कुर्सी दौड़ शुरु

लोकसभा चुनाव 2019

कार्यालय प्रतिनिधि
लोकसभा चुनाव के लिये कुर्सी दौड़ शुरु हो चुकी है। पूरे देश में पिछली बार प्रचंड बहुमत पाने वाली भाजपा और मुख्य विपक्ष कांग्रेस सहित अन्य दलों का शोर इन दिनों सरदर्द बनकर सुनाई दे रहा है। देश के हालातों पर दुहाई देने के अलावा एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले सभी दलों की पोल खुल चुकी है। क्योंकि इन्होंने अपने शोर को तेज और तीखा करने के लिये कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी है। कांग्रेस के चैकीदार चोर है’ के जबाव में भाजपाईयों ने ‘मैं भी चैकीदार’ का कैम्पन शुरु किया है। साीशल मीडिया पर खामखां की बहस हो रही है। सभाओं, रैलियों, जन सम्पर्कों का दौर चल रहा है। मतदाताओं को रिझाने के लिये युवाओं को सपने दिखाये जा रहे हैं। सबका ध्यान युवा मतदाताओं पर है, जिसकी लहर चुनाव में परिणाम दिलाने वाली होगी। अपनी रणनीति में भी पार्टियों ने युवाओं को टिकट और युवाओं की सभा को प्रमुखता से रखा है। इसे देश की राजनीति में नया दौर कहा जा सकता है। भाजपा में ही लालकृष्ण आडवाणी समेत 23 सांसदों के टिकट इस बार कट गये। दांव-पेंच के लिये दूसरी पार्टियों ने भी अपनी रणनीति को बदला है। कई बुजुर्ग नेता स्वयं को दौड़भाग से दूर रखना बेहतर मान रहे हैं। पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब, कर्नाटक, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित सभी राज्यांे में पार्टियों की जोड़-तोड़ सर्कस की जैसी लग रही है। कितनी जल्द नेता-अभिनेता रंग बदलते हैं, यह इस बार खूब दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश की सीटों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। यहाँ भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा सभी अपनी-अपनी ताकत दिखा रहे हैं। वाराणसी, लखनउ, रामपुर और अमेठी जैसी सीटों पर यहाँ हर पल की तैयारी के लिये चैकन्नापन है। ऐसे में उत्तराखण्ड की पांच लोकसभा सीटों पर भी रोचक मुकाबला होने जा रहा है। यहाँ नैनीताल- उधमसिंह नगर सीट, अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट, टिहरी सीट, पौड़ी लोकसभा सीट, हरिद्वार सीट पर इस बार पार्टियां बहुत सतर्क होकर उम्मीदवार उतार रही हैं। उतारे गये प्रत्याशियों पर जनता कितना भरोसा करेगी, यह सन्देह है। इसलिये स्टार प्रचारकों सहित पूरा दल-बल जुटा हुआ है।
चुनाव के लिये कांग्रेस की ओर से महासचिव प्रियंका गांधी सबसे लोकप्रिय स्टार प्रचारक के रूप में दिखाई दे रही हैं जबकि भाजपा में नरेन्द्र मोदी नाम ही काफी है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका ने अपनी सभाओं में कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है कि वह अपने वोट का सही इस्तेमाल करें। वह कहती हैं कि चुनाव में सच की जीत होगी। असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की लगातार कोशिश की जाएगी लेकिन वे रोजगार, किसानों और महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दों को लेकर सवाल पूछते रहें। आने वाले दिनों में सही निर्णय लीजिए। यह देश आपका बनाया है। यह चुनाव आजादी की लड़ाई से कम नहीं है। हम मिलकर काम करें और एकजुट होकर आगे बढ़ें।
भाजपा की ओर से नरेन्द्र मोदी यह समझा रहे हैं कि भाजपा ही राष्ट्र को सही दिशा दे सकती है। इसके लिये वह अपने कार्यों को उपलब्धि भरा बता रहे हैं। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका निशाना रहा है, आतंक के समूल नाश के लिये उनका प्रण है। कांग्रेस वंशवादी पर चलती रही है जिसने लोकतन्त्र में दूसरों को मौका नहीं दिया। मोदी कहते हैं उन्होंने घोटालेबाजों में खलबली मची है। वह किसी को नहीं छोड़ेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुुल गांध्ी ने देहरादून में विशाल रैली को
सम्बोधित करते हुए कार्यकर्ताओं में जोश भरा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल ने प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जमकर बरसे और कहा मैं मोदी की गलतियों को सुधरुंगा। इस रैली में भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूरी के पुत्रा मनीष खण्डूरी ने कांग्रेस का हाथ थामा।
इन दोनों पार्टियों के स्टार प्रियंका और मोदी के अलावा अन्य बड़े व छोटे नेताओं कागरजना- बरसना जारी है। कई नेताओं ने अपनी पार्टी बदली है और कुछ ने पार्टी का झण्डा उठाया है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांध्ी का कहना है कि प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद को पीड़ित की तरह पेश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मोदी की गलत नीतियों की वजह से देशवासी पीड़ित हैं। प्रधनमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों का राजनीतिकरण किया। साथ ही अपनी नाकामयाबियों को छिपाने के लिए राष्ट्रीय हितों के मुद्दों से खिलवाड़ हुआ। इस चुनाव में बदलाव का जनादेश होना है।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने भाजपा पर तीखा प्रहार करते हुए कहा है कि अंग्रेजों का साथ देने वाले हमें राष्ट्रवाद न समझाएं। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी अनुग्रह नारायण कहते हैं कि मोदी सरकार ने युवाओं, व्यापारियों व जनता के साथ छल किया है। इसका परिणाम भाजपा को चुनाव में भुगतना होगा और कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी। मुख्यमंत्री व भाजपा नेता त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा है कि विपक्ष बौखला गया है और कुप्रचार में जोर दे रहा है। इसका जबाब जनता देगी।
टिकट बंटवारे के साथ ही वोटरों की परिक्रमा का नजारा इन दिनों दिखाई दे रहा है। नैनीताल लोकसभा सीट पर बसपा से नवनीत अग्रवाल, राजेश दुबे ने नामांकन करवाया। प्रगतिशील लोक मंच ने प्रेम प्रसाद को उतारा है। सबकी आँखों में घूम रही इस सीट पर उक्रांद के काशीसिंह ऐरी लोकप्रिय नेता के रूप में दिखाई दे रहे थे लेकिन सत्ता की भूख और दौड़ी में जब सारे हथकण्डे अपनाये जा रहे हैं, यूकेडी संगठन कितना कुछ दम दिखा सकता है, यह सवाल उठने लगा। काफी मंथन के बाद यूकेडी ने अपनी रणनीति बदली। इस सीट पर भाजपा की ओर से विधयक पुष्कर सिंह धामी और संघ से जुड़े राजू भण्डारी के नामों को लेकर चर्चाएं चलती रहीं लेकिन पार्टी ने अन्त में प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को उतारा है। उनका मुकाबला कांग्रेस के दिग्गज हरीश रावत के साथ होना है। दोनों ही पार्टियांे ने बहुत चतुराई के साथ उम्मीदवारों को उतारा है। किसमें कितना दम है यह मतदान के बाद पता चल जायेगा। यहाँ बसपा प्रत्याशी सुन्दर धैनी व निर्दलीय सज्जन लाल ने नामांकन करवाया है। टिहरी लोकसभा सीट पर माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कामरेड राजेन्द्र पुरोहित को अपना उम्मीदवार बनाया है। भाजपा ने सांसद राजलक्ष्मी शाह को ही आजमाते हुए अपनी रणनीति बनाई है जबकि कांग्रेस की ओर से प्रदेश अध्यक्ष प्रतीम सिंह के उपर सारा दारोमदार है। राजनीति के खेल में उलझे रि.कर्नल अजय कोठियाल की आवाज का भी प्रभाव दिखाई देगा। कांग्रेस और भाजपा दोनों की पसंद कर्नल रहे हैं।
अल्मोड़ा- पिथौरागढ़ से नये नामों पर सोचना कठिन था, सो कांग्रेस ने राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा को टिकट देकर सिद्ध कर दिया कि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं था। भाजपा की ओर से केन्द्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा और प्रदेश की बालविकास मंत्री रेखा आर्या के बीच टिकट की तनातनी के बाद अजय टम्टा को टिकट दिया गया। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी ने चुनाव में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने, चुनाव का सम्पूर्ण खर्चा निर्वाचन आयोग द्वारा वहन करने, चुनाव प्रक्रिया में व्यापक सुधर का मुद्दा उठाते हुए एडवोकेट विमला को अपना उम्मीदवार बनाया है।
पौड़ी लोकसभा सीट पर भी रोचक मुकाबला होने जा रहा है। कांग्रेस ने पूर्व मुख्य मंत्री, सांसद और भाजपा के ईमानदार नेताओं में गिने जाने वाले भुवन चन्द्र खण्डूरी के पुत्र मनीष खण्डूरी को मैदान में उतारा है। मनीष ने इस चुनाव के लिये कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर भाजपा मंे खलबली मचा रखी है। बीसी खण्डूरी की छवि का लाभ उन्हें तय है। भाजपा ने अपनी रणनीति बदलते हुए यहाँ तीरथ सिंह रावत को मैदान में उतारा है। श्री रावत ही भाजपा के पास ऐसा विकल्प बचा था जो जनरल खण्डूरी की छवि और उनके पुत्र मनीष के कांग्रेस में जाने के बाद चुनाव मैदान में टक्कर दे सके। स्थानीय मुद्दों को उठाते हुए उक्रांद ने शान्तिप्रसाद भट्ट को मैदान में उतारा है। हरिद्वार लोकसभा सीट पर भाजपा और कांग्रेस में टिकट की खींचतान के बाद भाजपा की ओर से रमेश पोखरियाल का नाम घोषित किया जो पहले से ही तय माना जा रहा था। शुरु से ही लगातार सक्रिय चतुर निशंक को चुनौती देना कांग्रेस व अन्य के लिये भारी है। देखते  हैं कुर्सी दौड़……

बायांगढ़ को बौंगाड़ कहने लगे, कभी चन्द राजाओं का कोट था

पि0हि0प्रतिनिधि
थल। पुंगराउ घाटी का खूबसूरत गाँव है- बौंगाड़। पांखू कस्बे से आधा किमी दूरी पर स्थित इस ग्राम पर कभी बायांगढ़ कहा जाता था। इलाके के बड़े-बुजुुर्ग बताते हैं कि चन्द राजाओं के समय में यहाँ कोट था। आज भी एक टीले के उपर कोट के निशान हैं और मान्यता है कि पुराने समय में अपने विरोधियों को साधने के लिये राजा टीले से हमला कर देते थे। गाँव में कार्की परिवारों की बहुलता है। कई परिवार बाहर बस चुके हैं लेकिन ग्राम की परम्पराओं को शानदार तरीके से बनाया हुआ है।
सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती हरिप्रिया कार्की बताती हैं कि उन्होंने भी अपने बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि उनके पूर्वज नेपाल से यहाँ आये थे। चार भाई बौंगाड़, लोहाथल, दंतौला, चैंसला में रहने लगे। वैसे भी इलाके में शुरु से ही कहा जाता है- ‘‘चार राठ पाठक, चार राठ कार्की।’’
पहले इस ग्राम में प्राचीन ताम्रपत्र प्रधान त्रिलोक सिंह जी के वहाँ पाया जाता था। वर्तमान में व अन्यत्र है। बौंगाड़ की आवादी करीब चार सौ है। प्रधनमंमंत्री सड़क से जुड़े गाँव में शौचालय, कूड़ेदान, पेयजल की उचित व्यवस्था है। इस गाँव के 33 परिवार हल्द्वानी बस चुके हैं। फौज के अलावा अन्य क्षेत्रों में यहाँ के लोग हैं।
इस ग्राम पंचायत में 6 ग्राम आते हैं जिसमें खंडार, नायल, उप्रेतीखोला, बौंगाड़, बोकलकटिया, बंतोला। ग्रामपंचायत से लगा हुआ फल्याटी, तोराथल ग्राम है जहाँ से पैदल रास्ते होते हुए चकौड़ी घूमा जा सकता है। पांखू क्षेत्र के कई ग्रामों में जोहार के वृजवाल परिवार रहते हैं। तिब्बत व्यापार के दिनों में पैदल यात्रा के समय कई परिवार यत्र-तत्र बस थे जो यहाँ भी हैं। पास के इलाके ध्ररमघर में भी जोहार के काफी परिवार हैं। माइग्रेशन के दौरान स्कूल भी यहाँ चलता था, जो वर्तमान की स्थितियों में सरकारी स्कूल के रूप में जारी है।
बौगाड़ ग्राम से थल के लिये पुराना रास्ता भी है, जिसमें अब आवागमन नहीं होता है। पहले ग्रामवासी नियमित रूप से श्रमदान कर मार्ग की सफाई और रख-रखाव करते थे। सर्वोदय संस्था भी यहाँ बहुत सक्रिय रही है। राध बहिन, गोपाल सिंह सहित तमाम लोग बराबर ग्राम विकास के लिये कार्य करते रहे हैं। वर्तमान में युवा प्रधन द्वारा भी लगातार कार्यों किये जा रहे हैं। धन- धन्य से भरपूर इस ग्राम की उन्नति होती रहे और यह दूसरों के लिये भी प्रेरणा बने, ऐसी कामना है।

कार्की समाज के इतिहास व वंशावली पर पुस्तक
बौगाड़ निवासी लोकमान सिंह कार्की ने कार्की लोगों के इतिहास पर पुस्तक लिखी है। चम्पावत जिले में गाँव के नाम तक खर्ककार्की, मंचकार्की सुनाई देते हैं। तमाम रोचक जानकारियों के साथ बनी पुस्तक में 1970 से कार्की उपजाति का इतिहास इसमें दिया गया है। साथ ही इनकी बंशावली। बताया है कि कार्की कोंकण रिसायत के राजा थे। 12वीं शताब्दी में कार्की लोग नेपाल चले गए। कुमाउॅ मंे लोगों के आदि पुरुष को वह संग्राम सिंह बताते हैं। संग्राम सिंह नेपाल में गोरखा शासन से तंग आकर चम्पावत और लोहाघाट के मध्य कन्यूरी गाँव में रहने लगे। संग्राम सिंह के दो विवाह थे। उनके वंशवृक्ष के लोग बौगाड़, चैसाला, लोहाथल, दंतोला, बैराजुबर, मसूरिया, थर्प, चनकाना, भूलधरा, जजोली, ससिखेत, मुवानी, गणाई, रानीखेत, मनान, गगास समेत कई गाँव में कार्की रहते हैं। कार्की कुमाउँ के राजपूत हैं।
पुस्तक का विगत दिवस जिलाधिकारी पिथौरागढ़ डाॅ. रंजीत सिन्हा ने विमोचन किया। लोकमान सिंह का कहना है कि उक्त पुस्तक नई पीढ़ी को उनकी जड़ों को जानने में मददगार होगी। पुस्तक सामग्री पहले एकत्र हो चुकी थी किन्तु धनाभाव के कारण यह देरी से बन पाई।

पिघलता हिमालय 27 मार्च 2017 अंक से

वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी…..

डाॅ.पंकज उप्रेती
‘‘संग्राम जिन्दगी है, लड़ना इसे पड़ेगा…..।’’ इस प्रकार के गीतों को गुनगुनाने वाली हमारी ईजा अब सिर्फ याद आती रहेगी। वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी। बीमारी, अस्पताल, मौत तो उसके निकट थे लेकिन अचानक वह चल देगी ऐसा पता नहीं था।
मुझे याद है पिता के साथ घोर संघर्षों में साथ देने वाली माता ने कितनी परीक्षाएं मौत के लिये दी। अपनी 66 साल का आयु में उन्होंने सौ प्रतिशत संघर्ष किया जिसमें मौत से संघर्ष भी था। बचपन में हम तीन भाई बहन ;पंकज, ध्ीरज, मीनाक्षी सोचते माँ कब ठीक होगी, उसे भवाली सेनेटोरियम में भर्ती करवाना पड़ा। ईजा की बीमारी के समय दैनिक पिघलता हिमालय को बन्द करना पड़ा था। पहाड़ टूट पड़ा था। मुनस्यारी में दुर्गा चाचा ;दुर्गा सिंह मर्तोलिया अपने जीवन संग्राम में बुरी तरह टूट चुके थे। थके-हारे पिता आनन्द बल्लभ ने छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ को बिकाउ होने का विज्ञापन दे डाला था। लेकिन नहीं, परमात्मा को यह मंजूर नहीं था। ईश्वर को हमारा लड़ना ही पसन्द है। पूरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। 6 साल का मैं और 4 साल का भाई ध्ीरज गाँव गंगोलीहाट चले गये। छोटी बहन को नैनीहाल रानीखेत भेज दिया गया। माँ अस्पताल और पिता हल्द्वानी में। संघर्षों के उन सालों में जितने टोने-टोटके, पूजा-पाठ हो सकते थे सब किये पिता ने। ताकि हमारा परिवार बन सके। दो साल के अन्तराल में बिखरा हुआ पूरा परिवार एक हो गया लेकिन कुछ समय बाद ईजा फिर से बीमार हो गई। हम तीनों बच्चे रोते थे। पिफर से दो साल तक घोर संग्राम। पिता भी परेशान थे लेकिन ‘शक्ति प्रेस’ हमारी धुरी था। ‘उप्रेती ज्यू’ को मानने वाले, उनकी ईमानदारी को पहचानने वालों की कमी नहीं रही। ईजा ठीक होकर घर आ गई लेकिन बीमारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पिघलता हिमालय को पिता ने फिर से जीवन दिया और टेªेडिल मशीन के जमाने की मशीनों पर जूझते रहे। खून में व्यापार तो था नहीं, हाँ उनकी कलम की ताकत और ईमानदारी ने परिवार को सम्मान के पद पर खड़ा रखा। बीमारियों और संघर्षों ने हम बच्चों को भी बहुत कुछ सिखाया। हमें सिखाया की दुर्दिन कैसे होते हैं, दुनिया के मेले में कितने प्रकार के चेहरे होते हैं, अपना पराया क्या होता है………..।
मुपफलिसी में दवाईयों तक को पैसे नहीं होते थे लेकिन अखबार निकालना प्रतिब(ता थी। संकल्प ले रखा था इसे चलाने का। ईश्वर कभी कोई दूत भेज देता और उम्मीदें जग जाती। एक दिन हल्द्वानी बेस अस्पताल में ईजा को बाहर रख दिया गया और डाक्टरों ने कह दिया था कि भगवान ही बचा सकता है। हम बच्चे रात्रि में रोते हुए यह कहकर नींद की गोद चले गये- ‘‘हे भगवान! हमारी मम्मी को ठीक कर देना।’’ अगले दिन पता चला कि ईजा ठीक हो गई है। पिता जी अपने कुछ साथियों के साथ रातभर अस्पताल में मौत से जूझ रही ईजा के पास थे। अस्पताल में जाने से पहले मुंह का ग्रास तक छोड़कर जाना पड़ा था उन्हें। उस दिन मेरा जनमबार था और पिता ने तय किया था बहुत दिनों बाद आज ढंग से खाना खायेंगे। उन्होंने खाना पकाया और हम लोग खाना खाने बैठे ही थे कि हमारे पड़ौसी लाला दाउ दयाल जी बताने आ गये कि अस्पताल में चलो, हालत खराब है।
अस्पताल में बहुत समय अकेले ही काटा है ईजा ने। वह हिम्मती थी तभी इतने साल तक उसका शरीर बचा रहा। बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह थकी नहीं बल्कि परेशान इसलिये थी कि उनका परिवार परेशान है। वह कहती थी- ‘‘मैं एमबीबीएस हो चुकी हँू। बीमारियों के कारण सारी दवाईयों के नाम और बीमारियों के बारे में जान चुकी हँू।’’ कई बार मरते मरते बची ईजा बताती थी- ‘‘यमराज के वहाँ आधे रास्ते से लौट कर आई हँू।’’ संघर्षों के इन घोर दिनों को कई जगह किराये के मकान में हमने काटा। इसके अलावा ‘शक्ति प्रेस’ तो हमारा केन्द्र ही रहा। इस पुराने मकान में छापाखान, आन्दोलनकारियों की बैठकें, प्रेस वार्ता, जुलूस-आन्दोलन वालों की भीड़, बच्चों की पढ़ाई और संगीत सबकुछ एकसाथ चलता रहता था। ईजा का शरीर रोग से घिर चुका था लेकिन उसने संघर्ष नहीं छोड़ा। अपनी और अपने परिवार की परेशानियों के बावजूद वह पिता जी के साथ बराबर की हिस्सेदार थी। बैठकों में भाग लेना, अखबार की तैयारी, आने-जाने वालों का तांता सबकुछ मेला सा लगा रहता था। इतना ही नहीं, गंगोलीहाट इलाके के सभी लोगों का अड्डा उस जमाने में हमारा शक्ति प्रेस था। अब तो होटलों में रहने की परम्परा हो चुकी है और फैलते हल्द्वानी में कई लोगों के परिवार-रिश्तेदार हो चुके हैं। मुनस्यारी-धरचूला के कौने-कौने से आने वाले ‘पिघलता हिमालय’ परिवार के सदस्यों को ईजा अच्छी तरह पहचानती थी। घर में रोटी की समस्या बनी रहती लेकिन ईजा-बाबू के लिये आन्दोलन और अखबार जरूरी था। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड में घनी आबादी के बीच प्राइवेट बस अड्डे को हटाने के आन्दोलन में ईजा ने कई बसों के सीसे तोड़ डाले। हम बच्चे भी पत्थर मारकर बस के सीसे तोड़ने को खेल मानकर तोड़ डालते। दरअसल उस समय कई खूंखार लोग अड्डे से जुड़ चुके थे और वह बस अड्डे को वहीं रखना चाहते थे जहाँ पर हमारा छापाखाना था। उन्होंने लोभ भी दिया कि टिकट बुक आपके छापेखाने में ही छपवायेंगे। हल्द्वानी थाने के सीओ पुष्कर सिंह सैलाल जो बाद में एसपी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ईजा को समझाने आते थे- ‘भाभी जी बस अड्डा हट जायेगा, इनके सीसे मत तोड़ना।’ हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले का संचालन ही हमारे ‘शक्ति प्रेस’ से हुआ करता था। बीमार ईजा ने मेले के झण्डे तक सिले थे। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के उस दौर के प्रबुद्धजनों की बैठक वहाँ हुआ करती थी। लोक चेतना मंच से जुड़कर ईजा ने कई जगह प्रतिभाग किया। सीखने की इच्छा में ईजा ने ट्राइसेम योजना के तहत पीपुल्स कालेज में सार्टहैंड भी सीखा। गायत्री परिवार के अभियान में जुड़कर उन्हें सहयोग किया। ईजा को राजनैतिक पार्टियों की ओर से लगातार पार्टी में शामिल होने के निमंत्राण मिलते रहे लेकिन वह कभी किसी से नहीं जुड़ी। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने लखनउ में ईजा को पार्टी से जुड़ने का निवेदन किया लेकिन वह टाल गई। कठोर संघर्षों के बाद एक दिन हमारा छोटा सा घोंसला बना और सारा परिवार एकजुट हो गया। जैसे-तैसे हम भाई-बहिन ने भी अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली। बीच-बीच में बीमारी का सफर भी चलता रहता। सन् 2004 में हल्द्वानी में हमने अपना एक आशियाना बना लिया था- जे.के.पुरम् छोटी मुखानी हल्द्वानी में। इस छोटे से मकान में अपनी नई-पुरानी यादों के साथ पड़ाव डाल दिया। सालों साल की परेशानी के बाद पटरी में आते परिवार को झटका लगा लगा जब बाबू आनन्द बल्लभ जी 22 पफरवरी 2013 को अचानक चल दिये। उनके निधन के 6 माह में ईजा को फालिश/लकवा पड़ गया। अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद ईजा अपने पैरों में खड़ी कर दी गई लेकिन पहले से ही कमजोर शरीर के कारण वह अस्पताल-दवाईयों से बधी रही। इतने के बाद भी ईजा तो ईजा थी। उसकी उपस्थिति हमारे लिये सबकुछ था। 15 सितम्बर 2018 को प्रातः उसने प्राण त्याग दिये। उसे अहसास हो गया था अपने जाना का। सच्चाई की यह कहानी बहुत लम्बी है, फिर कभी……

चैती गायन का परम्परा ही सिमट चुकी है

डाॅ.पंकज उप्रेती
थल-बेरीनाग मार्ग के बीचोंबीच का  इलाका है- काण्डेकिरौली। काण्डे, किरौली, जगथली कभी एक ही ग्रामसभा हुआ करती थी, अब यह तीन ग्राम सभाएं हैं। इसी काण्डे के मूल निवासी पनीराम परम्परागत कलाकर हैं। नागों में मुखिया पिंगलीनाथ के दास के रूप में अपनी परम्परा को आज भी पनीराम और इनता परिवार निभा रहा है। लोक गायन की कई विधओं को जानने वाले 72 वर्षीय पनीराम के शिक्षित पुत्र राजन, गोपाल, महिपाल भी इन विधओं को जानते हैं और मेलों के असल रंग में झूमने के लिये जाते हैं।
पनीराम के दादा रुद्रराम और पिता गुलाबराम जागर व अन्य गायन की अन्य लोक विधाओं के जानकार थे, इन्हीं से सीखे हुए पनीराम आज भी नित्य प्रातः और सायं अपने घर में ढोल बजाकर पिंगलीनाथ का स्मरण करते हैं। ग्रामीण भी इनके मान-सम्मान में कसर नहीं छोड़ते हैं। लोक की यह अद्भुत परम्परा में कोई भेदभाव नहीं है, सब लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं। जिसके घर में जो नई पफसल का जो होता है उसका हिस्सा अनिवार्य रूप से इस परिवार को भी दिया जाता है। ऐसा सामाजिक तानाबाना हमारी कला-संस्कृति को जोड़ने वाला रहा है लेकिन सरकारी धन से कला-कलाकारों के संरक्षण के नाम पर हो रहा खेल दिल दुःखाता है।
पनीराम गंगनाथ की जागर लगाते हैं, जिसे हुड़के पर गाया जाता है। गोल ज्यू, नौलिंग, बजेंण, छुरमल, कालसिन की बंशावली को गाते हैं, जिसे ढोल की संगत में गाया जाता है। ढोल में पिंगलनाथ का स्मरण किया जाता है। वह बताते हैं कि नागों की वंशावली नहीं गाई जाती है, अन्य देवी-देवताओं के भांति नागों के डांगर नहीं होते हैं।
ढोल-जागर के अलावा पनीराम चैती गायन में माहिर हैं। इस गायकी में ट्टतु का रंग, रोमांच और उदासी के स्वर गूंजते हैं। पहाड़ में गाई जाने वाली यह गायकी अब सिमट चुकी है। बातचीत के दौरान वह ढोलकी के साथ सुनाने लगते हैं-
‘ट्टतु औंछे पलटि बरस का दिना
ज्यूना भागी जी रौला,
सौभागी सुणला बरस की ट्टतु……
मालो जानी गबड़ी पलटी आला,
खेवी जानी मौनू पलटी आला,
चैतोलिया मासा भाई भिटोली आला।
जाको न छि भाई, कौ भिटोली आला,
दैराणी-जैठाणी का भाई भिटौली आला,
गोरीध्ना रौतेली, कौ भिटोली आला,
छाजा बैठी गोरी आँसुवा ढोललि……..।’
इसमें चैत मास का वर्णन करते हुए गायक कहता है बर्ष में यह ट्टतु भी अपने समय से आयेगी, सभी राजीखुशी रहें, सौभाग्यवती सुनेंगी, भाबर जाने वाले ग्रामीण लौट आयेंगे जैसे मध्ुमक्खी रस लेकर अपने स्थान पर लौट आती है। इस वर्णन में गायक आगे कहता है- चैत के मास में भाई मिलने आयेगा। बहुत ही कारुणिक वर्णन इसमें है जब वह कहता है- गोरीध्ना का तो भाई ही नहीं है, कौन भिटोली लेकर आयेगा। वह छज्जे में बैठकर आंसु गिरायेगी।
चैती का यह वर्णन बहुत लम्बा है जिसमें आगे बताया गया है कि गोरीध्ना का भाई नहीं था। उसके विवाह के उपरान्त घर में एक भाई हुआ, जो बाद में उसके लिये भिटौली लेकर आया। इस प्रकार पुराने समय में ट्टतु के रंग, रोमांच के साथ करुणरस के स्वरों को घोलता हुआ चैती गीत गाया जाता है। वर्तमान में इसके गायक गिनती भर के हैं, जो गाँवों में घर-घर जाकर इसे सुनाया करते थे और सुनने वाले भी बहुत ही भावपूर्ण ढंग से इसे सुनते और कलाकार को पुरस्कार स्वरूप कुछ देते थे। काण्डे के पास ही बैठोली के दलीराम और उड्यारी के चनरराम भी चैती गायकी के अच्छे जानकार थे। इन्हीं परिवारों में से दलीप राम और मोहनराम ने गणतंत्रात दिवस के अवसर पर सबसे पहले छोलिया नृत्य किया था। यहाँ की ध्नीराम एण्ड पार्टी नैनीताल, लखनउफ, दिल्ली तमाम जगह में जाया करती थी। सनेेती, सनगाड़, भनार, नागमन्दिर बेणीनाग में कभी जबर्दस्त झोड़ा-चांचरी के आयोजन होते थे और परम्परागत कलाकार अपने गाँवों से ढोल-दमुवा बजाते हुए जात्रा के रूप में जाते थे। हुड़कीबौल सामन्यतः धन रौपाई में लगाई जाती है किन्तु यहाँ मडुवा गोड़ाई के समय इसे लगाया जाता था। समय बदला और अब पनीराम के ढोल की स्वर सुनाई देते हैं।

पिघलता हिमालय 19 सितम्बर 2016 के अंक से

आजादी के बाद भी सुलगते सवाल

कमला उप्रेती

स्वतंत्राता दिवस की बधई। हर साल की तरह इस साल भी  ध्ूमधम से मनाया गया आजादी का जश्न। देश की रक्षा और तरक्की के लिये संकल्प दोहराये गये और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ मिष्ठान वितरण हुआ। लेकिन स्वतंत्राता के सही अर्थों को हम हम आज तक नहीं समझ सके हैं। हम अपनी बात मनवाने के लिये वह उस स्वर लगाना चाहते हैं जो विवादी है। आजाद होने का मतलब ऐसी स्वतंतत्रा मान लिया गया है कि चाहे जो कुछ करते रहें। ऐसे में आजादी के बाद भी तमाम सवाल सुलग रहे हैं। देश के सन्दर्भ में हजारों सवाल हैं जो मार-काट पर उतर आये लोग समझने को तैयार ही नहीं हैं।

यहाँ पर बात पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड की ही कर लेते हैं। हमेशा आजाद प्रिय लोगों ने पृथक राज्य भी बनवा लिया लेकिन सवालों के चट्टे लगते जा रहे हैं। रक्षा-सुरक्षा, पर्यावरण, वन, जल, भू, विज्ञान, खेत-खलिहान, शिक्षा चिकित्सा से लेकर हर प्रकार की प्रगति का पाठ विज्ञापन के रूप में सरकारें पढ़वाती रही हैं परन्तु इनकी सच्चाई सामने है। बरसात में 250 से ज्यादा सड़कें प्रदेश में बन्द हैं। भूस्खलन से करोड़ो का नुकसान हो चुका है। आॅलवेदर रोड का सपना बहुत अच्छा है लेकिन इस कार्य में जितनी तोड़पफोड़ हो चुकी है उससे कई ज्यादा नुकसान हुआ है। डम्पिंग जोन में कटिंग का मलबा न डालने का परिणाम ही है कि कई नदियों में टनों मलबा घुल चुका है, हजारों पेड़ कट चुके हैं, पेयजल स्रोत दब गये, बस्तियों को खतरा हो गया। कटिंग का मलबा-पत्थर मीलों तक विकास से पहले का विनाश दिखा चुका है। राहत-बचाव के नाम पर अखबारों की सुर्खियों में बने रहने वाले बेहद सक्रिय हैं। आपदा हमेशा से होती रही है लेकिन आपदा के नाम पर ‘बचाव’ से ज्यादा अपना ‘बनाओ’ की होड़ भी देखी जा रही है। वही कर्ता वही ध्र्ता। खुद ही ठेकेदार, खुद ही खुदान करने वाले, खुद ही मलबा उठाने वाले……….। वाह रे स्वतंत्राता। ऐसी आजादी। अतिवृष्टि से मकान टूटने की घटनाएं हुई हैं लेकिन पहले से खण्डहर मकानों के नाम पर भी मुआवजा लेने वाले जुगत लगा रहे हैं। पीड़ितों के नाम पर आने वाली राहत राशि डकारने वाले नेतृत्व करने को लालायित रहते हैं। ये इतने बेशर्म होते हैं कि पीड़ितों के नाम पर आने वाले राशन, कम्बल, बर्तन, साबुन सबकुछ खा लेते हैं। इन्हंे पूरी आजादी है।

हालात यह हो चुके हैं हम खुद से नहीं संभल पा रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोगल वार्मिंग और वन आवरण घट जाने के कारण उत्तराखण्ड के ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। इससे गंगा, यमुना जैसी नदियों के पानी पर प्रभाव पड़ेगा। भारतीय अन्तरिक्ष शोध् संस्थान ;इसरोद्ध ने उत्तराखण्ड के ग्लेशियरों पर नज़र रखने का निर्णय लिया है। इसरो के पूर्व निदेशक पद्मश्री प्रो.ए.एस.किरण कुमार बताते हैं कि राज्यपाल के आग्रह पर उत्तराखण्ड के ग्लेशियरों में आ रहे बदलाव पर नज़र रखने के निर्देश इसरो के स्थानीय सेन्टर को दिए गए हैं। दूसरी ओर पर्यटन मंत्राी सतपाल महाराज ने गंगा के पानी में रेडिएशन का खतरा बताते हुए प्रधनमंत्राी नरेन्द्र मोदी से नन्दादेवी क्षेत्रा में गुम हुए प्यूटोनियम पैक का पता लगाने की मांग की है। महाराज ने कहा कि 1965 में चीन पर नज़र रखने को भारत और अमेरिका एजेंसी सीआईए की पर्वतारोही टीम ने नन्दादेवी की चोटी पर राडार पिफट किए जाने की कोशिश की। इस राडार का न्यूक्लियर पावर जेनरेटर बपर्फीले तूपफान में गुम हो गया था। उसके टूटने की स्थिति में समूची गंगा का पानी रेडिएशन का शिकार हो समा है।

आजादी का मतलब ऐसी मनमानी हो चुका है कि हम अपनी पर उतर चुके हैं। करोड़ों का एनएच घोटाला अभी तक पहेली बना हुआ है। कुछ पकड़ और कुछ पफरार के बीच जाँच जारी है। चर्चा है कि एनएच-74 मुआवजा घोटाले में जमीन का लैंड यूज बैक डेट में बदलवाकर 30 करोड़ रुपये का मुआवजा हड़पने वाले जसपुर के तीन किसान विदेश भाग गए हैं। इस बीच कुछ मामले पकड़ में हैं। देहरादून में पत्राकारिता की आड़ में दुष्कर्म कर ब्लैकमेलिंग करने वाले पाँच पत्राकारों की गिरफ्रतार हो चुकी है। चम्पावत में नकली नोट जमा कराने के आरोप में बैंक मैनेजर पर मामला दर्ज हुआ है। आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ.मृत्युंजय मिश्रा के खिलापफ जाँच चल रही है। आरोप है कि उन्होंने तकनीकी विवि और आयुर्वेदिक विवि में अनियमितताएं कीं। बिना टैंडर के खरीद सहित कई आरोप डाॅ.मिश्रा पर हैं। टनकपुर में नशे में बौराए पर्यावरण मित्रा ने नगर पालिका के ईओ को पीट डाला।

कुमाउँफ मण्डल आयुक्त राजीव रौतेला को एक पत्रा डाॅ.ओंकार नाथ कोष्टा प्रधनाचार्य राजकीय पालीटेक्निक शक्तिपफार्म जिला उध्मसिंह नगर की ओर से भेजा गया है। बताया जाता है कि आयुक्त ने बैठक के दौरान सख्त तेवर दिखाये। मामला क्या था इसी को लेकर डाॅ. कोष्टा ने जिस सापफगोई के साथ अपनी बात पत्रा में कही है वह हिम्मत की बात है। वह लिखते हैं- ‘‘निर्माण कार्यों की समीक्षा बैठक आपकी अध्यक्षता में काठगोदाम हल्द्वानी में आयोजित की गयी थी,  जिसमें विभिन्न संस्थानों के प्रधनाचार्य भी मौखिक आदेश पर बुलाये गए थे जो कि बैठक के दौरान बाहर बैठे हुए थे। इसी मध्य आपने मुझे बुलाया और पूछना शुरु किया किया। आपने विषयान्तर करते हुए, पोलिटेक्निक क्यों खोले? प्रिंसिपल क्या करता है? आदि आदि प्रश्न अप्रत्याशित रूप से लगभग चीखते हुए, असभ्य तरीके से पूछे। उस समय मुझे बैठने के लिए सीट भी नहीं दी गयी थी। आपके असभ्य व्यवहार के कारण आपकी किसी भी बात का जवाब देना उस समय सम्भव नहीं था। आपके द्वारा मांगी गई सूचना थोड़ी देर बाद मैंने आपको उपलब्ध् करा भी दी थी। इस प्रकार आपने एक वरिष्ठ प्रथम श्रेणी राजपत्रित अध्किारी, एक प्रधनाचार्य और एक ईमानदार प्रतिष्ठित नागरिक का भरी सभा में अपमान किया है। इसके साथ ही समाचार पत्रों में एकपक्षीय सचाचार प्रकाशित करवाकर सार्वजनिक रूप से मेरी प्रतिष्ठा को ठेस पहँुचाई। आपके इस क्रूर व्यवहार की में। निन्दा करता हँू।’’

आजादी का मतलब यह भी मान लिया गया है कि आईएएस अध्किारी पर कोई टिप्पणी नहीं हो सकती। आंखिर क्यों नहीं हो सकती है? उत्तराखण्ड में हमेशा से नौकरशाही हाबी रही है। पार्टियां चुनाव गणित में नचाती रही हैं। शराब को राजस्व का प्रिय स्रोत मान लिया गया है और खनन को सपफलता का आधर। अपराध् की दुनिया नेतागर्दी के साथ दिखाई दे रही है। सुख-शान्ति के लिए पृथक राज्य की मांग हुई थी परन्तु राज्य की अवधरणा को कुचल दिया गया है। विधनसभा सत्रा के दौरान ही बांहे समेटते माननीयों से क्या उम्मीद की जा सकती है। विधयक बनने के चस्के भी अपराध्यिों के पालनहार हैं। अभी ताजा घअना मंे पूर्व स्वास्थ्य मंत्राी तिलकराज बेहड़ को मोबाइल पर जान से मारने की ध्मकी दी गई। तराई की राजनीति में तो गोली-बारुद की बात सामन्य हो चुका है। पहाड़ में भी कुर्सी के लिये हथकण्डे अपनाये जाने लगे हैं। गैरसैंण राजधनी का मामला आज तक अटका हुआ है। भराड़ीसैंण में सत्रा चलाने के नाम पर हुई पिकनिक  ने हमारी सोच को दिखा दिया है। गैरसैंण की मांग को लेकर गैरसंैण में आन्दोलन करने वालों को जबरन उठाने-ध्कियाने के समाचार भी खूब चर्चा में थे लेकिन नेताशाही और अफसरशाही पर कोई असर नहीं हुआ है। प्रदेश को चलाने के लिये मांग-मांग काम चल रहा है। इस बीच प्रदेश सरकार ने आरबीआई से 250 करोड़ रुपये का ट्टण लिया। बताया गया है कि अवस्थापना कार्यों के लिए सरकार ने कर्ज लिया। जुलाई माह में भी सरकार 300 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। इस प्रकार त्रिवन्द्र सरकार अब तक 2150 करोड़ का आरबीआई से कर्ज ले चुकी है। 18 सालों में प्रदेश पर कर्ज की सीमा तकरीबन 45 हजार करोड़ से उफपर पहँुच चुकी है। पिफलहाल आजादी का जश्न मनाते हैं।

पिघलता हिमालय 20 अगस्त 2018 के अंक से

लोक रंगों में रंगा उत्तराखण्ड

डाॅ. मनीषा पाण्डे
इन दिनों पूरा उत्तराखण्ड लोक उत्सवों के रंग में रंगा है। आठूं-सातूं के अलावा जगह जगह होने वाले स्थानीय मेले व बड़े त्यौहारों में लोक कलाकारों के दर्शन हो रहे हैं। सीमान्त में नन्दा पूजन, अल्मोड़ा-नैनीताल सहित अन्य जगह नन्दा-सुनन्दा पूजन, अस्कोट में हीरन-चीतल नृत्य, डीडीहाट में ठुल खेल, चमोली उत्तरकाशी में जात्राओं के आयोजनों के अलावा लोेक देवताओं के पूजन का यह यह समय है। केदारघाटी के बणसू जाखधर में माँ राजेश्वरी की देवयात्रा हुई। देवर, रुद्रपुर, सांकरी, गुप्तकाशी, नाला, नायणकोटी समेत कई जगह भक्तों को आशीर्वाद मिला। 18 साल के अन्तराल में यह यात्रा होती है। उत्तरकाशी के गोपाल मन्दिर में अनुष्ठान जारी है। रुद्रप्रयाग जिले में उफखीमठ देवरियाताल महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ। इसम उफखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर, सारी के भूतनाथ मन्दिर तथा नागराज मन्दिर तक झांकियां निकाली गई। इस इलाके में बहुत प्राचीन मेला है। गंगोलीहाट क्षेत्रा में कई ग्राम पतारबाड़ा, पुनोली, कोठेरा इत्यादि में बच्चों से लेकर बूढ़े तक झोड़े चांचरी की मस्ती में हैं। चम्पावत जिले के देवीध्ुरा का प्रसि( बग्वाल मेला हो चुका है परन्तु स्थानीय स्तर के कई महोत्सवों का क्रम बना हुआ है। तराई भाबर क्षेत्रा में भी पहाड़ से आकर बस चुके लोगों ने अपने ईष्ट-मित्रों के साथ खेलों ;झोड़े-चांचरीद्धका आयोजन किया। लोकमंच का यही असल उत्सव है। लोक उत्सव के क्रम में सोर घाटी के नाम से प्रसि( पिथौरागढ़ शहर में भी अगस्त-सितम्बर के महीने मनाए जाने वाले अनेक मेलों से वातावरण लोक रंजित हो जाता है। यहाँ के गाँव घरों में सातूं-आठूं का पर्व बड़ी ध्ूमधम से मनाया जाता है। इस पर्व में विशेष रूप से गौरा महेश्वर की पूजा की जाती है और उनकी गाथा गाई जाती है। सातूं आठूं की तैयारी पंचमी तिथि से हो जाती है। पंचमी के दिन सभी महिलाएं सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर विरुड़ भिगाती हैं। इसके बाद सप्तमी-अष्टमी को गौरा महेश्वर की पूजा की जाती है। यहाँ ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 17 से 22 अगस्त तक यह मेला ध्ूमधम के साथ मनाया गया। सातूं के दिन पित्रौटा गाँव की महिलाओं द्वारा गौरा का विग्रह बनाकर उसे ढोल-नगाड़ों के साथ नगर में शोभा यात्रा के रूप में घुमाया गया। उसके बाद गौरा के विग्रह को रामलीला मैदान में स्थापित करके पूजा-अर्चना हुई। अगले दिन महेश्वर का विग्रह बनाकर उसे भी गौरा के विग्रह के साथ स्थापित किया गया। आठूं में प्रतिदिन अनेक कार्यक्रम देखने को मिले। हुड़के की थाप पर झोड़ा, चांचरी, न्योली-छपेली के अलावा स्थानीय विद्यालयों ने रंगारंग प्रस्तुतियां दीं। छह दिन तक चले इस मेले के अन्तिम दिन गौरा-महेश्वर का विदाई समारोह ध्ूमधम से हुआ। वर्तमान में गाँवों से पलायन के कारण पहाड़ की यह अद्भुत संस्कृति सिमटती जा रही है। ऐसे में आठूं मेले जैसा भव्य कार्यक्रम रामलीला कमेटी द्वारा कराना सराहनीय है। जो लोेग अपने ग्राम से दूर शहर में बस चुके हैं और उनकी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को नहीं जान पा रही है। उनके लिये यह आयोजन संस्कृति का परिचय पाठ भी है। सोर रामलीला प्रबन्ध् कारिणी के सभी सदस्य बहुत बधई के पात्रा हैं क्यांेकि पिछले नौ वर्षों से उन्होंने इस आयोजन को शहर में करवाकर सबको एकसूत्रा में बांध् दिया है। जिसमें नई पीढ़ी ने भी अभिरुचि ली है।
सोर के कुमौड़ गाँव में मनाया जाने वाली हिलजात्रा ध्ूमधम से मनाई गई। यहाँ कई ग्रामों में हिलजात्रा मनाई जाती है परन्तु कुमौड़ की हिलजात्रा में ‘लखिया भूत’ नामक पात्रा आकर्षण का केन्द्र होता है। इसके भगवान शिव का बारहवां गणमाना गया है, जो भगवान शंकर के क्रोध् से उत्पन्न हुआ था। कहा जाता है कि यह भयानक भूत का मुखौटा नेपाल के राजा ने महर भाइयों को उनकी वीरता से प्रसन्न होकर दिया था। जो व्यक्ति विशेष लखिया भूत का मुखौटा है उसके शरीर पर लखिया अवतरित हो जाता है। इस बार भी भयानक मुखौटा पहने, शरीर पर घंटियों सहित श्रृंगार किये लखिया भूत ने जब ऐतिहासिक हिलतात्रा मैदान में प्रवेश किया तो दर्शकों के रौंगटे खड़े हो गये। लखिया महाराज की जय और लटेश्वर महाराज की जय के नारों ऐ गूंजते मैदान का वातावरण एक बार पिफर से लोक की अपनी मान्यताओं पर सोचने को मजबूर कर देता है। इस आयोजन को कृषि से जोड़ कर भी देखा जाता है। लखिया भूत के अलावा बैलों की जोड़ी, गल्या बल्द का मुखौटा लगाकर, हुक्का पीता व्यक्ति, कमेड़ लगाने वाला, मछुआरे आदि पात्रों भी मैदान में आते हैं। यह सब आस्था के अलावा लोगों का भरपूर मनोरंज भी है।
चम्पावत जिले के पाटन-पाटनी में 14 सितम्बर से चार दिवसीय झूमाध्ूरी कौतिक होना है।
चमोली जिले में बधण और दशोली की मां नन्दा को भक्तों ने कैलास के लिये विदा किया। जागर लगाई गई।

ओ हो रे नैनीताल…..

कार्यालय प्रतिनिध्
पर्यटन नगरी नैनीताल में बढ़ता जा रहा दबाव और चल रही नीति-रीति से अजब हाल हो चुका है। गर्मियों में यहाँ का ताल सूखने लगा है और बरसात में अगल-बगल टूटने लगा है। देशी-विदेशी पर्यटकों की पसंदीदा जगह सरोेवर नगरी नैनीताल की रोजी-रोटी होटल उद्योग है। ऐसे में यहाँ के बाशिन्दों के अलावा बाहर से आकर कापफी संख्या में लोग रहने लगे हैं। बड़ा पैसा, बड़ा दीमाग, बड़ी पहँुच वालों ने उँफची पहाड़ियों से लेकर झील के पास तक साम्राज्य पफैला लिया जबकि पार्किंग के लिये यह पहाड़ी स्टेशन बेचैन है। नैनीताल बचाओ, इसका पर्यावरण बचाओ के नाम पर बहुत नारे लग चुके हैं लेकिन मनमापिफक सजावट पसन्द लोगों ने रातों रात कंक्रीट के ढेर लगा लिये जबकि अपनी ही जमीन पर अपना घंरौदा बनाने के लिये नियम पसन्द लोग परेशान हो चुके हैं। पीढ़ियों से नैनीताल रहने वाले चाह कर भी अपने मकान को न तो सजा पा रहे हैं और न बना पा रहे हैं जबकि नियम का पेंच लगाने वाले यह नहीं बता पा रहे हैं कि वह जिस स्थान पर बैठे हैं वहाँ किस नियम के तहत निर्माण कार्य या सजाया गया था। नैनीताल में लोअर माल रोड ध्ंसने लगी है। ऐसे में मान लिया जाता है कि शहर में बहुत दबाव है और निर्माण कार्यों को रोक कर सबकुछ ठीक कर लिया जायेगा। हाईकोर्ट ने भी झील के दो किलोमीटर के दायरे में निर्माण कार्यों पर रोक की बात कही। बाद में बात-बहस के बाद इस मामले में विचार हुआ। एनओसी लेकर अपनी जमीन पर अपना निर्माण करने वाले अभी तक भटक रहे हैं। दूसरी ओर झील को मजबूती देने के लिये हुए निर्माण कार्य की पोल खुल चुकी है। बार-बार लगाये जा रहे बजरी- सीमेंट का कोई असर नहीं है और सड़क का 25 मीटर भाग टूट कर नैनी झील में समा गया। ऐसे में अपर मालरोड से डिवाइडर लगाकर वाहनों का संचालन किया गया है। इसी समय 25 मीटर और हिस्सा में दरार आ गई।
इस बीच हाईकोर्ट के अनुपालन में नगर पालिका ने चाट पार्क व भोटिया मार्केट चार दर्जन दुकानों के अतिक्रमण हटाये। 36 दुकानों की झाप हटाने के अलावा 16 दुकानों के अतिरिक्त निर्माण को ध्वस्त किया गया। कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद प्रशासन हरकत में है और हाईकोर्ट के खिलापफ नारेबाजी करने वाले व्यापारियों ने क्षमा मांगी।
बहुत ही सीध्ी सी बात है कि चाट हो या चाकलेट, खिलौने हों या कपड़े की दुकान…..सभी ने अपनी जगह तलाशनी है। जिस जगह पर्यटकों की भीड़ और बिक्री की सम्भावना हो वहाँ दुकान जरूर सजेगी। यह बात दूसरी है कि कौन अपनी जगह पर दुकान सजाता है और कौन किराये पर या अतिक्रमण कर। चूंकि नैनीताल में हाईकोट है और न्यायमूर्ति सहित तमाम छोटे-बड़े अध्किारी यहाँ होते हैं। ऐसे में घिचपिच नैनीताल से होकर जाने में यदि इन्हें असुविध हुई तो सख्ती तो होगी ही। पिफर हाईकोर्ट के खिलापफ बोलना तो बहुत ही गलत हो जायेगा। यही सब हो रहा है इस नैनीताल में। यहाँ तक कि हाईकोर्ट को नैनीताल में पसन्द करने वाले भी चाहने लगे हैं कि यह किसी दूसरी जगह चला जाता। चारों ओर से डण्डे बरसने जैसा हो गया है इस सरोवर नगरी में। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, यहाँ के बाशिन्दों को एकजुट होकर न्यायालय का सम्मान करते हुए रास्ता तलाशना चाहिये। आंखिर नैनीताल की रंगत कुछ और ही ठैरी। इसे खूब सजाओ, खूब संवारो। पर्यावरण का ध्यान रखो, अतिक्रमण मत होने दो, जबरन के निर्माणों से बचो। नहीं तो क्याप्प से क्याप्प हो जायेगा।

हरि प्रदर्शनी शुरु करवाने व समाजसेवा में अग्रणीय थे नरसिंह जंगपांगी

 

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्त क्षेत्रा में मल्लादुम्मर में होने वाली हरि प्रदर्शनी क्षेत्रा की इकलौती यादगार प्रदर्शनी है जो आजादी से लेकर आज तक प्रतिवर्ष होती है। इसमें कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने के अलावा स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण किया जाता है। स्व.हरिसिंह ज्यू के याद में होने वाली इस प्रदर्शनी को शुरु करवाने वाले नरसिंह जंगपांगी सहित यादों की लम्बी श्रृंखला को सहेजे श्रीमती कमला रावत उत्तरांचल विहार हल्द्वानी में रहती हैं।
बात जंगपांगी परिवारों की करते हैं तो पता चलता है कि गौचर, थल के पास पतेत में जंगपांगियों का परिवार बसा। यहीं से लगे हुए ससखेत में जंगपांगी परिवार गया। किशन सिंह, मान सिंह, नर सिंह तीन भाईयों ने ससखेत को आबाद किया। किशन सिंह बहुत ही मान्यता वाले व्यक्ति थे और उनकी बात सभी को मान्य थी। इन्हीं के पुत्र हैं- पान सिंह, दीवान सिंह, राजेन्द्र सिंह। दूसरे भाई मान सिंह थे, जिनके पुत्र हुए- मंगल सिंह और महेन्द्र सिंह ‘महन्त’। तीसरे अर्थात छोटे भाई नरसिंह की सात पुत्रियों व एक पुत्र हुए। विवाहित पुत्रियों में खगौती धर्मशक्तू, चन्द्रप्रभा टोलिया, राजेश्वरी पांगती, लक्ष्मी मर्तोलिया, कमला रावत, बसन्ती टोलिया व कोकिला हुईं। पुत्र प्रहलाद सिंह जी ससखेत में हैं। प्रहलाद जी के पुत्र-पुत्रियों में- भूपेन्द्र, महिपाल, देवेन्द्र/दीपू, अनीता पांगती, जुगुनू पांगती, कविता हैं।
नरसिंह जी की पुत्री श्रीमती कमला रावत बताती हैं कि ताउ जी किशन सिंह की बड़ी धाक थी और जनहित के मुद्दों पर सब उनके साथ थे। उनके बाद छोटे ताउ मानसिंह ने भी समाज को जोड़ते हुए परम्परा को बनाये रखा। बुजुर्गों के बाद पिता नरसिंह में भी जिम्मेदारी आई जिसे उन्होंने निभाया। उनका बड़ा परिवार था। तब कृषि व पशु आधारित कुटीर उद्योगधन्धों पर सभी लोग लगा करते थे। खुशहाल गाँवों में चहल-पहल थी। माइग्रेशन सिस्टम में बुर्फू, मल्लादुम्मर, ससखेत तक लोगों का आवत रहती थी। पशुओं के साथ-साथ कई कामगार भी होने से पूरा परिवार व्यस्त था। ऐसे में पठन-पाठन भी प्रभावित होता। पढ़ने की लगन के कारण अवरोध् के बावजूद उन्होंने पढ़ा। तब ससखेत से अल्मोड़ा आने में पांच दिन लग जाते थे। वह पुराने रास्ते तो अब दिखाई भी नहीं देते हैं। अल्मोड़ा में बुआ तुलसी रावत-स्वतंत्रता सेनानी दुर्गा सिंह रावत के घर दूरस्थ क्षेत्रा से बच्चे जाते थे। छात्राओं को बुआ जी के घर में रहने का इन्तजाम था और छात्रों के लिये जोहार भवन में रुकने की व्यवस्था होती थी। अल्मोड़ा में आकर पढ़ने वाले कई छात्रा-छात्राएं काफी आगे पदों तक पहुंचे हैं। जोहार की प्रथम ग्रजुएट इन्द्रा दीदी थीं, जो लखनउ में प्रधनाचार्या रहीं बाद में हल्द्वानी में भी थी।
पढ़ाई के बाद कमला जी जखोली ;टिहरी में एडीओ बनीं। शेरसिंह रावत के साथ विवाह उपरान्त इन्होंने अपनी सरकारी सेवा छोड़ दी। उन दिनों वैसे भी महिलाओं को कम ही नौकरी में भेजा जाता था। अपनी घर-गृहस्थी में रमने के बाद आज श्रीमती कमला रावत पुरानी यादों को तरोताजा रखे हुए बचपन को याद करती हैं। गाँव-घरों के सामुहिक आयोजन, कुटीर उद्योग, व्यापार सिलसिले में यात्रा, पैदल रास्तों होकर मीलों पढ़ने जाना……………………….।
पिघलता हिमालय 1 अगस्त 2016 के अंक में प्रकाशित