चैती गायन का परम्परा ही सिमट चुकी है

डाॅ.पंकज उप्रेती
थल-बेरीनाग मार्ग के बीचोंबीच का  इलाका है- काण्डेकिरौली। काण्डे, किरौली, जगथली कभी एक ही ग्रामसभा हुआ करती थी, अब यह तीन ग्राम सभाएं हैं। इसी काण्डे के मूल निवासी पनीराम परम्परागत कलाकर हैं। नागों में मुखिया पिंगलीनाथ के दास के रूप में अपनी परम्परा को आज भी पनीराम और इनता परिवार निभा रहा है। लोक गायन की कई विधओं को जानने वाले 72 वर्षीय पनीराम के शिक्षित पुत्र राजन, गोपाल, महिपाल भी इन विधओं को जानते हैं और मेलों के असल रंग में झूमने के लिये जाते हैं।
पनीराम के दादा रुद्रराम और पिता गुलाबराम जागर व अन्य गायन की अन्य लोक विधाओं के जानकार थे, इन्हीं से सीखे हुए पनीराम आज भी नित्य प्रातः और सायं अपने घर में ढोल बजाकर पिंगलीनाथ का स्मरण करते हैं। ग्रामीण भी इनके मान-सम्मान में कसर नहीं छोड़ते हैं। लोक की यह अद्भुत परम्परा में कोई भेदभाव नहीं है, सब लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं। जिसके घर में जो नई पफसल का जो होता है उसका हिस्सा अनिवार्य रूप से इस परिवार को भी दिया जाता है। ऐसा सामाजिक तानाबाना हमारी कला-संस्कृति को जोड़ने वाला रहा है लेकिन सरकारी धन से कला-कलाकारों के संरक्षण के नाम पर हो रहा खेल दिल दुःखाता है।
पनीराम गंगनाथ की जागर लगाते हैं, जिसे हुड़के पर गाया जाता है। गोल ज्यू, नौलिंग, बजेंण, छुरमल, कालसिन की बंशावली को गाते हैं, जिसे ढोल की संगत में गाया जाता है। ढोल में पिंगलनाथ का स्मरण किया जाता है। वह बताते हैं कि नागों की वंशावली नहीं गाई जाती है, अन्य देवी-देवताओं के भांति नागों के डांगर नहीं होते हैं।
ढोल-जागर के अलावा पनीराम चैती गायन में माहिर हैं। इस गायकी में ट्टतु का रंग, रोमांच और उदासी के स्वर गूंजते हैं। पहाड़ में गाई जाने वाली यह गायकी अब सिमट चुकी है। बातचीत के दौरान वह ढोलकी के साथ सुनाने लगते हैं-
‘ट्टतु औंछे पलटि बरस का दिना
ज्यूना भागी जी रौला,
सौभागी सुणला बरस की ट्टतु……
मालो जानी गबड़ी पलटी आला,
खेवी जानी मौनू पलटी आला,
चैतोलिया मासा भाई भिटोली आला।
जाको न छि भाई, कौ भिटोली आला,
दैराणी-जैठाणी का भाई भिटौली आला,
गोरीध्ना रौतेली, कौ भिटोली आला,
छाजा बैठी गोरी आँसुवा ढोललि……..।’
इसमें चैत मास का वर्णन करते हुए गायक कहता है बर्ष में यह ट्टतु भी अपने समय से आयेगी, सभी राजीखुशी रहें, सौभाग्यवती सुनेंगी, भाबर जाने वाले ग्रामीण लौट आयेंगे जैसे मध्ुमक्खी रस लेकर अपने स्थान पर लौट आती है। इस वर्णन में गायक आगे कहता है- चैत के मास में भाई मिलने आयेगा। बहुत ही कारुणिक वर्णन इसमें है जब वह कहता है- गोरीध्ना का तो भाई ही नहीं है, कौन भिटोली लेकर आयेगा। वह छज्जे में बैठकर आंसु गिरायेगी।
चैती का यह वर्णन बहुत लम्बा है जिसमें आगे बताया गया है कि गोरीध्ना का भाई नहीं था। उसके विवाह के उपरान्त घर में एक भाई हुआ, जो बाद में उसके लिये भिटौली लेकर आया। इस प्रकार पुराने समय में ट्टतु के रंग, रोमांच के साथ करुणरस के स्वरों को घोलता हुआ चैती गीत गाया जाता है। वर्तमान में इसके गायक गिनती भर के हैं, जो गाँवों में घर-घर जाकर इसे सुनाया करते थे और सुनने वाले भी बहुत ही भावपूर्ण ढंग से इसे सुनते और कलाकार को पुरस्कार स्वरूप कुछ देते थे। काण्डे के पास ही बैठोली के दलीराम और उड्यारी के चनरराम भी चैती गायकी के अच्छे जानकार थे। इन्हीं परिवारों में से दलीप राम और मोहनराम ने गणतंत्रात दिवस के अवसर पर सबसे पहले छोलिया नृत्य किया था। यहाँ की ध्नीराम एण्ड पार्टी नैनीताल, लखनउफ, दिल्ली तमाम जगह में जाया करती थी। सनेेती, सनगाड़, भनार, नागमन्दिर बेणीनाग में कभी जबर्दस्त झोड़ा-चांचरी के आयोजन होते थे और परम्परागत कलाकार अपने गाँवों से ढोल-दमुवा बजाते हुए जात्रा के रूप में जाते थे। हुड़कीबौल सामन्यतः धन रौपाई में लगाई जाती है किन्तु यहाँ मडुवा गोड़ाई के समय इसे लगाया जाता था। समय बदला और अब पनीराम के ढोल की स्वर सुनाई देते हैं।

पिघलता हिमालय 19 सितम्बर 2016 के अंक से

शौका समाज आक्रोशित, मुख्यमंत्री को पत्र भेजा

सचिवालय के विश्वकर्मा भवन सभागार का परिवर्तन कर सम्पूर्ण जनजाति को आहत किया है

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
उत्तराखण्ड सचिवालय के विश्वकर्मा भवन सभागार का नाम परिवर्तन करने से शौका समाज बेहद आक्रोशित है। नाराज संगठनोें ने मुख्यमंत्राी सहित उच्च पदों पर बैठे लोगों को पत्रा भेजे हैं। जोहार मिलन केन्द्र हल्द्वानी, जोहार सांस्कृतिक वेलपफेयर सोसाइटी हल्द्वानी, मल्ला जोहार विकास समिति मुनस्यारी के अलावा उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति देहरादून ने सभी बुद्धिजीवियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट करते हुए चिन्ता जताई है कि नाम परिवर्तन की नीति अपनाई गई है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व कांग्रेस सरकार ने सचिवालय के विश्वकर्मा भवन सभागार का नाम पूर्व मुख्य सचिव व प्रदेश के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त डाॅ. आर.एस.टोलिया के नाम पर रखा था जिसे अब भाजपा शासन ने बदल कर वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम पर कर दिया है। आक्रोशित लोगों का कहना है कि वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली का वह बहुत सम्मान करते हैं और चाहते हंै उनके नाम पर कई कार्य हों लेकिन डाॅ. टोलिया के नाम पर एकमात्रा सभागार का नाम बदलने की राजनीति बर्दाश्त नहीं होगी।
उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति ने प्रदेश के समस्त बुद्धिजीवियों एवं जनजाति समाज की ओर से सरकार से अनुरोध् किया है कि अपनी उदारचेतना एवं व्यापक दृष्टि का पुनः परिचय देकर राज्य के मंत्राीमण्डल द्वारा पारित प्रस्ताव तथा जनभावनाओं का सम्मान करके उपरोक्त सभागार का नाम पुनः स्व. डाॅ.आर.एस.टोलिया के नाम पर करे। साथ ही शासन द्वारा की इस बारे में की जा रही कार्रवाई से समिति को अवगत करा दें ताकि राज्य के जनजाति समाज को निर्णय से अवगत कराया जा सके। समिति के संरक्षक एस.एस.पांगती, अध्यक्ष चन्द्र सिंह ग्वाल, महासचिव सुश्री विमला ने पत्रा जारी करते हुए जनजाति कल्याण सिमति एवं अ0भा0आदिवासी संगठन, रं कल्याण संस्था, नीतिमाणा घाटी कल्याण समिति, जोहार घाटी कमेटी, पूर्व विधयक गगन रजवार, वनराजि समाज संगठन, जौनसार बाबर समिति, जनजाति मोर्चा, बोक्सा आदिम संगठन, जोहार कल्याण संगठन, थारू विकास समिति खटीमा सहित तमाम जगह सम्पर्क किया है। मामले में संगठनों सरकार से निर्णय लेने की मांग की है।
जोहार सांस्कृतिक बेलपफेयर सोसाइटी हल्द्वानी के अध्यक्ष देवेन्द्र सिंह धर्मशक्तू, जोहार मिलन केन्द्र हल्द्वानी के अध्यक्ष डाॅ. पी.एस.मर्तोलिया की ओर से मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड सरकार को पत्र भेजकर अनुरोध् किया गया है कि डाॅ.टोलिया के नाम को यथावत रखा जाए। पत्रा की प्रतिलिपि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी मामले में हस्तक्षेप करने की उम्मीद के साथ भेजी है। कहा है कि हस्तक्षेप किया जाए ताकि उत्तराखण्ड सरकार के इस अविवेकपूर्ण निर्णय से आहत प्रदेश के जनजाति वर्ग इसे पार्टी का दुर्वल वर्ग के प्रति दुर्भावना न माने और आपकी दूसरी पार्टियां इसका राजनीतिकरण न करें।
पत्र में कहा है कि प्रदेश की वर्तमान सरकार द्वारा बिना किसी कारण व औचित्य के अचानक किये गये इस नाम परिवर्तन से उत्तराखण्ड का सम्पूर्ण जनजाति वर्ग व कुमाउँ निवासी और मुख्य रूप से भोटिया जनजाति व पिथौरागढ़ की जनता स्तब्ध् व आहत है। जोहार सांस्कृतिक एवं बेलफेयर सोससाइटी तथा जोहार मिलन केन्द्र के तत्वावधन में आयोजित वृहद सभा के पश्चात मुख्यमंत्री को सम्बोधित इस पत्र में कहा है कि आपके निर्णय पर आक्रोश व्यक्त करने और आपसे जनजाति और मुख्यरूप से जोहार के शौका समुदाय को आहत व अपमानित करने वाले इस निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध् करने के लिये जनभावनाओं का पत्र प्रेषित है। स्व.टोलिया पर्वू मुख्य सचिव व प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त न केवल उत्तराखण्ड जनजाति बल्कि पूरे प्रदेश के गौरव थे। उत्तर प्रदेश सरकार के उत्तराखण्ड राजधनी चयन आयोग के सचिव के कार्यकाल से ही उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। नये राज्य की स्थापना के निर्णय से ही उन्होंने नवगठित राज्य के प्रशासन व विभिन्न विभागों, निगमों व अन्य संस्थओें को सुव्यवस्थित व सुसंचालित करने और दोनों राज्यों में कर्मियों व परिसम्पत्तियों के बंटवारे के कार्यों को जिस निष्ठा और योग्यता से निष्पादित किया उसके कारण उन्हें राज्य का मुख्य सचिव तथा संस्थापक मुख्य सूचना आयुक्त बनया गया। प्रदेश की विकास योजनाओं की परिकल्पनाओं से लेकर उनके सपफल क्रियान्वयन तथा उनकी जो महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह सर्वविदित है कि प्रशासनिक अकादमी नैनीताल को केन्द्रीय स्तर पर मान सम्मान दिलानाभी उन्हीं का कार्य है। उत्तराखण्ड प्रशासन इतिहास के इतिहास पर उन्होंने जो शोध् किये और अनेकानेक शोध्ग्रन्थ लिखे वे न केवल इतिहास के बहुमूल्य व प्रमाणिक अभिलेख हैं बल्कि नवगठित राज्य के प्रशासकों के लिए मार्ग निर्देशिका भी हैं। सेवा निवृति के बाद भी वे उत्तराखण्ड के विकास और पहाड़ से पलायन रोकने की योजनाओं पर जुड़े रहे। इतना ही नहीं, सेवानिवृति के बाद मुनस्यारी जैसे पहाड़ के गाँव में बसकर उन्होंने पहाड़ के पुनर्वास की बात करने वालों के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने जिस योग्यता, निष्ठा और समर्पण की भावना से उत्तराखण्ड के विकास में योगदान दिया उसी के सम्मानस्वरूप उक्त सभागार व कुछ संस्थाएं पूर्ववर्ती सरकार द्वारा उनके नाम पर रखी गयी थी। टोलिया जी गैर राजनैतिक व्यक्ति थे। उनकी निष्ठा अपने राज्य और उसकी जनता के विकास से थी। वे हमेशा धर्म, जाति और क्षेत्रा के संकुचित दायरे से बाहर रहे। उनका सम्मान उत्तराखण्ड की समस्त जनता का सम्मान था और है। इसलिये सभागार से इस तरह नाम हटाया जाना प्रदेश की पूरी जनता और मुख्य रूप से जनजाति वर्ग का अपमान है। सभा के प्रतिभागियों का मानना है कि आदरणीय डाॅ.टोलिया जी को बेवजह कांग्रेस और भाजपा की प्रतिद्वंद्विता में बलि का बकरा बनाने का कृत्य किया गया है। उत्तराखण्ड के अन्य लोगों की तरह जनजाति के लोग भी वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के स्वतंत्रता संग्राम और उत्तराखण्ड की अस्मिता में योगदान के प्रशंसक हैं। उनके नाम पर किसी भी भवन, संस्था, शहर का नामकरण हमारे लिये हर्ष और गर्व की बात होगी। लेकिन इस कार्य के लिए किसी अन्य का नाम हटाना दुर्भावनापूर्ण और अपमान जनक है और इसलिए हमें स्वीकार नहीं है। यह न केवल दिवंगत आत्मा का अनादर है बल्कि समस्त जनता का और मुख्य रूप से डाॅ. टोलिया के जोहार शौका समुदाय का अपमान है।
सभा के दौरान सभी ने एक स्वर से प्रदेश के मुखिया से अपील दोहराई है कि अपने निर्णय पर अविलम्ब पुनर्विचार कर उक्त सभागार का नाम फिर से स्व.आर.एस.टोलिया के नाम पर रखा जाए। वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नाम पर उससे भी अध्कि प्रमुख भवन को किया जा सकता है।
मल्ला जोहार विकास समिति मुनस्यारी ने मुख्यमंत्राी को मामले में पत्रा भेजा है। समिति के अध्यक्ष श्रीराम सिंह धर्मशक्तू के साथ ही नाथूराम वर्मा एडवोकेट, अमरराम आर्या, गौरत पांगती, पूरन लस्पाल, दरपान राम, शंकर सिंह ध्र्मशक्तू, कैलाश सिंहधर्मशक्तू, मनीराम, खड़क सिंह पांगती, दीवान वर्मा, मंगल सिंह मर्तोलिया, कुन्दन सिंह पांगती, गजेन्द्र पांगती, मनोहर दरियाल, माधेसिंह पांगती, बलवन्त सिंह, गोकर्ण सिंह मर्तोलिया, लक्ष्मण सिंह, हरीश सयाना, पूरन सिंह, शेर सिंह वृजवाल, मानसिंह, देवेन्द्र सिंह सहित तमाम लोगांे के हस्ताक्षर पत्र में हैं।

आशा सिंह रावत ने कन्योटी के जोशी परिवार से डोटिला में खरीदी थी भूमि

शेर सिंह रावत से बातचीत

डाॅ.पंकज उप्रेती
आज भारत-चीन व्यापार और कैलास मानसरोवर यात्रा का बहुत हल्ला करने के बाद गिनती भर के लोग सरकारी निगरानी में सीमा पार यात्रा कर पाते हैं। पहले जब सीमाओं के ये बन्धन इतने जटिल नहीं थे, भारत-चीन युद्ध नहीं हुआ था, तिब्बत तक स्वतंत्रत आना-जाना था, धर्मिक यात्राी कैलास-मानसरोवर तक जाते थे, तब के व्यापार और यात्रा का स्वरूप कितना शुरु रहा होगा वह प्रसंग सुनकर नई पीढ़ी परीलोक की सी कहानी मानती है। वाकेई उस दौर के प्रसंग आलौकिक यात्राओं के ही थे और दुरुह में भी यात्राओं का अपना भोलापन था। व्यापार होते हुए भी प्रकृति के साथ नियमों की पालना थी। दुनिया के देश एक-दूसरे पर झपटने लगे, युद्धों का प्रभाव अतिआध्ुनिक तकनीक के साथ होने लगा। तिब्बत चीन ने कब्जा लिया और भारत पर हमला। चीन युद्ध के बाद भारत-तिब्बत व्यापार बन्द हो गया और दूर-दूर तक पैदल यात्रा करने वाले सीम के व्यापारी जो जहाँ थे, वहीं ठहर गये। माइग्रेशन की बहुत सी परम्पराएं भी सिमट कर रह गई। व्यापार के उन पुराने दिनों में जोहार से मुनस्यार, गिरगांव, रौछाल-क्वीटी, शामा होते हुए भी रुट था और लोगों का आना-जाना था। तब जलद के आशा सिंह रावत ने कन्योटी ग्राम सभा ;अब बागेश्वर जिले में के जोशी परिवार से डोटिला में भूमि खरीदी थी। और व्यापार बन्द होने के बाद रावतों के परिवार यहाँ रहने लगे। वर्तमान में नौकरी या अन्य कारणों से भी ये परिवार शहरों में रहने लगे हैं। डोटिला ग्राम खाली सा हो चुका है।
इसी डोटिला ग्राम में जन्मे 80 वर्षीय शेर सिंह रावत बताते हैं कि करीब सन् 1957 में उनके दादा आशा सिंह रावत ने कन्योटी में भूमि खरीदी। यह डोटिला तोक में है। जलद के रावत परिवार यहाँ पर रहते हैं। पिता दौलत सिंह, दुर्गा सिंह, बाला सिंह के दादा, प्रकाश सिंह के पिता महेन्द्र सिंह, खुशाल सिंह कई नाम स्मृतियों में हैं। भरा-पूरा गाँव था डोटिला। माइग्रेशन में इधर से उधर जाने के दिनों में शेर सिंह जी ने प्राइमरी की पढ़ाई कपकोट से ही की। वह बताते हैं कि यात्रा के उस कठिन समय से पढ़ाई भी अनियमित हो जायाकरती थी। दरकोट ;मुनस्यारीद् में वह पढ़ते थे। स्कूल में वासुदेव जी अध्यापक थे तो जाड़ों में तेजम और वर्षा में मिलम जाते थे। माइग्रेशन के हिसाब से स्कूल भी चलते थे। शेर सिंह जी जब मीडिल में पढ़ते थे, उनके परिवार ने मिलम जाना छोड़ दिया गया। उस समय विद्यानन्द सरस्वती ने तिकसैन, मुनस्यारी में एक स्कूल शुरु किया था।

श्री रावत बताते हैं कि बड़े भाई खुशाल सिंह रावत इस विद्यालय में हैडमास्टर बनकर आये। हिन्दी के लिये कपकोट के शास्त्राी जी थे। लोहाघाट के घनानन्द जोशी अंग्रेजी पढ़ाया करते थे। कक्षा आठ तक तिकसैन में पढ़ाई की। पिफर यह स्कूल नमजला में शिफ्रट हो गया, बाद में कन्या विद्यालय बना। वह बताते हैं कि जिला बोर्ड के हाथ में चले जाने के बाद वह लोग पिफर से पढ़ाई के लिये कपकोट आ गये। उनके साथ दुर्गासिंह रावत थे। लाछुली वाले भवानसिंह-उदयसिंह शामा पढ़ने गये जबकि तेजम वाले ध्रम सिंह-गोकरणसिंह अल्मोड़ा आ गये। इस प्रकार जलद, लाछुली और तेजम के 6 युवा रावत अलग-अलग जगह गये। कपकोट से हाईस्कूल, अल्मोड़ा से इण्टर करने के बाद नैनीताल से पढ़ाई की।

शेरसिंह जी बताते हैं- ‘हमसे पहले गोविन्द सिंह पांगती ने गणित से बीएससी की, जो फुटबाल के भी अच्छे खिलाड़ी थे। नैनीताल के बाद लखनउ एमए करने चला गया, खुशाल सिंह भी बीए करने के लिये साथ में थे। तीन साल लखनउफ में रहते हुए पी-एचडी के लिये तैयारी की लेकिन 1959 में बीडीओ के के लिये चयन हो गया। पहली नियुक्ति जखोली;टिहरी में हुई। चार-पांच साल बाद ताड़ीखेत;रानीखे. आया। वह दौर था जब चन्द्रभानु गुप्त मुख्यमंत्राी हुआ करते थे और रानीखेत उपमण्डल में तो रामदत्त पाण्डे-देवकीनन्दन पाण्डे की तूती बोलती थी। लेकिन उस समय की राजनीति व नेता आजकल की तरह नहीं थे। श्री रावत बताते हैं कि 1969 में संघ लोक सेवा आयोग के विज्ञापन इण्डियन इकाॅनमिक सर्विस के लिये पफार्म भर दिया था। बीडीओ की नौकरी करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और उनका चयन हो गया। आईएएस प्रोवेजनल में दो साल तक कई जगह पोस्टिंग हुई और सीखने को मिला। भोपाल ;म0प्र0 में प्लानिंग कमीशन में रहा। बाद में सिविल सप्लाई एण्ड काॅमर्स में डिप्टी डायरेक्टर होकर दिल्ली आया।’

रावत जी का विवाह स्वतंत्राता सेनानी और समाजसेवी ससखेत;थल निवासी नरसिंह जंगपंागी की पुत्र कमला देवी के साथ हुआ। जीवन के उत्तराद्ध में शेरसिंह-कमला रावत खट्टी-मीठी यादों के साथ अब हल्द्वानी में रह रहे हंै।

पिघलता हिमालय 18 जुलाई 2016 के अंक से

तीन बार अपनी मौत का समाचार सुन चुके थे

स्व.आर.सी.पन्त स्मृतियाँ

डाॅ.पंकज उप्रेती
कुमाउँ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रमेश चन्द्र पन्त जी का 18 मई 2018 को हल्द्वानी उनके आवास में निधन हो गया। इसी दिन कुविवि का नैनीताल में दीक्षान्त समारोह भी था। मूल रूप से ग्राम जजुट, गंगोलीहाट निवासी 73 वर्षीय पन्त जी सालभर से अस्वस्थ्य थे और अपने घर पर भी स्वध्याय में लगे रहते थे। हल्द्वानी शहर के चैयरमैन रहे दयाकिशन पाण्डे की सुपुत्राी से उनका विवाह हुआ था। श्रीमती पन्त का भी दो साल पूर्व निधन हो चुका है। पन्त जी के घर में उनके एक सेवक के अलावा कोई नहीं है। उनके भाई-बहन मिलने आ जाया करते थे। ईमानदार और मृदुभाषी के रूप में आरसी पन्त की पहचान रही है। इतना नरम होने के बाद भी उनकी अपनी टेड़ के कारण कुलपति के रूप में वह कई को नाराज कर गये। जर्मन भाषा को जानने वाले पन्त जी संस्कृत के भी प्रकाण्ड थे और हिन्दी में ही कामकाज को पसन्द करते थे। एकाकी जीवन बिता रहे पन्त जी ने अपनी पत्नी के निधन के बाद उनके नाम की तराई में कीमती भूमि बेचकर दरउ क्षेत्र में एक विद्यालय भी स्थापित किया था जिसकी देखरेख के लिये वह परेशान रहने लगे थे। करीब 6 माह पूर्व अटैक पड़ने के कारण एक दिन वह अपने बाथरुम में घण्टाभर बेहोश रहे, बाद में दिल्ली में उनका इलाज हुआ। तब से उन्होंने इधर उधर जाना भी बन्द कर दिया था।
पिघलता हिमालय समाचार पत्र परिवार से उनके मध्ुर सम्बन्ध् थे और इसके संस्थापक सम्पादक स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती को वह बहुत मानते थे। इनके कई आयोजनों में वह पधरे। बुजुर्गवार पन्त जी से मिलने के लिये मैं बीच-बीच में जाया करता था। करीब दो माह पूर्व मैंने दैनिक पत्र में समाचार पढ़ा- ‘पूर्व कुलपति पन्त का निधन’। दरअसल इस नामराशि के पूर्व रजिस्ट्रार पन्त जी के निधन को गलती से पूर्व कुलपति छापा गया था। मैंने पन्त जी को बताया तो वह बोले- ‘अपनी मौत का तीन बार समाचार सुन चुके हैं। पढ़ाई के दौरान किसी के निधन पर उन्हें मान लिया गया। उसके बाद देवीदत्त पन्त के निधन पर मुझे मरा जानकर देखने आ गये थे। अब तीसरी बार तुमने मौत का सामाचार सुना दिया है।’ और हँसने लगे। अब पन्त जी हमारे बीच नहीं हैं, उनकी स्मृतियाँ बनी रहेंगी।

पिघलता हिमालय 28 मई 2018 के अंक से

स्थापना के 41वें साल में

कमला उप्रेती
इस अंक के साथ ही ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के 41वें साल में पहँुच चुका है। सन् 1978 में स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया ने जिस साहस और दृढ़ता के साथ इसकी शुरुआत की वह आज भी नियमित रूप से आपके सामने है। अब तक के 40 सालों में कई उतार-चढ़ाव इसने देखे हैं लेकिन वह मिशन जिसके लिये इसे स्थापित किया गया था जारी है। ऐसे समय में जबकि संचार व समाचार के अनगिनत साधन हैं, पिघलता हिमालय जैसे छोटे समाचार पत्रा को बनाये रखना चुनौती है। फिर, स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया के मिशन पर इसे बनाये रखना और भी कठिन है लेकिन इस मिशन को चुनौतियां स्वीकार हैं। यही कारण है कि समाचार-विचार की दुनिया को रंगीन बनाकर परोसने के बजाए अपनों को जोड़ने का यह साधन है।

दुर्गा सिंह जी मात्रा 49 वर्ष आयु में इस दुनिया से विदा हो गये थे और उप्रेती जी भी 69 वर्ष आयु में हमें छोड़कर चले गये। उनके मिशन में निर्भीकता और स्वाभिमान था। वर्तमान की पत्रकारिता में मिशन के साथ चलने वाले गिने जा सकते हैं। इनसे न तो तिकड़मबाजी होती है और न ही जीहजूरी। इस मिशन पर चलते हुए कई दिक्कतें पिघतला हिमालय के सामने भी हैं। दिनोंदिन बढ़ती जा रही प्रतिस्पद्र्धा के बीच समय से इस पाती को परोसते हुए हमें लगता है स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया जी हमारे बीच हैं। उन्हीं का स्मरण करते हुए लगातार इसे आकर्षक बनाने की कोशिश की जा रही है। साधनों के आभाव के बावजूद दूरस्थ क्षेत्रों तक अपने प्रिय पाठकों के बीच पिघलता हिमालय पहँुच रहा है। इसे आॅनलाइन पढ़ने की व्यवस्था भी की गई है ताकि दूर तक समय से हमारा सन्देश पहँुचे और नई तकनीक से जुड़ी युवा पीढ़ी अपने प्रिय पत्र को आसानी से पढ़ सके। इस बार से यूट्यूब चैनल भी पिघलता हिमालय का जारी हुआ है।

सरकार चाहे जो भी रही हो, सबका ध्यान अपना मौका भुनाना रहा है। यही कारण है कि सरकार की विज्ञापन नीति में छोटे-मझले समाचार पत्रों को अवसर नहीं दिया जा रहा है। विज्ञापन का स्वाद बड़े मीडिया घरानों को लगाया जाता है ताकि नेताओं के बड़े और रंगीन पफोटो प्रिंट मीडिया में छपें और इलक्ट्रोनिक मीडिया में दिखाये जाते रहें। इसे मीडिया मैनेजमेंट कहा जाता है और झूठ को सच और सच को झूठ की पतंग बनाकर उड़ाने वाले सक्रिय रहते हैं। स्थानीय स्तर पर भी छुटभैय्यों के चुग्गे पर पत्राकारिता करने वाले तेजी दिखाने लगे हैं। इस प्रकार के वातावरण में मिशन की पत्रकारिता सिर्फ अपने पाठकों के बल पर की जा सकती है।

प्रिय पाठको! आप ‘पिघलता हिमालय’ परिवार हो, आप ही इसके प्रतिनिधि हो, आप ही इसके विज्ञापनदाता हो, आप ही इसके प्रचार-प्रसार वाले भी। तभी आज ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के चालीस साल पूरे कर चुका है। इसका सारा मैनेजमेंट सीमान्त से लेकर तराई-भाबर तक पफैले हमारे शुभचिन्तक हैं। उन स्थितियों में जब साप्ताहिक पत्रों का रिवाज ही लडखड़ा चुका है, पाठकों में पिघलता हिमालय का इन्तजार इसकी गहरी जड़ों को सि( कर रहा है। इसके पाठकगण एक परिवार के रूप में जुड़े हैं, उनका भावनात्मक लगाव इससे जुड़ने और अपनी अगली पीढ़ी को जोड़ने में सहायक है। आपका यही स्नेह हमारा बल है।

आजादी के बाद भी सुलगते सवाल

कमला उप्रेती

स्वतंत्राता दिवस की बधई। हर साल की तरह इस साल भी  ध्ूमधम से मनाया गया आजादी का जश्न। देश की रक्षा और तरक्की के लिये संकल्प दोहराये गये और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ मिष्ठान वितरण हुआ। लेकिन स्वतंत्राता के सही अर्थों को हम हम आज तक नहीं समझ सके हैं। हम अपनी बात मनवाने के लिये वह उस स्वर लगाना चाहते हैं जो विवादी है। आजाद होने का मतलब ऐसी स्वतंतत्रा मान लिया गया है कि चाहे जो कुछ करते रहें। ऐसे में आजादी के बाद भी तमाम सवाल सुलग रहे हैं। देश के सन्दर्भ में हजारों सवाल हैं जो मार-काट पर उतर आये लोग समझने को तैयार ही नहीं हैं।

यहाँ पर बात पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड की ही कर लेते हैं। हमेशा आजाद प्रिय लोगों ने पृथक राज्य भी बनवा लिया लेकिन सवालों के चट्टे लगते जा रहे हैं। रक्षा-सुरक्षा, पर्यावरण, वन, जल, भू, विज्ञान, खेत-खलिहान, शिक्षा चिकित्सा से लेकर हर प्रकार की प्रगति का पाठ विज्ञापन के रूप में सरकारें पढ़वाती रही हैं परन्तु इनकी सच्चाई सामने है। बरसात में 250 से ज्यादा सड़कें प्रदेश में बन्द हैं। भूस्खलन से करोड़ो का नुकसान हो चुका है। आॅलवेदर रोड का सपना बहुत अच्छा है लेकिन इस कार्य में जितनी तोड़पफोड़ हो चुकी है उससे कई ज्यादा नुकसान हुआ है। डम्पिंग जोन में कटिंग का मलबा न डालने का परिणाम ही है कि कई नदियों में टनों मलबा घुल चुका है, हजारों पेड़ कट चुके हैं, पेयजल स्रोत दब गये, बस्तियों को खतरा हो गया। कटिंग का मलबा-पत्थर मीलों तक विकास से पहले का विनाश दिखा चुका है। राहत-बचाव के नाम पर अखबारों की सुर्खियों में बने रहने वाले बेहद सक्रिय हैं। आपदा हमेशा से होती रही है लेकिन आपदा के नाम पर ‘बचाव’ से ज्यादा अपना ‘बनाओ’ की होड़ भी देखी जा रही है। वही कर्ता वही ध्र्ता। खुद ही ठेकेदार, खुद ही खुदान करने वाले, खुद ही मलबा उठाने वाले……….। वाह रे स्वतंत्राता। ऐसी आजादी। अतिवृष्टि से मकान टूटने की घटनाएं हुई हैं लेकिन पहले से खण्डहर मकानों के नाम पर भी मुआवजा लेने वाले जुगत लगा रहे हैं। पीड़ितों के नाम पर आने वाली राहत राशि डकारने वाले नेतृत्व करने को लालायित रहते हैं। ये इतने बेशर्म होते हैं कि पीड़ितों के नाम पर आने वाले राशन, कम्बल, बर्तन, साबुन सबकुछ खा लेते हैं। इन्हंे पूरी आजादी है।

हालात यह हो चुके हैं हम खुद से नहीं संभल पा रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोगल वार्मिंग और वन आवरण घट जाने के कारण उत्तराखण्ड के ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। इससे गंगा, यमुना जैसी नदियों के पानी पर प्रभाव पड़ेगा। भारतीय अन्तरिक्ष शोध् संस्थान ;इसरोद्ध ने उत्तराखण्ड के ग्लेशियरों पर नज़र रखने का निर्णय लिया है। इसरो के पूर्व निदेशक पद्मश्री प्रो.ए.एस.किरण कुमार बताते हैं कि राज्यपाल के आग्रह पर उत्तराखण्ड के ग्लेशियरों में आ रहे बदलाव पर नज़र रखने के निर्देश इसरो के स्थानीय सेन्टर को दिए गए हैं। दूसरी ओर पर्यटन मंत्राी सतपाल महाराज ने गंगा के पानी में रेडिएशन का खतरा बताते हुए प्रधनमंत्राी नरेन्द्र मोदी से नन्दादेवी क्षेत्रा में गुम हुए प्यूटोनियम पैक का पता लगाने की मांग की है। महाराज ने कहा कि 1965 में चीन पर नज़र रखने को भारत और अमेरिका एजेंसी सीआईए की पर्वतारोही टीम ने नन्दादेवी की चोटी पर राडार पिफट किए जाने की कोशिश की। इस राडार का न्यूक्लियर पावर जेनरेटर बपर्फीले तूपफान में गुम हो गया था। उसके टूटने की स्थिति में समूची गंगा का पानी रेडिएशन का शिकार हो समा है।

आजादी का मतलब ऐसी मनमानी हो चुका है कि हम अपनी पर उतर चुके हैं। करोड़ों का एनएच घोटाला अभी तक पहेली बना हुआ है। कुछ पकड़ और कुछ पफरार के बीच जाँच जारी है। चर्चा है कि एनएच-74 मुआवजा घोटाले में जमीन का लैंड यूज बैक डेट में बदलवाकर 30 करोड़ रुपये का मुआवजा हड़पने वाले जसपुर के तीन किसान विदेश भाग गए हैं। इस बीच कुछ मामले पकड़ में हैं। देहरादून में पत्राकारिता की आड़ में दुष्कर्म कर ब्लैकमेलिंग करने वाले पाँच पत्राकारों की गिरफ्रतार हो चुकी है। चम्पावत में नकली नोट जमा कराने के आरोप में बैंक मैनेजर पर मामला दर्ज हुआ है। आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ.मृत्युंजय मिश्रा के खिलापफ जाँच चल रही है। आरोप है कि उन्होंने तकनीकी विवि और आयुर्वेदिक विवि में अनियमितताएं कीं। बिना टैंडर के खरीद सहित कई आरोप डाॅ.मिश्रा पर हैं। टनकपुर में नशे में बौराए पर्यावरण मित्रा ने नगर पालिका के ईओ को पीट डाला।

कुमाउँफ मण्डल आयुक्त राजीव रौतेला को एक पत्रा डाॅ.ओंकार नाथ कोष्टा प्रधनाचार्य राजकीय पालीटेक्निक शक्तिपफार्म जिला उध्मसिंह नगर की ओर से भेजा गया है। बताया जाता है कि आयुक्त ने बैठक के दौरान सख्त तेवर दिखाये। मामला क्या था इसी को लेकर डाॅ. कोष्टा ने जिस सापफगोई के साथ अपनी बात पत्रा में कही है वह हिम्मत की बात है। वह लिखते हैं- ‘‘निर्माण कार्यों की समीक्षा बैठक आपकी अध्यक्षता में काठगोदाम हल्द्वानी में आयोजित की गयी थी,  जिसमें विभिन्न संस्थानों के प्रधनाचार्य भी मौखिक आदेश पर बुलाये गए थे जो कि बैठक के दौरान बाहर बैठे हुए थे। इसी मध्य आपने मुझे बुलाया और पूछना शुरु किया किया। आपने विषयान्तर करते हुए, पोलिटेक्निक क्यों खोले? प्रिंसिपल क्या करता है? आदि आदि प्रश्न अप्रत्याशित रूप से लगभग चीखते हुए, असभ्य तरीके से पूछे। उस समय मुझे बैठने के लिए सीट भी नहीं दी गयी थी। आपके असभ्य व्यवहार के कारण आपकी किसी भी बात का जवाब देना उस समय सम्भव नहीं था। आपके द्वारा मांगी गई सूचना थोड़ी देर बाद मैंने आपको उपलब्ध् करा भी दी थी। इस प्रकार आपने एक वरिष्ठ प्रथम श्रेणी राजपत्रित अध्किारी, एक प्रधनाचार्य और एक ईमानदार प्रतिष्ठित नागरिक का भरी सभा में अपमान किया है। इसके साथ ही समाचार पत्रों में एकपक्षीय सचाचार प्रकाशित करवाकर सार्वजनिक रूप से मेरी प्रतिष्ठा को ठेस पहँुचाई। आपके इस क्रूर व्यवहार की में। निन्दा करता हँू।’’

आजादी का मतलब यह भी मान लिया गया है कि आईएएस अध्किारी पर कोई टिप्पणी नहीं हो सकती। आंखिर क्यों नहीं हो सकती है? उत्तराखण्ड में हमेशा से नौकरशाही हाबी रही है। पार्टियां चुनाव गणित में नचाती रही हैं। शराब को राजस्व का प्रिय स्रोत मान लिया गया है और खनन को सपफलता का आधर। अपराध् की दुनिया नेतागर्दी के साथ दिखाई दे रही है। सुख-शान्ति के लिए पृथक राज्य की मांग हुई थी परन्तु राज्य की अवधरणा को कुचल दिया गया है। विधनसभा सत्रा के दौरान ही बांहे समेटते माननीयों से क्या उम्मीद की जा सकती है। विधयक बनने के चस्के भी अपराध्यिों के पालनहार हैं। अभी ताजा घअना मंे पूर्व स्वास्थ्य मंत्राी तिलकराज बेहड़ को मोबाइल पर जान से मारने की ध्मकी दी गई। तराई की राजनीति में तो गोली-बारुद की बात सामन्य हो चुका है। पहाड़ में भी कुर्सी के लिये हथकण्डे अपनाये जाने लगे हैं। गैरसैंण राजधनी का मामला आज तक अटका हुआ है। भराड़ीसैंण में सत्रा चलाने के नाम पर हुई पिकनिक  ने हमारी सोच को दिखा दिया है। गैरसैंण की मांग को लेकर गैरसंैण में आन्दोलन करने वालों को जबरन उठाने-ध्कियाने के समाचार भी खूब चर्चा में थे लेकिन नेताशाही और अफसरशाही पर कोई असर नहीं हुआ है। प्रदेश को चलाने के लिये मांग-मांग काम चल रहा है। इस बीच प्रदेश सरकार ने आरबीआई से 250 करोड़ रुपये का ट्टण लिया। बताया गया है कि अवस्थापना कार्यों के लिए सरकार ने कर्ज लिया। जुलाई माह में भी सरकार 300 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। इस प्रकार त्रिवन्द्र सरकार अब तक 2150 करोड़ का आरबीआई से कर्ज ले चुकी है। 18 सालों में प्रदेश पर कर्ज की सीमा तकरीबन 45 हजार करोड़ से उफपर पहँुच चुकी है। पिफलहाल आजादी का जश्न मनाते हैं।

पिघलता हिमालय 20 अगस्त 2018 के अंक से

सीमान्त ग्रामों का विकास सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम से सम्भव

वाई.एस.पांगती

भारत सरकार ने सीमा क्षेत्र के विकास के लिये बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम चलाया है। सरकार की गाईड लाइन में स्पष्ट किया गया है कि सीमा क्षेत्रा में रहने वाले लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ग्रामवार प्राथमिक शिक्षा, चिकित्सा केन्द्र, सामुदायिक केन्द्र, सड़क, बिजली, सम्पर्क मार्ग, नालियां, पीने का पानी आदि व रोजगार के साध्न उपलब्ध् कराने के लिये प्रस्ताव मांगकर उनको अन्तिम रूप देने के लिये खण्ड विकास कार्यालय के माध्यम से सम्बन्ध्ति विभागों को प्रशिक्षण करने के लिये भेजा जायेगा। यदि विभाग में गाँव की योजना पूर्व से प्लान में है तो सीध् विभाग द्वारा कार्यक्रम को संचालित करने के लिये प्लान में वजट पास करेगा और जो योजना प्लान में नहीं है उसको बी.ए.डी.पी. के माध्यम से प्रस्तावित करेगा।

इस प्रकार की योजनाओं को विकास खण्ड स्तरीय कमेटी बजट के अनुसार अनुमोदन हेतु जिला विकास कार्यालय के माध्यम से शासन को भेजेगा। शासन भारत सरकार मंत्रालय से अनुमोदन प्राप्त कर ग्रामों में योजनाओं का क्रियान्वयन करेगा। इस प्रकार की कमेटी के अध्यक्ष उपजिलाध्किारी, सचिव खण्ड विकास अध्किारी और सदस्य क्षेत्रा प्रमुख के अलावा विभागों के अध्किारीगण व चयनित ग्राम प्रधन व ग्राम पंचायत के अध्किारी सदस्य नामित हैं जो प्रत्येक त्रौमास में समीक्षा/बैठक करेंगे।

हमें यह भी जान लेना चाहिये कि केन्द्रीय गृह मंत्राी भारत सरकार द्वारा अभी हाल में ही जनपदवार बी.ए.डी.पी. की समीक्षा बैठक की गई। उनके द्वारा कहा गया कि सीमान्त में रहने वाले लोग देश के लिये सामरिक लिहाज से कापफी अहम हैं और सुरक्षा की भी अहम कड़ी हैं। जिसके कारण इन इलाकों के विकास को सरकार सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। सरकार द्वारा देश के सीमावर्ती ग्रामों को माॅडल के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया गया है और भविष्य में बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम की आनलाइन मानीटरिंग  के साथ ही गाँवों के लिये चयनित योजनाओं को सीध्े आॅनलाइन सिस्टम में डालकर अनुमोदन, राज्य को बजट की अवमुक्त किया जायेगा।

पूर्व अनुभव के आधर पर बी.ए.डी.पी. योजनाओं के बजट का बन्दरबांट किया गया, जिसके कारण ग्रामों का समुचित विकास नहीं हो पाया है। जो चिन्ता का विषय है। जोहार के दुर्गम 14 ग्राम, धरचूला के दुर्गम ग्राम, चमोली, उत्तरकाशी के सीमान्त ग्रामों की टोह लेते हुए जागरुक हो जाना चाहिये। मल्ला जोहार में तो जितनी सुविध मिल पाई है उसका श्रेय मल्ला जोहार विकास समिति को जाता है, जो जागरुक रहकर कार्य कर रही है। यह जागरुकता प्रत्येक नागरिक में होनी चाहिये।

अपेक्षा है सभी लोग जागरुक रहकर विकास के लिये भागीदार होंगे। जिला विकास कार्यालय से सम्पर्क कर पूर्ण जानकारी लेकर बी.ए.डी.पी. के अन्तर्गत आने वाले गाँवों का समुचित विकास में योगदान करेंगे।

पिघलता हिमालय 30 जुलाई 2018 के अंक से

तुलसी देवी का उफनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
ग्वालदम। तुलसी देवी मर्तोलिया ऐसा नाम है जिसने उफनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उपेक्षित लोगों को अवसर दिलाने के लिये उन्होंने अपनों का विरोध् भी सहन किया था। इन्हीं तुलसी देवी की याद में आज मूर्ति स्थापित है और लोग उनकी कर्मठता को याद करते हैं।
अपनी पुरानी यादों के साथ बातचीत करते हुए 70 वर्षीय हीरा सिंह पंचपाल बताते हैं कि करीब 1936 में जोहार के व्यापारी गरुड़ में आकर रहने लगे। ठण्डे स्थान में रहने वाले इन व्यापारियों को गरुड़ में भी गर्म लगने लगा और 1946 में ग्वालदम आ गये। इसमें उनके नाना मोहन सिंह रावत भी थे, जो पौड़ी-चमोली जिले के सम्मानित व्यक्तियों में थे। पिता स्व.राजेश सिंह पंचपाल भी व्यापार के सिलसिले में यत्रा-तत्रा जाते थे। देवाल, वाण, थराली, नारायणबगड़ दूरस्थ क्षेत्रों तक तत्कालीन ढुलान का कारोबार इन लोगों के पास था। श्री पंचपाल बताते हैं कि उनकी बुआ जी बेटी तुलसी देवी के पति की भाबर में मृत्यु के बाद वह असहाय सी महसूस करने लगी थी। तब नाना मोहन सिंह जी उन्हें ग्वालदम ले आये और वह उफनी कारोबार करने लगी। तुलसी दीदी के साथ माँ गंगादेवी पंचपाल भी उफनी फैक्ट्री में सहयोगी थी। 1954 में यू.पी. स्मोल स्केल इंडस्ट्रीज में पांचवे नम्बर का रजिस्ट्रेशन इनकी पफैक्ट्री का ही था। तब उफनी कपड़ों का बहुत चलन था और गढ़वाल के दूर-दूर क्षेत्रों तक इनकी धक थी। तुलसी दीदी जिला बोर्ड की सदस्य के अलावा महिला कांग्रेस चमोली की संयोजिका थी। भारत सरकार के प्रोग्राम कल्याण विस्तार परियोजना के 16 स्थानों में चलने वाले स्कूलों को वह देखती थी। आगनबाड़ी में कताई-बुनाई जैसे कार्य भी सिखाये जाते थे। उस समय यह लोग अवैतनिक कार्यकर्ता होते थे। मात्रा यात्रा भत्ता इन्हें मिलता था।
तुलसी दीदी ने कई धर्मिक अनुष्ठान यहाँ करवाये। साथ ही उपेक्षित लोगों को आगे बढ़ाने के लिये जुटी रहीं। बच्चों की रुचि पढ़ाई-लिखाई की ओर करने, ग्रामीणों को स्वावलम्बी बनाने, किसानों को कृषि औजार दिलाने जैसे कार्य में वह लगी रहती थी। 1985 में उन्होंने विद्याभारती संस्था को अपनी पफैक्ट्री दान कर दी, जिसमें आज सरस्वती स्कूल चल रहा है। 1985 में तुलसी देवी का निधन  हुआ। उनकी प्रेरणा से प्रेरित कई लोग आज काफी आगे हैं। ऐसी प्रेरणादायक की याद में स्कूल के पास ही उनकी मूर्ति स्थापित की गई है।
हीरा सिंह जी पुरानी शिक्षा व्यवस्था को गुणवत्तायुक्त मानते हुए बताते हैं कि तब हर कोई नहीं पढ़ता था। लगनशील बच्चे आगे बढ़ते थे और श्रम करते थे। तब पढ़ाने वाले पण्डित जी बहुत कम मेहनताने में योग्य शिष्यों को तैयार करते थे। समाज का भी उत्तरदायित्व गुरु की ओर ध्यान देने का था। स्कूल जाते समय बच्चे एक लकड़ी जरुर ले जाते थे और गुरुजी की घर के पास डाल देते, ग्रामीण महिलाएं उनके घर की लिपाई-घिसाई कर देती, कोई घी-सब्जी देता, कोई पानी ला देता। यानी कि बड़े ही शुद्ध भाव से गुरु सेवा होती थी और गुरुजन भी समाज को बनाने और सुधरने के लिये समर्पित थे। उनकी इलाके भर में प्रतिष्ठा होती थी, वह स्कूल की छुट्टी के बाद गाँव में घूमकर बकायदा बच्चों के बारे में उनके माता-पिता से बातचीत करते थे। गुरुजी पिटाई भी बहुत करते थे, जो हमें सुधार के लिये ही थी।
पिघलता हिमालय 11 जुलाई 2016 के अंक में प्रकाशित

कैलास मानसरोवर को जाने वाले परम्परागत मार्ग के सभी बगड़ रड़ रहे हैं

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि

बागेश्वर। उत्तराखण्ड के विकास की कहानी कितनी कोरी है इसका एक उदाहरण कपकोट-विनायक-शामा रोड से पता चलती है। भराड़ी बाजार के बाद पिण्डारी रोड से कटने वाला यह मार्ग कैलास मानसरोवर का परम्परागत मार्ग रहा है लेकिन वर्तमान में इसमें सड़क निर्माण का सुस्त कार्य चल रहा है। दर्जनों गाँव सुविधओं के आभाव में उजाड़ होते जा रहे हैं। यह क्षेत्र बगड़ों का का है। ;नदी किनारे बसे इलाकों को बगड़ कहा जाता है। तिमलाबगड़, कासूबगड़, रीसाबगड़, खारबगड़, देबीबगड़, हरसिंगिया बगड़, डोटिलाबगड़ इत्यादि। यहाँ रेवती गंगा, गांसूगंगा, सरयूगंगा नदियां बहती हैं और इनके संगम स्थान पर तीर्थ है। ये सारे बगड़ रड़ ;बग रहे हैं। पिछली आपदा में तो खारबगड़ में आये मलवे से कापफी नुकसान हुआ था। नदी आर-पार के तमाम ग्रामों का मुख्य व्यवसाय कृषि है लेकिन किसी भी प्रकार की सुविधाओं के न होने से गाँव के गाँव खाली हो चुके हैं। खारबगड़ होते हुए विनायक को जाने वाले मार्ग पर इन दिनों कार्य हो रहा है किन्तु एकदुम दुर्गम के इस क्षेत्र में देखरेख न होने से कार्य की सुस्ती देखने को मिली। यह मार्ग आगे विनायक के बाद शामा तक मिलता है। कैलास मानसरोवर जाने के लिये पुराने मार्गों में इसकी गणना होती है। मानसरोवर में महात्मा गांध्ी की अस्तियां विसर्जन के लिये इसी मार्ग से गये थे। इस मार्ग पर कभी बहुत आवत-जावत थी। पैदल यात्रा के समय घोड़े-खच्चर, भेड़-बकरियों के साथ व्यापारी जाते थे। जोहार के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोपाल सिंह मर्तोलिया के परिजन आज भी देवीबगड़ में निवास करते हैं। धरचूला में बूबू के नाम से विख्यात रहे स्वतंत्राता सेनानी जोगा सिंह मर्तोलिया का भी यहाँ मकान था। इनके परिजन आज धरचूला व हल्द्वानी में रहते हैं।
प्रहलाद सिंह मर्तोलिया बताते हैं कि तिब्बत को जाने के लिये इस मार्ग का प्रयोग होता था। पुराने समय में अल्मोड़ा से गिनती करते हुए व्यापारी विभिन्न पड़ावों में रुकते हुए जाते थे। इस गिनती में उन्हें मालूम था कि किस गिनती के अंक के बाद कौन सा स्थान आने वाला है। उन स्थानों का नामकरण भी कर दिया गया था जैसे- खारबगड़, मिलमढुंग।
इस क्षेत्रा में उत्तरभारत प्रा.लि. द्वारा जलविद्युत परियोजना का कार्य भी किया जा रहा है। परियोजना के कामकाज के तौर-तरीकों पर आरोप लगते रहे हैं लेकिन बात पिफर वही है कि इस दूरस्थ क्षेत्रा में कोई सुनवाई नहीं। नेतागर्दी का हाल यह है कि छुटभैय्ये से लेकर बड़े नेताओं तक का दबाव रहता है, खनन वाले भी मौका देखते रहते हैं। इन सारे हालातों में दूर-दराज के ग्रामीण विकास की राह जोह रहे हैं। वह चाहते हैं कि सड़क-संचार-शिक्षा जैसी मलभूत समस्या दूर हो जाये तो काफी राहत मिलेगी।
पिघलता हिमालय 9 मई 2016 के अंक में प्रकाशित

यह एक कौम का सवाल नहीं बल्कि हमारी सीमा पर एकता का प्रतीक है

पि.हि. प्रतिनिध्
मुनस्यारी। श्री हरि स्मारक समिति द्वारा इस बार भी महान स्वतंत्राता संग्राम सेनानी हरि सिंह जंगपांगी की याद में आयोजन किया गया। मल्ला दुम्मर में हुई हरि प्रदर्शनी में क्षेत्रावासियों ने जबर्दस्त उत्साह के साथ भागीदारी की। साथ ही इस बात पर आश्चर्य कि आजादी के बाद से अपने संसाध्नों पर निरन्तर चलने वाली इस प्रदर्शनी के लिये किसी भी प्रतिनिध् िद्वारा सहयोगात्मक रवैया नहीं अपनाया गया जबकि उत्तराखण्ड में जगह-जगह महोत्सव के नाम पन घोषणाएं व राशि वितरण करने का रिवाज सा बन गया है।
उल्लेखनीय है कि जंगपांगियों द्वारा मल्ला दुम्मर में बहुत ही उत्साह व क्रम से प्रतिवर्ष करवाये जाने वाला यह आयोजन मात्रा एक कौम का सवाल नहीं बल्कि हमारी सीमा पर एकता का प्रतीक भी है। देश के लिये मर-मिटने वाले जोहार के तमाम स्वतंत्राता सेनानियों का स्मरण इस मौके पर किया जाता है और ध्वजारोहण के साथ दुर्गम क्षेत्रा में रहने वाले सभी लोग मिल-बांटकर आयोजन को सपफल करते हैं। छोटे बच्चे भी ‘हरि बूबू की जै’ जैसे नारे लगाते हुए दिखाई देते हैं। यहाँ होने वाली सारी गतिविध्यिां अपने देश की सीमा की रक्षा के लिये संकल्प लेने वाली, अपने कुटीर उद्योग ध्न्धें को बनाये रखने, अपनी कृषि व पशुपालन को बढ़ावा देने के लिये हैं। मनोरंजन के लिये सांस्कृतिक मंच भी सजता है और शिक्षाप्रद कार्यक्रम किये जाते हैं। इतना होेने पर भी, हरि प्रदर्शनी के स्वरूप को और भव्यता देने की दिशा में स्थानीय जनप्रतिनिध्यिों का रुचि न लेना आश्चर्यजनक है।
इस बार भी हरि प्रदर्शनी के मौके पर ग्रामवासियों ने सांस्कृतिक मंच पर और अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाकर प्रतिभा का परिचय दिया। मल्ला जोहार आने-जाने के आदी लोगों का भी यहाँ जुटना सुखद है। समिति के संरक्षक विजय सिंह जंगपांगी, अध्यक्ष ललित सिंह जंगपांगी, सचिव गंगा सिंह जंगपांगी, प्रधन पंकज वृजवाल, लोकबहादुर सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह ध्पवाल, धम सिंह बरपफाल, मंगल सिंह जंगपांगी, मंगल सिंह मर्तोलिया, श्रीरामसिंह ध्र्मशक्तू, गोकर्णसिंह मर्तोलिया, नेत्रासिंह पांगती, खुशाल सिंह, गजराज सिंह, गजेन्द्र सिंह, नरेन्द्र सिंह, भूपेन्द्र जंगपांगी, नारायण सिंह, लक्ष्मण लछबू, राजेन्द्र मर्तोलिया, मनोज ध्र्मशक्तू सहित बड़ी संख्या में लोग जुटे। समाचार लिखे जाने तक प्रदर्शनी जारी थी। ;हरि प्रदर्शनी सम्बन्ध्ी समाचार अगले अंक में भी पढ़ें।द्ध
पिघलता हिमालय 7 नवम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित