जैं श्री कल्या लोहार जी- विशालकाय दैत्तीय सर्प अजगर संहारक

इतिहास-कथा
नरेन्द्र ‘न्यौला पंचाचूली’
दारमा घाटी का ग्राम- नागलिंग दो शब्द नाग और लिंग से मिलकर बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ नाग /शिव सर्प एवं लिंग शब्द का शाब्दिक अर्थ भोले बाबा /शिव अंश से है। किवदंति है कि इस नागलिंग ग्राम में विशालकाय दैत्तीय सर्प अजगर रहता था।
यह साँप जिस प्रकार से मनुष्य मानवीय और अमानवीय दोनों प्रवृत्ति के होते हैं। ठीक इसी प्रकार यह विशालकाय अजगर सर्प भी जीव-जन्तु भक्षी/नरभक्षी आतंकित प्रवृत्ति का था, वह अजगर जीव-जन्तु के साथ नर भक्षण भी करता था। भूख की स्थिति में वह रास्ते में दिखाई देने वाले मनुष्य को निगल लेता। इस हाहाकार स्थिति से मुक्ति पाने का किसी के पास कोई ठोस उपाय नहीं था। उसी दौरान दारमा लुंग्बा नागलिंग गाँव में अंफरों /लोहार श्री कल्या लोहार जी भी रहते थे, जिनको रं लुंग्बा का ‘प्रथम रं विश्वकर्मा’ लोहार माना जाता है। उन्होंने अपनी बुद्धि, बहादुरी एवं पेशे की कुशलता के बलबूते पर दैत्याकार सर्प को मारने की रणनीति बनायी। जब दुश्मन शक्तिशाली ताकतबर बलवान होता है, उसे ‘शक्ति बल’ से नहीं ‘बुद्धि बल’ से हराया जा सकता है। इस सिद्धान्त की नीति को अपनाते हुए उन्होंने सर्वप्रथम दैत्य अजगर से मित्रता की, उसका गुणगान कर सच्चे मित्र के रूप में विश्वास जीता (यह युग पशु-पक्षी, सजीवों का आपस में बोलने व भावनाओं को समझने का युग था) और प्रार्थना की- आप विशाल काय हो, आपको उचे नीचे पथरीले राह में पेट भरने के लिए इतना कष्ट करना, मुझसे देखा नहीं जाता इसलिए आपसे विनम्र प्रार्थना करता हूँ कि आप आराम से यथा स्थान अपने क्षेत्र के आसपास में ही रहना, आज से आपके भोजन की व्यवस्था आपका सच्चा दोस्त मै। करुँगा। सभी ग्राम मिलकर बारी-बारी से जो भी उपलब्ध् खाद्य पदार्थ जैसे भेड़ बकरी और अन्य खाद्य पदार्थ दारमा लुंग्बा में होगा, यथाशीघ्र आपको उपलब्ध् कराता रहूँगा, बस आपसे एक छोटी सी विनती यह है कि आप भोजन ग्रहण करते समय अपनी आँखें बन्द रखना क्योंकि आपकी आँखें खुली रहने से भोजन उपलब्ध् कराने वाला दारमा लुंग्बा जन भयभीत रहते हैं। इस तरह विशालकाय अजगर सर्प को बिना मेहनत करे बैठे-बैठे भोजन मिलने लगा। इसी दौरान कल्या लोहार जी ने भी अपनी स्थायी आजीविका के लिए अपना अफरो को नागलिंग ग्राम से लगभग एक किमी दूर आगे ‘ताबुला’ नामक स्थान पर स्थापित किया और भविष्य की योजना को अंजाम देने हेतु दारमा जनों से मिलकर तैयारी शुरु कर दी। अपने अफरो/आफरों के आसपास नदी-नालों से अधिकतर गोलनुमा अण्डाकार और कुछ नुकिलानुमा पत्थरों को एकत्रित किया और करवाया। साथ ही एक शुभ अवसर त्यौहार का दिन चुना जहाँ निकट ग्रामों के प्रत्येक घर से विशेष पकवान बनवाये गये। इन पकवानों के साथ योजनानुसार बारुद रूपी उन पत्थरों को आफरों में अधिकतर गर्म यानी लाल सुर्ख करना शुरु किया, दैत्य अजगर से विनती की कि हमारे जंगली जीव-जन्तु, हम सबके रक्षक, महाराज आज हम सभी दारमा ग्रामजनों ने विशेष पर्व ;त्यार में विशेष पकवान बच्छी/पूरी, चुन्या/पकोड़ी, हलवा, चावल/छकु, स्या/ मीट, पलती गुढ़े, फाफर गन्दु, मर्ती-च्यक्ती तैयार कर रखा है। कृपया आप इन्हें ग्रहण करें।
सर्वप्रथम मर्ती-च्यक्ती (स्थानीय शुद्ध एल्कोहल) पिलाकर विशालकाय अजगर को मदहोश किया गया और मीट खिलाया गया। फिर ग्रामजनों द्वारा तैयार पकवानों साथ-साथ गोल गरम-गरम लाल सुर्ख पत्थरों को तब तक खिलाया गया, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो गया। दैत्य अजगर भर्ती-च्यक्ती (स्थानीय शुद्ध एल्कोहल ) के नशे में मदहोश होने के कारण उसे पता नहीं चला कि मैं कितना खा चुका हूँ। परिणामस्वरूप इन गरम-गरम लाल सुर्ख पत्थरों को तब तक खिलाया गया जब तक लक्ष्या की प्राप्ति न हो गया। दैत्य अजगर मर्ती-च्यक्ती (स्थानीय शुद्ध एल्कोहल) के नशे में मदहोश होने के कारण उसे पता नहीं चला कि वह कितना खाना खा चुका है। परिणाम यह हुआ कि गरम-गरम लाल सुर्ख पत्थरों ने अजगर के पेट में बारुद का सा काम किया और विस्फोट के साथ फट पड़ा। इस भयंकर विस्फोट में अजगर के शरीर से चीथड़े उड़ गये, जिससे इस दैत्यकार आतंकित सर्प का अन्त हुआ।
नागलिंग और चल गाँव के आर-पार अजगर की अंतड़ियां विशाल चट्टानों पर चिपकी पड़ी हैं। इस निशानी सफेद भूरे कालेनुमा आँतों की लकीरें दूर से आज भी स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। जय श्री कल्या लोहार जी के अफरों रूपी पत्थर के निशान आज भी उस स्थान पर विद्यमान हैं, जिनमें गोल बारुद रूपी पत्थरों को गर्म किया गया था। कल्या लौहार कोई साधरण व्यक्ति नहीं बल्कि अवतारी पुरुष थे। रं लुंग्बा में जय श्री कल्या लोहार जी, ‘प्रथम रं विश्वकर्मा’ के रूप में अवतार लेकर देवभूमि को इस दैत्याकार विशाल अजगर से बचाने को अवरित हुए थे।
एक कथा के अनुसार जब शिव भगवान अपनी स्थानीय तपस्थली की खोज में घूमते-घूमते दारमा घाटी के इस ग्राम में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि इस घाटी के क्षेत्रवासी नरभक्षी/जीवभक्षी विशालकाय साँप अजगर के आतंक से आतंकित हैं। तब भोले बाबा के नाग ने यहाँ क्षेत्रवासियों को इस आतंक से मुक्ति दिलाने के लिये ‘जय श्री कल्या लोहार जी’ का रूप धरण कर इस आतंक रूपी अजगर का अन्त किया। तभी से दारमा के इस ग्राम का नाम शिवअंश के नाम से नागलिंग पड़ा।
विशेषता- ग्राम नांगलिंग, रं लुंम्बा, दारमा का ऐसा गाँव है, जहाँ दिन में सात बार धूप निकलती और छुपती है। इसका कारण सात चोटियों से होकर उसे गुजरना होता है।

जय श्री हुरबी पहलवान जी (जै रं बाहुबली)

जै हुरबी रं बाहुबली का गाँव बोंगलींग/बौंग्लींग
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
प्राचीन काल में रंग लुंग्बा के दारमा घाटी, ग्राम- बोंगलींग/बौंग्लींग में बाहुबली मानव ‘हुरबी’ पहलवान रहता था। वे कुश्ती पहलवानी करते-करते इतने पहलवान हो गये कि वह रं लुग्बा का बाहुबली मानव कहलाने लगे। हुरबी पहलवान को रं लुंग्बा के कोई भी पहलवान पहलवानी/कुश्ती में पराजित नहीं कर पाते थे। इस प्रकार उन्होंने अपने समय में पहलवानी में इतिहास रचा, जिसके कारण आज भी हम उन्हें याद करते हुए और जय दारमा ‘भीम’ के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। यह उस सदी की बात है जब रं लुंग्बा के पुरुष अपने कमर में हल की रस्सी बाँधकर खेत की जुताई किया करते थे।
प्राचीन समय से ही रं लुंग्बा जनों ने नेपाल हुमला-झुमला प्रान्त के झुमलियों के द्वारा जबरदस्ती कर वसूली व अमानवीय आतंकित लूटपाट का दंश समय-अन्तराल समय-समय पर झेला था। ये लोग रं लुंग्बा जन बहुत ही सीधे-साधे विचार के रहे हैं।
पहली घटना- एक बार लगभग 50-60 झुमलियों के समूह ने जबरदस्ती कर वसूली व आतंरिक लूटपाट करने के वास्ते नेपाल देश के हुमला-जुमला प्रान्त से बंगबा चैंदाँस घाटी के रिमझिम, हिमखोला ग्राम के पहाड़ की चढ़ाई कर पहाड़ की दूसरी ओर दारमा क्षेत्र का लंगदारमा, दैर्री /हेरी, फकल, नामक क्षेत्र में पहुँच कर नदी पार कर तल्ला दारमा, ग्राम बौंगलींग में प्रवेश किया। ग्राम जनों ने झुमलियों के द्वारा की जाने वाली जबदस्ती कर वसूली का विरोध् किया, झुमली लोग डराकर आतंकित लूटपाट पर उतारु हो हो गये, उसी पल दोनों गुटों में बहस हो गयी पर कुछ बुद्धिजीवी ग्रामजनों ने जबदरस्ती आतंकित लूटपाट से बचने के लिए एक कूटनीति चाल चली। हम आपको दोगुना टैक्स/कर देंगे, पर जब आप लोग हमारे हुरबी जी को कुश्ती में हरा पाओगे।
झुमलियों ने हुरबी पहलवान जी को सामान्य व्यक्ति समझकर इस कुश्ती चुनौती को स्वीकार कर लिया और कुश्ती का मुकाबला ग्राम के चैथरा थंग में शुरु करवाया गया। बाहुबली हुरबी पहलवान ने एक-एक करके अधिकतर झुमलियों को अकेले ही हरा दिया और हारे हुए झुमलियों में से 10-15 झुमलियों को अकेले ही को कुश्ती में क्ररता से इतना घायल कर दिया कि एक-ढेड़ घण्टे के समय अन्तराल में उनकी मृत्यु हो गयी।
बाहुबली हुरबी पहलवान जी के इस भयंकर क्रूर रूप को देखकर बचे झुमली लोगांे ने वहाँ से बचकर भागना ही ठीक समझते हुए, बंग्बा ;चैंदाँस की ओर भाग निकले और अन्त में गुस्से से जय श्री हुरबी पहलवान जी ने वहाँ मरे झुमलियों के सिर काट कर उनकी खोपड़ियों को गाँव से दूर जंगलों के मध्य उनका एकान्त नियमित अभ्यास स्थल पर स्थित पर ओखली में डालकर मुसले से कुटे, इस घटना के बाद से ग्राम जन हुरबी पहलवान जी को ग्राम रक्षक देव रूप में पूजते हैं। यह ओखली विशाल ठोस पत्थर पर बनी हुई है, ऐसी मान्यता है। यह खूनमखून लाल रक्त-रंगनुमा ओखली निशान चिन्ह आज भी उस स्थान पर बाहुबली हुरबी पहलवान जी के साक्ष्य के रूप में विद्यमान है। यह लाल रक्त नुमा ओखली बाहुबली हुरबी के नियमित अभ्यास के दौरान मुक्का-मुट्ठी मार-मार कर बना हुआ है। यह बात नागलिंग जैं श्री कल्या लौहार जी के समय काल का ही माना जाता है। इस जबरदस्ती कर वसूली आतंकित लूटपाट घटनाक्रम के बाद शताब्दियों तक पुनरावृत्ति करने की इन झुमलियों ने दुबारा कोशिश नहीं की।
दूसरी घटना- एक दिन ग्राम बौंग्लींग, बस्ती के समीप उपर बड़ा सा चट्टानी पत्थर पर जय जय श्री हुरबी पहलवान जी ने गुस्से से जोर से घूंसा जड़ दिया और उस पत्थर पर दरार पड़ गयी। ग्रामवासियों को वह पत्थर के टूटकर मकानों पर गिरने का डर बना रहता था।
उस पत्थर को टूटकर गिरने से रोकने के लिए ग्राम जनों ने जय श्री कल्या लोहार जी से टाँका लगाने का अनुरोध् किया और संकट मोहक जै श्री कल्या लोहार जी ने ग्राम जनों को बचाने के वास्ते उस पत्थर में टाँका लगा दिया। यह पत्थर आज भी वैसा ही मौजूद है। बाहुबली जैं श्री हुरबी पहलवान और जैं श्री कल्या लोहार जी को संकट मोचक के रूप में पूज्यनीय माना जाता है।