सेठ जगत सिंह की सेठियत

औपनिवेशिक शासन से आंखिर भारत ने 15 अगस्त 1947 को निजात पा ही लिया था,किन्तु आजादी के पंद्रह वर्ष बीत जाने पर भारत पर चीन के आक्रमण तथा तिब्बत पर अधिपत्य जमा लेने के बाद सीमा प्रांत क्षेत्र के निवासियों का सदीयों का व्यापार झटके में समाप्त हो गया,उसी में जोहार घाटी में निवास करने वाले शौका जनजाति समुदाय का भी जीवन गति थम सी गई, जिसके कारण कयी गर्खा (जाति )समुदाय के लोगों का जीवन भी प्रभावित हो चला था.
शौका जनजातियों के घुमक्कड़ी जीवन में स्थिरता आ गई ,जो मौसम के अनुसार अपना प्रवास बदलते रहते थे. अब एक ही स्थान पर रहने के लिए मजबूर हो गए. अफ़रा-तफ़री की स्थिति बन गई, जिनके व्यापार,व्यवसाय का संबंध हिमालय के वार-पार जन-जीवन से था, जीवन ठहर सी गई,अब लोग स्वयं अपनी तरह जीवन जीने को मजबूर थे.
जोहारियों के गांवों में भी लोगों की स्थिति दयनीय ही थी. जमीन बंदोबस्त में ‘जिसका जोत उसी का खेत’ के तहत जीमदारों( जिन्हे खेतीबाड़ी का जिम्मा था)के पास चला गया था.बस अब ऊनी कारोबार, पशुपालन, मेहनत मजदूरी से लोग जीवन व्यतीत कर रहे थे.देश को गुलामी से बाहर आए कम ही समय हुआ था,देश में ग़रीबी, बेरोजगारी,कष्टमय जीवन जीने को लोग मजबूर थे, वही स्थिति शौकाओं के गांवों की भी थी.
शौका बहुल गांव में सेठ,सौकार (धनवान) व्यक्ति जिन्हें विरासत में धन-दौलत प्राप्त था इने-गिने ही थे.उन्ही के पास छोटा-मोटा व्यापार, आर्थिक सम्पन्नता, प्रतिष्ठा भी थी, अन्य लोगों का जीवन अति कष्टमय, सुबह शाम का गुजारा करना भी मुश्किल था, परिवार भरा -भरा, शिक्षा का प्रचार प्रसार भी न थी.
सेठ जगत सिंह गांव का धनी, प्रतिष्ठित व्यक्ति था.जिनकी दो पत्नी,एक पुत्री तथा परिवार में धर्म भाई नैन सिंह भी रहता था. सेठ जी आदर्श चरित्रवान, मृदुभाषी, परोपकारी, संवेदनशील, सामाजिक, धार्मिक प्रवृत्ति के इंसान थे ; उन्हें चिंता थी तो केवल अपने उत्तराधिकारी पुत्र प्राप्ति की जिनके लिए, पुजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, सभी टोना-टुटका समय -समय करते रहते थे, किंतु व्यक्ति जो सोचता, होता नहीं.वही सेठ जी के साथ भी हुआ. जीवन के अंतिम समय मानसिक संतुलन भी खो बैठे, तथा जो मृत्यु का कारण भी बना था.
सौकार (धनवान ) जगत सिंह की सेठियत- “गांव के विशिष्ट व्यक्ति, धन-दौलत की चमक -दमक, गांव का एक मात्र व्यापारी, बासमती चावल की महक पास-परोस तक आना, औरतों के पहने आभूषणों का आकर्षण, गरीबों के हितेषी, पूजा -पाठ,ज्ञान -ध्यान,गीता ग्रंथ का नियमित अध्ययन,सरल व्यक्तित्व, धार्मिक प्रवृत्ति, सामाजिक व्यक्ति व बच्चों से प्रेम भाव आदि सेठ जी की ‘सेठियत’ ही थी.”
सन् 1960-70 में गांव के अधिकांश लोगों की माली हालत ठीक नही कहीं जा सकती हैं, जोहारियो के गांव में मुख्यतया -ऊनी कारोबार, पशुपालन, मेहनत मजदूरी, आंशिक कृर्षि करके ही जीवन यापन करते थे, गांव में खेती-बाड़ी सिर्फ दो ही जिमदार (सामान्य जाति) परिवार के पास ही अधिक थी. थोड़ी बहुत कुछ परिवार ही करते थे.किन्तु उनकी भी स्तिथि ठीक न था.
1967 में में आरक्षण आरक्षण मिलने पर यहां के युवाओं ने पढ़ाई लिखाई के पश्चात सरकारी नौकरी में जाना प्रारंभ किया तभी स्थितियां बदलती गई.
सेठ जगत सिंह जी अपने घर में बने बरामदे में बैठकर कुछ लिखत- पढ़त का काम कर ही रहा था, तभी बड़ी पत्नी सोबली देबी ने आवाज लगाई.
सोबली देबी – ” सेठ जी से- सुनिए ! “अगले महीने जौंलजीबी का मेला आने वाली है, तैयारी करनी पड़ेगी,”
सेठ जी – ‘ठीक है, “हमारे पास सामान कितने है- देख लेना.”
सोबली देबी – ” तीन दन, चार चुटका, छः पंखी,चार कोट के पट्टु,(ऊनी कपड़े) दो,तीन आसानच भी है बहुत है एक, दो और तैयार हो रहा है.’
सेठ जी – सोबली ! “थोड़ा मडुवा का सत्तू व खजिया धान का खाजा (भूना चावल) भी तैयार कर देना, नास्ते में अच्छा रहता है.”
सोबली देबी – ” मडुवा व खजिया धान बक्से में है कल परसों भूनकर तैयार करती हुं, हो जाएगा.”
सेठ जी – सोबली! हमें दो आदमी सामान इधर-उधर करने के लिए भी चाहिए,आज से ही बात करनी पड़ेगी.’
सोबली देबी – ” शेर सिंह व नैन सिंह जी मेरे खयाल से अच्छा रहेगा,आप बताइए.”
सेठ जी – ” तुमने तो मेरी मुंह की बात कह दी, मैं भी यही सोच रहा था.घोडे वाले तो सामान पहुंचाकर आ जायेंगे,उतने दिन वहां रूकना बेकार हुआ, फिर आ जायेंगे.”
सोबली देबी – ” तैयारी शुरू कर देते हैं.” ठीक ही होगा.
जौलजीबी का ऐतिहासिक व्यापारी मेला सदीयों से गोरी-काली के संगम पर लगता है जहां दूर-दूर से क्रेता -बिक्रता आकर अपने सामाग्री का आदान-प्रदान नगद धनराशि या वस्तु विनिमय के माध्यम से करते थे.पशु मेला भी लगता था.जोहारीयो के लिए बहुत महत्वपूर्ण मेला,यहां के व्यापारी अपनी-अपनी दुकानें सजाते थे. जिसकी आज यादें भर रह गई है.
“मेले की तैयारी हमारे गांव के लोग कैसे करते थे ?” हस्तशिल्प -ऊनी वस्त्रों का कारोबार,जोहार के हर परिवार में किया जाता था.मेले में वस्त्रों की बिक्री से नगद धन की लालसा लोगों में रहती थी. कयी माह पूर्व से लोग मेले में अपने सामान बेचने हेतु तैयारी करने लगते थे.गांव में घर-घर में ध्वाच – ध्वाच ( लकड़ी का हत्था तथा उसमें लगे पांच लोहे के पत्ते,पंजा जो:ताना-बाना’ को ठोंकने की आवाज है ),कटम-कटम ( थल्ल- चौड़ा लकड़ी के तख्त से बना यंत्र,’ताना-बाना’ को ठोकने की आवाज), बच्चे से लेकर बुजर्ग तक कुछ-न -कुछ ऊनी कारोबार में संलिप्त दिखाई देते थे, भरा परिवार, मेहनत कश लोग, अभावग्रस्त जिंदगी, जहां सभी मिलजूलकर परिवार का सहयोग में योगदान देते हैं.”
सेठ जगत सिंह का नित्य कार्य सुबह प्रातः काल उठकर दूर निवृत्त होना, स्नान, ज्ञान -ध्यान पूजा पाठ के बाद अपने रोजमर्रा के कार्य में संलग्न हो जाना है, तभी बाहर से आवाज आती है.
धनुली देबी – ” सौरा,सौरा (ससुर जी) मेरा भी दो-तीन पंखी जौलजीबी मेले में बेचने हेतु ले जाने का कष्ट कर दिजिएगा.”
सेठ जी – ” दाम तय कर लेना”
धनुली देबी – “क्या करूं? आप बेच दिजिए.”
सेठ जी – ” दाम तय ठीक रहता है, आपको भी अच्छा लगेगा.”
धनुली देबी – “सौरा बस ! “70,या80 रूपए तक बेच देना , हो गया.”
सेठ जी -, “ठीक है, कोशिश पूरी रहती है, नहीं बिकने पर ही वापस लाना पड़ता है. बहू!”
मेले जानें की तैयारी, छोटी पत्नी से कहती हैं – पानुली,”नास्ता हेतु सत्तू,व खाजा (भूना चावल) बना लिया है क्या?
पानुली देबी- जी, ” सब कुछ तैयार है.”
“शेर सिंह,सेठ जी के घर आकर कब चलना है, बता दिजिएगा.”सेठजी.
सेठ जी – ” शेरू, परसों सभी साथ चलेंगे,नेनू को भी बता देना.” ठीक!
शेर सिंह – ठीक है, “सेठ जी अब मैं घर जाता हूं.”
सेठ जी – अच्छा,” ठीक है.”
सेठ जगत सिंह जी अपने गांव दुम्मर से अपने कांरवा के साथ जौलजीबी मेले के लिए चलते हैं गांव के लोग घोड़े की हिनहिनाहट,खांकर (घंटीयां) की खनखनाहट,पास-परोस के लोगों की शोर शराबा, मेलार्थियों को दूर धार (अदृश्य पहाड़ के पार) तक जाते देखते हैं,प्रथम दिन छोरीबगर तक का लक्ष्य तथा दुसरे दिन मेले में पहूंच जाते हैं, सदियों से अपने पैतृक निर्धारित स्थान पर दुकान सजाते हैं, महिनों दिनों बिताने के पश्चात ही वापसी होती है, सामान बेचने के पश्चात कुछ आवश्यकता अनुसार खरीददारी-गुड,घी, कपड़े, जूता-चप्पल आदि घोड़े में रखकर घर पहुंचते हैं,
गांव के मेहनतकश लोगो को सेठ जी के वापिस का इंतजार भी रहता है.उन्हे अपने सामान बिकने से नगद धन की प्राप्ति की चाह,आंनदानूभूति की हिलोरे दिल में उठने का आभास होता है, दूर धार से ही घोड़ों की गले में बधी घंटीयों की खनखनाहट आवाज का आभास होता है, बच्चे एकदम सचेत हो जाते, तथा नजदीक पास आते देख सेठ जी के घर पर इकट्ठा हो जाते हैं ,आशा जरूर एक टुकड़ा बाल मिठाई प्राप्त हो ही जायेगी.”
दुसरे, तीसरे दिन से सेठ जी के बुलावे से लोग घर पर पहुंचते रहते हैं. कुछ के चहरे खिले हैं, तो कुछ उदास भी दिखते है. जिनका सामन बिक न सका था. सेठ जी अगले थल,या बागेश्वर में बेचने का आश्वासन देते हैं.”
अब सेठ जी फ़ुरसत के कुछ क्षण प्राप्त हुए हैं आराम तथा भगवान भक्ति में लगा देना चाहते हैं, बहुत दिनों से ” गीता ” का अध्ययन भी नहीं किया गया है. तभ बाहर से एक आवाज आती है
पोस्टमैन- सेठ जी..सैठ जी,नमस्ते ! आपका पत्र आया है.’
सेठ जी- नमस्ते. ” बैठो,चाय पी लिजिए.”
पोस्टमैन – ” ठीक है, चाचाजी.” यह लिजिए पत्र.
सेठ जी पत्र को लेकर बाहरी पता देखकर समझ जाते है कि मर्तोली के स्वामी जी का पत्र प्राप्त हुआ है.”
सोबली- ” पत्र कहा से आया है?”
सेठ जी – स्वामी जी का पत्र, है लिखा है. “लिखा है,मित्र जगत,अबके जब जोहार जाएंगे,तो आपके घर पहुंचकर साथ चलेंगे.” कैसा रहेगा? “
सोबली- ” बहुत अच्छी बात, स्वामी जी के साथ जाकर कयी बरस से छोडे चुके घर की देख रेख भी हो जाएगी.”
समय बितने के माह मई में ‘स्वामी जी’ का संदेश पत्र सेठ जी को मिलता है- मित्र ! “जगत परसों आपके घर पहुंच रहे हैं.” जोहार साथ -साथ चलेंगे.
सेठ जी – “स्वामी जी को देखते,आइए.. आइए, निकट जाकर प्रणाम किया, उनके संग साथ में शिष्या राधा बहन का भी सत्कार करते है. ‘सेठ जगत सिंह जी स्वामी जी के परम मित्र में से एक है.’
स्वामी जी – ” मित्र ठीक-ठाक, परिवार सहित कुशल मंगल से हो.”
सेठ जी – “स्वामी जी, आपकी कृपा से सब ठीक-ठाक ही है.” जी, आप पहले हाथ -मुंह धो लिजिए. चाय बनने तक.
“स्वामी जी तथा राधा बहन ने हाथ-मुंह धोकर , चाय-पानी ग्रहण किया. स्वामी जी ने थोड़ी देर आराम करने के पश्चात सेठ जी से गपशप करते हैं, तभी सेठ जी को कुछ पिछला खयाल आता है, तो वह स्वामी जी से कुछ मन की बात पुछने का अनुरोध करते हैं.”
स्वामी जी – मित्र! बेझिझक कहिए, क्या कहना है?”
सेठ जी – स्वामी जी, ” सोच रहा हूं, इस बार श्री पुर्ब्याल देवता के मंदिर में भागवत कथा का आयोजन रखने को सोच रहा हू,आप सुझाव देने का कष्ट करें.” कैसा रहेगा?”
स्वामी जी – वाह मित्र ! आपके नेक कार्य करने बिचार , बहुत अच्छा है, बस ! मुझे कुछ दिन पहले बता दिजिएना अवश्य आ जाऊंगा.’
सेठ जी का जोहार से वापसी के बाद गर्मी के मौसम का आगमन होने पर अपने कुल पुरोहित स्व० बच्ची राम जोशी को भागवत कथा शुभमुहूर्त दिन बार निकालने के लिए सलाह मशविरा किया गया. आज भी मंदिर के आंगन में निर्मित होम अग्निकुंड दिखाई देती है,अतीत की “सेठ जी के सेठियत” की कहानी को बयां करती है.
भागवत कथा प्रारम्भ कू पश्चात दूर -दूर से लोग श्री पुर्ब्याल देवता के मंदिर मंदिर में भक्ति भावना से पहुंचते गये, श्रृद्धा भक्ति अर्पित कर प्रफुल्लित मन से घर वापसी भी करते हैं.
सेठ जगत सिंह जी की सेठियत की कहानी को संक्षिप्तता में वर्णित करते हैं-उच्च चरित्रवान, समाजोपयोगी व्यक्ति,सरल व्यक्तित्व लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत थे .सेठ जी की नेक नियत, जीवन कहानी को स्मरण करते हृदयतल से कोटिश: नमन करते हुए अन्तरात्मा से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं.
✍️ जगदीश सिंह बृजवाल

गोरीफाट स्थित आदम बरपटिया जनजाति की उपजाति ‘बर्निया’ का संक्षिप्त वर्णन

जगदीश सिंह बृजवाल ✍️
हिमालय क्षेत्र के प्राचीन आदम जाति किरात, पुलिंद, तंगण तथा विष्णु पुराण, महाभारत के वनपर्व, वाराहसंहिता में भी भारतवर्ष के किनारे-किनारे हिमवंत क्षेत्र में सकास,नाग, गंधर्व, यक्ष भिल्ल, आदि आदम जाति रहते आ रहे हैं.आज भी निवास करने वाले उन प्राचीन जातियों से जो संबंध रखते हों, किंतु कयी अन्य बाहरी जातियों का यहाँ आकर इन जाति के साथ घुल-मिल जाने से पहचान की भ्रामकता दिखती है.
बरपटिया जनजाति के विषय में सही -सही बता पाना कठिन है.क्या ये खस, शक, या पौराणिक जाति किरात पुलिन्द, तंगण संबंध रखते होगें ? इनसे जानकारी प्राप्त करने पर वे अपने को बाहरी क्षेत्र नेपाल, पाली पछांऊ, दानपुर आदि क्षेत्रों से आने की बात बताते है.पर यह सिद्ध है कि कुछ बाहरी जातियाँ, आदम प्राचीन जातियों के साथ यहाँ आकर घुल-मिल गये हैं. जिसमें संदेह नहीं.
हिमालय क्षेत्र के ही जनजाति जोहार के शौका घुमंतू, पशुचारक, अर्द्धयायावरी जीवन व्यतीत करते थे, इनके विषय में इतिहासकारों की खोज, किवदंती, जनश्रुति, मत-मतांतर देखने को मिलते हैं.जोहार घाटी में भी समय-समय पर बाहरी जातियों का प्रवेश तथा रक्त संबंध स्थापित के चलते जोहार के समाज में पूरातन समय से अर्वाचीन तक सामाजिक उथल-पुथल चलता ही रहा है.
शौका जनजाति मौसम के अनुसार जोहार परगना, गौरीफाट, तल्लादेश में प्रवास करते रहे थे. इन्ही के आस-पास, बीच एक और छोटा – सा जनजाति समुदाय बरपटिया बारह पट्टी (बारह गाँव) में रहने वाले, जिनका अपनी संस्कृति, सांस्कृतिक पहिचान भी थी.जोहारियो के प्रभाव से इनके अस्तिव पर विराम लगता रहा है.
गोरीफाट (मुनस्यारी) तथा बरपटिया जनजाति समुदाय जो मुख्य रूप से कृषक तथा पशुपालक थे.जो स्थाई निवास कर माल क्षेत्र में शौका व्यापारीयो के लिए अनाज, आदि सामाग्री की आपूर्ति करके मैत्री भाव का संबंध शौकाओ के साथ बनाये रखते थे. जोहार के मध्यकाल के पंज्वारीयों का माल अनाज भंडारण क्षेत्र बरपटिया क्षेत्र ही था; प्रसिद्ध पूरूष, धनाढ्य व्यक्ति सुनपति शौका का सौकाट क्षेत्र बरपटिया क्षेत्र में ही है.
बारह पट्टी- जैंती गाँव ( बरनियागांव) पापड़ी, चौन-हरकोट, इमला, गोल्फा, सुरिंग, जीमीया, रिंगू-चूलकोट, गोल्फा, तोमिक, नामिक आदि क्षेत्र में निवास करते थे.इनकी उपजाति अधिकांशतः गाँव के नामों से आते हैं: बनिगों के , बर्निया, पापड़ी के पापड़ा, हरकोट के हरकोटिया,कोटाल गाँव के कोटाल, इमला के इमलाल, बोथी के बोथयाल, चूलकोट के चूलकोटिया, गोल्फा के गोलफियाल, तोमिक के तोमकियाल, जीमी के जीमीयाल, रिंगू के रिगंवाल, पछाई, सेमीया, कलझुनिया भी बरपटिया जनजाति ही है.सदियों से यहाँ निवास करते हैं.
बरपटिया जनजाति में पूर्व में बर्निया , पापडा , चूलकोटिया जाति का प्रभुत्व रहा है बाद में अपने -अपने क्षेत्र में शासक के रूप में भी देखा जा सकता हैं.
“बनिया माने” स्थान आज भी बेटूली धार के पास पत्थर स्तम्भ सीमा का प्रतीक चिह्न मौजूद हैं जिनका अधिपत्य गोरीनदी के किनारे किरकुटियागार, बछेपूर तक बताया जाता है उसी प्रकार पापडा, चूलकोटिया जाति भी अपने क्षेत्र सीमा तक के स्वामी थे.
बर्नियो का अतीत का इतिहास जो दोधर (दो भाग) में बटे कौम एक अपने को तातर देश (हुणदेश) के निवासियो से संबंध होना बताते हैं, दूसरा धर अन्य जाति का बर्नियो के साथ घुल- मिल जाना है. मेसर देव पूजन में हुमला-जुमला पलायन कर चुके बर्निया आज भी अपने मूल गाँव जैंती (बर्निया गाँव) पहुचते हैं.जो जोहारियो के प्रभाव चलते अपने मुल्क जैंती गाँव छोड़कर नेपाल में जा बस गये थे.
बर्निया जाति से जुड़ी प्रसिद्ध कथा-कहानी रूपवती कन्या का हरण जो मेसर व रूपवती कन्या के सामाजिक असमनता का कारण, दोनों के स्वाभाविक मानव स्वभाव मिलन में अवरोध की कहानी दिखती है.मेसर देव जो नागवंशी व बर्निया कन्या तातर देश के हुण जातिसे संबंध रखते थे. हिमालयी दर्रे से टिड्डी के दल की तरह भारत पर हुण आक्रमण मैदानों तक भी होते रहे है.रूपवती कन्या को सामाजिक विरोध के कारण अपना प्राण गंवानी पड़ी थी.
बर्निया गाँव का उत्तर दिशा की ओर स्थित मेसर देव का जिसमें शिवशक्ति प्रतिष्ठापित मंदिर है,जिसमें नौर्त (जागरण) देवतरण के कार्यक्रम चलता है तत्पश्चात् गाँव से पश्चिम दिशा की और घने जंगलों के बीच नागपंचमी के दिन मेसर कुण्ड में मेसर देव की पूजा-अराधना की जाती है, जिसमें महिषि बलि प्रथा बौन, बौद्ध पूजा विधि विधान का स्पष्ट संकेत भी देती है.
बरपटिया जनजाति में पूर्व में प्रभुत्व बर्नियाओ का रहा था, धीरे-धीरे पापडा, चूलकोटिया, गोल्फियाल जाति भी प्रभाव में दिखाई देते है यदपि यह प्रभाव अपने क्षेत्र तक सीमित हो.
पापडा तथा बर्नियों में सदैव प्रतिद्वंद्विता बनी रही. आज भी वह मल्लयुद्ध स्थान, रास्ता झुगरू गौ्र,( लड़ने-झगडने हेतु खेत की उपलब्धता )झुगरू बौ्ट( झगडे वाले रास्ते में मिलना )उन्ही बातों की याद दिलाती है. आज से कुछ वर्षों पूर्व डांडाधार, जैती गाँव के मेलों में जब गाजे-बाजे के साथ दोनो गांवों से लोग मंदिर में प्रवेश करते थे तब भी तना-तनी का माहोल अतीत का स्मरण कराती थीं.
बर्निया गाँव से प्राप्ति जानकारी से मालूम पड़ता है कि आज भी 10,15 बर्निया जनजाति परिवार तथा 20,25 परिवार अनुसूचित जाति के लोग भी गाँव में रहते हैं,जिनका पारस्परिक संबंध सदियों से बना है.धार्मिक,सामाजिक मान्यताए जनजातीय के अतिरिक्त हिंदू संस्कृतिकरण की तरह है. गाँव के लोग सरकारी नौकरी पैशा तथा कुछ अच्छे पदों में भी आसीन है.गाँव में रहन वाले लोग कृषि,पशुपालन, मजदूरी कर अपने आजिविका चलाते हैं.पूर्व के पधानचारी प्राप्त पद पधान राठ श्री किसन सिंह बर्निया का परिवार भी गाँव में रहता है, गाँव के लोग पढ़े लिखे सौहार्दता से मिल-जुल कर रहते हैं मोटर मार्ग ही निर्मित मेसर देवता पूजा-पाठ सामाग्री, बर्तन रखने का मंदिरनुमा छोटा सा कमरा बना है.बरपटिया जनजाति के संस्कृति, सांसकृतिक इतिहास को जानने की जिज्ञासा स्वयं बरपटिया समाज के लोगों को भी है.

भीम सिंह बृजवाल जी का तिब्बत यात्रा वृतांत

वर्तमान समय में जोहार घाटी के तिब्बत व्यापार तक जाने वाले लोगों की गिनती अंगुली में की जा सकती हैं. घाटी की चहल-पहल, प्रत्येक गाँव से तिब्बत जाने वाले छोटे- बड़े व्यापारीयों को लोग गाँव से वलकिया (गाजे-बाजे के साथ स्वागत ) कुछ दूर तक जाकर विदा करते थे. यहाँ के व्यापारी भी अन्य घाटी यों की व्यापारीयों की तरह हिमालय के वार-पार क्षेत्रों मे दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं की आपूर्ति करते थे.
तिब्बत व्यापार के लिए माल वाहक के कार्य भेड़-बकरी,घोड़े-खच्चर, जूबू,, चौंर (याक) ही प्रमुखतया थे.निर्यात- कपड़ा, अनाज, किराना सामान, भेली (गुड़) वस्तु विनमय के अतिरिक्त नगद धनराशि देकर भी किया जाता था. मंडी तथा मित्र तक पहुचाकर वस्तु विनमय का व्यापार प्रमुखतया था. आयात- नमक, ऊन, सोना- सूहागा, चंवर पूंछ आदि किया जाता था.व्यापार का इतिहास पुराणों में भी तंगण-पतंगण के उल्लेख के रूप में देखी जा सकती हैं.
चीन द्वारा तिब्बत राज्य पर अपना अधिपत्य के चलते सन् 1962 में शौकाओ के सदीयों से चलती आ रही व्यापार पर विराम लग चुका था तभी से जोहार के समृद्धशाली इतिहास तथा जोहार के बर्बादी की कहानी लिखना प्रारंभ हो गया था.
जोहार के शौकाओं को भारत तिब्बत एजेंट गरतोक द्वारा 1955 में व्यापार करने की अनुमति मिलने के पश्चात अपने युवा काल 19 वर्ष के उम्र में श्री भीम सिंह बृजवाल जी तिब्बत व्यापार जाने हेतु उत्सुक, अपने हम उम्र साथी लछम सिंह बृजवाल, रतन सिंह बृजवाल,बड़े भाई प्रेम सिंह बृजवाल के साथ अपने पिता जसौद सिंह बृजवाल के आज्ञा से तिब्बत जाने के लिए तैयार हो गये. जो आज नब्बे बंसत पार कर चुके अपनी मुह जबानी बताते हैं.
बिल्जू ग्राम से व्यापारी दल को गाँव के लोग वलकिया (गाजे-बाजे से स्वागत) कर गाँव से कुछ दूर तक विदा करते थे. हम भी उसी तरह विदा हुए, हम केवल घोड़ा-खच्चर में जौं, उवा लेकर एक याक (चंवर) याक के साथ तिब्बत यात पर थे. सबसे आगे याक तथा उसकी विशिष्ट विशेषता, कुदरत की देन यह जानवर चलते समय रूकने का नाम नहीं लेता है्.आगे- आगे मार्ग दर्शक का काम कर रही थी.पहला पडाव दुंग नामक स्थान पर रहा.कठिन कंकड़-पत्धर, पथरिली, बर्फ के रास्ते भी अति कठिनाइयों भरा राह भी सुखद अनुभूति ही करा रही थी. जो उनका प्रथम व अंतिम यात्रा थी.
तीन धूरा (चोटी) जहाँ जान गंवाने में भी देर नही लगती थी. ऊंटाधूरा, जयंती, किंगरी-बिगंरी जिसे किसी भी रूप में एक दिन में पार करना अनिवार्य था. जिसे हम डेथ पांइट भी कह सकते है. एक ही दिन में पार कर लिया गया, उसी बीच गंग पानी से किंगरी-बिगंरी , दुंग, छिरतिंग, चिलमता, मानीथंगा, खिमलिंग, गुरगम, मिसर, बम्बाडोल ज्ञानिमा तक रास्ते, पडाव दुर्गम,बफीले रास्ते जहाँ चलते काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. जहाँ भेड- बकरियाँ का बर्फ में डुबने तक की स्थिति आ सकती थी. किंतु हमारे पास सिर्फ घोड़े,खच्चर ही थे.बस अंतिम चोटी किंगरी-बिगंरी पहुचकर कैलाश पर्वत दर्शन का मनोरम दृश्य दृष्टिगत नज़र आने लगी.
सभी गर्खाओं के मित्र की तरह बृजवालों के मित्र खिमलिंग स्थान पर डेरा डाले थे.चंवर गाय के बालों से बनाया तम्बू जिसमें अत्यधिक गरम रहता था. वहाँ बौद्ध मठ (गुम्फा) का दर्शन व पूजा- पाठ करके आगे का रास्ता भी तय किया गया.
रास्ते में हमें अन्य गर्खा(जाति) के लोग जोहार के समाजसेवी व्यक्ति धरम राय के बड़े सुपुत्र बाला सिंह पांगती, हयात सिंह पांगती, उन्हीं के साथ साथ उमेद सिंह निखुर्पा भी मिल गये थे. तिरछापुरी,सिसर से दायीं तरफ की ओर बगल में हमें अपने मित्र मिल गये थे. जिन्होने चंवर गायों के बालों से बने मोटे तम्बू बनाकर डेरा डाला था. जो हमारा ही इंतजार कर रहे थे.ज्ञानिमा मंडी में पहले से पिताजी जसौद सिह, दीवान, सिंह तथा गोबर्धन सिंह,(बड़ा व्यापारी)जसवंत सिंह, जगत सिंह,(सेठ) मोहन सिंह धूरा वाले अपनी दुकान सजाऐ बैठे थे.
दोनों ओर से मित्रजनों का मिलन स्यो-ढोक (प्रणाम) का आदान-प्रदान के बाद थोड़ी देर आराम करने के पश्चात हुनिया मित्र द्वारा आवाभगत में समक्ष सभी के लिए थाली में पकाया हुनकारा भेड़ का गोस्त व सत्तू परोसा था, हम सभी ने सहर्ष स्वीकार कर ग्रहण किया.
अपने मित्र साथियों से मिलकर हम सभी ने तिब्बती बकरी हुनकारा,से बाल उतारने में सहयोग भी किया, 120 बिल्ची तैयार कर रूपये ढ़ाई (2=5०) की दर से नगद खरीदा था. दो- तीन दिन ठहरने के पश्चात जब घर वापसी की सोच रहे थे तभी तीन दिन भारी बर्फबारी के कारण यही रूकना पड़ा.
ज्ञानिमा व्यापारी मंडी में याक का आराम दायक आंनदित सवारी, घुमते- फिरते रहना जिसकी यादें भुले नहीं भुलाया जा सकता है,कुछ दिन रूकने के पश्चात अपने गाँव बिल्जू वापसी हुई.जोहार से तिब्बत आने -जाने में लगभग आठ-दस दिन का समय अवश्य लगता है.
श्री भीम सिंह बृजवाल जी से उनके तिब्बत यात्रा के विषय में बातचीत, जिक्र करने पर भावुक हो जाते है, वे तिब्बत यात्रा की सुखद अनुभूति को संजोये रखना, कभी भूलना नही चाहते हैं.आज वे स्वयं सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त है तथा दोनों सुपुत्र श्री गिरीश सिंह व श्री प्रकाश सिंह बृजवाल जी अच्छे सरकारी नौकरी पेशा उच्च ओहदे पद पर आसीन है.शहरों में निवास करते है.किंतु भीम सिंह बृजवाल जी का पैतृक भूमि प्रेम, पुरखों के विरासत को खोना किसी प्रकार से नागवार है.शहर का जीवन उन्हें रास नहीं आता है वे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती तुलसी देबी बृजवाल संग पुंगराव घाटी के फ्लांटी गाँव में रहते है इसी घाटी में एक और बुजुर्ग व्यक्ति श्री नारायण सिंह बृजवाल जी भी ग्राम मुसरिया में भी रहकर अपनी थाती प्रेम का मिसाल दे रहे हैं. और तिब्बत जोहार घाटी के विषम में अच्छी जानकारी रखते हैं.आज हमारे जीते- जागते धरोहरों, बुजुर्गों को सदैव नमन करता हूँ.
जगदीश सिंह बृजवाल

क्वीरीजिमिया का द्योल ढुड.

सीमान्त क्षेत्र में प्राचीन धार्मिक दर्शनीय स्थल
जगदीश सिंह बृजवाल
जहाँ त्रिदेव के रूप में एक साथ भीमकाय पाषाण खण्ड खुबसूरत जलाशय, कुण्ड बालचन देवता का प्राचीन काल से ही पाषाण निर्मित मन्दिर प्रतिष्ठापित है। इस स्थल का जुड़ाव अवश्य ही अतीत में भी धार्मिक आस्था से है। देवल पाषाण खण्ड का शाब्दिक अर्थ ‘देवताओं का पत्थर’ से है। जिस पावन पाषाण की पवित्रता आज के सात्विक पूजा विधि-विधान से स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं। प्रतिवर्ष बैशाख पूर्णिमा को पूजा पाठ के लिए श्रृद्धालु द्योल ढुघ पहुँचते हैं। जहाँ पहुँचने पर श्रृद्धालुओं के तन-मन में अलौकिक शक्ति की अनुभूति होती है।
मुनस्यारी तहसील मुख्यालय मुख्यालय से उत्तर दिशा की की ओर जोहार मोटरमार्ग के चिलमधार से लगभग 2 किमी दूरी पश्चिम की ओर लिंक मोटरमार्ग से क्वीरी जिमीया = क्वीरीजिमिया है भारत-तिब्बत सीमा का भी अन्तिम स्थाई गाँव है। यह तहसील मुख्यालय से लगभग 15 किमी की दूरी पर है, जहाँ तक मोटरमार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। क्वीरी गाँव के पश्चिम दिशा की ओर घने जंगलों से कुछ चढ़ाई चढ़ते पैदल मार्ग से लगभग 4 किमी दूरी पर द्योल ढुड. अवस्थित है। जहाँ पहुँचने पर आश्चर्य व अद्भुतता का दर्शन होता हैं। तीन आश्चर्य अवस्थित तीनों का देवत्व के रूप में सदियों से पूजा-अर्चना की जाती है।
क्वीरीजिमिया शब्द में दो गाँवों का समुच्चय बोधक सम्बन्ध स्थापित है। पूर्व मे आने वाला गाँव जिमिया जहाँ के मूल निवासी जिमियाल अब वर्तमान में एक भी परिवर का वसासत यहाँ नहीं है। कालान्तर में ये सब नामिक गाँव के अतिरिक्त अन्य गाँव में विस्थापित हो गये हैं।
जिमियाल जाति के गाँव छोड़ने की जो कहानी के पीछे का राज आज भी लोगों के बीच प्रचलित है। जिमियाल बरपटिया जनजाति जो मुनस्यारी के भी मूल जनजातियो में से एक है, अपने जनजाति लोकदेवता भरारी देव की पूजा-अर्चना करते थे। कारण बस, कुछ दिनों पश्चात उनके कोपभाजन के शिकार भी हो गये थे। लोगो का कथन है कि मन्दिर के पास स्थिति केमू(शहतूत) के बड़े पेड़ के बीचों-बीच लोहे की कील गाढ़ दिया था। जिनका मकसद पेड़ को बढ़ने से रोका जाना था। भरारी देव को यह कार्य रास न आया जिमियालां में खुजली की बीमारी का प्रकोप पफैल गया। जिनको मजबूरी में गांव छोड़ने को भी मजबूर होना पड़ा था। दिवास्वप्न भविष्य में इस गाँव का अस्तित्व मिट जायेगा। आज जीमिया का जमीदोज होना तथा जिमियालो का एक भी परिवार अपने मूल स्थान पर न मिलना, कुछ तो संशय पैदा करता है। आज भी साक्ष रूप में केमू;शहतूत का पेड़ मोटरमार्ग पर हरा-भरा मौजूद है।
क्वीरीयाल अब जो बाद में दोनों गांवों में रहने लगे। तत्पश्चात रावत, मर्तोलिया, लस्पाल, ल्वांल, बृजवाल क्वीरी में बरपटिया पछाई परिवारों की बसासत भी सदीयों पुरानी है।
बालचन देवता के विषय में कहा जाता है कि वह नेपाल से आया हुआ माना जाता है। स्यांकुरी नेपाल में हुस्कर देवता उनके पिता का मंदिर प्रतिष्ठापित है। धारचूला के जुम्मा रांती में भी हुस्कर मन्दिर प्रतिष्ठापित है। जहाँ अजबलि से पूजा-पाठ का विधि-विधान है। बालचन देवता को हुस्कर देवता क पुत्र माना जाता है। पिता के त्याग देने पर जोहार की ओर रुख कर लिया था। जिनका प्रभाव जोहार क्षेत्र में काफी रहा है। आज भी तल्ला जोहार क्षेत्रा में डुंगरी, डोर नामीक गाँव में बालचन देवता का मन्दिर प्रतिष्ठापित है धूम-धाम से पूजापाठ कही बलि प्रथा का चलन भी परम्परागत है। किन्तु द्योल ढुड. स्थित मन्दिर में सात्विक पूजा की ही परम्परा पुरातन काल से चली आ रही है। फल फूल, धूप नवैध, प्रसादी चढ़ावा की मान्यता है जिस पावन भूमि की पवित्रता की परम्परा को यथावत रक्खी गई है।
क्वारी जिमीया से जब आगे लगभग 2 किमी पैदल चलने के पश्चात सुलाधार जगह पड़ता है। जहाँ घने जंगलों के बीच समतल खुबसूरत मैदान लगभग 100 मी लम्बा चौड़ा मैदान जिसके चारों ओर थूनेर, खरसु तिमसू, बांज-बूरांश के घने जंगल, निगाल की कयी प्रजाति की झाड़ियां तथा अति प्राकृतिक नैसर्गिक सौंदर्यता, रमणीक स्थान दृष्टिगोचर होती है। जहाँ से दूर गोरी नदी पार का हिमाच्छादित हिमश्रृंखलाएं राजरम्भा, नागनी चोटी, रालमघाटी, पंचचूली हिमालय का विहंगम बर्फानी दृश्य का चित्त को शान्त तथा मन-मस्तिष्क को प्रपफुल्लित कर देती है।
यदि भविष्य में इस स्थल को मुनस्यारी क्षेत्र के पर्यटन व धार्मिक पर्यटन स्थल के स्वरूप में विकसित देखते हैं तो मुनस्यारी के पास नन्दा देवी मन्दिर डाडांधार से प्रकृति का जो विहंगम दृश्य अवलोकन करने का मौका मिलता हैं उसी के सापेक्ष में द्योल ढुड., सुलाधार की सौन्दर्यता को भी आंकलन करेंगे। जिस क्षेत्र का इतिहास भी पौराणिकता से जुड़ा है।
सुलाधार से आगे बढ़ने पर घने जंगलों के बीच स्थित द्योल ढुड., जब दर्शन होता है तो पहले पहल अद्भुत दृश्य देखकर मन के अन्दर कुछ भय सा भी आ जाता है। जहाँ जिसकी सम्भावना ही न हो वहाँ भीमकाय विशाल पाषाण खण्ड, जिसके किनारे जलाशय लम्बाई लगभग 50 मी व चौड़ाई 30 मी दिखाई देती है कुण्ड के बीच में स्थल का कुछ उभरा भाग जिसमें हरा घास उगा हुआ है। सामने छोटा सा प्राचीन पाषाण निर्मित मन्दिर बालचन देवता का जिसे ग्वाला ;पशुपालकद्ध पशुओं का देवता भी माना जाता है।
भीमकाय पाषाण खण्ड (स्तूपनुमा टीलाद्) जिसके तलहटी में चारों ओर से सपाट पाषाण स्पष्ट दिखाई देती है, तथा सिरे वाले भाग में थूनेर के वृक्ष, निगाल की झाड़ियां, दुर्लभ वृक्ष रतङोली जो औषधीयुक्त पर जो छोटा गोलाकार लिए छिद्र से दो भागों में विभाजन करते आधा सुर्ख लाल व आधा काले रंग का होता है फल के रस को आँखों में डालने से आँख के सपफाई तथा रोशनी में इजाफा होने की बात बुजर्गों के मुंहवाणी से आज भी सुनी जा सकती हैं। देवतुल्य पाषाण खण्ड के लोग चारों लोग परिक्रमा कर प्रार्थना, आराधना करते हैं वास्तव में यदि उस पाषाण खण्ड की परिगणना करेंगे तो देश ही नहीं विदेश में भी इसे प्रथम स्थान आसानी से प्राप्त हो सकता है।
जब द्योल ढुड. स्थित प्राचीन धरोहर का दर्शन कर वापस आते हैं तो दुसरे मार्ग का चुनाव करते हैं। अन्य मार्ग से ढलान की ओर बढ़ते हैं तो तब भी हमें एक अलग अंचभित दृश्य देखने को मिलता है लगभग 1 किमी के ढलान के अन्तर में 100 भी लम्बी व 50 भी चौड़ाई का जलाशय ;कुण्डद्ध स्थापित है, जिसे रागस कुंड (राक्षस जलाशय) नाम से भी जाना जाता ह। विशेषता द्योल कुण्ड से इस कुण्ड तक सर्पीली आकार से जल निकासी दिखाई देती है जो ऊपर से नीचे कुण्ड तक जुड़ा हुआ है इसके विषय में भी जो जनश्रुति है की इन जलधाराओं को नागों (सरिसर्प) द्वारा ही खुदवाया गया है, जो नागवंशी लोगों से सम्बन्ध होने का घोतक भी दिखाता है।
बालचन देवता के विषय में जो अनुश्रुति, प्राचीन काल से चली आ रही है उसे उल्लेखित करना भी आवश्यक है।
द्योल ढुड. में कुण्ड(जलाशय) निर्मित किए जाने के बिषय में अनुश्रुति इस कुण्ड का निर्माण पहले पहल साईंपोलू जिमिया गार (नदी) को रेणु नदी के नाम का उल्लेख श्री केदार विष्ट जी द्वारा 1987 के अपने लेख में किया गया था। पार के गाँव जहाँ सांई-पोलू से ऊपर स्थिति साई धुरा में देवताओं के द्वारा किया जा रहा था। जिस स्थल की सौन्दयता, भौगोलिक बनावट द्योल ढुड. समान ही है आज साई धूरा में बिष्ट जाति के लोगों की बसासत है। यह पूर्व मे पशुओं का चारागाह स्थल भी रहा होगा। पशुचारक अपने पशुओं को चुगाने के लिए जब-तब पहुँचे होंगे। जब जलाशय के निर्माण में देवता तथा उनके गण लगे ही थे। बालचन देवता को पशुओं का देवता भी माना जाता है, जिस कारण पशुओं के लिए जलापूर्ति हेतु जलाशय का निर्माण किया जा रहा था। अचानक साई पोलू गाँव के ही बिष्ट जाति की महिला का उस स्थान पर अपने पशुओं के साथ पहुँचना, अजनबियों द्वारा किए जाने वाले दुस्साहसिक कार्य की जानकारी से हतप्रभ रह जाती है। कुछ समझ से परे था। तब देवताओं के द्वारा इस विषय की जानकारी किसी को न बताने का अनुरोध महिला से किया गया था तथा उसे मुंह मांगी वरदान प्राप्ति के लिए आग्रह किया किन्तु महिला का गाँव प्रेम आशंकित खतरे से गाँव की ओर मुंह करके जोर-जोर से आवाज देकर गाँव के लोगों को घटना से अवगत कराया जाने लगा। जिससे क्रोधित देवताओं द्वारा महिला को पाषाण शिला खण्ड में तब्दील कर दिया गया। जिसका प्रमाण साक्ष के रूप साईधूरा में आज भी है।
लोगो के कथनानुसार तब सम्प्रति साईधुरा जिमिया गार के पार क्वीरीजिमिया के द्योल ढुङघ स्थान पर कुण्ड का निर्माण किया गया। देवताओं के कोपभाजन का शिकार बिष्ट जाति के लोगों का अपने ईष्ट देव के रूप में स्वीकारते पूजा-अर्चना करने लगे।
द्योल ढड. स्थित बालचन देवता की पूजा पूर्व में केवल साईं पोलू के बिष्ट जाति के द्वारा ही की जाती थी। गाँव के लोग गाजे-बाजे के साथ क्वीरीजिमिया अवस्थित मन्दिर तक पहुँचकर पूजा आराधना करते थे। धूप-नवैध, फल- फूल, महाभोग प्रसादी चढ़ावा तथा देवतरण प्रथा भी थी। लोगों का वन देवता (बालचन) यक्ष देवता (कुण्ड) प्रकृति देवता (महापाषाण खण्ड) के रूप में असीम आस्था सदैव बनी रही थी। प्रकृति देवता को अनावृष्टि से बचाने की प्रार्थना करते रहते थे। इन्द्र देवता के रूप में भी बारिश से होने वाले कार्य से किसी प्रकार का बिघ्न बाधा न पहुँचे प्रार्थना करते थे। एक भव्य मेले का आयोजन भी होता था, जो प्रथा आज समाप्त हो चुकी है।
एक अन्य जनश्रुति सांई के निवासी बिष्ट जाति के लोग द्योल ढुड. स्थित बालचन मन्दिर में समय समय पर सामुहिक पूजा हेतु गाजे-बाजे के जाते रहते थे मन्दिर में सात्विक पूजा-पाठ देव अवतरण भी हो या कहा जाता है कि एक बार जब मन्दिर में बाजे गाजे के साथ देव अवतरण हो रहा था तो अचानक अवतारी व्यक्ति द्वारा जलकुण्ड में छलांग लगाकर जलसमाधि ले ली गईं। सभी श्रद्धालु इस घटना से हतप्रभ रह गये क्योंकि अवतारी व्यक्ति का सम्बन्ध किसी से पिता, पुत्रा, पति का मानवीय रूप में सम्बन्ध था। सभी निराशा लिए अपने घर वापस आ गए। अवतारी व्यक्ति के घर न पहुँचने पर पत्नी ने लोगों से रहस्य को बताने की अपील की तब लोगों ने घटना की सम्पूर्ण जानकारियों से अवगत कराया। अपनी पति के दुःख से द्रवित महिला को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका पति उससे बिछुड़ चुका है। उसका अन्तर्मन भरोसा दिलाते रहता कि वह एक दिन अवश्य लौट कर घर आयेगा। तब से कुछ वर्षों तक पूजा-पाठ बन्द हो चुका था।
लोगों द्वारा पुनः द्योल ढड. में पूजा-अराधना किया जाने लगा तो बाजे की आवाज के साथ-साथ जलाशय का पानी हिलने लगा तब कुण्ड के बीच से लम्बी दाढ़ी मूंछें वाला जिसके शरीर पर मुंगा घास (मुलायम बारीक घास) उगे थे बाहर आ गया, जिनकी शक्ल अवतारी समाधि लेते व्यक्ति से मिलता-जुलता था। जिसे दूसरा नाम ‘फूकनी बूबू’ दिया गया। जलसमाधि लिए अवतारी व्यक्ति के पत्नी ने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था जो अपने साथ दिव्य पात्र ‘कांसे का कटोरा’ (ब्या्ल) भी संग लाया था।
पति के इन्तजार में लम्बा अर्सा बीतते, महिला का धैर्य भी अब टूटने लगा था। अचानक बारह बरस बीत जाने के उपरान्त महिला का पति अवतारी व्यक्ति पुनः प्रकट हो गया। पत्नी का अपने पति प्राप्ति से प्रशन्नता कोई ठिकाना न रहा। पति के शरीर पर मुगा (बारीक घास) उगे हुए थे। पत्नी ने आदर सत्कार भोजन ग्रहाणादी के पश्चात इतने समय तक कहा रहने के विषय में जानना चाहा किन्तु पति द्वारा उस विषय में किसी प्रकार की बात न करने को कहा गया। पत्नी ने अपने हठ के आगे पति को जुबान खोलने को मजबूर कर दिया। तब पति द्वारा पत्नी से अपने संग लाया कटोरे (ब्याल) में दही लाने की बात कही गई। पत्नी द्वारा दही का कांसे का बड़ा सा कटोरा (ब्याल) पति के सामने रख दिया। पति स्वरूप मानव ने दही में फूंक मारते ही स्वयं भी कटोरी में ही समाहित हो गया पिफर वापस कभी नहीं आया। तब से अनुश्रुति है कि आगे फुकनि बूबू के रूप में देवतुल्य होकर चमत्कारों से प्रभावित करने लगा था। आज भी सांई पोलू गाँव में कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व घर में स्थापित फूकनी बूबू का पूजा-अर्चना सफेद टोपी मन्दिर में चढ़ाये जाने का रीति-रीवाज है।
फूकनि बूबू द्वारा भेंट दिव्य पात्रा जो लोगों के लिए वरदान स्वरूप बन गया था। धूप व वर्षा के रूप में लोगों कथन- जब गाँव में कोई शुभ कार्य के दिन बारीष की सम्भावना पर बारीष को रोकने हेतु तुरन्त कटोरी को सुल्टा कर दिया जाता था, तुरंत मौसम सुहावना, धूप खिलने लगती थी तथा यदि कृषि हेतु बारिश की आवश्यकता होती तो कटोरी को उल्टा कर दिया जाता था. आसमान से बारीश होने लगती थी। चमत्कारी कटोरी का रहस्य के विषय में आसपास के गाँवों के लोगों को आज भी भली-भांति मालूम हैं कि फूंकनी बूबू का कटोरा कितना चमत्कारी था। सदियों का इतिहास, कथा-कहानी जनश्रुति के परम्पराओं ने आज भी लोगों के दिलों में अपना स्थान बनाया है।
पूर्व का जिमिया गाँव जो तीस-चालीस 40 वर्ष पहले आपदा की भेंट चढ़ गया है। जिस क्षेत्र की उपजाऊ कृषि आलू, राजमा, राई-गौबी मूली सब्जीयां पूरे क्षेत्र में एक अलग नाम क्वीरीजिमिया का होता था। आज केवल क्वीरी गाँव अपने पुराने अस्तित्व को बचाए है। कभी दो बैल की जोड़ी के समान दो गाँव दो होते हुए भी एक जैसे थे। जोडी की विछिन्ता, जोड़ीदार के बिछुड़ जोने से अकेले दूर निगाह लगाए टकटकी शून्य में अपने साथी को निहारते क्वीरी गाँव कल्पनातीत हो जाता है। उसे ऐसा लग रहा है कि कहीं मेरा मित्र भी देव कोपभाजन का शिकार तो नहीं हो गया? जिमिया गाँव में कोई भी सम्भावित आपदा की गुंजाइश ही नहीं थी। चारों ओर से बाज, बुरांश, खरसु तिमसू, निगार के घने जंगलों से घिरा जिमिया गाँव इस तरह भरभराकर कुछ ही समय में सारा गाँव जमीदोज हो जाना इतिहास के पन्नों को भी उलट-पलट देता है।
आज जिमिया गाँव के अधिकांश निवासी अपने गाँव को छोड़कर अन्यत्रा भी चले गए हैं किन्तु कुछ असहाय, गरीब तथा कुछ वे लोग जो अपने गाँव से आत्मीयता से घनिष्ठ सम्बन्ध रखत थे, वे आज भी गाँव के आस-पास बंजर भूमि को आवाद कर अपनी वसासत बनाने में कामयाब हो गए हैं। मेहनत मजदूरी, कृषि,पशुपालन, कार्य कर अपनी आजिविका को साधन बनाकर जीवटता से जीवन व्यतीत करते हैं। द्योल ढुड. (देववल पाषाण खण्ड )शाब्दिक अर्थ ‘देवताओं का पत्थर’ है। क्वीरीजिमिया से लगभग तीन, चार किमी दूरी पर स्थित है। जिसकी सिन्धु तल से ऊंचाई लगभग 5000 फिट है। जिसे मुनस्यारी का खूबसूरत पर्यटन व धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है। द्योल ढुड. से ही पर्वतारोहियों के लिए ट्रेकिंग रूट हीरामणि ग्लेशियर, हिमानी नामिक जाने का भी आसान रास्ता है। पर्वतारोही इस मार्ग से अपना अभियान चलाते रहते हैं। आलेखन के लेखन में क्वीरी निवासी प्राध्यापक श्री भगत सिंह पछाई, श्री गोकुल सिंह लस्पाल इंस्पेक्टर आईटीबीपी, मूल निवासी सांई- पोलू के महत्वपूर्ण सहयोग से अतीत की जानकारियां को आप तक पहुँचाने में कामयाब हो सका हूँ। अतीत के सांस्कृतिक परम्पराओ को लिपिबद्ध कर संजोए रखना हम सभी का कर्तव्य बनता है. किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है।