पुस्तक समीक्षा: ईथर से कागज पर

डाॅ.प्रयाग जोशी

मैं, कम्प्यूटर, स्मार्टपफोन, इण्टरनेट आदि पर निकलने वाले पोर्टलों की करिस्माई तकनीकों के सहारे चलने वाली साहित्यिक गतिविधियों से निरक्षर आदमी के जितना अनजान हँू। इधर संयोग से ही चन्द्रशेखर जोशी की किताब ‘धरती के चुभते सवाल’ हाथ आ गई जो पफेसबुक के एप पर प्रकाशित हुए एक सौ पचास ब्लागों के कण्टेण्ट को लेकर पुस्तकाकार छपी है।
एक ब्लाग एक पृष्ठ में है तो एक सौ पचास ब्लाग भी उतनी ही गिनती के पृष्ठों में आ गए हैं। मुद्रण की इस सुविचारिता से, किसी भी एक ब्लाग को पढ़ने के लिए, अगले पृष्ठ में जाने या पृष्ठ को पलटने की जरूरत नहीं होती। एक पेज पर एक विषयवस्तु पूरी खत्म हुई और दूसरे में नयी चीज पढ़ने को मिलती जाती है। एकरसता के लिए उसमें कोई ठौर नहीं हैं अखबार का जैसा, बिना आयास के पढ़ते जाने का तारतम्य उत्सुकता बढ़ाता जाता है कि देखें अगले पेज में क्या लिखा है? जितने पेज पढ़ने का मन हो, पफुर्सत से पढ़ो और रखते जाओ। हर रोज, हर बैठक में पाठक नयी-नयी सम-सामयिक सोच विचार की चीजंे पढ़ता जाता है। विविध् वण्र्य-वस्तु की यह किताब नाना प्रकार के स्रोतों से जुटाई गई और मौलिक अंदाज में प्रस्तुत की गई ज्ञातव्य जानकारियों से सजी हुई है। ज्ञान का ‘बखार’ नहीं है इसमें। पाठक को ज्ञान के उजाले में लाने की कोशिश है। जीवन और जगत की तात्कालिकता में अनुभव की गई बेचैनियों से निःसृत हुई यह प्रेरणा प्रशंसनीय है।
अधसधे हाथों की लिखाई से, स्कूली विद्यार्थियों की कापियों में छोटे निबन्ध्/ लेखों की तरह, अधिक से अधिक तीन-चार पृष्ठों में प्रश्नों का उत्तर लिखकर परीक्षा देने वालों का भी एक जमाना हुआ करता था। मैं उसी जमाने की अनुश्रुति में इस किताब को देखता और पढ़ता भी गया। कमजोर आँचाों में होने वाली किरकिरी और जलन के बावजूद किताब पढ़ने की उत्सुकता थमी नहीं। उसकी वजह विषयों को लिखने के लिए बरती गई सूझ, सोचने की निजता और भाषा की सतर्कता और सरलपन लगी। पढ़ने के लिए रखे अखबार और पत्रिकाओं की तरह किताब मेज में पड़ी रही। जो ब्लाग पढ़ लिया उसमें निशान बनाकर रखता गया। समय-साक्ष्य ‘वर्तमान’ था। विषयों की तरतीबें और संयोजन मनोनुकूल लगते गए तो मजे से बीस दिन में आद्योपांत पढ़ लेने के बाद, एक अच्छी और नयी शैली में लिखी हुई सर्वतोभद्र नालेज की किताब पर प्रतिक्रिया लिखे बगैर रह न सका।
किताब में, उत्तराखण्ड से सन्दर्भित सबसे ज्यादे तेरह ब्लागों में लेखक की स्व चेतना, सामाजिक संचेतना और मानवीय सम्वेदनशीलता की झलक मिली। लेखक ने अपनी ध्रती की खासियतें सुर्खियों में रखीं। क्षमताओं को समझा और विडम्बनाओं को रेखांकित किया है। ‘उत्तराखण्ड मंे जहाँ सुविधएं न होने और पहाड़ छोड़ने की मानसिकता अपफसरों के लिए कस्तूरी बनी हुई है तो वहीं, वहाँ के अपेक्षाकृत सम्हले हुए मौरुसी लोगों के महा-पलायन को थामने को कोई समाधन किसी के पास नहीं है।’ अपने लोगों का, अपने लोगों के लिए और अपने भूगोल की खातिर बना बना उत्तराखण्ड ‘रैबार खत्म दीदा करव जाणा छा?’ से शुरु होता है। उसके उत्तर की भद, गिर्दा  की, सिर्फ एक पंक्ति की कविता-भाषा की लाक्षणिकता मं है कि ‘खेल तुम्हारा तुम्हीं खिलाड़ी’।
अपने बड़बोलेपन से रौशनदार शीर्षकों से ही नहीं अपितु एक-एक वस्तुगत यथार्थ का सार्वभौमिक व सार्वजनिक परिचय कराते जाते ब्लाग हैं- ‘सॅवर जाये तो जन्नत से कम नहीं उत्तराखण्ड’, ‘प्रेम की दुनियाँ उत्तराखण्ड’, ‘वीरों की ध्रती उत्तराखण्ड’, ‘डब डब आँखें उत्तराखण्ड’, पर क्या करते हो कह कर? विडम्बनाआंे ने पेच ऐसे पफॅसा रखे हैं कि ‘खनन, ठेकेदारी और भ्रष्टाचार से उपजे ध्न से बलवान बने नेता और सत्ता के दाॅवों से बाजी मारने के अभ्यासी अफसर कुछ ही समय में यहाँ बदमाश का रूप ध्र लेते हैं।’ नशे का व्यापार और दबंगई कार्य-संस्कृति का ऐसा अंग हो जाती है कि ‘लोकोपकारी’ कहा जाने वाला सबकुछ, वांछित अपेक्षाओं से एकदम उलट चले जाता है। लेखक के पास लिखने को बचा रह जाता है तो यही कि ‘लाचार जवानी उत्तराखण्ड’, ‘चोखे धन्धे उत्तराखण्ड’, ‘इस धरती पर गहरे जख्म उत्तराखण्ड’। आइरनी यह है कि यह सब धन के प्रवाह में तेजी से हो रहा है। नव-धनिक और हुकूमत इस प्रवाह की धर को तेज करते हैं। इसका अंदाज ‘शादियों और सेल्फियों पर लिखे गए ब्लागों से होता है।’ उच्च तकनीक के उपयोग का विरोध् ठीक वैसे ही नहीं किया जा सकता जैसे कि शराब का, लेकिन ये दोनांे चीजें यदि कम अक्ल और कम उम्र के बच्चों की पहँुच में चली जाऐं तो बर्बादी तय है। सस्ते और अच्छे मोबाइल फोन और उस पर भी सस्ते इण्टनेट वाउचरों ने युवा पीढ़ी को अपनी गिरफ्रत में ले लिया है।’
यहाँ, ‘खुशियों और मेल-मिलाप के विस्तार के सामूहिक भावना से शुरु हुए मेलों और संस्कार समारोहों में बाजार का इरादा घुसा तो बेचने और कमाने की नीयत में सब कुछ बिगड़ता चला गया है। देखने को बच गया केवल ‘हुड़दंग’। लेखक का जिम्मेदार और समझबूझ भरा मशवरा है कि ‘शादियों के सम्बन्धें को जीवन्त, उल्लासपूर्ण और बहुआयामी बनाने में कोलाहल व लेन-देन का कोई महत्त्व नहीं है। यह एक मजबूरी की रश्म भी नहीं। यह जीवन का महत्वपूर्ण पल हैं इसे महत्वपूर्ण बनाने के लिए लालच, ढोंग व पाखण्ड की जरूरत नहीं होती’ परन्तु कौन सुन रहा? ‘सड़कों पर उतरी सिरफिरों की टोली’, ‘इस सुहानी डगर में सौ खतरे’, ‘गिरने का सीजन’, ‘मेरी बच्ची अब शादी के बाद तेरा हर कदम’ आदि ब्लागों को सामाजिक चलों की वर्णनात्मकता में नहीं अपितु हमारे सीध्े सादे और सरल रिवाजों में हाबी होते सम्बन्नता की विकृतियों के रूप में लेना होगा।
‘कैसा चलन हो गया है कि ठण्ड कितनी ही हो, कुछ महिलाएं स्वेटर तक नहीं पहन देतीं। दुल्हन को ऐसे बना देते हैं कि जैसे प्लैैस्टिक की गुड़िया। कार्यक्रम में, एक-दो आदमियों को रजिस्टर थमाकर कुर्सी पर ऐसे बिठा दिया जाता है मानो मण्डी में आड़ती के मुंशी।’
विविध् जातियों के, अलग-अलग वर्गों के असल और कम असल आयोजनों की शादियाँ होती रहती हैं पर ‘दिलदारों की शादी ओ हो’ क्या कहने। ‘रहम है कि ‘आज मेेरे यार की शादी है’ गीत को बैंड मास्टर पूरा नहीं गाते। ‘आदमी सड़क का’ पिफल्म के उस गीत में रपफी साहब ने आगे गाया था- ‘आज तू हमें नचाए, वक्त वो आने वाला ओ हो दुल्हनियाँ तुझे नचाए’।
लग्न, मुहूर्त और कर्मकाण्ड की शास्त्राीय जो अभी हाल-हाल के वर्षों तक जीवन के सबसे सुन्दर रिश्ते का केन्द्र बिन्दु हुआ करता था, इस कदर आडम्बरों से घिर गया है कि अब उसकी याद आते ही हर व्यक्ति तनाव में आ जाता है। लड़के-लड़कियों की बेडौल ऐठती कमरें, बेवजह आसमान में झूलते हुए हाथ और लात मारते पैरों को ये लोग डांस कहते हैं। ये डांस सड़कों पर होते हैं। शादियों का सबसे बड़ा किरदान पफोटोग्रापफर होता हैं पफोटोओं की अल्बम, विवाह के बड़े खर्च की मदों में से एक होती है। संगीत का सत्यानाश पिटी इन अल्बमों को कोई नहीं देखता फिर भी इनको घरों में रखे रहने का रिबाज हो गया है।’
उपर्युक्त सामाजिक नव-चलनों के बहुत गम्भीर सांस्कृतिक अर्थ हैं। लेखक सभी के घोड़ों को एक चाबुक से नहीं हांकता। किसी वर्ग, वर्ण या जाति के प्रति उसके मन में कोई पूर्वाग्रह, दुराग्रह नहीं है। वह निष्पक्ष हो, चलन, शगल, पिफतरत और फैशन के नाम पर पफैलाई जाती धन की की बदौलतो को देखता है। जहाँ उंगली उठानी हो, तर्जनी से वरजता है। उसकी मंशा के विपरीत मौजियों को भी वह भांपता है। रसूखदारों की मानसिकताओं की भद्दी नकल करने वाले जलसों पर भी उसकी नज़र है परन्तु भाषाई तिक्तता उसमें नहीं मिलती। समझदारों और कुछ नया करने के सम्भावनाशीलों से अपेक्षा भी कम नहीं हैं परन्तु उसका कोई एनजीओ नहीं है। चुटकियाँ, नख-क्षत, व्यंग्य और पफब्तियों के कुछ नमूने हैं-
‘दिनकर की लड़की एम.एस.सी. पास है। शादी के मामले में उसका मन अभी भी ‘पंछि बनूं उड़ति पिफरूँ’ में ही तरंगित हैं सक्सेना जी का लड़का हैसियत से 25 लाख का है। जोशी जी के लड़के की शादी बिना दहेज की हुई। बलबीर ने तीन वर्ष पहले बड़े बेटे की शादी की तो सवर्णों के लिए अलग से भोजन का इंतजाम करवाया था। छोटे लड़के की शादी का नम्बर आया तो बोले थे ‘जीवन भर अपमान करने वालों को खुशी में शामिल नहीं किया जाएगा। वर्मा जी ने सापफ कह किदया कि शादी कर रहा हँू पर एक रुपये का भी दहेज नहीं लिया जाएगा। एक शादी और हुई। लड़की एम.एस.सी. पास थी। लड़का सरकारी स्कूल में शिक्षक था। लड़के वाले सुबह एक स्टील का परात लेकर गए।’
फिजूल-फिजूल ही बखत-बखत सेल्पफी लेने के चलन पर शिक्षा-विभाग को निशाना बनाती सरकारी मशीनरी पर चुटकी अकारण नहीं है। विद्यार्थियों की तरफ से गुजारिश हुई है, ‘भेजो मास्साब सेल्फी भेजो। हाजरी के समय ही नहीं हर पीरियड की सेल्पफी केदारनाथ धम की तरह भेजना। हिन्दी के पीरियड पर वेष हिमाचल का सा बनाना। उर्दू के पीरियड की पफोटो उलेमाओं से मुलाकात जैसी होनी चाहिए। अंग्रेजी पढ़ाने की सेल्पफी हमेशा बदली-बदली भेजना। जिस विषय में शिक्षक न हो तो अध्किारी के पास की सेल्पफी दिखा देना। आपकी उंगली लगता है, सही-सही काम कर रही है, इसलिए जल्द आपका पूरा शरीर नेट पर लिंक किया जाएगा। इसके बाद आप आदर्श शिक्षक बन जाओगे।’
मजाक की ससब बनती सरकारी योजनाओं में ‘महेशराम की कागजी मशरूम’ भी एक ब्लाग है। उससे शुरु होकर, बीमार आदमी की चारपाई पर लकड़ी बाँध् कर अस्पताल ले जाने के लिए नदी पार कर रहे ग्रामीणों के पफोटो के साथ छपा ‘हम जीते हैं अपने दम पर सरकार की यहाँ जुर्रत नहीं’ के रोष भरे शब्दों को ‘बाक्स बंद’ करके ‘कब तक सितम सह लें: तड़प लें या रो लें’ तक और उसके बाद भी कई ब्लाग हैं। एक में, अपन ओवर टाइम में पोस्टमार्टम का अतिरिक्त काम करके घर लौटा सपफाई कर्मचारी सोनपाल है। वह अपने सत्राह वर्ष के लड़के को, सड़क में सापफ करने को बची पड़ी ढेरियों को उठाने के लिए काम पर जाने को विवश कर रहा है’, ‘पनीराम के घर नेता आए’, ‘भल्लू की दो किलो मंूगपफली’, आदि की सीरीज के सभी ब्लाग हमारे-आपके सभी के आँखों देखे शब्द-चित्रा हैं। जिनके विषय में ये व्यक्त किये गए हैं उन उन तबकों तक पहँुचने वाली हमारी सरकार की इमदादों की परिणति दिखाती हैं ‘रुलाते रहेंगे बैंक में’। इनमें मैंहदी, भानु और कितने ही ट्टण लेने वालों के हश्र की दास्तानें हैं। कथारस से पूर्ण। इनको पढ़ने से, लेखक की, बद किस्मती, घटना- दुर्घटनाओं, विडम्बनाओं और पचड़ों का लेखक की कहस की क्षमता का पता चलता है। मन मारकर ही उसने छोटे से भी छोटे में अपने कथनों को सीमित किया है।
‘सुन्दरराम का बेटा जम्मू मेमं शहीद हो गया। दीवान सिंह की पत्नी विमला पत्ते काटने भीमल के पेड़ पर चढ़ी, गिर गई। इलाज कराने बड़े अस्पताल के आई.सी.यू. में पाँच दिन रही। खर्च तो खूब किया पर वह मर गई। तेरहवीं भी नहीं हुई थी कि रात में गुलदार गोठ में घुसकर उसकी दोनों बकरियों को खा गया। इन सब घटनाओं के इतिवृत्त कहानियों जैसे हैं पढ़ने में।
उत्तराखण्ड पर कहने के लिए लेखक के पास जितना है उससे कम देश और दुनियाँ पर नहीं है। भीड़, सड़कों के पचड़े, शोर, गन्दगी, मार्ट-माॅल बाजार, खरीददारी, बाजारों के चलन, उनका कार्पोटीकरण, देसी आदतों के लोगों की आदतें, जनपद जनों की पुराने जमाने की दिलेर मेहमानबाजी, वैश्विक घटनाऐं, सब अपनी जगह हैं। उन पर लेखक के अबोझिल विचार हैं। ‘यूं जंगल पर भली विजय’, ‘नमकचोरी’ और ‘चमचमाती ध्रती’ लेख पूर्वोत्तर के अपने देश के राज्यों पर हैं तो ‘महान कहलाये जाखा’ अण्डमान-नीकोबार के मूल निवासियों पर हैं।
‘सोच में विज्ञान न हो तो जान को खतरा’ ब्लाग भले ही एक ही पेटी में भरी हुई अलग-अलग कम्पनियों की दवाओं की तस्दीग लेने के लिए की गई मस्ती से शुरु होता हो उसकी जद में ‘वट्सएप’ और ‘फेसबुक’ जैसे निरंकारी चलक भी है। पागल कुत्तों के काटने से संक्रमित होने वाले ‘वायरस’ की बाते तो हैं ही, शैलानी, होटल-मालिक, दलाल, मापिफया और लपफंगे भ्ीा समाज और संस्कृति के तानों-बानों में घुसे ‘वायरस’ ही हैं। वैज्ञानिक सोच को रेखांकित करने वाले लेखों के क्रम में, ‘बोस हाकिन्स में गहरा नाता’, ‘हाकिन्स का जाना इस युग की दुःखद घटना’, ‘याद रहेंगे गैलीलियो’ख् ‘आइन्स्टीन हमेशा जिन्दा रहेंगे’ जैसे विषय शीर्षकों से लिखे गए ब्लाग हैं। इन सब में काॅस्मोलाॅजी विषय पर संक्षिप्त पर प्रमाणिक टीपें, उसके अध्ययन के विकास की ऐतिहासिक जानकारी और उसकी सूचना देने वाली खोजों की किताबों की भू सूचनाएं हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे उम्मीदवारों के लिए उपयोगी सामग्री है इनमें।
मनोवृत्ति, भावना और संवेगों की परतों को पहचानने की दृष्टि से लेखक ने एक विशिष्ट किस्म का ब्लाग लिखा है ‘गुस्सा’। इसमें अनुभव, विचार, अध्ययन और तजुर्बे से प्रत्यक्ष हुए यथार्थ का अच्छा विमर्ष है। झूठ और लालच, झूठ और दगाबाजी, गुस्सा और हिंसा, खुशी और गुस्सा, हिंसा और नपफरत आदि- आदि संवेगों के मनोविज्ञान की गहराई में जाने की यह कोशिश वस्तुनिष्ठ विषयों की तुलना में विषयीगत विश्लेषण की है। लेखक का प्रतिपादन है, ‘नपफरतों का न्यूनतम रूप मन मुटाव और उच्चतम रूप आतंक तक पहँुच जाता है। महबूब के चेहरे पर प्रेम के गुस्से के भाव, बच्चों के माँ-बाप का लाड़ से भरा वो चेहरा और बुराई के खिलापफ उमड़ा गुस्से का सैलाब सभी मानव जीवन के लिए सुखद है।’ ढाई सौ रुपये दाम की यह किताब पढ़ने लायक है।
चन्द्रावती कालोनी,
छोटी मुखानी, हल्द्वानी

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