जलद का शीतकालीन पड़ाव तेजम

केदार सिंह रावत से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती

जोहार के ‘खड़कू गीता’ के बारे में पिघलता हिमालय ने अपने पुराने अंक में जानकारी दी थी। इसी परिवार के श्रीमान केदार सिंह रावत एयरइण्डिया में रहते हुए दुनिया के आलौकिक नजारों को महसूस करने वालों में से हैं। एकदम सीधा सच्चा जीवन जीने में विश्वास करने वाले रावत जी से बातचीज करने से पहले इनके बारे में जानते हैं- मिलम के तिब्बत व्यापारी खड़क सिंह रावत गीता, रामायण का रुचिपूर्ण पाठ करने के अलावा वैद्यगिरी में माहिर थे, जिस कारण ‘खड़कू गीता’ या ‘गीता’ नाम से उन्हें पहचान मिल गई। आयुर्वेद के जानकार होने के कारण यह इलाज भी कर देते। व्यापारी होने के नाते दिल्ली में भी इनका सम्पर्क था, जिससे यह दवाई की खुराक मंगवा लिया करते थे। वैद्यगिरी में स्थानीय जड़ी-बूटी का प्रयोग करते। धर्मपरायण होने के कारण इन्होंने अपने पुत्रों के नाम- देवराम सिंह, हरीराम सिंह, दयाराम सिंह, श्रीराम सिंह रखा। आज भी तेजम में इनके कुनबे की पहचान ‘गीता’ या ‘खड़कू गीता’ का परिवार के रूप में है। इन चार भाईयों में श्रीराम सिंह रावत के सुपुत्र हुए- डॉ. जी.एस. रावत (देहरादून) और के.एस. रावत (हल्द्वानी)।
जोहार-मुन्स्यार के जलद में रहने वाले रावत परिवारों को शीत कालीन पड़ाव तेजम हुआ करता था, जिस कारण यह तेजम में भी बस गये। जलद में ही केदार सिंह का जन्म 1955 में हुआ। बचपन बीतने के बाद बीएससी करने के लिये यह अल्मोड़ा आ गये, इसी कक्षा का पार्ट-2 करने के लिये नैनीताल का चयन किया क्योंकि उस समय इनके भाई भीमताल में थे। इसके बाद इन्होंने आगे एमए करने की तैयारी की लेकिन इनके मामा श्री लक्ष्मण सिंह पांगती ने लखनउ से एक विज्ञापन की सूचना इन्हें भेज दी, जो एयरइण्डिया की थी। रावत जी दिल्ली चले गये और चयन, टेनिंग के बाद 1978 में एयरइण्डिया में लग गये। बात लक्ष्मण सिंह पांगती की करें तो लखनउ में रहते हुए श्री पांगती जी का दिशा-निर्देश हमेशा अपने समाज के लिये रहा है। जोहार की लोक संस्कृति और इतिहास पर लिखने वाले और समाज सुधारक बाबू राम सिंह की सुपुत्री तुलसी देवी का विवाह श्रीराम सिंह रावत से हुआ था (केदार सिंह जी माता)। इनके सुपुत्र लक्ष्मण सिंह ने भी जोहार के इतिहास और संस्कृति को सहेजने का काम किया है। साथ ही युवाओं को आगे बढ़ाने में प्रोत्साहित भी किया।
हाँ, तो बात तेजम और रावत जी की हो रही थी। एयरइण्डिया में नौकरी भले ही के.एस.रावत जी करने लगे थे लेकिन इनके मन-मस्तिष्क में अपना बचपन अपना पहाड़ कौंधता रहता। हवाई यात्राओं में दुनिया के आलौकिक नजारे बहुत देखे लेकिन अपनी जड़ों को कैसे भूल सकते थे। दिल्ली में सारी सुख-सुविधाओं के बीच भी इनका जुड़ाव अपने पहाड़ से बना रहा है। इनकी पत्नी श्रीमती कुसुमलता रावत दिल्ली में ही न्यू इण्डिया इंश्योरेंश कम्पनी में थीं। जो हल्द्वानी में इसी कम्पनी की डप्टी मैनेजर के पद से 2021 में सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। इससे पूर्व श्री रावत जी 2013 में एयरइण्डिया से मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे लेकिन एक हादसा उन्हें परेशान करने वाला रहा वह 2011में हुआ जब वह पैदल घूमने निकले थे किसी मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मारी जो उनके पैर को बुरी तरह घायल कर गई। ऐसे में चाह कर भी लम्बी यात्राओं से बचाव करना होता है। इनके सुपुत्र विजेन्द्र सिंह और सुपुत्री रुचि दिल्ली में ही कार्यरत हैं जबकि रावत दम्पत्ति हल्द्वानी के छड़ायल नयाबाद क्षेत्र में निवास कर रहे हैं।
श्री रावत को एयरइण्डिया में सेवा के दौरान खासे अवसर मिले जब वह देश के शीर्षतम लोगों की फ्लाइट जानी होती थी। सन् 1981 में पहली बार जब प्रधनमंत्री राजीव गांधी चायना गये, तब रावत जी को साथ जाने का मौका मिला। इसी प्रकार राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के साथ साउथ अमेरिका, ब्राजील, मैक्सिको, प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह के साथ जर्मनी दौरे किया। 2010 के कामनवेल्थ गेम्स के लिये मिली बड़ी जिम्मेदारी इन्होंने निभाई जब आस्ट्रेलिया के करीब दस छोटे-छोटे देशों के खिलाड़ियों को एकत्रित कर गेम्स के लिये दिल्ली जाया गया। इन प्रकार की जिम्मेदारियों को बेहतरीन तरीके से निभाना और अपनी जड़ों के साथ जुड़े रहने वाले रावत जी आज भी युवाओं के लिये प्रेरणा हैं कि यदि इच्छा हो तो किसी भी जगह पर आप अपनी खूबियों को दिखा सकते हो।