
कुमाउंनी गीत संगीत एवं गायकी की सुर साम्राज्ञी बीना तिवारी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वह कुमाउंनी और गढ़वाली गीतों की उस जमाने की गायक कलाकार रही हैं जब आकाशवाणी लखनऊ से इनकी शुरुआत हो ही रही थी। यह करीब सन् 1963 के शुरुआती दिनों की बात है। इससे पूर्व कुमाउंनी और गढ़वाली गीतों के प्रसारण की आकाशवाणी लखनऊ से कोई व्यवस्था नहीं थी। हाँ,ं स्थानीय मेलों एवं कौतिकों में लोकगीत गाए एवं बजाए जाते थे। हालांकि उस समय कुमाउंनी और गढ़वाली के कई गीतकार गीतों की रचना में लगे हुए थे। कुछ स्वयं गाते भी थे।
कुमाउंनी और गढ़वाली लोकगीतों के हिमायती कुछ प्रबुद्ध विद्वानों ने आकाशवाणी लखनऊ से ‘उत्तरायण कार्यक्रम’ नाम से इसकी शुरुआत की। इसकी जिम्मेदारी जयदेव शर्मा ‘कमल’ और जीतसिंह जड़धारी को सौपी गई। ये दोनों गढ़वाली में कार्यक्रम करते थे और कुछ कुमाउंनी के गीत बजाया करते थे। कुमाउंनी के लिए कम्पीयर के रूप में बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ को लाया गया। 7 जनवरी 1963 से वे उत्तरायण कार्यक्रम से जुड़ गए। तब कुमाउंनी गढ़वाली गीतों को गाने वाले गायक कलाकारों को खोजा जाने लगा। कुमाउंनी लोकगीत गाने के लिए बीना तिवारी का चयन किया गया। बाकायदा स्वर परीक्षा के बाद ‘बी’ हाईग्रेड कलाकार के रूप में उनका चयन किया गया। मैं समझता हूँ लोक भाषा कुमाउंनी के गीत गाने वाली तत्कालीन बी हाईग्रेड कलाकार के रूप में वह प्रथम महिला गायिका रही हैं। उन्होंने कुमाउंनी के साथ साथ गढ़वाली के भी कई लोकगीत गाए हैं। आकाशवाणी लखनऊ के उत्तरायण कार्यक्रम में उनके गाए गीतों के प्रसारण के बाद श्रोताओं से उन्हें जो प्यार और वाहवाही मिली वह काबिले तारीफ रही।
बीना तिवारी का जन्म पिता कृष्णचन्द्र और माता मोहिनी देवी के घर 14 जनवरी 1949 को लखनऊ में हुआ। उनका मूल पैतृक गाँव ज्योली अल्मोड़ा है। उनकी शिक्षा दीक्षा लखनऊ में ही हुई। उन्होंने बीए, संगीत निपुण तक की शिक्षा भातखण्डे संगीत महाविद्यालय लखनऊ से प्राप्त की। उनके संगीत एवं गायन में महारत हासिल करने में गोविन्द नारायण नातू और कृष्णराय की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में कुछ समय के लिए बेगम अख्तर और बिरजू महाराज के सानिध्य में रह कर भी उन्हें संगीत एवं गायन सीखने का अवसर मिला।
उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ से जुड़कर कुमाउंनी गढ़वाली गीतों के अलावा हिन्दी के गीत गजल एवं भजन भी गाए। आकाशवाणी लखनऊ के अलावा आकाशवाणी रामपुर, नजीबाबाद और अल्मोड़ा केन्द्रों से भी उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है।
प्रतिष्ठित गीतकारों में चारुचन्द्र पाण्डेय, शेरसिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गोपालदत्त भट्ट, हीरासिंह राणा, बृजेन्द्र लाल साह, बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’, चन्द्रसिंह राही, केशव अनुरागी, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा ’ आदि के गीतों का अपने सुरीले कण्ठ एवं मोहक स्वर में गाकर स्वयं भी लोकप्रियता हासिल की और गीतकारों को भी अमर कर दिया।
उस समय के इनके गाए गीत काफी चर्चित एवं लोकप्रिय रहे। उनमें जैसे- झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, ओ परुवा बौज्यू, दे देवा बाबा जी कन्या को दान, बाट लागी बर्यात चेली, पारा भीड़ा जाणियां बटौव रे, बुरूंशी का फूलों को कुमकुम मारो, गिरधारी तेरो अति चकान, लोरी गीत और रामी बौराणी जैसे अनेकों गीतों को आपने स्वर दिया। जो आज भी सराहे जाते हैं।
आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित कई धारावाहिकों में भी आपने काम किया। बर्ष 2022 की गणतंत्र दिवस की बीटिंग रिट्रीट परेड हेतु ’‘झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी.!’ की धुन को चुना गया था। आपने 6 बर्षों तक मोतीलाल नेहरू कन्या इण्टर कालेज लखनऊ में और 19 बर्षों तक दयावती मोदी अकादमी रामपुर उ.प्र. में संगीत विषय का अध्यापन किया।
देश की नामी गिरामी कई संस्थाओं द्वारा समय-समय पर आपको करीब डेढ़ दर्जन पुरस्कारों/सम्मानों से नवाजा गया परन्तु आश्चर्य की बात है कि सरकारी स्तर पर अद्यतन आपको न संगीत नाटक अकादमी ने याद किया, न उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग ने और न उत्तराखण्ड भाषा संस्थान ने ही आपकी कोई सुध ली। संगीत एवं गायन के क्षेत्र में इनके अमूल्य योगदान का कहीं कोई मूल्यांकन नहीं हो पाया। यहाँ तक कि वयोवृद्ध कलाकारों को मिलने वाली पेंशन से भी इन्हें महरूम रहना पड़ रहा है। उनका कहना है कि कई बार आवेदन करने के बावजूद किसी ने भी संज्ञान नहीं लिया। इस सम्बन्ध में उनका आगे कहना है कि वर्तमान में’ अपनी-अपनी और अपनों की दौड़’ में उम्र की इस दहलीज में किससे कहूं और क्या कहूं। अब तो मन खिन्न हो चुका है और अब तमन्ना भी नहीं रह गई है।
इस लेख के माध्यम से मेरा उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग से अनुरोध है कि कम से कम उन्हें जीवन निर्वाह के लिए पेंशन तो अनुमन्य करवा देवें। उनके द्वारा लोकगीत संगीत क्षेत्रा में दिए गए करीब 50 बर्षों के अमूल्य योगदान का मूल्यांकन का उत्तराखण्ड सरकार को संज्ञान लेना चाहिए।
