दीर्घकालीन वर्षा जल संरक्षण हेतु वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता

पि.हि. प्रतिनिध्
मुनस्यारी। जोहार शौका वरिष्ठ नागरिक संगठन देहरादून व मल्ला जोहार विकास समिति द्वारा ग्रीष्मकालीन आयोजनों के दौरान दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। जिसके मुख्य अतिथि केन्द्रीय राज्य मंत्राी अजय टम्टा थे। आयोजन का शुभारम्भ करने मुख्यमंत्राी त्रिवेन्द्र रावत को आना था लेकिन उनके स्थान पर श्री अजय टम्टा पहँुचे थे। संगठन के अध्यक्ष डाॅ.भगत सिंह बरपफाल ने आयोजन समिति की ओर से सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि दीर्घकालीन जल संरक्षण हेतु वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है। इसके अन्तर्गत सभी मुख्य तथा उप जलधराओं के जल प्रवाह निर्वहन का दीर्घकालीन अध्ययन ;कार्यवाही- जल संस्थान एवं जल निगमद्ध, लम्बी अवध् ितक जलवायु मापन के डाटा ;कार्यवाही- जलवायु विज्ञान निदेशालयद्ध, भू-भौतिकीय अध्ययन ;कार्यवाही- वाडिया संस्थान आपफ हिमालयन जियोलोजीद्ध, भू-गर्भीय जल विज्ञान का अध्ययन ;कार्यवाही- उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्रद्ध, वन जल विज्ञान का अध्ययन ;कार्यवाही- राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्था रुड़कीद्ध जरूरी है।
उल्लेखनीय है कि सीमान्त क्षेत्रा मुनस्यारी के जल व जैवविविध्ता को ध्यान में रखते हुए जोहार शौका वरिष्ठ नागरिक समिति ने एक रूपरेखा बनाई और इस बार कार्यशाला का आयोजन करते हुए चाहा है कि इस दिशा में ठोस कार्य हो ताकि जल और जैवविविध्ता की दिशा में वैज्ञानिक विध् िसे कार्य होने के साथ ही इसका सभी को लाभ हो।
भौगोलिक दृष्टिकोण से मुनस्यारी एक अन्तन्त दुर्गम एवं दूरस्थ क्षेत्रा में चीन/तिब्बत सीमा पर स्थित है। वर्ष 196. के आसपास भारत-तिब्बत व्यापार बन्द होने के बाद मुनस्यारी एवं मल्ला जोहार का क्षेत्रा अपने असतित्व को बनाए रखने के लिये अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। जिनमें वन एवं जैव- विविध्ता में त्वरित गति ऐ हो रहे ह्रास, निरन्तर बढ़ रही जल संकट, जीवन-यापन के लिये संसाध्न एवं रोजगार की कमी, यातायात सुविध की चिन्ताजनक स्थिति, समुचित एवं उचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, शिक्षा के स्तर में गिरावट आदि मुख्य है। इन्हीं कारणों से इस क्षेत्रा से ध्ीरे-ध्ीरे पलायन हो रहा है और कई गाँव या तो खाली हो गए हैं या पिफर उनमें बहुत ही कम परिवार रह गए हैं।
चीन/तिब्बत सीमा पर बसे सामरिक दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्वपूर्ण मुनस्यारी एवं मल्ला जोहार क्षेत्रा से पलायन रोकने व पुनर्वास करने के लिये यह आवश्यक है कि इस क्षेत्रा का पर्यावरण संरक्षण के साथ दीर्घकालीन सर्वांगीण एवं सतत विकास की रूपरेखा बने और पिफर उसी के अनुरूप विकास के कार्य अमल में लाये जाएं। इसी उद्देश्य से स्थानीय लोगों की सहभागिता से यह कार्यशाला आयोजित की गई। जिसका विषय- ‘ मुनस्यारी क्षेत्रा के जल स्रोतों एवं जैवविविध्ता के संरक्षण के परिप्र्रेक्ष्य में भू-गर्भीय पर्यावरण तथा वन-जल विज्ञान की भूमिका’ है।
जोहार शौका वरिष्ठ नागरिक संगठन देहरादून द्वारा मल्ला जोहार विकास समिति मुनस्यारी एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मुनस्यारी पूर्व स्टूडेंट्स ऐसोसिएशन की सहभागिता से आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े दो सौ लोगों ने प्रतिभाग किया।
पिघलता हिमालय 18 जून 2018 के अंक में प्रकाशित रपट

लोक रंगों में रंगा उत्तराखण्ड

डाॅ. मनीषा पाण्डे
इन दिनों पूरा उत्तराखण्ड लोक उत्सवों के रंग में रंगा है। आठूं-सातूं के अलावा जगह जगह होने वाले स्थानीय मेले व बड़े त्यौहारों में लोक कलाकारों के दर्शन हो रहे हैं। सीमान्त में नन्दा पूजन, अल्मोड़ा-नैनीताल सहित अन्य जगह नन्दा-सुनन्दा पूजन, अस्कोट में हीरन-चीतल नृत्य, डीडीहाट में ठुल खेल, चमोली उत्तरकाशी में जात्राओं के आयोजनों के अलावा लोेक देवताओं के पूजन का यह यह समय है। केदारघाटी के बणसू जाखधर में माँ राजेश्वरी की देवयात्रा हुई। देवर, रुद्रपुर, सांकरी, गुप्तकाशी, नाला, नायणकोटी समेत कई जगह भक्तों को आशीर्वाद मिला। 18 साल के अन्तराल में यह यात्रा होती है। उत्तरकाशी के गोपाल मन्दिर में अनुष्ठान जारी है। रुद्रप्रयाग जिले में उफखीमठ देवरियाताल महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ। इसम उफखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर, सारी के भूतनाथ मन्दिर तथा नागराज मन्दिर तक झांकियां निकाली गई। इस इलाके में बहुत प्राचीन मेला है। गंगोलीहाट क्षेत्रा में कई ग्राम पतारबाड़ा, पुनोली, कोठेरा इत्यादि में बच्चों से लेकर बूढ़े तक झोड़े चांचरी की मस्ती में हैं। चम्पावत जिले के देवीध्ुरा का प्रसि( बग्वाल मेला हो चुका है परन्तु स्थानीय स्तर के कई महोत्सवों का क्रम बना हुआ है। तराई भाबर क्षेत्रा में भी पहाड़ से आकर बस चुके लोगों ने अपने ईष्ट-मित्रों के साथ खेलों ;झोड़े-चांचरीद्धका आयोजन किया। लोकमंच का यही असल उत्सव है। लोक उत्सव के क्रम में सोर घाटी के नाम से प्रसि( पिथौरागढ़ शहर में भी अगस्त-सितम्बर के महीने मनाए जाने वाले अनेक मेलों से वातावरण लोक रंजित हो जाता है। यहाँ के गाँव घरों में सातूं-आठूं का पर्व बड़ी ध्ूमधम से मनाया जाता है। इस पर्व में विशेष रूप से गौरा महेश्वर की पूजा की जाती है और उनकी गाथा गाई जाती है। सातूं आठूं की तैयारी पंचमी तिथि से हो जाती है। पंचमी के दिन सभी महिलाएं सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर विरुड़ भिगाती हैं। इसके बाद सप्तमी-अष्टमी को गौरा महेश्वर की पूजा की जाती है। यहाँ ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 17 से 22 अगस्त तक यह मेला ध्ूमधम के साथ मनाया गया। सातूं के दिन पित्रौटा गाँव की महिलाओं द्वारा गौरा का विग्रह बनाकर उसे ढोल-नगाड़ों के साथ नगर में शोभा यात्रा के रूप में घुमाया गया। उसके बाद गौरा के विग्रह को रामलीला मैदान में स्थापित करके पूजा-अर्चना हुई। अगले दिन महेश्वर का विग्रह बनाकर उसे भी गौरा के विग्रह के साथ स्थापित किया गया। आठूं में प्रतिदिन अनेक कार्यक्रम देखने को मिले। हुड़के की थाप पर झोड़ा, चांचरी, न्योली-छपेली के अलावा स्थानीय विद्यालयों ने रंगारंग प्रस्तुतियां दीं। छह दिन तक चले इस मेले के अन्तिम दिन गौरा-महेश्वर का विदाई समारोह ध्ूमधम से हुआ। वर्तमान में गाँवों से पलायन के कारण पहाड़ की यह अद्भुत संस्कृति सिमटती जा रही है। ऐसे में आठूं मेले जैसा भव्य कार्यक्रम रामलीला कमेटी द्वारा कराना सराहनीय है। जो लोेग अपने ग्राम से दूर शहर में बस चुके हैं और उनकी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को नहीं जान पा रही है। उनके लिये यह आयोजन संस्कृति का परिचय पाठ भी है। सोर रामलीला प्रबन्ध् कारिणी के सभी सदस्य बहुत बधई के पात्रा हैं क्यांेकि पिछले नौ वर्षों से उन्होंने इस आयोजन को शहर में करवाकर सबको एकसूत्रा में बांध् दिया है। जिसमें नई पीढ़ी ने भी अभिरुचि ली है।
सोर के कुमौड़ गाँव में मनाया जाने वाली हिलजात्रा ध्ूमधम से मनाई गई। यहाँ कई ग्रामों में हिलजात्रा मनाई जाती है परन्तु कुमौड़ की हिलजात्रा में ‘लखिया भूत’ नामक पात्रा आकर्षण का केन्द्र होता है। इसके भगवान शिव का बारहवां गणमाना गया है, जो भगवान शंकर के क्रोध् से उत्पन्न हुआ था। कहा जाता है कि यह भयानक भूत का मुखौटा नेपाल के राजा ने महर भाइयों को उनकी वीरता से प्रसन्न होकर दिया था। जो व्यक्ति विशेष लखिया भूत का मुखौटा है उसके शरीर पर लखिया अवतरित हो जाता है। इस बार भी भयानक मुखौटा पहने, शरीर पर घंटियों सहित श्रृंगार किये लखिया भूत ने जब ऐतिहासिक हिलतात्रा मैदान में प्रवेश किया तो दर्शकों के रौंगटे खड़े हो गये। लखिया महाराज की जय और लटेश्वर महाराज की जय के नारों ऐ गूंजते मैदान का वातावरण एक बार पिफर से लोक की अपनी मान्यताओं पर सोचने को मजबूर कर देता है। इस आयोजन को कृषि से जोड़ कर भी देखा जाता है। लखिया भूत के अलावा बैलों की जोड़ी, गल्या बल्द का मुखौटा लगाकर, हुक्का पीता व्यक्ति, कमेड़ लगाने वाला, मछुआरे आदि पात्रों भी मैदान में आते हैं। यह सब आस्था के अलावा लोगों का भरपूर मनोरंज भी है।
चम्पावत जिले के पाटन-पाटनी में 14 सितम्बर से चार दिवसीय झूमाध्ूरी कौतिक होना है।
चमोली जिले में बधण और दशोली की मां नन्दा को भक्तों ने कैलास के लिये विदा किया। जागर लगाई गई।

ओ हो रे नैनीताल…..

कार्यालय प्रतिनिध्
पर्यटन नगरी नैनीताल में बढ़ता जा रहा दबाव और चल रही नीति-रीति से अजब हाल हो चुका है। गर्मियों में यहाँ का ताल सूखने लगा है और बरसात में अगल-बगल टूटने लगा है। देशी-विदेशी पर्यटकों की पसंदीदा जगह सरोेवर नगरी नैनीताल की रोजी-रोटी होटल उद्योग है। ऐसे में यहाँ के बाशिन्दों के अलावा बाहर से आकर कापफी संख्या में लोग रहने लगे हैं। बड़ा पैसा, बड़ा दीमाग, बड़ी पहँुच वालों ने उँफची पहाड़ियों से लेकर झील के पास तक साम्राज्य पफैला लिया जबकि पार्किंग के लिये यह पहाड़ी स्टेशन बेचैन है। नैनीताल बचाओ, इसका पर्यावरण बचाओ के नाम पर बहुत नारे लग चुके हैं लेकिन मनमापिफक सजावट पसन्द लोगों ने रातों रात कंक्रीट के ढेर लगा लिये जबकि अपनी ही जमीन पर अपना घंरौदा बनाने के लिये नियम पसन्द लोग परेशान हो चुके हैं। पीढ़ियों से नैनीताल रहने वाले चाह कर भी अपने मकान को न तो सजा पा रहे हैं और न बना पा रहे हैं जबकि नियम का पेंच लगाने वाले यह नहीं बता पा रहे हैं कि वह जिस स्थान पर बैठे हैं वहाँ किस नियम के तहत निर्माण कार्य या सजाया गया था। नैनीताल में लोअर माल रोड ध्ंसने लगी है। ऐसे में मान लिया जाता है कि शहर में बहुत दबाव है और निर्माण कार्यों को रोक कर सबकुछ ठीक कर लिया जायेगा। हाईकोर्ट ने भी झील के दो किलोमीटर के दायरे में निर्माण कार्यों पर रोक की बात कही। बाद में बात-बहस के बाद इस मामले में विचार हुआ। एनओसी लेकर अपनी जमीन पर अपना निर्माण करने वाले अभी तक भटक रहे हैं। दूसरी ओर झील को मजबूती देने के लिये हुए निर्माण कार्य की पोल खुल चुकी है। बार-बार लगाये जा रहे बजरी- सीमेंट का कोई असर नहीं है और सड़क का 25 मीटर भाग टूट कर नैनी झील में समा गया। ऐसे में अपर मालरोड से डिवाइडर लगाकर वाहनों का संचालन किया गया है। इसी समय 25 मीटर और हिस्सा में दरार आ गई।
इस बीच हाईकोर्ट के अनुपालन में नगर पालिका ने चाट पार्क व भोटिया मार्केट चार दर्जन दुकानों के अतिक्रमण हटाये। 36 दुकानों की झाप हटाने के अलावा 16 दुकानों के अतिरिक्त निर्माण को ध्वस्त किया गया। कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद प्रशासन हरकत में है और हाईकोर्ट के खिलापफ नारेबाजी करने वाले व्यापारियों ने क्षमा मांगी।
बहुत ही सीध्ी सी बात है कि चाट हो या चाकलेट, खिलौने हों या कपड़े की दुकान…..सभी ने अपनी जगह तलाशनी है। जिस जगह पर्यटकों की भीड़ और बिक्री की सम्भावना हो वहाँ दुकान जरूर सजेगी। यह बात दूसरी है कि कौन अपनी जगह पर दुकान सजाता है और कौन किराये पर या अतिक्रमण कर। चूंकि नैनीताल में हाईकोट है और न्यायमूर्ति सहित तमाम छोटे-बड़े अध्किारी यहाँ होते हैं। ऐसे में घिचपिच नैनीताल से होकर जाने में यदि इन्हें असुविध हुई तो सख्ती तो होगी ही। पिफर हाईकोर्ट के खिलापफ बोलना तो बहुत ही गलत हो जायेगा। यही सब हो रहा है इस नैनीताल में। यहाँ तक कि हाईकोर्ट को नैनीताल में पसन्द करने वाले भी चाहने लगे हैं कि यह किसी दूसरी जगह चला जाता। चारों ओर से डण्डे बरसने जैसा हो गया है इस सरोवर नगरी में। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, यहाँ के बाशिन्दों को एकजुट होकर न्यायालय का सम्मान करते हुए रास्ता तलाशना चाहिये। आंखिर नैनीताल की रंगत कुछ और ही ठैरी। इसे खूब सजाओ, खूब संवारो। पर्यावरण का ध्यान रखो, अतिक्रमण मत होने दो, जबरन के निर्माणों से बचो। नहीं तो क्याप्प से क्याप्प हो जायेगा।

ढाकर बोकने का अपना मजा था, लाछुली से भराड़ी जाते थे

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
अल्मोड़ा। तिब्बत व्यापार के दिनों में जोहार के रावत परिवार में से एक तेजम से तीन किमी आगे लाछुली और एक जलद बस गया। व्यापार के सिलसिले में इध्र से उध्र जाने वालों ने दुरुह दिन देखे हैं और अपने को स्थापित किया है। अपनी उन पुरानी यादों के साथ पिघलता हिमालय से बात करते हुए 66 वर्षीय रघुनाथ सिंह रावत कहते हैं कि बचपन में उन्होंने भी ढाकर बोका है। लाछुली से बाखड़धर, शामा, हरसिंगियाबगड़ होते हुए भराड़ी तक वह लोग जाते थे। ये व्यापार के पड़ाव थे और बकरियों-भेड़ों ेके साथ सामान लेकर जाना होता था। ढाकर बोकने का अपना मजा था। समूह में जब कई लोग अपने जानवरों के साथ जाते थे तो छोटों को कुछ जानवरों के साथ आगे-आगे भेजा जाता था। पीछे से बड़े-सयाने आते थे। वह बताते हैं कि मुनस्यारी रुट से वह नामिक भी गये। नामिक में रावतों की जमीनें हैं।
श्री रावत के पिता 103 वर्षीय गोविन्द सिंह रावत तो कई बार तिब्बत व्यापार में शामिल हुए हैं। माइग्रेसन के समय यह परिवार लाछुली से शंखाध्ुरा ;मुनस्यारी पिफर मिलम जाता था। इसी अवरोही क्रम में उतरते थे। गोविन्द सिंह जी इस समय शंखाध्ुरा में रहते हैं।
रघुनाथ सिंह जी बताते हैं कि जलद वाले गंगासिंह रावत अभी भी हर साल मिलम जाते हैं। कई पुरानी यादों के साथ रघुनाथ जी अल्मोड़ा में निवास कर रहे हैं। शंखाध्ुरा में भी इनका परिवार है।
पिघलता हिमालय 6 जून 2016 के अंक में प्रकाशित

तिब्बत व्यापार के दिनों गढ़वाल में व्यापार का अपना महत्व था

डाॅ.पंकज उप्रेती
आजादी से पूर्व जब भारत-तिब्बत खुला व्यापार चलता था तब व्यापारियों के आन्तरिक व्यापार का नेटवर्क भी जबर्दस्त था। व्यापार के उन दिनों की चर्चा में अक्सर तिब्बत व्यापार की बात होती है जबकि कुमाउॅ-गढ़वाल के बीच होने वाले व्यापार का अपना महत्व था। व्यापार की इन रोचक जानकारियों के साथ 74 वर्षीय मोहन सिंह धर्मशक्तू बताते हैं कि व्यापार के दिनों में एक व्यापार तिब्बत की ओर होता था, दूसरा गढ़वाल की ओर। बरसात में तिब्बत जाते थे ;जुलाई से नवम्बर तक फिर गढ़वाल में व्यापार होता था।
जब माइग्रेशन में परिवारों के पड़ाव लगते थे तब मिलम, दरकोट, लोधिया बगड़ ;टिमटिया, तेजम के प्रसिद्ध इन धर्मशक्तू परिवार का आना-जाना होता था। माता केसी देवी व पिता हीरा सिंह के घर जन्मे मोहन सिंह, भूपेन्द्र सिंह, स्व.प्रद्युमन सिंह की वाल्यकाल का पढ़ाई दरकोट;मुनस्यारी हुई। पठन-पाठन के बाद सभी नौकरी-पेशा में इधर उधर रहे। मोहन सिंह धर्मशक्तू ने रेमजे अल्मोड़ा से हाईस्कूल, नैनीताल से इण्टर और लखनउ से डिप्लोमा करने के बाद विद्युत विभाग में अपनी नई शुरुआत की। गढ़वाल में उन्हें नौकरी का अवसर मिला और चमोली में कई अनुभवन उन्हें हुए। वह बताते हैं कि जब वह गढ़वाल में थे, स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया से चर्चा होती रहती थी। और बात निकल कर आती- ‘हमारा हिमालय पिघल रहा है।’ पिघलता हिमालय के शुरुआती दिनों में इसके नाम को लेकर चर्चा में सुमार था।
श्री धर्मशक्तू व्यापार के दिनों की पुरानी यादों पर लौटते हुए बताते हैं कि गढ़वाल में उनका व्यापार ज्यादा होता रहा है। कार्तिक माह में जब व्यापारियों का मुनस्यारी निवास होता था, तब गढ़वाल को जाते थे। गढ़वाल में ज्यादातर काला उफन की मां थी क्योंकि वहां काला कम्बल-लवादा पहनने का रिवाज है। तब जोहार के व्यापारियों की कई दुकानें भी गढ़वाल व्यापार के लिये थीं। ग्वालदम, थराली, देवाल, मीनगदेरे, उज्जवलपुर, सिमली, आदीबद्री, तिलवाड़ा, रुद्रप्रयाग, भुनारघाट, महलचैरी, चैखुटिया में जगह-जगह इनकी दुकानें थीं। अक्टूबर से अप्रैल तक व्यापारी इनमें दुकानदारी करते थे। तब तिब्बत से सीधे बकरियों द्वारा सामग्री पहुंचती थी। दुकानदार सम्पर्क कर इन सामग्री को पहुंचाते। भेड़-बकरियों की पीठ में सामान लादने का ‘बिल्च्या’ ;फांचा निकाल कर इनके द्वारा आलू, कोयला, चूना इत्यादि ढुलान करतवाते थे। तब दानसिंह मालदार के कारोबार भी काफी फैलता जा रहा था और व्यापार का सामान लेकर आये भेड़-बकरी पालक मालदार का सामान भी लदवाकर ले जाते थे। तब घोड़े वाले हल्द्वानी, रामनगर भाबर की मण्डी को जाते थे और भेड़-बकरी से समान ढोने वाले गढ़वाल की ओर ज्यादातर आते। व्यापार में उधारी भी होती थी और वसूली/उघाई करने वाले को ‘पगाली’ कहते थे। इस प्रकार गढ़वाल व्यापार का वृहद इतिहास रहा है। ;श्री मोहनसिंह जी से निवेदन भी है कि इस बारे में वह विस्तृत लेखन करेंगे
पिघलता हिमालय 5 दिसम्बर 2016 के अंक में प्रकाशित

तिब्बत व्यापार बन्द के बाद थाला में ही रहने लगे गनघरिया परिवार

धम सिंह गनघरिया
बागेश्वर। काण्डा से कोटमन्या जाने वाली सड़क से एक किमी नीचे बसा है ग्राम थाला। करीब 90 परिवारों वाले इस गाँव में पानी के बिना न तो खेती हो पा रही है और न ही अन्य कार्य। विकास की वाट जोह रहे ग्रामीण चाहते हैं कि शासन प्रशासन इनकी सुन ले।
भारत-तिब्बत व्यापार के जमाने में जोहार के गनघर से पड़ाव डालते हुए व्यापारी यहाँ भी ठहरते थे और व्यापार टूटने के बाद लोग यहीं बस गये। यहाँ पर चालीस जोहारी शौका परिवार हैं और संयोग से गढ़वाल के शौका परिवार भी हैं। गाँव के कुंवर सिंह नित्वाल, बालम सिंह गनघरिया, हीरा सिंह मडवाल कहते हैं कि भरण-पोषण के लिये दन-कालीन बुनाई और बकरी पालन के सिवा कुछ नहीं रह गया है। विकास की दौड़ में यह इलाका पिछड़े नहीं, इसके लिये ग्राम विकास की योजनाओं को लाना चाहिये। जनप्रतिनिध्यिों को इसकी टोह लेनी चाहिये।
ग्राम के सबसे बुजुर्ग हंसा सिंह गनघरिया बताते हैं कि उनके बुजुर्गो के जमाने से ही जोहार से थाला आया करते थे, तब यह जंगल था। तिब्बत व्यापार के समय भेड़-बकरियों के साथ वह लोग तिब्बत जाया करते थे। कपकोट होते हुए हल्द्वानी भाबर तक उनकी यात्रा होती थी। भेड़-बकरियां गुड़ की भेलियां लादकर चलती थीं। चीन यु( के बाद व्यापार बन्द होते ही जो जहाँ था, वहीं रुक गया। पहले आबादी कम थी, अब आबादी बढ़ने के बाद जरुरतें भी बढ़ गई हैं। पहले जंगल और पानी सब था। अब गाँव में पानी के लिये हाहाकार मचा हुआ है।
पिघलता हिमालय 4 जुलाई 2016 के अंक में प्रकाशित

पुंगराउ घाटी में वृजवालों ने बनाया था पड़ाव जो सिमट चुका है

पि.हि. प्रतिनिध्
पांखू/ध्रमघर। पुंगराउ घाटी कृषि व पशु पालन की दृष्टि से बहुत उपजाउ रही है लेकिन राजनीति के खेल में यहाँ विकास कम घसीटबाजी ज्यादा होती रही है। वर्तमान में विधयक नारायण राम द्वारा क्षेत्रा के लिये तैयार खाके को देखते हुए लग रहा है कि काफी कुछ होगा। दुग्ध् संघ अध्यक्ष विनोद कार्की विधायक द्वारा इस घाटी के लिये दिलाई गई योजनाओं और प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आने वाले चुनावों में विकास कार्य उन्हें हर बूथ में बढ़त दिलायेेंगे।
पुंगराउ घाटी में कोटगाड़ी यानी कोकिला देवी का विख्यात मन्दिर है। इस घाटी के कई गाँवों में सीमान्त क्षेत्र के व्यापारियों ने डेरा डाला था। इनके पड़ावों में तक पशुओं बड़े झुण्डों का आवागमन होता था किन्तु सारी स्थितियां बदल चुकी हैं। जोहार के बिल्जू निवासी वृजवालों ने पुंगराउ घाटी को उपयुक्त माना और यहाँ उनका आना जाना था। निकट ही धरमघर में पंचपालों ने भी अपना डेरा डाला था। वहाँ आज भी शौक्यूड़ा ग्राम है और माइग्रेसन व्यवस्था के तहत संचालित होना स्कूल है।
पंुगराउ घाटी में वृजवालों के जो परिवार हैं उनमें ग्राम मसुरिया में तीन परिवार, फल्याटी में तीन परिवार, डोबगाड़ा में एक, तुराथल में चार, लोहाथल में एक परिवार है। अब इनका मुख्य व्यवसाय कृषि है। पलायन के कारण अधिकांश लोग बाहर ही हैं। ग्राम मसुरिया में जोहार के अग्रणीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी त्रिलोक सिंह वृजवाल का का मकान भी है, जो अब खण्डहर हाल में है। इनके परिजन वर्तमान में मुनस्यारी में हैं।
मसुरिया ग्राम के निवासी भगत सिंह वृजवाल बताते हैं कि पुराने समय में जोहार के बिल्जू, मुनस्यारी के दुम्मर के बाद व्यापारी परिवार यत्र-तत्र रहते थे। याने तीन जगह उनके घर होते थे। भारत-तिब्बत व्यापार बन्दी के बाद कई परिवार अपनी सुविधनुसार रहने लगे। तल्ला दुम्मर से पांखू के मसुरिया में आये उनके परिवार के अलावा नारायण सिंह और घनश्याम सिंह वृजवाल का परिवार वर्तमान में है। डोबगाड़ा में शेरसिंह प्रहलाद सिंह का परिवार है। फल्याटी में भीम सिंह, ललित सिंह, सुरेन्द्र सिंह वृजवाल का परिवार है। इन्हीं परिवार के प्रकाश सिंह वृजवाल अल्मोड़ा के जिला कार्यक्रम अधिकारी हैं। लोहाथल में एक परिवार अमरनाथ वृजवाल जी का है जो ड्योटी से है। घोरपट्टा से तुराथल में आये परिवारों में चार परिवार वर्तमान में दरपान सिंह, नरेन्द्र सिंह, हुकुम सिंह, नवीन सिंह वृजवाल के हैं।
इस प्रकार पुंगराउ घाटी में भी वृजवालों के परिवार अभी हैं। अपनी मेहनत के बल इन्होंने अपने कृषि कार्य को संभालने के साथ ही संस्कृति को बनाये रखा है। भले ही जोहार से काफी दूर इनका आशियाना बन चुका है किन्तु अपनों को याद करते हुए यह लोग निरन्तर बिल्जू का स्मरण करते हैं। जहाँ से पैदल चलकर इनके पूर्वजों ने अपने कारोबार का विस्तार किया और यथासमय अपने को स्थापित कर लिया। इन परिवारों से कापफी लोग नौकरी-पेशा में बाहर हैं किन्तु इनका योगदान कोटगाड़ी की इस भूमि में भी है।
पिघलता हिमालय 4 जनवरी 2016 के अंक में प्रकाशित

हरि प्रदर्शनी शुरु करवाने व समाजसेवा में अग्रणीय थे नरसिंह जंगपांगी

 

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्त क्षेत्रा में मल्लादुम्मर में होने वाली हरि प्रदर्शनी क्षेत्रा की इकलौती यादगार प्रदर्शनी है जो आजादी से लेकर आज तक प्रतिवर्ष होती है। इसमें कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने के अलावा स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण किया जाता है। स्व.हरिसिंह ज्यू के याद में होने वाली इस प्रदर्शनी को शुरु करवाने वाले नरसिंह जंगपांगी सहित यादों की लम्बी श्रृंखला को सहेजे श्रीमती कमला रावत उत्तरांचल विहार हल्द्वानी में रहती हैं।
बात जंगपांगी परिवारों की करते हैं तो पता चलता है कि गौचर, थल के पास पतेत में जंगपांगियों का परिवार बसा। यहीं से लगे हुए ससखेत में जंगपांगी परिवार गया। किशन सिंह, मान सिंह, नर सिंह तीन भाईयों ने ससखेत को आबाद किया। किशन सिंह बहुत ही मान्यता वाले व्यक्ति थे और उनकी बात सभी को मान्य थी। इन्हीं के पुत्र हैं- पान सिंह, दीवान सिंह, राजेन्द्र सिंह। दूसरे भाई मान सिंह थे, जिनके पुत्र हुए- मंगल सिंह और महेन्द्र सिंह ‘महन्त’। तीसरे अर्थात छोटे भाई नरसिंह की सात पुत्रियों व एक पुत्र हुए। विवाहित पुत्रियों में खगौती धर्मशक्तू, चन्द्रप्रभा टोलिया, राजेश्वरी पांगती, लक्ष्मी मर्तोलिया, कमला रावत, बसन्ती टोलिया व कोकिला हुईं। पुत्र प्रहलाद सिंह जी ससखेत में हैं। प्रहलाद जी के पुत्र-पुत्रियों में- भूपेन्द्र, महिपाल, देवेन्द्र/दीपू, अनीता पांगती, जुगुनू पांगती, कविता हैं।
नरसिंह जी की पुत्री श्रीमती कमला रावत बताती हैं कि ताउ जी किशन सिंह की बड़ी धाक थी और जनहित के मुद्दों पर सब उनके साथ थे। उनके बाद छोटे ताउ मानसिंह ने भी समाज को जोड़ते हुए परम्परा को बनाये रखा। बुजुर्गों के बाद पिता नरसिंह में भी जिम्मेदारी आई जिसे उन्होंने निभाया। उनका बड़ा परिवार था। तब कृषि व पशु आधारित कुटीर उद्योगधन्धों पर सभी लोग लगा करते थे। खुशहाल गाँवों में चहल-पहल थी। माइग्रेशन सिस्टम में बुर्फू, मल्लादुम्मर, ससखेत तक लोगों का आवत रहती थी। पशुओं के साथ-साथ कई कामगार भी होने से पूरा परिवार व्यस्त था। ऐसे में पठन-पाठन भी प्रभावित होता। पढ़ने की लगन के कारण अवरोध् के बावजूद उन्होंने पढ़ा। तब ससखेत से अल्मोड़ा आने में पांच दिन लग जाते थे। वह पुराने रास्ते तो अब दिखाई भी नहीं देते हैं। अल्मोड़ा में बुआ तुलसी रावत-स्वतंत्रता सेनानी दुर्गा सिंह रावत के घर दूरस्थ क्षेत्रा से बच्चे जाते थे। छात्राओं को बुआ जी के घर में रहने का इन्तजाम था और छात्रों के लिये जोहार भवन में रुकने की व्यवस्था होती थी। अल्मोड़ा में आकर पढ़ने वाले कई छात्रा-छात्राएं काफी आगे पदों तक पहुंचे हैं। जोहार की प्रथम ग्रजुएट इन्द्रा दीदी थीं, जो लखनउ में प्रधनाचार्या रहीं बाद में हल्द्वानी में भी थी।
पढ़ाई के बाद कमला जी जखोली ;टिहरी में एडीओ बनीं। शेरसिंह रावत के साथ विवाह उपरान्त इन्होंने अपनी सरकारी सेवा छोड़ दी। उन दिनों वैसे भी महिलाओं को कम ही नौकरी में भेजा जाता था। अपनी घर-गृहस्थी में रमने के बाद आज श्रीमती कमला रावत पुरानी यादों को तरोताजा रखे हुए बचपन को याद करती हैं। गाँव-घरों के सामुहिक आयोजन, कुटीर उद्योग, व्यापार सिलसिले में यात्रा, पैदल रास्तों होकर मीलों पढ़ने जाना……………………….।
पिघलता हिमालय 1 अगस्त 2016 के अंक में प्रकाशित

नाम बदलती सरकार

राज्य सचिवालय के विश्वकर्मा भवन के पंचम तल में बने सभागार का नाम सरकार ने बदल दिया है। कांग्रेस सरकार ने इस सभागार का नाम पूर्व मुख्य सचिव स्व. आर.एस. टोलिया के नाम से रखा था। मौजूदा सरकार ने इस सभागार का नाम अब वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम से रखने का फैसला किया है। इसके लिये जीओ भी जारी हो चुका है।