमारा छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ जन मिलन का बड़ा केन्द्र बन चुका था, जहाँ पहाड़ के हर कौने से आने-जाने वाले मिलते थे। बाद में यहीं पर बाजपुर बस अड्डा बन गया और तराई क्षेत्रा के लोगों का मिलन केन्द्र भी हुआ। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ शुरु होते ही शक्ति प्रेस व्यापारियों के मिलन का केन्द्र भी बना। संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने रिंगाल के कारोबार के लिये यूपी के व्यापारियों से सम्पर्क बनाए थे। ‘रहमत अली शेख फारुखी’ नाम मुझे आज भी याद है। कई व्यापारी रिंगाल के लिये आते और हिन्दू धर्मशाला इत्यादि स्थानों में रुकते थे। व्यापारियों की अपनी इशारों की भाषा थी जिसे वह हाथ मिलाते हुए रुमाल से ढक कर एक-दूसरे के सौदा कर लेते।
हल्द्वानी का पर्वतीय उत्थान मंच का कार्यालय भी पिघलता हिमालय शक्ति प्रेस ही बना। रामलीला मैदान से शुरुआती शोभा यात्रा निकाली गई थी। बाद में हीरानगर में इसे स्थापित किया गया लेकिन जब तक भवन नहीं बन गया, उत्थान मंच की सारी गतिविधियों का केन्द्र शक्ति प्रेस ही रहा। मुझे भली भांति याद है हल्द्वानी में उत्तरायणी जुलूस को मेले का स्वरूप देने के लिये प्रथम बार स्टाल लगाने का विचार आया तो पिता जी ने सबसे पहले मिलम के जड़ी-बूटी विशेषज्ञ उत्तम सिंह सयाना और दुम्मर से उनी कपड़ों के लिये जंगपांगी जी को बुलाया। मात्र दो-चार स्टाल लगे थे। अगले साल भी ऐसा ही हुआ। बाद में यह मेला स्टालों की भरमार का बना। समाज में बढ़ती उच्छंृखलताओं को देख पिता जी ने उत्थान मंच को हमेशा के लिये छोड़ दिया। जिस मंच के लिये वह दिन-रात समर्पित थे, उन्होंने क्यों छोड़ा होगा, यह आज आज समझ में आने लगा है……….
पिता जी लेखन में जुटे रहते। तब उन्हें ‘राजजात के बहाने’ कृति के लिये राहुली सांकृत्यायन पुरस्कार से सम्मान मिला था। लगातार धारदार लेखन वह करते रहे। हीरसिंह राणा, गोपालबाबू गोस्वामी मिलने प्रेस में ही आ जाया करते थे। मेले की भीड़ क्या होती है, इस प्रश्न को पिता जी बहुत रोचक तरीके से हमें समझा देते थे। साथ ही पहाड़ के तमाम कौतिकों का उदाहरण देते, जो स्वयंस्पफूर्त होते हैं। पिछले एक दशक में तो हल्द्वानी सहित आसपास उत्तरायणी महोत्सव नाम के ही ढेर लग चुके हैं। तमाम मंच जगह-जगह सजने लगे हैं। इसके अलावा फैलते जा रहे हल्द्वानी में कई प्रकार के जलसे-जुलूसों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कई प्रकार की संस्कृतियों का गुलदस्ता यह भाबर है लेकिन हर कोई चाहेगा कि वह अपनी जड़ों को पल्लवित करे और अपने संस्कार अगली पीढ़ी तक पहँुचाए। ऐसी ही कोशिश जोहार समाज में भी हुई। शुरुआत में अपने स्थानीय तीज-त्यौहारों साथ जो शुरुआत हुई थी वह होली पूजा के रूप में बेहतर शुरुआत बन गई। माघ की खिचड़ी का आयोजन भी ध्यैनियों के सम्मान में मिलने-जुलने का बड़ा आयोजन बनने लगा। जोहार मिलन केन्द्र आपस में मेल-जोल का शानदार केन्द्र स्थापित हो गया, जिसमें हर आयुवर्ग के लोग आते हैं। ऐसे में उर्जावान युवाओं ने विचार किया कि क्यों न आधुनिक समय को देखते हुए किसी ऐसे आयोजन को अंजाम दिया जाए जिसकी सपफलता बड़ा परिणाम दे।
जोहार की बात और व्यवहार को लेकर कई संगठन हैं लेकिन जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी ने इसे कर दिखाया और ‘जोहार महोत्सव’ के रूप में जो वृक्ष रोपा वह आज हरा है। इसके पहले आयोजन में अनुभव कम था लेकिन उत्साह ज्यादा, जिसका परिणाम यह हुआ कि तमाम जगह से जोहारी बन्धु आयोजन में भागीदार बने। पहले अनुभव के बाद सोसाइटी ने अगले वर्ष इसके स्वरूप में बदलाव किये बगैर आयोजन को तरीके से समेट लिया। इसके बाद आयोजन का स्वरूप लगभग तय हो चुका था और समझ आने लगा था कि हल्द्वानी भाबर मेें किस प्रकार से सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसके स्टालों में जोर दिया गया और व्यावसायिक गतिविधियां द्रुत हुईं। सांस्कृतिक माहौल बनाने के लिये उन कलाकारों को बुलाया जाने लगा। सांगीतिक दृष्टि से आयोजन का यह हिस्सा बहुत असरकारी होता है, इसका प्रभाव दूरगामी होता है। खैर, आयोजकों ने जोहार की प्रतिभाओं को मौका देने के अलावा बाहर से कलाकार आमंत्रित किये।
‘जोहार-महोत्सव-मेला-संस्कृति’ की समग्र पड़ताल के बाद आयोजकों को बधाई दी जानी चाहिये कि वह इस बड़े आयोजन को अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। साथ ही सुझाव भी है कि आयोजन के ‘जोहार’ नाम अनुरूप इसकी हर हरकत उस संस्कृति की ठहस से भरपूर हो। जिस जोहार नगर (भोटिया पड़ाव) के बसने के समय घोर संघर्ष हुए थे तब इसके फैलाव के बारे में विचार भी नहीं आता था। वर्तमान में हल्द्वानी के अलग-अलग स्थानों पर जोहार वासियों की बसासत है। सारे साधन-संसाधन होने के बावजूद अब वह स्थिति है कि अधुना समय में इसकी चमक और ज्यादा हो।
यह सच भी स्वीकार लेना चाहिये कि समय बदलने की आहट इस बार के महोत्सव में दिखाई दी। पुरानी पीढ़ी के बहुत से लोग हमारे बीच नहीं हैं। कुछ समर्पित जन अस्वस्थ्य होने के बावजूद समाज की बेहतरी के लिये जुटे हैं। कई जुझारु जन अपने अनुभवों के साथ इस अभियान को बनाये रखने की कसक लिये हुए दिखाई दिये। देखना होगा समय का चक्र किस दिशा को तय करेगा….