पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
एन.सी.तिवारी से बातचीज डॉ.पंकज उप्रेती यह सच्चाई है कि सुख-दुःख के साथी और समय हर हमेशा मस्तिष्क में छाए रहते हैं। वर्तमान की दिखलावटी दुनिया में भले ही बहुत रंगीन नजारे खुशनुमा दिखते होंगे लेकिन इनकी रंगीनियत वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए। जीवन के गहरे अनुभव और समाज में हमेशा सक्रियता निभाने वाले श्रीमान नवीन चन्द्र तिवारी (एन.सी.तिवारी) जीवन के उत्तरार्द्ध में भी समाज के लिये जीवट बने रहने का जोश अपने साथियों और युवाओं को दिलाते हैं। हल्द्वानी के जगदम्बानगर निवासी तिवारी जी की यादों में अल्मोड़ा से लेकर हल्द्वानी तक लम्बा सपफर है जिसमें नजारे बदले लेकिन नजर में वही हैं। बातचीज में वह कहते हैं- ‘दुर्गा-आनन्द स्मृतियों में हर वक्त हैं।’ ‘पिघलता हिमालय’ की स्थापना के समय और उससे पहले से ही इसके संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ जिस प्रकार की प्रगाढ़ता इनकी रही है वह परिवार के सयाने की ही हो सकती है। अल्मोड़ा के शैल ग्राम निवासी श्रीबल्लभ तिवारी के सुपुत्र थे- कृष्णानन्द तिवारी। ये परिवार मूल रूप से सोमेश्वर के बेगनिया ग्राम का हुआ। माता दुर्गा देवी और पिता कृष्णानन्द जी के परिवार में 8 सन्तानें हुईं, जिनमें सबसे छोटे थे- नवीन तिवारी। 5 भाई 3 बहिनों में एन.सी.तिवारी बेशक छोटे रहे हों लेकिन अवसरों पर आगे बढ़ते हुए इन्होंने अपने रास्ते तय किये और सन् 1971 मंे इनका विवाह निर्मल जी के साथ हुआ। इनके परिवार में दो बेटियां प्रीति, संगीता (गुड़िया) और पुत्र विजय हुए। सभी गृहस्थ आश्रम के साथ अपनी परम्पराआंे से जुड़े हैं, जो उन्होंने श्रीमती निर्मल-श्री एन.सी.तिवारी से पाया। अल्मोड़ा से बीएससी करने के बाद तिवारी जी इलाहाबाद पढ़ने गये लेकिन स्कूल-कालेज की शिक्षा से ज्यादा व्यवहारिक शिक्षा में रमने वाले एन. सी.तिवारी के भाग्य में कुछ और ही था। अल्मोड़ा में पढ़ाई के दौरान उनके साथियों में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी थे। यह विज्ञान वर्ग में थे जबकि मर्तोलिया कला वर्ग में। वह बताते हैं- ‘हमारे ग्राम शैल के प्रतिष्ठि व्यापारी नारायण तिवारी जी ने अल्मोड़ा के जिस जगह पर देवालय बनाया, उस स्थान को नारायण तिवारी देवाल बाजार कहने लगे और धीरे-धीरे एनटीडी नाम प्रचलित हो गया। इसी क्षेत्र में सीमान्त क्षेत्रा के व्यापारी आते थे और यही जोहारी भाईयों का मुख्य केन्द्र था। ज्यादातर डॉ.दरवान सिंह के आवास पर भी रहते थे। बाद में और ज्यादा विस्तार हुआ। सन् 1947 में रिफ्रयूजी भी इस क्षेत्र में आकर बसने लगे थे। इनके स्कूल के साथी गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, बीरशिवा स्कूल के संस्थापक एन.एन.डी.भट्ट, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, दरवान सिंह, उत्तम सिंह वहीं मिले थे। उस दौर में पढ़ाई के बाद ज्यादातर शिक्षक बने और फिर उच्चपदों पर आसीन रहे। हल्द्वानी दोनहरिया निवासी लक्ष्मण निवास का नाम हमेशा से अग्रणीय रहा है इस परिवार के बाला सिंह, सत्यवान सिंह जंगपांगी, सेल्सटैक्स कमिश्नर पुष्कर सिंह, जज उत्तम सिंह पांगती, दुर्गा सिंह अच्छे साथी रहे हैं।’ इण्टर के बाद इलाहाबाद पढ़ाई गये तिवारी जी अधूरी पढ़ाई से जब लौटे तो कुछ महीने कौसानी में अध्यापकी करने लगे। इसके बाद बिड़ला मिल सिरपुर कागजनगर, आन्ध्रप्रदेश मेें अपने बड़े भाई के पास चले गये जो बिरला कागज फैक्ट्री में थे। 1938 में स्थापित भारत की सबसे पुरानी यह पेपर मिल्स को हैदराबाद मिर उस्मान अली खान द्वारा स्थापित किया गया था। 1950 में बिरला परिवार ने इसका अधिग्रहण किया और 2018 में जे.के. पेपर लि. ने इस मिल का अधिग्रहण कर लिया। बिरला की इस फैक्ट्री में एन.सी.तिवारी क्वालिटी कन्ट्रोल का काम देखने लगे, कुछ समय बाद पेपर मैकर बन गये। सन् 1968 में मशीन में दुर्घटना होने के बाद इन्होंने विचार बदला और अपने गाँव से इतनी दूर आ चुका हँू, भाई भी यहीं है, क्यों न घर चल जाउँ। फिर से शैल ग्राम अल्मोड़ा आ गये। कुछ दिन रुकने के बाद हल्द्वानी का रुख किया। अल्मोड़ा में जहाँ इनकी मुलाकात दुर्गा सिंह मर्तोलिया से हुई थीं वहीं हल्द्वानी में आनन्द बल्लभ उप्रेती से हुई। तब तक ‘पिघलता हिमालय’ अखबार के बारे में चिन्तन नहीं हुआ था। हल्द्वानी में स्वरोजगार के क्रम में यह अपने को आजमाते रहे और सफल नहीं हो रहे थे। खुली चाय का कार्य भी किया लेकिन इसका प्रचलन न होने से उसे छोड़ पेपर एजेंसी ले ली। अनुभव तो था लेकिन दूर-दूर तक उधरबाजी से इस काम को भी बन्द कर दिया। उन दिनों में आनन्द बल्लभ उप्रेती का छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ खुला और वह पत्रकारिता में पहले से सक्रिय थे ही। तिवारी जी बताते हैं कि युवाओं और गपोड़ियों के बैठने का अड्डा कालाढूंगी रोड स्थित ‘शक्ति प्रेस’ हुआ करता था। दाँतों के डाक्टर बी.सी.पन्त, वकील जीवन जोशी, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह डसीला तमाम लोगों का मिलना जुलना बराबर था। कुछ अन्तराल में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी ‘शक्ति प्रेस’ में आए और उप्रेती जी के साथ एक प्रण सा हो गया कि अपना अखबार निकालना है। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ की शुरुआत हो गई। जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव सभी साथियों ने देखे और एक-दूसरे की परेशानियों को समझा-महसूस किया। तिवारी जी बताते हैं कि स्वरोजगार के क्रम में उन्होंने पहली बार सोपस्टोन इन्डस्ट्रीज की स्थापना कर डाली। छोटी मुखानी हल्द्वानी में 1973 में इसे स्थापित किया गया। बागेश्वर में खड़िया कार्य के शुरुआती दिन थे। बहुत मुश्किलों से तब खड़िया कारोबार का बाजार बना था, एक प्रकार से इसका परिचय ही हुआ। कुछ सालों तक सपफल कार्य करने के बाद तिवारी ने इस कारोबार को समेट दिया। आज भी छोटी मुखानी का वह क्षेत्र खड़िया फैक्ट्री नाम से ही जाना जाता है। अपने कारोबार और घर-परिवार के साथ कदम से कदम आगे बढ़ रहे तिवारी जी ने अपने साथियों और समाज की भलाई के लिये भी कदमताल कम नहीं की। होली हो या दीपावली उसकी रंगत बनी रहे इसके लिये इनका ध्यान पूरा था। वह बताते हैं कि हल्द्वानी में छोटा सा बाजार और दूर-दूर तक छिटके आवास थे। साइकिल से आना-जाना होता था और होली मिलने के लिये एक दूसरे के वहाँ अनिवार्य रूप से जाते थे, एक बार जेलरोड में पत्थरबाजी की घटना ने माहौल खराब किया था। पहाड़ की होली के लिये हीराबल्लभ पन्त जी के वहाँ सभी जुटते थे। रामपुर रोड में बालमुकुन्द तिवारी के घर में बैठकी होली के अलावा जगदम्बा नगर में इनके अपने आवास पर होली की बैठक जमती थी। रेंजर हीरा बल्लभ जी, रमेश चन्द्र, अल्मोड़ा से तारा प्रसाद ‘तारी मास्साब’, जगदीश उप्रेती ‘जग्गन’ से रातभर रागों में भरी होलियों सुनने को मिलती थीं। सामाजिक सरोकारों से जुड़े एन.सी. तिवारी जी जनमुद्दों को लेकर हमेशा अगुवाई करते रहे हैं। जमरानी बांध बनाने के आन्दोलन के क्रम में श्री नवीन चन्द्र वर्मा के साथ मिलकर इन्होंने पीआईएल तक डाली जिसमें विभाग को जुर्माना पड़ा था। व्यापारी हितों के लिये भी इनकी भागीदारी कम नहीं रही। वह बताते हैं कि सन् 1992 में अलीगढ़ में व्यापार मण्डल का सम्मेलन हुआ, तब बाबूलाल जी को कुमाउँ का प्रभारी बनाया गया और उन्हें कोषाध्यक्ष। पृथक पर्वतीय राज्य के बाद सन् 2001 में उ.प्र. से अलग होकर उत्तराखण्ड का व्यापार मण्डल बना। इसके लिये गाजियाबाद में यूपी के अध्यक्ष श्याम विहारी एमपी सहित तमाम साथी थे। उत्तराखण्ड व्यापार मण्डल के लिये रीषिकेश के यशपाल अग्रवाल अध्यक्ष, हल्द्वानी से बाबूलाल गुप्ता कार्यकारी अध्यक्ष, देहरादून से अनिल गोयल महामंत्री, नवीन वर्मा उप महामंत्राी, एनसी तिवारी कोषाध्यक्ष बने। राज्य आन्दोलन के दौरान अगुवाई करने वाले एन.सी.तिवारी कहते हैं- मुलायम सिंह का जमाना था और पुलिस का सख्त पहरा। आरक्षण विरोधी आन्दोलन में सुलग रहे युवाओं को जेल भेजा जा रहा था तब हल्द्वानी में छात्र अभिभावक संघर्ष समिति का गठन हुआ जिसमें वह सह संयोजक बने। इस बीच अज्ञात उत्तराखण्ड मुक्ति मोर्चा द्वारा इन्हें जान से मारने की ध्मकी तक दे दी गई। मानसिक तनाव व अन्य प्रकार से दबाव देने वाले तिवारी जी के पीछे लगे रहे लेकिन ये विचलित नहीं हुए बल्कि और सूझबूझ से कमान संभाली। राज्य आन्दोलन का स्वरूप बढ़ता गया और सारे सरकारी संगठन इस समिति से जुड़ गये। जब दिल्ली में प्रदर्शन की बात हुई तो शासन-प्रशासन का पहरा था। जाने की अनुमति नहीं थी, ऐसे में कोर्ट से चालीस बसों को ले जाने की अनुमति ले ली गई। वह कहते हैं कि पुलिस का इरादा था आन्दोलनकारियों को हल्द्वानी से आगे ही न बढ़ने दिया जाए। गढ़वाल में भी ऐसा ही हुआ और दिल्ली जा रहे आन्दोलनकारियों के साथ रामपुर तिराहा काण्ड हुआ था। हल्द्वानी मे भी रामपुर तिराहा काण्ड कराने की पूरी साजिश थी लेकिन किसी प्रकार पूरे आन्दोलन को सही दिशा दी गई और आन्दोनकारी युवाओं को बचाया गया। बातचीज में तिवारी जी पुराने दिनों को याद कर भावुक हो जाते हैं और कहते हैं- जितना किया बहुत था, अब नई पीढ़ी ने इस शहर और प्रदेश को संवारने में जुटना चाहिए। पिघलता हिमालय परिवार में संरक्षक की भूमिका रखने वाले श्री तिवारी के सुपुत्र विजय तिवारी भी सुलझे हुए युवा उद्यमी हैं और उन पुरानी परम्पराओं को अपने बचपन से समझते हुए आगे बढ़ रहे हैं। कामना है उनकी चाह सफल रहे।
डाॅ. पंकज उप्रेती ‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी। कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा। ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’ 27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत शक्ति प्रेस डाॅ. पंकज उप्रेती ‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी। कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा। ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’ 27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत पड़ने पर अन्य कमरे भी प्रेस में जुड़ गये और छापेखाने का कार्य विस्तार पा गया। तब हमारा पूरा परिवार भी यहाँ रहता था। रूलिंग मशीन की सरसराहट के बीच शानदार बाइडिंग का कार्य, प्रिंटिग कार्य, बाद के दिनों में शादी कार्ड की छपाई भी होती। उस छोटे आकार की पुस्तकें जैसे भजन संग्रह, होली संग्रह इत्यादि भी छपते रहे। यहीं 30 अक्टूबर 1978 में साप्ताहिक पिघलता हिमालय का प्रकाशन भी आरम्भ हुआ। 19 दिसम्बी 1979 में इसे दैनिक समाचार पत्रा का रूप दे दिया गया था। कुछ अड़चनों के बाद 1 दिसम्बर 1986 को पुनः यहीं से पिघलता हिमालय जारी हुआ, जिसका प्रकाशन पता पिता आनन्द बल्लभ उप्रेती के निधन के बाद 2013 में जे.के.पुरम् सेक्टर डी, मुखानी हल्द्वानी में कर दिया गया था और प्रयास था कि ‘शक्ति प्रेस’ को भी पूरी तरह इसी जगह लाया जाए। 2018 में पिघलता हिमालय की सम्पादक और उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी माता जी श्रीमती कमला उप्रेती के निधन के बाद से लगातार यह विचार था कि अपने प्रेस को भी वहीं स्थापित करें जहाँ परिवार रहने लगा है लेकिन जिस जगह वर्षों की यादें जुड़ी हों उसे एकदम छोड़ना शायद हमारे लिये भी कठिन था। अन्ततः 27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट होना परिवार को सुखद लगा है। और इस बीच हमें कई नये अनुभव और सीख मिली कि कौन हमारे कितने करीब है। ऐशबाग मोहल्ले के पुराने पड़ोसी तो सब पहले ही जा चुके थे और जो दो-चार परिवार मकान मालिक की हैसियत से रहते हैं, उनकी इच्छा भी यही रही है कि अब समेट लिया जाए। समेटने की इस होड़ में वह भी अकेले हो चुके हैं। फिलहाल हम खुशनुमा माहौल में ऐसबाग से विदा हो गये। यह जरूरी भी था क्योंकि हल्द्वानी शहर की घिचपिच के बीच जिस प्रकार से सड़क चैड़ीकरण इत्यादि हो रहा है उसमें बदलाव तो होना ही है। ऐसे में हमेशा से पूरे सम्मान के साथ मान्यता रखने वाला ‘शक्ति प्रेस’ भी अच्छी जगह शिफ्रट हो जाए, खुशी की बात है। बात पुरानी है कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ला जिसमें हमारा प्रेस था, तब शहर में ही बहुत कम वाहन हुआ करते थे। रोड के दोनों ओर आम के बड़े-बड़े पेड़ सुन्दरता बढ़ाते थे। प्रेस से थोड़ा आगे एक बड़ा सा नाला हुआ करता था, जो घिर चुका है, इसी से होकर नालियों का पानी-कचरा निकासी होता था। वर्तमान की कालाढूंगी रोड बरसात में भर जाती है। प्रेस के सामने ही हल्द्वानी फर्नीचर मार्ट पुराने प्रतिष्ठानों में से रहा है। इस मोहल्ले की कई यादों को पिता जी ने अपनी कृति ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ में लिखा है। पुराने हल्द्वानी में जब मुख्य मार्ग सिंगल रोड के थे, सड़क से लगा हमारा मोहल्ला ऐशबाग कुछ परिवारों का गुलदस्ता था। घरों में ताले नहीं लगते थे, ‘शक्ति प्रेस’ में ताले कभी नहीं लगे क्योंकि दिन-रात गपोड़ियों, आन्दोलन कारियों के अलावा विचारवान लोगों की बैठकें और प्रिंटिंग का कार्य होता था। पड़े लिखे बेरोजगार भी इसे अपने संरक्षण का अड्डा मानते रहे हैं। कई ऐसी लड़ाईयां भी यहीं से शुरू हुई जिन्हें सुनकर आश्चर्य हो सकता है। एकदम शान्त रहने वाले पिता जी गलत पर झल्ला जाते। फिर चाहे कोई नेता या कोई अधिकारी हो, वह अपना विरोध् दर्ज करते। समय बदलता रहा और सड़क से बहुत उपर होने वाले मकान गड्ढों में ध्ंसते दिखाई देने लगे। हमारा घर/प्रेस भी सड़क से एक सीढ़ी नीचे हो गया था और बरसात में पानी भरने लगता था। पहले समय में पूरा मोहल्ला गर्मी के दिनों में खुले में सोता था। अपनी-अपनी चारपाई में मच्छरदानी लगाकर सारे परिवार सड़क किनारे ही दिखाई देते। सन् 2000 के बाद से थोड़ा बदलावा आया और मोहल्ले में पुराने परिवार दूसरे स्थानों पर अपना निवास स्थान बनाकर जा चुके थे। ‘शक्ति प्रेस’ के बाहर पाखड़ का पेड़ लग चुका था, जिसकी आड़ में बैठने वाले कम हो गये। सड़क भी सिंगल से चैड़ी होकर इसमें डिवाइडर बन गया। याद आ रहा है कि पुराने समय में संचार व्यवस्था भी सीमित थी। ‘शक्ति प्रेस’ में डायल करने वाला पुराना फोन था। ‘193’ नम्बर के इस पफोन पर सुख-दुःख भरी सूचनाओं के लिये दूर-दूर से लोग आया करते थे। कई लोगांे ने अपने सगे-सम्बन्ध्यिों-मित्रों को इस पफोन नम्बर को दिया था ताकि विशेष स्थिति में पफोन कर जानकारी मिल सके। रामनगर, काशीपुर, बाजपुर को जाने वाली बसों का प्राइवेट बस अड्डा भी इस प्रेस के पास खुला तो कालाढंूगी चकलुवा इत्यादि से लोग प्रचलन के हिसाब से शादी कार्ड छपवाने यहीं आते थे। कुछ वर्षों के अन्तराल में छपाई के तरीके बदले और छापेखानों में मशीनरी का तरीका भी बदलने लगा। तब स्क्रीन प्रिटिंग का कार्य भी शक्ति प्रेस में होने लगा और पहली बार कार्डों में ऐपण के डिजाइन बनाए गए। इस प्रकार के प्रयोग पिता जी किया करते थे, इन सबके बीच संगीत सभा का होना भी कम आश्चर्य नहीं था। हम भाई-बहन भी अपने बचपन से उबर कर युवा अवस्था में थे और खुला आसमान बना ‘शक्ति प्रेस’ हमारा घर था। इसी में पढ़ाई और संगीत का रियाज करना बहुतों को आश्चर्य ही लगता होगा। पुराने जमाने के छोटे-छोटे कमरे वाले मकान में रेलगाड़ी जैसा हमारा आवास हमें संरक्षित करता रहा। हमें ही नहीं, उन आन्दोलनकारियों को भी पनाह मिली जिनकी तलाश होती थी। कई आन्दोलनों में जब पकड़-धकड़ होती तो अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से तक प्रदर्शन करने वाले यहाँ आ जाते। सीमान्त क्षेत्रा से लेकर मैदान तक के व्यापारियों के मिलन का अड्डा यह बन गया। जम्बू-गन्द्रायणी से लेकर रिंगाल तक के कारोबारियों का पता शक्ति प्रेस था, इनकी व्यापारिक बैठक धर्मशाला में होती थी क्योंकि बिजनौर इत्यादि जगह से व्यापारी धर्मशालाओं में आकर रुकते थे। इसी प्रकार गंगावली क्षेत्रा से आने वालों के लिये हमारा घर ही मुख्य केन्द्र बना हुआ था। छोटे से शहर में तब लोग अपनों को तलाशते हुए मिलते-जुलते थे। प्रेम-व्यहार के उस समय में सभी जगह यह रिवाज रहा है। आज भी पुराने परिवार अपने रिवाजों को बनाए हुए हैं। शहर होने का कतई यह मतलब नहीं है कि मेहमानों को होटल में रुकवाया जाए या मेहमान चुपचाप होटलों में रुककर चले जाएं। वर्तमान में सुविधाओं को देखते हुए बहुत बदलाव हुआ है और हल्द्वानी जैसा सुन्दर शहर भी एकदम बदलने जा रहा है। इसमें पहाड़ और मैदान से आकर बसने वालों की भीड़ ने इतना दबाव बना दिया है कि मुख्य शहर में पैदल चलना भी दिक्कत भरा होता जा रहा है। यही सब देखते हुए सड़क चैड़ीकरण करण सहित अन्य तोड़पफोड़ होनी ही है। जिस सिंगल सड़क पर कोई भी व्यक्ति उतर कर किसी के घर या दुकान पर जा सकता था, उस सड़क पर अब दिनभर दौड़ रहे वाहनों व डिवाइडर के कारण कोई रुकना पसन्द नहीं करता है। बदलते शहर में आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रा जुड़ चुके हैं और खेत-खलिहानों का कार्य बहुत कम हो चुका है। ऐसे में अपराधिक गतिविधियों भी बहुत तेजी से बड़ी हैं। बाजारबाद और सोशल मीडिया के प्रभाव में नई पीढ़ी को हल्द्वानी शहर की पुरानी तहजीब का पता ही नहीं है जब इस गुलस्दते में होली-रामलीला से लेकर हर रंग था और एक-दूसरे की मदद को लोग आगे आते थे। दानपुण्य करते लोगों के अलावा गर्मी में प्याउ अपनी ओर से लगवाने वाले भी थे। वर्तमान का हल्द्वानी दिखावे में डूबा है। कुछ दिनों के अन्तराल में कोई न कोई महोत्सव या जुलूस होने लगे हैं। चहक रहे युवाओं को इससे कोई मतलब नहीं की क्या हो रहा है। सोशल मीडिया के लिये फोटो-रील उनका लक्ष्य लगता है। ‘शक्ति प्रेस’ में बैठकर स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ हमेशा दस्तावेज के रूप में कार्य करेगी। इस शहर के बनने से लेकर वर्तमान तक में कौन लोग किन-किन स्थानों से आए और किस तरह से एक सुसज्जित शहर बसासत हुई। किस समय में कौन कितना प्रभावशाली था और कौन नगर पालिका चैयरमैन, कौन बड़ा व्यापारी था और कौन समाजसेवी, सबकुछ इस कृति में है। यही कारण है कि इसकी मांग भी लगातार बढ़ रही है। जब शहर का स्वरूप ही बदलने जा रहा हो तो यह जानना और भी जरूरी हो जाता है कि आंखिर किसी शहर में दबाव के बाद किस प्रकार से बदलाव होता है। लिखने के लिये बहुत है लेकिन इतना भर कहना है कि प्रेम भाईचारा के जो पुराने दिन थे, वह सभी स्थानों पर बना रहे।कालाढूंगी रोड स्थित शक्ति प्रेस का एक कक्ष