नारायण दत्त तिवारी: वह हलचल भरी जिंदगी से घिरे रहे

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
राजनीति के क्षेत्र में दिग्गज रहे  वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी का 18 सितम्बर 2018 को दिल्ली के मैक्स अस्पताल में निधन हो गया। 1935 में इसी तारीख को जन्मे तिवारी जी पहले ऐसे नेता थे जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री बने। तिवारी 1976-77, 1984-85, 1988-89 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। 2002- 2007 तक वे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री एवं 2007 से 2009 तक आन्ध््र प्रदेश के राज्यपाल रहे।

हलचल भरी जिन्दगी से घिरे रहने वाले तिवारी जी का जन्म नैनीताल जिले के बल्युटी ग्राम में 18 अक्टूबर 1925 को हुआ था। इनके पिता पूर्णानन्द तिवारी का विवाह हरिदत्त जोशी की पुत्री के साथ हुआ था। श्रीमती जी के आकस्मिक निधन व अन्य कष्टों से घिरे पूर्णानन्द जी ने संभलते हुए दूसरा विवाह 24 वर्ष की आयु में मातीराम बल्युटिया की पुत्री चन्द्रावती के साथ किया। पिता पूर्णानन्द जी और माता चन्द्रावती के घर 18 अक्टूबर 1925 को नारायण ने जन्म लिया। इनके छोटे भाई प्रोफेसर रमेश तिवारी हैं। नारायण/नरैण की आरम्भिक शिक्षा नैनीताल के आसपास ही हुई। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. और एल.एल.बी. करने वाले एन.डी. 1947 में इलाबाद विवि छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये। 1947 से 1949 तक वह आॅल इण्डिया स्टूडेंट कांग्रेस के सचिव रहे। 1952 में प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर नैनीताल से चुनकर यूपी की विधानसभा में सबसे कम उम्र 27 वर्ष के विधायक बनने का सौभाग्य तिवारी जी को मिला।
तिवारी जी का 1954 में सुशीला तिवारी से विवाह हुआ। 14 मई 2014 को उन्होंने उज्जवला से 88 साल की आयु में विवाह किया। एन.डी.तिवारी उज्जवला के पुत्रा रोहित शेखर के जैविक पिता थे।
1957 में दूसरी बार नैनीताल विस जीतकर यूपी विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने एन.डी. 1962 में चुनाव हार गये थे। 1963 में कांग्रेस में शामिल होकर 1965 में काशीपुर से विधायक चुने गए। 1969 के मध्यावधि चुनाव में जीतकर यूपी सरकार में पहले श्रम, योजना व पंचायतीराज मंत्री बने। यूपी में 1976 में पहली बार, 1984 में दूसरी बार, 1985 में तीसरी बार और चैथी बार मुख्यमंत्री का पद संभाला। 1980, 1996 और 1999 में वह सांसद चुने गये। 1981 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे। 1987 को केन्द्र सरकार में वित्त एवं वाणिज्य मंत्री रहे। 1989 में आम चुनाव में हल्द्वानी सीट जीती लेकिन 1991 में भाजपा के बलराज पासी से नैनीताल लोकसभा सीट हारे। 16 मई 1993 को पत्नी डाॅ.सुशीला तिवारी का न्यूयार्क में कैंसर की बीमारी से निधन हो गया। 23 अगस्त 1994 को यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने 1997 में फिर से अध्यक्ष नियुक्त किये गये। 1998 में नैनीताल से चुनाव हारे और कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दियो। 2002 से 2007 तक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रहे। केन्द्र में योजना, उद्योग, पेट्रोलियम, विदेश मंत्राी रहे एन.डी. की चर्चा प्रधन मंत्री पद तक होने लगी थी।
मृदुभाषी, मिलनसार, विपक्षियों के भी चहेते तिवारी जी ने तराई में औद्योगिक विकास के लिये श्रम किया और रानीबाग की एचएमटी फैक्ट्री को बनाये रखने के लिये श्रमिकों के साथ खड़े रहे। इस महान नेता को पि.हि.परिवार की श्रद्धांजलि।

तिवारी कांग्रेस बनाकर भी देख ली
राजनैतिक पारी खेलते हुए नारायणदत्त तिवारी ने अपने बल पर चुनाव लड़ने के लिये 1994 में अर्जुन के साथ मिलकर पार्टी भी खड़ी की थी। कांग्रेस;तिवारीद्ध के रूप में जनता के बीच उम्मीदवार भी खड़े किये गये लेकिन उसका कोई प्रभाव चुनाव में नहीं पड़ सका था।

निरन्तर विकास समिति के संस्थापक
राजनीति के दांवपेंच में काफी आगे बढ़ने के बाद झटका खा चुके एन.डी.तिवारी निरन्तर विकास समिति के संस्थापक भी रहे। इसके लिये उन्होंने युवाओं के साथ सम्पर्क अभियान चलाया और जगह-जगह सभाओं को सम्बोधित किया।

पर्वतपुत्र-धरती पुत्र की दोस्ती
एन.डी.तिवारी को कई प्रकार की संज्ञाएं दी जाती रही हैं। हिमालय पुत्र, पर्वत पुत्र, विकास पुरुष और भी कई नामों के साथ आदर दिया जाता रहा है। दूसरी ओर यूपी के दिग्गज समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को धरती पुत्र की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार पर्वतपुत्र-ध्रती पुत्रा की दोस्ती घनिष्ठ रही है। एन.डी.तिवारी का हर प्रकार से साथ देने के लिये मुलायम सिंह यादव हमेशा तैयार रहे।
नौछमी नरैणा
अपने मिजाज के कारण हमेशा चर्चा में रहने वाले तिवारी जी को लेकर नरेन्द्र सिंह नेगी का गाया हुआ ‘नौछमी नरैणा’ गीत बहुत चर्चित हुआ। अपने जीवन के कई पन्नों में तिवारी जी वाद-विवाद में रहे लेकिन आन्ध््र प्रदेश का राज्यपाल रहते हुए बुरी तरह पफंस गये और उनका राजनैतिक भविष्य ध्ुंध्ला होता चला गया। बाद में रोहित शेखर के साथ कोर्ट-कचहरी हल्ले के बाद उन्होंने स्वीकार कि वह उनका पुत्रा है। तिवारी जी को चारों ओर से घिरा देख कांग्रेस ने उनसे दूरी कर ली। उनके करीब रहने वाले भी एक-एक कर कन्नी काट गये।
स्वार्थियों ने बुरी तरह घेर लिया था
जिस समय एन.डी.तिवारी की तूती बोलती थी, उन्हें स्वार्थियों ने घेर लिया था। विद्वता से भरे एन.डी. भी पता नहीं किन कारणों से उन स्वार्थियों को नहीं छोड़ पाते थे। आम लोगों में नारे लगने लगे थे- ‘एन.डी. तेरे चारों ओर, लीसा-लकड़ी-पत्थर चोर’। तिवारी जी का नाम लेकर अरबपति बन चुके लोगों ने लाभ लेने तक उन्हें बुरी तरह घेर लिया था और बाद में एकदम छोड़ दिया। तिवारी जी बिना एक कदम भी नहीं चलने वाले ऐसे लोगों ने उन्हें धेखा ही दिया।
के.सी.पन्त को नहीं पचा पाये
राजनीति के दांवपेंच में माहिर एन.डी.तिवारी भारत रत्न पं.गोविन्द बल्लभ पन्त के सुपुत्रा के.सी.पन्त को नहीं पचा पाये। चुनाव के दौरान पं.तिवारी व पं.पन्त के नाम पर कांग्रेस की गुटबाजी सापफ दिखाई देती थी। के.सी.पन्त की विद्वता और नम्रता अपनी जगह थी लेकिन तिवारी जी के दबदबे के आगे उन्हें कांग्रेस छोड़ भाजपा की सदस्यता लेनी पड़ी। उनकी पत्नी श्रीमती ईला पन्त ;भाजपाद्ध ने एन.डी. तिवारी ;कांग्रेसद्ध को नैनीताल लोकसभा सीट पर हरा दिया।