पौराणिक गाँव गैलंड. (गैं), ग्राम- सेला

इतिहास कथा
नरेन्द्र ‘न्यौला पंचाचूली’
शताब्दियों पहले ग्राम- सेला के स्येला मण्डम नदी के दायें छोर पर पौराणिक गाँव- गैलंड. नामक स्थान पर ग्राम बौन के राठ- बुंड.स्येला बौनालों के पितृ पूर्वज जन निवास करते थे, वे इस गैलंड. नामक क्षेत्र के मूल निवासी थे और और वर्तमान उत्तराधिकारी वे ही माने जाते हैं। इन बौनालों को बुंड.स्येला उपजाति नाम से भी सम्बोधित करते हैं। सदियों पूर्व ग्राम सेला का यह गैलंड. नामक स्थान में वीरान पड़े गाँव के मकानों के खण्डित अवशेष, मकानों के प्रवेश द्वार चैखटें, चिकनी मिट्टी का बर्तनों के साक्ष्य प्रमाण स्वरूप अभी भी मिलते रहते हैं। इस सुन्दर पौराणिक गाँव गैलंड. नामक क्षेत्र के चैड़े-चैड़े खेत के निशान, खेतों के बीच मैदानी भू-भाग, भू विभाजक पत्थरों के चिन्ह, गाँव के खड़न्जे एवं किराने किनारे खड़े किये गये उँचे-उँचे बड़े पत्थरों का बाड़ा, अनाज कूटने पीसने का जन्नदी (पत्थर का हाथ चक्की) और विशाल पत्थर पर बना पाला (ओखली), जानवरों को पानी पिलाने का कुलो, देव चिन्हित स्थल और गाँव का पंचायती चैथरा थं (चबूतरा) ऐसा आभास करता है मानो अभी-अभी कुछ समय पूर्व ही पंचायत से उठाकर लोग अपने-अपने घरों को चले गये हों, साथ ही इन साक्ष्यों को देखकर ऐसा लगता है मानो कुछ सदी पूर्व ही गैलंघ ग्रामवासियों ने यहाँ से पलायन किया हो।
सेला पौराणिक गाँव गैलंड. की प्राकृतिक, कृषि व व्यवसायिक सम्पदा के रूप में काफी समृद्ध था परन्तु यहाँ रहने वाले लोगों में बार-बार एक ही चीज की कसक थी कि गाँव पहाड़ से सटकर बसे होने के कारण दिन में सूर्य उदय की किरणें देर से पहुंचती है व शाम में सूर्य अस्त की किरणें जल्दी छुप जाती है (यानि सूरज की किरणें दिन में बहुत थोड़े समय तक के लिये ही पहुंच पाती थी)। सूरज की किरणें मानव व फसली जीवन के लिये अति महत्वपूर्ण होता है। यह गाँव ‘पहाड़ सूरज की किरणें’ गैलंड. सेलाल जनों के पलायन का कारण था, ऐसा दारमा रं जन और बुंड.स्येला जन कहते हैं। एक दिन गैलंड. सेलाल जनों ने इस समस्या का समाधान हेतु आपसी विचार विमर्श कर पंचायत का आयोजन किया, आगे भविष्य में गाँव तक सूरज की किरणें पहुंचने में रुकावट न हो करके इस रुकावट पैदा करने वाले पहाड़ को काटने का निर्णय लिया। प्राचीन काल में कोई भी ग्रामजन व बाहुबली जन जब भी किसी विशेष कार्य को करते थे, उस कार्य को प्रण लेकर करते थे और दूसरे क्षेत्र जनों के लिए एक उदाहरण सिद्ध करते थे। यह पहाड़ कटान का कार्य भी गैलंघ ग्राम जनों ने प्रण लेकर किया, प्रण लिया यदि हम एक ही रात में भोर सवेर से पहले इस पहाड़ को काट सके तो यहीं रहेंगे अन्यथा इस मातृ भूमि को छोड़कर कहीं और प्रवास पर चले जायेंगे।
(यह बात उस प्राचीन त्य वचन समय की है जब लोग अपने वचनों का सौ प्रतिशत मान रख उस वचनों पर अडिग रहते थे और मानव, वनस्पति व पशु पक्षियों की आपस की परेशानी को समझते हैं, साथ ही उस युग में वर्तमान का नौ दिन-एक दिन और वर्तमान नौ रात-एक रात के बराबर माना जाता था।)
पौराणिक गाँव-गैं ‘गैलंड.’ ग्रामजनों ने विशेष चाँदनी रात का दिन निश्चित कर ग्राम विधिवत पूजा-पाठ किया और भूमि-पूजन कर ग्राम जन अपने-अपने गैन्थी, फावड़ा, छैनी, साम्बल, घन और अन्य हथियारों को लेकर बलशाली ग्राम योद्धा युवक उस पहाड़ को काटने निकले, गाँव के बाहुबल योद्धा युवक दल ने पहाड़ का मध्य-निचली तल भाग को गुफानुमा काट-काटकर दोपहर तक गिराने की बहुत कोशिश की पर पहाड़ का चट्टान ठोस पत्थरों के होने के कारण योजना मुताबिक यह पहाड़ नहीं गिरा पाए। फिर दुबारे इसी दल ने पहाड़ के उच्च सिरा भाग से इस चट्टान का कटान करना शुरु किया। चट्टान काटते- काटते, तोड़ते-तोड़ते पहाड़ की चोटी को लगभग आध तक काट दिया पर समय बीतता जा रहा था। समय बीतते- बीतते तड़के बोर सवेर हो जाने के कारण उन्होंने उस कार्य को वहीं रोक दिया, वे उस पहाड़ को पूर्ण तोड़ नहीं पाये। बुंघ स्येला पितृ पूर्वज जनों के द्वारा उस प्राचीन समय पर तोड़े गये पहाड़ के टुकड़े और हथियारों के निशान के साक्ष्य वर्तमान समय पर भी साफ-साफ दिखाई देते हैं। पहाड़ के मध्य निचला तल भाग के जिस जगह पर चट्टान कटान का कार्य किया गया था, उस जगह पर वह पहाड़ इतना बड़ा गुफानुमा कटान हुआ है, जिस पर अनेकों लगभग 100-150 लोग एकत्रित हो सकते हैं। बाद में गैलंघ स्येला जनों ने उस पहाड़ को योजना मुताबिक नहीं तोड़ पाने के कारण वर्तमान बौनाल राठ- ‘ बुंड.स्येला ’ के पितृ पूर्वज जनों ने प्रण के मुताबिक गैलंघ गाँव से पलायन करने का निर्णय किया।
बुंड.स्येला पितृ पूर्वजों का पलायन करते समय पास के ग्राम-वर्तमान स्येला वासियों के पितृ पूर्वजों ने काफी समझाया पर वे उनकी बात को नहीं माने। अपने प्रण के मुताबिक अपनी वर्तमान जन्म- कर्म भूमि को छोड़कर वे वहाँ से चलते चलते वर्तमान बौंन गाँव पर जाकर बस गए, आजकल उन्हें ग्राम-बौंन, का बौनाल बुंड.स्येला राठ जन कहते हैं। यह ग्राम बौंन, राठ बुंड.स्येला, सेला ह्या गुरु गैलंड. देव को अपना ईष्ट देव मानते हैं।

महादेव गुफा ‘प्राचीन महादेव ध्यान साधना गुफा’ ग्राम सीपू

नरेन्द्र न्यौला ‘पंचाचूली’
‘हिम गिरी-देव भूमि’ उत्तराखण्ड देव- देवियों, सन्यासियों, रिषि-मुनियों व लामाओं का ध्यान साधना ‘तप केन्द्र भूमि’ आदि काल से ही रहा है। इस हिम देव भूमि में ऐसा भी एक ग्राम है। जहाँ देवाधिदेव जी का ‘साक्षात पदचिन्ह व आध्यात्मिक ध्यान साधना गुफा’ विद्यमान है। यह उस समय की बात है। जब दिव्य शक्ति प्राप्त विशेष व्यक्ति सन्यासी और भगवान देवों में विशेष क्षण पर परस्पर साक्षात्कार होता था। देवाधिदेव महादेव जी हिमालय क्षेत्रों से बाहर के ‘शिवालयों प्रवास’ से वापसी के दौरान दारमा से होते हुए जब वे अपने मूल निवास स्थान ‘कैलास मानसरोवर’ वापस जा रहे थे। इसकी सूचना मिलते ही दारमा लुंग्मा के सभी स्थानीय ‘सैं समा-देवी देवताओं’ व क्षेत्र जनों ने सैं ह्याजंगरी जी के मार्गदर्शन में अतिथि तपस्वी बाबा जी का न्यौंला पंचाचूली हिम शिखर के निकट भव्य रूप से स्वागत किया।
तपस्वी भोले बाबा शिव ने स्थानीय देवी-देवताओं के प्रेम भाव और ग्राम जनों की आस्थामय पाठ-पूजन के साथ- साथ ग्राम सीपू क्षेत्र के आस-पास के प्राकृतिक, नैसर्गिकता, रंग बिरंगे पफूलों की फुलवारी भोज वृक्षों की सिलसिलेवार नर्सरी, जड़ीबूटी की सुगन्धता, कस्तूरी मृगों (देव मृगों) के विचरण और यहाँ की भौगोलिकता से प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने ग्राम सीपू में अपने पद को विराम दिया। इस क्षेत्र की ‘आध्यात्मिक ध्यान साधना ’ को महसूस करने के लिए यहीं रुके, ग्राम सीपू से कुछ दूर एकान्त क्षेत्रा में ध्यान साधना हेतु एक ही रात में ‘ध्यान साधना गुफा’ का निर्माण करवाया जिसे हम रं लुंग्बा जन ‘महादेव गुफा’ के नाम से सम्बोधित करते हैं। इस ‘ध्यान साधना गुफा’ में महादेव जी ने महत्वपूर्ण दारमा प्रवास के लगभग तीन माह बिताए। बाद में रं लुंग्बा के सभी देवी-देवताओं ने सदा दारमा लुंग्बा को ही अपना स्थायी तपस्थली बनाने का बहुत अनुरोध् किया लेकिन महादेव जी स्थायी तपस्थली वाली बात को न मानते हुए, यहाँ प्रवास में प्रत्येक साल आने की बात पर सहमति दी और महादेव जी ने दारमा से दूसरे दिन प्रस्थान की तैयारी की परन्तु स्थानीय तपस्वी सै। ह्याजंगरी जी अपने तंत्रामंत्रा शक्तिबल से जिस दिन महादेव जी कैलास पर्वत जा रहे थे उसी दिन लगातार तेज बर्फबारी व ओलावृष्टि करा दी। महादेव जी जैसे-जैसे आगे कैलास की ओर जा ही रहे थे, ग्राम ढाकर के सामने बर्फीला पहाड़ी मार्ग से पैर फिसल कर गिर गये, जिससे उनका एक पैर जख्मी हो गया। तदोपरान्त ‘सैं ह्याजंगरी जी’ ने महादेव जी की मदद करते हुए उनको ग्राम सीपू महादेव तपस्थली गुफा की ओर वापस लौटे। वापस लौटते समय ग्राम सीपू क्षेत्र मार्ग पर स्थित पौराणिक शिलाखण्ड पर भोले शिव जी के पद पड़े और उस शिलाखण्ड पर पद चिन्ह के निशान पड़ गये, जो आज भी उस शिलाखण्ड पर विद्यमान है।
महादेव जी के इस ‘पद चिन्ह युक्त पौराणिक शिलाखण्ड’ के पास ही मन्दिर स्थापित कर ग्राम जन सदियों से पूजा अर्चना करते आ रहे हैं व महादेव जी आशीर्वाद ग्राम जनों को ‘सुरक्षा सुख समृद्धि के रूप में प्राप्त होता रहता है। सैं ह्याजंगरी जब जब महादेव जी को ‘महादेव तपस्थली गुफा’ में छोड़कर लौट रहे थे। उस वक्त महादेव खौला के प्रवेश स्थल के पास में ही सैं ह्याजंगरी ने अपने हाथ में लिए सूखे भोज वृक्ष से बनी लट्ठी वाले ठण्डे पर मंत्रणा कर उसे रोप दिया और ग्राम जनों की उपस्थित में कहा कि अगर महादेव जी इस गुफा में प्रवेश के बाद भी हमेशा किसी भी रूप में यहाँ वास करेंगे-रहेंगे तो यह सूखी भोजवृक्ष लट्ठी ‘मेरा हमसफर भोज वृक्ष लट्ठी’ हरा-भरा होकर पेड़ का रूप ले लेगा अगर महादेव जी का अंश का वास यहाँ नहीं होगा तो यह रोपित भोजवृक्ष लट्ठी हरित नहीं होगा। लेकिन चमत्कार हुआ। कुछ दिनों बाद सैं ह्याजंगरी जी द्वारा वह रोपित भोजवृक्ष लट्ठी ने पौध्े स्थल में लोगों की आस्था केन्द्र के कारण पौराणिक पौध भोजवृक्ष विशाल हरा-भरा भोज वृक्ष के रूप में आज स्थित है। यह ध्यान देने वाली बात है कि उस विशाल पौराणिक भोज वृक्ष से लगभग डेढ़ किलो मीटर के परिक्षेत्र में कोई भी भोजवृक्ष का पेड़ नहीं है। इससे पूर्णतया प्रमाणित होता है कि यह भूमि भोले बाबा शिव की ‘ध्यान साधना तप भूमि’ रही है और उनका ग्राम सीपू व क्षेत्रा जनों के रक्षक रूप में हमेशा विराजमान रहता है।
ऐसा माना जाता है कि ग्राम सीपू का नाम हमारे ग्राम पूर्वज बुजुर्गों व देव दूत ‘धामी जी’ ने भगवान महादेव शिव जी की आध्यात्मिक ध्यान साधना की तपस्थली होने के कारण ‘शिव से सीपू’ रखा। पौराणिक कथाओं और गाथाओं के अनुसार उत्तर पूर्व भोंट प्रान्त के भोले बाबा शिव ने जिस महादेव ध्यान साधना गुफा में तपस्या की थी तभी से देवाधिदेव प्रत्येक साल साक्षात प्रवास पर ग्राम सीपू महादेव गुफा में आते हैं। बाद में ग्राम जनों ने महादेव ध्यान साधना गुफा में ही ग्राम रक्षक शिव पूजा स्थल का चयन किया और प्रत्येक साल में एक बार उस पूजा स्थल में जाकर देवाधिदेव महादेव जी पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। ग्राम सीपू, शिव स्थापित स्थल पर ग्राम जन छः वर्ष में एक बार महापूजन का आयोजन कर धूमधाम से महादेव महा महोत्सव मनाते हैं। इस महोत्सव में देश प्रदेश के सभी ग्राम परिवार जन उपस्थित रहते हैं। कुछ श्रद्धालु जन महादेव गुफा पूजा स्थल में जाकर महादेव जी की पूजा अर्चना करते हैं।
आज भी 500-600 साल पहले ग्राम बुजुर्ग जनों ने ग्राम रक्षक देवाधिदेव महादेव जी का ध्यान साधना भंग न हो व गुफा को संरक्षण प्रदान करने के वास्ते विशालकाय दरवाजे का निर्माण करवाकर गुफा के मुख्य द्वार पर लगवाया। इस प्राचीन महादेव ध्यान गुफा मुख्य द्वार में उस प्राचीन समय पर लगवाए गए दरवाजे के अवशेष वर्तमान समय में भी विद्यमान हैं। महादेव गुफा दुर्गम खतरनाक क्षेत्र में स्थित है। इस कारण आज से 120-130 साल पूर्व ग्राम जनों की एक राय बनाकर ‘शिव ध्यान गुफा’ से शिवलिंग लाकर गाँव के पश्चिमी छोर में मन्दिर की स्थापना कर पूजा अर्चना करने का निर्णय लिया। प्रत्येक साल ग्रामजन महादेव जी की पूजा अर्चना गाँव में स्थापित महादेव शिव स्थल में परम्परागत ढंग से करते हैं। महादेव जी की कृपा दृष्टि सदा सभी क्षेत्रा वासियों में बनी रहती है। इस महादेव गुफा के अन्दर अनेकों शिवलिंग विराजमान हैं।
ग्राम सीपू भ्रमण के दौरान श्रद्धालु जन बताते हैं कि ‘महादेव गुफा’ परिसीमन के आसपास में सच्चे स्वच्छ निर्मल मन से उँ मंत्र का जाप करें तो पर्यावरण से उँ की ध्वनि तरंगों की गूंज सुनाई देती है। हजारों साल पहले देवाधिदेव महादेव जी ने जिस स्थान पर बैठकर साक्षात आध्यात्मिक ध्यान तप किया। देवाधिदेव महादेव जी के इस पवित्र भूमि शिव स्थल पर पहँुचकर एक क्षण में ही आत्मा में ऐसी शुद्धता का महसूस होता है। मानो सांसारिक दुनिया से ‘आत्मा का परमात्मा’ के साथ परस्पर मिलन की अनुभूति होने लगती है। बहुत साल पूर्व गाँव वालों ने शिव अंश पंच धातु का त्रिशूल ‘शिव ध्यान साधना गुफा’ में स्थापित किया। समय-समय पर श्रद्धालु जन वहाँ पहँुचकर शिवमय हो जाते हैं। इन सभी पूर्व की घटना और वर्तमान में मन की आत्मीयता का अनुभव से सिद्ध होता है। सीपू महादेव जी की गुफा में महादेव शिव आदिकाल से ही विराजमान है और इस महादेव गुफा के अन्दर बहुत सारे शिवलिंग है।
कुछ लोग बताते हैं कि सीपू प्रथम साक्षात प्रवास के बाद देवाधिदेव महादेव जी महादेव ध्यान साधना गुफा के पिछले द्वार से आदि कैलास (छोटा कैलास), उँ पर्वत होते हुए कैलास मानसरोवर अपने स्थायी तपस्थली को चले गए।

जैं श्री कल्या लोहार जी- विशालकाय दैत्तीय सर्प अजगर संहारक

इतिहास-कथा
नरेन्द्र ‘न्यौला पंचाचूली’
दारमा घाटी का ग्राम- नागलिंग दो शब्द नाग और लिंग से मिलकर बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ नाग /शिव सर्प एवं लिंग शब्द का शाब्दिक अर्थ भोले बाबा /शिव अंश से है। किवदंति है कि इस नागलिंग ग्राम में विशालकाय दैत्तीय सर्प अजगर रहता था।
यह साँप जिस प्रकार से मनुष्य मानवीय और अमानवीय दोनों प्रवृत्ति के होते हैं। ठीक इसी प्रकार यह विशालकाय अजगर सर्प भी जीव-जन्तु भक्षी/नरभक्षी आतंकित प्रवृत्ति का था, वह अजगर जीव-जन्तु के साथ नर भक्षण भी करता था। भूख की स्थिति में वह रास्ते में दिखाई देने वाले मनुष्य को निगल लेता। इस हाहाकार स्थिति से मुक्ति पाने का किसी के पास कोई ठोस उपाय नहीं था। उसी दौरान दारमा लुंग्बा नागलिंग गाँव में अंफरों /लोहार श्री कल्या लोहार जी भी रहते थे, जिनको रं लुंग्बा का ‘प्रथम रं विश्वकर्मा’ लोहार माना जाता है। उन्होंने अपनी बुद्धि, बहादुरी एवं पेशे की कुशलता के बलबूते पर दैत्याकार सर्प को मारने की रणनीति बनायी। जब दुश्मन शक्तिशाली ताकतबर बलवान होता है, उसे ‘शक्ति बल’ से नहीं ‘बुद्धि बल’ से हराया जा सकता है। इस सिद्धान्त की नीति को अपनाते हुए उन्होंने सर्वप्रथम दैत्य अजगर से मित्रता की, उसका गुणगान कर सच्चे मित्र के रूप में विश्वास जीता (यह युग पशु-पक्षी, सजीवों का आपस में बोलने व भावनाओं को समझने का युग था) और प्रार्थना की- आप विशाल काय हो, आपको उचे नीचे पथरीले राह में पेट भरने के लिए इतना कष्ट करना, मुझसे देखा नहीं जाता इसलिए आपसे विनम्र प्रार्थना करता हूँ कि आप आराम से यथा स्थान अपने क्षेत्र के आसपास में ही रहना, आज से आपके भोजन की व्यवस्था आपका सच्चा दोस्त मै। करुँगा। सभी ग्राम मिलकर बारी-बारी से जो भी उपलब्ध् खाद्य पदार्थ जैसे भेड़ बकरी और अन्य खाद्य पदार्थ दारमा लुंग्बा में होगा, यथाशीघ्र आपको उपलब्ध् कराता रहूँगा, बस आपसे एक छोटी सी विनती यह है कि आप भोजन ग्रहण करते समय अपनी आँखें बन्द रखना क्योंकि आपकी आँखें खुली रहने से भोजन उपलब्ध् कराने वाला दारमा लुंग्बा जन भयभीत रहते हैं। इस तरह विशालकाय अजगर सर्प को बिना मेहनत करे बैठे-बैठे भोजन मिलने लगा। इसी दौरान कल्या लोहार जी ने भी अपनी स्थायी आजीविका के लिए अपना अफरो को नागलिंग ग्राम से लगभग एक किमी दूर आगे ‘ताबुला’ नामक स्थान पर स्थापित किया और भविष्य की योजना को अंजाम देने हेतु दारमा जनों से मिलकर तैयारी शुरु कर दी। अपने अफरो/आफरों के आसपास नदी-नालों से अधिकतर गोलनुमा अण्डाकार और कुछ नुकिलानुमा पत्थरों को एकत्रित किया और करवाया। साथ ही एक शुभ अवसर त्यौहार का दिन चुना जहाँ निकट ग्रामों के प्रत्येक घर से विशेष पकवान बनवाये गये। इन पकवानों के साथ योजनानुसार बारुद रूपी उन पत्थरों को आफरों में अधिकतर गर्म यानी लाल सुर्ख करना शुरु किया, दैत्य अजगर से विनती की कि हमारे जंगली जीव-जन्तु, हम सबके रक्षक, महाराज आज हम सभी दारमा ग्रामजनों ने विशेष पर्व ;त्यार में विशेष पकवान बच्छी/पूरी, चुन्या/पकोड़ी, हलवा, चावल/छकु, स्या/ मीट, पलती गुढ़े, फाफर गन्दु, मर्ती-च्यक्ती तैयार कर रखा है। कृपया आप इन्हें ग्रहण करें।
सर्वप्रथम मर्ती-च्यक्ती (स्थानीय शुद्ध एल्कोहल) पिलाकर विशालकाय अजगर को मदहोश किया गया और मीट खिलाया गया। फिर ग्रामजनों द्वारा तैयार पकवानों साथ-साथ गोल गरम-गरम लाल सुर्ख पत्थरों को तब तक खिलाया गया, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो गया। दैत्य अजगर भर्ती-च्यक्ती (स्थानीय शुद्ध एल्कोहल ) के नशे में मदहोश होने के कारण उसे पता नहीं चला कि मैं कितना खा चुका हूँ। परिणामस्वरूप इन गरम-गरम लाल सुर्ख पत्थरों को तब तक खिलाया गया जब तक लक्ष्या की प्राप्ति न हो गया। दैत्य अजगर मर्ती-च्यक्ती (स्थानीय शुद्ध एल्कोहल) के नशे में मदहोश होने के कारण उसे पता नहीं चला कि वह कितना खाना खा चुका है। परिणाम यह हुआ कि गरम-गरम लाल सुर्ख पत्थरों ने अजगर के पेट में बारुद का सा काम किया और विस्फोट के साथ फट पड़ा। इस भयंकर विस्फोट में अजगर के शरीर से चीथड़े उड़ गये, जिससे इस दैत्यकार आतंकित सर्प का अन्त हुआ।
नागलिंग और चल गाँव के आर-पार अजगर की अंतड़ियां विशाल चट्टानों पर चिपकी पड़ी हैं। इस निशानी सफेद भूरे कालेनुमा आँतों की लकीरें दूर से आज भी स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। जय श्री कल्या लोहार जी के अफरों रूपी पत्थर के निशान आज भी उस स्थान पर विद्यमान हैं, जिनमें गोल बारुद रूपी पत्थरों को गर्म किया गया था। कल्या लौहार कोई साधरण व्यक्ति नहीं बल्कि अवतारी पुरुष थे। रं लुंग्बा में जय श्री कल्या लोहार जी, ‘प्रथम रं विश्वकर्मा’ के रूप में अवतार लेकर देवभूमि को इस दैत्याकार विशाल अजगर से बचाने को अवरित हुए थे।
एक कथा के अनुसार जब शिव भगवान अपनी स्थानीय तपस्थली की खोज में घूमते-घूमते दारमा घाटी के इस ग्राम में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि इस घाटी के क्षेत्रवासी नरभक्षी/जीवभक्षी विशालकाय साँप अजगर के आतंक से आतंकित हैं। तब भोले बाबा के नाग ने यहाँ क्षेत्रवासियों को इस आतंक से मुक्ति दिलाने के लिये ‘जय श्री कल्या लोहार जी’ का रूप धरण कर इस आतंक रूपी अजगर का अन्त किया। तभी से दारमा के इस ग्राम का नाम शिवअंश के नाम से नागलिंग पड़ा।
विशेषता- ग्राम नांगलिंग, रं लुंम्बा, दारमा का ऐसा गाँव है, जहाँ दिन में सात बार धूप निकलती और छुपती है। इसका कारण सात चोटियों से होकर उसे गुजरना होता है।