पौराणिक गाँव गैलंड. (गैं), ग्राम- सेला

इतिहास कथा
नरेन्द्र ‘न्यौला पंचाचूली’
शताब्दियों पहले ग्राम- सेला के स्येला मण्डम नदी के दायें छोर पर पौराणिक गाँव- गैलंड. नामक स्थान पर ग्राम बौन के राठ- बुंड.स्येला बौनालों के पितृ पूर्वज जन निवास करते थे, वे इस गैलंड. नामक क्षेत्र के मूल निवासी थे और और वर्तमान उत्तराधिकारी वे ही माने जाते हैं। इन बौनालों को बुंड.स्येला उपजाति नाम से भी सम्बोधित करते हैं। सदियों पूर्व ग्राम सेला का यह गैलंड. नामक स्थान में वीरान पड़े गाँव के मकानों के खण्डित अवशेष, मकानों के प्रवेश द्वार चैखटें, चिकनी मिट्टी का बर्तनों के साक्ष्य प्रमाण स्वरूप अभी भी मिलते रहते हैं। इस सुन्दर पौराणिक गाँव गैलंड. नामक क्षेत्र के चैड़े-चैड़े खेत के निशान, खेतों के बीच मैदानी भू-भाग, भू विभाजक पत्थरों के चिन्ह, गाँव के खड़न्जे एवं किराने किनारे खड़े किये गये उँचे-उँचे बड़े पत्थरों का बाड़ा, अनाज कूटने पीसने का जन्नदी (पत्थर का हाथ चक्की) और विशाल पत्थर पर बना पाला (ओखली), जानवरों को पानी पिलाने का कुलो, देव चिन्हित स्थल और गाँव का पंचायती चैथरा थं (चबूतरा) ऐसा आभास करता है मानो अभी-अभी कुछ समय पूर्व ही पंचायत से उठाकर लोग अपने-अपने घरों को चले गये हों, साथ ही इन साक्ष्यों को देखकर ऐसा लगता है मानो कुछ सदी पूर्व ही गैलंघ ग्रामवासियों ने यहाँ से पलायन किया हो।
सेला पौराणिक गाँव गैलंड. की प्राकृतिक, कृषि व व्यवसायिक सम्पदा के रूप में काफी समृद्ध था परन्तु यहाँ रहने वाले लोगों में बार-बार एक ही चीज की कसक थी कि गाँव पहाड़ से सटकर बसे होने के कारण दिन में सूर्य उदय की किरणें देर से पहुंचती है व शाम में सूर्य अस्त की किरणें जल्दी छुप जाती है (यानि सूरज की किरणें दिन में बहुत थोड़े समय तक के लिये ही पहुंच पाती थी)। सूरज की किरणें मानव व फसली जीवन के लिये अति महत्वपूर्ण होता है। यह गाँव ‘पहाड़ सूरज की किरणें’ गैलंड. सेलाल जनों के पलायन का कारण था, ऐसा दारमा रं जन और बुंड.स्येला जन कहते हैं। एक दिन गैलंड. सेलाल जनों ने इस समस्या का समाधान हेतु आपसी विचार विमर्श कर पंचायत का आयोजन किया, आगे भविष्य में गाँव तक सूरज की किरणें पहुंचने में रुकावट न हो करके इस रुकावट पैदा करने वाले पहाड़ को काटने का निर्णय लिया। प्राचीन काल में कोई भी ग्रामजन व बाहुबली जन जब भी किसी विशेष कार्य को करते थे, उस कार्य को प्रण लेकर करते थे और दूसरे क्षेत्र जनों के लिए एक उदाहरण सिद्ध करते थे। यह पहाड़ कटान का कार्य भी गैलंघ ग्राम जनों ने प्रण लेकर किया, प्रण लिया यदि हम एक ही रात में भोर सवेर से पहले इस पहाड़ को काट सके तो यहीं रहेंगे अन्यथा इस मातृ भूमि को छोड़कर कहीं और प्रवास पर चले जायेंगे।
(यह बात उस प्राचीन त्य वचन समय की है जब लोग अपने वचनों का सौ प्रतिशत मान रख उस वचनों पर अडिग रहते थे और मानव, वनस्पति व पशु पक्षियों की आपस की परेशानी को समझते हैं, साथ ही उस युग में वर्तमान का नौ दिन-एक दिन और वर्तमान नौ रात-एक रात के बराबर माना जाता था।)
पौराणिक गाँव-गैं ‘गैलंड.’ ग्रामजनों ने विशेष चाँदनी रात का दिन निश्चित कर ग्राम विधिवत पूजा-पाठ किया और भूमि-पूजन कर ग्राम जन अपने-अपने गैन्थी, फावड़ा, छैनी, साम्बल, घन और अन्य हथियारों को लेकर बलशाली ग्राम योद्धा युवक उस पहाड़ को काटने निकले, गाँव के बाहुबल योद्धा युवक दल ने पहाड़ का मध्य-निचली तल भाग को गुफानुमा काट-काटकर दोपहर तक गिराने की बहुत कोशिश की पर पहाड़ का चट्टान ठोस पत्थरों के होने के कारण योजना मुताबिक यह पहाड़ नहीं गिरा पाए। फिर दुबारे इसी दल ने पहाड़ के उच्च सिरा भाग से इस चट्टान का कटान करना शुरु किया। चट्टान काटते- काटते, तोड़ते-तोड़ते पहाड़ की चोटी को लगभग आध तक काट दिया पर समय बीतता जा रहा था। समय बीतते- बीतते तड़के बोर सवेर हो जाने के कारण उन्होंने उस कार्य को वहीं रोक दिया, वे उस पहाड़ को पूर्ण तोड़ नहीं पाये। बुंघ स्येला पितृ पूर्वज जनों के द्वारा उस प्राचीन समय पर तोड़े गये पहाड़ के टुकड़े और हथियारों के निशान के साक्ष्य वर्तमान समय पर भी साफ-साफ दिखाई देते हैं। पहाड़ के मध्य निचला तल भाग के जिस जगह पर चट्टान कटान का कार्य किया गया था, उस जगह पर वह पहाड़ इतना बड़ा गुफानुमा कटान हुआ है, जिस पर अनेकों लगभग 100-150 लोग एकत्रित हो सकते हैं। बाद में गैलंघ स्येला जनों ने उस पहाड़ को योजना मुताबिक नहीं तोड़ पाने के कारण वर्तमान बौनाल राठ- ‘ बुंड.स्येला ’ के पितृ पूर्वज जनों ने प्रण के मुताबिक गैलंघ गाँव से पलायन करने का निर्णय किया।
बुंड.स्येला पितृ पूर्वजों का पलायन करते समय पास के ग्राम-वर्तमान स्येला वासियों के पितृ पूर्वजों ने काफी समझाया पर वे उनकी बात को नहीं माने। अपने प्रण के मुताबिक अपनी वर्तमान जन्म- कर्म भूमि को छोड़कर वे वहाँ से चलते चलते वर्तमान बौंन गाँव पर जाकर बस गए, आजकल उन्हें ग्राम-बौंन, का बौनाल बुंड.स्येला राठ जन कहते हैं। यह ग्राम बौंन, राठ बुंड.स्येला, सेला ह्या गुरु गैलंड. देव को अपना ईष्ट देव मानते हैं।

महादेव गुफा ‘प्राचीन महादेव ध्यान साधना गुफा’ ग्राम सीपू

नरेन्द्र न्यौला ‘पंचाचूली’
‘हिम गिरी-देव भूमि’ उत्तराखण्ड देव- देवियों, सन्यासियों, रिषि-मुनियों व लामाओं का ध्यान साधना ‘तप केन्द्र भूमि’ आदि काल से ही रहा है। इस हिम देव भूमि में ऐसा भी एक ग्राम है। जहाँ देवाधिदेव जी का ‘साक्षात पदचिन्ह व आध्यात्मिक ध्यान साधना गुफा’ विद्यमान है। यह उस समय की बात है। जब दिव्य शक्ति प्राप्त विशेष व्यक्ति सन्यासी और भगवान देवों में विशेष क्षण पर परस्पर साक्षात्कार होता था। देवाधिदेव महादेव जी हिमालय क्षेत्रों से बाहर के ‘शिवालयों प्रवास’ से वापसी के दौरान दारमा से होते हुए जब वे अपने मूल निवास स्थान ‘कैलास मानसरोवर’ वापस जा रहे थे। इसकी सूचना मिलते ही दारमा लुंग्मा के सभी स्थानीय ‘सैं समा-देवी देवताओं’ व क्षेत्र जनों ने सैं ह्याजंगरी जी के मार्गदर्शन में अतिथि तपस्वी बाबा जी का न्यौंला पंचाचूली हिम शिखर के निकट भव्य रूप से स्वागत किया।
तपस्वी भोले बाबा शिव ने स्थानीय देवी-देवताओं के प्रेम भाव और ग्राम जनों की आस्थामय पाठ-पूजन के साथ- साथ ग्राम सीपू क्षेत्र के आस-पास के प्राकृतिक, नैसर्गिकता, रंग बिरंगे पफूलों की फुलवारी भोज वृक्षों की सिलसिलेवार नर्सरी, जड़ीबूटी की सुगन्धता, कस्तूरी मृगों (देव मृगों) के विचरण और यहाँ की भौगोलिकता से प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने ग्राम सीपू में अपने पद को विराम दिया। इस क्षेत्र की ‘आध्यात्मिक ध्यान साधना ’ को महसूस करने के लिए यहीं रुके, ग्राम सीपू से कुछ दूर एकान्त क्षेत्रा में ध्यान साधना हेतु एक ही रात में ‘ध्यान साधना गुफा’ का निर्माण करवाया जिसे हम रं लुंग्बा जन ‘महादेव गुफा’ के नाम से सम्बोधित करते हैं। इस ‘ध्यान साधना गुफा’ में महादेव जी ने महत्वपूर्ण दारमा प्रवास के लगभग तीन माह बिताए। बाद में रं लुंग्बा के सभी देवी-देवताओं ने सदा दारमा लुंग्बा को ही अपना स्थायी तपस्थली बनाने का बहुत अनुरोध् किया लेकिन महादेव जी स्थायी तपस्थली वाली बात को न मानते हुए, यहाँ प्रवास में प्रत्येक साल आने की बात पर सहमति दी और महादेव जी ने दारमा से दूसरे दिन प्रस्थान की तैयारी की परन्तु स्थानीय तपस्वी सै। ह्याजंगरी जी अपने तंत्रामंत्रा शक्तिबल से जिस दिन महादेव जी कैलास पर्वत जा रहे थे उसी दिन लगातार तेज बर्फबारी व ओलावृष्टि करा दी। महादेव जी जैसे-जैसे आगे कैलास की ओर जा ही रहे थे, ग्राम ढाकर के सामने बर्फीला पहाड़ी मार्ग से पैर फिसल कर गिर गये, जिससे उनका एक पैर जख्मी हो गया। तदोपरान्त ‘सैं ह्याजंगरी जी’ ने महादेव जी की मदद करते हुए उनको ग्राम सीपू महादेव तपस्थली गुफा की ओर वापस लौटे। वापस लौटते समय ग्राम सीपू क्षेत्र मार्ग पर स्थित पौराणिक शिलाखण्ड पर भोले शिव जी के पद पड़े और उस शिलाखण्ड पर पद चिन्ह के निशान पड़ गये, जो आज भी उस शिलाखण्ड पर विद्यमान है।
महादेव जी के इस ‘पद चिन्ह युक्त पौराणिक शिलाखण्ड’ के पास ही मन्दिर स्थापित कर ग्राम जन सदियों से पूजा अर्चना करते आ रहे हैं व महादेव जी आशीर्वाद ग्राम जनों को ‘सुरक्षा सुख समृद्धि के रूप में प्राप्त होता रहता है। सैं ह्याजंगरी जब जब महादेव जी को ‘महादेव तपस्थली गुफा’ में छोड़कर लौट रहे थे। उस वक्त महादेव खौला के प्रवेश स्थल के पास में ही सैं ह्याजंगरी ने अपने हाथ में लिए सूखे भोज वृक्ष से बनी लट्ठी वाले ठण्डे पर मंत्रणा कर उसे रोप दिया और ग्राम जनों की उपस्थित में कहा कि अगर महादेव जी इस गुफा में प्रवेश के बाद भी हमेशा किसी भी रूप में यहाँ वास करेंगे-रहेंगे तो यह सूखी भोजवृक्ष लट्ठी ‘मेरा हमसफर भोज वृक्ष लट्ठी’ हरा-भरा होकर पेड़ का रूप ले लेगा अगर महादेव जी का अंश का वास यहाँ नहीं होगा तो यह रोपित भोजवृक्ष लट्ठी हरित नहीं होगा। लेकिन चमत्कार हुआ। कुछ दिनों बाद सैं ह्याजंगरी जी द्वारा वह रोपित भोजवृक्ष लट्ठी ने पौध्े स्थल में लोगों की आस्था केन्द्र के कारण पौराणिक पौध भोजवृक्ष विशाल हरा-भरा भोज वृक्ष के रूप में आज स्थित है। यह ध्यान देने वाली बात है कि उस विशाल पौराणिक भोज वृक्ष से लगभग डेढ़ किलो मीटर के परिक्षेत्र में कोई भी भोजवृक्ष का पेड़ नहीं है। इससे पूर्णतया प्रमाणित होता है कि यह भूमि भोले बाबा शिव की ‘ध्यान साधना तप भूमि’ रही है और उनका ग्राम सीपू व क्षेत्रा जनों के रक्षक रूप में हमेशा विराजमान रहता है।
ऐसा माना जाता है कि ग्राम सीपू का नाम हमारे ग्राम पूर्वज बुजुर्गों व देव दूत ‘धामी जी’ ने भगवान महादेव शिव जी की आध्यात्मिक ध्यान साधना की तपस्थली होने के कारण ‘शिव से सीपू’ रखा। पौराणिक कथाओं और गाथाओं के अनुसार उत्तर पूर्व भोंट प्रान्त के भोले बाबा शिव ने जिस महादेव ध्यान साधना गुफा में तपस्या की थी तभी से देवाधिदेव प्रत्येक साल साक्षात प्रवास पर ग्राम सीपू महादेव गुफा में आते हैं। बाद में ग्राम जनों ने महादेव ध्यान साधना गुफा में ही ग्राम रक्षक शिव पूजा स्थल का चयन किया और प्रत्येक साल में एक बार उस पूजा स्थल में जाकर देवाधिदेव महादेव जी पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। ग्राम सीपू, शिव स्थापित स्थल पर ग्राम जन छः वर्ष में एक बार महापूजन का आयोजन कर धूमधाम से महादेव महा महोत्सव मनाते हैं। इस महोत्सव में देश प्रदेश के सभी ग्राम परिवार जन उपस्थित रहते हैं। कुछ श्रद्धालु जन महादेव गुफा पूजा स्थल में जाकर महादेव जी की पूजा अर्चना करते हैं।
आज भी 500-600 साल पहले ग्राम बुजुर्ग जनों ने ग्राम रक्षक देवाधिदेव महादेव जी का ध्यान साधना भंग न हो व गुफा को संरक्षण प्रदान करने के वास्ते विशालकाय दरवाजे का निर्माण करवाकर गुफा के मुख्य द्वार पर लगवाया। इस प्राचीन महादेव ध्यान गुफा मुख्य द्वार में उस प्राचीन समय पर लगवाए गए दरवाजे के अवशेष वर्तमान समय में भी विद्यमान हैं। महादेव गुफा दुर्गम खतरनाक क्षेत्र में स्थित है। इस कारण आज से 120-130 साल पूर्व ग्राम जनों की एक राय बनाकर ‘शिव ध्यान गुफा’ से शिवलिंग लाकर गाँव के पश्चिमी छोर में मन्दिर की स्थापना कर पूजा अर्चना करने का निर्णय लिया। प्रत्येक साल ग्रामजन महादेव जी की पूजा अर्चना गाँव में स्थापित महादेव शिव स्थल में परम्परागत ढंग से करते हैं। महादेव जी की कृपा दृष्टि सदा सभी क्षेत्रा वासियों में बनी रहती है। इस महादेव गुफा के अन्दर अनेकों शिवलिंग विराजमान हैं।
ग्राम सीपू भ्रमण के दौरान श्रद्धालु जन बताते हैं कि ‘महादेव गुफा’ परिसीमन के आसपास में सच्चे स्वच्छ निर्मल मन से उँ मंत्र का जाप करें तो पर्यावरण से उँ की ध्वनि तरंगों की गूंज सुनाई देती है। हजारों साल पहले देवाधिदेव महादेव जी ने जिस स्थान पर बैठकर साक्षात आध्यात्मिक ध्यान तप किया। देवाधिदेव महादेव जी के इस पवित्र भूमि शिव स्थल पर पहँुचकर एक क्षण में ही आत्मा में ऐसी शुद्धता का महसूस होता है। मानो सांसारिक दुनिया से ‘आत्मा का परमात्मा’ के साथ परस्पर मिलन की अनुभूति होने लगती है। बहुत साल पूर्व गाँव वालों ने शिव अंश पंच धातु का त्रिशूल ‘शिव ध्यान साधना गुफा’ में स्थापित किया। समय-समय पर श्रद्धालु जन वहाँ पहँुचकर शिवमय हो जाते हैं। इन सभी पूर्व की घटना और वर्तमान में मन की आत्मीयता का अनुभव से सिद्ध होता है। सीपू महादेव जी की गुफा में महादेव शिव आदिकाल से ही विराजमान है और इस महादेव गुफा के अन्दर बहुत सारे शिवलिंग है।
कुछ लोग बताते हैं कि सीपू प्रथम साक्षात प्रवास के बाद देवाधिदेव महादेव जी महादेव ध्यान साधना गुफा के पिछले द्वार से आदि कैलास (छोटा कैलास), उँ पर्वत होते हुए कैलास मानसरोवर अपने स्थायी तपस्थली को चले गए।

उत्तराखण्ड की रामलीला का संगीत

डाॅ.पंकज उप्रेती
विश्व रंगमंच पर राम के चरित्र को लेकर अनगिनत नाट्य खेले जाते हैं। वर्षों के काल क्रम बीतने पर भी विद्वानों ने नायक के रूप में राम को स्वीकारा है। इन्हीं की देन है- राम काव्य परम्परा तथा इसके आदिकवि हैं- वाल्मीकि। वेद-पुराणों में रामकथा के बीज देखने को मिलते हैं।
कल्याण के श्रीराम भक्ति अंक में रामकाव्यों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भगवान श्रीराम जैसे स्थावन-जंगमात्मक जगत् में सर्वत्र व्याप्त हैं, वैसे ही रामचरित्र भी किसी न किसी रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध है। रामचिरत्र के विषय में आर्ष ग्रन्थ के रूप में श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, आध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण, अद्भुत रामायण, भुशण्डिरामायण, श्रीरामचरित मानस आदि कतिपय ग्रन्थ सर्वाधिक मान्य हैं। इसके साथ ही विभिन्न पुराणों में, विभिन्न सम्प्रदायों में तथा विभिन्न भाषाओं में रामकथा का निरूपण बड़े समारोह से हुआ है। राम काव्य को लोकनाट्य के रूप में ऐसी मान्यता मिली कि जन-जन मर्यादापुरुषोत्तम की लीला मंचन करने और देखने में विश्वास करता है। रामलीला के रूप में इसका जगह-जगह मंचन होता है।
लोकनाट्य के रूप में रामलीला और इसके संगीत पर चर्चा करने से पूर्व रामकथा के प्रारम्भिक रूप के विषय में जानना आवश्यक है। वैदिक साहित्य में अनेक व्यक्ति, जिनका चरित्र रामायण में वर्णित है, उनका निर्देश उपलब्ध होता है। इक्ष्वाकुवा निर्देश ऋगवेद संहिता में यह मिलता है- जिस जनपद के इक्ष्वाकु राजा है, उनके रक्षा स्वरूप कर्म में वह प्रदेश बढ़ता है। अर्थवेद में भी इक्ष्वाकु के नाम का उल्लेख मिलता है- औषधे! जिस प्रसिद्ध प्राचीन इक्ष्वाकु राजा ने तुम्हें सभी व्याधियों के नाश के रूप में जाना।3 ‘मन्त्ररामायण’ नामक नामक ग्रन्थ जो पं.नीलकण्ठ ने लगभग चार सौ वर्ष पूर्व लिखा है, में ऋगवेद के मन्त्रों से रामायण कथा निकाली है। सायण आदि भाष्यों में यह अर्थ उपलब्ध नहीं है। इसका कारण यह है कि भाष्यकारों ने मन्त्रों का भाष्य यज्ञ-परक किया है। वेदों के अनेक अर्थ होते हैं। अतः इतिहासपरक नीलकण्ठ का भाष्य भी उपयुक्त है। जब रामायण को वेद का अवतार माना जाता है, तब मन्त्रों का रामपरक भाष्य निर्मूल है। ऋगवेद की ऋचा में रामायण का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि भगवान राम-सीता के साथ तपोवन में आये। दूसरे चरण में बताया गया है कि राम और लक्ष्मण पीछे रावण छिपकर सीता के पास आया और उसने उनका हरण कर लिया। तीसरे तरण में यह बताया गया है कि हनुमान ने लंका में आग लगा दी और चैथे चरण में कहा गया है कि रावण युद्ध के लिये राम के सम्मुख आ गया। दशरथ का उल्लेख भी ऋगवेद में मिलता है- ‘लाल रंग और भूरे रंग के दशरथ के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का नेतृत्व करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कैकेय का उल्लेख इस रूप में है- ‘उन्होंने कहा कि ये अश्वपति कैकेय इस समय वैश्वानर को जातने हैं।’ जनक का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में बहुधा हुआ है। ब्रहम्पुराण में रामकथा के अंश सर्वत्र विखरे पड़े हैं। अठारह पुराणों के गणनाक्रम में ब्रह्मपुराण की गणना सबसे पहले होती है, इसलिये इसे आदि पुराण भी कहा जाता है। देवताओं व दानवों के युद्ध में कोई निर्णय न हो पाने की स्थिति में आकाशवाणी होती है कि जिस पक्ष की ओर से राजा दशरथ लड़ेंगे, उसी की विजय होगी। पद्मपुराण में रामकथा का उल्लेख कई बार हुआ है। इसके सृष्टि खण्ड में भगवान की वनयात्रा, तीर्थयात्रा तथा पुष्कर में श्राद्धादि का वर्णन है। उत्तरखण्ड में 242 अध्याय से 246 अध्याय तक रामकथा पूरी कह दी गयी है।9 महापुराणों की के गणनाक्रम में शिव पुराण चैथे स्थान पर परिगणित है। इसमें श्रीराम की कथा कई स्थानों पर आयी है। एक उदाहरण प्रस्तुत है- रावण द्वारा सीता के हरण के बाद राम-लक्ष्मण जब सीता की खोज में निकलते हैं, उस समय शिव अपने आराध्य श्रीराम को देखते हैं और कहते हैं, ये मनुष्य नहीं साधुओं की रक्षा तथा हमारे कल्याण के लिये स्वयं परब्रह्म के रूप में अवतरित हुए है, इनके छोटे भाई लक्ष्मण शेषावतार हैं।
यद्यपि वेद पुराण में रामकथा के कई कथासूत्र मिलते हंै तथापि महर्षि वाल्मिकी ने रामायण काव्य में राम के सम्पूर्ण जीवन पर पहली बार प्रकाश डालते हुए संसार को राम-कथा महाकाव्य के रूप में अमूल्य निधि दी। भारतीय रामकाव्य के विकास में रामायण के पश्चात कई अन्य रामकाव्यों का उल्लेख मिलता है, उनमें आध्यात्म रामायण प्रमुख है। इसके अतिरिक्त अनेक रामायणों का योगदान रामकाव्य में है। जैसे- लोमेश रामायण, मन्जुल रामायण, सौहार्द रामायण, श्रवण रामायण, दुरन्त रामायण, देव रामायण इत्यादि परन्तु ‘श्रीमद्भागवत’ में श्रीराम के चरित्र का संक्षेप वर्णन होते हुए भी लालित्यपूर्ण है। इसके नवम् स्कन्ध में कहा गया है कि जिन्होंने भगवान राम का दर्शन और स्पर्श किया, उनका अनुगमन किया, वे सब तथा कौशलादेश के निवासी भी उसी लोक में गये, जहाँ बड़े-बड़े योगी योग साधना द्वारा जाते हैं। रामकाव्य की इस धारा में तुलसीदास ने जो अद्भुत कार्य किया वह गेय रूप में अमर है। रामचरित पर तुलसीदास का मंतव्य है कि कवितारूपी मुक्तमणियों को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित रूपी सुन्दर तागे में पिरोकर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं, जिससे अत्यन्त अनुराग रूपी शोभा होती है, वे अत्यन्त आनन्द को प्राप्त करते हैं। काव्य के बाद मर्यादापुरुषोत्तम राम के चरित्र को लेकर नाट्य रूप में इसका प्रस्तुतिकरण भी होने लगा। इसी क्रम में उत्तराखण्ड की रामलीला है। जिसका मंचन गेय नाट्य के रूप में होता है। पहाड़ की रामलीला का सबसे महत्वपूर्ण अंग इसका संगीत ही है। इसीलिये सबसे अधिक ध्यान गेयता पर ही दिया जाता है। भारतीय शास्त्राीय संगीत का इसमें गहरा प्रभाव है। कई शास्त्रीय रागों की बहुलता इसके गीतों में दिखाई देती है। जैसे- विलावल, पीलू, देश, विहाग, जयजयवन्ती, भैरवी, झिंझोटी, मालकोंस आदि। मंचन के दौरान सम्वादों में प्रभावोत्पादकता लाने के लिये पात्र सस्वर मानस की चैपाईयों का पाठ भी करते हैं। तुलसीदास की चैपाईयों के साथ सम्वादों में प्राचीन कवित्त, सवैया आदि छन्दों, राधेश्याम की रामायण के उद्धरणों तथा नौटंकी शैली की लोकप्रिय धुन ‘बहरे तवील’ भी सुनने को मिलती है।
उत्तराखण्ड में गीतनाट्य रामलीला का शुभारम्भ अल्मोड़ा नगर से माना जाता है। इसका शुभारम्भ 18वीं सदी के अन्तिम भाग में कुमाऊँ की राजधानी अल्मोड़ा में हुआ। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के उदीयमान कलाकार स्व.प्रगति साह ने अपने शोध प्रबन्ध में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रवक्ता स्व.मोहन उप्रेती की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए बताया था- ‘‘सन् 1886 में अल्मोड़ा के श्री देवीदत्त जोशी ने पहले पहल रामलीला का प्रस्तुतीकरण गेयनाटक के रूप में किया। पहले अल्मोड़ा में केवल दशहरे के ही दिन राम जुलूस निकलता था और खुले मैदान में रावण का पुतला जलाते थे। सम्भव है कि श्री जोशी ने उत्तर भारत में रामलीला प्रदर्शनों की लोकप्रियता को देखकर स्वयं राम भक्त होने के नाते अपने निवास स्थान अल्मोड़ा में भी उसे आरम्भ करने का निश्चय किया हो और यह भी सम्भव है कि गेय शैली में प्रस्तुत करने की प्रेरणा उन्हें अपने संगीत प्रेम के कारण मिली होगी। अल्मोड़ा से प्रारम्भ हुई उनकी यह गेय रामलीला शीघ्र ही समूचे कुमाऊँ-गढ़वाल क्षेत्र में दशहरे के उत्सव का प्रमुख आकर्षण का केन्द्र बन गई।’’ कुमाऊँ की सर्वप्रथम रामलीला के बारे में मतभेद हैं किन्तु सन् 1860 में प्रथम बार अल्मोड़ा में रामलीला के पक्ष में अधिक लोगों का मत है। वर्तमान में सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में लोकनाट्य के रूप में जो रामलीला मंचन होता है उसका मूल स्वरूप इसके कर्णप्रिय गीत-संगीत को लेकर है। राम सेना और रावण सेना के पात्रों के मुंह से विभिन्न राग-तालों में जिस प्रकार गीत, चैपाई, छन्द, सम्वाद सुनाई देते हैं वह लोकनाट्य होते हुए भी शास्त्रीय पक्ष को अपने में समेटे हुए है। प्रस्तुत हैं उत्तराखण्ड में मंचित होने वाली रामलीला के कतिपय गीत-
यमनकल्याण
सीता रावण से- अरे रावण तू धमकी दिखाता किसे,
मुझे मरने का खौफो खतर ही नहीं।
मुझे मारेगा क्या अपनी खैर मना,
तुझे होने की अपनी खबर ही नहीं।।
तू जो सोने की लंका का मान करे,
मेरे आगे वह मिट्टी का घर ही नहीं।
मेरे दिल का सुमेरू डिगे वो कहाँ,
मेरे मन में किसी का डर ही नहीं।।
उक्त गीत को कई बार ‘बहरे तवील’ नौटंकी की धुन में भी सुना जाता है परन्तु अभ्यास के लिये दीपचन्दी ताल में इसे यमन में पिरोया है और गाया जाता है।
भैरवी
राग भैरवी में कई गीत रामलीला नाट्य मंचन में सुनने को मिलते हैं। उदाहरण के लिये राम-कौशल्या सम्वाद का यह गीत प्रस्तुत है, जो कहरवा ताल में है-
आज पिता ने वनों का राज हमे दीन्हा।
पिता वचन नहिं टालना, यही हमारा काम।।
बरस चैदह वन जाइके पुनः मिलेंगे आय।
करो तुम पत्थर का सीना, वनों का राज हमें दीना।।
राग भैरवी का एक और गीत भी प्रस्तुत है जो वन जाने से पूर्व राम माता कौशल्या को समझाते हुए कह रहे हैं-
क्यों तू रुदन मचावे जननी, आँसू थाम-थाम-थाम।
नहिं दोषु मातु का माता, लिख दिया था यही विधाता।
अब क्या हाथ मले से आता, है विधि बाम-बाम-बाम।
लिखते हैं वेद अरु गीता, सब झूठी जग की रीत।
सदा रहा है नहिं कोई जीता, है एक नाम-नाम-नाम।
सिन्धभैरवी ताल दादरा का एक गीत प्रस्तुत है जिसे मन्थरा द्वारा गाया जाता है। मन्थरा रानी कैकयी को राम के विरुद्ध भड़काते हुए कहती है-
क्यों तुम हो भूल बैठी सुनिये हो राजरानी।।
कल राम राज पावें, राजा ने मन में ठानी।
संकट भरत को होगा, नहिं पावे राजधानी।।
इसी प्रकार सिन्ध भैरवी में एक और उदाहरण प्रस्तुत है जब बालक राम-लक्ष्मण वाटिका में भ्रमण करते हैं तो लक्ष्मण सीता को देख राम से कहते हैं-
देखो जी देखो महाराज यह ललनी।
संग सखी मिल मंगल गावें,
सिर पर सोहे देखो ताज यह ललनी।।
ललित मधुर चितवन अति नीकी,
फिरत है कौन से काज यह ललनी।।
खमाज
रामलीला की चैपाईयों में खमाज राग का प्रभाव है। एक उदाहरण (राग खमाज ताल विलम्बित कहरवा) प्रस्तुत है जब जनक दरवार में गुरु विश्वामित्र अचानक आ जाते हैं। दशरथ पूछते हैं-
केहि कारण आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लाउब बारा।
कृपा करहु मोहिं देहु बताई। कीन्ह पवित्र मोर गृह आई।
राम तर्ज के अलावा राक्षसी तर्ज भी गीतों के उदाहरण हैं। वन में राम-लक्ष्मण को देख ताड़िका कहती है-
बिलावल, ताल- कहरुवा
रे नृप बालक काल ग्रसाये। क्यों तुम सन्मुख मेरे आये।
जिनके आये करन सहाई। ते डरपोक विप्र मुनि राई।।
बिलावल में एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत है जब सूर्पनखा राम-लक्ष्मण को वन में अकेला पाकर रिझाती है-
प्रभु जी हमें वर लेओ, हमें वर लेओ।
एक तो मैं नीकी नार, हमें वर लेओ।
एक तो मैं बाली मैं बाली, मैं भोली मैं भोली।
दूजे भाई दसशीश, हमें वर लेओ।
दूजे मस्त जवानी, हमें वर लेओ।
गारा
विभीषण रावण को सझाते हुए कहते हैं राम से युद्ध मत करो-
मेरी मानो कहँु भईया, वे तो हैं रघुवीर।।
मैं तुमसे कहँू समुझाई, चित्त करके सुनो मम भाई,
पर नारी न लावो चुराई, तुम तो हो रणधीर।।
उस कुमति बसी विपरीती, ताते तुम करहु अनीती,
हित अनहित मानत प्रीती, सुनिये हो अति धीर।।
मांड
धनुषयज्ञ के समय जब रावण अभिमान के साथ सम्वाद करता है तब बाणासुर कहता है-
वृथा अभिमान क्यों करता अरे रावण सभा के बीच।
नहीं शिव धनु पुराना है, बनाया बज्र विधाता ने,
लिये पहचान भगवत को पिता बलिदान दिया उनको।।
इसी प्रकार वनवास के समय सीता जी कहती हैं। मांड-
पड़ी है धूप गरमी से,
लगी है प्यास अति भारी।
कहीं छाया नहीं दीखे,
मैं चलती नाथ अब हारी।।
झिंझोटी-
राम-लक्ष्मण को वन में देख सूर्पणखा मुग्ध हो जाती है और लक्ष्मण से झिंझोटी के स्वरों में गाती हुए कहती है-
मैं तो छोड़ आयी लंका का राज,
लखन लाल तेरे लिये।।
भाई भी छोड़ा मैंने, बहिना भी छोड़ी,
छोड़ आयी सारा परिवार, लखन लाल तेरे लिये।।
बाग भी छोड़ा, बगीचा भी छोड़ा
छोड़ आयी सारा संसार, लखन लाल तेरे लिये।।
तिलककामोद-
लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद में यह गीत है-
लक्ष्मण परशुराम से- पिनाक पुराना, काहे रिस होत।।
ऐसे धनुष बहुत हम तोड़े, कबहँु न क्रोध नहिं कीन्हा।
या में ममता है केहि कारण, जो देखत भृगुनाथ रिसाना।।
बार-बार मोहे परशु दिखाकर, क्यों करते अभिमाना।
जो कायर तुम मिले मुनि जी, उन्हीं को तुम जा धमकाना।।
इस प्रकार कई राग-रागनियों, मिश्रित रागों, धुनों में रची-बसी उत्तराखण्ड का रामलीला नाटक अद्भुत है। ग्यारह दिनों तक रामलीला मंचन में जब गेयता चढ़ती जाती है तो श्रोता मुग्ध हो जाता है।

जैं श्री ह्या छूड.ग सैं ‘इष्ट देव’ ग्राम तिदंग

इतिहास कथा

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
तिदांग में सर्वप्रथम ‘जैं रंचिम सैं’ का युग था। फिर सुम कच्यरों पैं (तीन कच्यरों भाई) का युग आया। उसके बाद तिदांग में ‘ह्या छूड.ग सैं’ का युग आया। ह्या छूड.ग से जब अपने मूल निवास स्थान- किदांग, तिब्बत से पश्चिम-दक्षिण हिमालयी क्षेत्र में भ्रमण करने निकले, तिदांग की अलौकिक सुन्दरता यहाँ से चारों ओर दिखाई देने वाला प्राकृतिक नैसर्गिकता और ग्राम जनों का परस्पर स्नेह को देखकर तिदांग को ही अपना निवास स्थान बनाने का निश्चय किया। तब ग्राम- तिदांग, नदी के पास का उच्च मैदानी भू-भाग ‘आधा नमीयुक्त हरियाली और आधा बंजरनुमा भूभाग’ हुआ करता था। समय बीतने के साथ-साथ हरियाली नुमा बंजर (सूखते जा रहे) होते जा रहे खेतीनुमा भू-भाग के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने जाना कि इस भू-भाग के नीचे बड़ा सा पत्थर है। इस पत्थर के नीचे एक साँप (खोबू) रहता है, जिसके तासीर (ताप) से तिदांग गाँव का मैदानी खेती युक्त भू-भाग बंजर होते जा रहा था, इस साँप को मारने के लिये ह्या छूड.ग सैं ने ‘चूहा और गरुड़ पक्षी’ का रूप धारण कर साँप को बाहर निकालकर उसे मार डाला और मरे हुए साँप को अपनी चोंच में पकड़कर आस-पास के ग्रामों में घुमा-घुमाकर हवाई रास्ते से किदांग (तकलाकोट )क्षेत्र ले जाकर दफना दिया। इस दौरान जब ह्या छूड.ग सैं वापस दितांग गाँव में पहुंचते हैं तो तिदांग की 30 प्रतिशत बजंर (सूखते) मैदानी भू-भाग, हरा-भरा खेतीनुमा मैदानी भू-भाग में बदल गया। जिस हरा-भरा खेती नुमा मैदानी भू-भाग में साँप की तासीर का प्रभाव अत्यधिक पड़ा उस भू-भाग में आज से 300-400 साल पहले तक उसका प्रभाव साफ दिखाई देता था। ऐसा बड़े-बुजुर्ग जनों का कहना है।
इस भौगोलिक परिवर्तन को देखकर सभी ग्रामजन खुश हुए और ह्या छूघग सैं की दिव्य शक्ति को देखकर ग्रामजनों ने उनका धन्यवाद किया। और उन्हें यहीं रहने का आग्रह करते हुए उनको प्रतिष्ठित कर पूजा-अर्चना का विशेष आयोजन किया। ग्रामजनों की श्रद्धापूर्वक भक्ति को देखकर ह्या छूड.ग सैं ने ग्राम तिदांग को ही अपना स्थाई निवास बनाने का निर्णय किया।
तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ के युग के दौरान बौन-ग्राम में एक शक्तिशाली तंत्र-मंत्र ज्ञाता (विद्वान) ‘हबा लाटौ’ रहता था। दारमा के ग्राम्य जनों के द्वारा देवी-देवताओं को पूजा-पाठ के माध्यम से चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा, बौन के तंत्र-मंत्र ज्ञाता हबा लाटौ इस चढ़ावा को देवी-देवताओं से पहले स्वतः ग्रहण कर लेते थे, जिससे देवी-देवताओं को यह चढ़ावा उन तक नहीं पहुंच पाता था। इस समस्या को हल करने के लिए भोले शिव के अवतारक दाँतू (दंग्तो) ‘‘ह्या गबला देव’’ ने अपने तपोस्थली ग्राम दाँतू के दं थं प्रांगण में दारमा के सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया। सभी देवी-देवतागण निमंत्रण मिलते ही सोंग (ग्राम) दं थं प्रांगण में उपस्थित हो गए। तिदांग ह्या छूड.ग सैं भी साधारण व्यक्ति के समान तिब्बती पहनावा व टेढ़ी टोपी पहनकर टट्टू (गधा) में सवार होकर सभा प्रांगण में पहुंचे।
किसी देवी-देवताओं ने भी ह्या छूड.ग सैं की उपस्थिति पर ध्यान नहीं दिया। ह्या छूड.ग सैं सभा प्रांगण से कुछ दूरी पर बैठकर सुस्ताने लगे। अपने टोपू (हुक्का) में तम्बाकू भरकर गधा (बाँगजु) के त्यागा (काठी) से च्यामा (आग प्रज्जवलित करने का पदार्थ) रगड़ कर आग पैदा की और तम्बाकू सुलगा कर हुक्का पीने लगे, तत्काल अपनी प्यास बुझाने के लिए अपनी मुट्ठी तेजी से जमीन की ओर फैंका, उस स्थान से फव्वारे की तरह पानी निकल आया। जिससे ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने वह पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। सभा में उपस्थित सभी देवी-देवतागण इस अद्भुत दिव्य-शक्ति को देखकर अचम्भित हो गए। सभी देवी-देवता ह्या छूड.ग सैं की असाधारण दिव्य-शक्ति देकर सभा में स्थान ग्रहण करने को कहा, लेकिन ह्या छूड.ग सैं ने कहा- ‘मैं अपनी जगह पर ही ठीक हूं। आप अपनी सभा प्रारम्भ कीजिए।’ सभा में ‘हबा लाटो’ के विषय पर प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, इस समस्या का निवारण करने के लिए जैं श्री ह्या गबला देव ने सभा में उपस्थित प्रत्येक देवी-देवता गणों से पूछा/प्रश्न किया। ह्या छूड.ग सैं के अलावा सभी देवी-देवताओं ने इस विषय में असमर्थता व्यक्त की। आंखिर में ह्या छूड.ग सैं से प्रश्न किया। उन्होंने सिर हिलाते हुए हामी भर दी। साथ ही ‘होला दम्फू सैं’ ने भी हाथ खड़ा कर हामी भरा। तब ह्या गबला देव, होला दम्फू सैं से पूछता है कि तुमने हाँ किस लिये किया। तब दम्फू सैं ने उत्तर दिया कि ‘ह्या छूड.ग सैं मेरे मामा हैं। इस समस्या को हल करने में जो कार्य वे मुझे सौंपेंगे, मैं वह कार्य करूंगा।’ इस प्रकार सभा पूर्ण हुई। सभी देवी-देवता गण अपने-अपने निवास स्थान को चले गए। ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू में सवार होकर तिदांग के लिए रवाना हो गए। ह्या छूड.ग सैं की अद्भुत दिव्य शक्ति और हबा लाटौ विषय पर कार्य सपफलता की परीक्षा लेने के लिए ह्या गबला देव ने उनके पीछे से तीव्र आंधी-तूफान प्रहार किया। जैं श्री ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू को तेजी से दौड़ाते हुए इतनी तेजी से ढाकर ‘गिलीघ’ नामक मैदान मेें पहुंचे , कि आंधी-तूफान भी उन्हें छू नहीं सके और वह तूफान उनकी टेड़ी टोपी को भी हिला न सका। तभी इस घटनाक्रम से ह्या गबला देव को पूर्ण विश्वास हो गया कि ह्या छूड.ग सैं के पास ही ऐसी शक्ति है जो हबा लाटौ जी के द्वारा देवी-देवताओं का प्रसाद जबरदस्ती ग्रहण करने की समस्या से निजात दिलाएगा। उस जमाने में तिब्बती लोग अपने भेड़-बकरियों, याक में नमक, सुहागा, छयूरा और अन्य सामग्री लादकर दारमा-पश्चिम तिब्बत सीमान्त परिक्षेत्र में व्यापार के लिए आया-जाया करते थे और दोनों क्षेत्र के व्यापारी परस्पर मित्रता रखा करते थे, ग्राम-बौन के हबा लाटौ का भी तिब्बती व्यापारियों से घनिष्ट मित्रता थी। तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने अपने अपनी दिव्य मंत्र-शक्ति का प्रयाग कर तिब्बती चन (भूत) का आह्वान किया और उसे हिदायत देते हुए कहा कि तुम अपने कुछ साथियों को लेकर सैकड़ों भेड़-बकरियों के साथ गो से आगे गोतो-रामा के मैदान में सही समय और मौसम को देखकर प्रकट हो जाना। एक दिन ह्या छूड.ग सैं को तिब्बती चन (भूत) ने रामा गोतो दं (उंचा स्थान) के मैदान में प्रकट होने का सन्देश भिजवाया और तभी ह्या छूड.ग सैं ने ‘लिंकम दं थं’ व ‘गोतो दं’ के बीच का चट्टानी रास्ता पूर्णतया बर्फ से ढकवा दिया और अपने भान्जे ‘होला दंफू सैं’ को ‘बौर बा लाटौ’ के पास व्यापारिक सूचना सूचित करने के लिए भेजा और हबा लाटौ जी से कहना तुम्हारे तिब्बती व्यापारिक मित्रगण अपने सैकड़ों भेड़-बकरियों और विनिमय सामान के साथ ‘रामा-गोतो दं’ (उंचा स्थान) के थं(मैदान) में डेरा लगाकर बैठे हैं, और तुम्हें जल्दी से जल्दी मिलने के लिए कहा है। इस पर हबा लाटौ जल्दी-जल्दी अपने मित्रों से मिलने के लिए अपने निवास स्थान से व्यापारिक परिक्षेत्र की ओर रवाना हो गया और जब ‘गोतो-लिंकम दं’ (उंचा स्थल) का पहाड़ी रास्ता बर्फ से ढका हुआ दिखाई दिया, तब ‘बौन हबा लाटौ’ बर्फ में डूबने व फिसलने से बचने के लिए तन्त्र विद्या का प्रयोग करते हुए, अपने जेब से ‘सरसों का दाना’ निकालकर अपने से आगे फैंकते गया, सरसों का दाना फेंकते ही सरसों के दाने का पत्थर बन गया। उन्हीं पत्थरों में छलांग लगाते हुए, आगे बढ़ते गए। जैसे ही बर्फीला आधा रास्ता तय कर लिया, तब उनका सरसों का दाना खत्म हो गया, अब ‘हबा लाटौ’ का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। साथ ही पीठ पीछे के सरसों से बना पत्थर भी अदृश्य हो गया, उसी समय तिदांग ह्या छूड.ग सैं ने उपर पहाड़ से बर्फ का बर्फीला तूफान करवाया और हबा लाटौ का अन्त हो गया। ऐसा कहा जाता है कि जिस स्थान पर हबा लाटौ दब गया था, वहाँ पर बहुत बड़ा टीला बन गया, जो अभी भी मौजूद है।
तंत्र-मंत्र ज्ञाता ‘हबा लाटौ’ को मारने के बाद इलाके के सभी देवी-देवतागणों को मनुष्यों के द्वारा चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा पूजा-पाठ खाद्य सामग्री सर्वप्रथम मिलना शुरु हो गया।
‘जैं हो किदांग जु (के)-
तदांग ह्या छूड.ग सैं’

त्रिलोक सिंह नंगन्याल (तिंका नंगन्याल प्रथम) के वंशजों का दारमा प्रतिनिधित्व काल

इतिहास-कथा
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
दारमा घाटी के जिस ग्राम की खूबसूरत चोटियों के कारण दिन में सात बार सूर्य दिखता व सात बार सूर्य छिपता है, उस ग्राम नागलिंग में त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी का जन्म 1750 के आसपास हुआ। त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी की सोच- आकांक्षाएं, आधुनिक भविष्य की जीवन जीने की सोच रखने वाले व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। ऐसा माना जाता है कि त्रिलोक सिंह जी के पूर्वज कत्यूर राज्य से दारमा आए थे। त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी को तिंका प्रथम के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। त्रिलोक सिंह जी के चार पुत्र हुए, जिनके नाम- बालों, चतुवा, बंगा और जसपाल थे। श्री तिंका नंगन्याल प्रथम जी की प्रभावशाली छवि, ज्ञानी व्यक्तित्व के कारण उन्होंने अपने चारों पुत्रों को अलग-अलग कार्य क्षेत्रा सौंपे, सबसे बड़े पुत्र बालों सिंह को राजनीतिक रणनीतिकार, दूसरे पुत्र चतुवा सिंह को समाज सुधारक, तीसरे पुत्र बंगा सिंह को व्यापारिक कार्य एवं सबसे छोटे पुत्र जसपाल सिंह को खेती कार्य क्षेत्र सौंपा।
इस प्रकार चारों पुत्रों की कार्य क्षेत्र की यश कीर्ति पूरे रं लुंग्बा में प्रचलित थी। श्री त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी का अस्कोट राज परिवार और तिब्बती राजाओं के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध् थे। ऐतिहासिक समय रं लुंग्बा, दारमा परगना (परगना दारमा) में श्री कित्ती सिंह ग्वाल ‘फौजदार’ ‘‘रं प्रतिनिधित्वकर्ता’’ ग्वाल एकाधिकार के बाद श्री त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी के सबसे बड़े पुत्र बालों सिंह जी दारमा लुंग्बा रं प्रतिनिधित्व कर्ता के रूप में उबरे और उन्होंने यह जिम्मेदारी निभाई। ग्वाल फौजदार परिवार का एकाधिकार के बाद अब दारमा का सभी प्रकार के न्याय कार्य ग्राम-गो की जगह ग्राम-नांगलिंग से होने लगा। नंगन्याल परिवार ने अपना प्रशासनिक अधिकार एवं व्यावसायिक कार्य ग्राम-नांगलिंग से ही शुरु किया। कुमाउँ ब्रिटिश शासन में अंग्रेजों का आगमन जब दारमा घाटी में हुआ। श्री बालों सिंह का प्रभावशाली व्यक्तित्व, जन लोकप्रियता, न्यायप्रियता व शानों- शौकत और साथ ही भवन की भव्यता को देखकर अंग्रेज आश्चर्यचकित हो गये। श्री बालों सिंह नंगन्याल जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने बालों जी को अपने पक्ष में करने के लिये उन्हें तीन प्रकार के अंग्रेजी हथियार और तीन खून माफ का अधिकार प्रदान कर कूटनीति चाल चली, श्री बालों सिंह नंगन्याल जी ने उस काल में अपने भव्य भवन निर्माण कार्य करवाने के लिये बागेश्वर, अल्मोड़ा, हल्द्वानी, पड़ोसी देश नेपाल के राजमिस्त्रियों को आमन्त्रित किया। इस भवन निर्माण में बड़े-बड़े पत्थरों, खड़िया पत्थरों के जोड़ को मजबूती प्रदान करने के लिये चूना व उड़द ;मासद्ध दाल के घोल बनवाकर चिनाई करवायी गयी। भवन राजमिस्त्राी कारीगरों के नाम दीपार के पत्थरों पर आज भी अंकित हैं। मकान में प्रयोग की गयी बड़े-बड़े पत्थरों की कटाई-छटाई में उस समय चाँदी-सिक्का (सवा रुपये) की लागत आई। जब-जब ब्रिटिश आला अधिकारी दारमा घाटी में आते थे, उक्त भव्य भवन में रहना व इसकी प्रशंसा करना नहीं भूलते थे।
श्री बालों नंगन्याल जी के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री तिंका नंगन्याल (तिंका द्वितीय जी ;1860-1940) ने अपना राजपाठ के साथ दारमा प्रतिनिधि/प्रतिनिधिकर्ता कार्यभार संभाला। श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी के सामय जब सम्पूर्ण भारतवर्ष में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार हो रहा था, तब दारमा घाटी में उन्होंने ईसाई धर्म प्रचार-प्रसार के लिये अंग्रेजों का प्रवेश निषेध् कर दिया था, जब ब्रिटिश रेजीमेन्ट को इस बात की सूचना मिली तो वे श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी से अत्यधिक नाराज हो गये। पर दारमा घाटी एक अत्यन्त दुर्गम व उनकी प्रभावशाली छवि के कारण कुमाउँ ब्रिटिश अंग्रेज प्रशासक श्री तिंका नंगन्याल जी पर कोई कार्यवाही नहीं कर सके। बाद में कुछ समय उपरान्त अंग्रेज अधिकारियों ने श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी को याद दिलाया कि उनके पिता बालों नंगन्याल को अंग्रेज प्रशासन ने तीन प्रकार हथियार करतूस और तीन खून माफ का अधिकार दिया था। उनके समय के घनिष्ठ सम्बन्धें की भी याद दिलाई। साथ ही तिंका नंगन्याल जी को अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें तीन की जगह सात खून माफ करने का शासनादेश और सम्पूर्ण रं लुंग्बा का ब्रिटिश मेम्बर नियुक्त किया गया और अल्मोड़ा जिला परिषद का मनोनीत सदस्य चुना एवं कुछ अन्य रं लुंग्बा के सुरक्षा से सम्बन्धित प्रभावी अधिकार भी दिये गये, तब जाकर अंग्रेजों का दारमा घाटी में पुनः प्रवेश और ईसाई ध्र्म का प्रचार-प्रसार हेतु अनुमति तो दी पर उनके प्रचार में कोई सहायता नहीं की। अंग्रेजों को इस प्रचार-प्रसार पर कोई फायदा नहीं मिला, न ही रं लुंग्बा दारमा घाटी के किसी भी परिवार ने ईसाई धर्म स्वीकार किया, इससे स्पष्ट होता है कि उस समय दारमा घाटी के प्रत्येक परिवार, प्रत्येक ग्राम व पूरे रं जनों में कितनी एकता-सक्षमता थी, पर दारमा घाटी में ईसाई प्रचारकों का आवागमन होते रहा, बाद में श्री नंगन्याल जी के स्वभाव, बुद्धिमत्ता व क्षेत्र में उनके प्रभाव के कारण ब्रिटिश शासकों से अच्छे सम्बन्ध् हो गये। श्री तिंका द्वितीय ‘मेम्बर साहब’ ने रं लुंग्बा दारमा प्रतिनिधित्वकर्ता का कार्य बखूबी निभाते हुए बहुत से कार्य करवाये और दारमा लुंग्बा का प्रथम ठेकेदारी मार्ग कार्य उन्होंने 1500/- रुपये का ठेका लेकर सन् 1923 में कार्य करवाया, यह ठेका कार्य मार्ग ग्राम- खेला से दारमा तक का था। उस समय ग्राम- खेला, दारमा, व्यास दोनों घाटी कुन्चाजनों का मुख्य पड़ाव केन्द्र के साथ-साथ तीनों रं घाटी जनों का प्राचीन व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था, जहाँ से पश्चिम तिब्बत, नेपाल और निचले भारतीय क्षेत्रों में जाने के लिए व्यापारिक विनिमय गतिविधियों से सम्बन्धित कार्य योजना संचालित होता था। श्री तिंका सिंह नंगन्याल (तिंका द्वितीय) ने ब्रिटिश प्रशासन द्वारा दिए गए अधिकारों का खूब प्रयोग किया, माना जाता है। श्री तिंका द्वितीय जी ने रं-शौका जनों के प्राचीन व्यापारिक पड़ावों का अधिकार बरकरार रहे इस सम्बन्ध् में पड़ाव क्षेत्रीय शासन-प्रशासन तक अपनी बात रखते हुए उन पड़ावों को बचाने की कोशिश की। उन्होंने तिब्बती प्रान्तीय राजाओं, नेपाल सीमान्त प्रशासक और अस्कोट राज्य ‘राज परिवार’ से घनिष्ठता बढ़ाने के साथ-साथ पूर्व से ही चली आ रही मित्रता को और अधिक घनिष्ठता में परिवर्तित किया। श्री तिंका नंगन्याल (तिंका द्वितीय) बुद्धिमान, प्रभावशाली छवि और चतुर व्यक्तित्व के धनी थे। इन कारणों के कारण वे तीन महीने तिब्बती प्रान्तीय राजाओं, राज प्रशासकों के साथ तिब्बती प्रान्तों और महीने उक्कू- बांकू, जौलजीवी, नेपाल में अस्कोट राजाओं के साथ आनन्दमयी जीवन व्यतीत करते थे। इस समय एक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक घटना घटित हुई। पिथौरागढ़ व्यापारी ‘मालदार परिवार’ के सदस्य जब तिब्बत व्यापार के लिए गए थे। अनजाने में तिब्बती कानून का उल्लंघन होने के कारण तिब्बती प्रशासन ने उन्हें कारावास की सजा दे दी, तब मालदार व्यापारी परिवार के सदस्य सीमान्त अस्कोट राज्य के राजा के पास इस सम्बन्ध् में मदद हेतु गए तो ‘राजा रजवार’ राज प्रशासन ने इस पर असमर्थता जताते हुए उन्हें श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी से मदद मांगने का सुझाव दिया और वे नंगन्याल जी पास गये। अपनी समस्या से अवगत कराया। इस समस्या समाधन हेतु नंगन्याल जी ने तिब्बती राजा को अनुरोध् पत्र लिखा। इसी पत्र द्वारा मालदार व्यापारी को तिब्बती कारावास से मुक्त किया गया।
श्री तिंका सिंह नंगन्याल (तिंका द्वितीय) ने अपने पिता से अधिक नाम कमाया और इसी कारण सम्पूर्ण रं क्षेत्र में वे ‘मेम्बर साहब’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। ऐसा माना जाता है कि समय के साथ-साथ श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी आकांक्षाओं महत्वाकांक्षा के कारण उनका अस्कोट राज्य के राजघराने से सम्बन्ध् बिगड़ते गए, स्यांकुरी से उपर दारमा घाटी, व्यास घाटी और चैदास घाटी पर अपना प्रतिनिधित्व अधिकार परिक्षेत्र मानते हुए, इन क्षेत्रों रे ‘रं लुंग्बा व्यवस्था-प्रबन्धन’ से सम्बन्धित कार्य हेतु वसूली करते थे और इन सम्पूर्ण क्षेत्र को परगना दारमा नाम दिया गया। बाद में अस्कोट राज्य राज परिवार से कर वसूली से सम्बन्धित विवाद हो गया। जब तिंका द्वितीय नंगन्याल जी अपने सेवकों के साथ वर्मा (म्यांमार) गये थे, और वापसी में अस्कोट पहँुचे तो वहाँ राज परिवार प्रशासन से अपने-अपने अधिपत्य सीमान्त क्षेत्रा की कर वसूली पर मतभेद होता चला गया, श्री तिंका नंगन्याल (तिंका द्वितीय) जी रं लुंग्बा के राज परिवार (राजा) न होते हुए अपने वंशजों में सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले रं प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि) रहे। बाद में तिंका नंगन्याल द्वितीय जी भाबर भारत, नेपाल देश व्यापारसे वापसी के समय टनकपुर के आस-पास अपने पड़ाव में उनकी मृत्यु हो गई। श्री तिंका द्वितीय के बाद उनके बड़े पुत्र श्री बाल बहादुर जी ‘प्रथम दारमा सरपंच’ ;बालो द्वितीय जी 1916-1969द्ध ने कार्यभार सम्भालते हुए दारमा क्षेत्रजनों के लिए बहुत कार्य किए। श्री बालो द्वितीय जी ने शासन-प्रशासन से अनुरोध् कर क्षेत्रीयजनों को शिक्षा-पत्राचार प्रदान करवाने के लिए ग्राम दुग्तू स्कूल (दारमा प्रथम स्कूल), दारमा लुंग्बा प्रथम पोस्ट आफिस ग्राम नांगलिंग में खुलवाने का महत्वपूर्ण कार्य किये और वे जौलजीवी तीर्थ मेले में भी सामाजिक भूमिका अदा करते रहते थे। एक बाद उन्होंने दो चवर गाय ‘याक’ और कुछ कम्बलों को मेला कमेटी को सहयोग रूप में भेंट दिया।
श्री तिंका नंगन्याल द्वितीय जी अस्कोट राजा भांति राजा तो नहीं था परन्तु सम्पन्नता धन-दौलत एवं शानों-शौकत अस्कोट राजा से कम नहीं थे।
रं लुंग्बा दारमा घाटी ग्राम नांगलिंग की सम्पूर्ण सम्पत्ति का आध भाग इसी वंश के उत्तराधिकारियों के अधिकार में है। साथ ही ग्राम- चल, सेला, वर्थिंग, बोगलिंग, दर, सोबला, न्यू सोबला सुवा, बैती, गलाती, गस्थला, दोबाट, धारचूला, पिथौरागढ़, हल्द्वानी, देहरादून, लखनउ, दिल्ली, म्यांमार तक में भी इनकी सम्पत्ति रही है, ऐसा कहा जाता है। जब इस वंश के व्यापारी तिब्बत व्यापार, टनकपुर व्यापार, नेपाल व्यापार हेतु निकलते थे तो इनके कापिफले के दिन-समय कोई दूसरा व्यापारी इस मार्ग से नहीं गुजरता था। इसकी सूचना पूर्व में ही लोगोें को दे दी जाती थी।
मुख्य ध्रोहरित सामग्रियाँ-
ब्रिटिश कालीन दो नाली कारतूस वाली बन्दूक, अन्य भरवा बन्दूक और इटालियन राइपफल ;जिसे बाद में बेच दिया गयाद्ध, चाँदी का बना इटालियन टार्च, चाँदी की छड़ी।
ब्रिटिश कालीन राजशाही चाँदी के बर्तन और सिक्के हैं तथा कत्यूरी शैली की बनी खिड़कियाँ व दरवाजों पर बनी नक्काशी दर्शनीय है।
बड़े-बड़े चार पफुर्मा तोली (फुर्मा तावी और चार फुर्मा कढ़ाई जो 40-40 किलोग्राम के हैं)। ये ‘तोली-कढ़ाई’ लगभग 300 वर्ष पूर्व की मानी जाती हैं। ये तोली-कढ़ाई तिब्बत से लायी गयी थी।
दर्जनों ऐतिहासिक ‘ढाल तलवार’ और पुरुष-स्त्री परिधान। साथ ही महिलाओं के अनेक श्रृंगार आभूषण मौजूद हैं।
नंगन्याल भवन के भीतरी भाग में एक विशाल आकार का शिवलिंग स्थित है। साथ ही हस्तिनापुर की महारानी ‘कुन्ती गान्धरी’ के शिलालेख भी मौजूद हैं।
श्री नंगन्याल राज में जिस प्रकार से इस बंशजों की शानो-शौकत, रहन सहन, सम्पूर्ण क्षेत्र में फैली शक्तियाँ और अधिकारों को सुनकर तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे राज परिवार का न होते हुए भी एक राजा की ही भाँति रं लुंग्बा में एकाधिकार रखते थे।

मुंशी रायबहादुर हरिप्रसाद टम्टा

हरिप्रसाद टम्टा – 26.08.1887 से 23.02.1962)

डॉ दुर्गा प्रसाद
26 अगस्त 1887 को अल्मोड़ा के ताम्र शिल्पियों के परिवार में हरिप्रसाद टम्टा का जन्म हुआ. गोविन्द प्रसाद टम्टा और गोविंदी देवी का यह पुत्र बचपन से ही मेधावी और प्रखर बुद्धि का था. बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने की वजह से हरिप्रसाद टम्टा को अपने छोटे भाई व बहन के साथ मामा कृष्ण टम्टा के संरक्षण में आना पड़ा.

उस समय अछूतों के लिए शिक्षा हासिल करना बहुत ज्यादा कठिन हुआ करता था. इसके बावजूद हरिप्रसाद ने मिडिल तक की शिक्षा हासिल करने के बाद उर्दू-फारसी में भी महारथ हासिल कर मुंशी की उपाधि प्राप्त की.

अपने मामा की प्रेरणा से वे 1903 से कुमाऊँ की अछूत जातियों के उद्धार में लग गए और 26 फरवरी 1960 में जब 73 साल की उम्र में उनका देहांत हुआ तब तक इस मिशन में डटे रहे. कुमाऊँ के अछूतों में सामाजिक चेतना जाग्रत करने के मकसद से उन्होंने 1905 में टम्टा सुधारक सभा की स्थापना की, जो आगे चलकर 1914 से ‘कुमाऊँ शिल्पकार सभा’ के नाम से जानी गयी. सभा ने शिल्पकार उत्थान के लिए कई आन्दोलन किये. इसी के बैनर तले अवांछित व अपमानजनक शब्दों से कुमाऊँ के अछूतों को संबोधित किये जाने के खिलाफ भी एक व्यापक आन्दोलन की शुरुआत 1920 से की गयी. ‘कुमाऊँ शिल्पकार सभा’ के 6 सालों के आन्दोलन के बाद शासन-प्रशासन ने उत्तराखण्ड के अछूतों को ‘शिल्पकार’ नाम से संबोधित किया जाना स्वीकार किया.

हरिप्रसाद टम्टा ने उत्तराखण्ड के अछूतों के बीच शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किये. उन्होंने अल्मोड़ा में कई रात्रिकालीन स्कूल खुलवाने के अलावा गरीब छात्रों को वजीफा भी दिया. शिक्षा के लिए उनके कामों को लीडर व अन्य राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने भी प्रकाशित किया.

हरिप्रसाद टम्टा ने शिल्पकारों के बीच फैली सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए भी व्यापक जनजागरण किया. उनके प्रयासों से ही शिल्पकारों के बीच मद्यपान, फुलवारी, आतिशबाजी, बरातों में फिजूलखर्ची जैसी कई गलत परम्पराएं बंद हुईं.

1 जून 1934 को ‘समता’ के प्रकाशन की शुरुआत के साथ ही वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अछूतों का प्रतिनिधित्व करने में जुट गए. 26 सालों तक समता का संचालन करने के साथ-साथ वे लीडर, हिंदी हरिजन, भारती, कमल, अधिकार जैसे कई राष्ट्रीय अख़बारों में भी शिल्पकारों की समस्याओं को उठाते रहे.

उत्तर प्रदेश के कुमाऊँ में सार्वजनिक परिवहन की शुरुआत करने वाले प्रमुख उद्यमियों में भी हरिप्रसाद टम्टा का नाम उल्लेखनीय है. उन्होंने 1920 में ‘हिल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी’ की स्थापना की. इसके साथ ही वहां चालकों के लिए कुमाऊँ का पहला प्रशिक्षण केंद्र भी हल्द्वानी में शुरू किया. कुमाऊँ में मोटर वाहन का चक्का घुमाने वाले शुरुआती व्यक्तियों में हरिप्रसाद टम्टा एक थे.

जिस घटना ने हरि प्रसाद टम्टा को शिल्पकार अस्मिता का योद्धा बनाया

यही नहीं हरिप्रसाद टम्टा ने 1907 और 1935 के युद्ध के बाद अकालग्रस्त भारत में पूरे कुमाऊँ में सस्ते राशन की दुकानें खुलवायीं. युद्ध के बाद जब इन्फ्लुएंजा का प्रकोप बढ़ा तो हरिप्रसाद टम्टा ने हजारों स्वयंसेवकों की सेना तैयार कर गांव-गांव दवाएं बंटवाई. इस तरह के कई अन्य सामाजिक कामों में भागीदारी करते हुए उन्होंने कभी भी धन व्यय की चिंता नहीं की.

सार्वजनिक जीवन में हरिप्रसाद टम्टा की लोकप्रियता ने उन्हें 3 बार म्युनिसिपलिटी के मेंबर-अध्यक्ष और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड अल्मोड़ा का वाइस चेयरमैन बनाया.

लेखक:
डॉ दुर्गा प्रसाद
सामाजिक चिन्तक एवं शिक्षाविद
जिलाउपाध्यक्ष भाजपा अनु.मो.पिथौरागढ़ उत्तराखंड

कित्ती फौजदार: प्रथम रं लुंग्बा प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि)

इतिहास-कथा

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
दारमा घाटी में आज से लगग 18वीं शताब्दी के मध्य से 19वीं शताब्दी के मध्य तक ग्राम-गो में एक प्रखर बुद्धिमान, आर्थिक सम्पन्न तथा दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति रहते थे, जिनका नाम कित्ती सिंह ग्वाल (कित्ती फौजदार) था, वे उस काल के सबसे प्रतिभावान, प्रभावशाली व्यक्ति थे और लीक से हटकर सोच रखते थे। शायद उन्होंने ही रं लोगों को उस समय तिब्बत देश से लेकर नेपाल देश और पश्चिम कुमाउँ तक व्यापार करना सिखाया हो।
उस समय भी दारमा, चैंदास तथा व्यास घाटी रं लुंग्बा प्राीचन भोंट देश का भोंट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था। इस कारण केन्द्रीय तिब्बत राज शासक- प्रशासक इस प्राचीन भोंट प्रान्त को ‘रं लुंग्बा’ के तिब्बत सीमान्त (रं लुंग्बा) क्षेत्र को जबरदस्ती अपना मानते हुए, दारमा व्यापारियों से जबरदस्ती कर वसूलते थे। साथ ही तिब्बत का प्रशासक कित्ती फौजदार को उसके प्रभावशाली छवि, आर्थिक सम्पन्नता के कारण इस रं क्षेत्र (रं लुंग्बा दारमा) का क्षेत्राीय तरजम (एस.डी.एम.), छयासों (कर अधिकारी) साथ ही ज्युस्यों (व्यापारी मुखिया) भी उन्हीं को मानते थे। जबकि दारमा वासी फौजदार जी को दारमा घाटी क्षेत्र का व्यवस्था प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि) समझते थे और उनका आदर सम्मान कर उनकी बातों को मानते थे। श्री कित्ती फौजदार जी के प्रभावशाली छवि के परिणामस्वरूप 18वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी के मध्य तक की ज्ञानिमा-सिल्दी व्यापार मण्डी का व्यापार दर (कमिशन दर) तब तक तय नहीं होता था जब तक ग्वाल व्यापारी लोग वहाँ नहीं पहँुच जाते थे।उस बात का फायदा उठाकर ग्वाल व्यापारी देरी से व्यापार मण्डी स्थल पर कई दिनों पहले पहुंचते थे और अन्य ग्राम व्याापारियों को व्यापार मण्डी स्थल पहँुचने के बाद भी कई दिनों तक इन्तजार करना पड़ता था। इस कारण अन्य व्यापारी परेशान होते थे। बाद में ब्रिटिश राज के मसय इस गटतोक (कमीशन रेट) की बात दारमा व्यापारियों ने मिलकर कुमाउँ कमीश्नर प्रशासन के संज्ञान में लाया गया, तत्पश्चात ग्वालों का व्यापार दर तय करने का एकछत्र राज (अधिकार) समाप्त हुआ।
श्री कित्ती फौजदार अपने रं प्रतिनिधित्वकर्ता काल में अपने क्षेत्र के लिए उन्नति/ प्रगति का अवसर ढूंढते रहते थे, वे रं लुंग्बा से बाहर अन्य क्षेत्रों तक व्यापार का अवसर देखना चाहते थे। यह व्यापारिक सोच चाह के मुताबिक जल्दी सम्भव हीं था, क्योंकि उस समय इस रं क्षेत्रों का किसी भी प्रकार का अपना स्थायी शासनिक-प्रशासनिक ढांचा नहीं था। रं धरोहित बुजुर्गों के कहने के अनुसार आज से 250-300 साल पूर्व तक रं लुंग्बा जन जाड़ों के मौसम में (जब अत्यधिक ठण्ड पड़ी थी) दारमा घाटी वासी ‘सोबला-कंच्योति, व्यास घाटी वासी लामारी-मालिपा-लोलंको नामक स्थापन पर तीन-चार महीने जानवरों को पालने के वास्ते आते थे। फिर वापस अपने मूल ग्राम की ओर चले जाते थे। इन निम्न स्थानों से नीचे के क्षेत्र अस्कोट राज परिवार अपना जबरदस्ती भू-क्षेत्र अधिकार मानता था। तब दारमा, चैंदास और व्यास का रं लुंग्बा प्राचीन भोट देश का भोट प्रान्त ‘संयुक्त रं लुंग्बा’ कहलाता था। उस समय इस प्राचीन भोट प्रान्त- ‘रं लुंग्बा’ क्षेत्रा से बाहर ब्रिटिश राज कालीन भारतीय क्षेत्रों तक जाने के लिए सर्वप्रथम अस्कोट रजवार ‘राजशाही’ के अनुमति की आवश्यकता पड़ती थी। इस कारण को देखते हुए एक दिन कित्ती फौजदार जी ने अपनी योजना बनाई। श्री कित्ती फौजदार ने विशेष जयन्ती के अवसर का चयन कर एक दिन अपने अच्छे-अच्छे ढोल-नगाड़े ‘दमो-छेलंग’ बाजकों के साथ अस्कोट रजवार के समारोह स्थल- जनता दरबार पर अनुरोध् प्रार्थना पत्रा और उपहार लेकर पहँुचे। महोदय हमारे रं जनों को आपके सीमान्त राज क्षेत्रों में जाड़ों के मौसम में 4-5 महीने धूप सेकने, जानवरों को चराने तथा व्यापार करने की अनुमति दी जाए। शायक रजवार ने कहा- राजकाज के नियमानुसार बिना किसी स्पद्धा/द्वन्द प्रतियोगिता जीते बिना ऐसी अनुमति देने का कोई प्रावधान नहीं साथ ही कहा- कित्ती, कुश्ती, दमो बाजा और क्षलिया नाच निम्न से किसी एक प्रतियोगिता का चयन कर तैयार रहना। फौजदार ने उस समय की परिस्थिति को देखते हुए डोल- नगाड़े (दमों) बजाने की प्रतियोगिता स्वीकार की ली। प्रतियोगिता अगले दिन करवाई गई और दोनों टीम/पक्ष का घण्टा परस्पर बाजा द्वन्द्व चलता रहा, उस वर्तमान परिस्थिति को समझते हुए, काका फौजदार ने अपने कलाकारों ‘दमों बाजकों’ का रं बोली में ‘जन्सु ला छयानी’ अर्थात (ग्वन संस्कार/ मृत्यु संस्कार वाला बाजा बजाने का संकेत दिया) यह कहते ही इन दमों (बाजे)कों ने उल्टा दमों बाजा बजाया। इन दमों बाजा की कला पर रजवार पक्ष प्रतियोगिता टक्कर नहीं दे पाये, (वे इस कला से दमों बना नहीं पाये) और वे हार गये। ‘दमो बाजा’ की कला केवल रं समाज में ही मृत्यु संस्कार में बजाये जाते हैं। इस प्रकार डोल-नगाड़े (दमों) प्रतियोगिता में श्री कित्ती फौजदार कलाकार पक्ष की जीत हुई। अस्कोट रजवार राजशाही को उनकी बात माननी पड़ी। तब से रं जनों को कंच्योति से नीचे रजवार परिसीमन जौलजीवी तल्लाबगड़ तक जाड़ों में बसने की अनुमति मिली, उस समय गोरी नदी की सरहद से लेकर एलागाड़ तक तक क्षेत्रा को मल्ला अस्कोट क्षेत्रा कहते थे।
रं लोग सन् 1950 तक रजवार क्षेत्रों में अस्थायी झोपड़ी बनाकर रहते थे और दारमा वापस जाते समय झोपड़ी जला देते थे। धीरे-धीरे स्थायी घर बनने लगे। उसी के परिणाम स्वरूप आज धारचूला तहसील से जौलजीवी तक अनेक रं गाँव बसे हुए हैं। अस्कोट दमों प्रतियोगिता विजय के बाद गोरखा शासन काल में श्री कित्ती फौजदार, नेपाल देश की राजधानी-काठमाण्डू राजशाही दरबार तक पहँुचे। श्री कित्ती जी, रं लुंग्बा के वे पहले व्यक्ति थे, जो इतने सुदूर से काठमाण्डू पहुंचे और अपनी क्षेत्रा की बात रखी। उनकी ‘प्रखर वक्ता’, अपने क्षेत्र के प्रभावशाली छवि, अस्कोट रजवार से सम्बन्ध्, तिब्बत से व्यापारिक सम्बन्धित के नाते उन्हें अपने पक्ष में लेने के लिए नेपाल राजशाही दरबार ने उनको ‘फौजदार’ की पदवी से सम्मानित किया। साथ ही उनकी कार्य कुशलता, कार्य प्रबन्धन नीति को देखते हुए उनको नेपाल की ओर से दारमा घाटी में शासन चलाने के लिये सन् 1813 में लाल मुहर और काला मुहर प्रदान कर न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों की आधिकारिक जिम्मेदारी सौंपी। उनके अनुरोध् पर रं लोगों को नेपाल के दार्चुला क्षेत्र में जाड़ों में रहने तथा अपने क्षेत्रों में व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी। सही मायने में श्री कित्ती फौजदार जी ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने रं लोगों को अपने क्षेत्रों से बाहर नये अवसरों को ढूंढने के लिए प्रेरित किया। इसके फलस्वरूप धारचूला तहसील क्षेत्रा के सैकड़ों गाँवों में से मात्रा रं समुदाय के लोग ही दूर-दूर तक व्यापार के लिए जाते रहे। जब भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत से व्यापार बन्द हुआ तब रं लोगों का व्यापर विकल्प नेपाल के सिलगड़ी, धनगड़ी, बेतड़ी, आछम, बयालमाटा, बजंग आदि और अन्य महत्वपूर्ण व्यापारिक सहयोग रहा। हम मानें या न मानें इसका श्रेय श्री कित्ती फौजदार जी को जाता है। क्योंकि उन्होंने ही लीक से हटकर, निडर होकर नया अवसर ढूंढ़ना और सफल होना सिखाया। इस कारण प्राचीन भोट प्रान्त रं लुंग्बा से बाहर व्यापारिक पटकथा के भूमिगत रचना/भूमिगत आधर तैयार करने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति वे ही थे। हमारी ओर से उन्हें नमन, उन्हें हमेशा याद कर रखना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
रं प्रतिनिधि श्री कित्ती फौजदार की मृत्यु के बाद उनका राजपाठ कार्यभार उनके उत्तराधिकारी पुत्र श्री मुंडवा सिंह ग्वाल ने सम्भाला। श्री मुंडवा ने अपनी दारमा प्रतिनिधि काल में उतनी ख्याति प्राप्त नहीं की, जितनी ख्याति पिता कित्ती जी की रही। फिर भी वे रं लुंग्बा परिसीमन के लिए लड़े, अस्कोट राज्य रजवार के साथ हुए परिसीमन विवाद को लेकर अंग्रेज शासन-प्रशासन के न्यायालय तक पहँुचे। ग्वाल जी ने अल्मोड़ा जिला न्यायालय में ठोस साक्ष्यों के साथ अपने पक्ष को रखा। न्यायालय ने तथ्यों पर गहन विचार विमर्श कर अन्त में श्री मुंडवा ‘ग्वाल साहब’ को सीमा विवाद पर विजय घोषित किया। इस विजय फैसले पर ग्वाल साइब पक्ष समूह जन जब विजय उल्लास के साथ लौट रहे थे उस समय अस्कोट-जौलजीवी के मध्य ग्राम गर्जिया, गोरी नदी पुल से अस्कोट राज्य षड्यन्त्रकर्ताओं ने विश्वासघात कर ग्वाल साहब को नदी में धकेल कर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार रं लुंग्बा ग्वाल प्रतिनिधित्वकर्ता का शासन काल समाप्त हुआ। लेकिन इतिहास की यह बातें हमेशा के लिये अमर हैं।

पंचेश्वर से उत्तरकाशी तक पैदल यात्रा करने वाले टी.सी.पपनै

परिचय
पर्यावरण संरक्षण के लिये जसपुर-टनकपुर में भी किया प्रदर्शन
डाॅ. पंकज उप्रेती
पर्यावरण संरक्षण व जनचेतना के नाम पर हो-हल्ला मचाती भीड़ से हटकर ठोस कार्य करने वालों में त्रिलोचन पपनै अग्रणीय हैं। 89 वर्ष के श्री टी.सी. पपनै ने सुन्दरलाल बहुगुणा के साथ पंचेश्वर से उत्तरकाशी तक पैदल यात्रा करते हुए पर्यावरण का सन्देश दिया था। तराई-भाबर में यूकेलिप्टस के विरोध् में आन्दोलन छेड़ने वाले इस समाजसेवी ने जसपुर से टनकपुर तक पदयात्रा करते हुए समाज को चेताया था। सरकारी सेवा में तहसीलदार पद से सेवानिवृत्त पपनै जी अपनी राजकीय सेवा में भी कर्मठ और उर्जावान बनकर समाज को जोड़ते रहे। सामाजिक सरोकारों से जुड़े श्री पपैन ने हर हमेशा समाज को संरक्षक के रूप में संवारा। हल्द्वानी के जजफार्म क्षेत्रा को नियोजित तरीके से बसाने में वह सक्रिय रहे। क्षेत्रवासियों के साथ बैठकें करते हुए नित कोई न कोई गतिविधि वह करते रहे हैं। उनका त्याग-तपस्या उनके परिवार के रूप में समाज के सामने है। उन्हें कभी भी किसी पद-प्रतिष्ठा का गुमान नहीं रहा है, वह सीधा-सादा जीवन व्यतीत करने पर विश्वास करते हैं और समाज को भी उनका यही सन्देश रहा है। लोक चेतना मंच, हिमालय संगीत शोध् समिति सहित कई संस्थाओं में वह संरक्षक के रूप में रहे हैं। उनका लेखक रूप भी है, उन्होंने 1982 में कमल साहित्यालंकार (कृतित्व एवं व्यक्तित्व) पुस्तक का प्रकाशन करते हुए पहाड़ के साहित्यकार के परिचय के बहाने अपने पहाड़ अनुराग को प्रकट किया। पहाड़ की संस्कृति, कला, बोली-भाषा को उन्होेंने नई पीढ़ी के लिये प्रस्तुत किया। ‘धरती पर दूधातोली’, ‘झुरमुट’ कविता संग्रह, ‘मेरा गाँव’ उनकी कृतियां हैं। इस समय उनका कविता संग्रह ‘फुहार’ भी तैयार हो चुका है, जो अप्रकाशित है।
6 अगस्त 1931 को जन्मे त्रिलोचन पपनै (त्रिलोक चन्द्र पपनै) का मूल निवास ग्राम घुग्ती केलानी अब चेक केलान, पट्टी मल्ला चैकाटे, देघाट जिला अल्मोड़ा है। पिता स्व.ईश्वरीदत्त पपनै व माता शारदा देवी घर जन्मे त्रिलोक चन्द्र पपनै राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त कर अध्यापन कार्य से कर्म क्षेत्र में पर्दापण कर चुके थे, जो बाद में राजस्व विभाग में तहसीलदार पद से सेवानिवृत्त हुए। राजकीय सेवा के बाद विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर पर्यावरण, नशामुक्ति, महिला एवं वाल विका आदि कार्यों में भाग लेकर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हैदराबाद, उदयपुर सहित राज्य व क्षेत्रीय सम्मेलनों में मुख्य भूमिका में रहे। ़क्षेत्र पंचायत हल्द्वानी के बीडीसी सदस्य रहे श्री पपनै को उत्कृष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पदक सहित अनेकों प्रशस्ति पत्र मिल चुके हैं। हल्द्वानी के विकास पुरम् जजफार्म रहने वाले टी.सी.पपनै जी की पत्नी श्रीमती सावित्री पपनै भी बहुत ही उदार महिला हैं। इनके पुत्र- स्व.विनोद, बहु ललिता (अध्यापिका), पौती दीप्ती (अमेरिकाद), पौता दिव्यांशु (दुबईद्ध, दूसरे पुत्र अशोक (जसपुर शूगर मिल में),बहू मंजू, पौता दीपक (एयरफोर्सद), भारतेन्दु (;ताइवान में), तीसरे पुत्र कैलाश पपनै (शिक्षक), बहू श्रीमती हंशा, पौता पौती- मेघा व देवांश हैं।

झुमली आक्रमणकारियों का दारमा लुंग्बा पर प्रथम और अन्तिम आक्रमण

इतिहास-कथा
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बाबरे-बाबरे,
कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो खानदा छन
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नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त/प्रदेश) के व्याँस और चाौंदास दोनों घाटी में ‘हुमला झुमला’ प्रान्त के झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित-लूटपाट समय- अन्तराल (समय-समय) में होता रहता था।
इस घटनाक्रम के बारे में दारमा घाटी के जन भी परस्पर पारिवारिक सम्बन्ध् होने के नाते समय-समय पर सुनते रहते थे, क्योंकि दारमा रं जन का सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक सम्बन्ध् आदि समयकाल से ही व्याँस और चाौंदाँसियों से होता रहा है। ये उस समय की बात है जब दारमा घाटी के निवासी कन्चोती तथा व्याँसी लोग लोंलको नामक स्थान के आसपास से नीचले क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से आ-जा नहीं सकते थे। क्योंकि इसके नीचे का परिक्षेत्र अस्कोट राज्य के अधीन माना जाता था, जबकि उस समय दारमा व्याँसी और चाौंदासियों का क्षेत्र स्वतंत्र भोट देश का भोट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ कहलाया जाता था। भोंट प्रदेश ‘रं लंुग्बा’ का उस समय अपना मजबूत प्रशासनिक ढाँचा नहीं था। इस कारण पड़ोसी देश नेपाल के प्रान्तीय शासक इस क्षेत्र पर अपना जबरदस्ती परिसीमन समझता था और गाये-बगाये उनके कर्मचारी इस भोंट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ परिक्षेत्र में आकर जबरदस्ती कर वसूलते थे, मना करने पर आतंकित लूटपाट करते थे। व्याँस-चाौंदास दोनों घाटी के लोग बार-बार जबरदस्ती कर वूसूली-आतंकित लूटपाट से तंग आ चुके थे। इस कारण वसूली व लूटपाट से पार पाने के लिए दोनों घाटी के लोगों ने सामूहिक परस्पर समूह में झुमली मुकाबला कार्यक्रम कर झुमलियों का दमन योजना बनाते थे। फिर भी ये क्षेत्रा वर्तमान-नेपाल के नजदीक के नजदीक परिसीमन होने के कारण ये अत्याचारी झुमला आक्रमण कारियों की टोली जबरदस्ती कर वसूली करके और न मानने पर आतंकित लूटपाट कर तुरन्त बिना हमारे क्षेत्र काली नदी वार ठहरे, काली नदी पार कर वापास नेपाल क्षेत्र में लौट जाते थे।
उस समयकाल में जैसे-जैसे झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित लूटपाट क्षेत्रा बढ़ता जा रहा था। तब हम दारमावासियों ने सोचा एक दिन ये झुमली लोग हमारे लुंग्बा में भी जबरदस्ती कर वसूली और आतंक कर सकते हैं। ये सोच कर दारमावासियों ने समय रहते एक रणनीति बनाते हुए व्यास-चाौंदास झुमली दमन योजना के तर्ज पर दारमा वासियों ने झुमली से मुकाबले की योजना बनाई। रणनीति अनुसार दारमा झुमली संहारक योद्धाओं की टीम तैयार कर झुमलियों से मुकाबला करने के लिए स्थान का चयन किया गया। यह स्थान ‘बालिंग से गंबैनाती’ की ओर ‘गंबैनाती से बालिंग’ की ओर का लगभग मध्य स्थान ‘जैं गुरु सैं’ स्थल के नजदीक का स्थान चुना था, जो अत्यधिक संकरा और अत्यधिक खतरनाक चट्टानी मार्ग था, इस संकरे चट्टानी रास्ते का चयन करने का मुख्य लाभ यह था कि इस रास्ते के उपर 40-50 मी. की उफँचाई पर एक सुरंगनुमा गुफा है, जिसे हम सब रं जन गंबैनाती फु के नाम से जानते हैं। यह फु /गुफा आश्रय के लिए सुरक्षित गुफा है। इसी गुफा के नजदीक और संकरे चट्टाननुमा रास्ते के 20-25 मी. उपर से झुमलियों पर आक्रमण करना सबसे उचित और सुरक्षित रहेगा, यह समझते हुए हमारे धरोहित बुजुर्ग रणनीतिकारों ने इस स्थान को झुमलियों से मुकाबले के लिए चुना। कहा जाता है कि इस सुरंगनुमा गुफा (गंबैनाती फु) में सुरक्षित वातावरण में आराम से लगभग 5-6 ग्रामवासी रहने तक का स्थान था, ये गुफा सर्वप्रथम प्राचीन काल में तकरीबन ढाई से तीन किमी. दूर ग्राम बालिंग ब्यैंक्से बुग्याली नामक स्थान तक खुलता था। ‘दारमावासी वीर रक्षक योद्धाओं ने नदी से बड़े-बड़े गोल पत्थर लाकर गुफा में इकट्ठे किए।
एक दिन ऐसा समय आ ही गया, झुमली आक्रमणकारियों की टोलियों ने व्यास-चाौंदास के ग्राम-रिमझिम की चोटी को पार कर दारमा, दैर्रीयंग/हैर्री, लांगदारमा फकल नामक प्राचीन ग्राम स्थान से बोंगलिंग नदी पार कर बोंगलिंग-वर्थिंग होते हुए, दारमा के अन्य ग्रामों में प्रवेश करने वाले हैं। इसकी सूचना सुदूर दारमा में मिलते ही यहाँ के दारमावासियों ने ‘झुमली संहारक योद्धाओं की पूरी टीम सदस्यों’ ने झुमली मुकाबला चयन स्थान में अपने-अपने ढाल, तलवार, हथियार, गोलनुमा पत्थर और खाने-पीने का सामान, हमी (सत्तू के आटे से तैयार चर्पा/लड्डूनुमा खाद्य पदार्थ और अन्य खाद्य सामग्री एकत्रित कर सभी दारमा के नौजवान योद्धा एकत्रित होकर झुमलियों के मुकाबले के इन्तजार मंे एकत्रित हो गए। 4-5 दिन इन्तजार करने के बाद अगले दिन झुमलियों का काफिला बालिंग से गंबैनाती की ओर आते देखा गया। जैसे ही दारमावासियों के द्वारा चयनित गुफा के ठीक नीचे चट्टानी संकरे रास्ते झुमलियों की टोली 10-15 मीटर चट्टानी रास्ते के मध्य सीध्े-आगे गुजरने ही वाली थी, तुरन्त सभी नौजवानों ने झुमली संहारक योद्धाओं ने उन पर एकाएक लगातार देर तक पत्थरों के गोले बरसाये, अचानक हुए इस खतरनाक हमले से झुमली लोग घबरा गए, कुछ झुमली इस हमले में गम्भीर रूप से घायल हो गए, बांकी झुमलियों ने अपने रास्ते से पीछे हटना ही ठीक समझा और वे सभी पीछे हट गये। आगे बढ़ना पीछे लौटने से कहीं ज्यादा खतरनाक था क्योंकि आगे बढ़ने-पीछे हटने के लिए वही एकमात्रा रास्ता था, नीचे नदी उपर बिल्कुल खतरनाक चट्टान।
झुमली लोग जान बचाते हुए, कुछ दूर वापस जाकर उपर खतरनाक चट्टानी गुफा के नजदीक में एकत्रित हुए लोगों को देखा कि वे लोग एक हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हें। इस क्रियाकलाप को देखकर वे चकित रह गए और वे यह कहते वापस भागे ‘बाबरे-बाबरे कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो (पत्थर) लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो (पत्थर) खानदा छन’ (अरे ये कैसे लोग हैं कए हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हैं) जबकि वे योद्धाओं दूसरे हाथ से सत्तू/हमी और लड्डूनुमा चर्पा का गोलनुमा खाद्य पदार्थ खा रहे थे। दूसरे हाथ से पत्थर खाने की ऐसी खतरनाक क्रिया समझकर वे झुमली लोग भाग गए। फिर दोबार उन्होंने इस प्रकार का जबरदस्ती कर वसूली-आतंकित लूटपाट करने की स्वतंत्र भारत गणराज्य बनने तक कोई कोशिश नहीं की। उस समय झुमली आतंकित लुटेरे-आक्रमणकारियों के द्वारा किया गया यह झुमली आक्रमण 20वीं शताब्दी से पहले का और पिछले ‘प्राचीन काल में हुआ जैं श्री हुरबी पहलवान-झुमली मुकाबला’ के बाद का लुंग्बा में किया गया प्रथम और अन्तिम आतंकित लुटेरे झुमली आक्रमण का मुकाबला था।
ऐसा मैंने बड़े बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी और अमटीकर लेखों से पढ़ी सही कथनों के निष्कर्ष निकालते हुए यह संक्षिप्त विवरण दिया है।
यह 17वीं-18वीं शताब्दी के मध्य की घटना मानी जाती है बाद में कूर्मांचल (कुमाउ) को गोरखा शासन ने अपने अधीन कर लिया था तब भी प्राचीन भोंट प्रान्त- रं लुंग्बा स्वतंत्र था।
हमारे पूर्वज जनों का हम पर यह कर्ज हमेशा रहेगा जिन्होंने हमें सुरक्षित रखा। जय हो हमारे पूर्वज ध्रोहर रणनीतिकार, जय हो हमारे रक्षक वीर योद्धा (झुमली संहारक योद्धा))।

पलायन की मार झेल रहे हैं सीमान्त के गाँव

तिब्बत तथा भारत के बीच सीमान्त क्षेत्र में रहने वाले मानव समूहों के लिये ‘भोटिया’ शब्द प्रयुक्त किया गया है परन्तु वास्तव में इससे भ्रम होने लगता है। कई संस्कृतियों के इस हिमालय में निरन्तर शोध् होते रहे हैं। इसी विषय पर पी.एन.जी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामनगर के एसो.प्रोफेसर डाॅ.गिरीश पन्त का एक शोधपत्र प्रस्तुत है। -सम्पादक
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भोटिया वास्तव में कोई जाति नहीं है। ये इस जातीय सम्बोधन को पसन्द भी नहीं करते हैं। अंग्रेज प्रशासकों ने इनकी बसासत और तिब्बत से सम्बन्धों के चलते इन्हें गलती से भोटिया पुकारना शुरु कर दिया जबकि इन्हें मारछा, ताल्छा, जोहारी, शौक, दारमी, चैंदासी और व्याॅसी के नाम से सम्बोधित किया जाना चाहिये था। -डाॅ.आर.एस.टोलिया
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डाॅ.गिरीश चन्द्र पन्त
भारत और तिब्बत के बीच का सीमान्त क्षेत्रा अत्यन्त दुर्गम और हिमाच्छादित पहाड़ी क्षेत्रा होने के कारण ही भारत ने सामरिक कारणों से भोटियों को जनजाति का दर्जा दिया था। इस तथ्य के पीछे धारणा थी कि ये लोग अपने स्थानों पर बने रह कर, अपना विकास कर सकें और सामरिक दृष्टि से अति सम्वेदनशील इस इलाके को निर्जन न होने दें। ये लोग प्राचीन काल से भारतवर्ष की उत्तरी सीमा की प्रहरी जाति रही हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत के लिए व्यापार बन्द हो जाने के कारण इन लोगों का इन दुर्गम एवं जीवन के लिए अति कठिन क्षेत्र में निवास करना निरर्थक हो गया है, ऐसी स्थिति में भारत सरकार ने भी नहीं सोचा कि बिना आजीविका के कोई भी आबादी ऐसे विकट भौगोलिक परिस्थिति वाले और शेष दुनिया से कटे दुर्गम क्षेत्र में कैसे टिक सकेगी। हालांकि इन जीवट कर्मवीरों ने उस हालात में भी जीने का काफी कुछ साजो सामान जुटा ही लिया, दूसरी ओर सम्पन्न होते जाते इन लोगों के लिए शीत मरुस्थलीय गाँवों में टिके रहने की मजबूरी भी जाती रही। इस सीमान्त क्षेत्र से बहुत तेजी से जनसंख्या का पलायन होने के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पुनः खतरा उत्पन्न हो गया है। पड़ोसी देश चीन द्वारा इस सामरिक क्षेत्रा में सीमा का उल्लंघन करना आम बात हो गयी है। यह विचारणीय प्रश्न आज भारत राष्ट्र के सम्मुख है कि इन पर्वत पुत्रों का अपनी थाती-माटी से पलायन कैसे रोका जाए। चीनी आक्रमण के बाद तिब्बत से व्यापार बन्द होने से यहाँ के निवासियों के पुश्तैनी व्यापार पर तो असर पड़ा ही है, साथ ही उत्तराखण्ड के लोगों को सस्ते एवं सुलभ उनी वस्त्रों से भी वंचित होना पड़ा है। पर्वतीय समाज के द्वारा प्रयोग किया जाने वाला चट्टानी नमक की आपूर्ति भी बन्द हो गयी है। तिब्बत से व्यापार बन्द होने के कारण भोटियों की लाखों बकरियाँ उन पर बोझ बन गयी हैं। इसलिए अब उनकी बकरियों की संख्या लाखों की जगह मात्रा हजारों में रह गयी है। इसका सीधा असर उत्तराखण्ड के उनी उत्पादन पर भी पड़ा है। मांग और पूर्ति में भारी अन्तर होने के कारण ठण्डे पहाड़ों के लिये अति आवश्यक उनी कपड़े आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गये हैं, उनकी जगह सिन्थैटिक धागों के वस्त्रों ने ले ली है जो कि पर्यावरण की दृष्टि से खतरनाक होने के साथ ही स्वास्थ्य के लिए भी अनुपयुक्त माने गये हैं।
तिब्बत से व्यापार बन्द होने तथा बकरियों की संख्या में कमी के चलते यहाँ के निवासियों ने आजीविका के लिए नये विकल्प ढूँढ लिये। दूसरी ओर इनके द्वारा हस्तशिल्प के रूप में बनाए जाने वाले गलीचे, दन, थुल्मे, कम्बल, उनी वस्त्र आदि की परम्परागत कला के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा। वन एवं वन्य जीव संरक्षण के नाम पर सरकार ने फूलों की घाटी और नन्दादेवी बायोस्पफीयर जैसे कई बुग्याली क्षेत्र आरक्षित कर दिए, अतः चारागाहों से वंचित इन पशुपालकों का बकरी पालन भी अत्यन्त प्रभावित हो गया। जिसका सीधा असर हस्तशिल्प एवं प्राचीनतम कुटीर उद्योग पर पड़ा, जबकि इनका कुटीर उद्योग सम्पूर्ण पर्वतीयों के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय था। यहाँ के लोग स्थानीय उत्पादों से शराब बनाने में माहिर माने जाते हैं शराब इनके जीवन से जुड़ी हुई है। ठण्ड से बचने के साथ यह इनके देवी-देवताओं से जुड़ी हुई वस्तु भी है।
देश की आन्तरिक सुरक्षा पर 17 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री जी अध्यक्षता में दिल्ली मेें आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बताया कि पिछले 5 साल (सन् 2007 से 2012 तक) चीन के गश्ती दलों की ओर से भारतीय सीमा में 37 बार घुसपैठ हुई है। उन्होंने इसके साथ ही नेपाली सीमा पर वामपंथी उग्रवाद पनपने की आशंकाओं का हवाला देते हुए उत्तराखण्ड के 5 सीमावर्ती जिलों के सभी 34 विकासखण्डों को सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम (बीएडीपी) में शामिल करने और पुलिस बल के आधुनिकीकरण के लिये पूरा धन केन्द्र की तरफ से उपलब्ध् कराये जाने की भी मांग की। उन्होंने उत्तराखण्ड में चीन से सटी 350 किमी लम्बी सीमा में चीन की तरफ से चमोली जिले के बाड़ाहोती इलाके में भारतीय दावे को विवादित करने की चीन की कोशिशों का प्रमुखता से उल्लेख किया। मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड ने इस बैठक में कहा कि चीन के गश्ती दलों ने 2006 में 6 बार, 2007 में दो बाद, 2008 में दस बार, 2009 में 11 बार, 2011 में 5 बार और 2012 में तीन बार सीमा सीमा उल्लंघन किया है। सीमावर्ती इलाकों में मजबूत सड़क सम्पर्क की जरूरतों पर जोर देते हुए उन्होंने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से ज्यादे रोड़े न अटकाए जाने की भी अपील की। उन्हेांने भारत से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर चीन की तरफ से सड़ राजमार्ग बनाए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें भी सीमावर्ती सड़कों के निर्माण की प्रक्रिया तेज करनी पड़ेगी। इसी तरह नेपाल से सटी 275 किमी लम्बी सीमा पर भी सुरक्षा की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश की अहम सामरिक स्थिति एवं सम्वेदनशीलता के मद्देनजर सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा और संचार तन्त्र स्थापित करना जरूरी है। नेपाली प्रान्त महाकाली अँचल में नेपाली माओवादी एवं यंग कम्युनिस्ट लीग सक्रिय है। महाकाली इलाके से लगे उत्तराखण्ड क्षेत्र में भाकपा (माओवादी) पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी तैनात करना चाहती है। खुफिया सूत्रों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि माओवादी इस इलाके में अपने आन्दोलन का विस्तार करना चाहते हैं। मुख्यमंत्री का सुझाव था कि सीमा पार से इस खतरों को ध्यान में रखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर खुफिया नेटवर्क सुधाराजाए। साथ ही केन्द्रीय बल सतर्कता एवं निरीक्षण भी तेज किया जाए।
चीन द्वारा 2020 में लद्दाख एवं गलवान में दिखाया गया कपटपूर्ण व्यवहार एवं पड़ोसी देश नेपाल द्वारा चीन के साथ सुर से सुर मिलाना, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्राी की उपरोक्त शंकाओं को सौ प्रतिशत सिद्ध करता है। पड़ोसी देशों की सेनाओं द्वारा की जा रही घुसपैठों को सदा सीमान्त के निवासियों ने पहले पकड़ा है चाहे वह घुसपैठ पाकिस्तान द्वारा की गयी हो, चीन, नेपाल अथवा बांगलादेशियों द्वारा। चिन्ता का विषय है कि आज उत्तराखण्ड का सीमान्त क्षेत्र दिन पर दिन जनविहीन होता जा रहा हे। यहाँ के मूल निवासी पर्वत पुत्र सुख सुविधाओं के आभाव में अन्यत्र जाकर बसने के लिए मजबूर होते जा रहे हैं ऐसी परिस्थिति में यक्ष प्रश्न उठता है कि कौन करेगा? इस सीमान्त क्षेत्र की रक्षा। उत्तराखण्ड राज्य के सीमान्त निवासियों को भोटिया नाम से जाना जाता है। डाॅ. आर.एस.टोलिया ने अपनी पुस्तक (गे्रेट ट्राइवल डाइवर्सिटी आॅफ उत्तराखण्ड) में उल्लेख किया है कि भोटिया वास्तव में कोई जाति नहीं है ये इस जातीय सम्बोधन को पसन्द भी नहीं करते हैं। उनका मानना है कि अंग्रेज प्रशासकों ने इनकी बसासत और तिब्बत से सम्बन्धों के चलते इन्हें गलती से भोटिया पुकारना शुरु कर दिया जबकि इन्हें मारछा, ताल्छा, जोहारी, शौक, दारमी, चैंदासी और व्याॅसी के नाम से सम्बोधित किया जाना चाहिये था। हिमालय गजेटियर में एटकिंसन ने कहा है कि भोटिया शब्द की उत्पत्ति भोट शब्द से हुई है जो कि ‘बोड’ शब्द का अपभ्रन्श है। इसका अर्थ तिब्बत से लगाया जाता है और इसी भोट शब्द ने भोटिया नाम को जन्म दिया है, जिसे कालान्तर में तिब्बत तथा भारत के बीच सीमान्त क्षेत्र में रहने वाले मानव समूहों के लिये प्रयुक्त किया गया। एटकिंसन ने इन्हें खस मानने से इन्कार करने के साथ ही इनकी भाषा के आधार पर इन्हें तिब्बत मूल का माना है। लेकिन इस समूह के विद्वानों का कहना है कि एटकिंसन एक प्रशासक था वह भाषा विज्ञानी नहीं था। बी.एस.चटर्जी ने लिखा है कि भोटिया शब्द का प्रयोग भारत-तिब्बत सीमा में निवास करने वाले अनेक नृःजातीय समूहों के लिए किया जाता है, जिनकी आदतें कुछ समान होते हुए भी अन्य मानव जातियों से भिन्न शारीरिक विशेषताएँ होती हैं। देखा जाय तो भोटिया भारत-तिब्बत सीमा पर सीमान्त प्रहरी की तरह बसे हुए हैं और अगर भारतीय के बजाय उन्हें तिब्बती कहा जाय तो उनकी भावनाओं का आहत होना स्वाभाविक ही हे। सम्भवतः तिब्बत से व्यापारिक सम्बन्ध् होने तथा वहाँ के निवासियों के साथ ‘ज्ञानकोषी’ और ‘पानकोषी’ (खानपान के रिश्ते) सम्मिलित होना सुदृढ़ मैत्री का यथार्थ प्रमाण माना जाता था। शिवराज सिंह रावत निःसंग का मानना है कि व्यापारिक समुदाय के सम्बन्ध् अतीत में वैदिक परम्पराओं से जुड़े थे। कालान्तर में इस जाति ने विष्णुगंगा क्षेत्र माणा, धवल गंगा क्षेत्र में नीती-गमसाली, जान्हवी क्षेत्र में डुण्डा, हरसिल नेलंग, धारचूला और व्यास- चाौंदास जैसे उपयोगी मार्गों के सिरोभाग में अपना निवास स्थान चुना। उत्तराखण्ड की विभिन्न घाटियों में सदियों से निवास कर रही भोटिया जनजाति को विभिन्न नामों से जाना जाता है। धारचूला के रं, मुन्स्यारी के शौका, माणा के मारछा, नीती घाटी के तोल्छा तथा उत्तरकाशी के जाड़ भोटियों का रहन-सहन, बोली भाषा तथा वेशभूषा भिन्न है। पूर्व में इनमें से एक समूह दूसरे से वैवाहिक सम्बन्ध् नहीं रखते थे। गढ़वाल में मारछा जनजाति के मूल गाँव माणा, गमसाली, नीति और बम्पा हैं, जबकि तोल्छा लोगों के मूल गाँव कोसा, कैलाशपुर, फकरिया, मलारी, जेलम, फाक्ती, द्रोणागिरी, लाता, रेणी, सुराईकोठा और सुबाई आदि हैं। सुबाई, मल्लागाँव और सुक्की जैसे कुछ गाँवों में दोनों जातियों की मिश्रित आबादी निवास करती है। तोल्छा स्वयं को उची जाति मानते हैं। उत्तरकाशी जिले के भटवाड़ी तहसील के भोटिया जाड़, निलंग तथा जाडुंग घाटियों के मूल निवासी हैं। इन सभी जातियों में अत्यधिक सांस्कृतिक भिन्नताएं हैं जैसे मारछा, तोल्छा स्वयं को क्षत्रियों के करीब मानते हैं तो जाड़ तिब्बतियों की तरह बौद्ध हैं। परन्तु दोनों का मूल एक ही माना जाता है। गढ़वाल के भोटिया स्वयं को राम का वंशज मानते हैं ये केवल क्षत्रियों से अपना सम्बन्ध् कायम रखते हैं। ‘वाल्टन’ ने भी माना है कि भोटिया किसी भी तरह से तिब्बतियों से समरूप नहीं हैं। हालांकि इनके गुण शक तातार जाति से मिलते हैं। राहुल सांस्कृत्यायन ने भी लिखा है कि भाषा, पहनावे तथा शारीरिक बनावट के साथ कतिपय अन्य समानताओं के चलते भोटियों को तिब्बती कहना उचित नहीं है।
भोटिया वास्तव में जाजीविका के लिए एक घुमन्तू और व्यापारिक मानव समूह रहा है। भारत तथा तिब्बत के बीच में रहनेे तथा दोनों भू-भागों में व्यापार करने के लिए उन्हें एक ऐसी विलक्षण भाषा की जरूरत पड़ी जो कि न दुनिया के अन्य क्षेत्रों में बोली जाती हो और ना ही दूसरा व्यापारिक वर्ग उसे समझता हों। इसीलिए इनकी बोली को सांकेतिक भाषा भी कहा जाता हे। भोटिया अन्य हिमालयी जनजातियों की तरह खेती या वनों पर आधारित कभी भी नहीं रहे। उनकी आजीविका का मुख्य साध्न व्यापार रहा हे। सन् 1962 से पहले व्यास घाटी के व्यापारी लिपुलेख दर्रे से तकलाकोट, दारमा घाटी के व्यापारी न्यू धूरासे छाकरा, जोहार के उटाधूरा होते हुए ज्ञानिमा, नीति वाले बाड़ाहोती से दाबा, माणा के व्यापारी थोलिंग और निलंग के व्यापारी चपराॅग आदि तिब्बती मण्डयों में जाकर व्यापार करते थे। उस समय नमक एवं सुहागा तिब्बत का मुख्य उत्पाद था। इनका तिब्बत से कई बहुमूल्यवस्तुओं का व्यापार होता था इनमें भेड़-बकरी, भोटिया घोड़े, भारद्वाज घोड़े, हुण्डेर, च्यालपू, चॅवर पूंछ, तिब्बती उन (पश्मीना) तिब्बती कालीन, चमड़ा, सुहागा, राॅगा, तिब्बती नमक, मूंगा, हींग, लालजड़ी, जहरमोहरा और वन ककड़ी आदि जड़ी-बूटियाँ शामिल थीं। इनके सीमावर्ती गाँव हर तरह से व्यापार के डिपो थे। भोटिया व्यापारियों ने तिब्बत से ही उनी कारोबार करना सीखा था। उनी वस्त्रों में थुलमा, गुदमा, दन्न, चैपट्टा पट्टू, लावा,ख् आॅगड़ा, कालीन, पंखी एवं शटन आदि तथा चाॅद या राँछ पर उनी वस्त्र बुनना भी भोटियों ने तिब्बत से ही सीखा था। कुछ अन्य जातियों की तरह भोटिया जनजाति एक जगह पर स्थिर नहीं रही फिर भी इन्हें खानाबदोश नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि इनकी बसासत साल में कुछ निश्चत स्थानों में ही होती थी। तिब्बत नजदीक होने के कारण नीती, माणा, चैदास और जोहार जैसी उफँचाई वाली घाटियों में भीषण भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद भोटिया वहाँ रहते थे। वे क्षेत्रा गर्मियों के लिए भोटियों की बकरियों के हिसाब से अनुकूल थे और वहाँ व्यापारिक वस्तुओं का संग्रह भी कर लेते थे। सीमान्त की विकट जलवायु का भोटिया जनजाति के खानपान, रहन-सहन पहनावा, जीवन शैली एवं व्यवहार पर गहरा प्रभाव रहा है। प्राकृतिक पर्यावरण का उनकी शारीरिक बनावट पर भी असर पड़ा है। उत्तराखण्ड राज्य के जिस क्षेत्र में ये भोटिया रहते हैं उस भू-भाग का एक चैथाई भाग 6 माह बर्फ से ढका रहता है। हवा अधिक चलने के कारण यहाँ गर्मियों में भी तापमान अत्यधिक घट जाता है इसीलिए इनकी बस्तियाँ प्रायः ऐसी धूप वाली ढलानों पर होती हैं, जिन पर सूर्य की सीधी किरणें पड़ती हैं। भारी हिमपात को ध्यान में रखते हुए घरों की छतें तिरछी या शंक्वाकार होती हैं ताकि बर्फ फिसल कर नीचे आ जाए। इनके परम्परागत मकान मिट्टी, पत्थर से बने होते थे। पश्चिम में मारछा, तोलछा और जाड़ भोटियों की बसासतों में पत्थर के स्लेटों की कमी के कारण मकान की छातें भोजपत्र वृक्ष की मोटी छालों से या देवदार के तख्तों से ढकी जाती थी।
भोटिया समूह विवाहोत्सव को बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं। विवाहोत्सव का जश्न शराब के बिना अध्ूरा माना जाता है। चमोली के भोटिया जनजाति पौणा नृत्य (बारात का नृत्य) इतना लोकप्रिय होता जा रहा है कि इसका आयोजन गैर भोटिया कार्यक्रमों में होने लगा है। शोध् कर्ताओं ने पाया कि जाड़, दारमी, व्यासी और चैदासी भोटियों में ममेरे, फुफेरों में वैवाहिक सम्बन्ध् हो सकते हैं जबकि अन्य में देवर और साली के साथ विवाह की अनुमति है। लेकिन जब से भोटिया लोगों ने गंगाड़ी ठाकुरों से रिश्ते कायम करने शुरू किये तब से वे अपने को राजपूत मानने लगे हैं, इनके कुछ उप समूहों में कन्या शुल्क लेने की प्रथा रही है जबकि मारछा, तोल्छा तथा जोहारियों में यह परम्परा कभी नहीं रही है।
डाॅ. आर.एस.टोलिया का कहना है कि अब भोटिया समाज में भी दहेज की बीमारी फैल रही है। भोटिया महिलाओं में माँग में सिन्दूर, गले में हार तथा नाक में नथ विवाहित महिला की पहचान होती है। अपनी पुस्तक ‘द शेड्यूल्ड ट्राइब्स’ में के.एस. सिंह ने लिखा है कि सिक्किम के उत्तरी जिलों में 1981 तक बहुपति प्रथा के मामले दर्ज हुए थे। सिक्किम के भोटिया अपने मुर्दे को उसे लेकर 49 दिन तक घर के अन्दर ही रखकर शोक मनाते हैं और इसके बाद मुर्दे का अन्तिम संस्कार किया जाता है। बरसी के अवसर पर लामचे संस्कार होता है।
जाड़ भोटिया समुदाय ने हिन्दू और तिब्बत की बौद्ध संस्कृति का एक अनूठा समन्वय स्थापित किया है। वे एक तरह से तिब्बती त्यौहार को हिन्दू तरीके से मनाते हैं। तिब्बत की सीमा से लगे हुए जाढुंग, नेलाॅग से विस्थापित कर डूंडा में बसाए गए और पहले से ही बगोरी में रह रहे जनजाति समुदाय के लोग डुंडा के वीरपुर में स्थायी रूप से बस गये हैं। कण्डाली त्यौहार रं भोटिया समुदाय के लिए महाकुम्भ जैसा है, जो कि पूरे 12 वर्ष बाद मनाया जाता है। इस अवसर पर देश-विदेश में फैले इस समुदाय के लोग अपने गाँवों में लौट आते हैं। सीमान्त की चाौंदास घाटी में हर बारह वर्षों बाद बुराई का प्रतीक मानी जाने वाली (कंडाली) पौधे को रं समुदाय द्वारा नष्ट किया जाता है। कहा जाता है कि इस पौधे में बारह वर्ष में एक बार फूल खिलते हैं। जोहारियों के अलावा शेष भोटिया समुदाय का साल में दो बार निवास परिवर्तन होता है। जबकि जोहारी भोटिया साल में तीन बार निवास बदलते हैं। उनका पहला निवास तिब्बत सीमा के एकदम निकट दस हजार से 19 हजार पिफट की उफँचाई पर होता है। मिलम, मर्तोली, बुपर्फू, माणा, लवन आदि बुग्याल हैं। जोहारियों के स्थाई घर 7000 से 7500 फिट की उचाई पर होते हैं। जहाँ अपेक्षाकृत कम ठण्ड पड़ती है। इनका तीसरा ठिकाना भाबर के निकट होता था जो कि समुद्र तल से 2500 से लेकर 3500 फिट की उचाई तक स्थित है। शेष दो बार जलवायु या मौसम के हिसाब से निवास बदलते हैं।
2011 की जनगणना से पहले अगर 12001 की जनगणना के आॅकड़ों पर ध्यान दें तो हमें उत्तराखण्ड में निवास करने वाली अन्य चार जनजातियों में से भोटिया जनजाति प्रत्येक क्षेत्र में सबसे आगे नजर आती है। वे उत्तराखण्ड की अन्य सामान्य जातियों की तुलना में भी तरक्की के मामले में सबसे आगे दिखाई देते हैं। 2001 की जनगणना के आॅकड़ों के अनुसार यद्यपि उत्तराखण्ड में जन जातियों की 93.8 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है लेकिन इनमें से सर्वाधिक 25.8 प्रतिशत आबादी नगरीय क्षेत्रों में रहती है। सन् 2001 में प्रदेश की जनजातियों का लिंगानुपात 950 स्त्री प्रति हजार था लेकिन भोटिया जनजाति में सर्वाधिक 1049 लिंगानुपात दर्ज किया गया है। उस दौरान सभी जन जातियों का साक्षरता प्रतिशत 63.2 था जबकि अकेली भोटिया जनजाति का प्रतिशत 79.9 था। उस दौरान जब राज्य की जनजातियों के 5 से लेकर 14 साल के 76.6 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते थे जबकि भोटिया जनजाति के 86.4 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते थे। जनगणना में प्रदेश की जनजातियों के 4.3 प्रतिशत लोग ही स्नातक और परास्नातक स्तर तक शिक्षित पाये गये। इनमें भी सर्वाध्कि 11.6 प्रतिशत स्नातक और उससे उपर की कक्षाओं के छात्र भोटिया (सीमान्त) जनजाति के थे। सन् 2001 की जनगणना मेें जन जातियों की 41.1 प्रतिशत आबादी कर्मकार में दर्ज की गयी। कुल कर्मकारों या कर्मियों में सर्वाधिक 41.1 प्रतिशत भोटिया और सबसे कम 34.9 प्रतिशत बुक्सा जनजाति के लोग थे। प्रख्यात इतिहासकार पद्मश्री प्रो.शेखर पाठक का मानना है कि सन् 1967 में आरक्षण मिलने के बाद भोटान्तिक क्षेत्रा की आबादी का बड़ा हिस्सा आरक्षण मिलने के बाद राजकीय नौकरियों में आना शुरु हुआ है जिससे भोटान्तिक में सदियों से विकसित विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक आर्थिक परिदृश्य एकदम बदल गया, बल्कि ध्वस्त हो गया है। उत्तरकाशी से लेकर पिथौरागढ़ तक लगभग 300 किमी लम्बी भारत तिब्बत सीमा के निकट नीति-माणा और व्यास-दारमा घाटियों में बसे भेटिया समुदाय के लोगों द्वारा बड़े पैमाने पलायन किये जाने से ये सीमान्त क्षेत्रा तेजी से निर्जन होते जा रहे हैं। यह पलायन नहीं रोका गया तो देश की सुरक्षा के सामने एक गम्भीर चुनौती खड़ी हो जायेगी। पिथौरागढ़ जिले में तिब्बत से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से जुड़ी व्यास, चैदास घाटियाँ खाली हो गयी है। इन घाटियों के नाबी, रौंगकौंग, गुंजी, गब्र्यांग, बूँदी, सीपू, मार्छा, तिदाँग, गो में, दातू में, दुग्तू, बाने में, बालिंग, चल में, नाग्लिंग में और सेला जैसे सीमान्त गाँव लगभग खाली हो गए हैं। महिलाओं का उल्लेख किये बिना इस समाज का मूल्यांकन अध्ूरा रह जाएगा। यहाँ की महिलाएं गर्म कपड़ों की बुनाई में सि(हस्त होती हैं। उनमें प्रोसेसिंग, डाइंग और उन बुनने की परम्परागत कला संस्कार के तौर पर माँ से बेटी के पास जाती है। अन्य पर्वतीय महिलाओं की तरह उन पर खेती की जिम्मेदारी नहीं होती है। उनमें पुरुषों के साथ काम का बंटवारा भी समान नहीं होता है, वे अन्य पहाड़ी महिलाओं की तरह पुरुषों के बाद भोजन करने की प्रथा को भी नहीं मानती क्योंकि उन्हें भोजन आदि कार्यों को निपटा कर बुनाई जैसे कार्यों में जुटना होता है। ये व्यापार के साथ घरेलू कच्ची शराब बनाने में भी माहिर होती हैं। समाज में शराब केवल जीवन एवं संस्कृति का अंग ही नहीं बल्कि आर्थिकी का भी अभिन्न अंग होती है। कठिन जलवायु के कारण ये शारीरिक रूप से अत्यन्त मजबूत, ताकतवर एवं जीवट होती हैं। ये अन्य पहाड़ी महिलाओं की तरह संकोची नहीं होती हैं। चिपको आन्दोलन के बगैर जिस प्रकार दुनिया भर में पर्यावरण की चर्चा अध्ूरी है, उसी प्रकार बिना गौरा देवी की चर्चा किए भोटिया महिलाओं की जीवटता, शौर्य और अदम्य साहस के साथ पर्यावरण चेतना की बातें भी अध्ूरी हैं। बेजुबान वृक्षों की रक्षक इन वीरांगनाओं ने हिमालय की उपत्यकाओं से वृक्षखोरों के खिलापफ जो गर्जना की वह दुनिया के कोने-कोने तक प्रतिध्वनित हुई, वह गौरा देवी भी कोई और नहीं बल्कि एक भोटिया महिला थी। जिसने सीमान्त नीति घाटी में स्थित रैणी गाँव की जनजाति महिलाओं के सहयोग से 26 मार्च 1974 को कुल्हाड़ियों तथा बन्दूकों से लैस वन ठेकेदार के मजदूरों, वन कर्मियों के साथ ठेकेदार के दबंगों को जंगल से इस तरह भगाया कि वे दुबारा पीछे मुड़कर न देख सके। गौरा देवी के साथ रैणी गाँव की उमा देवी, गुमती देवी, गोमा देवी, परसा देवी, मूसी देवी, हरकी देवी, तिलाड़ी देवी, संग्रामी देवी एवं बाली देवी जैसी वीरांगनाओं की टोली आजीवन बनी रही। हाथ में तकली, पीठ पर कपड़े से बंध बच्च और सामने एक डगर पहाड़ी पगडण्डी, लकड़ी के राॅच पर रंग-बिरंगे धगों के ताने-बानों में उलझी सीमान्त की ये नारियाँ सचमुच जिन्दगी के रंग-बिरंगे सपनों की प्रेरणा देती हैं, वे खाली कभी भी नहीं बैठती हैं। इन महिलाओं में वो अदम्य साहस होता है कि इतिहास उनके पीछे चलता है। गगनचुम्बी हिम शिखरों का गर्वमर्दन करने वाली बछेन्द्रीपाल और चन्द्रप्रभा ऐतवाल ये वो नारियाँ हैं जिन्होंने अपनी हिम्मत और हौंसले का डंका सारी दुनिया में बजाया है। पूर्व में जसुली देवी ने अपनी पूरी सम्पत्ति अंग्रेज कमिश्नर सर हेनरी रैमजे को पैदल यात्रियोें की सुविध हेतु धर्मशालाओं के निर्माणार्थ सौंप दी थी। उन्होंने लगभग तीन सौ धर्मशालाएं बनवाई जिनके अवशेष आज भी यत्र-तत्र पाये जाते हैं। इसी तरह गंगोत्री गरब्याल को शिक्षा के क्षेत्र में सन् 1964 मेें राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया था। आज सीमान्त के गाँव वीरान होते जा रहे हैं जो सामरिक दृष्टि से अत्यन्त चिन्ता का विषय है। इस सीमान्त गाँवों में बच्चों के लिए प्राइमरी स्कूल तक न होने के कारण ये सीमान्तक लोग बच्चों की पढ़ाई की खातिर अब मूल गाँवों में लौटने के बजाय नीचे की घाटियों में ही स्थायी रूप से रहने लगे हैं। अपने विराट स्वरूप और सर्वाधिक उचाई जैसी विशेषताओं के कारण अगर हिमालय भारत वर्ष का ताज कहा जाता है तो इनके मूल निवासी उसकी जीवटता, उद्यमशीलता, प्रगतिशीलता तथा विशिष्ट संस्कृति को देखते हुए भारत वर्ष के आदिम जाति समूह का सरताज अवश्य ही कहे जा सकते हैं। मध्य हिमालय की भोटिया जनजाति इसी क्षेत्र की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत वर्ष की जनजातियों में सर्वाधिक विकसित तो है ही, इनकी खुशहाली एवं समृद्धि गैर जनजातीय लोगोें के लिए भी अनुकरणीय उदाहरण है। इस जनजाति का ऐसा विकास किसी दैवीय चमत्कार या खास प्राकृतिक सम्पदा के कारण नहीं हुआ है वरन इनकी हिम्मत, कठिन परिश्रम और लगन का परिणाम है। इन्होंने भीषणतम भौगोलिक परिस्थितियों एवं प्रतिकूल जलवायु में खुशी से जीने की कला भी सीखी औरर इन कठिनतम परिस्थितियों ने उनके अन्दर के पौरुष को ललकार कर उन्हें व्यापार के जरिये अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिये प्रेरित भी किया। ये जनजाति के लोग कुशाग्र बुद्धि, कड़ी मेहनत और जन्मजात विनम्रता का ही परिणाम है कि वे आज प्रत्येक क्षेत्र में अपना विशेष स्थान रखते हैं। ये उत्तराखण्ड राज्य ही नहीं भारत राष्ट्र की सेवा में अपना अतुलनीय योगदान प्रदान कर रहे हैं। उत्तराखण्ड राज्य गठन के मात्रा 20 वर्षों के अन्तराल में ही इस मानव समूह ने प्रदेश के मुख्य सचिव, सूचना आयुक्त देने के साथ दर्जनों आइएएस आईपीएस, आईएपफएस, पीसीएस, पीपीएस सैकड़ों डाक्टर, इंजीनियर तथा सहस्त्रों की संख्या में अन्य नौकरशाह देने के साथ ही प्रदेश के उद्योग और व्यापार में भी अहम भूमिकाा अदा करते हुए दूसरे समुदायों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण इस मानव समूह में किसी प्राचीन या अर्वाचीन श्रेष्ठ मानव नस्ल का अंश होने का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
पड़ोसी देश चीन एवं नेपाल की सीमा से लगे हुए सीमान्त गाँवों का निर्जन हो जाना भारत राष्ट्र की सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त चिन्ता का विषय है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही पड़ोसी देश चीन के साथ चल रहा सीमा विवाद, चीन द्वारा पड़ोसी देश तिब्बत को हड़प लेना, नेपाल जैसे शान्त देश को भारत के खिलाफ उकसाये रखना, उत्तराखण्ड की सीमाओं में घुसपैठ करना, सन् 2020 से चीन द्वारा सम्पूर्ण सीमा में विवाद खड़ा किए रखना। दूसरी ओर सीमान्त के गाँवों का उजड़ना एवं जन विहीन होना बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। उत्तराखण्ड सरकार एवं भारत रकार को समय रहते जागना होगा सीमान्त के जनविहीन गाँवों में पर्यटन हब विकसित करना होगा। अन्यथा की स्थिति में भारत राष्ट्र को सीमाओं की सुरक्षा एवं सामरिक महत्व के दृष्टिगत सीमान्त के इन निर्जन गाँवों को भारत तिब्बत सीमा पुलिस अथवा सेना को सौंपना होगा।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-
यात्राएं जीवन यात्राएं: लेखकर डाॅ. प्रयाग जोशी।
हिमलायन गजेटियर ग्रन्थ-2, भाग2, एटकिंसन। अनुवाद प्रकाश थपलियाल
हिमालय दर्शन: लेखक दिगम्बर दत्त थपलियाल
उत्तराखण्ड का सामाजिक एवं साम्प्रदायिक इतिहास: लेखक प्रो. डी.डी.शर्मा
उत्तराखण्ड जनजातियों का इतिहास लेखक जयसिंह रावत
हिमालयन गजेटियर ग्रन्थ-2, भाग-1, एटकिंसन, अनुवाद- प्रकाश थपलियाल
उत्तराखण्ड इयर बुक: सम्पादक लोकेश नवानी।
कुमाउ का इतिहास: लेखक बद्रीदत्त पाण्डेय
उत्तराखण्ड ज्ञानाकोष: लेखक प्रो. डी.डी.शर्मा
पहाड़ 14-15 अस्कोट-आरोकोट अभियान अंक। सम्पा.शेखर पाठक
पहाड़ 14-15 पिथौरागढ़-चम्पावत अंक, सम्पादक शेखर पाठक
पहाड़ स्मृति अंक: एक 20-21- 2019, सम्पादक शेखर पाठक
पहाड़ 18 हिमालयी समाज, संस्कृति, इतिहास 2012-13। सम्पा. शेखर पाठक
पहाड़ चम्पावत अंक-2
पहाड़ 19 गिर्दा के आयाम 2015