गुरुजनों ने जीवन संवार दिया

नारायण सिंह मर्तोलिया से बातचीज

पि.हि.प्रतिनिधि
आज जब हम शिक्षा और शिक्षकों की बात करते हैं तो बाजार का कुरूप चित्र दीमांग में बनने लगता है। वैसा बाजार जिसमें किसी को कोई सुनवाई नहीं होती। पैसे के बल पर लेन-देन। किसी को किसी के भविष्य की चिन्ता नहीं। लेकिन असल गुरुजनों का मान-सम्मान हमेशा रहेगा। गुरु की भूमिका अपने शिष्यों को आगे बढ़ाने में पहले होती है। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा हुआ है। यहाँ पर नारायण सिंह मर्तोलिया जी से उनकी शिक्षा और बचपन की यादों के साथ गुरुजनों की भूमिका पर बातचीज के आधर पर प्रस्तुति है-
मुनस्यारी के मिनाल ग्राम के उमेद सिंह के परिवार से यह कहानी शुरु होती है। उनके दो पुत्र  नारायण सिंह, धरम सिंह हुए। ग्रामीण परिवेश का सीध सरल परिवार अपनी दिनचर्या में रहता। वह ग्राम जिसमें मर्तोलियाओं के कई परिवार रहते थे अब अधिकांश हल्द्वानी आकर बस चुके हैं। जब नारायण सिंह हाईस्कूल में पढ़ रहे थे, उनके पिता का निधन हो गया। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी सहित अपनी पढ़ाई का दबाव इनपर था।  ग्राम्य जीवन के घोर श्रम में नारायणसिंह मर्तोलिया ने इण्टरमीडिएट किया। इस बीच पालीटेक्निक के लिये बाहर चले गये लेकिन मौसम और स्वास्थ्य के साथ न देने से वह मुनस्यारी अपने गाँव लौट आए। घर की स्थिति-परिस्थिति देखते हुए 1967-68 में अध्यापन का कार्य किया। उसके बाद भारतीय पोस्टल विभाग में आ गये।
नारायण सिंह जी अपने जीवन में अपने गुरुजनों का हमेशा स्मरण बनाये रखते हैं और कहते हैं कर्मठ, ईमानदार और परिस्थितियों को जानने वाले वैसे गुरुजनों का मिलना दुर्लभ है। अतीत को याद करते हुए मर्तोलिया जी बताते हैं कि खेतीबाड़ी, पशुपालन का काम ग्राम्य जीवन का पहला हिस्सा होता है। इसके अलावा निजी संघर्ष लगे रहते हैं। वह बताते हैं- ‘‘जब मैं लखनउ से अस्वस्थ्य होकर मुनस्यारी आ चुका था और एक दिन बाजार में टहल रहा था। कवीन्द्र शेखर उप्रेती ने मुझे बुलाया और कहा- 6, 7, 8 में पढ़ाने के लिये कोई नहीं है। तुम जिला विद्यालय निरीक्षक पिथौरागढ़ को मिलो। मैं पत्र बनवाता हूं कि जब तक स्थायी व्यवस्था नहीं हो जाती है तब तक पढ़ाई के लिये इन्हें अस्थायी रूप से रख दिया जाए। विद्यालय के हैड क्लर्क रमेश उप्रेती जी ने पत्र बनाया। उस पत्र को लेकर मैं पैदल तेजम गया और अगले दिन पिथौरागढ़। सरकारी कार्यालयों की प्रणाली से मैं परिचित नहीं था अतः दो दिन तक चक्कर लगाता रहा। इसके बाद किसी तरह मेरी अस्थायी नियुक्ति का पत्र बन गया।’’ मर्तोलिया जी कहते हैं कि गुरुजनों को अपने शिष्यों का पूरा ध्यान रहता था और वह पग-पग पर मार्गदर्शन करते थे। वह विजय सिंह पांगती जी को भी अपना गुरु मानते हैं, जिनके कहने पर वह डाक विभाग से जुडे़।
मर्तोलिया जी सामने शिक्षा और डाक में से एक विभाग चुनने का अवसर था। विजय सिंह जी ने इन्हें समझाया कि शिक्षा में फिलहाल तो लग चुके हो लेकिन अस्थायी व्यवस्था में न जाने कब तक रहना पड़े। डाक विभाग में जाओ। इसके बाद नारायण सिंह आगरा में पोस्ट क्लर्क बन गये। 1974 में परीक्षा पास करते हुए प्रमोशन की प्रक्रिया में मुनस्यारी आए। अपने गाँव के नारायण को पोस्टआफिस में साहब बनकर आता देख ग्रामीण खुश थे। राजकाज में इधर-उधर तो जाना ही होता है। इसके बाद मर्तोलिया जी पिथौरागढ़, कर्णप्रयाग, बेरीनाग, जलौन कानपुर, इटावा होते हुए शहजहांपुर हैड पोस्टमास्टर बने और कुछ दिन हल्द्वानी भी रहे। इनकी कार्यदक्षता और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए आसाम भेज दिया गया। 1990-92 तक असम में अध्ीक्षक रहने के बाद यूपी के सहारनपुर, बरेली, बदांयू रहे। लखनउ, हरिद्वार सहित देहरादून में सेवा की। 31 मई 2009 को सहा. पोस्ट मास्टर जनरल उत्तराखण्ड के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद हल्द्वानी के दुर्गेश कालोनी में रह रहे हैं। इनके सुपुत्र जीतेन्द्र मर्तोलिया भी पोस्टल डिपार्टमेंट में हैं और अपनी कला-संस्कृति के लिये समर्पित हैं। पुत्र विनोद मर्तोलिया और जगदीश मर्तोलिया भी पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ अपने कर्मक्षेत्र में हैं। सामाजिक सरोकारों से जुड़े इस परिवार को शुभकामनाएं।

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